आध्ुनिक भारत की संस्कृति एक विकसित शतदल कमल के समान है जिसका एक - एक दल एक - एक प्रांतीय भाषा और उसकी साहित्य - संस्कृति है। किसी एक को मिटा देने से उस कमल की शोभा ही नष्ट हो जाएगी। हम चाहते हैं कि भारत की सब प्रांतीय बोलियाँ जिनमें सुंदर साहित्य सृष्िट हुइर् है, अपने - अपने घर में ;प्रांत मेंद्ध रानी बनकर रहें, और आध्ुनिक भाषाओं के हार की मध्य मण्िा हिंदी भारत भारती होकर विराजती रहे। रवींद्रनाथ ठावुफर प्रेमचंद ;1880.1936द्ध 31 जुलाइर् 1880 को बनारस के करीब लमही गाँव में जन्मे ध्नपत राय ने उदर्ू में नवाब राय और ¯हदी में प्रेमचंद नाम से लेखन कायर् किया। निजी व्यवहार और पत्राचार ध्नपत राय नाम से ही करते रहे। उदूर् में प्रकाश्िात पहला कहानी संग्रह ‘सोशेवतन’ अंग्रेश सरकार ने जब्त कर लिया। आजीविका के लिए स्वूफल मास्टरी, इंस्पेक्टरी, मैनेजरी करने के अलावा इन्होंने ‘हंस’, ‘माध्ुरी’ जैसी प्रमुख पत्रिाकाओं का संपादन भी किया। वुफछ समय बंबइर् ;मुंबइर्द्ध की प्िाफल्म नगरी में भी बिताया़लेकिन वह उन्हें रास नहीं आइर्। यद्यपि उनकी कइर् कृतियों पर यादगार प्िाफल्में़बनीं। आम आदमी के दुख - ददर् के बेजोड़ चितेरे प्रेमचंद को उनके जीवन काल में ही कथा सम्राट, उपन्यास सम्राट कहा जाने लगा था। उन्होंने हिंदी कथा लेखन की परिपाटी पूरी तरह बदल डाली थी। अपनी रचनाओं में उन्होंने उन लोगों को प्रमुख पात्रा बनाकर साहित्य में जगह दी जिन्हें जीवन और जगत में केवल प्रताड़ना और लांछन ही मिले थे। 8 अक्तूबर 1936 में उनका देहावसान हुआ। प्रेमचंद ने जितनी भी कहानियाँ लिखीं वे सब मानसरोवर शीषर्क से आठ खंडों में संकलित हैं। उनके प्रमुख उपन्यास हैं - गोदान, गबन, प्रेमाश्रम, सेवासदन, निमर्ला, कमर्भूमि, रंगभूमि, कायाकल्प, प्रतिज्ञा और मंगलसूत्रा ;अपूणर्द्ध। अभी तुम छोटे हो इसलिए इस काम में हाथ मत डालो। यह सुनते ही कइर् बार बच्चों के मन में आता है काश, हम बड़े होते तो कोइर् हमें यों न टोकता। लेकिन इस भुलावे में न रहिएगा, क्योंकि बड़े होने से वुफछ भी करने का अध्िकार नहीं मिल जाता। घर के बड़े को कइर् बार तो उन कामों में शामिल होने से भी अपने को रोकना पड़ता है जो उसी उम्र के और लड़के बेध्ड़क करते रहते हैं। जानते हो क्यों, क्योंकि वे लड़के अपने घर में किसी से बड़े नहीं होते। प्रस्तुत पाठ में भी एक बड़े भाइर् साहब हैं, जो हैं तो छोटे ही, लेकिन घर में उनसे छोटा एक भाइर् और है। उससे उम्र में केवल वुफछ साल बड़ा होने के कारण उनसे बड़़ी - बड़ी अपेक्षाएँ की जाती हैं। बड़ा होने के नाते वह खुद भी यही चाहते और कोश्िाश करते हैं कि वह जो वुफछ भी करें वह छोटे भाइर् के लिए एक मिसाल का काम करे। इस आदशर् स्िथति को बनाए रखने के पेफर में बड़े भाइर् साहब का बचपना तिरोहित हो जाता है। बड़े भाइर् साहब मेरे भाइर् साहब मुझसे पाँच साल बड़े, लेकिन केवल तीन दरजे आगे। उन्होंने भी उसी उम्र मंे पढ़ना शुरू किया था, जब मैंने शुरू किया लेकिन तालीम जैसे महत्त्व के मामले मंे वह जल्दबाशी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन की बुनियाद खूब मशबूत डालना चाहते थे, जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी - कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्ता न हो, तो मकान वैफसे पायेदार बने। मैं छोटा था, वह बड़े थे। मेरी उम्र नौ साल की थी, वह चैदह साल के थे। उन्हें मेरी तम्बीह और निगरानी का पूरा और जन्मसि( अिाकार था और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्म को कानून समझूँ। वह स्वभाव से बड़े अध्ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी काॅपी पर, किताब के हाश्िायों पर चिडि़यों, वुफत्तों, बिल्िलयों की तसवीरें बनाया करते थे। कभी - कभी एक ही नाम या शब्द या वाक्य दस - बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार - बार सुंदर अक्षरों मंे नकल करते। कभी ऐसी शब्द - रचना करते, जिसमें न कोइर् अथर् होता, न कोइर् सामंजस्य। मसलन एक बार उनकी काॅपी पर मैंने यह इबारत देखी - स्पेशल, अमीना, भाइयों - भाइयों, दरअसल, भाइर् - भाइर्। राधेश्याम, श्रीयुत राधेश्याम, एक घंटे तक - इसके बाद एक आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने बहुत चेष्टा की कि इस पहेली का कोइर् अथर् निकालूँ, लेकिन असपफल रहा। और उनसे पूछने का साहस न हुआ। वह नौवीं जमात में थे, मैं पाँचवीं में। उनकी रचनाओं को समझना मेरे लिए छोटा मुँह बड़ी बात थी। मेरा जी पढ़ने में बिलवुफल न लगता था। एक घंटा भी किताब लेकर बैठना पहाड़ था। मौका पाते ही होस्टल से निकलकर मैदान में आ जाता और कभी वंफकरियाँ उछालता, कभी कागश की तितलियाँ उड़ाता और कहीं कोइर् साथी मिल गया, तो पूछना ही क्या। कभी चारदीवारी पर चढ़कर नीचे वूफद रहे हैं। कभी पफाटक पर सवार, उसे आगे - पीछे चलाते हुए मोटरकार का आनंद उठा रहे हैं, लेकिन कमरे में आते ही भाइर् साहब का वह रुद्र - रूप देखकर प्राण सूख जाते। उनका पहला सवाल यह होता - ‘कहाँ थे’? हमेशा यही सवाल, इसी ध्वनि में हमेशा पूछा जाता था और इसका जवाब मेरे पास केवल मौन था। न जाने मेरे मुँह से यह बात क्यों न निकलती कि शरा बाहर खेल रहा था। मेरा मौन कह देता था कि मुझे अपना अपराध स्वीकार है और भाइर् साहब के लिए उसके सिवा और कोइर् इलाज न था कि स्नेह और रोष से मिले हुए शब्दों में मेरा सत्कार करें। फ्इस तरह अंग्रेशी पढ़ोगे, तो ¯शदगी - भर पढ़ते रहोगे और एक हप़्ार्फ न आएगा। अंग्रेशी पढ़ना कोइर् हँसी - खेल नहीं है कि जो चाहे, पढ़ ले, नहीं ऐरा - गैरा नत्थू - खैरा सभी अंग्रेशी के विद्वान हो जाते। यहाँ रात - दिन आँखें पफोड़नी पड़ती हैं और खून जलाना पड़ता है, तब कहीं यह विद्या आती है। और आती क्या है, हाँ कहने को आ जाती है। बड़े - बड़े विद्वान भी शु( अंग्रेशी नहीं लिख सकते, बोलना तो दूर रहा। और मैं कहता हूँ, तुम कितने घोंघा हो कि मुझे देखकर भी सबक नहीं लेते। मैं कितनी मिहनत करता हूँ, यह तुम अपनी आँखों से देखते हो, अगर नहीं देखते, तो यह तुम्हारी आँखों का कसूर है, तुम्हारी बुि का कसूर है। इतने मेले - तमाशे होते हैं, मुझे तुमने कभी देखने जाते देखा है? रोश ही िकेट और हाॅकी मैच होते हैं। मैं पास नहीं पफटकता। हमेशा पढ़ता रहता हूँ। उस पर भी एक - एक दरजे में दो - दो, तीन - तीन साल पड़ा रहता हूँ, पिफर भी तुम वैफसे आशा करते हो कि तुम यों खेल - वूफद में वक्त गँवाकर पास हो जाओगे? मुझे तो दो ही तीन साल लगते हैं, तुम उम्र - भर इसी दरजे में पड़े सड़ते रहोगे? अगर तुम्हें इस तरह उम्र गँवानी है, तो बेहतर है, घर चले जाओ और मशे से गुल्ली - डंडा खेलो। दादा की गाढ़ी कमाइर् के रुपये क्यों बरबाद करते हो?य् मैं यह लताड़ सुनकर आँसू बहाने लगता। जवाब ही क्या था। अपराध तो मैंने किया, लताड़ कौन सहे? भाइर् साहब उपदेश की कला में निपुण थे। ऐसी - ऐसी लगती बातें कहते, ऐसे - ऐसे सूक्ित - बाण चलाते कि मेरे जिगर के टुकड़े - टुकड़े हो जाते और हिम्मत टूट जाती। इस तरह जान तोड़कर मेहनत करने की शक्ित मैं अपने में न पाता था और उस निराशा में शरा देर के लिए मैं सोचने लगता - ‘क्यों न घर चला जाउँफ। जो काम मेरे बूते के बाहर है, उसमें हाथ डालकर क्यों अपनी ¯शदगी खराब करूँ।’ मुझे अपना मूखर् रहना मंशूर था, लेकिन उतनी मेहनत से मुझे तो चक्कर आ जाता था, लेकिन घंटे - दो घंटे के बाद निराशा के बादल पफट जाते और मैं इरादा करता कि आगे से खूब जी लगाकर पढ°़Âगा। चटपट एक टाइम - टेबिल बना डालता। बिना पहले से नक्शा बनाए कोइर् स्कीम तैयार किए काम वैफसे शुरू करूँ। टाइम - टेबिल में खेलवूफद की मद बिलवुफल उड़ जाती। प्रातःकाल छः बजे उठना, मुँह - हाथ धो, नाश्ता कर, पढ़ने बैठ जाना। छः से आठ तक अंग्रेशी, आठ से नौ तक हिसाब, नौ से साढ़े नौ तक इतिहास, पिफर भोजन और स्वूफल। साढ़े तीन बजे स्वूफल से वापिस होकर आधा घंटा आराम, चार से पाँच तक भूगोल, पाँच से छः तक ग्रामर, आधा घंटा होस्टल के सामने ही टहलना, साढ़े छः से सात तक अंग्रेशी वंफपोशीशन, पिफर भोजन करके आठ से नौ तक अनुवाद, नौ से दस तक ¯हदी, दस से ग्यारह तक विविध - विषय, पिफर विश्राम। मगर टाइम - टेबिल बना लेना एक बात है, उस पर अमल करना दूसरी बात। पहले ही दिन उसकी अवहेलना शुरू हो जाती। मैदान की वह सुखद हरियाली, हवा के हलके - हलके झोंके, पुफटबाल की वह उछल - वूफद, कबंी के वह दाँव - घात, वाॅलीबाल की वह तेशी और पुफरती, मुझे अज्ञात और अनिवायर् रूप से खींच ले जाती और वहाँ जाते ही मैं सब वुफछ भूल जाता। वह जानलेवा टाइम - टेबिल, वह आँखपफोड़ पुस्तवेंफ, किसी की याद न रहती और भाइर् साहब को नसीहत और प़्ाफजीहत का अवसर मिल जाता। मैं उनके साये से भागता, उनकी आँखों से दूर रहने की चेष्टा करता, कमरे में इस तरह दबे पाँव आता कि उन्हें खबर न हो। उनकी नशर मेरी ओर उठी और मेरे प्राण निकले। हमेशा सिर पर एक नंगी तलवार - सी लटकती मालूम होती। पिफर भी जैसे मौत और विपिा के बीच भी आदमी मोह और माया के बंधन में जकड़ा रहता है, मैं पफटकार और घुड़कियाँ खाकर भी खेल - वूफद का तिरस्कार न कर सकता था। ;2द्ध सालाना इम्ितहान हुआ। भाइर् साहब पेफल हो गए, मैं पास हो गया और दरजे में प्रथम आया। मेरे औऱउनके बीच में केवल दो साल का अंतर रह गया। जी में आया, भाइर् साहब को आड़े हाथों लूँ - ‘आपकी वह घोर तपस्या कहाँ गइर्? मुझे देख्िाए, मशे से खेलता भी रहा और दरजे में अव्वल भी हूँ।’ लेकिन वह इतने दुखी और उदास थे कि मुझे उनसे दिली हमददीर् हुइर् और उनके घाव पर नमक छिड़कने का विचार ही लज्जास्पद जान पड़ा। हाँ, अब मुझे अपने उफपर वुफछ अभ्िामान हुआ और आत्मसम्मान भी बढ़ा। भाइर् साहब का वह रौब मुझ पर न रहा। आशादी से खेलवूफद में शरीक होने लगा। दिल मशबूत था। अगर उन्होंने पिफर मेरी पफजीहत की, तो साप़्ाफ कह दूँगा - ‘आपने अपना़खून जलाकर कौन - सा तीर मार लिया। मैं तो खेलते - वूफदते दरजे में अव्वल आ गया।’ शबान से यह हेकड़ी जताने का साहस न होने पर भी मेरे रंग - ढंग से सापफ शाहिर होता था कि भाइर् साहब का़वह आतंक मुझ पर नहीं था। भाइर् साहब ने इसे भाँप लिया - उनकी सहज बुि बड़ी तीव्र थी और एक दिन जब मैं भोर का सारा समय गुल्ली - डंडे की भेंट करके ठीक भोजन के समय लौटा, तो भाइर् साहब ने मानो तलवार खींच ली और मुझ पर टूट पड़े - देखता हूँ, इस साल पास हो गए और दरजे में अव्वल आ गए, तो तुम्हें दिमाग हो गया है, मगर भाइर्जान, घमंड तो बड़े - बड़े का नहीं रहा, तुम्हारी क्या हस्ती है? इतिहास में रावण का हाल तो पढ़ा ही होगा। उसके चरित्रा से तुमने कौन - सा उपदेश लिया? या यों ही पढ़ गए? महश इम्ितहान पास कर लेना कोइर् चीश नहीं, असल चीश है बुि का विकास। जो वुफछ पढ़ो, उसका अभ्िाप्राय समझो। रावण भूमंडल का स्वामी था। ऐसे राजाओं को चक्रवतीर् कहते हैं। आजकल अंग्रेशों के राज्य का विस्तार बहुत बढ़ा हुआ है, पर इन्हें चक्रवतीर् नहीं कह सकते। संसार में अनेक राष्ट्र अंग्रेशों का आिापत्य स्वीकार नहीं करते, बिलवुफल स्वाधीन हैं। रावण चक्रवतीर् राजा था, संसार के सभी महीप उसे कर देते थे। बड़े - बड़े देवता उसकी गुलामी करते थे। आग और पानी के देवता भी उसके दास थे, मगर उसका अंत क्या हुआ? घमंड ने उसका नाम - निशान तक मिटा दिया, कोइर् उसे एक चुल्लू पानी देने वाला भी न बचा। आदमी और जो वुफकमर् चाहे करे, पर अभ्िामान न करे, इतराये नहीं। अभ्िामान किया और दीन - दुनिया दोनों से गया। शैतान का हाल भी पढ़ा ही होगा। उसे यह अभ्िामान हुआ था कि इर्श्वर का उससे बढ़कर सच्चा भक्त कोइर् है ही नहीं। अंत में यह हुआ कि स्वगर् से नरक में ढकेल दिया गया। शाहेरूम ने भी एक बार अहंकार किया था। भीख माँग - माँगकर मर गया। तुमने