प्रहलाद अग्रवाल;1947द्ध भारत की आशादी के साल मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर में जन्मे प्रहलाद अग्रवाल ने ¯हदी से एम.ए. तक श्िाक्षा हासिल की। इन्हें किशोर वय से ही ¯हदी प्िाफल्मों वेफ़इतिहास और प्िाफल्मकारों के जीवन और उनके अभ्िानय के बारे में विस्तार से़जानने और उस पर चचार् करने का शौक रहा। इन दिनों सतना के शासकीयस्वशासी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्राध्यापन कर रहे प्रहलाद अग्रवाल प्िाफल्म क्षेत्रा़से जुड़े लोगों और प्िाफल्मों पर बहुत वुफछ लिख चुके हैं और आगे भी इसी क्षेत्रा़को अपने लेखन का विषय बनाए रखने के लिए वृफतसंकल्प हैं। इनकी प्रमुख वृफतियाँ हैंμसातवाँ दशक, तानाशाह, मैं खुशबू, सुपर स्टार, राजकपूर: आध्ी हकीकत आध पफसाना, कवि शैलेंद्र: ¯शदगी की जीत में यकीन, प्यासा: चिऱअतृप्त गुरुदत्त, उत्ताल उमंग: सुभाष घइर् की प्िाफल्मकला, ओ रे माराय का सिनेमा और महाबाशार के महानायक: इक्कीसवीं सदी का सिनेमा। ़ँझी: बिमल साल के किसी महीने का शायद ही कोइर् शुव्रफवार ऐसा जाता हो जब कोइर् न कोइर् ¯हदी प्िाफल्म सिने पदेर् पर न पहुँचती हो। इनमें से वुफछ सपफल रहती हैं तो़वुफछ असपफल। वुफछ दशर्कों को वुफछ असेर् तक याद रह जाती हंै, वुफछ को वह सिनेमाघर से बाहर निकलते ही भूल जाते हंै। लेकिन जब कोइर् प्िाफल्मकार किसी़साहित्ियक वृफति को पूरी लगन और इर्मानदारी से पदेर् पर उतारता है तो उसकी प्ि़ाफल्म न केवल यादगार बन जाती है बल्िक लोगों का मनोरंजन करने के साथ ही उन्हें कोइर् बेहतर संदेश देने में भी कामयाब रहती है। एक गीतकार के रूप में कइर् दशकों तक प्ि़ाफल्म क्षेत्रा से जुड़े रहे कवि और गीतकार ने जब पफणीश्वर नाथ रेणु की अमर वृफति ‘तीसरी कसम उपर्फ मारे गए़गुलपफाम’ को सिने पदेर् पर उतारा तो वह मील का पत्थर सि( हुइर्। आज भी उसकी गणना ¯हदी की वुफछ अमर प्ि़़ाफल्मों में की जाती है। इस प्िाफल्म ने न केवल अपने गीत, संगीत, कहानी की बदौलत शोहरत पाइर् बल्िक इसमें अपने शमाने के सबसे बड़े शोमैन राजकपूर ने अपने प्ि़ाफल्मी जीवन की सबसे बेहतरीन ए¯क्टग करके सबको चमत्वृफत कर दिया। प्ि़ाफल्म की हीरोइन वहीदा रहमान ने भी वैसा ही अभ्िानय कर दिखाया जैसी उनसे उम्मीद थी। इस मायने में एक यादगार प्ि़ाफल्म होने के बावजूद ‘तीसरी कसम’ को आज इसलिए भी याद किया जाता है क्योंकि इस प्िाफल्म के निमार्ण ने यह भी़उजागर कर दिया कि ¯हदी प्ि़ाफल्म जगत में एक साथर्क और उद्देश्यपरक प्िाफल्म़बनाना कितना कठिन और जोख्िाम का काम है। तीसरी कसम के श्िाल्पकार शैलेंद्र ‘संगम’ की अद्भुत सपफलता ने राजकपूर में गहन आत्मविश्वास भर दिया और उसने एक साथ चार प्ि़ाफल्मों के निमार्ण की घोषणा कीμ‘मेरा