Sectors Hindi अध्याय 2- भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक किसी अर्थव्यवस्था को हम उत्तम ढंग से तभी समझ इसके उदाहरण दिए गए हैं। कृषि के घटते महत्त्व और सकते हैं, जब इसके घटकों या क्षेत्रों का अध्ययन करते उद्योगों एवं सेवाओं के बढ़ते महत्त्व को, छात्रों के हैं। क्षेत्रक वर्गीकरण अनेक मानदंडों के आधार पर दैनिक जीवन के अनुभवों से लिए गए अधिकाधिक किया जा सकता है। इस अध्याय में तीन प्रकार के उदाहरणों से जोड़ा जाना चाहिए। इसके लिए संचार वर्गीकरणों की चर्चा की गई है- प्राथमिक/द्वितीयक/ माध्यमों द्वारा प्राप्त सूचनाओं का इस्तेमाल किया जा तृतीयक; संगठित/असंगठित और सार्वजनिक/निजी। आप सकता है। आप छात्रों को अखबारों की महत्त्वपूर्ण दैनिक जीवन में छात्रों से परिचित उदाहरणों के द्वारा इन कतरनों और विवरणों को लाने के लिए प्रोत्साहित कर वर्गीकृत क्षेत्रों के बारे में चर्चा कर सकते हैं। क्षेत्रकों की सकते हैं, जिन्हें कथापटलों पर प्रदर्शित किया जा सके बदलती भूमिका पर विशेष बल देना आवश्यक है। सेवा और इन पर चर्चा की जा सके। असंगठित क्षेत्रक पर क्षेत्रक की तीव्र संवृद्धि की ओर छात्रों का ध्यान चर्चा करते समय कार्यरत श्रमिकों के संरक्षण जैसे आकर्षित करते हुए पुनः इन पर प्रकाश डाला जा महत्त्वपूर्ण मुद्दे पर विशेष बल दिया जाना चाहिए। आप सकता है। इस अध्याय में प्रस्तुत धारणाओं की विस्तार छात्रों को असंगठित क्षेत्रक के लोगों तथा उद्यमों के से व्याख्या करते समय छात्रों को कुछ मौलिक पास जाकर उनकी वास्तविक जीवन-परिस्थितियों का अवधारणाओं जैसे - राष्ट्रीय आय, रोजगार इत्यादि से साक्षात् अनुभव प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित कर अवगत कराने की ज़रूरत पड़ सकती है। चूँकि छात्रों सकते हैं। को इसे समझने में कठिनाई हो सकती है, इसलिए । का जाप उदाहरण के द्वारा इन्हें स्पष्ट करना आवश्यक है। छात्रों को समझने में सहायक अनेक क्रियाकलाप और अभ्यास । इस अध्याय में सकल घरेलू उत्पाद (स.घ.उ.) के इस अध्याय में दिए गए हैं - किसी व्यक्ति के कार्य आँकड़े औद्योगिक उत्पादन लागत पर सकल घरेल को कैसे प्राथमिक, द्वितीयक या तृतीयक, संगठित या उत्पाद से संबंधित वर्ष 2004-05 के मूल्य के आधार असंगठित और सार्वजनिक या निजी क्षेत्रक में रखा जा पर आर्थिक सर्वेक्षण से लिए गए हैं। यह स.घ.उ. एवं सकता है। आप छात्रों को उनके आसपास के कामकाजी भारतीय अर्थव्यवस्था से संबंधित अन्य जानकारियों के लोगों (दुकान के मालिक, अनियत श्रमिक, सब्जी लिए महत्त्वपूर्ण स्रोत है। मूल्यांकन के लिए, विशेषकर विक्रेता, कार्यशाला मैकेनिक, घरेलू नौकर इत्यादि) से पाठकों की विश्लेषण क्षमता का विकास करने के उद्देश्य बात करने के लिए, कि वे कैसे रहते और काम करते से शिक्षक कई वर्षों के आँकडे प्राप्त करने के लिए हैं तथा और अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए, आर्थिक सर्वेक्षण का उल्लेख कर सकते हैं। प्रोत्साहित कर सकते हैं। इन जानकारियों के आधार पर आर्थिक गतिविधियों का स्वयं वर्गीकरण करने के लिए रोजगार आँकड़े राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण संगठन द्वारा छात्रों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। रोजगार और बेरोजगारी पर किए गए पाँचवर्षीय सर्वेक्षणों के आँकड़ों पर आधारित है। रा.प्र.स.सं., भारत सरकार के क्षेत्रकों की भूमिका में परिवर्तन से होने वाली । सांख्यिकी, योजना एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के समस्याएँ एक अन्य महत्त्वपूर्ण मुद्दा है, जिस पर प्रकाश । | अन्तर्गत एक संगठन है। इसकी वेबसाइट: http:/ डालने की ज़रूरत है। इस अध्याय में बेरोजगारी और । इस अध्याय में बराजगारा आरmospi.nic.in को आप देख सकते हैं। रोजगार-आँकड़े उसके निराकरण के लिए सरकार क्या कर सकती है, अन्य स्रोतों जैसे भारत की जनगणना में भी उपलब्ध है। आर्थिक विकास की समझ निम्न चित्रों को देखें। आप लोगों को विभिन्न आर्थिक गतिविधियों में कार्यरत पाएँगे। इनमें से कुछ गतिविधियाँ वस्तुओं का उत्पादन करती हैं। कुछ अन्य सेवाओं का सृजन करती हैं। ये गतिविधियाँ हमारे चारों ओर हर समय सम्पादित होती हैं, यहाँ तक कि हमारे बोलने में भी। हम इन गतिविधियों को कैसे समझ सकते हैं? इन्हें समझने का एक तरीका यह है कि कुछ महत्त्वपूर्ण मानदंडों के आधार पर इन्हें विभिन्न समूहों में वर्गीकृत कर दिया जाए। इन समूहों को क्षेत्रक भी कहते हैं। उद्देश्य और किसी महत्त्वपूर्ण मानदंड के आधार पर इन्हें अनेक तरीकों से वर्गीकृत किया जा सकता है। प्राथमिक क्षेत्रक (कृषि) माल के रूप में उपयोग कर हम चीनी और गुड़ हम विभिन्न प्रकार की आर्थिक तैयार करते हैं। हम मिट्टी से ईंट बनाते हैं और ईंटों गतिविधियों से प्रारम्भ करते हैं। से घर और भवनों का निर्माण करते हैं। चूंकि यह क्षेत्रक क्रमशः संवर्धित विभिन्न प्रकार के उद्योगों प्राकृतिक संसाधनों के प्रत्यक्ष उपयोग पर से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसे औद्योगिक क्षेत्रक आधारित अनेक गतिविधियाँ हैं। जैसे-कपास की भी कहा जाता है। खेती। यह एक मौसमी फसल है। कपास के पौधों की वृद्धि के लिए हम मुख्यतः, न कि पूर्णतया, प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रक के अतिरिक्त प्राकृतिक कारकों जैसे-वर्षा, सूर्य का प्रकाश और आर्थिक गतिविधियों की एक तीसरी कोटि भी है। जलवायु पर निर्भर हैं। अतः कपास एक प्राकृतिक जो तृतीयक क्षेत्रक के अन्तर्गत आती हैं और उत्पाद है। इसी प्रकार, डेयरी उत्पादन में हम उपर्युक्त दो क्षेत्रकों से भिन्न है। ये गतिविधियाँ पशुओं की जैविक प्रक्रिया एवं चारा आदि की प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रक के विकास में मदद उपलब्धता पर निर्भर होते हैं। अतः इसका उत्पाद करती हैं। ये गतिविधियाँ स्वतः वस्तुओं का उत्पादन दूध भी एक प्राकृतिक उत्पाद है। नहीं करती हैं, बल्कि उत्पादन-प्रक्रिया में सहयोग इसी प्रकार, खनिज और अयस्क भी या मदद करती हैं। जैसे - प्राथमिक और द्वितीयक तृतीयक प्राकृतिक उत्पाद है। जब हम क्षेत्रक द्वारा उत्पादित वस्तुओं को थोक एवं खुदरा क्षेत्रक प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करके विक्रेताओं को बेचने के लिए ट्रकों और ट्रेनों द्वारा किसी वस्तु का उत्पादन करते हैं, तो परिवहन करने की जरूरत पड़ती है। कभी-कभी इसे प्राथमिक क्षेत्रक की गतिविधि वस्तुओं को गोदामों में भण्डारित करने की कहा जाता है। प्राथमिक क्यों? क्योंकि आवश्यकता होती है। हमें उत्पादन और व्यापार में यह उन सभी उत्पादों का आधार है, सहूलियत के लिए टेलीफोन पर दूसरों से वार्तालाप जिन्हें हम क्रमशः निर्मित करते हैं। करने या पत्राचार (संवाद) या बैंकों से कर्ज लेने चूँकि हम अधिकांश प्राकृतिक उत्पाद की भी आवश्यकता होती है। परिवहन, भण्डारण, कृषि, डेयरी, मत्स्यन