3 साना साना हाथ जाेडिेे ...़़़ मधु कांकरिया मैंने हैरान होकर देखाμआसमान जैसे उलटा पड़ा था और सारे तारे बिखरकर नीचे टिमटिमा रहे थे। दूर...ढलान लेती तराइर् पर सितारों के गुच्छे रोशनियों की एक झालर - सी बना रहे थे। क्या था वह? वह रात में जगमगाता गैंगटाॅक शहर थाμइतिहास और वतर्मान के संिा - स्थल पर खड़ा मेहनतकश बादशाहों का वह एक ऐसा शहर था जिसका सब वुफछ सुंदर थाμसुबह, शाम, रात। और वह रहस्यमयी सितारों भरी रात मुझमें सम्मोहन जगा रही थी, वुफछ इस कदर कि उन जादू भरे क्षणों में मेरा सब वुफछ स्थगित था, अथर्हीन था...मैं, मेरी चेतना, मेरा आस - पास। मेरे भीतर - बाहर सिप़्ार्फ शून्य था और थी अतींदि्रयता1 में डूबी रोशनी की वह जादुइर् झालर। धीरे - धीरे एक उजास2 उस शून्य से पूफटने लगा...एक प्राथर्ना हांेठों को छूने लगी..साना - साना हाथ जोडि़, गदर्हु प्राथर्ना। हाम्रो जीवन तिम्रो कौसेली ;छोटे - छोटे हाथ जोड़कर प्राथर्ना कर रही हूँ कि मेरा सारा जीवन अच्छाइयों को समपिर्त होद्ध। आज सुबह की प्राथर्ना के ये बोल मैंने एक नेपाली युवती से सीखे थे। सुबह हमंे यूमथांग के लिए निकल पड़ना था, पर आँख खुलते ही मैं बालकनी की तरपफ भागी। यहाँ के लोगों ने बताया था कि यदि मौसम साप़्ाफ हो तो बालकनी से भी़वंफचनजंघा दिखाइर् देती है। हिमालय की तीसरी सबसे बड़ी चोटी वंफचनजंघा! पर मौसम अच्छा होने के बावशूद आसमान हलके - हलके बादलों से ढका था, पिछले वषर् की ही 1.इन्िद्रयों से परे 2.प्रकाश, उजाला तरह इस बार भी बादलो वफ कपाट ठावफर जी के कपाट की तरह बंद ही रहे। वंफचनजंघा ुंेन दिखनी थी, न दिखी। पर सामने ही रकम - रकम3 के रंग - बिरंगे इतने सारे पूफल दिखाइर् पड़े कि लगा पूफलों के बाग में आ गइर् हूँ। बहरहाल...गैंगटाॅक से 149 किलोमीटर की दूरी पर यूमथांग था। फ्यूमथांग यानी घाटियाँ...सारे रास्ते हिमालय की गहनतम घाटियाँ और पूफलों से लदी वादियाँ मिलेंगी आपकोय् ड्राइवर - कम - गाइड जितेन नागेर् मुझे बता रहा था। फ्क्या वहाँ बप़्ार्फ मिलेगी?य् मैं बचकाने उत्साह से पूछने लगती हूँ। चलिए तो...। जगह - जगह गदराए पाइर्न और धूपी के खूबसूरत नुकीले पेड़ों का जायजा लेते हुए हम पहाड़ी रास्तों पर आगे बढ़ने लगे कि एक जगह दिखाइर् दीं...एक कतार में लगी सप़्ोफद - सपेफद बौ( पताकाएँ। किसी ध्वज की तरह लहराती...शांति और अ¯हसा की प्रतीक़ये पताकाएँ जिन पर मंत्रा लिखे हुए थे। नागेर् ने बतायाμयहाँ बु( की बड़ी मान्यता है। जब भी किसी बुिस्ट की मृत्यु होती है, उसकी आत्मा की शांति के लिए शहर से दूर किसी भी पवित्रा स्थान पर एक सौ आठ श्वेत पताकाएँ पफहरा दी जाती हैं। नहीं, इन्हें उतारा नहीं जाता है, ये धीरे - धीरे अपने आप ही नष्ट हो जाती हैं। कइर् बार किसी नए कायर् की शुरुआत में भी ये पताकाएँ लगा दी जाती हैं पर वे रंगीन होती हैं। नागेर् बोलता जा रहा था और मेरी नशर उसकी जीप में लगी दलाइर् लामा की तसवीर पर टिकी हुइर् थी। कइर् दुकानों पर भी मैंने दलाइर् लामा की ऐसी ही तसवीर देखी थी। हिचकोले खाती हमारी जीप थोड़ी और आगे बढ़ी। अपनी लुभावनी हँसी बिखेरते हुए जितेन बताने लगा...इस जगह का नाम है कवी - लोंग स्टाॅक। यहाँ ‘गाइड’ पिफल्म की शू¯टग हुइर् थी। तिब्बत के चीस - खे बम्सन ने लेपचाओं के शोमेन से वंुफजतेक के साथ संिा - पत्रा पर यहीं हस्ताक्षर किए थे। एक पत्थर यहाँ स्मारक के रूप में भी है। ;लेपचा और भुटिया सिक्िकम की इन दोनों स्थानीय जातियों के बीच चले सुदीघर् झगड़ों के बाद शांति वातार् का शुरुआती स्थल।द्ध उन्हीं रास्तों पर मैंने देखाμएक वुफटिया के भीतर घूमता चक्र। यह क्या? नागेर् कहने लगा...फ्मैडम यह धमर् चक्र है। प्रेयर व्हील। इसको घुमाने से सारे पाप धुल जाते हैं।य् फ्क्या?