नाम जोकर’, ‘अजन्ता’, ‘मैं और मेरा दोस्त’ और ‘सत्यम् श्िावम् सुंदरम्’। पर जब 1965 में राजकपूर ने ‘मेरा नाम जोकर’ का निमार्ण आरंभ किया तब संभवतः उसने भी यह कल्पना नहीं की होगी कि इस प्ि़ाफल्म का एक ही भाग बनाने में छह वषो± का समय लग जाएगा। इन छह वषो± के अंतराल में राजकपूर द्वारा अभ्िानीत कइर् प्ि़ाफल्में प्रद£शत हुईं, जिनमें सन् 1966 में प्रद£शत कवि शैलेंद्र की ‘तीसरी कसम’ भी शामिल है। यह वह प्िाफल्म है जिसमें राजकपूर ने़अपने जीवन की सवोर्त्कृष्ट भूमिका अदा की। यही नहीं, ‘तीसरी कसम’ वह प्ि़ाफल्म है जिसने ¯हदीसाहित्य की एक अत्यंत मामिर्क कृति को सैल्यूलाइड पर पूरी साथर्कता से उतारा। ‘तीसरी कसम’ ़प्िाफल्म नहीं, सैल्यूलाइड पर लिखी कविता थी। ‘तीसरी कसम’ शैलेंद्र के जीवन की पहली और अंतिम प्िाफल्म है। ‘तीसरी कसम’ को़‘राष्ट्रपति स्वणर्पदक’ मिला, बंगाल प्ि़़ाफल्म जनर्लिस्ट एसोसिएशन द्वारा सवर्श्रेष्ठ प्िाफल्म और कइर् अन्य पुरस्कारों द्वारा सम्मानित किया गया। मास्को प्िाफल्म पेफस्िटवल में भी यह प्ि़ाफल्म पुरस्कृत हुइर्।़इसकी कलात्मकता की लंबी - चैड़ी तारीप़्ोंफ हुईं। इसमें शैलेंद्र की संवेदनशीलता पूरी श्िाद्दत के साथ मौजूद है। उन्होंने ऐसी प्िाफल्म बनाइर् थी जिसे सच्चा कवि - हृदय ही बना सकता था।़शैलेंद्र ने राजकपूर की भावनाओं को शब्द दिए हैं। राजकपूर ने अपने अनन्य सहयोगी की प्िाफल्म में उतनी ही तन्मयता के साथ काम किया, किसी पारिश्रमिक की अपेक्षा किए बगैर। शैलेंद्ऱने लिखा था कि वे राजकपूर के पास ‘तीसरी कसम’ की कहानी सुनाने पहुँचे तो कहानी सुनकर उन्होंने बड़े उत्साहपूवर्क काम करना स्वीकार कर लिया। पर तुरंत गंभीरतापूवर्क बोलेμफ्मेरा पारिश्रमिक एडवांस देना होगा।य् शैलेंद्र को ऐसी उम्मीद नहीं थी कि राजकपूर ¯शदगी - भर की दोस्ती का ये बदला देंगे। शैलेंद्र का मुरझाया हुआ चेहरा देखकर राजकपूर ने मुसकराते हुए कहा, फ्निकालो एक रुपया, मेरा पारिश्रमिक! पूरा एडवांस।य् शैलेंद्र राजकपूर की इस याराना मस्ती से परिचित तो थे, लेकिन एक निमार्ता के रूप में बड़े व्यावसायिक सूझबूझ वाले भी चक्कर खा जाते हैं, पिफर शैलेंद्र तो प्ि़ाफल्म - निमार्ता बनने के लिए सवर्था अयोग्य थे। राजकपूर ने एक अच्छे और सच्चे मित्रा की हैसियत से शैलेंद्र को प्ि़ाफल्म की असपफलता के खतरों से आगाह भी किया। पर वह तो एकआदशर्वादी भावुक कवि था, जिसे अपार संपिा और यश तक की इतनी कामना नहीं थी जितनी आत्म - संतुष्िट के सुख की अभ्िालाषा थी। ‘तीसरी कसम’ कितनी ही महान प्ि़ाफल्म क्यों न रही हो, लेकिन यह एक दुखद सत्य है कि इसे प्रदश्िार्त करने के लिए बमुश्िकल वितरक मिले। बावजूद इसके कि ‘तीसरी कसम’ में राजकपूर और वहीदा रहमान जैसे नामशद