और वनों से संचार, बैंक सेवाएँ और व्यापार तृतीयक गतिविधियों प्राप्त करते हैं, इसलिए इस क्षेत्रक के कुछ उदाहरण हैं। चूँकि ये गतिविधियाँ वस्तुओं | को कृषि एवं सहायक क्षेत्रक भी के बजाय सेवाओं का सृजन करती हैं, इसलिए अन्य क्षेत्रों के विकास में मदद कहा जाता है। तृतीयक क्षेत्रक को सेवा क्षेत्रक भी कहा जाता है। पहुंचाता है। द्वितीयक क्षेत्रक की गतिविधियों सेवा क्षेत्रक में कुछ ऐसी अपरिहार्य सेवाएँ भी के अन्तर्गत प्राकृतिक उत्पादों को विनिर्माण प्रणाली हैं, जो प्रत्यक्ष रूप से वस्तुओं के उत्पादन में के जरिए अन्य रूपों में परिवर्तित किया जाता है। सहायता नहीं करती हैं। जैसे, हमें शिक्षकों, डॉक्टरों, यह प्राथमिक क्षेत्रक के बाद अगला कदम है। धोबी, नाई, मोची एवं वकील जैसे व्यक्तिगत यहाँ वस्तुएँ सीधे प्रकृति से उत्पादित नहीं होती हैं, सेवाएँ उपलब्ध कराने वाले और प्रशासनिक एवं बल्कि निर्मित की जाती हैं। इसलिए विनिर्माण की लेखाकरण कार्य करने वाले लोगों की आवश्यकता प्रक्रिया अपरिहार्य है। यह प्रक्रिया किसी कारखाना, होती है। वर्तमान समय में सूचना प्रौद्योगिकी पर किसी कार्यशाला या घर में हो सकती है। जैसे, आधारित कुछ नवीन सेवाएँ जैसे, इंटरनेट कैफे, कपास के पौधे से प्राप्त रेशे का उपयोग कर हम ए.टी.एम. बूथ, कॉल सेंटर, सॉफ्टवेयर कम्पनी सूत कातते और कपड़ा बुनते हैं। गन्ने को कच्चे इत्यादि भी महत्त्वपूर्ण हो गई हैं। प्राकृतिक वस्तुएँ उत्पादित करता है। द्वितीयक क्षेत्रक ( औद्योगिक) विनिर्मित वस्तुएँ उत्पादित करता है। आर्थिक विकास की समझ यद्यपि आर्थिक गतिविधियाँ तीन विभिन्न वर्गों में विभाजित हैं, फिर भी ये बहुत अधिक परस्पर-निर्भर हैं। हम कुछ उदाहरण दे रहे हैं। उदाहरण यह क्या प्रदर्शित करता है? यह द्वितीयक या औद्योगिक क्षेत्रक का उदाहरण है, जो प्राथमिक क्षेत्रक पर निर्भर है। कल्पना करें कि यदि किसान किसी चीनी मिल को गन्ना बेचने से इंकार कर दें, तो क्या होगा। मिल बंद हो जाएगी। कल्पना करें कि यदि कम्पनियाँ भारतीय बाज़ार से कपास नहीं खरीदती और अन्य देशों से कपास आयात करने का निर्णय करती हैं, तो कपास की खेती का क्या होगा? भारत में कपास की खेती कम लाभकारी रह जाएगी और यदि किसान शीघ्रता से अन्य फसलों की ओर उन्मुख नहीं होते हैं, तो वे दिवालिया भी हो सकते हैं तथा कपास की कीमत गिर जाएगी। किसान, ट्रैक्टर, पम्पसेट, बिजली, कीटनाशक और उर्वरक जैसी अनेक वस्तुएँ खरीदते हैं। कल्पना करें कि यदि उर्वरकों और पम्पसेटों की कीमत बढ़ जाती है, तो क्या होगा? खेती पर लागत बढ़ जाएगी और किसानों का लाभ कम हो जाएगा। औद्योगिक और सेवा क्षेत्रक में काम करने वाले लोगों को भोजन की आवश्यकता होती है। कल्पना करें कि यदि ट्रांसपोर्टरों ने हड़ताल कर दी है और ग्रामीण क्षेत्रों से सब्जियाँ, दूध इत्यादि ले जाने से इंकार कर दिया, तो क्या होगा? शहरी क्षेत्रों में भोजन की कमी हो जाएगी और किसान अपने उत्पाद बेचने में असमर्थ हो जायेंगे। 1. विभिन्न क्षेत्रकों की परस्पर-निर्भरता दिखाते हुए उपर्युक्त सारणी को भरें। 2. पुस्तक में वर्णित उदाहरणों से भिन्न उदाहरणों के आधार पर प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रकों के अंतर की व्याख्या करें। 3. निम्नलिखित व्यवसायों को प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रकों में विभाजित करें: • दर्जी । • पुजारी • कुम्हार • टोकरी बुनकर • कूरियर पहुँचाने वाला • मधुमक्खी पालक • फूल की खेती करने वाला • दियासलाई कारखाना में श्रमिक • अंतरिक्ष - यात्री • दूध-विक्रेता • महाजन • कॉल सेंटर का कर्मचारी • मछुआरा • माली 4. विद्यालय में छात्रों को प्रायः प्राथमिक और द्वितीयक अथवा वरिष्ठ और कनिष्ठ वर्गों में विभाजित किया जाता है। इस विभाजन की कसौटी क्या है? क्या आप मानते हैं कि यह विभाजन उपयुक्त है? चर्चा करें। भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्रक के विविध संख्या का योगफल कैसे कर सकते हैं। यह उत्पादन कार्यों से काफी अधिक मात्रा में वस्तुओं अत्यंत बेतुकी बात है। और सेवाओं का उत्पादन होता है। साथ ही, इन | आप बिल्कुल सही सोचते हैं। इस समस्या के क्षेत्रकों में काफी अधिक संख्या में लोग वस्तुओं समाधान के लिए अर्थशास्त्रियों का सुझाव है कि और सेवाओं के उत्पादन के लिए काम करते हैं। वस्तुओं और सेवाओं की वास्तविक संख्याओं का इसलिए, अगले चरण में यह देखना है कि प्रत्येक योग करने के स्थान पर उनके मूल्य का उपयोग क्षेत्रक में कितनी वस्तुएँ और सेवाएँ उत्पादित होती किया जाना चाहिए। जैसे, यदि 10, 000 कि.ग्रा. हैं और कितने लोग उस क्षेत्रक में काम करते हैं। गेहूँ 8 रु. प्रति कि.ग्रा. की दर से बेचा जाता है। किसी अर्थव्यवस्था में कुल उत्पादन और रोजगार तो, गेहूँ का मूल्य 80, 000 रु. होगा। 10 रु. प्रति की दृष्टि से एक या अधिक क्षेत्रक प्रधान होते हैं, नारियल की दर से 5000 नारियल का मूल्य जबकि अन्य क्षेत्रक अपेक्षाकृत छोटे आकार 50, 000 रु. होगा। इसी प्रकार, तीनों क्षेत्रकों के के होते हैं। वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य की गणना की जाती प्रत्येक क्षेत्रक की विविध वस्तुओं है और उसके बाद योगफल प्राप्त करते हैं। और सेवाओं की हम गणना कैसे ध्यान रखें कि यहाँ एक सावधानी बरतने की करते हैं और कुल उत्पादन को कैसे ज़रूरत है। उत्पादित और बेची गई प्रत्येक वस्तु जानते हैं? (या सेवा) की गणना करने की ज़रूरत नहीं है। केवल अंतिम वस्तुओं और सेवाओं की गणना आप सोचते होंगे कि हजारों की संख्या में का ही औचित्य है। जैसे, एक किसान किसी उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की गणना करना आटा-मिल को 8 रु. प्रति कि.ग्रा. की दर से गेहूं असंभव कार्य है। यह न केवल वृहद् कार्य है, बेचता है। मिल में गेहूं की पिसाई होती है और बल्कि आप आश्चर्यचकित भी होंगे कि हम बिस्कुट कंपनी को आटा 10 रु. प्रति कि.