तो अभी केवल एक दरजा पास किया है और अभी से तुम्हारा सिर पिफर गया, तब तो तुम आगे पढ़ चुके। यह समझ लो कि तुम अपनी मेहनत से नहीं पास हुए, अंधे के हाथ बटेर लग गइर्। मगर बटेर केवल एक बार हाथ लग सकती है, बार - बार नहीं लग सकती। कभी - कभी गुल्ली - डंडे में भी अंधा - चोट निशाना पड़ जाता है। इससे कोइर् सपफल ख्िालाड़ी नहीं हो जाता। सपफल ख्िालाड़ी वह है, जिसका कोइर् निशाना खाली न जाए। मेरे प़्ोफल होने पर मत जाओ। मेरे दरजे में आओगे, तो दाँतांे पसीना आ जाएगा, जब अलजबरा और जामेट्री के लोहे के चने चबाने पड़ेंगे और इंगलिस्तान का इतिहास पढ़ना पड़ेगा। बादशाहों के नाम याद रखना आसान नहीं। आठ - आठ हेनरी हो गुशरे हैं। कौन - सा कांड किस हेनरी के समय में हुआ, क्या यह याद कर लेना आसान समझते हो? हेनरी सातवें की जगह हेनरी आठवाँ लिखा और सब नंबर गायब। सपफाचट। सिप़्ाफर भी न मिलेगा, सिप़्ाफर भी। हो किस खयाल में। दरजनों तो जेम्स़हुए हैं, दरजनों विलियम, कोडि़यों चाल्सर्। दिमाग चक्कर खाने लगता है। आंधी रोग हो जाता है। इन अभागों को नाम भी न जुड़ते थे। एक ही नाम के पीछे दोयम, सोयम, चहारूम, पंचुम लगाते चले गए। मुझसे पूछते, तो दस लाख नाम बता देता। और जामेट्री तो बस, खुदा ही पनाह। अ ब ज की जगह अ ज ब लिख दिया और सारे नंबर कट गए। कोइर् इन निदर्यी मुमतहिनों से नहीं पूछता कि आख्िार अ ब ज और अ ज ब में क्या पफवर्फ़है, और व्यथर् की बात के लिए क्यों छात्रों का खून करते हो। दाल - भात - रोटी खाइर् या भात - दाल - रोटी खाइर्, इसमें क्या रखा है, मगर इन परीक्षकों को क्या परवाह। वह तो वही देखते हैं जो पुस्तक में लिखा है। चाहते हैं कि लड़के अक्षर - अक्षर रट डालें। और इसी रटंत का नाम श्िाक्षा रख छोड़ा है। और आख्िार इन बे - सिर - पैर की बातों के पढ़ने से प़्ाफायदा? इस रेखा पर वह लंब गिरा दो, तो आधार लंब से दुगुना होगा। पूछिए, इससे प्रयोजन? दुगुना नहीं, चैगुना हो जाए, या आधा ही रहे, मेरी बला से, लेकिन परीक्षा में पास होना है, तो यह सब खुरापफात़याद करनी पड़ेगी। कह दिया - ‘समय की पाबंदी’ पर एक निबंध लिखो, जो चार पन्नों से कम न हो। अब आप काॅपी सामने खोले, कलम हाथ में लिए उसके नाम को रोइए। कौन नहीं जानता कि समय की पाबंदी बहुत अच्छी बात है। इससे आदमी के जीवन में संयम आ जाता है, दूसरों का उस पर स्नेह होने लगता है और उसके कारोबार में उन्नति होती है, लेकिन इस शरा - सी बात पर चार पन्ने वैफसे लिखें? जो बात एक वाक्य में कही जा सके, उसे चार पन्नों में लिखने की शरूरत? मैं तो इसे हिमाकत कहता हूँ। यह तो समय की किप़्ाफायत नहीं, बल्िक उसका दुरुपयोग है कि व्यथर् में किसी बात को ठूँस दिया जाए। हम चाहते हैं, आदमी को जो वुफछ कहना हो, चटपट कह दे और अपनी राह ले। मगर नहीं, आपको चार पन्ने रँगने पड़ेंगे, चाहे जैसे लिख्िाए और पन्ने भी पूरे पुफलस्केप आकार के। यह छात्रों पर अत्याचार नहीं, तो और क्या है? अनथर् तो यह है कि कहा जाता है, संक्षेप में लिखो। समय की पाबंदी पर संक्षेप में एक निबंध लिखो, जो चार पन्नों से कम न हो। ठीक। संक्षेप में तो चार पन्ने हुए, नहीं शायद सौ - दो - सौ पन्ने लिखवाते। तेश भी दौडि़ए और धीरे - धीरे भी। है उलटी बात, है या नहीं? बालक भी इतनी - सी बात समझ सकता है, लेकिन इन अध्यापकों को इतनी तमीश भी नहीं। उस पर दावा है कि हम अध्यापक हंै। मेरे दरजे में आओगे लाला, तो ये सारे पापड़ बेलने पड़ेंगे और तब आटे - दाल का भाव मालूम होगा। इस दरजे में अव्वल आ गए हो, तो शमीन पर पाँव नहीं रखते। इसलिए मेरा कहना मानिए। लाख प़्ोफल हो गया हूँ, लेकिन तुमसे बड़ा हूँ, संसार का मुझे तुमसे कहीं श्यादा अनुभव है। जो वुफछ कहता हूँ उसे गिरह बाँिाए, नहीं पछताइएगा। स्वूफल का समय निकट था, नहीं इर्श्वर जाने यह उपदेश - माला कब समाप्त होती। भोजन आज मुझे निःस्वाद - सा लग रहा था। जब पास