सितारे थे, शंकर - जयकिशन का संगीत था, जिनकी लोकपि्रयता उन दिनों सातवें आसमान पर थी और इसके गीत भी प्िाफल्म़के प्रदशर्न के पूवर् ही बेहद लोकपि्रय हो चुके थे, लेकिन इस प्िाफल्म को खरीदने वाला कोइर् नहीं़था। दरअसल इस प्िाफल्म की संवेदना किसी दो से चार बनाने का गण्िात जानने वाले की समझ़से परे थी। उसमें रची - बसी करुणा तराशू पर तौली जा सकने वाली चीश नहीं थी। इसीलिए बमुश्िकल जब ‘तीसरी कसम’ रिलीश हुइर् तो इसका कोइर् प्रचार नहीं हुआ। प्िाफल्म कब आइर्, कब़चली गइर्, मालूम ही नहीं पड़ा। ऐसा नहीं है कि शैलेंद्र बीस सालों तक प्ि़ाफल्म इंडस्ट्री में रहते हुए भी वहाँ के तौर - तरीकों से नावाकिप़्ाफ थे, परंतु उनमें उलझकर वे अपनी आदमियत नहीं खो सके थे। ‘श्री 420’ का एक लोकपि्रय गीत हैμ‘प्यार हुआ, इकरार हुआ है, प्यार से पिफर क्यूँ डरता है दिल।’ इसके अंतरे कीएक पंक्ितμ‘रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ’ पर संगीतकार जयकिशन ने आपिा की। उनका खयाल था कि दशर्क ‘चार दिशाएँ’ तो समझ सकते हैंμ‘दस दिशाएँ’ नहीं। लेकिन शैलेंद्र परिवतर्न के लिए तैयार नहीं हुए। उनका दृढ़ मंतव्य था कि दशर्कों की रुचि की आड़ में हमें उथलेपन को उन पर नहीं थोपना चाहिए। कलाकार का यह कतर्व्य भी है कि वह उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करने का प्रयत्न करे। और उनका यकीन गलत नहीं था। यही नहीं, वे बहुत अच्छे गीत भी जो उन्होंने लिखे बेहद लोकपि्रय हुए। शैलेंद्र ने झूठे अभ्िाजात्य को कभी नहीं अपनाया। उनके गीत भाव - प्रवण थेμदुरूह नहीं। ‘मेरा जूता है जापानी, ये पतलून इंगलिस्तानी, सर पे लाल टोपी रूसी, पिफर भी दिल है ¯हदुस्तानी’μयह गीत शैलेंद्र ही लिख सकते थे। शांत नदी का प्रवाह और समुद्र की गहराइर् लिए हुए। यही विशेषता उनकी ¯शदगी की थी और यही उन्होंने अपनी प्िाफल्म के द्वारा भी साबित किया था।़‘तीसरी कसम’ यदि एकमात्रा नहीं तो चंद उन प्ि़ाफल्मों में से है जिन्होंने साहित्य - रचना के साथ शत - प्रतिशत न्याय किया हो। शैलेंद्र ने राजकपूर जैसे स्टार को ‘हीरामन’ बना दिया था। हीरामन पर राजकपूर हावी नहीं हो सका। और छींट की सस्ती साड़ी में लिपटी ‘हीराबाइर्’ ने वहीदा रहमान की प्रसि( उँफचाइयों को बहुत पीछे छोड़ दिया था। कजरी नदी के किनारे उकड़ू बैठा हीरामन जब गीत गाते हुए हीराबाइर् से पूछता है ‘मन समझती हंै न आप?’ तब हीराबाइर् शुबान से नहीं, आँखों से बोलती तीसरी कसम के श्िाल्पकार शैलेंद्र ध्93 है। दुनिया - भर के शब्द उस भाषा को अभ्िाव्यक्ित नहीं दे सकते। ऐसी ही सूक्ष्मताओं से स्पंदित थीμ‘तीसरी कसम’। अपनी मस्ती में डूबकर झूमते गाते गाड़ीवानμ‘चलत मुसाप्ि़ाफर मोह लियो रे ¯पजड़े वाली मुनिया।’ टप्पर - गाड़ी में हीराबाइर् को जाते हुए देखकर उनके पीछे दौड़ते - गाते बच्चों का हुजूमμ‘लाली - लाली डोलिया में लाली रे दुलहनिया’, एक नौटंकी की बाइर् में अपनापन खोज लेने वाला सरल हृदय गाड़ीवान! अभावों की ¯शदगी जीते लोगों के सपनीले कहकहे। हमारी प्ि़ाफल्मों की सबसे बड़ी कमशोरी होती है, लोक - तत्त्व का अभाव। वे ¯शदगी से दूर होती है। यदि त्रासद स्िथतियों का चित्रांकन होता है तो उन्हें ग्लोरीपफाइर् किया जाता है। दुख का ऐसा़वीभत्स रूप प्रस्तुत होता है जो दशर्कों का भावनात्मक शोषण कर सके। और ‘तीसरी कसम’ की यह खास बात थी कि वह दुख को भी सहज स्िथति में, जीवन - सापेक्ष प्रस्तुत करती है। मैंने शैलेंद्र को गीतकार नहीं, कवि कहा है। वे सिनेमा की चकाचैंध के बीच रहते हुए यश और धन - लिप्सा से कोसों दूर थे। जो बात उनकी ¯शदगी में थी वही उनके गीतों में भी। उनके गीतों में सिपर्फ करुणा नहीं, जूझऩे का संकेत भी था और वह प्रिया भी मौजूद थी जिसके तहत अपनी मंिाल तक पहुँचा जाता है। व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती, उसे आगे बढ़ने का संदेश देती है। शैलेंद्र ने ‘तीसरी कसम’ को अपनी भावप्रवणता का सवर्श्रेष्ठ तथ्य प्रदान किया। मुकेश की आवाश में शैलेंद्र का यह गीत तो अद्वितीय बन गया हैμ सजनवा बैरी हो गए हमार चिठिया हो तो हर कोइर् बाँचै भाग न बाँचै कोय..अभ्िानय के दृष्िटकोण से ‘तीसरी कसम’ राजकपूर की ¯शदगी की सबसे हसीन प्िाफल्म है।़राजकपूर जिन्हंे समीक्षक और कला - ममर्ज्ञ आँखों से बात करने वाला कलाकार मानते हैं, ‘तीसरी कसम’ में मासूमियत के चमोर्त्कषर् को छूते हैं। अभ्िानेता राजकपूर जितनी ताकत के साथ ‘तीसरी कसम’ में मौजूद हंै, उतना ‘जागते रहो’ में भी नहीं। ‘जागते रहो’ में राजकपूर के अभ्िानय को बहुत सराहा गया था, लेकिन ‘तीसरी कसम’ वह प्ि़ाफल्म है जिसमें राजकपूर अभ्िानय नहीं करता। वह हीरामन के साथ एकाकार हो गया है। खालिस देहाती भुच्च गाड़ीवान जो सिप़्ार्फ दिल की शुबान समझता है, दिमाग की नहीं। जिसके लिए मोहब्बत के सिवा किसी दूसरी चीश का कोइर् अथर् नहीं। बहुत बड़ी बात यह है कि ‘तीसरी कसम’ राजकपूर के अभ्िानय - जीवन का वह मुकाम है, जब वह एश्िाया के सबसे बड़े शोमैन के रूप में स्थापित हो चुके थे। उनका अपना व्यक्ितत्व एक ¯कवदंती बन चुका था। लेकिन ‘तीसरी कसम’ में वह महिमामय व्यक्ितत्व पूरी तरह हीरामन की आत्मा में उतर गया है। वह कहीं हीरामन का अभ्िानय नहीं करता, अपितु खुद हीरामन में ढल गया है। हीराबाइर् की पेफनू - गिलासी बोली पर रीझता हुआ, उसकी ‘मनुआ - नटुआ’ जैसी भोली सूरत पर न्योछावर होता हुआ और हीराबाइर् की तनिक - सी उपेक्षा पर अपने अस्ितत्व से जूझता हुआ सच्चा हीरामन बन गया है। ‘तीसरी कसम’ की पटकथा मूल कहानी के लेखक पफणीश्वरनाथ रेणु ने स्वयं तैयार की थी। कहानी का रेशा - रेशा, उसकी छोटी - से - छोटी बारीकियाँ प्ि़ाफल्म में पूरी तरह उतर आईं। प्रश्न - अभ्यास मौख्िाक निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर एक - दो पंक्ितयों में दीजिएμ 1.