अज्ञेय मैं क्यों लिखता हूँ? यह प्रश्न बड़ा सरल जान पड़ता है पर बड़ा कठिन भी है। क्योंकि इसकासच्चा उत्तर लेखक के आंतरिक जीवन के स्तरों से संबंध् रखता है। उन सबको संक्षेप में वुफछ वाक्यों में बाँध् देना आसान तो नहीं ही है, न जाने सम्भव भी है या नहीं? इतना ही किया जा सकता है कि उनमें से वुफछ का स्पशर् किया जाएμविशेष रूप से ऐसों का जिन्हें जानना दूसरों के लिए उपयोगी हो सकता है।एक उत्तर तो यह है कि मैं इसीलिए लिखताहूँ कि स्वयं जानना चाहता हूँ कि क्यों लिखता हूँ - लिखे बिना इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलसकता है। वास्तव में सच्चा उत्तर यही है। लिखकर ही लेखक उस आभ्यंतर1 विवशता को पहचानता है जिसके कारण उसने लिखाμऔर लिखकर ही वह उससे मुक्त हो जाता है। मैं भी उस आंतरिक विवशता से मुक्ित पाने के लिए, तटस्थ होकर उसे देखने और पहचान लेने के लिए लिखता हूँ। मेरा विश्वास है कि सभी वृफतिकारμक्योंकि सभी लेखक वृफतिकार नहीं होतेऋ न उनका सब लेखन ही वृफति होेता हैμसभी वृफतिकार इसीलिए लिखते हैं। यह ठीक है कि वुफछ ख्याति मिल जाने के बाद वुफछ बाहर की विवशता से भी लिखा जाता है - संपादकों के आग्रह से, प्रकाशक के तकाजे से, आथ्िार्क आवश्यकता से। पर एक तो वृफतिकार हमेशा अपने सम्मुख इर्मानदारी से यह भेद बनाए रखता है कि कौन - सी वृफति भीतरी प्रेरणा का पफल है, कौन - सा लेखन बाहरी दबाव का, दूसरे यह भी होता है कि बाहर का दबाव वास्तव में दबाव नहीं रहता, वह मानो भीतरी उन्मेष2 का निमििा3 बन जाता है। 5 मैंक्योंलिखताहूँ? 1.भीतर का, अंदरुनी 2.प्रकाश, दीप्ित 3.कारण मैं क्यों लिखता हूँ? 43 यहाँ पर वृफतिकार के स्वभाव और आत्मानुशासन का महत्त्व बहुत होता है। वुफछ ऐसे आलसी जीव होते हैं कि बिना इस बाहरी दबाव के लिख ही नहीं पातेμइसी के सहारे उनके भीतर की विवशता स्पष्ट होती हैμयह वुफछ वैसा ही है जैसे प्रातःकाल नींद खुल जाने पर कोइर् बिछौने पर तब तक पड़ा रहे जब तक घड़ी का एलामर् न बज जाए। इस प्रकार वास्तव में वृफतिकार बाहर के दबाव के प्रति समपिर्त नहीं हो जाता है, उसे केवल एक सहायक यंत्रा की तरह काम में लाता है जिससे भौतिक यथाथर् के साथ उसका संबंध् बना रहे। मुझे इस सहारे की शरूरत नहीं पड़ती लेकिन कभी उससे बाध भी नहीं होती। उठने वाली तुलना को बनाए रखूँ तो कहूँ कि सबेरे उठ जाता हूँ अपने आप ही, पर अलामर् भी बज जाए तो कोइर् हानि नहीं मानता। यह भीतरी विवशता क्या होती है? इसे बखानना बड़ा कठिन है। क्या वह नहीं होती यह बताना शायद कम कठिन होता है। या उसका उदाहरण दिया जा सकता हैμकदाचित् वही अध्िक उपयोगी होगा। अपनी एक कविता की वुफछ चचार् करूँ जिससे मेरी बात स्पष्ट हो जाएगी। मैं विज्ञान का विद्याथीर् रहा हूँ, मेरी नियमित श्िाक्षा उसी विषय में हुइर्। अणु क्या होता है, वैफसे हम रेडियम - ध्मीर् तत्वों का अध्ययन करते हुए विज्ञान की उस सीढ़ी तक पहुँचे जहाँ अणु का भेदन संभव हुआ, रेडियम - ध्मिर्ता के क्या प्रभाव होेते हैंμइन सबका पुस्तकीय या सै(ांतिक ज्ञान तो मुझे था। पिफर जब वह हिरोश्िामा में अणु - बम गिरा, तब उसके समाचार मैंने पढ़ेऋ और उसके परवतीर् प्रभावों का भी विवरण पढ़ता रहा। इस प्रकार उसके प्रभावों का ऐतिहासिक प्रमाण भी सामने आ गया। विज्ञान के इस दुरुपयोग के प्रति बुि का विद्रोह स्वाभाविक था, मैंने लेख आदि में वुफछ लिखा भी पर अनुभूति के स्तर पर जो विवशता होती है वह बौिक पकड़ से आगे की बात है और उसकी तवर्फ संगति भी अपनी अलग होती है। इसलिए कविता मैंने इस विषय में नहीं लिखी। यों यु(काल में भारत की पूवीर्य सीमा पर देखा था कि वैफसे सैनिक