ग्रा. की कारों और कम्प्यूटरों, कीलों और फर्नीचरों की दर से बेचा जाता है। बिस्कुट कंपनी आटा के साथ चीनी एवं तेल जैसी चीज़ों का उपयोग करती है और बिस्कुट के चार पैकेट बनाती है। वह बाजार में उपभोक्ताओं को 60 रु. में (15 रु. प्रति लेकिन मुझे इस गेहूँ का पैकेट) बिस्कुट बेचती है। अतः बिस्कुट ही पूरा मूल्य प्राप्त होना अंतिम उत्पाद है, अर्थात् वह वस्तु जो उपभोक्ताओं चाहिए, जिसका मैंने तक पहुँचती है।। उत्पादन किया। केवल 'अंतिम वस्तुओं और सेवाओं' की ही गणना क्यों की जाती है? दिए गए उदाहरण में अंतिम वस्तु के विपरीत गेहूँ और आटा जैसी वस्तुएँ मध्यवर्ती वस्तुएँ हैं। मध्यवर्ती वस्तुएँ, अंतिम वस्तुओं और सेवाओं के निर्माण में इस्तेमाल की जाती हैं। अंतिम वस्तुओं के मूल्य में मध्यवर्ती वस्तुओं का मूल्य पहले से ही शामिल होता है। बिस्कुट (अंतिम वस्तु) के मूल्य 60 रु. में पहले आर्थिक विकास की समझ से ही आटा का मूल्य (10 रु.) शामिल है। इसी और सैनिक कार्य इत्यादि से जुड़े थे। फिर भी, इस प्रकार अन्य सभी मध्यवर्ती वस्तुओं का मूल्य भी अवस्था में अधिकांश उत्पादित वस्तुएँ प्राकृतिक शामिल होगा। अतः गेहूँ और आटा के मूल्य की उत्पाद थी, जो प्राथमिक क्षेत्रक में आती थीं और अलग-अलग गणना उचित नहीं है, क्योंकि तब अधिकांश लोग इसी क्षेत्रक में रोजगार करते थे। हम एक ही वस्तु के मूल्य की गणना कई बार लम्बे समय (सौ वर्षों से अधिक) के बाद करते हैं। पहले गेहूँ के रूप में, फिर आटा के और विशेषकर विनिर्माण की नवीन प्रणाली के रूप में और अंततः अंतिम वस्तु बिस्कुट के रूप । प्रचलन से कारखाने अस्तित्व में आए और उनका में मूल्य की कई बार गणना करते हैं। प्रसार होने लगा। जो लोग पहले खेतों में काम | किसी विशेष वर्ष में प्रत्येक क्षेत्रक द्वारा करते थे, उनमें से बहुत अधिक लोग अब कारखानों उत्पादित अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का में काम करने लगे। कारखानों में सस्ती दरों पर मूल्य, उस वर्ष में क्षेत्रक के कुल उत्पादन की उत्पादित वस्तुओं का लोग इस्तेमाल करने लगे। जानकारी प्रदान करता है। तीनों क्षेत्रकों के कुल उत्पादन एवं रोजगार की दृष्टि से द्वितीयक उत्पादनों के योगफल को देश का सकल घरेलू क्षेत्रक सबसे महत्त्वपूर्ण हो गया। इस कारण उत्पाद ( स. घ. उ.) कहते हैं। यह किसी देश अतिरिक्त समय में भी काम होने लगा। इसका के भीतर किसी विशेष वर्ष में उत्पादित सभी अर्थ है कि क्षेत्रकों का महत्त्व परिवर्तित हो गया। अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य है। स. घ. उ. अर्थव्यवस्था की विशालता प्रदर्शित विगत 100 वर्षों में, विकसित देशों में द्वितीयक करता है। क्षेत्रक से तृतीयक क्षेत्रक की ओर पुनः बदलाव हुआ है। कुल उत्पादन की दृष्टि से सेवा क्षेत्रक भारत में स. घ. उ. मापन जैसा कठिन कार्य का महत्त्व बढ़ गया। अधिकांश श्रमजीवी लोग केन्द्र सरकार के मंत्रालय द्वारा किया जाता है। यह मंत्रालय राज्यों एवं केन्द्र शासित क्षेत्रों के विभिन्न सेवा क्षेत्रक में ही नियोजित हैं। विकसित देशों में सरकारी विभागों की सहायता से वस्तुओं और यही सामान्य लक्षण देखा गया है। सेवाओं की कुल संख्या और उनके मूल्य से। भारत में तीनों क्षेत्रकों का कुल उत्पादन संबंधित सूचनाएँ एकत्र करता है और तब । और रोजगार कितना है? विगत वर्षों में विकसित जी. डी. पी. का अनुमान करता है। देशों में देखे गए पैटर्न के समरूप क्या भारत में भी परिवर्तन हुआ है। हम इसे अगले खंड में क्षेत्रकों में ऐतिहासिक परिवर्तन देखेंगे। सामान्यतया, अधिकांश विकसित देशों के इतिहास में यह देखा गया है कि विकास की प्रारम्भिक अवस्थाओं में प्राथमिक क्षेत्रक ही आर्थिक सक्रियता का सबसे महत्त्वपूर्ण क्षेत्रक रहा है। 1. विकसित देशों का इतिहास क्षेत्रकों में हुए परिवर्तन के संबंध में क्या संकेत करता है? जैसे-जैसे कृषि प्रणाली परिवर्तित होती गई और कृषि क्षेत्रक समृद्ध होता गया, वैसे-वैसे पहले। 2. अव्यवस्थित वाक्यांश से स. घ. उ. गणना हेतु महत्त्वपूर्ण पहलुओं को की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक उत्पादन होने व्यवस्थित एवं सही करें। लगा। अब अनेक लोग दूसरे कार्य करने लगे। उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं की गणना करने के लिए हम उनकी शिल्पियों और व्यापारियों की संख्या में वृद्धि होने संख्याओं को जोड़ देते हैं। हम विगत पाँच वर्षों में उत्पादित सभी वस्तुओं लगी। क्रय-विक्रय की गतिविधियाँ कई गुना बढ़ की गणना करते हैं। चूंकि हमें किसी चीज़ को छोड़ना नहीं चाहिए इसलिए गई। इसके अतिरिक्त अनेक लोग परिवहन, प्रशासक हम इन वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य का योगफल प्राप्त करते हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक आलेख 1 - प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक द्वारा स. घ. उ. आलेख 1- तीनों क्षेत्रकों द्वारा उत्पादित वस्तुओं और । सेवाओं को दिखाता है। यह दो वर्षों 1970-71 और 2010-11 के उत्पादन को दिखाता है। आप देख सकते हैं कि चालीस वर्षों में कुल उत्पादन में कितनी संवृद्धि हुई है। आरेख का अवलोकन करते हुए निम्नलिखित का उत्तर दें- 1. 1970-71 में सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्रक कौन 811? 2. 2010-11 में सबसे बड़ा उत्पादक क्षेत्रक कौन था? 3. क्या आप बता सकते हैं कि तीस वर्षों में किस क्षेत्रक में सबसे अधिक संवृद्धि हुई? 4. 2011 में भारत का जी. डी. पी. क्या है? सन् 1970-71 और 2010-11 के बीच तुलना क्या प्रदर्शित करती है? इससे आप क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं? विचार करें। भारत में तृतीयक क्षेत्रक इतना महत्त्वपूर्ण क्यों हो गया? इसके कई कारण हो सकते हैं। उत्पादन में तृतीयक क्षेत्रक का बढ़ता | प्रथम, किसी भी देश में अनेक सेवाओं, महत्त्व जैसे- अस्पताल, शैक्षिक संस्थाएँ, डाक एवं तार वर्ष 1970-71 और 2010-11 के बीच चालीस सेवा, थाना, कचहरी, ग्रामीण प्रशासनिक कार्यालय, वर्षों में यद्यपि सभी क्षेत्रकों में उत्पादन में वृद्धि हुई, नगर निगम, रक्षा, परिवहन, बैंक, बीमा कंपनी परन्तु सबसे अधिक वृद्धि तृतीयक क्षेत्रक के उत्पादन इत्यादि की आवश्यकता होती है। इन्हें बुनियादी में हुई। परिणामतः वर्ष 2010-11 में भारत में सेवाएँ माना जाता है। किसी विकासशील देश में प्राथमिक क्षेत्रक को प्रतिस्थापित करते हुए तृतीयक इन सेवाओं के प्रबंधन की जिम्मेदारी सरकार क्षेत्रक सबसे बड़े उत्पादक क्षेत्रक के रूप में उभरा। उठाती है। आर्थिक विकास की समझ आलेख 2 - स. घ. उ. में क्षेत्रकों की हिस्सेदारी (%) द्वितीय, कृषि एवं उद्योग के विकास से परिवहन, व्यापार, भण्डारण जैसी सेवाओं का विकास होता | है। प्राथमिक और द्वितीयक क्षेत्रक का विकास जितना अधिक होगा, ऐसी सेवाओं की माँग उतनी ही अधिक होगी। तृतीय, जैसे-जैसे आय बढ़ती है, कुछ लोग अन्य कई सेवाओं जैसे - रेस्तरां, पर्यटन, शॉपिंग, निजी अस्पताल, निजी विद्यालय, व्यावसायिक प्रशिक्षण इत्यादि की माँग शुरू कर देते हैं। आप नगरों में, विशेषकर बड़े नगरों में इस द्रुत परिवर्तन को देख सकते हैं। | चतुर्थ, विगत दशकों में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी पर आधारित कुछ नवीन सेवाएँ महत्त्वपूर्ण एवं अपरिहार्य हो गई हैं। इन सेवाओं के उत्पादन में तीव्र वृद्धि हो रही है। अध्याय-4 में हम इन भारत के संदर्भ में एक उल्लेखनीय तथ्य है। नवीन सेवाओं और इनके प्रसार के कारणों की कि यद्यपि स. घ. उ. में तीनों क्षेत्रकों की हिस्सेदारी चर्चा करेंगे। में परिवर्तन हुआ है, फिर भी रोजगार में ऐसा ही परिवर्तन नहीं हुआ है। आरेख 3 - वर्ष 1970-71 अंततः, आपको याद रखना चाहिए कि सेवा एवं 2009-10 और वर्ष 2003 में तीनों क्षेत्रकों में क्षेत्रक