अध्यायअध्िगम उद्देश्य इस अध्याय के अध्ययन के पश्चात् आपμ ऽ व्यावसायिक वित्त का अथर् समझा सवेंफगेऋ ऽ वित्तीय प्रबंध का अथर् बता सवेंफगेऋ ऽ हमारे उपक्रमों में वित्तीय प्रबंध की भूमिका को समझा सवेंफगेऋ ऽ वित्तीय प्रबंध के उद्देश्यों तथा उन्हें वैफसे प्राप्त किया जा सकता है की विवेचना कर सवेंफगेऋ ऽ वित्तीय नियोजन के अथर् एवं महत्त्व को समझा सवेंफगेऋ ऽ पूँजी संरचना का अथर् बता सवेंफगेऋ ऽ एक उपयुक्त पूँजी संरचना के चुनाव को प्रभावित करने वाले कारकों का विश्लेषण कर सवेंफगेऋ ऽ स्थाइर् पूँजी एवं कायर्शील पूँजी का अथर् बता सवेंफगेऋ ऽ स्थाइर् पूँजी एवं कायर्शील पूँजी की आवश्यकता को प्रभावित करने वाले कारकों का विश्लेषण कर सवेंफगे। व्यावसायिक वित्त टाटा स्टील द्वारा कोरस का अध्िग्रहण भारत की निजी क्षेत्रा में सबसे अिाक स्टील उत्पादक है, ने कोरस का अिाग्रहण किया है। कोरस को पहले बि्रटिश स्टील के नाम से जाना जाता था। यह अिाग्रहण 8.6 अरब यू. एस. डाॅलर में हुआ है। इससे आज टाटा स्टील का विश्व में स्टील उत्पादन में पाँचवाँ स्थान बनगया है। इस महानतम वित्तीय निणर्य से टाटा तथा कोरस एवं सभी कमर्चारियों तथा अंशधारियों कोनिविर्वाद रूप से अत्यंत महत्त्वपूणर् स्थान प्राप्त हो गया है। उनमें से वुफछ निम्न प्रकार हैंμ ऽ टाटा संसार में सबसे अिाक स्टील उत्पादन वाला पाँचवाँ संगठन होगा। ऽ इस सौदे के लिए टाटा आठ अरब डाॅलर का )ण लेगा। इस सौदे के भुगतान के लिए टाटा स्टील यूके. एक विशेष उद्देश्य वाहन ;स्पेशल परपश व्हीकलद्ध का निमार्ण करेगा। एस.पी.वी.ए सिंगापुर की सहायक वंफपनी के माध्यम से टाटा स्टील से कोष प्राप्त करेगी। टाटा ग्रुप की एक अन्य वंफपनी, टाटा संस लिमिटेड टाटा स्टील के साथ, एक अरब डाॅलर के पूवार्िाकार अंशों में विनियोग करेगी तथा इतनी ही राश्िा का विनियोग टाटा स्टील द्वारा भी किया जाएगा। ऽ टाटा स्टील जो व्रेफता ;अजर्कद्ध वंफपनी है के द्वारा36,500 करोड़ रुपए की वित्तीय व्यवस्था अिाग्रहण हेतु की जाएगी। ऽ टाटा स्टील द्वारा इस धन राश्िा की व्यवस्था )ण लेकर या समता निगर्मन या दोनों के संयोजन द्वारा की जाएगी। वुफछ धन की व्यवस्था अंतरित उपचय या उपाजर्न द्वारा भी की जाएगी। यहवित्तीय निणर्य टाटा स्टील के पूँजी ढाँचे को प्रभावित करेगा। ऽ सन् 2012 तक टाटा स्टील को 4 करोड़ टन तक उत्पादन में वृि तथा 32 अरब यू.एस. डाॅलर में वृि की आशा है। ऽ इससे टाटा स्टील की प्रतियोगितात्मकता भी प्रभावित होगी, क्योंकि स्टील की उत्पादन लागत सभी संभाव्यताओं में परिवतिर्त होगी। ऽ टाटा स्टील की लाभांश भुगतान क्षमता भी प्रभावित हो सकती है क्योंकि इतने बड़े भारी रोकड़ राश्िाका वहिगर्मन तथा इतने बड़े भारी एवं महत्त्वपूणर् )णों के भुगतानाथर्, अंशधारियों को लाभांश देने से पूवर् व्यवस्था करनी होगी। ऽ जोख्िाम की मात्रा भी प्रभावित होगी। यह कहना गलत नहीं होगा कि, एक ऐसा निणर्यए संगठन के भविष्य को प्रभावित करेगा। ऐसे निणर्य जब इन्हें औपचारिक रूप दिया जाता है तो खंड स्तंभ का रूप ले लेते हैं। ड्डोत - दि इकोनाॅमिक टाइम्स विषय प्रवेश इस प्रकार के निणर्यों को लेने के लिए सावधानीपूणर्वित्तीय नियोजन, एक निणार्यक पूँजी संरचना की समझ तथा जोख्िामपूणर् उद्यम की लाभदायकता की आवश्यकता होती है। इन सब का भार अंशधारियों तथा कमर्चारियों को उठाना पड़ता है।उन्हें व्यावसायिक वित्त की समझ की आवश्यकताहोती है तथा मुख्य वित्तीय निणर्य करने वालेक्षेत्रों, वित्तीय जोख्िाम, व्यवसाय की स्थाइर् एवं कायर्शील पूँजी की आवश्यकता की समझ की भी आवश्यकता होती है। इन्हें अब एक - एक करके स्पष्ट किया जाएगा। व्यावसायिक वित्त का अथर् व्यावसायिक ियाओं के संचालन हेतु धन कीआवश्यकता होती है इसे ही व्यावसायिक वित्त कहते हैं। लगभग सभी व्यावसायिक ियाओं के लिए वुफछ न वुफछ धन की आवश्यकता होती है। वित्त की आवश्यकता, व्यवसाय के स्थापन, संचालन, इसमंे आधुनिकीकरण, विस्तार करने अथवाविविधीकरण के लिए होती है। अतः वित्त, एक व्यवसाय के जीवन काल में हर कदम पर आवश्यकहोता है। व्यवसाय के उत्तर जीवन तथा विकास के लिएए उपयुक्त वित्त की उपलब्धता अत्यंत निणार्यक होती है। वित्तीय प्रबंध सभी वित्त के लिए वुफछ लागत की आवश्यकता होती है। यह अति आवश्यक है कि इसकी आवश्यकता की व्यवस्था अत्यंत सावधानीपूवर्क की जानी चाहिए। वित्तीय प्रबंध का संबंध इसकीइष्टतम उपलब्धता तथा वित्त के उपयोग से है।इष्टतम उपलब्धता के लिए वित्त के विभ्िान्न उपलब्धड्डोतों की पहचान की जाती है तथा उनके ऊपर आने वाले व्यय की तुलना की जाती है तथा संबंिात जोख्िाम का भी ध्यान रखा जाता है। ठीकउसी प्रकार, जो वित्त उपलब्ध हुआ है उसका विनियोग इस प्रकार किया जाता है कि उससे होने वाली आय उसकी लागत से अिाक हो। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि जिस लागतपर वित्त व्यवस्था की गइर् है उससे होने वाली आयए लागत से अिाक हो। वित्तीय प्रबंध का लक्ष्यए कोष प्राप्ित लागत को कम करना होता है। इसका उद्देश्य आवश्यकता के समय पयार्प्त कोषों को उपलब्ध कराने का विश्वास दिलाना भी होताहै तथा अनावश्यक वित्त से बचाकर रखना होताहै। अतः वित्तीय प्रबंध का अथर् आवश्यकतानुसारवित्त की समुचित व्यवस्था करना है। यह कहना गलत नहीं होगा कि किसी भी व्यवसाय का भविष्य इस बात पर निभर्र करता है कि उसकीवित्तीय व्यवस्था किस कोटि की है। भूमिकाμ वित्तीय प्रबंध की भूमिका को अनदेखा नहीं किया जा सकता। जैसा कि व्यवसाय कीवित्तीय अवस्था से वित्तीय प्रबंध का प्रत्यक्ष संबंधहै, वित्तीय विवरण - स्िथति - विवरण तथा लाभ - हानि खाता पफमर् की आथ्िार्क स्िथति तथा अंतिम अवस्था को प्रतिपादित करते हंै। व्यवसाय के अंतिम खातोंके सभी मदों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से वित्तीय प्रबंध के निणर्यों से प्रभावित हुए बगैर नहीं रहते अथार्त् प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से निश्िचत ही प्रभावित होते हैं। उनमें से वुफछ पहलू जो मुख्य उदाहरण हैं निम्नांकित हैंμ ;पद्ध व्यवसाय की स्िथर संपिायों का आकार तथा उनका सम्िमश्रणμ उदाहरणाथर्, स्थाइर् संपिायों में 100 करोड़ रुपए के विनियोग का पूँजी बजट निणर्यए इस राश्िा से स्थाइर् संपिायों के आकार को बढ़ा देगा। ;पपद्ध चालू संपिायों की मात्रा तथा उनका रोकड़ए स्वंफध ;स्टाॅकद्ध तथा प्राप्ितयों में विभाजनμ स्थाइर् संपिायों के विनियोजन में वृिए कायर्शील पूँजी में भी आवश्यकता के अनुरूप वृिकरता है। वित्तीय प्रबंध निणर्यों से चालू संपिायों की मात्रा भी प्रभावित होती है। इसके अतिरिक्त उधार नीति, स्वंफध प्रबंध, देनदारों की पूणर्राश्िा तथा रहतिया, चालू संपिायों तथा उनके सम्िमश्रण भी अप्रभावित नहीं रहते। ;पपपद्ध दीघर्कालीन एवं अल्पकालीन वित्तीय राश्िायों को उपयोग में लानाμ वित्तीय प्रबंध में दीघर्कालीन एवं अल्पकालीन वित्त के अनुपात का निणर्य भी निहित होता है। एक उद्यम को अिाक तरल पूँजी की आवश्यकता है तो उसे उसके अनुपात में दीघर्कालीन आधार पर अिाक राश्िा जुटानी होगी। तरलता तथा लाभदायकता में विकल्प होता है। अंतनिर्हित मान्यता यह है कि दीघर्कालीन दायित्वों की अपेक्षा अल्पकालीन दायित्व कम खचीर्ले होते हैं। ;पअद्ध दीघर्कालीन वित्त का )ण तथा समता में विभाजनμ वुफल दीघर्कालीन वित्त के लिए )ण अथवा और समता पूँजी को बढ़ाना भीवित्तीय प्रबंध निणर्य ही है। )ण राश्िा, समताअंश पूँजी, पूवार्िाकारी अंश पूँजी भी वित्तीयनिणर्य से प्रभावित होती है। जोकि वित्तीय प्रबंध का ही एक अंग है। ;अद्ध वास्तव में लाभ - हानि खाते की सभी मदें जैसे - ब्याज, व्ययए ”ास आदिμ )ण के अिाक मात्रा में भार से भविष्य में ब्याज का भार भी अिाक ही होता हैμ जैसे समता का अिाक उपयोग, लाभांश की मात्रा में, भुगतानाथर् वृि ही करता है। समानरूप में एक व्यवसाय में वृि जोकि पूँजी बजट निणर्य का ही परिणाम होता है व्यवसाय के लाभ - हानि खाते की सभी मदों को प्रभावित करता है। दूसरे शब्दों में यहकहा जा सकता है कि व्यवसाय के वित्तीय विवरणों का मुख्यतः निधार्रण पूवर्वत लिए गएवित्तीय प्रबंध निणर्यों पर ही आधारित होता है।समरूपता में भविष्य के वित्तीय विवरणभूतकालीन तथा चालू वित्तीय निणर्यों पर ही निभर्र करते हैं। दूसरे शब्दों में एक व्यवसाय कासमूचा वित्तीय ढाँचा उसके वित्तीय प्रबंध के स्वरूप द्वारा निधार्रित किया जाता है। एकअच्छे वित्तीय प्रबंध का लक्ष्यए वित्तीय संसाधनों को कम कीमत पर, अिाक - से - अिाक लाभकारी ियाओं में लगाना होता है। उद्देश्य वित्तीय प्रबंध का मुख्य उद्देश्य अंशधारियों की धन संपदा में अिाकतम वृि करना होता है। इसलिएवित्त प्रबंध् में दीघर् अवध्ि संपिायों में निवेशकायर्शील पूँजी संपिायों के वित्तीयन आदि के संबंध में निणर्य सम्िमलित है। वंफपनी के अंशों काबाशार मूल्य तीन मूलभूत वित्तीय निणर्यों से संबंिात होता है। जिनका अध्ययन आप बाद में करेंगे। यह इसलिए कि वंफपनी के सभी कोष अंशधारियों से संबंिात होते हैं। जिस वििा से उनका विनियोजन किया जाता है तथा जिस वििा से उनके द्वारा लाभाजर्न किया जाता है के अनुरूप ही उनका बाशारी मूल्य या कीमत निधार्रित होती है। जिसका अथर् समता अंशों का बाशार मूल्य अिाक - से - अिाक बढ़ाना होता है। समता अंशों पर यदि घोष्िात लाभांश की राश्िा, लागत से अिाक होती है तो समता अंशोंका बाशार मूल्य बढ़ता है। अतः सभी वित्तीय निणर्यों का लक्ष्य इस बात को प्रतिपादित करना होता है कि प्रत्येक निणर्य वुफशलतापूवर्क लिया गया है तथा उनसे अंशों के मूल्य में वृि हुइर् है तथा इस प्रकार की मूल्य वृि से अंशों के बाशार मूल्य में वृि होती है। यदि मूल्य में गिरावट आती है तो इसका अथर् यहहुआ है कि निणर्य कमजोर है। अतः वित्तीय प्रबंध का उद्देश्य वंफपनी के क्षमता अंशों के वतर्मान मूल्योंकी अध्िकतम ऊँचाइर् तक ले जाना है। अथार्त् वंफपनी के स्वामियों एवं अंशधरकों के ध्न को अिाकतम बनाना है। अतः जब किसी नयी मशीन में विनियोजन का निणर्य लिया जाता है, तो इसका उद्देश्यए लागत से अिाक लाभ प्राप्त करना होता है। जिससे कि मूल्योंमें वृि होती है। इसी तरह जब वित्त उपाजर्न होता है तो उद्देश्य लागत को कम करना होता है ताकि मूल्य वृि अिाक हो।