अध्याय उद्यमिता विकासअध्िगम उद्देश्य इस अध्याय के अध्ययन के पश्चात् आप - ऽ शब्द ‘उद्यमी’, ‘उद्यमिता’ एवं ‘उद्यम’ का अथर् बता सवेंफगेऋ ऽ उद्यमिता एवं प्रबंधन में अंतर तथा उद्यमिता के लक्षणों का विवेचन कर सवेंफगेऋ ऽ उद्यमिता की आवश्यकता स्पष्ट कर सवेंफगेऋ ऽ उद्यमी के कायर् एवं उसकी भूमिका को व£णत कर सवेंफगेऋ ऽ उद्यमीय सक्षमता की पहचान कर सवेंफगेऋ ऽ उद्यमिता विकास की प्रिया को अनुसरित करके उसे स्पष्ट कर सवेंफगेऋ ऽ उद्यमिता में प्रवेशाथर् मूल्यों, अभ्िावृिायों एवं अभ्िाप्रेरणा प्रवििायों की पहचान कर सवेंफगे। विरचो की संतति श्री नारायण रेंी एम.एस.सी. आॅगेर्निक वैफमिस्ट्री, 1981 तक एक पफामार्स्यूटीकल ;औषधीयद्ध वंफपनी में कायर्रत रहे, जहाँ उन्होंने एक अणु ;माॅलिक्यूलद्ध विकसित किया। वे इस अणु का व्यापारिक उपयोग करने के लिए एक लघु स्तरीय उद्यम स्थापित करने का विचार कर रहे थे जो इससे भी छोटा हो जिससे उन्होंने प्रारंभ किया था। वस्तुतः वे दो डाॅक्टरों से मिले जो अभी हाल में गल्पफ देश से वापिस आये थे और वुफछ उत्पादन संबंधी कायर् की तलाश में थे जिसमें वे अपनी वहाँ पर की गइर् बचत को निवेश करना चाहते थे। ;गल्पफ की घटनाओं को ध्यान में रखकरद्ध। रेंी का विचार उन्हें उचित लगा। अतः इच्छुक उद्यमियों का मिलन हुआ, क्योंकि जहाँ इच्छा प्रबल हो वहाँ मागर् अवश्य ही प्रशस्त होता है और उद्यम का शुभारंभ हुआ। सभी तकनीकी, आथ्िार्क, वाण्िाज्ियक तथा वित्तीय संभावनाओं का विस्तृत अध्ययन करने के उपरांत अंत में अणु से भारी मात्रा में औषिायों के निमार्ण करने का निश्चय किया गया। सन् 1982 में ‘विरचो लैबोरेटरीज’ का 28 लाख रुपए के प्रारंभ्िाक निवेश से बतौर एस.एस.आइर्. का शुभारंभ हुआ। उसके वुफल निवेश में 8 लाख रुपए की अंशदान तीनों प्रवतर्कों ने बराबर - बराबर किया तथा 20 लाख रुपए की नििा आंध्र - प्रदेश स्टेट पफाइनेंस काॅरपोरेशन ;ए.पी.एस.एपफसीद्ध द्वारा लगाइर् गइर्। परियोजना का कायार्न्वयन अत्यंत चुनौतीपूणर् था क्योंकि स्थापना के लिए भूमि अिाग्रहण, पैफक्टरी निमार्ण, उपस्कर अथार्त्् साजो सामान का क्रय, आपूतिर्कतार्ओं से समझौते, भावी व्रेफता, पयार्वरण तथा ड्रग वंफट्रोल एवं अन्य संस्थाओं से अनापिा प्रमाण - पत्रा प्राप्त करना, सभी व्यवस्थाएँ करना अत्यंत जटिल कायर् थे। ये वही नारायण रेंी थे जो प्रारंभ्िाक काल में उद्यम के पहिए की घुरी की भाँति कायर् करते रहे। बाद में सशक्त प्रबंधन दल कायर्रत हुआ। दृढ़तापूणर् बल तथा 412 विषय प्रवेश अन्य आथ्िार्क ियाओं ;चाहे वह नौकरी अथवा अन्य कोइर् भी धंधा होद्ध से भ्िान्न उद्यमिता अपना स्वयं का व्यवसाय स्थापित करने की एक प्रिया है। व्यक्ित - विशेष जो व्यवसाय की स्थापना करता है उसे उद्यमी कहते हैं। प्रिया की इस देन ;उत्पादद्ध अथार्त् स्थापित व्यवसायिक इकाइर् को उद्यम कहा जाता है। आप अंग्रेजी व्याकरण के ‘विषय - िया - प्रयोजन ;वि.ि.प्र.द्ध के संबंधीय सूत्रा से इन शब्दों को भली भाँति नीचे दिए गए चित्रा से समझ सकते हैं। यह एक दिलचस्प बात है कि उद्यमिता उद्यमी को स्व - रोशगार प्रदान करने के साथ - साथ रोशगार एवं अन्य धंधों से संबंिात दो आथ्िार्क ियाओं को सृजित करती है और इनके विकास के अवसर भी प्रस्तुत करती है। ;क्या आप सोच सकते हैं कि ऐसा क्यों और किस प्रकार है?द्ध इतना ही नहीं प्रत्येक व्यवसाय दूसरे अन्य व्यवसायों को भी बढ़ावा देने का कायर् करते हैं। कच्चे माल एवं अन्य आवश्यक सामगि्रयों का आपूरक, सेवा प्रदायक - यात्रा एवं उद्यमी आवागमन साधन, वुफरियर, तार, डाकखाना, संदेश वाहन साधन, वितरक, मध्यस्थ, विज्ञापन संस्थाएँ, लेखांकन संस्थाएँ, एडवोकेट आदि। इस प्रकार इस प्रिया में उद्यमिता राष्ट्र के समूचे आथ्िार्क विकास में एक अहम कड़ी के रूप में उभर कर हमारे सम्मुख प्रस्तुत होता है। संपूणर् आ£थक विकास की परियोजना में इसकी महत्त्वपूणर् भूमिका का अवलोकन करने के उपरान्त यह ध्यान देना रोचक लगता है कि बहुत से व्यक्ित अपना पेशा ही उद्यमिता को चुनते हैं बल्िक पारम्परिक रूप से यह दृढ़ विश्वास भी था कि उद्यमी जन्म से ही होते हैं। आथ्िार्क विकास की संपूणर् परियोजना में इसकी प्रदत्त महत्त्वपूणर् भूमिका होते हुए भी यह अत्यंत ही नोट करने के लिए रोचक लगता है कि बहुत से व्यक्ित उद्यमिता को अपना जीवन यापन का माध्यम नहीं चुनते। परम्परागत रूप में यह विश्वास किया जाता था उद्यमी जन्म से ही होते हैं। अथार्त् कोइर् भी व्यक्ित पैदाइसी उद्यमी बनकर होता है। कोइर् भी समाज जन्म से उद्यमी पैदा होने वाले संयोग की प्रतीक्षा नहीं कर सकता कि उस समय उद्यमव्यक्ित - विशेष/कतार् प्रवि्रफया/कायर् निगर्त/उत्पाद विषय ;वि.