द्वादशः पाठः जीवनं विभवं विना प्रस्तुत पाठ जनजीवन से सम्ब( कुछ रोचक एवं मामिर्क पद्यों का संकलन है। इनमें जनसामान्य विशेषतः दरिद्र लोगों की पीड़ा से द्रवीभूत कवियों के उद्गार हैं। इन श्लोकों में दरिद्रता का अत्यन्त ममर्स्पशीर् चित्राण किया गया है। सक्तून् शोचति सम्प्लुतान् प्रतिकरोत्याव्रफन्दतो बालकान् प्रत्युत्िस×चति कपर्रेण सलिलं शÕयातृणं रक्षति। दत्वा मूध्र्नि शीणर्शूपर्शकलं जीणेर् गृहे व्यावुफला ¯क तद् यÂ करोति दुःखगृहिणी देवे भृशं वषर्ति ।।1।। अद्याशनं श्िाशुजनस्य बलेन जातं श्वो वा कथं नु भवितेति विचिन्तयन्ती। इत्यश्रुपातमलिनीवृफतगण्डदेशा नैच्छद् दरिद्रगृहिणी रजनीविरामम् ।।2।। प्रायो दरिद्रश्िाशवः परमन्िदराणां द्वारेषु दत्तकरपल्लवलीनदेहाः। लज्जानिगूढवचसो बत भोक्तुकामा भोक्तारमध्र्नयनेन विलोकयन्ित ।।3।। कन्थाखण्डमिदं प्रयच्छ यदि वा स्वाघड्ढे गृहाणाभर्वंफ, रिक्तं भूतलमत्रा नाथ भवतः पृष्ठे पलालोच्चयः। दम्पत्योनिर्श्िाजल्पतोरितिवचः श्रुत्वैव चैरस्तदा लब्ध्ं कपर्टमन्यतस्तदुपरि क्ष्िाप्त्वा रुदन्िनगर्तः ।।4।। हसति हसति स्वामिन्युच्चै रुदत्यपि रोदिति वृफतपरिकरः स्वेदोद्गारं प्रधवति धवति। गुणसमुदितं दोषोेपेतं प्रनिन्दति निन्दति ध्नलवपरिक्रीतो भृत्यः प्रनृत्यति नृत्यति ।।5।। रात्रौ जानुदिर्वा भानुः वृफशानुः सन्ध्ययोद्वर्योः इत्थं शीतं मया नीतं जानुभानुवृफशानुभ्िाः।।6।। सक्तून् - भूजिर्तस्य चणकस्य चूणर्म् - सत्तू को शोचति - चिन्तयति - चिंता करती है सम्प्लुतान् - आद्रार्न् - भीगे हुए को आव्रफन्दतो - व्रफन्दनं वुफवर्त् - रोते हुए को प्रतिकरोति - शाम्यति - चुप कराती है कपर्रेण - भग्न पाध्ेण - टूटे बतर्न के टुकड़े से प्रत्युत्िस×चति - शोषयति - सुखाती है/उलीच रही है सलिलम् - जलम् - जल को शÕयातृणम् - तृणैः निमिर्तां शÕयाम् - पुआल का बना बिस्तर मूध्र्नि - श्िारसि - सिर पर शीणर्शूपर्शकलम् - जीणर्शूपर्खण्डम् - टूटे - पूफटे सूप के टुकड़े को जीणेर् - प्राचीने - पुराने भृशं - अत्यन्तम् - अत्यध्िवफ अशनम् - भोजनम् - भोजन मलिनीवृफतगण्डदेशा - मलिनकपोलप्रदेशाः - जिसके गाल मलिन हो गए हैं। रजनीविरामम् - रात्रयाः अन्ते - रात्रिा की समाप्ित परमन्िदराणाम् - परभवनानाम् - दूसरों के घरों का दत्तकरपल्लवलीनदेहाः - निहितकरकिसलयगोपितकायाः - हथेली से मुख छिपाए हुए लज्जानिगूढवचसः - लज्जाविवृतशब्दाः - लज्जावश जिसके वचन नहीं निकल रहे अधर्नयनेन - अध्र्निमीलितनेत्रोण - अध्मुँदी आँखों से भोक्तारम् - भोजनं वुफवार्णं - भोजन करने वालों को विलोकयन्ित - पश्यन्ित - देखते हैं कन्था - जीणर्वस्ध्ेण निमिर्तं आस्तरणम् - कथरी प्रयच्छ - देहि - दो स्वाडड्ढे - स्वव्रफोडे - अपनी गोद में अभर्कम् - बालम् - बच्चे को भूतलम् - भूमितलम् - ध्रती पलालोच्चयः - पलालसंग्रहः - पुआल का ढेर दम्पत्योः - पति - पत्न्योः - पति - पत्नी की निश्िा - रात्रौ - रात में जल्पतोः - गल्पतोः - बात करते हुए ;दो कोद्ध कपर्टम् - जीणर्वस्त्राम् - चादर, जीणर्शीणर् कपड़ा निगर्तः - बहिगर्तः - निकल गया परिकरः - कटिभागम् - कमर स्वेदोद्गारम् - स्वेदस्य श्रमविन्दोः उद्गारम् - पसीने का निकलना दोषोपेतम् - दोषसहितम्/निगर्मनम् - दोषमुक्त ध्नलवपरिक्रीतः - अल्पध्नेन व्रफीतः - थोड़े ध्न से खरीदा हुआ भृत्यः - परिचारकः - नौकर जानुः - शरीरावयवविशेषः - घुटना भानुः - रविः - सूयर् वृफशानुः - पावकः - अग्िन अन्वयाः 1.देवे भृशं वषर्ति ;सतिद्ध जीणेर् गृहे व्यावुफला दुःखगृहिणी शीणर्शूपर्शकलं मूध्र्नि दत्वा तत् ¯क यत् न करोति - सम्प्लुतान् सक्तून् शोचति आव्रफन्दतः बालकान् प्रतिकरोति कपर्रेण सलिलं प्रत्युत्िस×चति शÕयातृणं ;चद्ध रक्षति। 2.अद्य बलेन श्िाशुजनस्य अशनं जातम् श्वः कथं वा नु भविता इति विचिन्तयन्ती अश्रुपातमलिनीवृफतगण्डदेशा दरिद्रगृहिणी रजनीविरामं न ऐच्छत्। जीवनं विभवं विना 103 3.बत् प्रायः परमन्िदराणां द्वारेषु दत्तकरपल्लवलीनदेहाः लज्जानिगूढवचसः भोक्तुकामा दरिद्रश्िाशवः भोक्तारम् अध्र्नयनेन विलोकयन्ित। 4.हे नाथ! इदं कन्थाखण्डं प्रयच्छ, यदि वा स्वाटे ;स्वस्य व्रफोडेद्ध अभर्कं ;श्िाशुंद्ध गृहाण, अत्रा भूतलं रिक्तं भवतः पृष्ठे पलालोच्चयः। निश्िा जल्पतोः दम्पत्योः इति वचः श्रुत्वा एव तदा अन्यतः लब्ध्ं कपर्टम् तदुपरि क्ष्िाप्त्वा रुदन् चैरः निगर्तः। 5.ध्नलवपरिव्रफीतः भृत्यः स्वामिनि हसति हसति ;स्वामिनिद्ध, रुदति उच्चैः रोदिति, धवति वृफतपरिकरः स्वेदोद्गारं प्रधवति गुणसमुदितं दोषोपेतं ;वाद्ध निन्दति प्रनिन्दति, नृत्यति प्रनृत्यति। 6.रात्रौ जानुः दिवा भानुः द्वयोः सन्ध्ययोः ;प्रातः साय×चद्ध वृफशानुः - इत्थं जानु भानुवृफशानुभ्िाः मया शीतं नीतम्। हिन्दी अथर् 1.इन्द्र देव के अत्यध्िक वषार् करने पर परेशान गृहिणी टूटे सूप के टूकड़े को सिर पर लेकर क्या ऐसा है जो नहीं करती। ;विकलतावश सबकुछ करती हैद्ध - भीगे हुए सत्तू की चिंता करती है, रोते हुए बच्चों को चुप कराती है, टूटे बतर्न के टुकड़े से पानी उलीचकर बाहर पेंफकती है, तृण के बने बिस्तर ;पुआल के बिस्तरद्ध की रक्षा करती है। 2.