वास्तव में सभी वित्तीय निणर्यों में चाहे वे छोटे हों या बड़े, अंतिम उद्देश्यए निणर्यकतार् का वुफछ मूल्य में वृि करने में मागर्दशर्क का काम करता है जिससे कि समता अंशों का बाशार मूल्य अिाकतम हो सके। यह वुफशल निणर्य लेकर ही संभव हो सकता है। निणर्य लेना तभी वुफशल कहा जाता है जब विभ्िान्न उपलब्ध विकल्पों में से सवर्श्रेष्ठ का चुनाव किया जाता है। वित्तीय निणर्य वित्तीय संदभर् में इसका तात्पयर् सवोर्त्तम वित्तीय विकल्प अथवा सवोर्त्तम विनियोग विकल्प है। वित्तीय निणर्य लेने का अथर् तीन विस्तृत निणर्यों से है जो निम्नांकित हैंμ निवेश संबंधी निणर्य पफमो± के साधन उस तुलना में अपयार्प्त होते हैं जिनमें उनका उपयोग किया जा सकता है तथा लगाया जा सकता है। एक पफमर् को इस बात का चुनाव करना होता है कि इन साधनों को कहाँ पर विनियोजित अध्िकतम लाभ की अवधरणा किया जाए। ताकि वे अपने निवेशकों को अिाकतम लाभ उपाजिर्त करा सवेंफ। अतः निवेश निणर्य का संबंध इस बात से होता है कि पफमर् के कोषों कोविभ्िान्न प्रकार की संपिायों में वैफसे विनियोजित किया जाए। निवेश निणर्य दीघर्कालीन अथवा अल्पकालीन हो सकता है। एक दीघर्कालीन निवेश निणर्य को ‘पूँजी बजटिंग निणर्य’ के नाम से भी पुकारा जाताहै। इसमें दीघर्कालीन आधार पर वित्त की वचनब(ता निहित होती है। उदाहरणाथर् - वतर्मान में प्रचलित मशीन के स्थान पर एक नयी मशीन में निवेशकरना या एक नयी संपिा का अिाग्रहण करना या कोइर् नयी शाखा खोलना आदि इसके उदाहरण हैं। किसी भी व्यवसाय के लिए ऐसे निणर्य बड़े विकराल होते हैं क्योंकि ये दीघर्काल में पफमर् कीलाभदायक क्षमता को प्रभावित करते हैं। संपिायों का आकार, लाभदायकता तथा तुलनात्मकता, सभी पूँजी बजटिंग निणर्यों से प्रभावित होती हैं। इसके अतिरिक्त ये सभी निणर्य सामान्यतः निवेश की भारी मात्रा की राश्िा को सम्िमलित किए हुए होते हैं तथा इनको एक बड़ी भारी लागत में अतिरिक्त परिवतिर्त भी नहीं किया जा सकता। अतः एक बार निणर्य लेने के उपरांत इनसे व्यवसाय को मुक्ित पाना असंभव नहीं तो दुष्कर अवश्य होता है। अतः ऐसे निणर्यों को लेते समय अत्यंत सावधानी की आवश्यकता होती है। ये निणर्य उन्हीं लोगों के द्वारा लिए जाने चाहिए जो इन्हें पूणर्रूप से जानते हंै या जिन्हें ये बोधगम्य हैं। एक गलत पूँजी बजटिंग निणर्य सामान्य रूप से व्यवसाय की कायर्क्षमता को क्षति ही पहुँचाता है तथाभविष्य में भी वित्तीय भविष्य को ठेस पहुँचाता है। पूँजी बजटिंग निणर्यों को प्रभावित करने वाले कारक एक व्यवसाय के लिए निवेश के लिए अनेक परियोजनाएँ उपलब्ध होती हैं। लेकिन प्रत्येक परियोजना का उससे प्राप्त होने वाली आय का सावधानीपूवर्क मूल्यांकन किया जाना चाहिए चाहे उस परियोजना का चुनाव किया जाता है अथवा नहीं, लेकिन मूल्यांकन अवश्य किया जाना चाहिए। यदि, केवल एक ही परियोजना है तो उससे होने वाली आय की व्यवहायर्ता पर विचार अवश्य किया जाना चाहिए। अथार्त् निवेश और इसकी तुल्यता उस प्रकार के उद्योगों के अनुपात से देखी जाती है। निम्नलिख्िात वुफछ कारक हैं जो पूँजी बजटिंग निणर्य को प्रभावित करते हैं। ;कद्ध परियोजना का रोकड़ प्रवाहμ जब एक वंफपनी एक भारी धनराश्िा का निवेश करने का निणर्य लेती है तो वह एक समय में वुफछ रोकड़ का प्रवाह अिाक होने की अपेक्षा करती है अथार्त् वुफछ रोकड़ अिाक प्राप्त करना चाहती है। ये रोकड़ प्रवाह रोकड़ प्राप्ित तथा रोकड़ भुगतान क्रम उस समय विशेष के लिए होते हैं जो किए हुए निवेश से होते हैं। पूँजी बजटिंग निणर्य लेने से पहले इन रोकड़ प्रवाह की धनराश्िायों का भली - भाँति विश्लेषण कर लेना चाहिए। ;खद्ध आय की दरμ परियोजना सबसे महत्त्वपूणर् कसौटी उससे होने वाली आय की दर होती है। इन गणनाओं का आधार प्रत्येक प्रस्ताव से होने वाली आय तथा उस पर होने वाली जोख्िाम का निधार्रण है। मान लीजिए कि ‘अ’ तथा ‘ब’ दो प्रस्ताव हैं ;जिनमें दोनों में समान प्रकार की जोख्िाम हैंद्ध आय की दर क्रमशः 10 तथा 12 प्रतिशत हैं। तो सामान्य परिस्िथतियों में परियोजना ‘ब’ का चुनाव किया जाएगा। ;गद्ध निवेश कसौटी अंतभार्वितताμ किसी विशेष परियोजना में निवेश का निणर्य करने के लिए अनेक गणनाओं जैसे निवेश की राश्िा, ब्याज की दर, रोकड़ प्रवाह तथा आय की दर आदि की गणना करनी पड़ती है। निवेश प्रस्तावों के मूल्यांकन की अनेक तकनीवेंफ हैं जिन्हें पूँजी बजटिंग तकनीकोें के नाम से पुकारा जाता है। किसी एक विशेष प्रस्ताव का चुनाव करने से पूवर् इन तकनीकांे का उपयोग सभी प्रस्तावों के लिए किया जाता है। अल्पकालीन निवेश निणर्य ;चालू पूँजी निणर्यद्धμ अल्पकालीन निवेश निणर्य से तात्पयर् व्यवसाय में स्वंफधए देनदार तथा रोकड़ के स्तर का निणर्य लेने सेहै। इन संपिायों के विषय में निणर्य लेने का अथर् व्यवसाय की दैनिक कायर्वाही का निणर्य लेने से है।क्योंकि ये संपिायाँ दैनिक लेन - देन से प्रभावित होती हैं। ये लेन - देन व्यवसाय की देयता तथा लाभदायकता को प्रभावित करते हैं। वुफशल रोकड़ प्रबंधए स्कंध प्रबंधए तथा प्राप्यनीय खातों का प्रबंध कायर्शील पूँजी प्रबंध के ठोस संघटक हैं। वित्तीयन संबंधी निणर्य यह निणर्य दीघर्कालीन ड्डोतों से धन प्राप्त करकेवित्त की प्रभामा के विषय में लिया जाता है;अल्पकालीन ड्डोतों का अध्ययन कायर्शील पूँजी प्रबंध में किया जा चुका है।द्ध इसके अंतगर्त विभ्िान्न उपलब्ध स्रोतों की पहचान की जाती है। कोषों को जुटाने के मुख्य स्रोत जो एक वंफपनी द्वारा अपनाए जाते हैं अंशधारी कोष तथा उधारी नििायाँ मुख्य हैं। अंशधारी कोष से तात्पयर् समता पूँजी तथा प्रतिधारित उपाजर्न से होता है।उधारी नििायों से आशय उस वित्त से होता है जिसका प्रबंध )ण पत्रों के निगर्मन या कोइर् अन्य रूप में लिया हुआ )ण। नििायों के अनुपात के वित्तीय निणर्य विषय में वंफपनी को स्वयं निधार्रित करना होता है निश्िचत समय के उपरांत करना ही पड़ता है।कि समता पूँजी नििा तथा उधारी नििायाँ वंफपनी में भुगतान न करने की चूक को वित्तीय जोख्िाम कहा किस अनुपात में रखी जाएँ। यह अनुपात भी जाता है जिसे वंफपनी के पास पयार्प्त मात्रा में लाभ वंफपनियों के अपने स्वयं के आधारभूत लक्षणों पर का न होना भी कहा जाता है। क्योंकि निश्िचत निभर्र करता है। उधारी नििायों पर वंफपनी को पूवर् समय पर वंफपनी के पास भुगतान करने के लिए निश्िचत दर से ब्याज निश्िचत रूप से देना ही होता पयार्प्त मात्रा में लाभ नहीं होता है। दूसरी ओर है चाहे वंफपनी को लाभ हुआ हो या न हुआ हो। अंशधारियों की नििा की ओर से कोइर् भी उसी प्रकार उधारी नििा का पुनभुर्गतान भी एक इस प्रकार की वचनब(ता नहीं होती है कि वे प्रतिलाभ या पूँजी का पुनभुर्गतान करेंगे। अतः एकवंफपनी को वित्तीय निणर्य लेने में विवेकसंमत होना चाहिए ताकि )ण तथा समता का अनुपात उचितहो। इन वित्तीय निणर्यों में )ण, समता तथा पूवार्िाकार, अंश पूँजी तथा प्रतिधारित उपाजर्न हो सकते हैं।प्रत्येक प्रकार के वित्त की लागत का अनुमानलगाया जाता है। वुफछ ड्डोत दूसरों की अपेक्षा सस्तेहो सकते हैं। उदाहरणाथर् - )ण सबसे सस्ता ड्डोत माना जाता है। ब्याज पर कर की कटौती, इसे औरअिाक सस्ता बना देती है। प्रत्येक प्रकार के ड्डोत के लिए सहयोगी जोख्िाम भी पृथक ही है। उदाहरणाथर् प्रत्येक )ण पर ब्याज का भुगतान करना आवश्यक है तथा परिपक्वता तिथ्िा पर मूल ;)णद्ध का भुगतान करना भी आवश्यक होता है। समता अंशों पर लाभांश का भुगतान करना आवश्यकनहीं है। अतः वित्तीय जोख्िामवाली केवल एक राश्िा होती है जिसे )ण वित्तीयकरण कहते हैं।अतः इस प्रकार )णगत वित्त में वुफछ राश्िा वित्तीयजोख्िाम के रूप में भी होती है। वुफल वित्तीय जोख्िाम वुफल पूँजी में )ण के अनुपात पर भी निभर्र करती है। नििा विकास अभ्यास भी वुफछ मूल्य रखता है। यह मूल्य परिवतर्नशील लागत कहलाता है। यह तब भी सम्िमलित किया जाता है जब विभ्िान्नस्रोतों का मूल्यांकन किया जाता है। वित्तीय निणर्य तक शामिल किए जाते हैं, जब यह निणर्य लिया जाता है कि वह उस स्रोत से कितना विकास करेगा। यह निणर्य व्यवसाय की वुफल लागत औरवित्तीय जोख्िाम को निधार्रित करता है। वित्तीय निणर्य को प्रभावित करने वाले कारक वित्तीय निणर्य विभ्िान्न कारकों से प्रभावित होते हैं।उनमें से वुफछ महत्त्वपूणर् कारक निम्नलिख्िात हैंμ भारतीय निगमित क्षेत्रा द्वारा बोनस अंशों के निगर्मन तथा लाभांश की घोषणा निगमित भारत ने अपने अंशधारियों के लिए अंतरिम लाभांश तथा बोनस अंशों के निगर्मन में अपनी थैलियों की डोरियों को कापफी ढीला कर दिया है। लगभग 60 वंफपनियों ने अंतरिम लाभांश घोष्िात भी कर दिया है या जनवरी मास के प्रथम तीन सप्ताहों में ऐसा करने की योजना की घोषणा कर दी है। इसके अतिरिक्त 12 वंफपनियों ने इसी मास में जनवरी 2006 में लगभग तीन गुना अिाक बोनस अंशों के निगर्मन की घोषणा की है। वंफपनियों के क्षेत्रा में अंशधारियों को लाभांवित करने की कापफी गुंजाइश है और इसके लिए लाभांश भुगतान सबसे सरल एवं प्रत्यक्ष रूप है। अंशधारियों की समस्त आय में से रोकड़ भुगतान तथा अंशधारियों के स्टाक के मूल्यांकन में संतुलन बनाए रखना एक आदशर् वंफपनी के लिए आवश्यक होता है।वंफपनियों द्वारा अंशधारियों को पुरस्कृत करने की वििा के रूप में वुफल लाभ में से वुफछ राश्िा लाभांश के रूप में दी जाती है। बहुत सी वंफपनियों ने अंशधारियों को बोनस अंश निगर्मित करने की घोषणा भी की है। बहुत सी ऐसी वंफपनियाँ भी हैं जिन्होंने पहले से ही बोनस अंशों का निगर्मन कर दिया है या यह घोषणा कर दी है कि वे आगामी बोडर् की सभा में ऐसा कर देंगी वे मध्यम स्तरीय या लघु स्तरीय वंफपनियाँ हैं। स्रोत - दि इकोनाॅमिक टाइम्स ;कद्ध लागतμ विभ्िान्न ड्डोतों से नििा प्राप्त करने की लागत भ्िान्न - भ्िान्न ही होती है। साधारणतया एक विवेकशील प्रबंधक उसीड्डोत का चुनाव करता है जो सबसे सस्ता होता है। ;खद्ध जोख्िामμ विभ्िान्न ड्डोतों में संबंिात जोख्िाम भ्िान्न होती है। ;गद्ध प्रवतर्न लागतμ जिस ड्डोत की प्रवतर्न लागत अिाक होती है उसके प्रति आकषर्क कम होता है। ;घद्ध रोकड़ प्रवाह स्िथतिμ एक व्यवसाय के सुदृढ़रोकड़ प्रवाह, स्िथति, )ण वित्तीयन उसेअिाक जीवनक्षम बना सकती है अपेक्षाकृतसमता वित्तीयन स्िथति के। ;घद्ध स्थाइर् संचालन लागत का स्तरμ यदि व्यवसाय में स्थाइर् संचालन लागत का स्तर ऊँचा है ;जैसे - भवन किराया, बीमा प्रीमियम, वेतनआदिद्ध तो निश्िचत रूप से इसे स्थाइर् वित्तीय लागत के लिए कम करना चाहिए। जैसे निम्नश्रेणी की )ण वित्तीयन अच्छी है। उसी प्रकार यदि स्थाइर् संचालन लागत कम है तोअिाक )ण वित्तीयन, प्राथमिकता के आधार पर अपनाइर् जाएगी। ;चद्ध नियंत्राण प्रतिपफलμ यदि समता अंशों का निगर्मन अिाक मात्रा में कर दिया जाता है तो व्यवसाय पर प्रबंध का नियंत्राण ढीला हो जाताहै। )ण वित्तीयन में ऐसी परेशानियाँ नहीं आती हंै। जो वंफपनियाँ इस भय से ग्रसित होती हैं कि कहीं कोइर् अन्य वंफपनी इसका अिाग्रहण न कर ले, वे )ण समता को प्राथमिकता देती हैं। ;छद्ध पूँजी बाशार की स्िथतिμ पूँजी बाशार कीदशा भी नििा ड्डोत के विकल्प को प्रभावित करती है। जिस समय स्टाॅक बाशार में प्रतिभूतियों का मूल्य बढ़ रहा होता है उस समय बहुत से लोग समता में निवेश के लिए तत्पर रहते हंै। यद्यपि किसी भी वंफपनी के लिए अवनत पूँजी मावेर्फट की दशा में समता निगर्मन का कायर् कठिन होता है। लाभांश से संबंिात निणर्य तृतीय महत्त्वपूणर् निणर्य जो प्रत्येक वित्तीय प्रबंध को करना पड़ता है, वह है लाभांश के वितरण का निणर्य। लाभांश, लाभ का वह अंश होता है जो अंशधारियों में वितरित किया जाता है। इस निणर्य में यह निश्चय किया जाता है कि अजिर्त लाभ ;कर का भुगतान करने के पश्चात्द्ध का कितना भाग अंशधारियों में लाभ के रूप में वितरित कर दिया जाए तथा लाभ का कितना भाग पफमर् में प्रतिधारित उपाजर्न के रूप में पुनविर्नियोजनाथर् रखा जाए। ताकि विनियोग की आवश्यकता को पूरा किया जा सके। यद्यपि लाभांश वतर्मान आय का द्योतक है तो प्रतिधारित उपाजर्न का पुनविर्नियोजन पफमर् की भविष्य में आय में वृि करने में सहायक होता है। प्रतिधारित उपाजर्न कीसीमा पफमर् के वित्तीय निणर्य को प्रभावित करती है। जब पफमर् को प्रतिधारित उपाजर्न के पुननिर्वेश की उतनी आवश्यकता नहीं होती है जितना कि प्रतिधारित उपाजर्न की मात्रा वंफपनी में उपलब्ध है तो लाभांश के वितरण से संबंिात निणर्य