द्ध वि्रफया ;वि्रफ.द्ध प्रयोजन ;प्र.द्ध वि.ि.प्र. अनुरूपता उद्यमिता - सब वुफछ आपके हाथ एक उद्यमी जन्म लेगा तथा विकासशील योजनाओं का अनुसरण किया जाएगा। वास्तव में आथ्िार्क विकास की योजनाएँ वुफछ पफलदायी होती हैं, अन्यथा यह समझना कि उद्यमिता विकास जानबूझकर लोगों को जागरूक करने की प्रिया है जिससे लोग अल्प आयु में ही उद्यमिता को जीवन यापन के लिए उन परिस्िथतियों में निमार्ण कर सवेंफ तथा वे एक उद्यमी बन सवेंफ। जब आप इसका चयन करते हैं तब आप एक काम सुलभ कराते हैं न कि काम चाहने वाले। इसके अतिरिक्त आप दूसरे वित्तीय तथा मनोवैज्ञानिक अतिथ्िायों का उपभोग भी करते हैं। यदि उद्यमिता के विषय में गंभीरता से विचार किया जाए तो हम पाते हैं कि उद्यमिता निश्िचत रूप से एक व्यक्ित को आकांक्षाओं के अनुरूप एक उद्यमी बनाने में महत्त्वपूणर् योगदान प्रदान करती है तथा इस भावना को नकारती है कि उद्यमी जन्म से पैदा होते हैं। उद्यमिता की अवधारणा जैसा कि आप समझते हैं कि उद्यमिता उत्पादन के चार मुख्य कारकों में से एक है। अन्य तीनों में भूमि, श्रम तथा पूँजी है। यह जानकर आपको आश्चयर् होगा कि जहाँ तक शब्द उद्यमिता से प्रफांस में अभ्युदय का प्रश्न है ;यह िया ‘एन्टरप्रेन्डे’ से निकला है जिसका शाब्िदक अथर् बीड़ा उठाना है।द्ध जिसका संबंध अथर्तंत्रा से न होकर सैनिक अभ्िायानों की कायर्वाहियों से है जिसमें सैन्य तंत्रा - ;मानवीय हलचल तथा मशीनों की समयानुसार सुलझनाद्ध आदि सम्िमलित होते हैं। ऐतिहासिक रूप में यु( आथ्िार्क पुनः निमार्ण से होते हैं। यह विस्मयकारक नहीं है कि सैनिक अवधारणाओं का उपयोग अथर्तंत्रा तंत्रा एवं प्रबंध दोनों में होता है। यह बता देना कि यु( कभी - कभी ही होते हैं तथा बड़े अंतराल में होते हैं, लेकिन आज की प्रतियोगिता की दुनिया में उद्यमियों के यु( प्रतिदिन होते हैं। आज नये उत्पाद विकसित करने के लिए, नये बाशारों की खोज करने के लिए, तकनीक को आधुनिक बनाने के लिए तथा बाशार संबंधी योजनाओं के नवीनीकरण आदि के लिए लगातार विस्मयकारी दबाव नित नये बने रहते हैं। ‘उद्यमी’ शब्द का सवर्प्रथम 18वीं शताब्दी में प्रफांसीसी अथर्शास्त्राी रिचाडर् वैफन्टीलौंन ने अथर्शास्त्रा में परिचय दिया, अथार्त् ‘उद्यमी’ शब्द को जन्म दिया। उसने अपने लेख में औपचारिक रूप से उद्यमी शब्द को इस तरह से परिभाष्िात किया - फ्एक प्रतिनििा जो उत्पादन के साधनों को निश्िचत मूल्य पर क्रय करता है तथा भविष्य में उनका अनिश्िचत मूल्य पर विक्रय करने के लिए निमार्ण करता है।य् तब से अथर्शास्त्रा में इस शब्द के उपयोग के अवलोकन से दृष्िटपात होता है कि उद्यमिता में जोख्िाम / अनिश्िचतता, उत्पादन स्रोतों का सामंजस्य, नवीनीकरण की प्रस्तावना तथा पूँजी व्यवस्था समाविष्ट होती है। उद्यमिता की परिभाषा - ‘उद्यमिता एक क्रमब( उद्देश्यपूणर् तथा रचनात्मक िया है ताकि आवश्यकताओं को उजागर किया जा सके तथा ड्डोतों को गतिशील बनाने तथा उत्पादन को ग्राहकों के मूल्यानुसार सुपुदर्गी देने के विचार से संगठित करने, निवेशकों को आय दिलाने तथा व्यवसाय स्वयं को व्यापारिक जोख्िामों तथा संबंिात अनिश्िचताओं के अनुरूप लाभ सुलभ कराने में सहायक होती है यह परिभाषा उद्यमिता की विशेषताओं की ओर संकेत करती है। अब हम अपना ध्यान भी उनकी ओर आकष्िार्त करते हैं। उद्यमिता की विशेषताएँ उद्यमी, उद्यमिता तथा उद्यम की विचारधारा के निरूपण में विषय, िया तथा उद्देश्य ;एस.वी.