य् चाहे मैदान हो या पहाड़, तमाम वैज्ञानिक प्रगतियों के बावशूद इस देश की आत्मा एक जैसी। लोगों की आस्थाएँ, विश्वास, अंधविश्वास, पाप - पुण्य की अवधारणाएँ और कल्पनाएँ एक जैसी। 3.तरह - तरह के 19 रफ्ऱता - रफ्ऱता4 हम उँफचाइर् की ओर बढ़ने लगे। बाशार, लोग और बस्ितयाँ पीछे छूटने लगे। अब परिदृश्य से चलते - चलते स्वेटर बुनती नेपाली युवतियाँ और पीठ पर भारी - भरकम काटूर्न ढोते बौने से दिखते बहादुर नेपाली ओझल हो रहे थे। अब नीचे देखने पर घाटियों में ताश के घरों की तरह पेड़ - पौधों के बीच छोटे - छोटे घर दिखाइर् दे रहे थे। हिमालय भी अब छोटी - छोटी पहाडि़यों के रूप में नहीं वरन् अपने विराट रूप एवं वैभव के साथ सामने आने वाला था। न जाने कितने दशर्कों, यात्रिायों और तीथार्टानियों का काम्य हिमालय। पल - पल परिवतिर्त हिमालय! और देखते - देखते रास्ते वीरान, सँकरे और जलेबी की तरह घुमावदार होने लगे थे। हिमालय बड़ा होते - होते विशालकाय होने लगा। घटाएँ गहराती - गहराती पाताल नापने लगीं। वादियाँ चैड़ी होने लगीं। बीच - बीच में करिश्मे की तरह रंग - बिरंगे पूफल श्िाद्दत5 से मुसवफराने लगे। उन भीमकाय पवर्तों के बीच और घाटियों के उफपर बने संकरे कच्चे - पक्के रास्तों से गुशरते यूँ लग रहा था जैसे हम किसी सघन हरियाली वाली गुपफा के बीच हिचकोले खाते निकल रहे हों। 4.धीरे - धीरे 5.तीव्रता, प्रबलता, अिाकता इस बिखरी असीम सुंदरता का मन पर यह प्रभाव पड़ा कि सभी सैलानी झूम - झूमकर गाने लगेμफ्सुहाना सप़्ाफर और ये मौसम हँसी...।य्पर मैं मौन थी। किसी ट्टष्िा की तरह शांत थी। मैं चाहती थी कि इस सारे परिदृश्य को अपने भीतर भर लूँ। पर मेरे भीतर वुफछ बूँद - बूँद पिघलने लगा था। जीप की ख्िाड़की से मुंडकी6 निकाल - निकाल मैं कभी आसमान को छूते पवर्तों के श्िाखर देखती तो कभी उफपर से दूध की धार की तरह झर - झर गिरते जल - प्रपातों को। तो कभी नीचे चिकने - चिकने गुलाबी पत्थरों के बीच इठला - इठला कर बहती, चाँदी की तरह कौंध मारती बनी - ठनी तिस्ता नदी को। सिलीगुड़ी से ही हमारे साथ थी यह तिस्ता नदी। पर यहाँ उसका सौंदयर् पराकाष्ठा पर था। इतनी खूबसूरत नदी मैंने पहली बार देखी थी। मैं रोमांचित थी। पुलकित थी। चिडि़या के पंखों की तरह हलकी थी। फ्मेरे नगपति मेरे विशालय्μमैंने हिमालय को सलामी देनी चाही कि तभी जीप एक जगह रफकी...खूब उँफचाइर् से पूरे वेग के साथ उफपर श्िाखरों के भी श्िाखर से गिरता पेफनउगलता झरना। इसका नाम थाμ‘सेवन सिस्टसर् वाॅटर पफाॅल।’ फ्ऱ लैश चमकने लगे। सभी सैलानी इन खूबसूरत लम्हों की रंगत को वैफमरे में वैफद करने में मशगूल7 थे। आदिम युग की किसी अभ्िाशप्त8 राजवुफमारी - सी मैं भी नीचे बिखरे भारी - भरकम पत्थरों पर बैठ झरने के संगीत के साथ ही आत्मा का संगीत सुनने लगी। थोड़ी देर बाद ही बहती जलधारा में पाँव डुबोया तो भीतर तक भीग गइर्। मन काव्यमय हो उठा। सत्य और सौंदयर् को छूने लगा। जीवन की अनंतता का प्रतीक वह झरना...उन अद्भुत - अनूठे क्षणों में मुझमें जीवन की शक्ित का अहसास हो रहा था। इस कदर प्रतीत हुआ कि जैसे मैं स्वयं भी देश और काल की सरहदों9 से दूर बहती धारा बन बहने लगी हूँ। भीतर की सारी तामसिकताएँ10और दुष्ट वासनाएँ11 इस निमर्ल धारा में बह गईं। मन हुआ कि अनंत समय तक ऐसे ही बहती रहूँ...सुनती रहूँ इस झरने की पुकार को। पर जितेन मुझे ठेलने लगा...आगे इससे भी सुंदर नशारे मिलेंगे। अनमनी - सी मैं उठी। थोड़ी देर बाद ही पिफर वही नशारेμआँखों और आत्मा को सुख देने वाले। कहीं चटक हरे रंग का मोटा कालीन ओढ़े तो कहीं हलका पीलापन लिए, तो कहीं पलस्तर उखड़ी दीवार की तरह पथरीला और देखते ही देखते परिदृश्य से सब छू - मंतर...जैसे किसी ने जादू की छड़ी घुमा दी हो। सब पर बादलों की एक मोटी चादर। सब वुफछ बादलमय। 