‘तीसरी कसम’ प्िाफल्म को कौन - कौन से पुरस्कारों से सम्मानित किया गया है?़2.शैलेंद्र ने कितनी प्िाफल्में बनाईं?़3.राजकपूर द्वारा निदेर्श्िात वुफछ प्िाफल्मों के नाम बताइए।़4.‘तीसरी कसम’ प्ि़ाफल्म के नायक व नायिकाओं के नाम बताइए और प्ि़ाफल्म में इन्होंने किन पात्रों का अभ्िानय किया है? 5.प्िाफल्म ‘तीसरी कसम’ का निमार्ण किसने किया था?़6.राजकपूर ने ‘मेरा नाम जोकर’ के निमार्ण के समय किस बात की कल्पना भी नहीं की थी? 7.राजकपूर की किस बात पर शैलेंद्र का चेहरा मुरझा गया? 8.प्िाफल्म समीक्षक राजकपूर को किस तरह का कलाकार मानते थे?़लिख्िात ;कद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;25.30 शब्दों मेंद्ध लिख्िाएμ 1.‘तीसरी कसम’ प्िाफल्म को ‘सैल्यूलाइड पर लिखी कविता’ क्यों कहा गया है?़2.‘तीसरी कसम’ प्ि़ाफल्म को खरीददार क्यों नहीं मिल रहे थे? 3.शैलेंद्र के अनुसार कलाकार का कतर्व्य क्या है? 4.प्ि़ाफल्मों में त्रासद स्िथतियों का चित्रांकन ग्लोरिप़्ाफाइर् क्यों कर दिया जाता है? 5.‘शैलेंद्र ने राजकपूर की भावनाओं को शब्द दिए हैं’μइस कथन से आप क्या समझते हैं? स्पष्ट कीजिए। 6.लेखक ने राजकपूर को एश्िाया का सबसे बड़ा शोमैन कहा है। शोमैन से आप क्या समझते हैं? 7.प्िाफल्म ‘श्री 420’ के गीत ‘रातों दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ’ पर संगीतकार जयकिशन ने़आपिा क्यों की? तीसरी कसम के श्िाल्पकार शैलेंद्र ध्95 ;खद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;50.60 शब्दों मेंद्ध लिख्िाएμ 1 राजकपूर द्वारा प्ि़ाफल्म की असपफलता के खतरों से आगाह करने पर भी शैलेंद्र ने यह प्ि़ाफल्म क्यों बनाइर्? 2 ‘तीसरी कसम’ में राजकपूर का महिमामय व्यक्ितत्व किस तरह हीरामन की आत्मा में उतर गया है? स्पष्ट कीजिए। 3 लेखक ने ऐसा क्यों लिखा है कि ‘तीसरी कसम’ ने साहित्य - रचना के साथ शत - प्रतिशत न्याय किया है? 4 शैलेंद्र के गीतों की क्या विशेषताएँ हैं? अपने शब्दों में लिख्िाए। 5 प्ि़ाफल्म निमार्ता के रूप में शैलेंद्र की विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। 6 शैलेंद्र के निजी जीवन की छाप उनकी प्ि़ाफल्म में झलकती हैμवैफसे? स्पष्ट कीजिए। 7 लेखक के इस कथन से कि ‘तीसरी कसम’ प्ि़ाफल्म कोइर् सच्चा कवि - हृदय ही बना सकता था, आप कहाँ तक सहमत हैं? स्पष्ट कीजिए। ;गद्ध निम्नलिख्िात के आशय स्पष्ट कीजिएμ 1....