ओद्ध में हम पाते हैं कि उद्यमिता एक व्यवसाय के स्थापन की प्रिया है। किसी व्यवसाय की आश्चयर्जनक चमक की प्रिया में सभी अपने को असहाय पाते हैं। कोइर् भी व्यक्ित अपने जीवनयापन के लिए सवर्प्रथम अपने व्यवसाय का चुनाव वैफसे करता है? वह वैफसे बाशार के सुअवसरों का बोध करता है? वह उसकी सीढि़याँ चढ़ने के लिए वैफसे साहस जुटाता है? तथा वैफसे आवश्यक ड्डोतों को गतिशील बनाता है? सामान्य भाषा में प्रतिभाशाली व्यक्ितयों के लिए उद्यमिता का आश्रय एकमात्रा सुरक्ष्िात स्थान समझा जाता है। निम्नलिख्िात अनुच्छेदों में हमारा प्रयत्न यही होगा कि उद्यमिता को एक पेशा के रूप में निरूपित किया जाए जिसकी आपको अभ्िालाषा है। याद रहे संसाधन सीमित होते हैं, महत्वाकांक्षाएँ अनंत हैं आप आज की अपनी स्िथति एवं संसाधनों से वुफछ बड़े या महान स्तर की आकांक्षा कर सकते हैं। अतः आज ही प्रारंभ करें। लेकिन याद रखें कि महत्त्वाकांक्षाओं से तात्पयर् इच्छाओं को िया द्वारा बढ़ावा देना है। 1. नियमित िया - उद्यमिता कोइर् रहस्यमय उपहार या जादू नहीं है, और न ही कोइर् ऐसी घटना है जो अनायास स्वतः ही घट जाती है। यह एक नियमब(, कदम - दर - कदम चलने वाली तथा उद्देश्यपूणर् िया है। इसकी वुफछ मनः स्िथतियाँ, चातुयर् तथा अन्य ज्ञान एवं योग्यता संबंधी आवश्यकताएँ होती हैं जिन्हें उपाजिर्त, हृदयांगम तथा विकसित किया जा सकता है। जिसके लिए दोनों प्रकार की औपचारिक तथा व्यावसायिक श्िाक्षा की मदद ली जा सकती है तथा उद्यमिता विकास 415 देख - रेख एवं कायर्नुभव द्वारा भी कायर् संपन्न किया जा सकता है। उद्यमिता की इस सूझबूझ वाली प्रिया, इस पौराण्िाक भ्रम को दूर करने में निणार्यक का कायर् करती है कि उद्यमी पैदा ही होते है न कि तैयार किये जाते हैं। दूसरे शब्दों में, उद्यमिता के अध्ययन एवं मनन के उपरांत यह सि( हो जाता है कि उद्यमी तैयार किये जाते हैं और यह िया निरन्तर चलती रहती है। 2. वििा - सम्मत तथा उद्देश्यपूणर् िया - उद्यमिता का उद्देश्य वििा - सम्मत व्यापार करने से है। यह ध्यान रखना अत्यंत महत्त्वपूणर् है कि किसी का यह प्रयत्न कि अवैध कायर्वाही को उद्यमिता के आधार पर वैध ठहराएँ कि उद्यमिता केवल जोख्िामों को आवश्यक बनाती है अतः अवैध व्यापार किया जाए, ठीक नहीं है वास्तव में उद्यमिता का उद्देश्य व्यक्ितगत लाभ तथा सामाजिक हित में मूल्यों का निमार्ण करना है। अतः उद्यमिता एक वििा - सम्मत तथा उद्देश्यपूणर् िया है। 3. सृजनात्मक गतिवििा - उद्यमिता में मूल्यों की रचना होती है इस अथर् में यह सृजनात्मक गतिवििा है। आपको कृतज्ञ होना चाहिए कि उद्यमिता विहीन ‘विषय’, ‘साधन’ नहीं बन सकता। उत्पादन के विभ्िान्न घटकों को एकत्रिात करके एक उद्यमी वस्तुओं का उत्पादन करता है तथा सेवाएँ मुहैया कराता है ताकि समाज की आवश्यकताओं की पूतिर् की जा सके। उद्यमिता की प्रत्येक कायर्वाही से आय तथा धन में वृि होती है। जब नये - नये उत्पादों के अभ्युदय से वतर्मान में कायर्शील उद्योग नष्ट भ्रष्ट हो जाते हैं। उदाहरण के तौर पर िारोक्स मशीनों के आगमन ने काबर्न पेपर उद्योग को नष्ट कर दिया। मोबाइल टेलीपफोन के आने से वतर्मान टेलीपफोनों को खतरा पैदा हो गया है। अथर्व्यवस्था को शु( लाभ का उपाजर्न तो उद्यमवृिा इस प्रकार की ियाओं की आपूतिर् ठीक उसी प्रकार करती है जैसा कि रचनात्मक विनाश की कायर्वाही। उद्यमिता इस अथर् में रचनात्मक भी है क्योंकि इसमें नवोत्पाद, - नये उत्पादनों का परिचय, नये बाशारों की खोज तथा निवेश की आपूतिर्, श्िाल्पशास्त्राीय नयी खोज तथा नये संगठनात्मक रूपों का अच्छा कायर् करने के लिए विकास जो आधुनिक की अपेक्षा सस्ता हो, तेज हो एवं परिस्िथति विज्ञान तथा पयार्वरण के लिए कम हानिकार हों, सम्िमलित होते हैं। यह सम्भव है कि विकासशील देशों के उद्यमी मूलरूप में नवोत्पादों के विषय में अग्रणी या नवप्रवतर्क न रहे हों लेकिन यह निश्िचत रूप से कहा जा सकता है कि वे नयी तकनीकों को अपनाने में प्रथम या द्वितीय अवश्य हो सकते हैं। उनकी यह उपलब्िध भी कोइर् कम नहीं कही जा सकती। विकसित विश्व से तकनीकी नकल करना देश के लिए पूणर्तया चुनौती है। एक उद्यमी महिला औद्योगिक तापन के लिए उष्मीय ;थमर्लद्ध पैड जो आश्चयर्जनक मुखवाला हो, को प्रवतिर्त करना चाहती है। उसकी यह इच्छा है कि आज केमिकल तथा चीनी मिलों के मालिक जो परम्परागत रीति से लकड़ी या कोयला जलाकर या तरल पैट्रोलियम गैस का प्रयोग करके बतर्नों को गरम करते हैं उसके ऊपर यह उत्पाद अिाक उत्तम होगा, वेंयह सि( करना चाहती है। इसके अतिरिक्त उसे इस भावना से भी कोइर् परेशानी नहीं है कि इसका अविष्कार यहाँ नहीं किया गया था। चक्र के पुनः आविष्कृत करने की भी आवश्यकता नहीं है। भूमण्डलीय इलेक्ट्राॅनिक मुख्िाया, सोनी ने ट्रांजिस्टर का आविष्कार नहीं किया था। लेकिन उन्होंने मनोरंजन उत्पाद तैयार करने में ट्रांजिस्टर का उपयोग किया। जो आज विश्व में अग्रणी है। 