आज तो प्रयत्नपूवर्क बच्चों का भोजन हो गया, कल किस प्रकार उनका भोजन हो पाएगा, यह सोचती हुइर्, रोने से जिसके गाल मलिन हो गए हैं ऐसी गरीब की पत्नी नहीं चाहती है कि रात बीते। 3.प्रायः दूसरों के घरों के दरवाजे पर दोनों हाथ रखकर जिसके कारण उनका शरीर छिप गया है और वचन लज्जावश निगूढ़ हो गए हैं ;छिप गए हैंद्ध, आवाज नहीं निकल पाती। खेद है भोजन की इच्छा रखने वाले गरीबों के ऐसे बच्चे ;खाने वालों कोद्ध अध्खुली आँखों से अथार्त् टकटकी लगा कर देख रहे हैं। 4.मुझे यह कन्थाखंड ;कथरी का टुकड़ाद्ध दे दो या अपनी गोद में ;मेरेद्ध बच्चे को ले लो ;क्योेंकिद्ध यहाँ ध्रती खाली है ;जमीन पर बिस्तर नहीं हैद्ध तुम्हारी पीठ के नीचे पुआल का ढेर है - इस प्रकार रात्रिा में पति - पत्नी की बातचीत सुनकर दूसरे ;घरद्ध से प्राप्त चादर को उसके उफपर पेंफककर रोता हुआ चोर निकल गया। 5 अत्यल्प ध्न से खरीदे हुए नौकर मालिक के हँसने पर हँसते हैं, रोने पर जोर से रोते हैं, स्वामी के दौड़ने पर जोर से कमर पर हाथ रख कर पसीना निकालते हुए दौड़ते हैं, गुणवान् हो या दोषरहित ;स्वामी केद्ध निन्दा करने पर अध्िक निन्दा करते हैं, ;उनकेद्ध नाचने पर जोर से नाचते हैं। 6 मेरे द्वारा रात घुटनों के सहारे, दिन सूयर् ;की गमीर्द्ध के सहारे दोनों सन्ध्यायें अग्िन के सहारे बिताइर् गइर्। इस प्रकार घुटने, सूयर् और अग्िन के सहारे जाड़े के दिन बिताए। 1 अधेलिख्िातानां प्रश्नानाम् उत्तराण्िा संस्वृफतभाषया लिखत - ;कद्ध दरिद्रगृहिणी रजनीविरामं किमथ± नेच्छति? ;खद्ध परमन्िदराणां द्वारेषु के विलोकयन्ित? ;गद्ध चैरः ¯क श्रुत्वा रुदन्िनगर्तः? ;घद्ध स्वामिनि हसति कः हसति? ;घद्ध देवे भृशं वषर्ति सति दुखःगृहिणी ¯क करोति? 2 रेखािड्ढतपदमाध्ृत्य प्रश्ननिमार्णं वुफरुत - ;कद्ध भृत्यः स्वामिनि रोदिति रोदिति। ;खद्ध श्िाशुजनस्य अद्य अशनं जातम्। ;गद्ध श्िाशवः अध्र्नयनेन विलोकयन्ित। ;घद्ध माता आव्रफन्दतः बालकान् प्रतिकरोति। ;घद्ध चैरः कपर्टम् क्ष्िाप्त्वा निगर्तः। 3 संध्िं/विच्छेदं वा वुफरुत - ;कद्ध यÂ ....................$ ....................। ;खद्ध नेच्छत् ....................$ ....................। जीवनं विभवं विना 105 ;गद्ध ....................- स्व $ अघड्ढे। ;घद्ध - श्रुत्वा $ एव। ;घद्ध दोषोपेतम् - $ । 4.अनेकेषां शब्दानां वृफते समुचितम् एकपदं ;समस्तपदंद्ध लिखत - ;कद्धध्नलवेन परिकीतः - ;खद्ध लज्जया निगूढ़ाः वचांसि येषाम् तेषाम् - ;गद्धअश्रुपातेन मलिनीवृफतः गण्डदेशः यस्याः सा - ;घद्ध वृफतः परिकरःयेन सः - 5.