ब्रह्मपुत्रा में बम पेंफक कर हशारों मछलियाँ मार देते थे। जबकि उन्हें आवश्यकता थोड़ी - सी होती थी, और जीव के इस अपव्यय से जो व्यथा भीतर उमड़ी थी, उससे एक सीमा तक अणु - बम द्वारा व्यथर् जीव - नाश का अनुभव तो कर ही सका था। जापान जाने का अवसर मिला, तब हिरोश्िामा भी गया और वह अस्पताल भी देखा जहाँ रेडियम - पदाथर् से आहत लोेग वषो± से कष्ट पा रहे थे। इस प्रकार प्रत्यक्ष अनुभव भी हुआμपर अनुभव से अनुभूति गहरी चीश है, कम - से - कम वृफतिकार के लिए। अनुभव तो घटित का होता है, पर अनुभूति संवेदना और कल्पना के सहारे उस सत्य को आत्मसात् कर लेती है जो वास्तव में वृफतिकार के साथ घटित नहीं हुआ है। जो आँखों के सामने वृफतिका नहीं आया, जो घटित के अनुभव में नहीं आया, वही आत्मा के सामने ज्वलंत प्रकाश में आ जाता है, तब वह अनुभूति - प्रत्यक्ष हो जाता है। तो हिरोश्िामा में सब देखकर भी तत्काल वुफछ लिखा नहीं, क्योंकि इसी अनुभूति प्रत्यक्ष की कसर थी। पिफर एक दिन वहीं सड़क पर घूमते हुए देखा कि एक जले हुए पत्थर पर एक लंबी उजली छाया हैμविस्पफोट के समय कोइर् वहाँ खड़ा रहा होगा और विस्पफोट से बिखरे हुए रेडियम - धमीर् पदाथर् की किरणें उसमें रु(4 हो गइर् होंगीμजो आस - पास से आगे बढ़ गईं उन्होंने पत्थर को झुलसा दिया, जो उस व्यक्ित पर अटकीं उन्होंने उसे भाप बनाकर उड़ा दिया होगा। इस प्रकार समूची ट्रेजडी जैसे पत्थर पर 4.बंद हो गइर्, पँफस गइर् मैं क्यों लिखता हूँ? उस छाया को देखकर जैसे एक थप्पड़ - सा लगा। अवाव्फ इतिहास जैसे भीतर कहीं सहसा एक जलते हुए सूयर् - सा उग आया और डूब गया। मैं कहूँ कि उस क्षण में अणु - विस्पफोट मेरे अनुभूति - प्रत्यक्ष में आ गयाμएक अथर् में मैं स्वयं हिरोश्िामा के विस्पफोट का भोक्ता बन गया। इसी में से वह विवशता जागी। भीतर की आवुफलता बुि के क्षेत्रा से बढ़कर संवेदना के क्षेत्रा में आ गइर्...पिफर ध्ीरे - ध्ीरे मैं उससे अपने को अलग कर सका और अचानक एक दिन मैंने हिरोश्िामा पर कविता लिखीμजापान में नहीं, भारत लौटकर, रेलगाड़ी में बैठे - बैठे। यह कविता अच्छी है या बुरीऋ इससे मुझे मतलब नहीं है। मेरे निकट वह सच है, क्योंकि वह अनुभूति - प्रसूत5 है, यही मेरे निकट महत्त्व की बात है। प्रश्न - अभ्यास 1.लेखक के अनुसार प्रत्यक्ष अनुभव की अपेक्षा अनुभूति उनके लेखन में कहीं अध्िक मदद करती है, क्यों? 2.लेखक ने अपने आपको हिरोश्िामा के विस्पफोट का भोक्ता कब और किस तरह महसूस किया? 3. मैं क्यों लिखता हूँ? के आधर पर बताइए किμ ;कद्ध लेखक को कौन - सी बातें लिखने के लिए प्रेरित करती हैं? ;खद्ध किसी रचनाकार के प्रेरणा स्रोत किसी दूसरे को वुफछ भी रचने के लिए किस तरह उत्साहित कर सकते हैं? 4.वुफछ रचनाकारों के लिए आत्मानुभूति/स्वयं के अनुभव के साथ - साथ बाह्य दबाव भीमहत्त्वपूणर् होता है। ये बाह्य दबाव कौन - कौन से हो सकते हैं? 5.क्या बाह्य दबाव केवल लेखन से जुड़े रचनाकारों को ही प्रभावित करते हैं या अन्य क्षेत्रों से जुडे़ कलाकारों को भी प्रभावित करते हैं, वैफसे ? 6.हिरोश्िामा पर लिखी कविता लेखक के अंतः व बाह्य दोनों दबाव का परिणाम है यह आप वैफसे कह सकते हैं? 7.हिरोश्िामा की घटना विज्ञान का भयानकतम दुरुपयोग है। आपकी दृष्िट में विज्ञान का दुरुपयोग कहाँ - कहाँ और किस तरह से हो रहा है। 8. एक संवेदनशील युवा नागरिक की हैसियत से विज्ञान का दुरुपयोग रोकने में आपकी क्या भूमिका है? 5.उत्पन्न सन् 1959 में प्रकाश्िात अरी ओ करुणा प्रभामय काव्य - संग्रह में संकलित अज्ञेय की हिरोश्िामा कविता यहाँ दी जा रही हैμ

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