4. उत्पादन का संस्थान - उत्पादन में उपयोगिता का सृजन किया जाता है उसमें रूप उपयोगिता, स्थान उपयोगिता, समय उपयोगिता तथा अिाकार उपयोगिता आदि हो सकती है। जिसके लिए उत्पादन के विभ्िान्न घटकों जैसे भूमि, श्रम, पूँजी तथा तकनीक की संयुक्त रूप में आवश्यकता होती है। एक उद्यमी अपनी प्रतििया से इन साधनों को गति देकर एक उत्पादक उद्यम या पफमर् में व्यावसायिक सुअवसरों का लाभ उठाकर उनको मूतर् रूप देता है अथार्त् उत्पिा के साधनों से सुअवसरों का लाभ उठाता है। यहाँ यह बतलाना अतिआवश्यक है कि उद्यमी के पास इनमें से कोइर् भी साधन नहीं होता है। उसके पास केवल एक ‘विचार’ होता है जिसे वह उत्पिा के साधनदाताओं में प्रसारित करता है। एक पूणर् विकसित वित्तीय आथ्िार्क प(ति में उसे वित्तीय संस्थानों को संतुष्ट करना होता है तथा पूँजी की व्यवस्था इस प्रकार करता है ताकि उपक्रमों, माल, उपयोगिताओं ;जैसे बिजली तथा पानीद्ध तथा तकनीक आदि की आपूतिर् आवश्यकतानुसार अबाध गति से चलती रहे। एक उत्पादन संगठन के लिए किन - किन चीजों की आवश्यकता होती है, वे कब आवश्यक होगी तथा उनकी पूतिर् कब और कहाँ से संभव होगी तथा उनका अिाकतम उपयोग वैफसे संभव होगा। इन सब बातों की व्यवस्था करना उद्यमी का कत्तर्व्य होता है। यथासम्भव उनमें संयोजन भी करता है। एक उद्यमी इन उत्पिा के साधनों का उद्यम के हित में अिाकतम उपयोग के लिए चातुयर्पूणर् वातार्लाप भी करता है। उत्पादन संगठन में उत्पाद विकास तथा बाशार का उत्पाद के लिए विकास सम्िमलित होते हैं। इसके अतिरिक्त एक उद्यमी आवश्यक उत्पादों की पूतिर् के ड्डोतों को भी विकसित करता है। उदाहरण स्वरूप यदि एक आॅटोमोबाइल निमार्ता उद्यमिता में आय एवं उसकी जोख्िाम की समझ उद्यमिता का प्रतिपफल गण्िातीय संभाव्यता म्;त्1द्ध पर आधरित है जिसमें अधेलेख ;पद्ध यह दशार्ता है कि किसी भी व्यावसायिक निणर्य की कइर् संभावित प्रतिपफल दरें हो सकती हैं, जैसे कि 20, 18, 17 एवं 15 प्रतिशत। वास्तव में किसी भी निवेश पर बड़ी संख्या में वैकल्िपक प्रतिपफल हो सकते हैं। सरल बनाने के लिए हम यहाँ केवल चार अभ्युक्ितयों को ले रहे हैं। माना कि इन सभी प्रतिपफलों की संभाव्यता समान है। ऐसा होने पर म्;त्द्ध इन प्रतिपफलों की औसत होगी। अथार्त् म्;त्1द्ध त्र φ त्र 20 ़ 18 ़ 17 ़ 15ध्4 त्र 17ण्5 प्रतिशत। दूसरे शब्दों में उद्यमिता निणर्यों का संभावित प्रतिपफल यहाँ 17.5 प्रतिशत है। जोख्िाम को इस संभाव्यता से रूपान्तर की सीमा के रूप में मापा जा सकता है। और अिाक उचित रूप से देखें तो यह प्रतिपफल वितरण का मानक विचलन होगा अथार्त् व्त्1। इस उदाहरण में यह 1.8 प्रतिशत है। दूसरे शब्दों में वास्तविक अथवा वसूल किया गया लाभ संभावित लाभ से 1.8 प्रतिशत तक भ्िान्न हो सकता है। इससे स्पष्ट हुआ कि मानक विचलन जितना अध्िक होगा उतनी ही अध्िक जोख्िाम होगी। ऐसा कहा जाता है कि जितनी अिाक जोख्िाम उतना ही अध्िक लाभ। इसका अथर् इस प्रकार है - ;कद्ध कोइर् भी समझदार व्यक्ित एक निधर्रित जोख्िाम के बदले संभावित लाभ से अध्िक अथवा उसके बराबर काा लाभ चाहेगा। ;खद्ध एक निधर्रित लाभ के लिए कोइर् भी समझदार व्यक्ित कम जोख्िाम उठाना चाहेगा। ;गद्ध यदि जोख्िाम में वृि होती है तो लाभ में कम से कम उसी अनुपात में वृि होनी चाहिए। ;घद्ध अब क्योंकि जोख्िाम कम और अध्िक दोनों हो सकता है अथार्त् प्राप्त लाभ संभावित लाभ से अिाक भी हो सकता है और कम भी, अत्यध्िक आशावादी उद्यमियों का यह विश्वास रहता है कि रूपान्तर केवल ऊँची ओर होगा। इकाइर् या बगर्र/पीशा बनाने वाली इकाइर् को एक साथ लाने की बात हो, उत्पाद के विकास के लिए बाशार का उत्थान आदि के लिए आपूतिर्कतार्ओं का एक संगठन विकसित करना तथा उन तत्वों का जो उत्पादन में साथ - साथ कायर् करते हैं ये सभी ियाएँ एक उद्यमी द्वारा ही की जाती है अतः उद्यमिता की उत्पादन का संस्थान के रूप में भी एक विशेष प्रिया होती है। 