6.सिर 7.व्यस्त 8.शापित, अभ्िायुक्त 9.सीमा 10.तमोगुण से युक्त, वुफटिल 11.बुरी इच्छाएँ 21 चित्रालिख्िात - सी मैं ‘माया’ और ‘छाया’ के इस अनूठे खेल को भर - भर आँखों देखतीजा रही थी। प्रकृति जैसे मुझे सयानी12 बनाने के लिए जीवन रहस्यों का उद्घाटन करने पर तुली हुइर् थी। धीरे - धीरे धुंध की चादर थोड़ी छँटी। अब वहाँ पहाड़ नहीं, दो विपरीत दिशाओं से आते छाया - पहाड़ थे और थोड़ी देर बाद ही वे छाया - पहाड़ अपने श्रेष्ठतम रूप में मेरे सामने थे। जीप थोड़ी देर के लिए रुकवा दी गइर् थी। मैंने गदर्न घुमाइर्...सब ओर जैसे जन्नत13 बिखरी पड़ी थी। नशरों के छोर तक खूबसूरती ही खूबसूरती। अपने को निरंतर दे देने की अनुभूति कराते पवर्त, झरने, पूफलों, घाटियों और वादियों के दुलर्भ नशारे! वहीं कहीं लिखा था...‘¯थक ग्रीन।’ आश्चयर्! पलभर में ब्रह्मांड में कितना वुफछ घटित हो रहा था। सतत प्रवाहमान झरने, नीचे वेग से बहती तिस्ता नदी। सामने उठती धंुध। उफपर मँडराते आवारा बादल। मिम - मिम हवा में हिलोरे लेते पि्रयुता और रूडोडेंड्रो के पूफल। सब अपनी - अपनी लय तान और प्रवाह में बहते हुए। चैरवेति - चैरवेति14। और समय के इसी सतत प्रवाह में तिनके - सा बहता हमारा वशूद15। पहली बार अहसास हुआ...जीवन का आनंद है यही चलायमान सौंदयर्। संपूणर्ता के उन क्षणों में मन इस बिखरे सौंदयर् से इस कदर एकात्म हो रहा था कि भीतर - बाहर की रेखा मिट गइर् थी, आत्मा की सारी ख्िाड़कियाँ खुलने लगी थीं...मैं सचमुच इर्श्वर के निकट थी। सुबह सीखी प्राथर्ना पिफर होठों को छूने लगी थी...साना - साना हाथ जोडि़...कि तभी वह अतींदि्रय संसार खंड - खंड हो गया! वह महाभाव सूखी टहनी - सा टूट गया। दरअसल मंत्रामुग्ध - सी मैं तंदि्रल अवस्था में ही थोड़ी दूर तक निकल आइर् थी कि अचानक पाँवों पर ब्रेक सी लगी...जैसे समािास्थ भाव में नृत्य करती किसी आत्मलीन नृत्यांगना के नुपूर अचानक टूट गए हों। मैंने देखा इस अद्वितीय सौंदयर् से निरपेक्ष वुफछ पहाड़ी औरतें पत्थरों पर बैठीं पत्थर तोड़ रही थीं। गँुथे आटे - सी कोमल काया पर हाथों में वुफदाल और हथौड़े! कइर्यों की पीठ पर बँधी डोको ;बड़ी टोकरीद्ध में उनके बच्चे भी बँधे हुए थे। वुफछ वुफदाल को भरपूर ताकत के साथ शमीन पर मार रही थीं। इतने स्वगीर्य सौंदयर्, नदी, पूफलों, वादियों और झरनों के बीच भूख, मौत, दैन्य और ¯शदा रहने की यह जंग! मातृत्व और श्रम साधना साथ - साथ। वहीं पर खड़े बी.आर.ओ;बोडर् रोड आगेर्नाइजेशनद्ध के एक कमर्चारी से पूछा मैंने, फ्यह क्या हो रहा है? उसने 12.समझदार, चतुर 13.स्वगर् 14.चलते रहो, चलते रहो 15.अस्ितत्व चुहलबाशी के अंदाश में बताया जिन रास्तों से गुशरते हुए आप हिम - श्िाखरों से टक्कर लेने जा रही हैं उन्हीं रास्तों को ये पहाडि़नें चैड़ा बना रही हैं।य् फ्बड़ा खतरनाक कायर् होगा यहय् मेरे मुँह से अकस्मात निकला। वह संजीदा हो गया। कहने लगा, पिछले महीने तो एक की जान भी चली गइर् थी। बड़ा दुसाध्य कायर् है पहाड़ों पर रास्ता बनाना। पहले डाइनामाइट से च‘ानों को उड़ा दिया जाता है। पिफर बड़े - बड़े पत्थरों को तोड़ - मोड़कर एक आकार के छोटे - छोटे पत्थरों मंे बदला जाता है, पिफर बड़े - से जाले में उन्हें लंबी प‘ी की तरह बिठाकर कटे रास्तों पर बाड़े की तरह लगाया जाता है। शरा - सी चूक और सीधा पाताल प्रवेश! और तभी मुझे ध्यान आया...इन्हीं रास्तों पर एक जगह सिक्िकम सरकार का बोडर् लगा था जिस पर बड़े - बड़े अक्षरों में लिखा था, फ्एवर वंडडर् हू डिपफाइड डेथ टू बिल्ड दीज रोड्स।य् ;आप ताज्जुब करेंगे पर इन रास्तों को बनाने में लोगों ने मौत को झुठलाया है।द्ध एकाएक मेरा मानसिक चैनल बदला। मन पीछे घूम गया। इसी प्रकार एक बार पलामूऔर गुमला के जंगलों में देखा था...