की सभी सेवाओं में समान रूप से संवृद्धि रोजगार की हिस्सेदारी को दिखाता है। आज भी नहीं हो रही है। भारत में सेवा क्षेत्रक कई तरह के प्राथमिक क्षेत्र में सबसे बडा नियोक्ता है। लोगों को नियोजित करते हैं। एक ओर, उन सेवाओं की संख्या सीमित है, जिसमें अत्यन्त आलेख 3 - रोजगार में क्षेत्रकों की हिस्सेदारी ( % ) कुशल और शिक्षित श्रमिकों को रोजगार मिलता है। दूसरी ओर, बहुत अधिक संख्या में लोग छोटी दुकानों, मरम्मत कार्यों, परिवहन जैसी सेवाओं में लगे हुए हैं। वे लोग बड़ी मुश्किल से जीविका निर्वाह कर पाते हैं और वे इन सेवाओं में इसलिए लगे हुए हैं क्योंकि उनके पास कोई अन्य वैकल्पिक अवसर नहीं है। इस कारण सेवा क्षेत्रक के केवल कुछ भागों का ही महत्त्व बढ़ रहा है। आप इनके बारे में अगले खंड में विस्तार से पढ़ेंगे। अधिकांश लोग कहाँ नियोजित हैं? आलेख 2 - स. घ. उ. में तीनों क्षेत्रकों की प्राथमिक क्षेत्रक से रोजगार का ऐसा ही क्षेत्रक प्रतिशत हिस्सेदारी प्रस्तुत करता है। अब आप स्थानान्तरण क्यों नहीं हुआ? इसका कारण यह है चालीस वर्षों में क्षेत्रकों के बदलते महत्त्व को कि द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रक में रोजगार के प्रत्यक्षतः देख सकते हैं। पर्याप्त अवसरों का सृजन नहीं हुआ। यद्यपि इस भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक अवधि में वस्तुओं के औद्योगिक उत्पादन में 3 की बेरोजगारी, जिनके पास कोई रोजगार गुना से ज्यादा वृद्धि हुई परन्तु औद्योगिक रोजगार नहीं है और बेकार बैठे हुए हैं, से अलग है। में लगभग 3 गुना ही वृद्धि हुई। तृतीयक क्षेत्रक पर (खुली बेरोजगारी )। इसलिए इसे प्रच्छन्न भी यही बात लागू होती है। सेवा क्षेत्रक में उत्पादन बेरोजगारी भी कहा जाता है। में 14 गुना से ज्यादा वृद्धि हुई, परन्तु रोजगार में | अब मान लेते हैं कि एक भूस्वामी सुखराम 5 गुना से भी कम वृद्धि हुई। आता है और अपनी जमीन पर काम करने के । परिणामतः, देश में आधे से अधिक श्रमिक लिए लक्ष्मी के परिवार के एक या दो सदस्यों को प्राथमिक क्षेत्रक, मख्यतः कषि क्षेत्र में काम कर भाडे पर ले जाता है। अब लक्ष्मी के परिवार को रहे हैं जिसका स. घ. उ. में योगदान केवल मज़दूरी के द्वारा कुछ अतिरिक्त आय होती है। एक-चौथाई है। इसकी तुलना में द्वितीयक और चूँकि आपको छोटे से भूखंड पर काम करने के तृतीयक क्षेत्रक का स. घ. उ. में हिस्सा तीन-चौथाई लिए पाँच लोगों की ज़रूरत नहीं है, अतः दो है। परन्तु, ये क्षेत्र आधे से भी कम लोगों को लोगों के चले जाने से कृषि-उत्पादन प्रभावित रोजगार प्रदान करते हैं। क्या इसका अर्थ यह है नहीं होता है। दिए गए उदाहरण में, दो सदस्य कि कृषि क्षेत्र में लगे श्रमिक अपनी क्षमता से कम किसी कारखाना में भी काम करने के लिए जा उत्पादन कर रहे हैं? सकते हैं। एक बार फिर परिवार की कमाई में वृद्धि होगी और वे लोग अपनी भूमि से पहले क्या इसका अर्थ यह है कि कृषि में आवश्यकता जैसा उत्पादन करते रहेंगे। से अधिक लोग लगे हुए हैं? अतएव, यदि आप कुछ लोगों को कृषि क्षेत्र से हटा देते हो, तो भी भारत में लक्ष्मी की तरह लाखों किसान हैं। उत्पादन प्रभावित नहीं होगा। दूसरे शब्दों में, कृषि इसका अर्थ है कि यदि हम कुछ लोगों को कृषि । क्षेत्रक के श्रमिकों में अल्प बेरोजगारी है। क्षेत्रक से हटाकर उन्हें कहीं और समुचित रोजगार 5. उपलब्ध करा दें, तो भी कृषि उत्पादन पर बुरा एक छोटा किसान लक्ष्मी का उदाहरण लेते हैं, प्रभाव नहीं पड़ेगा। कोई अन्य रोजगार करने से लोगों जिसके पास दो हेक्टेयर असिंचित भूमि है, जो । की आय से परिवार के कुल आय में वृद्धि होगी। सिंचाई के लिए केवल वर्षा पर निर्भर है और ज्वार एवं अरहर जैसी फसलें उपजाती है। उसके अल्प बेरोजगारी दूसरे क्षेत्रकों में भी हो सकती परिवार के सभी पाँच सदस्य उस भूमि पर वर्ष भर है। उदाहरण के लिए, शहरों में सेवा क्षेत्रक में काम करते हैं। क्यों? क्योंकि उन्हें कहीं और हजारों अनियत श्रमिक हैं जो दैनिक रोजगार की रोजगार उपलब्ध नहीं है। आप देखेंगे कि प्रत्येक तलाश करते हैं। वे प्लम्बर, पेन्टर, मरम्मत कार्य व्यक्ति काम कर रहा है, कोई बेकार नहीं है। जैसे रोजगार करते हैं और अन्य लोग असुविधाजनक परन्तु, वास्तव में उनका श्रम-प्रयास विभाजित है। विषम काम करते हैं। उनमें से कई रोजाना काम प्रत्येक व्यक्ति कुछ काम कर रहा है परन्तु किसी नहीं पाते हैं। इसी प्रकार हम सेवा क्षेत्रक के कुछ को भी पर्ण रोजगार प्राप्त नहीं है। यह अल्प लोगों को सड़कों पर ठेला खींचते अथवा कुछ बेरोजगारी की स्थिति है, जहाँ लोग प्रत्यक्ष रूप से चीजें बेचते हुए देखते हैं, जहाँ वे पूरा दिन बिता काम कर रहे हैं, लेकिन सभी अपनी क्षमता से देते हैं, परन्तु बहुत कम कमा पाते हैं। वे यह कम काम करते हैं। इस प्रकार की अल्प बेरोजगारी काम इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि उनके पास कोई को छिपी हुई कहते हैं क्योंकि यह उन लोगों बेहतर अवसर नहीं है। आर्थिक विकास की समझ 1. आलेख 2 और 3 में दिए गए आँकड़े का प्रयोग कर सारणी की पूर्ति करें और नीचे दिए गए प्रश्नों का उत्तर दें। 1970-71 2000 या 2010-11 | स. घ. उ. में हिस्सेदारी रोजगार में हिस्सेदारी 40 वर्षों में प्राथमिक क्षेत्रक में आप क्या परिवर्तन देखते हैं? 2. सही उत्तर का चयन करें - अल्प बेरोजगारी तब होती है जब लोग - (अ) काम करना नहीं चाहते हैं। (ब) सुस्त ढंग से काम कर रहे हैं। (स) अपनी क्षमता से कम काम कर रहे हैं। (द) उनके काम के लिए भुगतान नहीं किया जाता है। 3. विकसित देशों में देखे गए लक्षण की भारत में हुए परिवर्तनों से तुलना करें और वैषम्य बतायें। भारत में क्षेत्रकों के बीच किस प्रकार के परिवर्तन वांछित थे, जो नहीं हुए? 4. हमें अल्प बेरोजगारी के संबंध में क्यों विचार करना चाहिए? अतिरिक्त रोजगार का सृजन कैसे हो? उपर्युक्त चर्चा से हम देख सकते हैं कि कृषि क्षेत्र में अल्प बेरोजगारी की गंभीर स्थिति बनी हुई है। कुछ लोग ऐसे हैं जिन्हें बिल्कुल रोजगार नहीं मिला है। लोगों के लिए रोजगार की वृद्धि कैसे की जा सकती है? हम कुछ तरीकों को देखते हैं। हम लक्ष्मी और उसके दो हेक्टेयर असिंचित भूखंड का उदाहरण लेते हैं। उसके परिवार की भूमि की सिंचाई हेतु एक कुएँ का निर्माण करने के लिए सरकार कुछ मुद्रा व्यय कर सकती है या बैंक ऋण प्रदान कर सकता है। तब लक्ष्मी अपनी भूमि की सिंचाई करने में सक्षम होगी और रबी मौसम में एक दूसरी फसल गेहूँ उपजाती है। हम मान लेते हैं कि एक हेक्टेयर गेहूं की फसल दो लोगों को 50 दिनों (बीज डालने, पानी देने, खाद डालने और कटाई में) तक रोजगार प्रदान कर सकती है। अतः परिवार के दो अन्य सदस्यों को अपनी जमीन में रोजगार मिल सकता है। अब मान लेते हैं कि ऐसे कई खेतों की सिंचाई के लिए एक नये बाँध का निर्माण किया जाता है अथवा एक नहर खोदी जाती है। इससे कृषि क्षेत्र में रोजगार