5. जोख्िाम उठना - एक उद्यमी अपने उद्यम के हिताथर् निश्िचत आपूतिर् के लिए विभ्िान्न प्रकार की संविदाएँ करता है तो साथ ही यदि भविष्य में कोइर् हानि हो तो उसकी जोख्िाम को उठाने का वायदा भी करता है। इस प्रकार भूमिधारी को भूमि का किराया मिलता है, पूँजीपति को पूवर् निधार्रित दर से ब्याज मिलता है, श्रम को पूवर् निधार्रण अनुसार वेतन तथा मशदूरी प्राप्त होती है। लेकिन उद्यमी को लाभ का कोइर् आश्वासन नहीं होता है। यहाँ यह बतलाना आवश्यक होगा कि किसी भी उद्यम का पूणर् विनाश असम्भव होता है क्योंकि प्रत्येक उद्यमी अपनी क्षमतानुसार, वह कोइर् कसर नहीं छोड़ता कि संस्था को कोइर् हानि पहुँचे अथार्त् सभी वुफछ वह करता है ताकि संस्था उन्नति करे तथा लाभ अजिर्त करे। उदाहरणस्वरूप - वह अपने उत्पाद के विक्रय के लिए ग्राहकों से पहले से ही प्रसंविद करके रखता है। परिणामतः वह उत्पादकों या विव्रेफताओं जो अन्य उत्पादों में सौदा करते हैं संविदाएँ करतेंहै। इसका परिणाम यह होता है कि जोख्िाम उठाने से उतना लाभ नहीं होता जितने की अपेक्षा की जाती है। लेकिन लाभ की आशा अवश्य की जा सकती है। यह विश्वास किया जाता है कि उद्यमी भारी जोख्िाम उठाते हैं यहाँ यह कहना भी उचित ही है कि एक व्यक्ित द्वारा अकेले ही उद्यमिता में अपनी जीवन निधार्रित करना अिाक जोख्िामपूणर् है अपेक्षाकृत जीवन यापन एक कमर्चारी या व्यावसायिक ;पेशेवरद्ध के रूप में निधार्रित किया जाए। क्योंकि कमर्चारी या व्यवसायी के रूप में जीवन काटना कम जोख्िामपूणर् होता है अपेक्षाकृत एक उद्यमी ने कोइर् व्यक्ित अपनी नौकरी को छोड़कर उद्यम प्रारम्भ करने की बात सोचता है तो वह यह विचार करता है कि क्या मैं वतर्मान में प्राप्त वेतन के बराबर उद्यम में आय प्राप्त कर सवूँफगा या नहीं। एक प्रेक्षक के लिए एक सुव्यवस्िथत रोशगार को छोड़ना एक जोख्िाम भरा कायर् है। लेकिन क्या उस व्यक्ित ने जो जोख्िाम ली है उसकी गणना की है। यह अवस्था एक मोटर साइकिल सवार के समान है जो मौत के घेरे ;वुँफआद्ध में है अथवा एक कलाबाज कलाकार के समान जो एक सवर्फस में काम करता है। जहाँ उसकी भारी जोख्िाम भरे कलाबाजी को देखकर दशर्क विस्मय में है वहीं कलाकार ने पूवर् गणना करके ही जोख्िाम उठाया है। यह गणना उसके प्रश्िाक्षण, चातुथर् तथा प्रिया एवं विश्वास और साहस पर निभर्र करती है। यह कहा जाता है कि उद्यमी लोग परिस्िथतियों के अनुसार ही पफलते - पूफलते हैं, जबकि विषम पक्षपाती तथा सपफलता के विपरीत परिस्िथतियों की संभावना आधी - आधी होती है। उन्हें अपनी क्षमता पर भरोसा होता है और वे 50: 50 अवसरों को 100 प्रतिशत सपफलता में बदल देते हैं। वे उन परिस्िथतियों से बचते हैं जहाँ जोख्िाम अिाक होती है क्योंकि वे विपफल होना नहीं चाहते वे ऐसा वुफछ नहीं करते जैसा कि अन्य लोग करते हैं। वे निम्न स्तरीय जोख्िामों को पसंद नहीं करते क्योंकि व्यवसाय एक जूए की तरह समाप्त हो जाता है। वित्तीय शंवुफ से अिाक जोख्िाम व्यक्ितगत शंवुफ बन जाती है क्योंकि आशानुवूफल निष्पादन का न होना दुःख तथा विनाश का कारण बन जाता है। उद्यमिता की जिन विशेषताओं की विवेचना ऊपर की गइर् है वह विभ्िान्न संदभो± के अनुरूप हैं और इसी प्रकार से उद्यमिता शब्द को विभ्िान्न रूपों में प्रयोग किया गया है जैसे कि कृष्िा, ग्रामीण उद्यमिता, औद्योगिक उद्यमिता, तकनीकि उद्यमिता, नैट उद्यमिता हरित। पयार्वरण अथवा इर्को उद्यमिता, निगमत/पफमो± के बीच अथार्त् इन्टरा उद्यमिता एवं सामाजिक उद्यमिता। वास्तव में उद्यमिता को ‘एक प्रकार का व्यवहार’ माना जाने लगा है जिसमें एक व्यक्ित - ;पद्ध समस्या का अंग न बनकर उसके समाधान का प्रयत्न करता है;पपद्ध व्यक्ितगत सृजनशीलता एवं बुि कौशल का उपयोग कर नवीन समाधानों को विकसित करता है ;पपपद्ध नये - नये अवसरों का लाभ उठाने या पिफर जटिल समस्याओं के समाधन के लिये वतर्मान संसाध्नों से परे की सोचता है ;पअद्ध उसे पूणर् विश्वास है कि वह अपने