पीठ पर बच्चे को कपड़े से बाँधकर पत्तों की तलाश में वन - वन डोलती आदिवासी युवतियाँ। उन आदिवासी युवतियों के पूफले हुए पाँव और 23 इन पत्थर तोड़ती पहाडि़नों के हाथों में पड़े ठाठे16, एक ही कहानी कह रहे थे कि आम ¯शदगियों की कहानी हर जगह एक - सी है कि सारी मलाइर् एक तरपफऋ सारे आँसू, अभाव,़यातना और वंचना एक तरप़्ाफ! और तभी मेरी सहयात्राी मण्िा और जितेन मुझे खोजते - खोजते वहाँ तक आ गए थे। मुझे गमगीन देख जितेन कहने लगा, फ्मैडम, ये मेरे देश की आम जनता है, इन्हें तो आप कहीं भी देख लेंगी...आप इन्हें नहीं, पहाड़ों की सुंदरता को देख्िाए...जिसके लिए आप इतने पैसे खचर् करके आइर् हैं।य् ‘ये देश की आम जनता ही नहीं, जीवन का प्रति संतुलन भी हैं। ये ‘वेस्ट एट रिपेईंग’17 हैं। कितना कम लेकर ये समाज को कितना अिाक वापस लौटा देती हैं’, मन ही मन सोचा मैंने। हम वापस जीप की ओर मुड़ने लगे कि तभी मैंने देखाμवे श्रम - सुंदरियाँ किसी बात पर इस कदर ख्िालख्िालाकर हँस पड़ी थीं कि जीवन लहरा उठा था और वह सारा खंडहर ताजमहल बन गया था। हम लगातार उँफचाइर्यों पर चढ़ते जा रहे थे। जितेन बता रहा था, अब हम हर मोड़ पर हेयर पिन बेंट लेंगे और तेशी से उँफचाइर् पर चढ़ते जाएँगे। हेयर पिन बंेट के ठीक पहले एक पड़ाव पर देखा सात - आठ वषर् की उम्र के ढेर सारे पहाड़ी बच्चे स्वूफल से लौट रहेथे और हमसे लिफ्रट माँग रहे थे। जितेन ने बताया हर दिन तीन - साढ़े तीन किलोमीटर की पहाड़ी चढ़ाइर् चढ़कर ये बच्चे स्वूफल जाते हैं। फ्क्या स्वूफली बस नहीं?य् मण्िा के पूछने पर जितेन हँस पड़ा, फ्मैडम यह मैदानी नहीं पहाड़ी इलाका है। मैदान की तरह यहाँ कोइर् भी आपको चिकना वबीर्ला18 नहीं मिलेगा। यहाँ जीवन कठोर है। नीचे तराइर् में ले - देकर एक ही स्वूफल है। दूर - दूर से बच्चे उसी स्वूफल में जाते हैं। और सिप़्ार्फ पढ़ते ही नहीं हैं, इनमें से अिाकांश बच्चे शाम के समय अपनी माँओं के साथ मवेश्िायों को चराते हैं, पानी भरते हैं, जंगल से लकडि़यों के भारी - भारी गऋर ढोते हैं। खुद मैंने भी ढोए थे।य् खतरा अब धीरे - धीरे बढ़ने लगा था। रास्ते और भी सँकरे होते जा रहे थे। कइर् बार लगता जैसे रास्तों को इंच टेप से नापकर एक जीप जितना ही चैड़ा बनाया गया है कि 16.हाथ में पड़ने वाली गाठें या निशान 17.कम लेना और ज्यादा देना 18.बढ़े हुए पेट वाला शरा भी संतुलन बिगड़े, इंच भर भी जीप इधर - उधर ख्िासके तो हम सीधे घाटियों में! इन रास्तों पर जगह - जगह लिखी चेतावनियाँ भी हमें खतरों के प्रति सजग कर रही थीं। सामने ही लिखा थाμ‘धीरे चलाएँ, घर मंे बच्चे आपका इंतशार कर रहे हैं। थोड़ा और आगे बढ़े कि पिफर एक चेतावनीμ‘वी केयर, मैन इटर अराउंड।’ पर हमंे नरभक्षी जानवर नहीं, दूध देने वाले याक दिखे...काले - काले ढेर सारे याक। पहाड़ों पर गिरती बपर्फ से प्राकृतिक ढंग से रक्षा करने वाले घने - घने बालों वाले याक।़सूरज ढलने लगा था। हमने देखा वुफछ पहाड़ी औरतें गायों को चराकर वापस लौट रही थीं। वुफछ के सिर पर लकडि़यों के भारी - भरकम गऋर थे। उफपर आसमान पिफर धंुध और बादलों से घ्िारा हुआ था। उतरती संध्या में जीप अब चाय के बागानों से गुशर रही थी कि पिफर एक दृश्य ने मुझे खींचा...नीचे चाय के हरे - भरे बागानों में कइर् युवतियाँ बोवुफ ़पहने ;सिक्िकमी परिधानद्ध चाय की पिायाँ तोड़ रही थीं। नदी की तरह उपफान लेता उनका यौवन और श्रम से दमकता गुलाबी चेहरा। एक युवती ने चटक लाल रंग का बोवुफ पहन रखा था। सघन हरियाली के बीच चटक लाल रंग डूबते सूरज की स्वण्िार्म और सात्िवक आभा में वुफछ इस कदर इंद्रधनुषी छटा बिखेर रहा था कि मंत्रामुग्ध - सी मैं चीख पड़ी थी!...