करतेसमय अंशधारियों की संपिा को उच्चतम सीमा तक बढ़ाने के उद्देश्य को ध्यान में रखकर लेना चाहिए। लाभांश निणर्य को प्रभावित करने वाले कारक वंफपनी द्वारा उपाजिर्त वुफल लाभ में से कितना लाभ का अंश अंशधारियों में लाभ के रूप में वितरण किया जाए तथा कितना भाग व्यवसाय में प्रतिधारित किया जाए इस पर बहुत से कारकों का प्रभावपड़ता है। उनमें से वुफछ महत्त्वपूणर् कारक नीचे दिए गए हैंμ ;कद्ध उपाजर्नμ लाभांशों का भुगतान वतर्मान एवं भूतकालीन उपाजर्नों में से किया जाता है। अतः लाभांश संबंधी निणर्य लेते समय उपाजर्न एक मुख्य निधार्रक तत्व है। ;खद्ध उपाजर्न का स्थायित्वμ यदि अन्य बातें समान रहें तो एक वंफपनी जिसकी उपाजर्न क्षमता स्थाइर् है तो वह अिाक लाभांश घोष्िात करने की अवस्था में होती हैं। इसके विपरीत यदि वंफपनी की उपाजर्न अस्िथर है तो वह संभवतः कम लाभांश देगी। ;गद्ध लाभांश का स्थायित्वμ यह देखने में आया है कि प्रायः वंफपनियाँ प्रति अंश लाभांश स्िथरीकरण की नीति अपनाती हैं। लाभांश की मात्रा में वृि सामान्यतः तभी की जाती है जब अिाक लाभ उपाजर्न की संभावनाएँ प्रबल होती हंै तथा वह संभावना भी केवल चालू वषर् की ही नहीं होनी चाहिए बल्िक भविष्य में भी चलती रहनी चाहिए। दूसरे शब्दों में अंशों पर लाभांश को तब तक नहीं बढ़ाया जाता जब तक कि उपाजर्न में वृि बहुत अिाक न होया जब वृि थोड़ी हो तथा अस्थाइर् प्रकृति की हो तो लाभांश में वृि प्रायः नहीं की जाती। ;घद्ध संवृि सुयोगμ जो वंफपनियाँ विकासोन्मुख होती हैं अथार्त् जिन वंफपनियों में संवृि सुयोग होते हैं वे अिाक धन अपनी प्रतिधाारित राश्िा में से वंफपनी में ही रख लेती हैं ताकि आवश्यकतानुसार वंफपनी में निवेश किया जा सके। विकसित वंफपनियों में लाभांश कीराश्िा अपेक्षाकृत उन वंफपनियों से अिाक होती है जो विकसित नहीं हो पाइर् हैं अथार्त् जो आशानुवूफल उन्नति का लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाइर् हैं। ;घद्ध रोकड़ प्रवाह स्िथतिμ लाभांश में रोकड़ का वहिगर्मन निहित होता है। एक वंफपनी लाभाजर्न कर रही होती है लेकिन उसमें रोकड़ की कमी होती है। वंफपनी द्वारा लाभांश घोष्िात करने के लिए उसके पास पयार्प्त मात्रा में रोकड़ का होना आवश्यक होता है। ;चद्ध पूवार्िाकार अंशधारीμ जिस समय लाभांश की घोषणा की जाती है उस समय वंफपनी के प्रबंधकों के मस्ितष्क में इस सदंभर् में पूवार्िाकार अंशधारियों का ध्यान रखना आवश्यक होता है। सामान्यतः अंशधारियों की यह जिज्ञासा होती है कि एक निश्िचत राश्िा लाभांश के रूप में अवश्य प्राप्त हो जाए। अतः इसी बात का ध्यान रखते हुए वंफपनियाँ लाभांश की घोषणा किया करती हंै। वुफछ अंशधारी ऐसे अवश्य होते हैं जो अपने निवेश से एक नियमित आय की आशा किया करते हैं तथा जिसपर निभर्र भी करते हैं। ;छद्ध करारोपण नीतिμ लाभांश भुगतान तथा प्रतिधारित उपाजर्न के विकल्प के मध्य एक सीमा होती है। जिसपर कर निधार्रण तथा पूँजीगत लाभों का प्रभाव पड़ता है। यदि लाभांश पर करों का भार अिाक होगा तो अच्छा होगा तथा लाभांश के भुगतानाथर् कम धन राश्िा का भुगतान करना पड़ेगा। इसकी तुलना में यदि कर की दर कम होगी तो लाभांश भुगतान की राश्िा अिाक होगी। यद्यपि अंशधारियों को प्राप्त होने वाला लाभांश कर मुक्त होता है क्योंकि वंफपनियों पर सीधे ही कर निधार्रण होता है तथा वंफपनियाँ अंशधारियों को लाभांश का भुगतान कर भुगतान के उपरांत ही करती हैं। अतः कर की वतर्माननीति के अनुसार अंशधारी ऊँची लाभांश राश्िा को ही प्राथमिकता देते हैं। ;जद्ध शेयर बाशार प्रतििया - सामान्यतःμ निवेशक, लाभांश में वृि को एक सुखद सूचना के रूप में लेते हैं तथा शेयर बाशार को कीमतों की प्रतििया भी सकारात्मक ही होती है। ठीक उसी प्रकार लाभांश की मात्रा में कमी होने से अंशों के मूल्यों पर शेयर बाशार में प्रतिवूफल प्रभाव पड़ता है। अतः प्रबंध द्वारा, लाभांश नीति निधार्रण में समता अंश मूल्यपर संभावित प्रभाव एक अत्यंत महत्त्वपूणर् घटक, ध्यान में रखा जाता है। ;झद्ध पूँजी बाशार तक पहुँचμ बड़ी तथा प्रतिष्िठत वंफपनियों की पूँजी बाशार तक पहुँच सुगम होती है, अतः वंफपनी के विकास के लिए वेवित्त के लिए प्रतिधारित उपाजर्न पर कम ही निभर्र करती हैं। ये वंफपनियाँ अपने अंशधारियोंको अपेक्षाकृत अिाक लाभांश का भुगतान करते हैं उन वंफपनियों से जो आकार में छोटी होती हैं तथा जिनकी पहुँच पूँजी बाशार तक कम होती है। ;×ाद्ध कानूनी बाध्यताμ वंफपनी अिानियम के वुफछ प्रावधान लाभांश भुगतान पर वुफछ प्रतिबंध लगाते हैं। लाभांश घोषणा के समय ऐसे प्रावधानों का पालन निश्िचत रूप से किया जाना चाहिए। ;टद्ध संविदात्मक प्रतिबंधμ जब किसी वंफपनी को )ण प्राप्त करने की स्वीकृति मिलती है तो )णदाता वंफपनी पर भविष्य में लाभांश भुगतान पर वुफछ प्रतिबंध लगा देते हैं। तो वंफपनियों से यह आशा की जाती है कि वे इस बात का आश्वासन दें कि लाभांश भुगतान संबंधी )ण की शतो± का पालन किया जाएगा तथा किसी भी प्रकार उल्लंघन नहीं किया जाएगा। वित्तीय नियोजन वित्तीय नियोजन से तात्पयर् निश्िचत रूप से एकसंगठन के भविष्य प्रचालन से संबंिात वित्तीयब्लूपि्रंट खाका या स्वरूप तैयार करना है। वित्तीय नियोजन का उद्देश्य उचित समय पर पयार्प्त नििा सुलभ कराने का आश्वासन होता है। यदि पयार्प्त मात्रा में नििा उपलब्ध नहीं होती है तो पफमर् अपने वायदों को पूरा भी नहीं कर पाएगी तथा व्यवसाय को व्यवस्िथत वििा से चला भी नहीं पाएगी। दूसरी ओर यदि नििा की मात्रा आवश्यकता से अिाक होती है तो अनावश्यक रूप से लागत में वृि होती है तथा अपव्यय भी होता है। इसबात का ध्यान अवश्य रखना चाहिए कि वित्तीयनियोजन न तो वित्तीय प्रबंध के समतुल्य है औरन ही उसका स्थानापन्न है। वित्तीय प्रबंध काउद्देश्य सवोर्त्तम निवेश का चुनाव करना तथा वित्तीय विकल्पों पर उनसे मिलने वाले लाभों तथा उन पर आने वाली लागत पर पफोकस करना है तथा इसका मुख्य उद्देश्य अंशधारियों की संपदा में बढ़ोतरी करना है।दूसरी ओर वित्तीय नियोजन का उद्देश्य नििा आवश्यकताओं पर पफोकस करते हुए सुगमसंचालन हेतु वित्तीय निणर्यों के मतानुसार उनकी उपलब्ध्ता का ध्यान करना है। उदाहरणाथर् - यदि पूँजी बजट का निणर्य लिया जाता है तो प्रचालन उच्च स्तर के होंगे। व्यय एवं आगम की राश्िायोंमें वृि होगी। वित्तीय नियोजन प्रिया का प्रयत्न उन मदों की भविष्यवाणी करना होता है जिनमें परिवतर्न होने की संभावना होती है। इससे प्रबंध को नििा की मात्रा तथा आवश्यकता का समय ज्ञात करने में सहायता करता है। यह अिाक्य तथा संभावित कमी के विषय में भी बतलाता है जिससे उन अवस्थाओं का सामना करने के लिए पहले से ही आवश्यक कायर्वाही कर लीजाए। इस तरह वित्तीय नियोजन निम्नलिख्िात युग्म उद्देश्य अंशधारियों की संपदा में बढ़ोतरी करना है।दूसरी ओर वित्तीय नियोजन का उद्देश्य नििा आवश्यकताओं पर पफोकस करते हुए सुगम संचालनहेतु वित्तीय निणर्यों के मतानुसार उनकी उपलब्धता का ध्यान करना है उदाहरणाथर् - यदि पूँजी बजट का निणर्य लिया जाता है तो प्रचालन उच्च स्तर के होंगे। व्यय एवं आगम की राश्िायों में वृि होगी।वित्तीय नियोजन प्रिया का प्रयत्न उन मदों की भविष्यवाणी करना होता है जिनमें परिवतर्न होने की संभावना होती है। इससे प्रबंध को नििा की मात्रा तथा आवश्यकता का समय ज्ञात करने में सहायता करता है। यह अिाक्य तथा संभावित कमी के विषय में भी बतलाता है जिससे उन अवस्थाओं का सामना करने के लिए पहले से ही आवश्यककायर्वाही कर ली जाए। इस तरह वित्तीय नियोजन निम्नलिख्िात युग्म उद्देश्यों की प्राप्ित हेतु निरंतर संघषर्रत रहता है। ;कद्ध नििायों की आवश्यकतानुसार उनकी उपलब्धता का आश्वासन देनाμ इसका तात्पयर् नििायों का विभ्िान्न उद्देश्यों की आवश्यकतानुसारअनुमान लगाना है जैसे दीघर्कालीन संपिायों का क्रय करने के लिए या व्यवसाय की दैनिक आवश्यकताओं की संपूतिर् करने के लिए आदि। इसके अतिरिक्त यह भी आवश्यक है कि समय का अनुमान लगाया जाए जिससमय ये नििायाँ उपलब्ध होंगी वित्तीय नियोजनइन नििायों के संभावित ड्डोतों को स्पष्ट करने का प्रयत्न भी करता है। ;खद्ध यह देखना कि पफमर् संसाधनों में अनावश्यक रूप से वृि नहीं करती हैμ नििा अिाक्य सदैव ही अनुचित है, ठीक उसी प्रकार जैसे अनुपयुक्त नििाकरण। यद्यपि वुफछ धन आिाक्य मात्रा में हो सकता है, अच्छीवित्तीय योजना इसको अच्छे से अच्छे उपयोग में ला सकती है ताकि वित्तीय संसाधनों को बिना उपयोग न छोड़ा जाए। तथा अनावश्यक रूप से लागत में न जोड़ दिया जाए। अतः उपयुक्त नििा आवश्यकता की तुलनातथा उनकी सुलभता वित्तीय नियोजन द्वारा ही प्राप्त की जा सकती है। एक व्यवसाय की नििा आवश्यकता के अनुमान की प्रिया तथा नििाके ड्डोतों का वगीर्करण ही वित्तीय नियोजनकहलाता है। वित्तीय नियोजन में एक दिए हुए समय में विकास, निष्पादन, निवेश तथा नििा की आवश्यकता को ही ध्यान में रखा जाता है। बढ़ता लाभांश मूल्यांकन को प्रोत्साहित कर सकता है आगामी वुफछ वषो± में वंफपनियाँ लाभांश की पूणर्तया उपेक्षा नहीं कर सवेंफगी। निवेशक एक अच्छी आय की अपेक्षा करते हैं तथा वण्िार्त लाभांश नीति का आश्वासन भी माँगते हैं। यद्यपि भारत में वुफछ वंफपनियाँ ऐसी अवश्य हैं जिन्होंने विगत पाँच वषो± में लाभांश का अनुवूफलतम भुगतान किया है। हालाँकि लाभांश की मात्रा नियमित रूप में घटी है और जिसका 800 वंफपनियों में औसत लाभांश 1.1 प्रतिशत है। ये वंफपनियाँ विभ्िान्न बी. एस. इर्. तथा ऐन. एस. इर्. के आकार के भाग की सूचक हैं। केवल लाभांश की मात्रा ही कम नहीं हुइर् है बल्िक इस सूची में एक भी वंफपनी ऐसी नहीं है जिसने पिछले किसी भी पाँच वषो± में लाभ वृि के साथ लाभांश की मात्रा को बढ़ाया हो। इस समुदाय की वंफपनियों में जिन्होंने विगत वषो± में नियमित भुगतान की मात्रा में वृि की है उनमें बहुतसी बहुराष्ट्रीय वंफपनियाँ सम्िमलित हैं, जिन्होंने पूँजी पर ऊँची दर से लाभ अजिर्त किया है। इन वंफपनियों में ऐस्ट्राशेनिका पफामार्, नेसले इण्िडया, हिन्दुस्तान लीवर, क्लेरियेन्ट, प्पफीजर, ग्लैक्सोस्िमथ क्िलन वंफश्यूमर एंड कमिन्स इण्िडया आदि ने अंशधारियों को देय लाभांश की राश्िा में वृि की है। यद्यपि इन वंफपनियों का विकास बनावटी प्रतीत नहीं होता है। वुफछ भारतीय वंफपनियाँ जैसे आॅटोमेटिव आॅक्सीश, रैनबाक्सी लैब्स, हीरो होंडा मोटसर्, एश्िायन पेन्ट्स थरमैक्स तथा वुफछ बैकिंग एवं नाॅन बैकिंग वंफपनियाँ आगे बढ़ी हैं। तथा इनका विकास भी कापफी तीव्र गति से हुआ है तथा लाभांश घोषणाओं ने भी संभावनाओं के अनुसार निराश नहीं किया है। ऐसी वंफपनियाँ जिन्होंने लाभ तो कमाया है लेकिन लाभांश की घोषणा नहीं की है उनमें इर् - सवर्, व्रेफन्ससाॅफ्रटवेयर, सेसा गोआ, टाटा मोटसर्, मोशर बाएर, ए.बी.सी., माइको अजटेक साॅफ्रटवेयर, हावेल्स इंडिया, एमटेक इंडिया, तथा स्टरलाइट इण्डस्ट्रीज सम्िमलित हैं। यह एक संकेतात्मक सूची है। लेकिन इसमें और भी कइर् वंफपनियाँ सम्िमलित हैं। लाभांश भुगतान अनुपात दशार्इर् गइर् वंफपनियों में 20 प्रतिशत से भी कम ही है। यद्यपि नियोजक लाभांश में वृि चाहते हैं तथा वण्िार्त लाभांश नीति की आवश्यकता को महसूस करते हैं। आय की मात्रा ;पी.