वह तो एक आदशर्वादी भावुक कवि था, जिसे अपार संपिा और यश तक की इतनी कामना नहीं थी जितनी आत्म - संतुष्िट के सुख की अभ्िालाषा थी। 2.उनका यह दृढ़ मंतव्य था कि दशर्कों की रुचि की आड़ में हमें उथलेपन को उन पर नहीं थोपना चाहिए। कलाकार का यह कतर्व्य भी है कि वह उपभोक्ता की रुचियों का परिष्कार करने का प्रयत्न करे। 3.व्यथा आदमी को पराजित नहीं करती, उसे आगे बढ़ने का संदेश देती है। 4.दरअसल इस प्िाफल्म की संवेदना किसी दो से चार बनाने वाले की समझ से परे है।़5.उनके गीत भाव - प्रवण थेμदुरूह नहीं। भाषा अध्ययन 1.पाठ में आए ‘से’ के विभ्िान्न प्रयोगों से वाक्य की संरचना को समझिए। ;कद्ध राजकपूर ने एक अच्छे और सच्चे मित्रा की हैसियत से शैलेंद्र को प्िाफल्म की असपफलता वेफ़खतरों से आगाह भी किया। ;खद्ध रातें दसों दिशाओं से कहेंगी अपनी कहानियाँ। ;गद्ध प्ि़ाफल्म इंडस्ट्री में रहते हुए भी वहाँ के तौर - तरीकों से नावाकिप़्ाफ थे। ;घद्ध दरअसल इस प्ि़ाफल्म की संवेदना किसी दो से चार बनाने के गण्िात जानने वाले की समझ से परे थी। ;घद्ध शैलेंद्र राजकपूर की इस याराना दोस्ती से परिचित तो थे। 2.इस पाठ में आए निम्नलिख्िात वाक्यों की संरचना पर ध्यान दीजिएμ ;कद्ध ‘तीसरी कसम’ प्िाफल्म नहीं, सैल्यूलाइड पर लिखी कविता थी।़;खद्ध उन्होंने ऐसी प्िाफल्म बनाइर् थी जिसे सच्चा कवि - हृदय ही बना सकता था।़;गद्ध प्िाफल्म कब आइर्, कब चली गइर्, मालूम ही नहीं पड़ा।़;घद्ध खालिस देहाती भुच्च गाड़ीवान जो सिपर्फ दिल की शुबान समझता है, दिमाग की नहीं।़3.पाठ में आए निम्नलिख्िात मुहावरों से वाक्य बनाइएμ चेहरा मुरझाना, चक्कर खा जाना, दो से चार बनाना, आँखों से बोलना 4.निम्नलिख्िात शब्दों के ¯हदी पयार्य दीजिएμ ;कद्ध श्िाद्दत ..................;घद्ध नावाकिप़फ .................;खद्ध याराना ..................;चद्ध यकीन .................;गद्ध बमुश्िकल ..................;छद्ध हावी .................;घद्ध खालिस ..................;जद्ध रेशा .................5.निम्नलिख्िात का संध्िविच्छेद कीजिएμ ;कद्ध चित्रांकन μ ...............$ ...............;घद्ध रूपांतरण μ ...............$ ..............;खद्ध सवोर्त्कृष्ट μ ...............$ ...............;घद्ध घनानंद μ ...............$ ..............;गद्ध चमोर्त्कषर् μ ...............$ ..............6.निम्नलिख्िात का समास विग्रह कीजिए और समास का नाम भी लिख्िाएμ ;कद्ध कला - ममर्ज्ञ ..............;खद्ध लोकपि्रय ..............;गद्ध राष्टªपति ..............योग्यता विस्तार 1.पफणीश्वरनाथ रेणु की किस कहानी पर ‘तीसरी कसम’ प्ि़ाफल्म आधरित है, जानकारी प्राप्त कीजिए और मूल रचना पढि़ए। 2.