इतना अिाक सौंदयर् मेरे लिए असह्य था। यूमथांग पहुँचने के लिए हमें रात भर लायुंग में पड़ाव लेना था। गगनचुंबी पहाड़ों के तल में साँस लेती एक नन्हीं - सी शांत बस्ती लायुंग। सारी दौड़ - धूप से दूर ¯शदगी जहाँ नि¯श्चत सो रही थी। उसी लायुंग में हम ठहरे थे। तिस्ता नदी के तीर पर बसे लकड़ी के एक छोटे - से घर में। मुँह - हाथ धोकर मैं तुरंत ही तिस्ता नदी के किनारे बिखरे पत्थरों पर बैठ गइर् थी। सामने बहुत उफपर से बहता झरना नीचे कल - कल बहती तिस्ता में मिल रहा था। मिम - मिम19 हवा बह रही थी। पेड़ - पौधे झूम रहे थे। गहरे बादलों की परत ने चाँद को ढक रखा था...बाहर परिंदे और लोग अपने घरों को लौट रहे थे। वातावरण में अद्भुत शांति थी। मंदिर की घंटियों - सी...घुँघरुओं की रुनझुनाहट - सी। आँखें अनायास भर आईं। ज्ञान का नन्हा - सा बोिासत्व जैसे भीतर उगने लगा...वहीं सुख शांति और सुवूफन है जहाँ अखंडित संपूणर्ता हैμपेड़, पौधे, पशु, और आदमीμसब अपनी - अपनी लय, ताल औरगति में हैं। हमारी पीढ़ी ने प्रकृति की इस लय, ताल और गति से ख्िालवाड़ कर अक्षम्य अपराध किया है। हिमालय अब मेरे लिए कविता ही नहीं, दशर्न बन गया था। 19.धीमी, हलकी 25 अँधेरा होने के पहले ही किसी प्रकार डगमगाती श्िालाओं और पत्थरों से होकर तिस्ता नदी की धार तक पहुँची। बहते पानी को अपनी अंजुलि में भरा तो अतीत भीतर धड़कने लगा...स्मृति में कौंधा...हमारे यहाँ जल को हाथ में लेकर संकल्प किया जाता है...क्या संकल्प करूँ? पर मैं संकल्प की स्िथति में नहीं थी...भीतर थी एक प्राथर्ना...एक कमशोर व्यक्ित की प्राथर्ना...भीतर का सारा हलाहल20, सारी तामसिकताएँ बह जाएँ...इसी बहती धारा में! रात धीरे - धीरे गहराने लगी। हिमालय ने काला वंफबल ओढ़ लिया था। जितेन ने लकड़ी के बने ख्िालौने से उस छोटे से गेस्ट हाउफस में गाने की तेश धुन पर जब अपने संगी - साथ्िायों के साथ नाचना शुरू किया तो देखते - देखते एक आदिम रात्रिा की महक से परियों की कहानी - सी मोहक वह रात महक उठी। मस्ती और मादकता का ऐसा संक्रमण21 हुआ कि एक - एक कर हम सभी सैलानी गोल - गोल घेरा बनाकर नाचने लगे। मेरी पचास वषीर्य सहेली मण्िा ने वुफमारियों को भी मात करते हुए वो जानदार नृत्य प्रस्तुत किया कि हम सब अवाव्फ उसे ही देखते रह गए। कितना आनंद भरा था उसके भीतर! कहाँ से आता था इतना आनंद? लायुंग की सुबह! बेहद शांत और सुरम्य। तिस्ता नदी की शांत धारा के समान ही कल - कल कर बहती हुइर्। अिाकतर लोगों की जीविका का साधन पहाड़ी आलू, धान की खेती और दारू का व्यापार। सुबह मैं अकेले ही टहलने निकल गइर् थी। मैंने उम्मीद की थी कि यहाँ मुझे बप़़्ार्फ मिलेगी पर अप्रैल के शुरुआती महीने में यहाँ बपर्फ का एक कतरा भी नहीं था। यद्यपि हम सी लेवल22 से 14000 पफीट की उँफचाइर् पर थे। मैं बपर्फ देखने़के लिए बैचेन थी...हम मैदानों से आए लोगों के लिए बपर्फ से ढके पहाड़ किसी जन्नत़से कम नहीं होते। वहीं पर घूमते हुए एक सिक्िकमी नवयुवक ने मुझे बताया कि प्रदूषण के चलते स्नो - पफाॅल लगातार कम होती जा रही है पर यदि मैं ‘कटाओ’ चली जाउँफ तो मुझे वहाँ शतिर्या बप़्ार्फ मिल जाएगी...कटाओ यानी भारत का स्िवट्जरलैंड! कटाओ जो कि अभी तक टूरिस्ट स्पाॅट नहीं बनने के कारण सुख्िार्यों23 में नहीं आया था, और अपने प्राकृतिक स्वरूप में था। कटाओ जो लायुंग से 500 पफीट उँफचाइर् पर था और करीब दो घंटे का सप़्ाफर था। वह नवयुवक मुझसे बतिया रहा था और उसकी घरवाली अपने छोटे से लकड़ी के घर के बाहर हमें उत्सुकतापूवर्क देख रही थी कि तभी गाय ने आकर बाहर थैले में रखा उसका महुआ गुडुप24 कर लिया था। मीठी झिड़कियाँ देकर उसने गाय को भगा दिया था।उम्मीद, आवेश और उत्तेजना के साथ अब हमारा सप़्ाफर कटाओ की ओर। कटाओ का रास्ता और खतरनाक था अैर उस पर धुंध और बारिश। जितेन लगभग अंदाश से गाड़ी 20.विष, शहर 21.मिलन, संयोग 22.