के अनेक अवसर सृजित हो सकेंगे और अल्प बेरोजगारी की समस्या अपने-आप कम हो जाएगी। भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक अब मान लेते हैं कि लक्ष्मी और दूसरे किसान साथ-साथ कृषि में सुधार के लिए किसानों को पहले की तुलना में अधिक उत्पादन करते हैं। उन्हें सस्ते कृषि साख भी प्रदान करने की ज़रूरत है। कुछ उत्पाद बेचने की भी आवश्यकता होगी? हम अध्याय-4 मुद्रा एवं साख में कुछ आवश्यकताओं इसके लिए उन्हें अपना उत्पाद नजदीक के शहर का अध्ययन करेंगे। में ले जाने की आवश्यकता हो सकती है। यदि | हम एक अन्य तरीके से इस समस्या का सरकार परिवहन और फसलों के भण्डारण पर । समाधान कर सकते हैं। वह तरीका है अर्द्ध-ग्रामीण अथवा बेहतर ग्रामीण सड़कों के निर्माण पर कुछ। क्षेत्रों में उन उद्योगों और सेवाओं की पहचान करना पैसा निवेश करती है तो छोटे ट्रक सब जगह । और उन्हें बढ़ावा देना, जहाँ बहत अधिक लोग पहुँच जाते हैं। इस तरीके से लक्ष्मी जैसे अनेक नियोजित किए जा सकें। उदाहरण के लिए, मान किसान, जिन्हें अब पानी की सुविधा उपलब्ध है, लेते हैं कि अनेक किसान अरहर और मटर फसलों की उपज और विक्रय कर सकते हैं। इस (दलहन फसलें) उपजाने का निर्णय करते हैं। कार्य से केवल किसानों को ही उत्पादक रोजगार इनकी वसूली और प्रसंस्करण के लिए तथा शहरों उपलब्ध नहीं हो सकता है, बल्कि परिवहन और में विक्रय करने के लिए दाल मिल की स्थापना व्यापार जैसी सेवाओं में लगे लोगों को भी रोजगार | एक ऐसा ही उदाहरण है। शीत भण्डारण गृहों के प्राप्त हो सकता है। खुलने से किसानों को एक अवसर मिलेगा कि वे | लक्ष्मी की ज़रूरत केवल पानी तक ही सीमित अपने आलू और प्याज जैसे उत्पादों का भण्डारण नहीं है। खेती करने के लिए उसे बीजों, उर्वरकों, कर सके और अच्छी कीमत मिलने पर बेच सकें। कृषिगत उपकरणों और पानी निकालने के लिए वन क्षेत्रों के निकटवर्ती गाँवों में हम शहद संग्रह पम्पसेटों की भी ज़रूरत है। एक निर्धन किसान केन्द्रों की शुरुआत कर सकते हैं, जहाँ किसान होने के कारण वह सभी चीजों पर खर्च नहीं कर वनों से प्राप्त शहद बेच सकें। सब्जियों और सकती। इसलिए उसे साहूकारों से पैसा उधार लेना कृषिगत उत्पादों, जैसे आलू, शकरकंद, चावल, होगा और उच्च ब्याज दर पर वापस करना पड़ेगा। गेहूँ, टमाटर और फल इत्यादि, जिसे बाहरी बाज़ारों यदि स्थानीय बैंक उचित ब्याज दर पर उसे साख में बेचा जा सके, के लिए प्रसंस्करण उद्योगों की प्रदान करता है, तो वह इन सभी चीजों को उचित स्थापना की जा सकती है। यह अर्द्ध-ग्रामीण क्षेत्रों समय पर खरीदने और अपनी भूमि पर खेती करने में स्थित उद्योगों में रोजगार प्रदान करेगा। में सक्षम होगी। तात्पर्य यह है कि पानी के आपके विचार से आपके क्षेत्र में किस समूह के लोग बेरोजगार अथवा अल्प बेरोजगार हैं? क्या आप कुछ उपाय सुझा सकते हैं, जिन पर अमल किया जा सके? हरियाणा में गुड़ निर्माण | क्या आप जानते हैं कि भारत में विद्यालय जाने के आयु-वर्ग 5-29 वर्ष में लगभग 47 प्रतिशत बच्चे हैं? इनमें से 52 प्रतिशत के लगभग ही विद्यालय जाते हैं। शेष विद्यालय नहीं जाते हैं - वे या तो घर पर रहते होंगे या उनमें से अधिकतर बाल श्रमिक के रूप में काम कर रहे होंगे। यदि ये बच्चे भी विद्यालय जाने लगें तो हमें और अधिक भवनों, अध्यापकों और अन्य कर्मचारियों की आवश्यकता होगी। योजना आयोग द्वारा किए गए एक अध्ययन के अनुसार, अकेले शिक्षा क्षेत्र में लगभग 20 लाख रोजगारों का सृजन किया जा सकता है। इसी प्रकार, यदि हमें स्वास्थ्य की स्थिति में सुधार करना है तो हमें ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने वाले और अधिक डॉक्टरों, नर्से और स्वास्थ्य कर्मचारियों की आवश्यकता पड़ेगी। ये कुछ ऐसे तरीके हैं जिनसे रोजगार का सृजन होगा और हम विकास के महत्त्वपूर्ण पहलुओं पर विचार कर पाने में भी सक्षम होंगे, जिन पर हम अध्याय-1 में चर्चा कर चुके हैं। | प्रत्येक राज्य या प्रदेश में वहाँ के निवासियों की आय और उनके रोजगार में वृद्धि करने की संभावना होती है। यह पर्यटन अथवा क्षेत्रीय शिल्प उद्योग अथवा सूचना प्रौद्योगिकी जैसी नवीन सेवाओं के माध्यम से हो सकता है। इनमें से कुछ के लिए समुचित योजना एवं सरकारी सहायता की आवश्यकता होगी। उदाहरण के लिए, योजना आयोग के अध्ययन के अनसार यदि पर्यटन क्षेत्र में सुधार होता है तो हम प्रतिवर्ष 35 लाख से अधिक लोगों को अतिरिक्त रोजगार प्रदान कर सकते हैं। | हम जानते हैं कि चर्चा किए गए कुछ सुझावों के अमल में लंबा समय लगेगा। अतः छोटी अवधि के लिए हमें कुछ द्रुत उपायों की ज़रूरत है। इसे ध्यान में रखते हुए केन्द्र सरकार ने अभी भारत के 200 जिलों में काम का अधिकार लागू करने के लिए एक कानून बनाया है। इनमें 130 अन्य जिले जोड़े गये हैं। 1 अप्रैल 2008 से शेष ग्रामीण क्षेत्रों में काम शुरू किया गया है। इसे राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम-2005 (रा.ग्रा.रो. गा.अ.-2005) कहते हैं। रा. ग्रा. रो. गा. अ. -2005 के अन्तर्गत उन सभी लोगों, जो काम करने में सक्षम हैं और जिन्हें काम की ज़रूरत है, को सरकार द्वारा वर्ष में 100 दिन के रोजगार की गारंटी दी गई है। यदि सरकार रोजगार उपलब्ध कराने में असफल रहती है तो वह लोगों को बेरोज़गारी भत्ता देगी। अधिनियम के अन्तर्गत उस तरह के कामों को वरीयता दी जाएगी, जिनसे भविष्य में भूमि से उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी। 1. आपके विचार से रा. ग्रा. रो. गा. अ. को काम का अधिकार क्यों कहा गया है? 2. कल्पना कीजिए, कि आप ग्राम के प्रधान हैं और उस हैसियत से कुछ ऐसे क्रियाकलापों का सुझाव दीजिए जिसे आप मानते हैं कि उससे लोगों की आय में वृद्धि होगी और उसे इस अधिनियम के अन्तर्गत शामिल किया जाना चाहिए। चर्चा करें। 3. यदि किसानों को सिंचाई और विपणन सुविधाएँ उपलब्ध कराई जाती है तो रोजगार और आय में वृद्धि | कैसे होगी? 4. शहरी क्षेत्रों में रोजगार में वृद्धि कैसे की जा सकती है? भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक अब हम आर्थिक कार्यों को विभाजित करने के एक अन्य तरीके का परीक्षण करते हैं। इसे लोगों के नियोजित होने के आधार पर देखते हैं। उनके काम करने की शर्ते क्या हैं? क्या कोई नियम और विनियम है, जिनका उनके रोजगार के संदर्भ में अनुपालन किया जाता है? कान्ता कान्ता एक कार्यालय में काम करती है। वह सुबह 9.30 से शाम 5.30 तक कार्यालय में रहती है। वह नियमित रूप से प्रत्येक माह के अन्त में अपना वेतन पाती है। वेतन के अतिरिक्त वह सरकारी नियमों के तहत भविष्य निधि भी प्राप्त करती है। उसे चिकित्सीय और अन्य भत्ते भी मिलते हैं। कान्ता रविवार को कार्यालय नहीं जाती है। इस दिन सवेतन अवकाश होता है। उसने जब नौकरी आरम्भ की थी, तब उसे एक नियुक्ति पत्र दिया गया था जिसमें नौकरी संबंधी निबंधन और शर्तों का उल्लेख किया गया था। 