होने पर यह तिरस्कार हो रहा है, तो पेफल हो जाने पर तो शायद प्राण ही ले लिए जाएँ। भाइर् साहब ने अपने दरजे की पढ़ाइर् का जो भयंकर चित्रा खींचा था, उसने मुझे भयभीत कर दिया। स्वूफल छोड़कर घर नहीं भागा, यही ताज्जुब है, लेकिन इतने तिरस्कार पर भी पुस्तकों में मेरी अरुचि ज्यों - की - त्यों बनी रही। खेल - वूफद का कोइर् अवसर हाथ से न जाने देता। पढ़ता भी, मगर बहुत कम। बस, इतना कि रोश टास्क पूरा हो जाए और दरजे में शलील न होना पडे़। अपने ऊपर जो विश्वास पैदा हुआ था, वह पिफर लुप्त हो गया और पिफर चोरों का - सा जीवन कटने लगा। ;3द्ध पिफर सालाना इम्ितहान हुआ और वुफछ ऐसा संयोग हुआ कि मैं पिफर पास हुआ और भाइर् साहब पिफर पेफल हो गए। मैंने बहुत मेहनत नहीं की, पर न जाने वैफसे दरजे में अव्वल आ गया। मुझे खुद अचरज ़हुआ। भाइर् साहब ने प्राणांतक परिश्रम किया। कोसर् का एक - एक शब्द चाट गए थे, दस बजे रात तक इधर, चार बजे भोर से उधर, छः से साढ़े नौ तक स्वूफल जाने के पहले। मुद्रा कांतिहीन हो गइर् थी, मगर बेचारे पेफल हो गए। मुझे उन पर दया आती थी। नतीजा सुनाया गया, तो वह रो पड़े और ़़मैं भी रोने लगा। अपने पास होने की खुशी आधी हो गइर्। मैं भी पेफल हो गया होता, तो भाइर् साहब ़को इतना दुःख न होता, लेकिन वििा की बात कौन टाले! मेरे और भाइर् साहब के बीच में अब केवल एक दरजे का अंतर और रह गया। मेरे मन में एक वुफटिल भावना उदय हुइर् कि कहीं भाइर् साहब एक साल और प़्ोफल हो जाएँ, तो मैं उनके बराबर हो जाउँफ, पिफर वह किस आधार पर मेरी पफजीहत कर सवेंफगे, लेकिन मैंने इस विचार को दिल से ़बलपूवर्क निकाल डाला। आख्िार वह मुझे मेरे हित के विचार से ही तो डाँटते हैं। मुझे इस वक्त अपि्रय लगता है अवश्य, मगर यह शायद उनके उपदेशों का ही असर है कि मैं दनादन पास हो जाता हूँ और इतने अच्छे नंबरों से। अब भाइर् साहब बहुत वुफछ नरम पड़ गए थे। कइर् बार मुझे डाँटने का अवसर पाकर भी उन्होंने धीरज से काम लिया। शायद अब वह खुद समझने लगे थे कि मुझे डाँटने का अिाकार उन्हें नहीं रहा, या रहा भी, तो बहुत कम। मेरी स्वच्छंदता भी बढ़ी। मैं उनकी सहिष्णुता का अनुचित लाभ उठाने लगा। मुझे वुफछ ऐसी धारणा हुइर् कि मैं पास ही हो जाउँफगा, पढँ़Â या न पढँ, मेरी तकदीर बलवान है, इसलिए ़Âभाइर् साहब के डर से जो थोड़ा - बहुत पढ़ लिया करता था, वह भी बंद हुआ। मुझे कनकौए उड़ाने का नया शौक पैदा हो गया था और अब सारा समय पतंगबाशी की ही भेंट होता था, पिफर भी मैं भाइर् साहब का अदब करता था और उनकी नशर बचाकर कनकौए उड़ाता था। मांझा देना, कन्ने बाँधना, पतंग टूनार्मेंट की तैयारियाँ आदि समस्याएँ सब गुप्त रूप से हल की जाती थीं। मैं भाइर् साहब को यह संदेह न करने देना चाहता था कि उनका सम्मान और लिहाश मेरी नशरों में कम हो गया है। एक दिन संध्या समय, होस्टल से दूर मैं एक कनकौआ लूटने बेतहाशा दौड़ा जा रहा था। आँखें आसमान की ओर थीं और मन उस आकाशगामी पथ्िाक की ओर, जो मंद गति से झूमता पतन की ओर चला आ रहा था, मानो कोइर् आत्मा स्वगर् से निकलकर विरक्त मन से नए संस्कार ग्रहण करने जा रही हो। बालकों की पूरी सेना लग्गे और झाड़दार बाँस लिए इनका स्वागत करने को दौड़ी आ रही थी। किसी को अपने आगे - पीछे की खबर न थी। सभी मानो उस पतंग के साथ ही आकाश में उड़ रहे थे, जहाँ सब वुफछ समतल है, न मोटरकारें हंै, न ट्राम, न गाडि़याँ। सहसा भाइर् साहब से मेरी मुठभेड़ हो गइर्, जो शायद बाशार से लौट रहे थे। उन्होंने वहीं हाथ पकड़ लिया और उग्र भाव से बोले - इन बाशारी लौंडों के साथ धेले के कनकौए के लिए दौड़ते तुम्हें शमर् नहीं आती? तुम्हें इसका भी वुफछ लिहाज नहीं कि अब नीची जमात में नहीं हो, बल्िक आठवीं जमात में आ गए हो और मुझसे केवल एक दरजा नीचे हो। आख्िार आदमी को वुफछ तो अपनी पोशीशन का खयाल रखना चाहिए। एक शमाना था कि लोग आठवाँ दरजा पास करके नायब