विचारों से दूसरों को प्रभावित कर लेगा तथा परियोजना के लिये उनकी प्रतिब(ता प्राप्त कर लेगा ;अद्ध कठिनाइयों का सामना करने का उसमें साहस है, वह झटके लगने पर भी टिका रहेगा तथा आशावान बना रहेगा। उद्यमिता एवं प्रबंध्न के बीच संबंध् उद्यमिता व्यवसाय के प्रारंभ तथा उसके नवीनीकरण से जुड़ी है। अथार्त् इसका प्रादुर्भाव व्यवसाय के प्रारंभ के समय होता है। उद्यम को गतिमान व्यवसाय बनाते समय यह वुफछ समय के लिए विलुप्त हो जाता है तथा जब भी उत्पाद बाशार, तकनीकी, ढांचे आदि में परिवतर्न करना होता है तो इसका पुनर्रुत्थान हो जाता है। ऐसा कहा जाता कि हर व्यक्ित उस समय तक एक उद्यमी होता है जब वह कोइर् नया संगठन बनाता है, लेकिन जैसे ही वह व्यवसाय को खड़ा कर लेता है, उसे अन्य लोगों की भाँति चलाने में जुट जाता है तो वह अपनी इस विशेषता को खो देता है। विकसित देशों में इस बात में स्पष्ट रूप से अंतर है कि उद्यमशीलता का वेंफद्र बिन्दु व्यवसाय का प्रारंभ है तो प्रबंध्न इसके दिन प्रतिदिन के प्रचालन पर वेंफित है तथा तवर्फ यह दिया जाता है कि यदि परियोजना अपने परिपक्वता के स्तर को प्राप्त कर चुकी है तो उद्यमियों को इसे छोड़ देना चाहिए तथा प्रबंध्कों को उसका स्थान ले लेना चाहिए। विकासशील देशों में उद्यमिता के लिए स्वामी प्रबंध्क की अवधरणा अध्िक उपयुक्त लगती है क्योंकि यहाँ उद्यमी उपक्रम के दिन प्रतिदिन के परिचालन से भी जुड़ा रहता है। कइर् बार तो व्यवसाय में असपफलता का कारण उनकी प्रबंध् वुफशलता में कमी को माना जाता है। जैसे कि कभी - कभी आवश्यकता पड़ने पर प्रबंध्कों से उद्यमी की भूमिका निभाने की आशा की जाती है उसी प्रकार से उद्यमियों को भी अपने उपक्रम की सपफलता के लिए प्रबंध्न योग्यता को दशार्ना चाहिए। चाहे उद्यमी प्रबंधकों के लिए मागर् प्रशस्त करते हैं या पिफर वह स्वयं प्रबंधन के उत्तरदायित्व को निभाते हैं ‘उद्यमिता’ उद्यमिता विकास 419 एवं ‘प्रबंधन’ में अंतर करना संभव है। कृपया अगले पृष्ठ पर तालिका देखें। उद्यमिता की आवश्यकता देश चाहे विकसित हो या कि विकासशील उद्यमियों की सभी को आवश्यकता है। विकासशील देशों को उद्यमियों की आवश्यकता विकास प्रिया को प्रारंभ करने के लिए होती है तो विकसित देशों को इसकी आवश्यकता विकास को बनाए रखने के लिए होती है। वतर्मान में भारत के संदभर् में सावर्जनिक क्षेत्रा एवं बड़े पैमाने के क्षेत्रा में रोशगार के अवसर कम होते जा रहे हैं, लेकिन भूमंडलीकरण के कारण बहुत बड़ी संख्या में अवसर पैदा हो रहे हैं। ऐसे में उद्यमिता भारत को एक आथ्िार्क महाशक्ित के रूप में ऊँचाइर् तक ले जा सकती है। ;देखें बाॅक्स भारत को उद्यमियों की आवश्यकताद्ध अनेक देशों में राष्ट्रीय स्तर की उद्यमिता ियाओं के वाष्िार्क मूल्यांकन के एक अनुसंधान कायर्क्रम ग्लोबल एन्ट्री प्रन्योरश्िाप माॅनीटर का अध्ययन ;ूूूण्हमउबवदेवतजपनउण्वतह पर जाएँद्ध दशार्ता है आथ्िार्क विकास के स्तर में 33 प्रतिशत तक के अंतर का कारण उद्यमिता ियाओं के स्तर में अंतर है। आथ्िार्क विकास को उद्यमी किस प्रकार से प्रभावित करते हैं? यही हमें आथ्िार्क विकास के संबंध् में उद्यमियों के कायो± की विवेचना के लिए प्रेरित करती है। उद्यम करना उनके कायो± का उद्देश्य है इसीलिए हमें उद्यम के संबंध में उनके कायो± का मूल्यांकन करना चाहिए। उद्यमिता की आवश्यकता उनके आथ्िार्क विकास की प्रिया एवं व्यावसायिक उद्यम से जुड़े कायो± के परिणामस्वरूप पैदा होती है। उद्यमिता एवं प्रबंध्न में अंतर क्रम सं अंतर का आधर उद्यमिता प्रबंध्न 1 वेंफद्रीभू ;पफोकसद्ध व्यवसाय प्रारंभ प्रचलित व्यवसाय के प्रचालन कायर् 2 संसाध्न अनुस्थापन उद्यमी संसाध्नों से विवश नहीं होता। वह संसाध्नों को जुटाता है प्रबंध्क उपलब्ध् संसाध्नों पर निभर्र करता है। 