इर्. ;मूल्य आयद्ध अनुपात के विपरीतद्ध आज लगभग 6 प्रतिशत है। यदि भुगतान ;पेय आउटद्ध अनुपात को 40 प्रतिशत तक बढ़ा दिया जाए तो लाभांश की मात्रा लगभग 2.5 प्रतिशत बढ़ सकती है। ड्डोत - ूूूण्जीमीपदकनइनेपदमेेसपदमण्बवउध्पूध्2005ध्07ध्24 वित्तीय नियोजन में दोनों ही अल्पकालीन तथा वुफछ जटिल हो जाते हैं तथा कम उपयुक्त होते हैं। दीघर्कालीन नियोजन सम्िमलित होता है। दीघर्कालीन ऐसी योजनाएँ जो एक वषर् या उससे कम समय के नियोजन से तात्पयर् दीघर्कालीन विकास तथा निवेश लिए तैयार की जाती हंै उन्हें बजट कहते हैं। विस्तारसे होता है। इसका पफोकस पूँजीगत व्यय कायर्क्रम में बजट वित्तीय नियोजन के अभ्यास का ही पर होता है। अल्पकालीन नियोजन के अंतगर्तउदाहरण है। इनमें कायर्वाही की विस्तृत योजना होतीअल्पकालीन वित्तीय योजना आती है जिसे बजट है जो प्रायः एक वषर् या उससे कम समय की होती कहते हैं।है।प्रारूपिक, वित्तीय नियोजन तीन से पाँच वषर् केवित्तीय नियोजन का शुभारंभ बिक्री केलिए किया जाता है। लंबे समय के वित्तीय नियोजन पूवार्नुमान लगाने से होता है। कल्पना कीजिए कि एक वंफपनी आगामी पाँच वषो± के लिए वित्तीय योजना बनाती है। इसका आरंभ अनुमानित बिक्री से होगा। जो आगामी पाँच वषो± में होने की आशाकी जा सकती है। इसी पर आधारित वित्तीय विवरणों का निमार्ण इस बात को ध्यान में रखकर किया जाता है कि निवेश के लिए नििा स्थाइर् पूँजी के लिए तथा चालू पूँजी के लिए कितनी आवश्यक होगी। उसके उपरांत उस समय में होने वाले लाभ का अनुमान लगाया जाता है ताकि यहविचार लगाया जा सके कि आंतरिक ड्डोतों से कितनी नििा का प्रबंध किया जा सकेगा। कहने का तात्पयर् यह है कि प्रतिधारित उपाजर्न में से ;लाभांश भुगतान कर देने के पश्चात्द्ध वंफपनी कोकितनी नििा इस आंतरिक ड्डोत से उपलब्ध हो सकेगी। इसका परिणाम यह होगा कि बाह्य नििा की आवश्यकता का अनुमान लगाया जा सकेगा। इसके बाद बाह्य नििा आवश्यकता की पूतिर् किन ड्डोतों से होगी, की पहचान की जाती है तथा रोकड़ बजट तैयार किए जाते हंै। ताकि इन घटकों को अमल में लाया जा सके। महत्त्व किसी भी व्यावसायिक इकाइर् के समग्र नियोजन का, वित्तीय नियोजन एक महत्त्वपूणर् अंग है। इसका लक्ष्य वंफपनी कोष की उपलब्धता के लिए उपलब्ध समय के संबंध में अनिश्िचतता का सामना करने के योग्य बनाना है। यह संगठन के सुगम प्रचालनमें सहायक होती है। वित्तीय नियोजन के महत्त्व को निम्नलिख्िात के अनुसार समझाया जा सकता हैμ ;पद्ध इसका यह प्रयत्न होता है कि यह पहले से ही बतला दिया जाए कि भविष्य में विभ्िान्न व्यावसायिक परिस्िथतियों में क्या घटित हो सकता है। ये स्वयं काम करके पफमर् की सहायता करते हैं कि संभावित परिस्िथतियों का वैफसे, ठीक प्रकार से समाधान किया जाए। दूसरे शब्दों में यह पफमर् को भविष्य की परेशानियों का सामना करने के लिए सुदृढ़ बनाते हैं। उदाहरणाथर् - एक वंफपनी की बिक्री में 20 प्रतिशत की वृि का अनुमान लगाया जाता है। लेकिन यह भी संभव हो सकता है कि यह वृि 10 प्रतिशत या 30 प्रतिशत हो। बहुत से व्ययों की मदें इन तीन परिस्िथतियों में भ्िान्न होंगी। इन तीन परिस्िथतियों में ब्लूपि्रंट बनाकर प्रबंध यह निश्चय कर सकता है कि इन तीनों परिस्िथतियों का क्या किया जाना चाहिए।स्थानापन्न वित्तीय नियोजनों की इस तरह की तैयारी वुफछ विभ्िान्न परिस्िथतियों में स्पष्ट रूप में व्यवसाय के सुगम संचालन में असीम सहायता प्रदान करती है। ;पपद्ध यह व्यावसायिक आकस्िमक परेशानियों तथा विस्मयों से बचने में सहायता करती हैं तथा भविष्य निमार्ण में भी सहायक होती हैं। ;पपपद्ध विभ्िान्न व्यावसायिक कायो± में सामंजस्य स्थापित करने में सहायक होती है। उदाहरणाथर् - उत्पादन तथा विक्रय कायो± में स्पष्ट नीति निधार्रित करके सहायता करती हैं। ;पअद्ध वित्तीय प्रबंधन में कायर् की विस्तृत योजना तैयार करके अपव्यय को कम किया जासकता है। तथा ियाओं की पुनरावृिा तथा नियोजन में अंतराल को भी कम किया जा सकता है। ;अद्ध यह वतर्मान को भविष्य से जोड़ने का प्रयत्न ;अपपद्ध विभ्िान्न व्यावसायिक खंडों के उद्देश्यों करता है। की व्याख्या करके यह वास्तविक ;अपद्धयह निवेश तथा वित्तीय निणर्यों में अनवरत निष्पादन का आसानी से मूल्यांकन आधार पर संपवर्फ स्थापित करता है। करता है। )णों पर कटौती अत्यंत सपफल व्यवसाय भी )ण से मुक्त नहीं पाए जाते हैं। लेकिन कितना )ण पयार्प्त है? आगे आप क्या व्यवस्था कर सकते हैं? यह जानकारी प्राप्त करना ही )ण की व्यवस्था है। )ण की उचित मात्रा की बात करें तो इसका तात्पयर् एक व्यवसाय जो जीवन के लिए संघषर् कर रहा है तथा दूसरा जो आथ्िार्क परिवतर्नों या बाशार की अवस्थाओं का वुफशलतापूवर्क सामना कर सकता है का अंतर हो सकता है। विभ्िान्न परिस्िथतियाँ )ण लेने को प्रमाण्िात कर सकती हैं। सामान्यतः जब आपकोरोकड़ प्रवाह को प्रोत्साहित करना है या वित्तीय विकास करना है अथवा व्यापार को बढ़ाना है तभी )णलेना साथर्क होता है। जब आप विकास की ओर अग्रसर हैं तब )ण आपको उत्तोलक शक्ित प्रदान करता है। लेकिन अत्यिाक )ण व्यवसाय को संकट में डाल सकता है। अतः यह प्रश्न सामने आता है कि कितना )ण पयार्प्त है? विशेषज्ञों का मत है कि रोकड़ प्रवाह का विश्लेषण तथा साथ ही उद्योग का विश्लेषण करना ही इसकाउत्तर है। एक व्यवसाय जो उन्नति नहीं करता समाप्त हो जाता है। आपको उन्नति नहीं करता समाप्त हो जाता है। आपको उन्नति करनी है, लेकिन आपकी उन्नति आपके व्यवसाय की आथ्िार्क सीमाओं के अंदर ही होनी चाहिए। एक व्यवसाय को आदशर् पूँजी ढाँचे की क्या आवश्यकता है ताकि वह उद्योग में व्यावहारिक बना रहे? यदि आपके उद्योग में उच्च व्यवहायर्ता है तो आपको कम )ण लेना चाहिए। यदि आपके उद्योग में लघु व्यवहायर्ता है तो आप अिाक )ण ले सकते हैं।यद्यपि बैंक तथा अन्य वित्तीय संस्थाएँ किसी व्यावसायिक इकाइर् को )ण स्वीकृत करते समय )ण समता अनुपात की संतोषजनक स्िथति होने पर विशेष ध्यान देती हैं न कि किसी )ण दाता कीइच्छानुसार कोषों में वृि व्यवसाय की सुदृढ़ )ण स्िथति इसका प्रमाण समझा जाता है। वुफछ वित्तीय संस्थाएँ अति उत्साही )णदाता होती हैं, विशेषकर जब कि वुफछ प्रलोंभन देने का प्रयत्न किया जा रहा हो या विश्वसनीय व्यावसायिक ग्राहकों को नियंत्राण में लेने की इच्छा हो। एक बैंक संपाश्िर्वक संबंधीसंपिायों में अिाक रुचि रखती हैं अपेक्षाकृत उस अवस्था के कि जब उपाजिर्त आय को )ण सेवा में उपयोग के योग्य समझा जाएगा। इन )ण परेशानियों से परे यह आप पर निभर्र करता है कि आप अपने व्यवसाय में अपने वित्तीय तथ्यों को ध्यान में रखते हुए क्या सुदृढ़ )ण नीति बनाने का निणर्य लेते हैं। यह दुभार्ग्य ही कहा जाएगा कि बहुतसे उद्यमी यह जानकारी नहीं रखते कि एक सपफल व्यवसाय के लिए वित्तीय विश्लेषण कितना महत्त्वपूणर्है? यहाँ तक कि व्यवसायी उनके लेखाकारों द्वारा तैयार किए हुए वित्तीय लेखों को प्रस्तुत करने पर उनमेंनिहित महत्त्वपूणर् सूचनाओं का पूरा लाभ भी नहीं उठाते। ड्डोत - ूूूण्मदजतमचतमदमनतण्बवउध्उंहं्रपदमध्मदजतमचतमदमनतध्2006ध्क्मबमउइमत पूँजी संरचना वित्तीय प्रबंधन में एक महत्त्वपूणर् निणर्य वित्तीय प्रारूप से संबंिात है अथवा नििायों को बढ़ाने मेंविभ्िान्न ड्डोतों के उपयोग का अनुपात। स्वामित्वके आधार पर व्यावसायिक वित्त के ड्डोतों को मोटे तौर पर दो वगो± में विभाजित किया जा सकता है। जैसे ‘स्वामिगत नििा’ तथा ‘उधार लिया हुआ या ग्रहीत नििा’। स्वामिगत नििा में समता अंश पूवार्िाकार अंश तथा संचय एवं अिाक्य अथवा प्रतिधारित उपाजर्न सम्िमलित होते हैं। ग्रहीत नििा में )ण, )णपत्रा, सावर्जनिक जमा आदिसम्िमलित होते हैं। इनको बैंक, अन्य वित्तीय संस्थाओं, )ण पत्रा धारियों एवं जनता से उधार लिया जा सकता है। पूँजी संरचना से आशय स्वामिगत तथा ग्रहीत नििा के मिश्रण से है। इन्हें समता तथा )ण के रूप में तदंतर पाठ में उल्लेख्िात किया जाएगा। )ण समता अनुपात की गणना इस प्रकार होती हैμ ीं )ण ˘)ण समता अनुपात = अथवा,ट्ट˙ट्ठ समता ˚वुफल पूँजी में )ण की मात्रा जैसे ीं )ण ˘ ट्ट˙ट्ठ )ण $ समता ˚ पफमर् के दृष्िटकोण से )ण तथा समता दोनों की लागत तथा जोख्िाम में महत्त्वपूणर् अंतर होता है। एक पफमर् में समता की अपेक्षा )ण की लागत कम होती है। क्योंकि उधारदाता ;महाजनद्ध का जोख्िाम अंशधारियों के जोख्िाम से कम होता है। उधारदाता एक निश्िचत राश्िा ब्याज के रूप में पाते हैं तथा एक निश्िचत समय के उपरांत उन्हें अपनी निवेश्िात राश्िा का भुगतान भी प्राप्त हो जाता है अतः उनकी आय की माँग निम्न दर की होती है। इसके अतिरिक्त )णों पर भुगतान किया गया ब्याज, कर के रूप में देनदारी में से कम किया जाता है जबकि लाभांश का भुगतान लाभ में से कर को घटाने के बाद शेष लाभ में से किया जाता है। )ण के बढ़ते हुए उपयोग से यह संभावना होती है कि पफमर् की पूँजी की वुफल लागत कम हो जाए। बशतेर् कि समता की लागत अप्रभावित रहे। )ण - समता अनुपात के बदलाव का प्रति अंश आय पर प्रभाव अगले अध्याय में विस्तार से किया गया है। एक व्यवसाय के लिए )ण सस्ता होता है लेकिन अिाक जोख्िामपूणर् होता है। क्योंकि )ण पर ब्याज तथा मूल राश्िा का भुगतान निश्िचत रूप से व्यवसाय को करना होता है। इन प्रतिविताओं को पूरा करने में किसी भी प्रकार की चूक व्यवसाय को दिवालिया होने के लिए बाध्य कर सकती है। समता की दशा में ऐसी कोइर् बाध्यता नहीं होती है। अतः समता पूँजी को व्यवसाय के लिए जोख्िाम रहित समझा जाता है। )णों का अिाक उपयोग एक व्यवसाय का स्थाइर् व्यय बढ़ाता है। परिणामस्वरूप )णों का बढ़ता हुआउपयोग व्यवसाय की वित्तीय जोख्िाम में भी वृि करता है। व्यवसाय की पूँजी संरचना इस प्रकारलाभदायकता तथा वित्तीय जोख्िाम दोनों को प्रभावितकरती है। पूँजी संरचना को सवोर्त्तम तब कहा जाएगा जब )ण तथा समता का अनुपात ऐसा होगा जिसका परिणाम समता अंशों के मूल्य में वृि होती है। दूसरे शब्दों में पूँजी संरचना से संबंिात सभी निणर्य ऐसे हों जिससे अंशधारियों की पूँजी में वृि हो।)ण का समस्त पूँजी से अनुपात को वित्तीयउत्तोलक के नाम से भी पुकारा जाता है। वित्तीय )ण )ण उत्तोलक की गणना यासमता )ण $ समता सूत्रा द्वारा की जाती है। यहाँ )ण से तात्पयर् बाह्य )णगत पूँजी तथा समता से तात्पयर् अंशधारियों द्वारा लगाइर् गइर् पूँजी जिसमें अजिर्त लाभ यदि लाभांश के रूप में निकाले गए हों, को सम्िमलितकिया जाता है। जब वित्तीय उत्तोलक बढ़ती है तो नििा की लागत घटती है। क्योंकि सस्ते )णों काउपयोग अिाक होता है। लेकिन वित्तीय जोख्िामबढ़ जाती है। वित्तीय उत्तोलक का व्यवसाय की लाभदायकता पर प्रभाव इर्.बी.आइर्.टी. - इर्.पी.एसनिम्न उदाहरण के द्वारा देखा जा सकता है। तीन स्िथतियों को ध्यान में रखा गया है। स्िथति प् मे कोइर् ट्टण नहीं है अथार्त् ;बिनाउत्तोलक व्यवसायद्ध स्िथति प्प् तथा प्प्प् में ट्टण की मात्रा 1,00,000 तथा 2,00,000 रुपएमानी गइर् है। संपूणर् ट्टण ब्याज दर 10 प्रतिशत वाष्िार्क है। वंफपनी की प्रति अंश आय 0.93 प्रति अंश यदि यह बिना उत्तोलक है। जब ट्टण 10,00,000 रुहै तो प्रति अंश आय 1.05 रुपए है। जब ट्टणवुफछ ऊचा अथार्त् 20 लाख रु. है तो इसकी प्रति अंश आय बढ़़कर 1.40 रुपए हो गइर् है। क्याकारण है कि ट्टण की मात्रा बढ़ने से प्रति अंशआय में भी वृि हो गइर् है? इसका कारण ट्टण की लागत आय से कम होना है जिसका उपाजर्न वंफपनी निध्ि विनियोजन से कर रही है। वंफपनी की वुफल विनियोजन पर आय ;आर.ओ.आइर्.