समाचार पत्रों में प्िाफल्मों की समीक्षा दी जाती है। किन्हीं तीन प्ि़ाफल्मों की समीक्षा पढि़ए और ‘तीसरी कसम’़प्ि़ाफल्म को देखकर इस प्िाफल्म की समीक्षा स्वयं लिखने का प्रयास कीजिए।़परियोजना कायर् 1.प्िाफल्मों के संदभर् में आपने अकसर यह सुना होगाμ‘जो बात पहले की प्ि़ाफल्मों में थी, वह अब कहाँ’।़वतर्मान दौर की प्िाफल्मों और पहले की प्ि़ाफल्मों में क्या समानता और अंतर है? कक्षा में चचार् कीजिए।़तीसरी कसम के श्िाल्पकार शैलेंद्र ध्97 2.‘तीसरी कसम’ जैसी और भी प्िाफल्में हैं जो किसी न किसी भाषा की साहित्ियक रचना पर बनी हैं। ऐसी़प्िाफल्मों की सूची निम्नांकित प्रपत्रा के आधर पर तैयार करें।़क्र.सं.प्ि़ाफल्म का नाम साहित्ियक रचना भाषा रचनाकार 1 देवदास देवदास बंगला शरत्चंद्र 2 .............. .............. .............. .............. 3 .............. .............. .............. .............. 4 .............. .............. .............. .............. 3.लोकगीत हमें अपनी संस्कृति से जोड़ते हैं। ‘तीसरी कसम’ प्िाफल्म में लोकगीतों का प्रयोग किया गया है।़आप भी अपने क्षेत्रा के प्रचलित दो - तीन लोकगीतों को एकत्रा कर परियोजना काॅपी पर लिख्िाए। शब्दाथर् और टिप्पण्िायाँ अंतराल - के बाद अभ्िानीत - अभ्िानय किया गया सवोर्त्कृष्ट - सबसे अच्छा सैल्यूलाइड - वैफमरे की रील में उतार चित्रा पर प्रस्तुत करना साथर्कता - सपफलता के साथ कलात्मकता - कला से परिपूणर् संवेदनशीलता - भावुकता श्िाद्दत - तीव्रता अनन्य - परम / अत्यध्िक तन्मयता - तल्लीनता पारिश्रमिक - मेहनताना याराना मस्ती - दोस्ताना अंदाश आगाह - सचेत आत्म - संतुष्िट - अपनी तुष्िट बमुश्िकल - बहुत कठिनाइर् से वितरक - प्रसारित करने वाले लोग नामशद - विख्यात नावाकिपफ़ - अनजान इकरार - सहमति मंतव्य - इच्छा उथलापन - सतही / नीचा अभ्िाजात्य - परिष्कृत भाव - प्रवण - भावनाओं के भरा हुआ दुरूह - कठिन उकड़ू सूक्ष्मता स्पंदित लालायित टप्पर - गाड़ी हुशूम प्रतिरूप रूपांतरणलोक - तत्त्व त्रासद ग्लोरीप़्ाफाइर् वीभत्स जीवन - सापेक्ष ध्न - लिप्सा प्रिया बाँचै भाग भरमाये समीक्षक कला - ममर्ज्ञ चमोर्त्कषर् खालिस भुच्च ¯कवदंती - घुटने मोड़कर पैर के तलवों के सहारे बैठना - बारीकी - संचालित करना / गतिमान - इच्छुक - अध्र्गोलाकार छप्पर युक्त बैलगाड़ी - भीड़ - छाया - किसी एक रूप से दूसरे रूप मंे परिवतिर्त करना - लोक संबंध्ी - दुखद - गुणगान / महिमामंडित करना - भयावह - जीवन के प्रति - ध्न की अत्यध्िक चाह - प्रणाली - पढ़ना - भाग्य - भ्रम होना / झूठा आश्वासन - समीक्षा करने वाला - कला की परख करने वाला - उँफचाइर् के श्िाखर पर - शु( - निरा / बिलवुफल - कहावत

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