7461 कमल, कान्ता को पड़ोसी है। वह नज़दीक के किराना दुकान में दैनिक मजदूरी करने वाला श्रमिक है। वह सुबह 7.30 बजे दुकान पर जाता है और शाम 8 बजे तक काम करता है। उसे अपनी मजदूरी के अतिरिक्त अन्य कोई भत्ता नहीं मिलता है। जिस दिन वह काम नहीं करता है, उस दिन की मज़दूरी उसे नहीं मिलती है। उसे कोई छुट्टी या सवेतन अवकाश नहीं मिलता है। उसे कोई औपचारिक-पत्र नहीं मिला है, जिसमें दुकान में नियुक्ति के बारे में कहा गया हो। उसका नियोक्ता उसे किसी भी समय काम से हटने के लिए कह सकता है। क्या आप कान्ता और कमल के रोज़गार की परिस्थितियों में अन्तर देखते हैं? गया है। इसे संगठित क्षेत्रक कहते हैं क्योंकि । इसकी कुछ औपचारिक प्रक्रिया एवं कार्यविधि कान्ता संगठित क्षेत्रक में काम करती है। है। कुछ लोग किसी के द्वारा नियोजित नहीं होते। संगठित क्षेत्रक में वे उद्यम अथवा कार्य-स्थान बल्कि वे स्वतः काम कर सकते हैं। परन्तु वे भी आते हैं जहाँ रोज़गार की अवधि नियमित होती है। अपने को सरकार के समक्ष पंजीकृत कराते हैं और और इसलिए लोगों के पास सुनिश्चित काम होता । नियमों एवं विनियमों का अनुपालन करते हैं। है। वे क्षेत्रक सरकार द्वारा पंजीकृत होते हैं और उन्हें सरकारी नियमों एवं विनियमों का अनुपालन संगठित क्षेत्रक के कर्मचारियों को रोजगार-सुरक्षा करना होता है। इन नियमों एवं विनियमों का अनेक के लाभ मिलते हैं। उनसे एक निश्चित समय तक विधियों, जैसे, कारखाना अधिनियम, न्यूनतम मजदूरी ही काम करने की आशा की जाती है। यदि वे अधिनियम, सेवानुदान अधिनियम, दुकान एवं अधिक काम करते हैं तो नियोक्ता द्वारा उन्हें प्रतिष्ठान अधिनियम, इत्यादि में उल्लेख किया अतिरिक्त वेतन दिया जाता है। वे नियोक्ता से कई आर्थिक विकास की समझ दूसरे लाभ भी प्राप्त करते हैं। ये लाभ क्या हैं? रोजगार हैं और प्रायः नियमित नहीं हैं। यहाँ सवेतन छुट्टी, अवकाश काल में भुगतान, भविष्य अतिरिक्त समय में काम करने, सवेतन छुट्टी, निधि, सेवानुदान इत्यादि पाते हैं। वे चिकित्सीय अवकाश, बीमारी के कारण छुट्टी इत्यादि का लाभ पाने के हकदार होते हैं और नियमों के कोई प्रावधान नहीं है। रोजगार सुरक्षित नहीं है। अनुसार कारखाना मालिक को पेयजल और सुरक्षित श्रमिकों को बिना किसी कारण काम से हटाया कार्य-पर्यावरण जैसी सुविधाओं को सुनिश्चित जा सकता है। कुछ मौसमों में जब काम कम करना होता है। जब वे सेवानिवृत होते हैं, तो पेंशन होता है, तो कुछ लोगों को काम से छुट्टी दे दी भी प्राप्त करते हैं। जाती है। बहुत से लोग नियोक्ता की पसन्द पर | निर्भर होते हैं। | इसके विपरीत, कमल असंगठित क्षेत्रक में । काम करता है। असंगठित क्षेत्रक छोटी-छोटी । | इस क्षेत्रक में काफी संख्या में लोग अपने-अपने और बिखरी इकाइयों, जो अधिकांशतः सरकारी छोटे कार्यों, जैसे- सड़कों पर विक्रय अथवा नियंत्रण से बाहर होती हैं, से निर्मित होता है। इस मरम्मत कार्य में स्वतः नियोजित हैं। इसी प्रकार क्षेत्रक के नियम और विनियम तो होते हैं परंतु किसान अपने खेतों में काम करते हैं और जरूरत उनका अनुपालन नहीं होता है। वे कम वेतन वाले पड़ने पर मज़दूरी पर श्रमिकों को लगाते हैं। 1. निम्नलिखित उदाहरणों को देखें। इनमें से कौन असंगठित क्षेत्रक की गतिविधियाँ हैं? • विद्यालय में पढ़ाता एक शिक्षक • बाज़ार में अपनी पीठ पर सीमेन्ट की बोरी ढोता हुआ एक श्रमिक • अपने खेत की सिंचाई करता एक किसान • अस्पताल में मरीज का इलाज करता एक डॉक्टर • एक ठेकेदार के अधीन काम करता एक दैनिक मजदूरी वाला श्रमिक • एक बड़े कारखाने में काम करने जाता एक कारखाना श्रमिक • अपने घर में काम करता एक करघा बुनकर।। 2. संगठित क्षेत्रक में नियमित काम करने वाले एक व्यक्ति और असंगठित क्षेत्रक में काम करने वाले किसी दूसरे व्यक्ति से बात करें। सभी पहलुओं पर उनकी कार्य-स्थितियों की तुलना करें। 3. असंगठित और संगठित क्षेत्रक के बीच आप विभेद कैसे करेंगे? अपने शब्दों में व्याख्या करें। 4. संगठित एवं असंगठित क्षेत्रक में भारत के सभी श्रमिकों की अनुमानित संख्या नीचे दी गई सारणी में दी गई है। सारणी को सावधानी से पढ़े। विलुप्त आँकड़ों की पूर्ति करें और प्रश्नों का उत्तर दें। संगठित असंगठित क्षेत्रक प्राथमिक द्वितीयक तृतीयक 242 ht कुल प्रतिशत में 100% हैं। • असंगठित क्षेत्रक में कृषि में लगे लोगों का प्रतिशत क्या है? • क्या आप सहमत हैं कि कृषि असंगठित क्षेत्रक की गतिविधि है? क्यों? यदि हम सम्पूर्ण देश पर नजर डालते हैं तो पाते हैं कि भारत में - - % श्रमिक असंगठित क्षेत्रक में हैं। भारत में लगभग - % श्रमिकों को ही संगठित क्षेत्रक में रोजगार उपलब्ध है। भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक असंगठित क्षेत्रक के श्रमिकों का ये लाचार लोग कौन हैं जिन्हें संरक्षण की संरक्षण कैसे हो? आवश्यकता है? ग्रामीण क्षेत्रों में, असंगठित क्षेत्रक मुख्यतः भूमिहीन कृषि श्रमिकों, छोटे और सीमांत संगठित क्षेत्रक अत्यधिक माँग पर ही रोजगार किसानों, फसल बँटाईदारों और कारीगरों (जैसे प्रस्तावित करता है। लेकिन संगठित क्षेत्रक में बुनकरों, लुहारों, बढई और सुनार) से रचित होता रोज़गार के अवसरों में अत्यंत धीमी गति से वृद्धि है। भारत में लगभग 80 प्रतिशत ग्रामीण परिवार हो रही है। यह भी आम तौर पर पाया जाता है कि छोटे और सीमांत किसानों की श्रेणी में आते हैं। इन संगठित क्षेत्रक, असंगठित क्षेत्रक के रूप में काम किसानों को समय से बीज, कृषि-उपकरणों, करते हैं। वे ऐसी रणनीति, कर वंचन एवं श्रमिकों । साख, भण्डारण सुविधा और विपणन केन्द्र की को संरक्षण प्रदान करने वाली विधियों के अनुपालन पर्याप्त सुविधा उपलब्ध कराने की जरूरत है। से बचने के लिए अपनाते हैं। परिणामत: बहुत से । शहरी क्षेत्रों में असंगठित क्षेत्रक मुख्यतः लघु श्रमिक असंगठित क्षेत्रक में काम करने के लिए। विवश हुए हैं, जहाँ बहुत कम वेतन मिलता है। । उद्योगों के श्रमिकों, निर्माण, व्यापार एवं परिवहन उनका प्रायः शोषण किया जाता है और उन्हें । में कार्यरत आकस्मिक श्रमिकों और सड़कों पर उचित मजदूरी नहीं दी जाती है। उनकी आय कम । । विक्रेता का काम करने वालों, सिर पर बोझा ढोने है और नियमित नहीं है। इस रोजगार में संरक्षण | वाले श्रमिकों, वस्त्र-निर्माण करने वालों और कबाड़ उठाने वालों से रचित है। लघु उद्योगों को भी कच्चे नहीं है और न ही इसमें कोई लाभ है। माल की प्राप्ति और उत्पाद के विपणन के लिए सन् 1990 से यह भी देखा गया है कि संगठित सरकारी मदद की आवश्यकता होती है। आकस्मिक क्षेत्रक के बहुत अधिक श्रमिक अपना रोजगार श्रमिकों को शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में खोते जा रहे हैं। ये लोग असंगठित क्षेत्रक में कम संरक्षण दिए जाने की जरूरत है। वेतन पर काम करने के लिए विवश हैं। अतः। असंगठित क्षेत्रक में और अधिक रोजगार की | हम यह भी पाते हैं कि बहुसंख्यक