द्ध ⎡ इर्बीआइर्टी ⎤⎡ 4 लाख ⎤13.33 प्रतिशत का × 100 80 × 100⎢ ⎥⎢⎥⎣ वुफल निवेश ⎦⎣ 30 लाख ⎦ यह 10 प्रतिशत ब्याज से अध्िक है जो ट्टणनिध्ि पर भुगतान हो रहा है। ट्टण के अध्िक मात्रामें प्रयोग से आर.ओ.आइर्. तथा ट्टण की लागत कायह अंतर इर्पीएस में वृि करता है। यह वित्तीयउत्तोलक की अनुवूफल स्िथति है। ऐसी अवस्था में वंफपनी प्रायः इर्पीएस वृि करने के लिए सस्ते दरकी ब्याज पर अध्िक ट्टण लेती है। इस प्रथा को समता पर व्यापार कहते हैं। समता पर व्यापार से आशय समता अंश धरियों द्वारा अजिर्त लाभ में वृि का होना है। जिसकाकारण स्थाइर् वित्त व्यय जैसे ब्याज की मात्रा को परिरक्ष्िात रखना है। अब वाइर् वंफपनी के निम्नलिख्िात उदाहरण पर ध्यान दीजिए। सभी विवरण पूवर्वत हैं अंतर के ब्याज तथा कर काटने से पूवर् आय 2 लाख रु. है। ;ब्याज तथा कर से पहले आय/आय प्रति अंशद्ध इस उदाहरण में )ण के अिाक उपयोग के कारण वंफपनी का इर्.पी.एस. घट रहा है। क्योंकि वंफपनी की विनियोग पर आय, )णों की लागत से कम है। वाइर् वंफपनी की विनियोग पर आय है। जबकि )ण पर ब्याज की दर 10 प्रतिशत है। ऐसे उदाहरणों में )ण का उपयोग इर्.पी.एस. में कमीकरता है। यह दशा प्रतिवूफल वित्तीय उत्तोलन की है। इस स्िथति में समता पर व्यापार का परामशर् देने योग्य नहीं है। एक्स वंफपनी के विषय में भी लापरवाही से समता पर व्यापार की अनुशंसा नहीं की जा सकती। )ण की मात्रा में वृि इर्.पी.एस. को बढ़ा सकती है, लेकिन जैसा पहले बतलाया गयाहै इसने वित्तीय जोख्िाम में भी वृि हो जाती उदाहरण प् एक्स लिमिटेड वंफपनी वुफल नििा उपयोग 30 लाख रुपए ब्याज दर 10» वाष्िार्क कर दर 30» इर्.बी.आइर्.टी 4 लाख रुपए )ण स्िथति प् शून्य ;वुफछ नहींद्ध स्िथति प्प् 10 लाख रुपए स्िथति प्प्प् 20 लाख रुपए इर्.बी.आइर्.टी. - इर्.पी.एस. विश्लेषण स्िथति स्िथति स्िथति प् प्प् प्प्प् इर्.बी.आइर्.टी 4,00,000 4,00,000 4,00,000 ब्याज वुफछ नहीं 1,00,000 2,00,000 इर्.बी.टी 4,00,000 3,00,000 2,00,000 ;कर पूवर् आयद्ध कर 1,20,000 90,000 60,000 इर्.ए.टी 2,80,000 2,10,000 1,40,000 ;कर के बाद आयद्ध 10 रु प्रत्येक के अंशों की संख्या 300,000 2,00,000 1,00,000 इर्.पी.एस 0.93 1.05 1.40 ;आय प्रति अंशद्ध उदाहरण प्प् वंफपनी वाइर् लिमिटेड स्िथति स्िथति स्िथति प् प्प् प्प्प् इर्.बी.आइर्.टी 2ए00ए000 2ए00ए000 2ए00ए000 ब्याज वुफछ नहीं 1ए00ए000 2ए00ए000 इर्.बी.टी 2ए00ए000 1ए00ए000 वुफछ नहीं कर 60ए000 30ए000 वुफछ नहीं इर्.ए.टी 1ए40ए000 70ए000 वुफछ नहीं 10 रु. वाले अंशों की संख्या 3ए00ए000 2ए00ए000 1ए00ए000 इर्.पी.एस 0.47 0.35 वुफछ नही है। आदशर्तः एक वंफपनी को इस प्रकार के जोख्िाम प्रतिपफल सम्िमश्रण का चुनाव करना चाहिए जिससे अंशधारियों को संपदा में अिाकतम वृि हो सके। पूँजी संरचना को प्रभावित करने वाले कारक एक पफमर् की पूँजी संरचना का निधार्रण करने में विभ्िान्न प्रकार की नििायों से संबंिात अनुपात का निधार्रण सन्िनहित होता है। यह विभ्िान्न कारकों पर निभर्र करता है। उदाहरण के लिए )ण को निरंतर सेवा की अपेक्षा रहती है। एक व्यवसाय के लिए )ण का पुनभुर्गतान तथा ब्याज का समयानुसार भुगतान अनिवायर् होता है। इसके अतिरिक्त यदि एक वंफपनी )णों की मात्रा में वृि करने की योजना बना रही है तो उसे )णोंकी मात्रा ऊँची होने के कारण पयार्प्त मात्रा में रोकड़ की व्यवस्था, भुगतान करने के लिए कर लेनी चाहिए। उसी तरह पूँजी संरचना के चुनावको निधार्रित करने वाले महत्त्वपूणर् कारक निम्नलिख्िात हैंμ 1. रोकड़ प्रवाह स्िथतिμ )णपत्रों के निगर्मन से पूवर् रोकड़ - प्रवाह के आकार को ध्यान में अवश्य रखना चाहिए। रोकड़ प्रवाह से तात्पयर् केवल स्थाइर् रूप से रोकड़ के भुगतान से ही नहीं है बल्िक पयार्प्त मात्रा में बपफर का होना भी है। इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि एक वंफपनी जिन आभारों का रोकड़ में भुगतान करती है ;पद्ध सामान्य व्यावसायिक संचालन के लिए ;पपद्ध स्थाइर् संपिायों में निवेश के लिए ;पपपद्ध )ण - सेवा वचनब(ता का परिपालन करने के लिए अथार्त् ब्याज के भुगतान के लिए तथा )ण के मूलधन के पुनभुर्गतान के लिए की भी व्यवस्था करनी चाहिए। 2. ब्याज आवरण अनुपात ;आइर्.सी.आर.द्ध ब्याज आवरण अनुपात से तात्पयर् है कि वंफपनी का ब्याज, तथा कर काटने से पूवर् लाभ की मात्रा ब्याज से कितने गुना अिाक है। अथार्त् ब्याज के आभार को भुगतान करने के लिए लाभ की मात्रा कितने गुणा अिाक है। इसकी गणना निम्न प्रकार से की जाती है। इ.र्बी.आइर्.टीब्याज आवरण अनुपात = ब्याज ;आय ब्याज व कर काटने से पूवर्द्ध यह अनुपात जितना अिाक होता है वंफपनी की आथ्िार्क दशा ब्याज का भुगतान करने के लिए उतनी ही सुदृढ़ समझी जाती है। अथार्त् वंफपनी ब्याज का भुगतान आसानी से करने में सामथ्यर्वान समझी जाती है। यद्यपि इस अनुपात को एक पयार्प्त अनुपात नहीं समझा जाता है। पफमर् कीइर्.बी.आइर्.टी. ऊँची हो सकती है लेकिन रोकड़ शेष कम हो सकता है। ब्याज के अतिरिक्त आभारों का भुगतान भी संबंिात ही है। 3. )ण सेवा आवरण अनुपात ;डी.एस.सीआर.द्धμ )ण सेवा आवरण अनुपात उन कमियों पर ध्यान देता है जो ब्याज आवरण अनुपात ;आइर्सी.आर.द्ध में होती हैं। इसकी गणना निम्न प्रकार की जाती हैμ एक उच्च डी.एस.सी.आर. प्रदश्िार्त करता है। रोकड़ प्रतिब(ता की बेहतर उपलब्धता को और निरंतरता को, वंफपनी की )ण तत्व को बढ़ाने की क्षमता को अपने स्वयं की पूँजी संरचना द्वारा। 4. निवेश पर आय ;आर.ओ.आइर्.द्धμ यदि वंफपनी की निवेश पर आय ऊँची दर की है तो प्रति अंश आय को बढ़ाने के लिए वंफपनी समता पर व्यापार के उपयोग का चुनाव कर सकती है। अथार्त् इसकी )ण उपयोग की योग्यता उच्च श्रेणी की है। हम प्रथम उदाहरण में पहले ही अवलोकन कर चुके हैं कि एक वंफपनी, प्रति अंश आय में वृि करने के लिए अिाक )णों का उपयोग कर सकती है। जबकि दूसरे उदाहरण में अिाक )णों का उपयोग प्रति अंश आय में कमी करता है। यह सब इसलिए कि वंफपनी की निवेशों पर आय केवल 6.67 प्रतिशत है जो कि )णों की लागत से कम है। उदाहरण एक में निवेशों पर आय 13.3 प्रतिशत है तथा समता पर व्यापार लाभदायक है। इससे यह प्रकट होता है कि निवेशों पर आय वंफपनी की समता परव्यापार की योग्यता का एक महत्त्वपूणर् निणार्यक है तथा इसी प्रकार पूँजी संरचना में उसकी भूमिकामहत्त्वपूणर् होती है। 5. )ण की लागतμ एक वंफपनी द्वारा नीचीब्याज की दर पर )ण लेना उसकी ऊँची दर से )ण विनियोजन क्षमता को प्रदश्िार्त करता है। अतः यदि नीची दर की ब्याज पर )ण लिए जा सकते हों तो अिाक मात्रा में )णों का उपयोग किया जा सकता है। 6. कर दरμ यद्यपि ब्याज वुफल आगम में से कम किया जाने वाला व्यय है। )ण की लागत कर दर से प्रभावित होती है। हमारे उदाहरणों में पफमर् 10 प्रतिशत पर )ण ग्रहण कर रही है। यदि कर की दर 30 प्रतिशत हो तो कर काटने के उपरांत )ण की लागत केवल 7 प्रतिशतहै। कर की ऊँची दर, )णों को अपेक्षाकृत सस्ता करती है तथा समता में वृि को आकष्िार्त करती है। 7. समता की लागतμ प्रत्येक अंशधारी अपने द्वारा धारित अंश पूँजी पर उसके द्वारा उठाए गए जोख्िाम के अनुपात में आय प्राप्त करने की अपेक्षा करता है। जब वंफपनी )ण की मात्रा में वृिकरती है तो अंशधारियों की वित्तीय जोख्िाम जिसे वे उठा रहे हैं, में भी वृि हो जाती है। परिणामतः उनकी आशांवित आय की दर भी बढ़ जाती है। इसका कारण यह है कि वंफपनी )णों का उपयोग उस ¯बदु से आगे नहीं किया जा सकता जिसके लिए वे )ण ग्रहित किए गए हैं। यदि )णों का उपयोग उस ¯बदु से आगे किया जाता है तो समता की लागत तेजी से बढ़ना शुरू हो जाती है तथा अंशों का मूल्य इर्.पी.एस. में वृि होने पर भी घटना प्रारंभ हो जाता है। अतः अंशधारियों की संपदा में अिाकतम वृि करने या अंशधारियों को अिाकतम लाभा¯वत करने के लिए, )णों का उपयोग एक निश्िचत ¯बदु तक ही करना चाहिए। 8. प्रवतर्न लागतμ वंफपनी प्रवतर्न में ड्डोतों में वृि करने पर वुफछ खचेर् भी करने पड़ते हैं। जब अंशों तथा )ण पत्रों का जनता में निगर्मन किया जाता है तो वुफछ यथेष्ट व्ययों के भुगतानकरने की आवश्यकता भी होती है। किसी वित्तीय संस्था से )ण प्राप्त करने में इतनी ज्यादा लागत नहीं आती है। ये मान्यताएँ अंश निगर्मन या )ण ग्रहण करने के मध्य चुनाव को प्रभावित कर सकती है तथा पूँजी संरचना भी प्रभावित होती है। 9. जोख्िाम का ध्यानμ जैसा कि पहले ही समझाया जा चुका है कि किसी भी व्यवसाय में)णों की मात्रा में वृि, वित्तीय जोख्िाम में वृिकरती है। वित्तीय जोख्िाम से तात्पयर् उस अवस्था िया 1 भारतीय उद्योग का नििाकरण कौन करता है? यह महत्त्वपूणर् क्यों है? मध्य 1980 से 1990 तक की सूचीकृत भारतीय पफमो± के आकड़ों के उपयोग से भारतीय उद्योग से संबंिात वुफछ निगर्मों का अध्ययन किया गया। उनमें से एक पहलू यह है कि प्रवतर्कों तथा उद्यमियों ने वास्तविक रूप में जिन वंफपनियों में उनका नियंत्राण है अत्यंत सीमित मात्रा में अंशों में निवेश किया हुआ है।तथापि, वंफपनियों में तुलनात्मक रूप से स्वामित्व की कमी होने के बावजूद भी बहुत सी सूचीकृत वंफपनियों,खासकर निजी क्षेत्रा की वंफपनियों का प्रबंधन अिाक या तो संस्थापकों द्वारा या उनके परिवार के उत्तरािाकारी जनों द्वारा अन्य प्रवतर्कों द्वारा जिनकी उनपर जागीरदारी है के द्वारा किया जाता था। पफमर् की वुफल पूँजी में अनुपात अंशों का प्रतिशत उधार लिया हुआ धन ;)णद्ध आता कहाँ से है: - वाण्िाज्ियक बैंकों से )ण 26.9 वित्तीय संस्थाओं से )ण 19.89 )णपत्रा 7.78 स्थाइर् जमा 3.86 अन्य )ण 8.78 अंशों के धारक कौन हैं? जनता द्वारा धरित अंश - विस्तार से 10.88 विदेशी अंशधरिता 3.54 सरकारी अंशधरिता 5.49 संस्थागत अंशधरिता 8.44 संचालकों की अंशधरिता 2.80 चोटी के 50 अंशधारियों की अंशधरिता 1.85 एक वंफपनी की वुफल )ण तथा समता पूँजी 100.00 अिाकतम भारतीय वंफपनियों का वित्तीयन )ण द्वारा ही किया जाता था। जो पश्िचमी देशों में पसंद नहीं किया जाता। यदि वुफल )ण तथा नामिक समता पूँजी औसत भारतीय वंफपनियों में 100 थी तो उसमें )ण पूँजी का अंश 67 प्रतिशत तथा समता पूँजी का अंश केवल 33 प्रतिशत ही था। यदि निगमित समता में सरकारी स्वामित्व का अंश तथा वित्तीय संस्थाओं की समता को जोड़ा जाए तो 60 प्रतिशत से अिाक ;26.69$19.89$5.49$8.44द्ध कोषों का अंशदान किसी न किसी प्रकार राज्य सरकारों का पाया जाता है। विदेशी अंशधारियों का सूचीकृत भारतीय वंफपनियों में बहुत चीख पुकार के बाद मुश्िकल से 4 प्रतिशत;3.54द्ध से अिाक नहीं पाया जाता। जबकि भारतीय सूचीकृत वंफपनियों में जनता जनादर्न का अंश 11प्रतिशत के लगभग पाया जाता है। उच्च श्रेणी के 50 अंशधारियों का अंशदान 2 प्रतिशत ;1.85द्ध से कम ही पाया जाता है। यह दशा तो इस प्रकार के विश्िाष्ट वगीर्कृत अंशधारियों की है जिसमें प्रवतर्कों, उद्यमियों तथा अन्य बड़ेअंशधारियों को विशेष वगर् में वगीर्कृत किया जाता है। उद्यमियों की अपेक्षा जनता द्वारा 5 गुना धन वंफपनियों में लगाया जाता है। पिफर भी व्यक्ितयों का एक समूहजिनका वंफपनी में वित्तीय सहयोग अपेक्षाकृत कम ही होता है पिफर भी वंफपनी का प्रभावी नियंत्राण केवल उन्हीं व्यक्ितयों के हाथों में होता है। ड्डोत - ूूूण्जीमीपदकनइनेपदमेेसपदमण्बवउध्2005ध्10ध्07 से है जब कोइर् वंफपनी अपने निश्िचत वित्तीय व्ययों अथार्त् ब्याज का भुगतान करने में असमथर् होती है तथा पूवार्िाकार अंशों पर लाभांश देने में भी एवं देनदारियों का पुनभुर्गतान भी नहीं कर पाती। इनवित्तीय जोख्िामों के अतिरिक्त, सभी व्यवसायों की संचालन जोख्िाम भी होती हैं जिन्हें व्यावसायिक जोख्िामों के नाम से भी पुकारते हैं। व्यावसायिक जोख्िाम स्थाइर् संचालन लागतों पर निभर्र करती हैं।