तल, स्तर 23.चचार् में आना 24.निगल लिया चला रहा था। पहाड़, पेड़, आकाश, घाटियाँ सब पर बादलों की परत। सब वुफछ बादलमय। बादलांे को चीरकर निकलती हमारी जीप। खतरनाक रास्तों के अहसास ने हमें मौन कर दिया था। और उस पर बारिश। एक चूक और सब खलास...साँस रोके हम धुंध और पिफसलन भरे रास्ते पर सँभल - सँभलकर आगे बढ़ती जीप को देख रहे थे। हमारी साँस लेने की आवाशों के सिवाय आस - पास जीवन का कोइर् पता नहीं था। पिफर नशर पड़ी बड़े - बड़े शब्दों में लिखी एक चेतावनी पर...‘इपफ यू आर मैरिड, डाइवोसर् स्पीड।’ थोड़ी ही दूर आगे बढ़े कि पिफर एक चेतावनीμ‘दुघर्टना से देर भली, सावधानी से मौत टली।’ करीब आधे रास्ते बाद धुंध छँटी और साथ ही सृष्िट और हमारे बीच पैफला सन्नाटा भी हटा। नागेर् उत्साहित होकर कहने लगा, फ्कटाओ ¯हदुस्तान का स्िवट्शरलैंड है।य् मेरी सहेली मण्िा स्िवट्शरलैंड घूम आइर् थी, उसने तुरंत प्रतिवाद कियाμफ्नहीं स्िवट्शरलैंड भी इतनी उँफचाइर् पर नहीं है और न ही इतना सुंदर।य् हम कटाओ के करीब आ रहे थे क्योंकि दूर से ही बप़्ार्फ से ढके पहाड़ दिखने लगे थे। पास में जो पवर्त थे वे आधे हरे - काले दिख रहे थे। लग रहा था जैसे किसी ने इन पहाड़ों पर पाउडर छिड़क दिया हो। कहीं पाउडर बची रह गइर् हो और कहीं वह धूप मेंबह गइर् हो। नागेर् ने उत्तेजित होकर कहाμफ्देख्िाए एकदम ताशा बप़्ार्फ है, लगता है रात में गिरी है यह बप़़्ार्फ।य् थोड़ा और आगे बढ़ने पर अब हमें पूरी तरह बपर्फ से ढके पहाड़ दिख रहे थे। साबुन के झाग की तरह सब ओर गिरी हुइर् बप़्ार्फ। मैं जीप की ख्िाड़की से मुंडी निकाल - निकाल दूर - दूर तक देख रही थी...चाँदी से चमकते पहाड़! एकाएक जितेन ने पूछा, फ्वैफसा लग रहा है?य् मैंने जवाब दियाμफ्राम रोछोय्25। वह उछल पड़ाμफ्अरे, यह नेपाली बोली कहाँ से सीखी?य् अपनी भाषा के गवर् से उसकी आँखें चमक उठी, चेहरा इतराने लगा। और तभी किसी चमत्कार की तरह हलकी - हलकी बप़्ार्फ, एकदम महीन - महीन मोती की तरह गिरने लगी! फ्तिम्रो माया सैंधै मलाइर् सताउँफछय्, ;तुम्हारा प्यार मुझे सदैव रुलाता है।द्ध चहुँ ओर बिखरी यह बप़्ाफीर्ली सुंदरता जितेन के मन पर भी थाप लगाने लगी थी। प्रेम की झील में तैरते हुए झूम - झूम गाने लगा था वह। हम सभी सैलानी अब जीप से उतर कर बप़़्ार्फ पर वूफदने लगे थे। यहाँ बपर्फ सवार्िाक थी। घुटनों तक नरम - नरम बप़़्ार्फ। उफपर आसमान और बपर्फ से ढके पहाड़ एक हो रहे थे। कइर् सैलानी बप़्ार्फ पर लेटकर हर लम्हे की रंगत को वैफमरे में वैफद करने में लगे थे। 25.अच्छा है 27 मेरे पाँव झन - झन करने लगे थे। पर मन वृंदावन हो रहा था। भीतर जैसे देवता जाग गए थे। ख्वाहिश हुइर् कि मैं भी बपर्फ पर लेटकर इस बप़़्ाफीर्ली जन्नत को जी भर देखूँ। पर मेरे पास बपर्फ पर पहनने वाले लंबे - लंबे जूते नहीं थे। मैंने चाहा कि किराए पर ले़लूँ पर कटाओ, यूमथांग और झांगू लेक की तरह टूरिस्ट स्पाॅट26 नहीं था, इस कारण यहाँ झांगू की तरह दुनिया भर की तो क्या एक भी दुकान नहीं थी। खैर..दनादन पफोटो ¯खचवाने की बजाय मैं उस सारे परिदृश्य को अपने भीतर लगातार खींच़रही थी जिससे महानगर के डावर्फ रूम में इसे पिफर - पिफर देख सवूँफ। संपूणर्ता के उन क्षणों मंे यह हिमश्िाखर मुझे मेरे आध्यात्िमक अतीत से जोड़ रहे थे। शायद ऐसी ही विभोर करदेने वाली दिव्यता के बीच हमारे ट्टष्िा - मुनियों ने वेदों की रचना की होगी। जीवन सत्यों को खोजा होगा। ‘सवेर् भवंतु सुख्िानः’ का महामंत्रा पाया होगा। अंतिम संपूणर्ता का प्रतीक वह सौंदयर् ऐसा कि बड़ा से बड़ा अपराधी भी इसे देख ले तो क्षणों के लिए ही सही ‘करुणा का अवतार’ बु( बन जाए। और तभी दिमाग में कौंधा कि मिल्टन ने इर्व की सुंदरता का वणर्न करते हुए लिखा था कि शैतान भी उसे देखकर ठगा - सा रह जाता था और दूसरों का अमंगल करने कीवृिा भूल जाता था। मैंने मण्िा से पूछाμफ्क्या उसने पढ़ी है मिल्टन की वह कविता?