श्रमिक ज़रूरत के अलावा श्रमिकों को संरक्षण और अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों से सहायता की भी आवश्यकता है। हैं, जो असंगठित क्षेत्रक में रोजगार करते हैं। ये श्रमिक अनियमित और कम मज़दूरी पर काम करने के अलावा सामाजिक भेदभाव के भी शिकार हैं। अतः आर्थिक एवं सामाजिक विकास के लिए असंगठित क्षेत्रक के श्रमिकों को संरक्षण और सहायता अनिवार्य है। जब कारखाने बंद हो जाते हैं तब अनेक नियमित श्रमिक सब्ज़ियाँ बेचते या ठेला खींचते या कुछ अन्य काम करते देखे जाते हैं। आर्थिक विकास की समझ स्मरण कीजिए हमारे चारों ओर अनेक आर्थिक गतिविधियाँ संचालित होती हैं। उन पर तर्कसंगत ढंग से विचार करने के लिए वर्गीकरण की प्रक्रिया अपरिहार्य है। हम क्या निष्कर्ष चाहते हैं, इस आधार पर वर्गीकरण की अनेक कसौटियाँ हो सकती हैं। वर्गीकरण की प्रक्रिया वस्तुस्थिति का मूल्यांकन करने में सहायता करती है। आर्थिक गतिविधियों को तीन क्षेत्रकों- प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक में विभाजित करने के लिए कार्य के स्वभाव' को कसौटी की रूप में उपयोग किया गया। इस वर्गीकरण के आध र पर हम भारत में कुल उत्पादन और रोजगार की पद्धति का विश्लेषण करने में समर्थ हुए। इसी प्रकार, हमने आर्थिक गतिविधियों को संगठित और असंगठित क्षेत्रक में विभाजित किया और इस विभाजन का प्रयोग इन दो क्षेत्रकों में रोजगार की स्थिति देखने के लिए किया। वर्गीकरण अभ्यासों से व्युत्पन्न सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष क्या थे? वे समस्याएँ और समाधान क्या थे, जिनकी ओर संकेत किया गया? क्या आप जानकारियों को निम्नलिखित सारणी में संक्षिप्त रूप में व्यक्त कर सकते हैं? क्षेत्रक इस्तेमाल की गई कसौटी सबसे महत्त्वपूर्ण निष्कर्ष इंगित समस्याएँ और उनका समाधान कैसे किया | जा सकता है? कार्य का स्वभाव प्राथमिक द्वितीयक तृतीयक संगठित असंगठित आर्थिक गतिविधियों को क्षेत्रकों में वर्गीकृत करने । | करने के लिए हमें इन एकल स्वामियों और का एक अन्य तरीका हो सकता है- परिसंपत्तियों कंपनियों को भुगतान करना पड़ता है। सार्वजनिक का स्वामी और सेवाओं की उपलब्धता के लिए क्षेत्रक का ध्येय केवल लाभ कमाना नहीं होता है। ज़िम्मेदार व्यक्ति कौन है? सार्वजनिक क्षेत्रक में, सरकार सेवाओं पर किए गए व्यय की भरपाई करों अधिकांश परिसंपत्तियों पर सरकार का स्वामित्व या अन्य तरीकों से करती है। आधुनिक दिनों में होता है और सरकार ही सभी सेवाएँ उपलब्ध सरकार सभी तरह की गतिविधियों पर व्यय करती कराती है। निजी क्षेत्रक में परिसंपत्तियों पर है। ये गतिविधियाँ क्या हैं? सरकार ऐसी गतिविधियों स्वामित्व और सेवाओं के वितरण की जिम्मेदारी पर व्यय क्यों करती है? ज्ञात करें। एकल व्यक्ति या कंपनी के हाथों में होता है। कई ऐसी चीजें हैं जिनकी आवश्यकता समाज रेलवे अथवा डाकघर सार्वजनिक क्षेत्रक के उदाहरण हैं, जबकि टाटा आयरन एंड स्टील कंपनी लिमिटेड | के सभी सदस्यों को होती है, परन्तु जिन्हें निजी (टिस्को) अथवा रिलायंस इण्डस्ट्रीज लिमिटेड क्षेत्रक उचित कीमत पर उपलब्ध नहीं कराते जैसी कम्पनियाँ निजी स्वामित्व में हैं। हैं। क्यों? क्योंकि इनमें से कुछ चीज़ों पर बहुत अधिक पैसे खर्च करने पड़ते हैं, जो निजी क्षेत्रकों निजी क्षेत्रक की गतिविधियों का ध्येय लाभ की क्षमता से बाहर होती हैं। इन चीजों का अर्जित करना होता है। इनकी सेवाओं को प्राप्त इस्तेमाल करने वाले हजारों लोगों से पैसा एकत्र भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक करना भी आसान नहीं है। फिर, यदि वे चीज़ों को भाग वहन करती है। इस प्रकार, सरकार किसानों उपलब्ध कराते हैं तो वे इसकी ऊँची कीमत और उपभोक्ताओं दोनों को सहायता पहुँचाती है। वसुलते हैं। जैसे, सड़कों, पूलों, रेलवे, पत्तनों, अधिकतर आर्थिक गतिविधियाँ ऐसी हैं। बिजली आदि का निर्माण और बॉध आदि से जिनकी प्राथमिक जिम्मेदारी सरकार पर है। इन सिंचाई की सुविधा उपलब्ध कराना। इसीलिए सरकार पर व्यय करना सरकार की अनिवार्यता है। ऐसे भारी व्यय स्वयं उठाती है और सभी लोगों के जैसे- सभी के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा सविध लिए इन सुविधाओं को सुनिश्चित करती है। आएँ उपलब्ध कराना। हमने पहले अध्याय में | कुछ गतिविधियाँ ऐसी हैं, जिन्हें सरकारी कुछ गतिविधियों पर विचार किया है। समुचित समर्थन की ज़रूरत पड़ती है। निजी क्षेत्रक उन ढंग से विद्यालय चलाना और गुणात्मक शिक्षा, उत्पादनों अथवा व्यवसायों को तब तक जारी नहीं विशेषकर प्राथमिक शिक्षा उपलब्ध कराना सरकार रख सकते, जब तक सरकार उन्हें प्रोत्साहित नहीं का कर्तव्य है। भारत में निरक्षरों की संख्या विश्व करती है। जैसे, उत्पादन-मूल्य पर बिजली की में सबसे अधिक है। बिक्री से बहुत से उद्योगों में वस्तुओं की इसी प्रकार, हम जानते हैं कि भारत के उत्पादन-लागत में लगभग आधे बच्चे कुपोषण के शिकार हैं और इकाइयाँ, विशेषकर लघु इकाईयाँ बन्द हो सकती उनमें से एक-चौथाई गंभीर रूप से बीमार हैं। हैं। यहाँ सरकार उस दर पर बिजली उत्पादन और हमने शिशु मृत्यु दर के बारे में पढ़ा है। ओडिशा वितरण के लिए कदम उठाती है जिस पर ये (53) अथवा मध्य प्रदेश (56) का शिशु मृत्य उद्योग बिजली खरीद सकते हैं। सरकार लागत का दर विश्व के कछ निर्धनतम भागों से अधिक है। कुछ अंश वहन करती है। सरकार को भी मानव विकास के पक्षों, जैसे | इसी प्रकार, भारत सरकार किसानों से उचित सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता, निर्धनों के लिए मूल्य पर गेहूँ और चावल खरीदती है। इसे अपने आवासीय सुविधाएँ और भोजन एवं पोषण पर गोदामों में भण्डारित करती है और राशन दुकानों ध्यान देने की जरूरत है। सरकार का यह भी के माध्यम से उपभोक्ताओं को कम मूल्य पर कर्तव्य है कि वह बजट बढ़ाकर अत्यन्त निर्धनों बेचती है। आपने कक्षा-9 में खाद्य सुरक्षा अध्याय की और देश के पूर्णतया उपेक्षित भागों की में इसके बारे में पढ़ा है। सरकार लागत का कुछ देखभाल करे। अन्न सारांश इस अध्याय में हमने आर्थिक गतिविधियों को देश में रोजगार के अवसरों की वृद्धि के लिए क्या कुछ सार्थक समूहों में विभाजित करने के तरीकों किया जा सकता है। दूसरे वर्गीकरण में हम का अध्ययन किया। इसका एक तरीका यह परीक्षण संगठित या असंगठित क्षेत्रक में काम करने वाले करना है कि गतिविधि प्राथमिक, द्वितीयक और लोगों पर विचार करते हैं। अधिकांशतः लोग तृतीयक क्षेत्रक में से किससे संबंधित है। भारत के असंगठित क्षेत्रक में काम कर रहे हैं और उनके विगत तीस वर्षों के आँकड़े प्रदर्शित करते हैं कि लिए संरक्षण अनिवार्य है। हमने सार्वजनिक और यद्यपि जी. डी. पी. में सबसे अधिक योगदान निजी क्षेत्रकों की गतिविधियों के बीच अंतर का तृतीयक क्षेत्रक में उत्पादित वस्तुओं और सेवाओं अध्ययन किया और देखा कि सार्वजनिक गतिविधि का है, लेकिन रोज़गार अधिकांशतः प्राथमिक यों को कुछ निश्चित क्षेत्रों पर केन्द्रित करना क्षेत्रक में ही मिलता है। हमने यह भी देखा है कि अनिवार्य क्यों है। आर्थिक विकास की समझ 1. कोष्ठक में दिए गए सही विकल्प का प्रयोग कर रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए - (क) सेवा क्षेत्रक में रोजगार में उत्पादन के समान अनुपात में वृद्धि •.....................। (हुई है।