तहसीलदार हो जाते थे। मैं कितने ही मिडिलचियों को जानता हूँ, जो आज अव्वल दरजे के डिप्टी मैजिस्ट्रेट या सुप¯रटेंडेंट हैं। कितने ही आठवीं जमात वाले हमारे लीडर और समाचारपत्रों के संपादक हैं। बड़े - बड़े विद्वान उनकी मातहती में काम करते हैं और तुम उसी आठवें दरजे में आकर बाशारी लौंडों के साथ कनकौए के लिए दौड़ रहे हो। मुझे तुम्हारी इस कम अक्ली पर दुःख होता है। तुम शहीन हो, इसमें शक नहीं, लेकिन वह शेहन किस काम का जो हमारे आत्मगौरव की हत्या कर डाले। तुम अपने दिल में समझते होगे, मैं भाइर् साहब से महश एक दरजा नीचे हूँ और अब उन्हें मुझको वुफछ कहने का हक नहीं है, लेकिन यह तुम्हारी गलती है। मैं तुमसे पाँच साल बड़ा हूँ और चाहे आज तुम मेरी ही जमात में आ जाओ और परीक्षकों का यही हाल है, तो निस्संदेह अगले साल तुम मेरे समकक्ष हो जाओगे और शायद एक साल बाद मुझसे आगे भी निकल जाओ, लेकिन मुझमें और तुममें जो पाँच साल का अंतर है, उसे तुम क्या, खुदा भी नहीं मिटा सकता। मैं तुमसे पाँच साल बड़ा हूँ और हमेशा रहूँगा। मुझे दुनिया का और ¯शदगी का जो तजुरबा है, तुम उसकी बराबरी नहीं कर सकते, चाहे तुम एम.ए. और डीपिफल् और डी.लिट् ही क्यों न हो जाओ। समझ किताबें पढ़ने से नहीं आती, दुनिया देखने से आती है। हमारी अम्माँ ने कोइर् दरजा नहीं पास किया और दादा भी शायद पाँचवीं - छठी जमात के आगे नहीं गए, लेकिन हम दोनों चाहे सारी दुनिया की विद्या पढ़ लें, अम्माँ और दादा को हमें समझाने और सुधारने का अिाकार हमेशा रहेगा। केवल इसलिए नहीं कि वे हमारे जन्मदाता हैं, बल्िक इसलिए कि उन्हें दुनिया का हमसे श्यादा तजुरबा है और रहेगा। अमेरिका में किस तरह की राज - व्यवस्था है, और आठवें हेनरी ने कितने ब्याह किए और आकाश में कितने नक्षत्रा हैं, यह बातें चाहे उन्हें न मालूम हों, लेकिन हशारों ऐसी बातें हंै, जिनका ज्ञान उन्हें हमसे और तुमसे श्यादा है। दैव न करे, आज मैं बीमार हो जाउँफ, तो तुम्हारे हाथ - पाँव पूफल जाएँगे। दादा को तार देने के सिवा तुम्हें और वुफछ न सूझेगा, लेकिन तुम्हारी जगह दादा हांे, तो किसी को तार न दें, न घबराएँ, न बदहवास हों। पहले खुद मरश पहचानकर इलाज करेंगे, उसमें सपफल न हुए, तो किसी डाॅक्टर को बुलाएँगे। बीमारी तो खैर बड़ी चीश है। हम - तुम तो इतना भी नहीं जानते कि महीने - भर का खचर् महीना - भर वैफसे चले। जो वुफछ दादा भेजते हैं, उसे हम बीस - बाइर्स तक खचर् कर डालते हैं और पिफर पैसे - पैसे को मुहताज हो जाते हैं। नाश्ता बंद हो जाता है, धोबी और नाइर्र् से मुँह चुराने लगते हंै, लेकिन जितना आज हम और तुम खचर् कर रहे हैं, उसके आधे में दादा ने अपनी उम्र का बड़ा भाग इश्शत और नेकनामी के साथ निभाया है और वुफटुम्ब का पालन किया है जिसमें सब मिलकर नौ आदमी थे। अपने हेडमास्टर साहब ही को देखो। एम.ए. हंै कि नहीं और यहाँ के एम.ए. नहीं, आक्सपफोडर् के। एक हशार रुपये पाते हंैऋ लेकिन उनके घर का इंतशाम कौन करता है? उनकी बूढ़ी माँ। हेडमास्टर साहब की डिग्री यहाँ बेकार हो गइर्। पहले खुद घर का इंतशाम करते थे। खचर् पूरा न पड़ता था। कशर्दार रहते थे। जब से उनकी माता जी ने प्रबंध अपने हाथ में ले लिया है, जैसे घर में लक्ष्मी आ गइर् है। तो भाइर्जान, यह गरूर दिल से निकाल डालो कि तुम मेरे समीप आ गए हो और अब स्वतंत्रा हो। मेरे देखते तुम बेराह न चलने पाओगे। अगर तुम यों न मानोगे तो मैं ;थप्पड़ दिखाकरद्ध इसका प्रयोग भी कर सकता हूँ। मैं जानता हूँ, तुम्हें मेरी बातें शहर लग रही हैं।..