ऊँची दर की स्थाइर् संचालन लागत का परिणामऊँची दर की व्यावसायिक जोख्िाम होता है या इसके विपरीत क्रम में होता है। वुफल जोख्िाम दोनोंप्रकार की व्यावसायिक जोख्िाम तथा वित्तीय जोख्िाम पर निभर्र रहती है। यदि किसी पफमर् की व्यावसायिक जोख्िाम नीची दर की है तो इसकी )ण उपयोगक्षमता ऊँची दर की होगी या इसके विपरीत क्रम में होगी। 10. लचीलापनμ यदि एक पफमर् अपनी )ण संभाविता का पूरा उपयोग करती है तो यह और अिाक )णों के बोझ को नहीं उठा पाती अथार्त् और नए )णपत्रा निगर्मित नहीं कर सकती। अतः लचीलापन बनाए रखने के लिए इसे अदृश्य परिस्िथतियों से सावधान रहते हुए अपनी )ण लेने की क्षमता को बनाए रखना चाहिए। 11. नियंत्राणμ )ण प्रायः नियंत्राण को कमजोर होने का कारण नहीं होता। एक वंफपनी का समता अंशों में सावर्जनिक निगर्मन वंफपनी में प्रबंध की पकड़ को कमजोर करता है और इस कमजोरी की हालत में दूसरों को अिाकार में लेने के योग्य बनाता है। यही घटक )ण तथा समता के मध्य चुनाव को प्रभावित करता है खास तौर से वंफपनियों में जहाँ वतर्मान अवस्था में प्रबंध की पकड़ कमजोर हालत में होती है। 12. नियामक ढाँचाμ प्रत्येक वंफपनी को नियामक ढाँचा, जिसका निमार्ण विधान के अनुसार होता है के अधीन चलना होता है। उदाहरणाथर् - अंशों या )ण पत्रों का निगर्मन सेबी की हिदायतों केअंतगर्त ही होता है। यदि बैंकों या अन्य वित्तीय संस्थाओं से )ण लेना होता है तो मानकों का पूरा किया जाना आवश्यक होता है। उससे संबंिात जो भी नियम होते हैं उनका पालन किया जाना आवश्यक होता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जासकता है कि उस ड्डोत की प्रिया को पूरा करना अति आवश्यक होता है जिसका अनुसरण वह संस्था करती है। 13. शेयर बाशार की दशाएँμ यदि शेयर बाशारकी दशा ऊँची है अथार्त् शेयर बाशार में तेजडि़यों का बोलवाला है तो समता अंशों का विक्रय सुगमहोता है यहाँ तक कि बड़ी ऊँची कीमत पर भी विक्रय संभव होता है। प्रायः ऐसी अवस्था में वंफपनियों द्वारा समता अंश पूँजी को ही प्राथमिकता दी जाती हैं इसके विपरीत आथ्िार्क मंदी के समय, एक वंफपनी को समता पूँजी का जुटा पाना जटिल कायर् होता है तथा प्रायः वंफपनियाँ )ण लेना ही बेहतर समझती हंै। अतः शेयर बाशार की दशाएँ वंफपनी को समता पूँजी अथवा )ण दोनों में से एक के चुनाव के लिए विवश करती हैं अथार्त् चुनाव को प्रभावित करती हैं। 14. अन्य वंफपनियों की पूँजी संरचनाμ पूँजी संरचना नियोजन में एक उपयोगी मागर्दशर्क अन्य वंफपनियों का जो इसी प्रकार के व्यवसाय में संलग्न हैं का )ण समता अनुपात है। प्रायः प्रत्येक वंफपनी के अपने वुफछ नियम होते हैं जो मदद कर सकते हैं। ;यहाँ यह याद रखना चाहिए कि वंफपनी नियमों का पालन अंधा बनकर नहीं करती है।द्ध उदाहरण के लिए यदि एक पफमर् की व्यावसायिकजोख्िाम बड़ी ऊँची है, तो वह उसी प्रकार कीवित्तीय जोख्िाम को सहन नहीं कर सकती जो वंफपनी नियमों में सुझाइर् गइर् है। यह छोटे स्तर के )ण के लिए हो सकती है। अतः प्रबंध को यह ज्ञात होना चाहिए कि उद्योग के नियम क्या हैं, क्या वे उनका अनुसरण कर रहे हैं? क्या हम उनसे विचलित होकर किसी अन्य दिशा में अग्रसर हो रहे हैं? दोनों अवस्थाओं में उपयुक्त औचित्य अवश्य होना चाहिए। स्थाइर् एवं कायर्शील पूँजी अथर् प्रत्येक व्यवसाय को नििा की आवश्यकता इसकी संपिायों के क्रय तथा ियाओं के संचालन केलिए होती है। वंफपनी को स्थाइर् संपिायों तथाचालू संपिायों में निवेश करने की आवश्यकताहोती है। स्थाइर् संपिायाँ वे होती हैं जो व्यवसाय में एक वषर् से अिाक समय के लिए होती हैं या और लम्बे समय तक कायार्न्िवत रहती हैं। उदाहरण के तौर पर संयंत्रा एवं मशीन, पफनीर्चर एवं पिफक्सचर, भूमि एवं भवन तथा वाहन आदि।स्थाइर् संपिायों में निवेश का निणर्य बहुत सोच - विचार के बाद ही लेना चाहिए। क्योंकिस्थाइर् संपिायों में निवेश किया हुआ धन बड़ी भारी मात्रा में होता है। इस प्रकार के लिए हुए निणर्य अटल अथवा अपरिवतर्नीय प्रवृफति के होते हैं और यदि परिवतर्न किया जाता है तो बड़ी भारी हानि उठानी पड़ती है। इस प्रकार के निणर्यों को पूँजी बजटिंग निणर्यों के नाम से पुकारा जाता है। चालू संपिायाँ वे होती हैं जो व्यवसाय के दैनिक ियाकलापों में एक वषर् के अंदर ही रोकड़ या रोकड़ तुल्य में परिवतिर्त हो जाती हैं। उदाहरणाथर् - स्वंफध, देनदार, प्राप्य बिल आदि। स्थाइर् पूँजी का प्रबंध्न स्थाइर् पूँजी से आशय दीघर्कालीन संपिायों में निवेश से है। स्थाइर् पूँजी व्यवस्था में पफमर् की पूँजी का विभ्िान्न प्रकार की परियोजनाओं में आवंटन किया जाता है अथवा उस प्रकार कीसंपिायों में लगाया जाता है जो व्यवसाय में लंबे समय तक उपयोग में आती रहती हैं। इस प्रकार के निणर्यों को निवेश निणर्यों के नाम से पुकारा जाता है। इन्हें पूँजी बजटिंग निणर्यों के नाम से भी जानते हैं जो लंबे समय तक वंफपनी की लाभदायकता विकास तथा जोख्िाम को प्रभावितकरते रहते हैं। ये दीघर्कालीन संपिायाँ एक वषर् से अिाक के समय के लिए होती हैं।ऐसी संपिायों के लिए वित्त व्यवस्था भीपूँजी के दीघर्कालीन ड्डोतों जैसे समता या पूवार्िाकारअंश, ट्टणपत्रा, दीघर्कालीन ट्टण तथा व्यवसाय के प्रतिधारित उपाजर्न से की जानी चाहिए। स्थाइर्संपिायाँ का वित्त प्रबंधन कभी भी अल्पकालीनड्डोतों से नहीं किया जाना चाहिए।इन संपिायों में किया गया निवेश, क्रय पर किया गया व्यय, विस्तार पर किया व्यय, आधुनिकीकरण एवं उनके प्रतिस्थापन पर किए गए व्यय भी सम्िमलित होते हैं। इन निणर्यों में भूमि का क्रय भवन, संयंत्रा तथा मशीनों आदि का क्रय तथा किसी नयी उत्पाद लाइन का प्रवतर्न ताकि उत्पादन नयी तकनीकों से हो सके, सम्िमलित होते हैं। बड़े भारी व्यय जैसे विज्ञापन अभ्िायान, खोज या अनुसंधान, विकास कायर्क्रम जिनका प्रभाव दीघर्काल तक प्रभावशाली रहेगा, पूँजी बजटिंग निणर्यों के अनुपम उदाहरण हैं। स्थाइर् पूँजी की व्यवस्था या निवेश या पूँजी बजटिंग निणर्य निम्नलिख्िातकारणों से भी महत्त्वपूणर् हैंμ ;पद्ध दीघर्कालीन विकास तथा प्रभावμ ये निणर्य दीघर्कालीन विकास के लिए किए जाते हैं।दीघर्कालीन संपिायों में नििा के निवेश से भविष्य में आमदनी होती है, जिस आशा पर इनमें निवेश किया जाता है। ये व्यवसाय भविष्य की संभावनाओं तथा प्रत्याशाओं को प्रभावित करती हैं। ;पपद्ध इनमें नििा की बड़ी मात्रा आलिप्त होती हैμ इन निणर्यों के परिणामस्वरूप पूँजी कोष का एक बड़ा भारी भाग इन दीघर्कालीन परियोजनाओं में निवेश करने से अविचल हो जाता है। अथार्त् पूँजी स्िथर हो जाती है। इसीलिए इन निणर्यों को लेने से पहले, इनका विस्तृत विश्लेषण कर लेने के उपरांत, ही कायर्क्रम नियोजित किए जाते हैं। इन निणर्यों में यह भी ध्यान रखा जाता है कि नििा को कहाँ से किस ब्याज दर पर लिया जाए। ;पपपद्ध जोख्िाम का आलिप्त होनाμ स्थाइर् पूँजी में निवेश की भारी मात्रा आलिप्त होती है। जिसका पफमर् की संपूणर् आय पर दीघर्कालीन प्रभाव होता है। अतः स्थाइर् पूँजी आलिप्त निवेश निणर्य, पफमर् की संपूणर् व्यावसायिक जोख्िामों को प्रभावित करते हैं। ;पअद्ध अनुत्क्रमणीय निणर्यμ यदि ऐसे निणर्य एक बार ले लिए जाएँ तो उन्हें बिना भारी हानि उठाए बदला नहीं जा सकता है। किसी परियोजना को भारी निवेश के उपरांत बंद करने का तात्पयर् कोषों का अपव्यय होता है जिससे बड़ी लागत से बनी परियोजनाओं के विपफल होने का भय भी रहता है। अतः इस प्रकार के निणर्यों को बड़ी सावधानी से लेनाचाहिए तथा सभी विवरणों या विपरीत वित्तीय परिणामों का जो बड़े भारी भरकम भी हो सकते हैं का उचित मूल्यांकन करने के उपरांत ही निणर्य लेना चाहिए। स्थाइर् पूँजी की आवश्यकता को प्रभावित करने वाले घटक 1. व्यवसाय की प्रवृफतिμ स्थाइर् पूँजी की आवश्यकता व्यवसाय के प्रकार पर निभर्र करती है। उदाहरण के लिए एक व्यापारिक इकाइर् कीस्थाइर् संपिायों में निवेश की आवश्यकता एक निणार्यक संगठन की अपेक्षा कम होती है। क्योंकि उस संयंत्रा तथा मशीनें आदि क्रय करने की आवश्यकता नहीं होती है। 2. संिया का मापदंडμ एक वृहद् आकार वाले संगठन जो बड़े स्तर पर संचालित है उसे बड़ी - बड़ी मशीनों की आवश्यकता होती है तथा अिाक स्थान की भी आवश्यकता होती है। अतःउसे स्थाइर् संपिायों में निवेश के लिए अिाक धनराश्िा की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत छोटे उद्योगों को छोटी मशीनों तथा थोड़े स्थान की ही आवश्यकता होती है। 3. तकनीक का विकल्पμ वुफछ संगठन पूँजी प्रधान होते हैं तो दूसरे श्रम - प्रधान होते हैं। पूँजी प्रधान संगठनों में संयंत्रा एवं मशीनों के क्रय के लिए भारी निवेश की आवश्यकता होती है क्योंकि इनमें मानवीय श्रम की कम आवश्यकता होती है। ऐसे उद्यमों में स्थाइर् पूँजी की अिाक आवश्यकता होतीे है। दूसरी ओर श्रम प्रधान संगठनों में स्थाइर्संपिायों में निवेश की आवश्यकता कम ही होती है क्योंकि उनकी स्थाइर् पूँजी की आवश्यकता भी कम होती है। 4. तकनीकी उत्थानμ वुफछ उद्योगों में संपिायाँ शीघ्र ही अप्रचलित हो जाती हंै, परिणामस्वरूप उनका प्रतिस्थापन शीघ्र ही कराना होता है। ऐसीवंफपनियों में स्थाइर् संपिायों में भारी मात्रा में निवेश की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए वंफप्यूटर बहुत शीघ्र अप्रचलित हो जाते हैं तथा शीघ्र ही उनका प्रतिस्थापन भी किया जाता है। यदि हम उसकी तुलना पफनीर्चर से करें तो पाते हैं कि पफनीर्चर इतना शीघ्र न तो अप्रचलित होेता है और नहीं इतना शीघ्र प्रतिस्थापित किया जाता है। अतःऐसे संस्थान जिनकी संपिायाँ शीघ्र ही अप्रचलित होने को अधोमुखी होती ही रहती हैं उन्हें स्थाइर्संपिायों के क्रय के लिए स्थाइर् रूप मेें स्थाइर् पूँजी की व्यवस्था करनी होती है। 5. विकास प्रत्याशाμ किसी संगठन में ऊँची दर से विकास की प्रत्याशा की संतुष्िट के लिए प्रायःस्थाइर् संपिायों की व्यवस्था के लिए अिाक निवेश की आवश्यकता होती है। यद्यपि जब इस प्रकार के विकास की आशा की जाती है, तब व्यवसाय केसामने यह विकल्प होता है कि ऊँची दर कीआशान्िवत माँग को शीघ्र पूरा करने के लिए ऊँची दरकी क्षमता का निमार्ण करे। यह स्थाइर् संपिायों मेंऊँची दर की क्षमता का निमार्ण करे। यह स्थाइर्संपिायों में ऊँची दर के निवेश को आवश्यकबनाता है तथा तत्पश्चात् ही ऊँची दर की स्थाइर्संपिायों में वृि भी होती है। 6. विविधीकरणμ एक पफमर् विभ्िान्न कारणों से अपनी संचालन प्रिया में विविधीकरण द्वारा विविधता ला सकती है। यह िया स्थाइर् पूँजी की आवश्यकता में वृि करके भी की जा सकती है। उदाहरण के लिए एक कपड़ा निमार्ण वंफपनी, एक सीमेंट उत्पादन संयंत्रा लगाकर विविधता ला सकती है। स्पष्ट है कि उसकी स्थाइर् पूँजी की माँग में वृि हो जाएगी। 