नहीं हुई है) (ख) ••••••••••••••••••••• क्षेत्रक के श्रमिक वस्तुओं का उत्पादन नहीं करते हैं। (तृतीयक/कृषि) (ग) ••••••••• •••••••••• क्षेत्रक के अधिकांश श्रमिकों को रोजगार-सुरक्षा प्राप्त होती है। (संगठित/असंगठित) (घ) भारत में अनुपात में श्रमिक असंगठित क्षेत्रक में काम कर रहे हैं। (बड़े/छोटे) (ङ) कपास एक ••••••••••••••••••••••••••••• उत्पाद है और कपडा एक ••••••••••••••••••••••••••••• उत्पाद है। (प्राकृतिक/विनिर्मित)। (च) प्राथमिक, द्वितीयक और तृतीयक क्षेत्रकों की गतिविधियाँ •••• हैं। (स्वतंत्र/परस्पर निर्भर) 2. सही उत्तर का चयन करें - (अ) सार्वजनिक और निजी क्षेत्रक आधार पर विभाजित हैं। (क) रोजगार की शर्ते (ख) आर्थिक गतिविधि के स्वभाव (ग) उद्यमों के स्वामित्व (घ) उद्यम में नियोजित श्रमिकों की संख्या (ब) एक वस्तु का अधिकांशतः प्राकृतिक प्रक्रिया से उत्पादन क्षेत्रक की गतिविधि है। (क) प्राथमिक (ख) द्वितीयक (ग) तृतीयक (घ) सूचना प्रौद्योगिकी (स) किसी वर्ष में उत्पादित ••••• कुल मूल्य को स. घ. उ. कहते हैं। (क) सभी वस्तुओं और सेवाओं (ख) सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं (ग) सभी मध्यवर्ती वस्तुओं और सेवाओं (घ) सभी मध्यवर्ती एवं अंतिम वस्तुओं और सेवाओं The (द) स.घ.उ, के पदों में वर्ष 2010-11 में तृतीयक क्षेत्रक की हिस्सेदारी •••••••• (क) कुल 20 से 30 प्रतिशत के बीच (ख) 30 से 40 प्रतिशत के बीच (ग) 50 से 60 प्रतिशत के बीच (घ) 70 प्रतिशत भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक 3. निम्नलिखित का मेल कीजिए - कृषि क्षेत्रक की समस्याएँ कुछ संभावित उपाय 1. असिंचित भूमि (अ) कृषि-आधारित मिलों की स्थापना 2. फसलों का कम मूल्य (ब) सहकारी विपणन समितियाँ 3. कर्ज भार । (स) सरकार द्वारा खाद्यान्नों की वसूली 4. मंदी काल में रोजगार का अभाव (द) सरकार द्वारा नहरों का निर्माण 5. कटाई के तुरन्त बाद स्थानीय (य) कम ब्याज पर बैंकों द्वारा व्यापारियों को अपना अनाज बेचने साख उपलब्ध कराना की विवशता 4. विषम की पहचान करें और बताइए क्यों? (क) पर्यटन-निर्देशक, धोबी, दर्जी, कुम्हार (ख) शिक्षक, डॉक्टर, सब्जी विक्रेता, वकील (ग) डाकिया, मोची, सैनिक, पुलिस कांस्टेबल (घ) एम.टी.एन.एल., भारतीय रेल, एयर इण्डिया, सहारा एयरलाइन्स, ऑल इण्डिया रेडियो। 5. एक शोध छात्र ने सूरत शहर में काम करने वाले लोगों का अध्ययन करके निम्न आँकड़े जुटाए - कार्य स्थान रोजगार की प्रकृति श्रमिकों का प्रतिशत सरकार द्वारा पंजीकृत कार्यालयों संगठित और कारखानों में औपचारिक अधिकार-पत्र सहित बाजारों में अपनी दुकान, कार्यालय और क्लिनिक सड़कों पर काम करते लोग निर्माण श्रमिक, घरेलू श्रमिक छोटी कार्यशालाओं में काम करते लोग, जो प्रायः सरकार द्वारा पंजीकृत नहीं हैं। ū तालिका को पूरा कीजिए। इस शहर में असंगठित क्षेत्रक में श्रमिकों की प्रतिशतता क्या है? 6. क्या आप मानते हैं कि आर्थिक गतिविधियों का प्राथमिक, द्वितीयक एवं तृतीयक क्षेत्र में विभाजन की उपयोगिता है? व्याख्या कीजिए कि कैसे? 7. इस अध्याय में आए प्रत्येक क्षेत्रक को रोजगार और सकल घरेलू उत्पाद (स.घ.उ.) पर ही क्यों केन्द्रित | करना चाहिए? क्या अन्य वाद-पदों का परीक्षण किया जा सकता है? चर्चा करें। 8. जीविका के लिए काम करने वाले अपने आसपास के वयस्कों के सभी कार्यों की लंबी सूची बनाइए। उन्हें आप किस तरीके से वर्गीकृत कर सकते हैं? अपने चयन की व्याख्या कीजिए। 9. तृतीयक क्षेत्रक अन्य क्षेत्रकों से कैसे भिन्न है? सोदाहरण व्याख्या कीजिए। 10. प्रच्छन्न बेरोजगारी से आप क्या समझते हैं? शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों से उदाहरण देकर व्याख्या कीजिए। 11. खुली बेरोजगारी और प्रच्छन्न बेरोजगारी के बीच विभेद कीजिए। आर्थिक विकास की समझ 12. * भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास में तृतीयक क्षेत्रक कोई महत्त्वपूर्ण भूमिका नहीं निभा रहा है। क्या आप इससे सहमत है? अपने उत्तर के समर्थन में कारण दीजिए। 13. भारत में सेवा क्षेत्रक दो विभिन्न प्रकार के लोग नियोजित करता हैं। ये लोग कौन हैं? 14. " असंगठित क्षेत्रक में श्रमिकों का शोषण किया जाता है। क्या आप इस विचार से सहमत हैं? अपने उत्तर के समर्थन में कारण दीजिए। 15. अर्थव्यवस्था में गतिविधियाँ रोजगार की परिस्थितियों के आधार पर कैसे वर्गीकृत की जाती हैं? 16. संगठित और असंगठित क्षेत्रकों में विद्यमान रोजगार-परिस्थितियों की तुलना करें। 17. रा.ग्रा.रो.गा.अ. 2005 (NREGA 2005) के उद्देश्यों की व्याख्या कीजिए। 18. अपने क्षेत्र से उदाहरण लेकर सार्वजनिक और निजी क्षेत्रक की गतिविधियों एवं कार्यों की तुलना तथा वैषम्य कीजिए। 19. अपने क्षेत्र से एक-एक उदाहरण देकर निम्न तालिका को पूरा कीजिए और चर्चा कीजिए। सुव्यवस्थित प्रबंध वाले संगठन कुव्यवस्थित प्रबंध वाले संगठन सार्वजनिक क्षेत्रक निजी क्षेत्रक 20. सार्वजनिक क्षेत्रक की गतिविधियों के कुछ उदाहरण दीजिए और व्याख्या कीजिए कि सरकार द्वारा इन गतिविधि यों का कार्यान्वयन क्यों किया जाता है? 21. व्याख्या कीजिए कि एक देश के आर्थिक विकास में सार्वजनिक क्षेत्रक कैसे योगदान करता है? 22. असंगठित क्षेत्रक के श्रमिकों को निम्नलिखित मुद्दों पर संरक्षण की आवश्यकता है- मजदूरी, सुरक्षा और स्वास्थ्य। उदाहरण सहित व्याख्या कीजिए। 23. अहमदाबाद में किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि नगर के 15,00,000 श्रमिकों में से 11,00,000 श्रमिक असंगठित क्षेत्रक में काम करते थे। वर्ष 1997-98 में नगर की कुल आय 600 करोड़ रुपए थी इसमें से 320 करोड़ रुपए संगठित क्षेत्रक से प्राप्त होती थी। इस आँकड़े को तालिका में प्रदर्शित कीजिए। नगर में और अधिक रोजगार-सृजन के लिए किन तरीकों पर विचार किया जाना चाहिए? 24. निम्नलिखित तालिका में तीनों क्षेत्रकों का सकल घरेलू उत्पाद (स.घ.उ.) रुपए (करोड़) में दिया गया है: वर्ष प्राथमिक द्वितीयक तृतीयक 1950 80,000 19,000 39,000 2010 8,18,000 1,24,900 28,18,000 (क) वर्ष 1950 एवं 2010 के लिए स.घ.उ. में तीनों क्षेत्रकों की हिस्सेदारी की गणना कीजिए। (ख) इन आँकड़ों को अध्याय में दिए आलेख-2 के समान एक दण्ड-आलेख के रूप में प्रदर्शित कीजिए। (ग) दण्ड-आलेख से हम क्या निष्कर्ष प्राप्त करते है? भारतीय अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक

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