मैं उनकी इस नयी युक्ित से नत - मस्तक हो गया। मुझे आज सचमुच अपनी लघुता का अनुभव हुआ और भाइर् साहब के प्रति मेरे मन में श्र(ा उत्पन्न हुइर्। मंैने सजल आँखों से कहा - हरगिश नहीं। आप जो वुफछ पफरमा़रहे हैं, वह बिलवुफल सच है और आपको उसके कहने का अिाकार है। भाइर् साहब ने मुझे गले से लगा लिया और बोले - मैं कनकौए उड़ाने को मना नहीं करता। मेरा भी जी ललचाता हैऋ लेकिन करूँ क्या, खुद बेराह चलँू, तो तुम्हारी रक्षा वैफसे करूँ? यह कतर्व्य भी तो मेरे सिर है। संयोग से उसी वक्त एक कटा हुआ कनकौआ हमारे ऊपर से गुशरा। उसकी डोर लटक रही थी। लड़कों का एक गोल पीछे - पीछे दौड़ा चला आता था। भाइर् साहब लंबे हैं ही। उछलकर उसकी डोर पकड़ ली और बेतहाशा होस्टल की तरप़्ाफ दौड़े। मैं पीछे - पीछे दौड़ रहा था। प्रश्न - अभ्यास मौख्िाक निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर एक - दो पंक्ितयों में दीजिए - 1.कथा नायक की रफचि किन कायो± मंे थी? 2.बड़े भाइर् साहब छोटे भाइर् से हर समय पहला सवाल क्या पूछते थे? 3.दूसरी बार पास होने पर छोटे भाइर् के व्यवहार में क्या परिवतर्न आया? 4.बड़े भाइर् साहब छोटे भाइर् से उम्र में कितने बड़े थे और वे कौन - सी कक्षा में पढ़ते थे? 5.बड़े भाइर् साहब दिमाग को आराम देने के लिए क्या करते थे? लिख्िात ;कद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;25.30 शब्दों मेंद्ध लिख्िाए - 1.छोटे भाइर् ने अपनी पढ़ाइर् का टाइम - टेबिल बनाते समय क्या - क्या सोचा और पिफर उसका पालन क्यों नहीं कर पाया? 2.एक दिन जब गुल्ली - डंडा खेलने के बाद छोटा भाइर् बड़े भाइर् साहब के सामने पहुँचा तो उनकी क्या प्रतििया हुइर्? 3.बड़े भाइर् साहब को अपने मन की इच्छाएँ क्यों दबानी पड़ती थीं? 4.बड़े भाइर् साहब छोटे भाइर् को क्या सलाह देते थे और क्यों? 5.छोटे भाइर् ने बड़े भाइर् साहब के नरम व्यवहार का क्या पफायदा उठाया?़;खद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;50.60 शब्दों मेंद्ध लिख्िाए - 1.बड़े भाइर् की डाँट - पफटकार अगर न मिलती, तो क्या छोटा भाइर् कक्षा मंे अव्वल आता? अपने विचार प्रकट कीजिए। 2.इस पाठ में लेखक ने समूची श्िाक्षा के किन तौर - तरीकों पर व्यंग्य किया है? क्या आप उनके विचार से सहमत हैं? 3.बड़े भाइर् साहब के अनुसार जीवन की समझ वैफसे आती है? 4.छोटे भाइर् के मन में बड़े भाइर् साहब के प्रति श्र(ा क्यों उत्पन्न हुइर्? 5.बड़े भाइर् की स्वभावगत विशेषताएँ बताइए? 6.बड़े भाइर् साहब ने ¯शदगी के अनुभव और किताबी ज्ञान में से किसे और क्यों महत्त्वपूणर् कहा है? 7.बताइए पाठ के किन अंशों से पता चलता है कि - ;कद्धछोटा भाइर् अपने भाइर् साहब का आदर करता है। ;खद्ध भाइर् साहब को ¯शदगी का अच्छा अनुभव है। ;गद्धभाइर् साहब के भीतर भी एक बच्चा है। ;घद्ध भाइर् साहब छोटे भाइर् का भला चाहते हैं। ;गद्ध निम्नलिख्िात के आशय स्पष्ट कीजिए - 1.इम्ितहान पास कर लेना कोइर् चीश नहीं, असल चीश है बुि का विकास। 2.पिफर भी जैसे मौत और विपिा के बीच भी आदमी मोह और माया के बंधन मंे जकड़ा रहता है, मंै पफटकार और घुड़कियाँ खाकर भी खेल - वूफद का तिरस्कार न कर सकता था। 3.बुनियाद ही पुख्ता न हो, तो मकान वैफसे पायेदार बने? 4.आँखें आसमान की ओर थीं और मन उस आकाशगामी पथ्िाक की ओर, जो मंद गति से झूमता पतन की ओर चला आ रहा था, मानो कोइर् आत्मा स्वगर् से निकलकर विरक्त मन से नए संस्कार ग्रहण करने जा रही हो। भाषा अध्ययन 1.निम्नलिख्िात शब्दांे के दो - दो पयार्यवाची शब्द लिख्िाए - नसीहत, रोष, आशादी, राजा, ताज्जुब 2.प्रेमचंद की भाषा बहुत पैनी और मुहावरेदार है। इसीलिए इनकी कहानियाँ रोचक और प्रभावपूणर् होती हंै। इस कहानी में आप देखेंगे कि हर अनुच्छेद में दो - तीन मुहावरों का प्रयोग किया गया है। उदाहरणतः इन वाक्यों को देख्िाए और ध्यान से पढि़ए - ऽ मेरा जी पढ़ने में बिलवुफल न लगता था। एक घंटा भी किताब लेकर बैठना पहाड़ था। ऽ भाइर् साहब उपदेश की कला में निपुण थे। ऐसी - ऐसी लगती बातें कहते, ऐसे - ऐसे सूक्ित बाण चलाते कि मेरे जिगर के टुकड़े - टुकड़े हो जाते और हिम्मत टूट जाती। ऽ वह जानलेवा टाइम - टेबिल, वह आँखपफोड़ पुस्तवेंफ, किसी की याद न रहती और भाइर् साहब को नसीहत और पफजीहत का अवसर मिल जाता। ़निम्नलिख्िात मुहावरों का वाक्यों में प्रयोग कीजिए - सिर पर नंगी तलवार लटकना, आड़े हाथों लेना, अंधे के हाथ बटेर लगना, लोहे के चने चबाना, दाँतों पसीना आना, ऐरा - गैरा नत्थू खैरा। 