3 कायर् के लिए मागर् अपनाना औपचारिक अनौपचारिक 4 मूल अभ्िाप्रेरणा उपलब्िध् शक्ित 5 उद्यम में पद स्वामी कमर्चारी 6 मूल आथ्िार्क प्रतिपफल लाभ वेतन 7 नवीनीकरण अनुस्थापन पूवर् स्िथति को चुनौती देता है पूवर् स्िथति को यथावत रखता है 8 जोख्िाम अनुस्थापन जोख्िाम उठाता है जोख्िाम उठाने से बचता है 9 निणर्य लेने की प(ति प्रभावोत्पादक तवर्फ, व्यक्ितगत साहस एवं दृढ़ निश्चय द्वारा प्रेरित वियोजक तवर्फ एवं अनुसंधन से प्रेरित 10 कायो± का पैमाना लद्यु व्यवसाय बड़ा व्यवसाय 11 आवश्यक मूल कौशल अवसर की पहचान करना फ्पहल क्षमताय् संसाध्नों का उपयोग संगठन, प(ति निधर्रण एवं एवं परिचालन प्रिया, मानव संसाध्न प्रबंध्न 12 विश्िाष्टीकरण अनुस्थापन सामान्य आचरणकतार् सभी कायो± का ज्ञान रखना एवं सभी कायर् स्वयं करना विशेषज्ञ उद्यमिता विकास भारत को उद्यमियों की आवश्यकता भारत को इनकी दो कारणों से आवश्यकता है - नये अवसरों से लाभ उठाना एवं ध्न तथा नये - नये काम के अवसर पैदा करना। मैकिन्से एण्ड वंफपनी - नाॅसकाॅम की एक रिपोटर् में अनुमान लगाया गया है कि भारत को 2008 तक 87 अरब डाॅलर के आइर्. टी. क्षेत्रा के निमार्ण के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कम से कम 8ए000 नये व्यवसायों की आवश्यकता होगी और अगले 10 वषो± में 11 से 13 करोड़ भारतीय काम की तलाश कर रहे होंगे जिनमें से 8 से 10 करोड़ पहली बार काम करेंगे। यह संख्या आस्ट्रेलिया की वुफल जनसंख्या का सात गुणा है। इसमें ग्रामीण भारत में रोशगार में लगे 23 करोड़ लोगों के 50 प्रतिशत से अिाक छुपे बेरोशगार सम्िमलित नहीं हैं। सरकार एवं अथर्व्यवस्था के पुराने भागीदार जैसे पारम्परिक नियोक्ताओं के लिए भविष्य में रोशगार के इस स्तर को बनाए रखना कठिन होगा इसीलिए उद्यमी ही रोशगार के नए अवसर पैदा कर सकते हैं। ड्डोत - ूूूण्नूबेमेण्मजन ;पफरवरी 2001 को प्रथम बार इंडिया टुडे में प्रकाश्िातद्ध उद्यमियों के आथ्िार्क विकास से जुड़े कायर् आप जानते हैं कि उद्यमी उत्पादन प्रिया की व्यवस्था करते हैं। इसके न होने पर भूमि श्रम एवं पूँजी जैसे सभी संसाध्नों का उपयोग संभव नहीं होगा। वह उत्पादों का आविष्कार/खोज नहीं कर सकते। एक उत्पादक तंत्रा की व्यवस्था के माध्यम से विज्ञान एवं तकनीकी के विकास का वाण्िाज्ियक उपयोग में उनकी भूमि का अन्य संसाध्नों को उत्पादक एवं उपयोगी बनाती है। यहाँ तक कहा जाता है कि यदि उद्यमिता नहीं है तो पौध्े मात्रा खर - पतवार तथा खनिज चट्टðान मात्रा रहेंगे। 1. सकल घरेलू उत्पाद में योगदान - सकल घरेलू उत्पाद में वृि आथ्िार्क विकास का सवर् सामान्य अथर् है। आप जानते हैं कि उत्पादन प्रिया से आय पैदा होती है अथार्त् चाहे कृष्िा हो या विनिमार्ण या पिफर सेवाएँ, उत्पादन की व्यवस्था के द्वारा उद्यमी आय पैदा करते हैं। आप यह भी जानते हैं कि आय को उत्पादन के साध्नों में बाँट दिया जाता है। भूमि के बदले में लगान, श्रम के बदले मजदूरी एवं वेतन, पूँजी के बदले ब्याज दिया जाता है और जो बचा रहता है वह लाभ के रूप में उद्यमी की आय होती है। भूमि एवं पूँजी के स्वामियों को किराया एवं ब्याज मिलता है जबकि अध्िकांश लोगों की आय मजदूरी के रूप में होती है। उद्यमिता का सवार्ध्िक योगदान पूँजी निमार्ण एवं रोशगार के अवसर पैदा करने के रूप में है। हम इसी पर विचार करेंगे। 2. पूँजी निमार्ण - उद्यमिता का निणर्य निवेश का निणर्य होता है जो अथर्व्यवस्था की उत्पादक क्षमता में वृि करता है जिसके परिणामस्वरूप पूँजी का निमार्ण होता है। वास्तव में पूँजी उत्पादन अनुपात ;ब्व्त्द्ध सकल घरेलू उत्पाद एवं पूँजी निमार्ण में संबंध् बताता है या यँू कहें कि पूँजी उत्पाद वृि अनुपात ;प्ब्व्त्द्ध पूँजी निमार्ण में प्रतिशत वृि को मापता है जिसकी आवश्यकता सकल घरेलू उत्पाद में प्रतिशत वृि को ज्ञात करने के लिए होती है। अथार्त यदि कोइर् देश 10 प्रतिशत वाष्िार्क से विकास चाहता है तथा उसका प्ब्व्त् 2.6 है तो 26 प्रतिशत वाष्िार्क से पूँजी निमार्ण सुनिश्िचत करना होगा। पूँजी निमार्ण उद्यमी अपनी स्वयं की बचत को निवेश कर तथा अनौपचारिक रूप से अपने मित्रा एवं सगे संबंिायों की बचत को जुटाकर पूँजी निमार्ण में योगदान करते हैं। इस प्रकार से यह अनौपचारिक ध्न का योगदान बैंक, वित्तीय संस्थान एवं पूँजी बाशार से ध्न जुटाने के औपचारिक माध्यमों का पूरक होता है। 