7. वित्तीय विकल्पμ एक विकसित वित्तीय बाशार वुफल विक्रय के लिए विकल्प के रूप मेंपट्टðेदारी सुविधा मुहैÕया करा सकता है। जब एकसंपिा पट्टेð पर ली जाती है तो व्रेफता पफमर् विवे्रफताको पट्टðेदारी किराया देता है तथा संपिा को अपने प्रयोग में लाता है। ऐसा करने से वह एक बड़ीभारी रकम जो उस संपिा के क्रय के लिए चाहिए थी कि व्यवस्था करने से बच जाता है। पट्टðेदारी की सुविधाएँ मिलने से उन नििायों कीआवश्यकता कम हो जाती है जिनकी स्थाइर् संपिायों में निवेश के लिए आवश्यकता होती है। अतः स्थाइर् पूँजी की आवश्यकता भी कम ही रहती है। इस प्रकार की व्यूह रचना उन व्यवसायों में अिाक उपयुक्त होती है जहाँ पर जोख्िाम की मात्रा अिाक होती है। 8. सहयोग का स्तरμ कभी - कभी वुफछ व्यावसायिक संगठन एक दूसरे की सुविधाओं का उपयोग करते हैं। उदाहरण के लिए एक बैंक दूसरे बैंक की आॅटोमैटिक टैलर मशीन ;एटीएमद्ध का उपयोग कर सकती है। या उनमें से वुफछ संयुक्त रूप में ऐसी सुविधा की व्यवस्था कर सकते हैं। यह तभी संभव होता है कि उनमें से प्रत्येक का संचालन पैमाना उस स्तर का नहीं होता कि वह उस सुविधा का पूरा लाभ उठा सके। इस प्रकार के सहयोग या कोलाबोरेशन कायर्शील पूँजी स्िथति पीटी अस्ट्रा इण्टर नेशनल इण्डोनेश्िाया आटोमेकर के सी.ऐपफ.ओ. ;चीपफ पफाइनेंस आपिफसरद्ध के अनुसार फ्भारी बिक्री के कारण ये 18 महीने अिाक चमत्कारी रहे हैं।य् इस दौरान यू.ऐस. मुद्रा में 4 अरब डाॅलर की बिक्री हुइर् है। इण्डोनेश्िाया पिफर उन्नति के पथ पर अग्रसर है तथा उपभोक्ताओं की नइर् पीढ़ी प्रथम वाहन - मोटर - साइकिल की उत्सुक है। साथ ही होंडा तथा टोयोटा की आस्ट्रा की अिाक प्रीमियम व्राण्ड्स की भी जिज्ञासा है। प्रस्ताव का सबसे सराहनीय अंग यह है कि कायर्शील पूँजी प्रबंध स्वयं अपनी सुरक्षा करता हुआ प्रतीत होता है। फ्व्यवसाय पर निभर्रता तथा व्यापारिक प्राप्ितयों की गणनानुसार हमारे पास 8 और 19 दिन के मध्य की कायर्शील पूँजी है।य् स्लैक के अनुमानानुसार वंफपनी को यह चमत्कारिक उन्नति संचालनीयता ने दी। उनमें से एक कारण यह भी है कि कायर्शील पूँजी का विस्तार उस दर से नहीं हुआ। जिस दर से स्कंध का हुआ। बल्िक इसकी दुलर्भता ही बनी रही। फ्हम उस बाशार में हैं जो हमें नए उत्पादों की प्रतििया सुदृढ़ता से देता है।य् ‘स्लैक’। फ्और उत्पादों की पूवर् बिक्री भी बड़ी उच्च कोटि की है।य् हम चार से छः महीने पूवर् ही भुगतान सहित आडर्र प्राप्त कर लेते हैं जो हमारी रोकड़ स्िथति को अच्छा बनाने में सहायता करता है। यदि सब वुफछ ठीक रहा तो हमारा एक वाहन शीघ्र ही बनकर तैयार हो जाएगा तथा डीलरों तक पहुँच जाएगा। हमारी स्कन्ध लागत बड़ी कम है तथा उत्पाद लाइन भी सुगमता से आगे बढ़ती है।य् कायर्शील पूँजी प्रबंध में बैंकों की हितकारी भूमिका एक बड़ा भारी कारण है कि रोकड़ प्रवाह व्यवसाय में उन्नतिशील ही है। बैकिंग प्रतियोगिता एक अच्छा प्रबंधकीय परिणाम है। वंफपनी ने पारंपरिक बैंकों तथा राज्य सरकारों के भारतीय संस्थानों, से हटकर अिाक प्रतियोगी निजी संस्थानों तथा विदेशी बैंकों, जो उनके भागीदार हैं से संबंध स्थापित करने की अनुमति दे दी है। इन बैंकों ने श्िाल्पविज्ञान ;टैक्नोलाॅजीद्ध में रोकड़ प्रवाह पर दृष्िटपात करते हुए, निवेश किया है जो पाँच वषर् पूवर् एक असाधरण घटना थी। ड्डोत - ूूूण्बविंेपंण्बवउध्ंतबीपअमेध्200503.02ण्ीजउ स्थाइर् संपिायों में निवेश के स्तर को कम करने में संपिायों की अपेक्षा कम ही लाभदायक होती हैं।सहायक होते हैं उन सहयेागी संस्थानों में जो इस चालू संपिायों के वुफछ उदाहरण उनके तरलता प्रकार का सहयोग निमार्ण करते हैं। के क्रम में नीचे दिए गए हैंμ 1.रोकड़ हस्ते/रोकड़ बंैक में कायर्शील पूँजी 2.विक्रय योग्य प्रतिभूतियाँस्थाइर् संपिायों में निवेश के अतिरिक्त प्रत्येक3.प्राप्य बिलव्यावसायिक संगठन को चालू संपिायों में भी 4.देनदारनिवेश की आवश्यकता होती है। इस निवेश 5.तैयार माल रहतियासुविधा के माध्यम से दैनिक संचालन ियाओं 6.अ(र् निमिर्त मालको सुगम रूप में संचालित रखने में व्यवसाय कोसहायता प्राप्त होती है। चालू संपिायाँ प्रायः 7.कच्चा माल अिाक तरल होती हैं लेकिन व्यवसाय को स्थाइर् 8.पूवर्दत्त व्यय उपरोक्त लिख्िात संपिायों से यह संभावना रहती है कि वे एक वषर् के अंदर वे या तो रोकड़ में या रोकड़ तुल्य में परिवतिर्त हो जाएँगी। येसंपिायाँ व्यवसाय को तरलता प्रदान करती हैं। वेसंपिायाँ अिाक तरल मानी जाती हैं जो मूल्य में किसी प्रकार की कटौती के बिना रोकड़ मेंशीघ्रातिशीघ्र परिवतिर्त हो जाती है। चालू संपिायों में अपयार्प्त निवेश वंफपनी के चालू दायित्वों के भुगतान में व्यवधान डाल सकता है। यद्यपि येसंपिायाँ संगठन को अल्प लाभ ही सुलभ कराती हैं। अतः तरलता एवं लाभदायकता के बीच प्रभावशाली शेष आवश्यक होता है। चालू दायित्वों से तात्पयर् उन दायित्वों से है जो एक वषर् के अंदर ही जब बनते हैं तभी भुगतान पाने के अिाकारी होते हैं। इनके उदाहरण देय विपत्रा, लेनदार, अदंत व्यय, ग्राहकों से पूवर् प्राप्त भुगतानआदि हैं। वुफछ चालू संपतियों के लिए वित्त प्रबंधनअल्पकालीन ड्डोतों से किया जाता है उन्हें चालूदायित्व कहते हैं। शेष का वित्त प्रबंधन दीघर्कालीनड्डोतों से होता है, उन्हें शु( कायर्शील पूँजी कहते हैं।इस प्रकार शु( कायर्शील पूँजी चालू संपिायाँ - चालू दायित्व सूत्रा का प्रयोग किया जाता है। कायर्शील पूँजी आवश्यकता को प्रभावित करने वाले कारक 1. व्यवसाय की प्रवृफतिμ व्यवसाय की मूलभूत प्रवृफति उसकी कायर्शील पूँजी की आवश्यकता को प्रभावित करती है। एक व्यापारिक संगठन को जहाँ केवल माल का क्रय एवं विक्रय ही होता है कम कायर्शील पूँजी की आवश्यकता होती है अपेक्षावृफत एक निमार्यक संगठन के जहाँ कच्चा माल क्रय करके उसका उपभोक्ता वस्तु के रूप में निमार्ण किया जाता है। इसका कारण यह है कि व्यापारिक संगठन में प्रायः माल की कोइर् प्रिया नहीं होती है अतः यहाँ कच्चे माल तथा तैयार माल में कोइर् अंतर नहीं होता है। जैसे ही माल का क्रय किया जाता है वह ज्यों - का - त्यों तुरंत ही बेच दिया जाता है। कभी - कभी तो माल प्राप्त होने से पहले ही उसका सौदा कर दिया जाता है। जबकि निमार्यक उद्योग में कच्चे माल को निमिर्त माल में बदला जाता है अथार्त् उसे उपभोग योग्य तैयार किया जाता है तब कहीं जाकर वह बिक्री योग्य बनता है। यदि अन्य बातें समान रहें तो एक व्यापारिक इकाइर् को कायर्शील पूँजी की कम ही आवश्यकता पड़ती है। इसी तरह सेवा उद्योगों को क्योंकि वुफछ भी माल का स्टाॅक रखने की आवश्यकता नहीं होती है अतः उन्हें भी कम ही कायर्शील पूँजी की आवश्यकता होती है। 2. संचालन का स्तरμ ऐसे उद्यम जिनका संचालन स्तर बहुत ही उच्च कोटि का है उन्हें स्टाॅक व देनदारों की मात्रा कापफी अिाक रखनी पड़ती है। उन्हें अिाक कायर्शील पूँजी की मात्रा की आवश्यकता होती है अपेक्षावृफत उन उद्यमों के जिनके व्यापारिक संचालन निम्न कोटि का है।अथार्त् जिनका व्यापार ऊँचे स्तर का होता है। उन्हें अिाक कायर्शील पूँजी की आवश्यकता होती है उन व्यवसायों से जिनका व्यापार निचले स्तर का है। 3. व्यवसाय चक्रμ व्यवसायिक चक्र की विभ्िान्न दशाएँ एक पफमर् की कायर्शील पूँजी की आवश्यकता को प्रभावित करती हैं। व्यापार उत्कषर् के समय बिक्री एवं उत्पादन दोनों में वृि होती है अतः अिाक कायर्शील पूँजी की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत आथ्िार्क मंदी के समय जबकि बिक्री एवं उत्पादन दोनों ही निम्न स्तर के होते हैं अतः कायर्शील पूँजी की कम ही आवश्यकता होती है। 4. मौसमी कारकμ वुफछ व्यवसाय मौसमी होते हैं जैसे आइसक्रीम पैफक्ट्री। मौसम के चरम या शीषर् स्तर पर जब उसकी िया अिाक गतिशील होती है, अिाक कायर्शील पूँजी की आवश्यकता होती है। जब मौसम का उतार होता है या मौसम बदल जाता है तो उस व्यवसाय की िया मंद हो जाती है तब कायर्शील पूँजी की कम आवश्यकता होती है। अथार्त् मौसमी उद्यमों में मौसम में अिाक तथा बेमौसम कम कायर्शील पूँजी की आवश्यकता होती है। 5. उत्पादन चक्रμ उत्पादन चक्र से तात्पयर् कच्चे माल की प्राप्ित तथा उस माल को पक्के माल में परिवतिर्त करने तक के समय के अंतर से है। वुफछ व्यवसायों का उत्पादनचक्र दीघर्कालीन होता है तो अन्य का लघुकालीन। समय की अविा एवं उसकी दूरी उत्पादन चक्र के अनुसार कायर्शील पूँजी की आवश्यकता को प्रभावित करती है। क्योंकि कच्चा माल तथा उत्पादन व्ययों के भुगतानाथर् कायर्शील पूँजी आवश्यक होती है। अतः उन व्यवसायों में जहाँ उत्पादन चक्र लम्बा है वहाँ कायर्शील पूँजी की आवश्यकता अपेक्षावृफत अिाक होती है। इसके विपरीत जहाँ उत्पादन प्रिया छोटी या अल्पकालीन होती है वहाँ कम कायर्शील पूँजी से भी काम चलाया जा सकता है। 6. उधार विक्रय सुविधाμ विभ्िान्न वंफपनियाँ अपने ग्राहकों का विभ्िान्न प्रकार की उधार की शतो± पर माल बेचती हैं। यह सब प्रतियोगिता स्तर पर निभर्र करता है तथा ग्राहक वगर् की योग्यता अनुसार भी उधार दिया जाता है। एक उद्यम को उधार नीति अपनाने के लिए तथा देनदारों की संख्या में वृि कराने के लिए अिाक कायर्शील पूँजी की आवश्यकता होती है। 7. उधार क्रय सुविधाμ जब कोइर् पफमर् अपने ग्राहकों को उधार माल बेचती है तो उसे उधार क्रय पर माल मिल भी जाता है। जितना अिाक कोइर् वंफपनी उधार माल क्रय करेगी, उसे उतनी ही कम कायर्शील पूँजी की आवश्यकता होगी। 8. संचालन कायर् वुफशलताμ वंफपनियाँ अपने संचालन का विभ्िान्न प्रकार की कायर् वुफशलताओं से प्रबंध करती हैं। उदाहरणस्वरूप एक पफमर् अपने कच्चे माल की प्रबंध वुफशलता का प्रबंध करने में कम माल के शेष ;स्टाॅकद्ध से ही काम चला रही है। यह वंफपनी के उच्च कोटि के स्वंफध आवतर् अनुपात का द्योतक है। उसी तरह )णदाताओं से शीघ्रातिशीघ्र धन की वसूली अच्छे प्राप्यकीय आवतर् अनुपात का द्योतक होता है। इससे कायर्शील पूँजी की कम ही आवश्यकता होती है। अच्छी बिक्री के प्रयत्न तैयार माल को स्टाॅक में रखे रहने की मात्रा में कमी लाते हैं। इससे कच्चे माल की मात्रा मेंकमी होती है, तैयार माल तथा ट्टणदाताओं में कमी होती है। अतः कम कायर्शील पूँजी की आवश्यकता होती है। 9. कच्चे माल की उपलब्िधμ यदि कच्चा माल तथा अन्य आवश्यक वस्तुएँ आसानी एवं सुगमता से उपलब्ध होती रहती हैं तथा उनकी आवक में कोइर् रुकावट नहीं होती है, तो माल का थोड़ा स्टाॅक भी पयार्प्त होता है। इसके विपरीत यदि माल निविर्घ्न रूप में उपलब्ध नहीं होता है तो माल के भारी स्टाॅक की आवश्यकता होगी। इसके अतिरिक्त माल के क्रय करने के आदेश की तिथ्िा तथा माल पूतिर् की तिथ्िायों में यदि कापफी अंतर होगा तो उससे भी कायर्शील पूँजी की आवश्यकता पर प्रभाव पड़ता है। इसे लीड टाइम के नाम से भी जाना जाता है। लीड टाइम जितना अिाक होगा कच्चे माल की मात्रा की उतनी ही अिाक आवश्यकता होगी तथा उतनी ही अिाक कायर्शील पूँजी की अिाक आवश्यकता होगी। 10. विकास प्रत्याशाμ यदि किसी व्यवसाय की विकास की संभावनाएँ अिाक प्रतीत होती हैं तो उसके लिए अिाक कायर्शील पूँजी की आवश्यकता होगी, जिसकी सहायता से वह व्यवसाय अिाक माल का उत्पादन भी कर सकेगा तथा जब वांच्छनीय होगा तब विक्रय लक्ष्य को भी प्राप्त कर सकेगा। 11. प्रतियोगिता का स्तरμ उच्चस्तरीय प्रतियोगिता की अवस्था में अिाक तैयार माल की आवश्यकता होगी ताकि ग्राहकों को तुरंत, आदेशानुसार, माल की पूतिर् की जा सके। इससे कायर्शील पूँजी की आवश्यकता में वृि होगी। प्रतियोगिता की दशा में व्यवसाय माल के अिाक उधार विक्रय के लिए विवश होगा और अिाक कायर्शील पूँजी की आवश्यकता होगी। 