य् पर मण्िा उस समय किसी दूसरे ही सवाल से जूझ रही थी। वह एकाएक दाशर्निकोंकी तरह कहने लगी, फ्ये हिमश्िाखर जल स्तंभ हैं, पूरे एश्िाया के। देखो, प्रकृति भी किस नायाब ढंग से सारा इंतशाम करती है। सदिर्यों में बप़्ार्फ के रूप में जल संग्रह कर लेती है और गमिर्यों मंे पानी के लिए जब त्राहि - त्राहि मचती है तो ये ही बपर्फ श्िालाएँ़पिघल - पिघल जलधारा बन हमारे सूखे वंफठों को तरावट पहुँचाती हैं। कितनी अद्भुत व्यवस्था है जल संचय की!य् मण्िा ने अभ्िाभूत हो माथा नवायाμफ्जाने कितना ट्टण है हम पर इन नदियों का, हिम श्िाखरों का।य् ‘संसार कितना सुंदर।’ स्वप्न जगाते उन लम्हों में मैंने सोचा। पर तभी उदासी की एक झीनी - सी परत मुझ पर छा गइर्। उड़ते बादलों की तरह पत्थर तोड़ती उन पहाडि़नों का खयाल आ गया। आत्मा की अनंत परतों को छीलता हुआ हमारा यह सप़्ाफर थोड़ा और आगे बढ़ा कि तभी देखाμइक्की - दुक्की प़्ाफौजी छावनियाँ। ध्यान आया यह बाॅडर्र एरिया है। थोड़ी दूरी पर ही चीन की सीमा है। एक प़्ाफौजी से मैंने कहाμफ्इतनी कड़कड़ाती ठंड में ;उस समय तापमान माइनस 15 डिग्री सेल्ियसय थाद्ध आप लोगों को बहुत तकलीपफ होती होगी।य् वह़26.भ्रमण - स्थल हँस दियाμएक उदास हँसी, फ्आप चैन की नींद सो सवेंफ, इसीलिए तो हम यहाँ पहरा दे रहे हैं।य् ‘पेफरी भेटुला’ ;पिफर मिलेंगेद्ध कहते हुए जितेन ने जीप चालू कर दी। थोड़ी देर बाद ही पिफर दिखी एक प़्ाफौजी छावनी जिस पर लिखा थाμ‘वी गिव अवर टुडे पफाॅर योर टुमारो।’ मन उदास हो गया। भीतर वुफछ पिघलने लगा। महानगर में रहते हुए कभी ध्यान ही नहीं आया कि जिन बपफीर्ले इलाकों में वैसाख के महीने में भी पाँच मिनट में ही हम़ठिठुरने लगे थे, हमारे ये जवान पौष और माघ में भी जबकि सिवाय पेट्रोल के सब वुफछ जम जाता है, तैनात रहते हैं। और जिन सँकरे घुमावदार और खतरनाक रास्तों से गुशरने भर मंे हमारे प्राण काँप उठते हैं उन रास्तों को बनाने में जाने कितनों के जीवन अपनी मीआद के पूवर् ही खत्म हो गए हैं। मेरे लिए यह यात्रा सचमुच ही एक खोज यात्रा थी। पूरा सप़्ाफर चेतना और अंतरात्मा में हलचल मचाने वाला था। बहरहाल...अब हम लायुंग वापस लौटकर पिफर यूमथांग की ओर। जितेन वुफछ दिन पूवर् ही नेपाल से ताशा - ताशा आया था। यूमथांग की घाटियों में एक नया आकषर्ण और जुड़ गया था...ढेरों - ढेर पि्रयुता और रूडोडेंड्रो के पूफल। जितेन बताने लगा, फ्बस पंद्रह दिनों में ही देख्िाएगा पूरी घाटी पूफलों से इस कदर भर जाएगी कि लगेगा पूफलों की सेज रखी हो।य्यहाँ रास्ते अपेक्षाकृत चैड़े थे, इस कारण खतरों का अहसास कम था। इन घाटियों में कइर् बंदर भी दिखे। वुफछ अकेले तो वुफछ अपने बाल - बच्चों के साथ। बहरहाल...घाटियों, वादियों, पहाड़ों और बादलों की आँख - मिचैली दिखाती, पहाड़ी कबूतरों को उड़ाती हमारी जीप जब यूमथांग पहुँची तो हम थोड़े निराश हुए। बपर्फ से ढवेफ़कटाओ के हिम - श्िाखरों को देखने के बाद यूमथांग थोड़ा पफीका लगा और यह भी अहसास हुआ कि मंिाल से कहीं श्यादा रोमांचक होता है मंिाल तक का सप़्ाफर। बहरहाल यूमथांग मंे चिप्स बेचती एक सिक्िकमी युवती से मैंने पूछाμफ्क्या तुम सिक्िकमी हो?य् फ्नहीं मैं इंडियन हूँ,य् उसने जवाब दिया। सुनकर बहुत अच्छा लगा। सिक्िकम के लोग भारत मंे मिलकर बहुत खुश हैं। जब सिक्िकम स्वतंत्रा रजवाड़ा था तब टूरिस्ट उद्योग इतना नहीं पफला - पूफला था। हर एक सिक्िकमी भारतीय आबोहवा में इस कदर घुलमिल गया है कि लगता ही नहीं, कभी सिक्िकम भारत मंे नहीं था।जीप में बैठने को हुए कि एक पहाड़ी वुफत्ते ने रास्ता काट दिया। मण्िा ने बताया, फ्येपहाड़ी वुफत्ते हैं। ये भौंकते नहीं हैं। ये सिप़्ार्फ चाँदनी रात मंे ही भौंकते हैं।