3.निम्नलिख्िात तत्सम, तद्भव, देशी, आगत शब्दों को दिए गए उदाहरणों के आधार पर छाँटकर लिख्िाए। तत्सम तद्भव देशज आगत ;अंग्रेशी एवं उदूर् / अरबी - प़्ाफारसीद्ध जन्मसि( आँख दाल - भात पोशीशन, पफजीहत़तालीम, जल्दबाशी, पुख्ता, हाश्िाया, चेष्टा, जमात, हप़्ार्फ, सूक्ितबाण, जानलेवा, आँखपफोड़, घुड़कियाँ, आिापत्य, पन्ना, मेला - तमाशा, मसलन, स्पेशल, स्कीम, पफटकार, प्रातःकाल, विद्वान, निपुण, भाइर् साहब, अवहेलना, टाइम - टेबिल 4.ियाएँ मुख्यतः दो प्रकार की होती हैं - सकमर्क और अकमर्क। सकमर्क िया - वाक्य में जिस िया के प्रयोग में कमर् की अपेक्षा रहती है, उसे सकमर्क िया कहते हैंऋ जैसे - शीला ने सेब खाया। मोहन पानी पी रहा है। अकमर्क िया - वाक्य में जिस िया के प्रयोग में कमर् की अपेक्षा नहीं होती, उसे अकमर्क िया कहते हैंऋ जैसे - शीला हँसती है। बच्चा रो रहा है। नीचे दिए वाक्यों में कौन - सी िया है - सकमर्क या अकमर्क? लिख्िाए - ;कद्ध उन्होंने वहीं हाथ पकड़ लिया। ;खद्ध पिफर चोरों - सा जीवन कटने लगा। ;गद्ध शैतान का हाल भी पढ़ा ही होगा। ;घद्ध मैं यह लताड़ सुनकर आँसू बहाने लगता। ;घद्ध समय की पाबंदी पर एक निबंध् लिखो। ;चद्ध मैं पीछे - पीछे दौड़ रहा था। 5. ‘इक’ प्रत्यय लगाकर शब्द बनाइए - विचार, इतिहास, संसार, दिन, नीति, प्रयोग, अध्िकार योग्यता विस्तार 1.प्रेमचंद की कहानियाँ मानसरोवर के आठ भागों में संकलित हैं। इनमें से कहानियाँ पढि़ए और कक्षा में सुनाइए। वुफछ कहानियों का मंचन भी कीजिए। 2.श्िाक्षा रटंत विद्या नहीं है - इस विषय पर कक्षा में परिचचार् आयोजित कीजिए। 3.क्या पढ़ाइर् और खेल - वूफद साथ - साथ चल सकते हैं - कक्षा में इस पर वाद - विवाद कायर्क्रम आयोजित कीजिए। 4.क्या परीक्षा पास कर लेना ही योग्यता का आधर है? इस विषय पर कक्षा में चचार् कीजिए। परियोजना कायर् 1.कहानी में ¯शदगी से प्राप्त अनुभवों को किताबी ज्ञान से श्यादा महत्त्वपूणर् बताया गया है। अपने माता - पिता, बड़े भाइर् - बहिनों या अन्य बुशुगर् / बड़े सदस्यों से उनके जीवन के बारे में बातचीत कीजिए और पता लगाइए कि बेहतर ढंग से ¯शदगी जीने के लिए क्या काम आया - समझदारी / पुराने अनुभव या किताबी पढ़ाइर्? 2.आपकी छोटी बहिन / छोटा भाइर् छात्रावास में रहती / रहता है। उसकी पढ़ाइर् - लिखाइर् के संबंध् में उसे एक पत्रा लिख्िाए। शब्दाथर् एवं टिप्पण्िायाँ तालीम - श्िाक्षा पुख्ता - मशबूत तम्बीह - डाँट - डपट सामंजस्य - तालमेल मसलन - उदाहरणतः इबारत - लेख चेष्टा - कोश्िाश जमात - कक्षा हप़्ार्फ - अक्षर मिहनत ;मेहनतद्ध - परिश्रम लताड़ - डाँट - डपट सूक्ित - बाण - व्यंग्यात्मक कथन / तीखी बातें स्कीम - योजना अमल करना - पालन करना अवहेलना - तिरस्कार नसीहत - सलाह प़्ाफजीहत - अपमान तिरस्कार - उपेक्षा सालाना इम्ितहान - वाष्िार्क परीक्षा लज्जास्पद - शमर्नाक शरीक - शामिल आतंक - भय अव्वल - प्रथम बड़े भाइर् साहब ध् 67 आिापत्य - प्रभुत्व / साम्राज्य स्वाधीन - स्वतंत्रा महीप - राजा वुफकमर् - बुरा काम अभ्िामान - घमंड मुमतहिन - परीक्षक प्रयोजन - उद्देश्य खुरापफात़ - व्यथर् की बातें हिमाकत किपफायत़- बेववूफप्ाफी़- बचत ;सेद्ध दुरुपयोग - अनुचित उपयोग निःस्वाद - बिना स्वाद का ताज्जुब - आश्चयर् टास्क - कायर् जलील - अपमानित प्राणांतक - प्राण लेने वाला / प्राणों का अंत करने वाला कांतिहीन - चेहरे पर चमक न होना स्वच्छंदता - आशादी सहिष्णुता - सहनशीलता कनकौआ - पतंग अदब - इश्शत शहीन - प्रतिभावान तजुरबा - अनुभव बदहवास - बेहाल मुहताज ;मोहताजद्ध - दूसरे पर आश्रित

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