12. मुद्रा स्पफीतिμ मुद्रा स्पफीति की अवस्था में प्रत्येक वस्तु का मूल्य बढ़ जाता है और उत्पादन तथा बिक्री को स्थाइर् बनाए रखने के लिए अिाक धन की आवश्यकता होती है। अतः मुद्रा स्पफीति के अिाक होने से कायर्शील पूँजी की आवश्यकता भी बढ़ जाती है। इस विषय में यह याद रखना चाहिए कि यदि मुद्रा प्रसार की दर 5 प्रतिशत बढ़ती है तो यह आवश्यक नहीं है कि कायर्शील पूँजी का प्रत्येक घटक भी 5 प्रतिशत ही बढ़ेगा। अथार्त् विभ्िान्न घटकों में बढ़ोतरी का प्रतिशत लगभग और अिाक ही होगा। वास्तविक कायर्शील पूँजी की आवश्यकता विभ्िान्न घटकों जैसे कच्चा माल, अ(र्निमिर्त माल, श्रम लागत, तैयार माल आदि के मूल्यों में वृि के अनुसार होगी तथा उनका वुफल आवश्यकता में क्या अनुपात है इस बात पर भी कायर्शील पूँजी की आवश्यकता पर प्रभाव पड़ेगा। मुख्य शब्दावली वित्तीय प्रबंध् संपदा में अध्िकतम वृि निवेश संबंध्ी निणर्य वित्तीयन संबंध्ी निणर्य लाभांश निणर्य पूँजी बजट कायर्शील पूँजी वित्तीय नियोजन पूँजी संरचना समता का व्यापार सारांश व्यावसायिक वित्तμ व्यावसायिक ियाओं के संचालन हेतु धन की आवश्यकता होती है इसे हीव्यावसायिक वित्त कहते हैं। लगभग सभी व्यावसायिक ियाओं के लिए वुफछ न वुफछ धन की आवश्यकताहोती है। वित्त की आवश्यकता, व्यवसाय के स्थापन, संचालन, इसमंे आधुनिकीकरण, विस्तार करने अथवा विविधीकरण के लिए होती है। वित्तीय प्रबंध्नμ सभी वित्त के लिए वुफछ लागत की आवश्यकता होती है। यह अति आवश्यक है कि इसकी आवश्यकता की व्यवस्था अत्यंत सावधानीपूवर्क की जानी चाहिए। वित्तीय प्रबंध का संबंध इसकीइष्टतम उपलब्धता तथा वित्त के उपयोग से है। इष्टतम उपलब्धता के लिए वित्त के विभ्िान्न उपलब्ध ड्डोतोंकी पहचान की जाती है तथा उनके ऊपर आने वाले व्यय की तुलना की जाती है तथा संबंिात जोख्िाम का भी ध्यान रखा जाता है। उद्देश्य तथा वित्तीय निणर्यμ वित्तीय प्रबंध का मुख्य उद्देश्य अंशधारियों की धन संपदा में अिाकतम वृिकरना होता है। वंफपनी के अंशों का बाशार मूल्य तीन मूलभूत वित्तीय निणर्यों से संबंिात होता है।वित्तीय निणर्य लेने का अथर् तीन विस्तृत निणर्यों से है जो निम्नांकित हैं - निवेश संबंध्ी निणर्य, वित्तीयन संबंध्ी निणर्य, लाभांश से संबंध्ित निणर्य। वित्तीय नियोजन और उसका महत्त्वμ वित्तीय नियोजन से तात्पयर् निश्िचत रूप से एक संगठन केभविष्य प्रचालन से संबंिात वित्तीय ब्लूपि्रंट तैयार करना है। वित्तीय नियोजन का उद्देश्य उचित समय पर पयार्प्त नििा सुलभ कराने का आश्वासन होता है। ;कद्ध नििायों की आवश्यकतानुसार उनकी उपलब्धता का आश्वासन देना। ;खद्ध यह देखना कि पफमर् संसाधनों में अनावश्यक रूप से वृि नहीं करती है। किसी भी व्यावसायिक इकाइर् के समग्र नियोजन का, वित्तीय नियोजन एक महत्त्वपूणर् अंग है। इसका लक्ष्य वंफपनी कोष की उपलब्धता के लिए उपलब्ध समय के संबंध में अनिश्िचतता का सामना करने के योग्य बनाना है। यह संगठन के सुगम प्रचालन में सहायक होती है। पूँजी संरचना और उसके कारकμ वित्तीय प्रबंधन में एक महत्त्वपूणर् निणर्य वित्तीय प्रारूप से संबंिातहै अथवा नििायों को बढ़ाने में विभ्िान्न ड्डोतों के उपयोग का अनुपात। स्वामित्व के आधार परव्यावसायिक वित्त के ड्डोतों को मोटे तौर पर दो वगो± में विभाजित किया जा सकता है। जैसे ‘स्वामिगत नििा’ तथा ‘उधार लिया हुआ या ग्रहीत नििा’। पूँजी संरचना और उसको प्रभावित करने वाले कारक। एक पफमर् की पूँजी संरचना का निधार्रण करने में विभ्िान्न प्रकार की नििायों से संबंिात अनुपात का निधार्रण सन्िनहित होता है। यह विभ्िान्न कारकों पर निभर्र करता है। उदाहरण के लिए - रोकड़ प्रवाह स्िथति, ब्याज आवरण अनुपात ;आइर्.सी.आर.द्ध, )ण सेवा आवरण अनुपात ;डी.एस.सी.आर.द्ध, निवेश पर आय ;आर.ओ.आइर्.द्ध, )ण की लागत, कर दर, समता की लागत, प्रवतर्न लागत, जोख्िाम का ध्यान, लचीलापन, नियंत्राण, नियामक ढाँचा, शेयर बाजार की दशाएँ, अन्य कंपनियों की पूँजी संरचना। स्थाइर् एवं कायर्शील पूँजीμ स्थाइर् पूँजी से आशय दीघर्कालीन संपिायों में निवेश से है। स्थाइर् पूँजी व्यवस्था में पफमर् की पूँजी का विभ्िान्न प्रकार की परियोजनाओं में आवंटन किया जाता है अथवा उस प्रकार की संपिायों में लगाया जाता है जो व्यवसाय में लंबे समय तक उपयोग में आती रहती हैं। इस प्रकार के निणर्यों को निवेश निणर्यों के नाम से पुकारा जाता है। इन्हें पूँजी बजटिंग निणर्यों के नाम से भी जानते हैं जो लंबे समय तक वंफपनी की लाभदायकता विकास तथा जोख्िाम को प्रभावित करते रहते हैं। स्थाइर् पूँजी की आवश्यकता को प्रभावित करने वाले घटकμ व्यवसाय की प्रवृफति, सियता कामापदंड, तकनीक का विकल्प, तकनीकी उत्थान, विकास प्रत्याशा, विविध्ीकरण, वित्तीय विकल्प, सहयोग का स्तर, कायर्शील पूँजी आवश्यकताओं को प्रभावित करने वाले कारकμ व्यवसाय की प्रवृफति, संचालन का स्तर, व्यवसाय चक्र, मौसमी कारक, उत्पादन चक्र, उधर विक्रय सुविध, उधर क्रय सुविध, संचालन कायर् वुफशलता, कच्चे माल की उपलब्िध्, विकास प्रत्याशा, प्रतियोगिता का स्तर, मुद्रा स्पफीति। अभ्यास बहुविकल्पीय प्रश्न 1.वित्त का सबसे सस्ता ड्डोत हैμ ;कद्ध )णपत्रा ;खद्ध समता अंश पूँजी ;गद्ध पूवार्िाकार अंश ;घद्ध प्रतिधरित उपाजर्न। 2. पुराने संयंत्रा को उन्नतिशील बनाने के लिए एक नए तथा आधुनिक संयंत्रा के अिाग्रहण का निणर्य हैμ ;कद्ध वित्तीय निणर्य ;खद्ध कायर्शील पूँजी निणर्य ;गद्ध निवेश निणर्य ;घद्ध लाभांश निणर्य। 3.यदि अन्य बातें समान रहें तो कर की दर में निगमित लाभ पर वृि होगीμ ;कद्ध )ण अपेक्षावृफत सस्ते होंगे, ;खद्ध )ण अपेक्षावृफत कम सस्ते होंगे, ;गद्ध )णों की लागत पर कोइर् प्रभाव नहीं होगा, ;घद्ध हम वुफछ नहीं कह सकते। 4.पितृसुलभ उच्च विकसित वंफपनियाँ पसंद करती हैंμ ;कद्ध कम लाभांश देना ;खद्ध अिाक लाभांश देना ;गद्ध लाभांश पर विकास विचार का कोइर् प्रभाव नहीं होता है ;घद्ध इनमें से कोइर् नहीं। 5.वित्तीय उत्तोलन अनुवूफल कहलाता है यदिμ ;कद्ध )णों की लागत से निवेश पर आय कम होती है ;खद्ध निवेश पर आय, )णों की लागत से ऊँची है ;गद्ध )ण आसानी से उपलब्ध है ;घद्ध यदि विद्यमान वित्तीय उत्तोलन की मात्रा कम है। ीं )ण ˘6.ऊँचा )ण समता अनुपात ट्ट˙ परिणाम में होता हैμट्ठ समता˚ ;कद्ध निम्नतर वित्तीय जोख्िाम ;खद्ध उच्चस्तरीय संचालन जोख्िाम;गद्ध उच्चस्तरीय वित्तीय जोख्िाम ;घद्ध उच्चस्तरीय प्रतिअंश आय ;इर्.पी.एस.द्ध। 7.उच्चस्तरीय कायर्शील पूँजी का सामान्यतः परिणाम होता हैμ ;कद्ध उच्चतम चालू अनुपात, उच्चतम जोख्िाम तथा ऊँचा लाभ ;खद्ध निम्नतम चालू अनुपात, उच्चतम जोख्िाम तथा लाभ ;गद्ध उच्चतम समता, निम्नतम जोख्िाम तथा निम्नतम लाभ ;घद्ध निम्नतम समता, निम्नतम जोख्िाम तथा उच्चतम लाभ। 8.चालू संपिायाँ वे संपिायाँ होती हंै जो रोकड़ में परिवतिर्त होती हैंμ ;कद्ध छः महीने के अंदर ;खद्ध एक साल के अंदर ;गद्ध एक से तीन साल के अंदर;घद्ध तीन से पाँच साल के अंदर। 9.वित्तीय नियोजन में घटित होता हैμ ;कद्ध समता अंशों के निगर्मन की सहायता से बाह्य देनदारियों को कम - से - कम करता है ;खद्ध यह दशार्ता है कि पफमर् के पास पयार्प्त मात्रा में आवश्यकतानुसार नििा है अतः कोषों से संबंिात कोइर् परेशानी नहीं है ;गद्ध इस बात का आश्वासन कि पफमर् के पास न तो कोषों की कमी है और न ही कोषों की भरमार है ;घद्ध नििा से क्या संभव है वही करना तथा यह दिखलाना कि पफमर् अपने प्रबंध के अधीन है। 10.प्रति अंश उच्चतम लाभांश संबंिात हैμ ;कद्ध ऊँची आय, ऊँचा रोकड़ प्रवाह, अनुपयोग आय तथा उच्चतम विकास अवसर ;खद्ध ऊँची आय, ऊँची रोकड़ प्रवाह, स्िथर आय, तथा ऊँचे विकास अवसर ;गद्ध ऊँची आय, ऊँचा रोकड़ प्रवाह, स्िथर आय तथा निम्नतम विकास अवसर ;घद्ध ऊँची आय, निम्न रोकड़ प्रवाह, स्िथर आय तथा निम्नतम विकास अवसर। 11.स्थाइर् संपिायों की वित्त व्यवस्था होनी चाहिएμ ;कद्ध दीघर्कालीन दायित्वों से ;खद्ध अल्पकालीन दायित्वों से ;गद्ध दीघर्कालीन तथा अल्पकालीन दायित्वों के मिश्रण से। 12.एक व्यवसाय की चालू संपिायों की वित्त व्यवस्था होनी चाहिएμ ;कद्ध केवल चालू दायित्वों से ;खद्ध केवल दीघर्कालीन दायित्वों से ;गद्ध दीघर्कालीन तथा अल्पकालीन दोनों से अंशतः। लघु उत्तरीय प्रश्न 1.पूँजी संरचना से क्या तात्पयर् है? 2.वित्तीय नियोजन के दो उद्देश्यों को स्पष्ट कीजिए। 3.वित्तीय जोख्िाम क्या है? इनका अभ्युदय वैफसे होता है? 4.‘चालू संपिायों’ को परिभाष्िात कीजिए तथा उनके कोइर् चार उदाहरण दीजिए। 5.वित्तीय प्रबंधन तीन विस्तृत वित्तीय निणर्यों पर आधरित होता है, ये क्या हैं? 6.वित्तीय प्रबंधन का मुख्य उद्देश्य क्या है? संक्षेप में समझाइए। 7.स्पष्ट कीजिए कि कायर्शील पूँजी एक व्यवसाय की तरलता एवं लाभदायकता दोनों को प्रभावित करती हंै। दीघर् उत्तरीय प्रश्न 1.कायर्शील पूँजी का क्या आशय है? इसकी गणना वैफसे की जाती है? कायर्शील पूँजी कीआवश्यकता को निधार्रित करने वाले पाँच महत्त्वपूणर् निधार्रकों को स्पष्ट कीजिए। 2.पूँजी संरचना निणर्य निश्िचत रूप से जोख्िाम - आय का आशावादी संबंध है। टिप्पणी कीजिए। 3.पूँजी बजटिंग निणर्य एक व्यवसाय के वित्तीय भाग्य को बदलने में सामथ्यर्वान होता है। क्यों अथवा क्यों नहीं? 4.लाभांश निणर्य को प्रभावित करने वाले घटकों को समझाइए। 5.‘समता पर व्यापार’ मद को समझाइए। एक व्यावसायिक संगठन द्वारा इसे क्यों तथा वैफसे अपनाया जा सकता है? समस्या ‘एस’ लिमिटेड भारत में अपने प्लांट में स्टील का उत्पादन कर रही है। अपने उत्पादों की माँग के आधर पर यह 7 - 8 प्रतिशत आथ्िार्क विकास कर रही है तथा स्टील की माँग बढ़ती जा रही है। बढ़ती माँग को देखते हुए यह एक नए प्लांट की स्थापना पर विचार कर रही है। इस प्लांट को स्थापना पर 5000 करोड़ रुपए की आवश्यकता है तथा 500 करोड़ रुपए की कायर्शाल पूँजी की आवश्यकता होगी। प्रश्न 1.इस वंफपनी के लिए वित्तीय प्रबंध्न की क्या भूमिका और उद्देश्य हैं? 2.इस वंफपनी के लिए वित्तीय योजना का क्या महत्त्व है? अपने उत्तर की पुष्िट के लिए एक काल्पनिक योजना दीजिए। 3.वह कौन से कारक हैं, जो इस वंफपनी की पूँजी संरचना को प्रभावित करेंगे? 4.यह ध्यान में रखते हुए कि यह एक अत्यध्िक सघन पूँजी वाली वंफपनी है, आपके उत्तर के समथर्न में कौन से कारक प्रभाव डालेंगे? परियोजना कायर् 1.एक ही प्रकार का व्यवसाय करने वाली दो या अिाक वंफपनियों की वाष्िार्क रिपोटर् लें तथा उन वंफपनियों की बैव साइट या अन्य श्रोतों पर इन आँकड़ों को पहुँचाएँ तथा उनके पूँजी ढाँचे की तुलना करें। उनमें आपस के अंतभेर्दों का विश्लेषण करें। इसके लिए आप अनुपातिक विश्लेषण का उपयोग कर सकते हैं। अपने अध्यापक की सहायता से अपनी कक्षा में इन खोजों पर चचार् करें तथा रिपोटर् तैयार करें। 2.वाष्िार्क रिपोटो± जिनका आप उपयोग करते हैं, वंफपनी की कायर्शील पूँजी का विश्लेषण करें। आप अल्पकालीन )णशोधन क्षमता अनुपात का उपयोग कर सकते हैं। जिन वंफपनियों का आप अध्ययन कर रहे हैं उनकी व्यवसायिक संचालन घटना चक्र का अध्ययन करें तथा उनकी सुदृढ़ता पर एक रिपोटर् तैयार करें। अपने अध्यापक की सहायता से अपनी कक्षा में इन खोजों पर चचार् करके रिपोटर् तैयार करें।

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