य् 29 फ्क्या?य् विस्मय और अविश्वास से मैं उसे सुनती रही। क्या समुद्र की तरह वुफत्तों पर भी पूण्िार्मा की चाँदनी कामनाओं का श्वार - भाटा जगाती है! खैर...। लौटती यात्रा में जीप में भी जितेन हमें रकम - रकम की जानकारियाँ देता रहा फ्मैडम, यहाँ एक पत्थर है जिस पर गुरुनानक के पुफट ¯प्रट हैं। कहते हैं यहाँ गुरुनानक की थाली से थोड़े से चावल छिटक कर बाहर गिर गए थे। जिस जगह चावल छिटक कर गिरे थे, वहाँ चावल की खेती होती है।य् करीब तीन - चार किलोमीटर बाद ही उसने पिफर उँगली दिखाइर्, फ्मैडम इसे खेदुम कहते हैं। यह पूरा लगभग एक किलोमीटर का एरिया है। यहाँ देवी - देवताओं का निवास है, यहाँ जो गंदगी पैफलाएगा, वह मर जाएगा।य् फ्तुम लोग पहाड़ों पर गंदगी नहीं पैफलाते...?य् उसने जीभ निकालते हुए कहाμफ्नहीं मैडम, पहाड़, नदी, झरने...हम इनकी पूजा करते हैं, इन्हें गंदा करेंगे तो हम मर जाएँगे।य् फ्तभी गैंगटाॅक इतना सुंदर हैय्, मैंने कहा। फ्गैंगटाॅक नहीं मैडम गंतोक कहिए। इसका असली नाम गंतोक है। गंतोक का मतलब है पहाड़...।य् मैं वुफछ पूछती कि वह पिफर चालू हो गया, फ्मैडम यूमथांग भी पहले टूरिस्ट स्पाॅट नहीं था। यह तो सिक्िकम जब भारत में मिला उसके भी कइर् वषो± बाद भारतीय आमीर्के कप्तान शेखर दत्ता के दिमाग मंे आया कि यहाँ सिप़़्ार्फ पफौजियों को रखकर क्या होगा, घाटियों के बीच रास्ते निकालकर इसे टूरिस्ट स्पाॅट बनाया जा सकता है। आप देख्िाए, अभी भी रास्ते बन रहे हैं।य् ‘हाँ, रास्ते अभी भी बन ही रहे हैं। नए - नए स्थानों की खोज अभी भी जारी है। शायद मनुष्य की इसी असमाप्त खोज का नाम सौंदयर् है’...मन - ही - मन मैं कहती हूँ। जीप आगे बढ़ने लगती है। प्रश्न - अभ्यास 1.झिलमिलाते सितारों की रोशनी में नहाया गंतोक लेख्िाका को किस तरह सम्मोहित कर रहा था? 2.गंतोक को ‘मेहनतकश बादशाहों का शहर’ क्यों कहा गया? 3.कभी श्वेत तो कभी रंगीन पताकाओं का पफहराना किन अलग - अलग अवसरों की ओर संकेत करता है? 4.जितेन नागेर् ने लेख्िाका को सिक्िकम की प्रकृति, वहाँ की भौगोलिक स्िथति एवं जनजीवनके बारे में क्या महत्त्वपूणर् जानकारियाँ दीं, लिख्िाए। 5.लोंग स्टाॅक में घूमते हुए चक्र को देखकर लेख्िाका को पूरे भारत की आत्मा एक - सी क्यों दिखाइर् दी? 6.जितेन नागेर् की गाइड की भूमिका के बारे में विचार करते हुए लिख्िाए कि एक वुफशल गाइड में क्या गुण होते हैं? 7.इस यात्रा - वृत्तांत में लेख्िाका ने हिमालय के जिन - जिन रूपों का चित्रा खींचा है, उन्हें अपने शब्दों में लिख्िाए। 8.प्रकृति के उस अनंत और विराट स्वरूप को देखकर लेख्िाका को वैफसी अनुभूति होती है? 9.प्राकृतिक सौंदयर् के अलौकिक आनंद में डूबी लेख्िाका को कौन - कौन से दृश्य झकझोर गए? 10.सैलानियों को प्रकृति की अलौकिक छटा का अनुभव करवाने में किन - किन लोगों का योगदान होता है, उल्लेख करें। 11.फ्कितना कम लेकर ये समाज को कितना अिाक वापस लौटा देती हैं।य् इस कथन के आधार पर स्पष्ट करें कि आम जनता की देश की आथ्िार्क प्रगति में क्या भूमिका है? 12.आज की पीढ़ी द्वारा प्रकृति के साथ किस तरह का ख्िालवाड़ किया जा रहा है। इसे रोकने में आपकी क्या भूमिका होनी चाहिए। 13.प्रदूषण के कारण स्नोपफाॅल में कमी का जिव्रफ किया गया है? प्रदूषण के और कौन - कौन से दुष्परिणाम सामने आए हैं, लिखें। 14.‘कटाओ’ पर किसी भी दुकान का न होना उसके लिए वरदान है। इस कथन के पक्ष में अपनी राय व्यक्त कीजिए? 15.प्रकृति ने जल संचय की व्यवस्था किस प्रकार की है? 16.देश की सीमा पर बैठे पफौजी किस तरह की कठिनाइयों से जूझते हैं? उनके प्रति हमारा़क्या उत्तरदायित्व होना चाहिए?

RELOAD if chapter isn't visible.