पाठमाध्ृत्य अधेलिख्िातान्वये रिक्तस्थानानि पूरयत - ध्नलवपरिव्रफीतः भृत्यः स्वामिनि हसति ;स्वामिनिद्ध रोदिति धावति ..............स्वेदोद्गारं प्रधवति गुणसमुदितं दोषोपेतं वा निन्दति ..............नृत्यति ..............। 6. अधेलिख्िातानि पदानि प्रयुज्य संस्वृफतेनि वाक्यरचनां वुफरुत - ;कद्ध श्िाशवः ;खद्ध भानुः ;गद्ध सलिलम् ;घद्ध रजनी ;घद्ध गृहिणी 7. मूलधतुं पुरुषं वचनं च लिखत - धतु पुरुष वचन ;कद्ध शोचति ;खद्ध वषर्ति ;गद्ध रोदिति ;घद्ध धवति ;घद्ध नृत्यति परियोजनाकायर्म् 1.दारिद्र्यं पीडादायवंफ भवति इति मत्वा दारिद्र्यनिवारणाय प्रयत्नः कत्तर्व्यः दारिद्रयम् निन्दनीयम् वा? - स्वविचारान् स्वभाषया लिखत। 2.त्वं कस्यापि निध्र्नछात्रास्य सहायतां कथं करिष्यसि - स्वभाषया लिखत। संस्वृफत साहित्य की विकास यात्रा में वेद से लेकर अद्यावध्ि एक सवि्रफय काव्यपरंपरा चल रही है, जिसे हम लोकध्मीर् काव्य कहते हैं। यह काव्य परंपरा राजसभा की संकरी दुनिया के बाहर भारतीय जनता के विराट संसार से उपजी थी। कुछ अनाम और अनजाने कवि दरबार की विलासिता और चाकचिक्य कामिनी का सौंदयर्विलास या भक्ित की शान्त सरिता में अवगाहन से अलग हटकर सामान्य जन - जीवन में आने वाली समस्याएँ, उनसे जूझते लोगों की दुरवस्थाओं का यथाथर् वणर्न करते रहे हैं और उनके माध्यम से तत्कालीन सामाजिक और सांस्वृफतिक स्िथतियों का यथातथ्य चित्राण करते रहे हैं। इस तरह के कुछ श्लोक पठितव्य हैं - 1 कदाचित् कष्टेन द्रविणमध्माराध्नवशा - न्मया लब्ध्ं स्तोवंफ निहितमवनौ तस्करवशात् ततो नित्ये कश्िचद्दध्दपि तदाखुबिर्लगृहे नयल्लब्धे{प्यथोर् न भवति यदा कमर्विषमम् ।। 2 एते दरिद्रश्िाशवस्तनुजीणर्कन्थां स्कन्ध्े निधाय मलिनां पुलकावुफला सूयर्स्पुफरत्करकदम्िबतभ्िािादेश लाभाय शीतसमये कलिमाचरन्ित । 3 लग्नः शृघõयुगे गृही सतनयो वृध्दौ गुरूपाश्वर्योः । पुच्छाग्रे गृहिणी खुरेषु श्िाशवो लग्नः वध्ूः कम्बले । एकः शीणर्जरद्गवो विध्िवशात् सवर्स्वभूतो गृहे सवैर्रेव वुफटुम्बकेन रुदता सुप्तः समुत्थाप्यते ।। जीवनं विभवं विना 107 4.सुखं हि दुःखाÂनुभूयशोभते घनान्ध्कारेष्िवव दीपदशर्नम् सुखात्तु यो याति नरो दरिद्रतां ध्ृतः शरीरेण मृतः स जीवति।। ध्यातव्य - महाकवि शूद्रक वृफत प्रसि( सामाजिक प्रकरण ‘मृच्छकटिकम्’ छात्रों को अवश्य पढ़ना चाहिए जिसमें दारिद्र्य के सहज चित्राण के अतिरिक्त समाजिक परिस्िथतियों/विसंगतियों का यथाथर् चित्राण है। तत्सम - तद्भव शब्द तत्सम तद्भव कन्था कथरी अश्रु आँसू गण्ड गाल लज्जा लाज पलाल पुआल चैरः चोर

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