3. रोशगार के अवसर पैदा करना - प्रत्येक नया व्यवसाय विभ्िान्न योग्यता, कौशल एवं गुणों वाले लोगों के लिए रोशगार का ड्डोत होता है। इस प्रकार से उद्यमिता उन लोगों के लिए जीविका का ड्डोत बन जाती है जिनके पास न तो ब्याज कमाने के लिए पूँजी है और न ही लगान अजिर्त करने के लिए भूमि है। जो वुफछ भी वह कमाते हैं न केवल उनकी जीविका है जीवन निवार्ह का साध्न है बल्िक अपने स्वयं, एवं परिवार की जीवन शैली है तथा व्यक्ितगत कायर् संतुष्िट है। इस प्रकार से उद्यमी प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से अनेक लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं। 4. अन्य लोगों के लिए व्यवसाय के अवसर पैदा करना - जब भी कोइर् नया व्यवसाय प्रारंभ होता है तो उससे आगत के आपूतिर्कतार्ओं के लिए ;इसे विपरीत संिा कहते हैंद्ध तथा उत्पाद के विपणन कतार्ओं के लिए ;जिसे अगि्रम संिा कहते हैंद्ध अवसर पैदा होते हैं। यदि आप पेन का उत्पादन करते हैं तो आप रिपिफल निमार्ताओं एवं स्टेशनरी उत्पादों के थोक विव्रेफताओं एवं पुफटकर विव्रेफताओं के लिए अवसर पैदा करते हैं। इन प्रत्यक्ष कडि़यों से आगे कड़ी जुड़ती है। उदाहरण के लिए यदि उद्यमिता विकास भारत के पिछड़े वगर् के समूहों में लघु पैमाने की उद्यमिता पिछड़े वगर् महिला उद्यमी अनुसूचित जाति के उद्यमि अनुसूचित जनजाति के उद्यमी अन्य पिछड़े वगर् से उद्यमी वुफल उद्यमिता में अनुपातन भागीदारी ;»द्ध 8 8 4 49 ड्डोत - भारत में लघु पैमाने के उद्योगों की तीसरी जनगणना, लघु उद्योग मंत्रालय एवं भारत सरकार रिपिफल निमार्ताओं को बड़े अवसर मिलते हैं तो इससे स्याही के उत्पादकों का व्यवसाय बढ़ेगा। सामान्य रूप से इससे माल ढोने वालों, विज्ञापनकतार्ओं की शृंखला बन जाएगी जिसका उन्हें लाभ मिलेगा। उद्यमिता आथ्िार्क िया के स्तर को गति प्रदान करती है। 5. आथ्िार्क वुफशलता में सुधर - आप जानते हैं कि वुुफशलता का अथर् है उसी आगत से और अिाक उत्पादन। उद्यमिता आथ्िार्क कायर्वुफशलता में निम्न तरीके से सुधर लाती है - ;कद्ध प्रिया में सुधर, अपव्यय में कमी, उत्पादन में वृि तथा ;खद्ध श्रम - पूँजी अनुपात में परिवतर्न के माध्यम से तकनीक में सुधर। आप जानते हैं कि यदि श्रमिकों को अच्छे औशार ;पूँजीद्ध उपलब्ध् कराएँगे तो उनकी उत्पादकता में वृि होगी। 6. आथ्िार्क गतिविध्ियों के स्वरूप एवं क्षेत्रा में वृि - विकास का अथर् जो वुफछ है उसी में वृि करना अथवा उसको और अध्िक श्रेष्ठ बनाना ही नहीं है बल्िक इसका दूसरा तथा अिाक निणार्यक अथर् है आथ्िार्क ियाओं का भौगोलिक, क्षेत्राीय एवं तकनीकी क्षेत्रों में विस्तार आप यह भी जानते हैं कि अविकसित देश माँग एवं पूतिर् के दुष्चक्र में पफँसे हुए हैं। उद्यमी इस चक्र में सेंध् लगाकर इसे तोड़ देते हैं। उदाहरण के लिए, घरेलू उत्पादन को नियार्त रूपक बनाना एवं यथानुवूफल व्यवस्था करना। अतः उत्पादन ;एवं उससे आय पैदा करनाद्ध अपयार्प्त घरेलू माँग के दबाव में नहीं है ;दुष्चक्र का माँग का पहलूद्ध। वतर्मान में भारत विभ्िान्न उत्पादों के वैश्िवक बाशार का विनिमार्ण वेंफद्र बनने जा रहा है। आथ्िार्क विकास पर पूतिर् पक्ष का भी दबाव है जिसके कारण माँग घरेलू हो अथवा विदेशी उसकी पूतिर् की क्षमता में कमी है। उद्यमी देश की उत्पादक क्षमता में बढ़ोतरी के लिए स्थानीय एवं विदेशी संसाध्नों की व्यवस्था करते हैं। भारतीय बहुराष्ट्रीय दिग्गज अब तेजी से वास्तविकता बनते जा रहे हैं। उद्यमी आथ्िार्क वगर् में परिवतर्न के माध्यम से आथ्िार्क विकास ला रहे हैं। आप जानते हैं कि जैसे - जैसे आथ्िार्क विकास होता है कृष्िा से पैदा सकल घरेलू उत्पाद का प्रतिशत कम होता जाता है तथा उद्योग एवं सेवा के क्षेत्रा का उत्पाद प्रतिशत बढ़ता जाता है। उद्यमी पुराने पड़ते जा रहे क्षेत्रों से हटकर नये लाभकारी क्षेत्रों में निवेश द्वारा अथर्व्यवस्था भारतीय ैडम् मंडियाँ लघु पैमाने के औद्योगिक ;ैैप्द्ध क्षेत्रा देश के औद्योगिक उत्पादन में 40 प्रतिशत का योगदान कर एवं प्रत्यक्ष नियार्त में 35 प्रतिशत का योगदान कर भारतीय औद्योगिक विकास की महत्त्वपूणर् उपलब्िध्यों का कारण सि( हुआ है। ऐसे अनेक समूह हैं जो दशाब्िदयों से और वुफछ तो शताब्िदयों से उपस्िथत हैं। जो ैैप् क्षेत्रा में महत्त्वपूणर् भूमिका निभा रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन ;न्छप्क्व्द्ध के अनुसार 388 ैैप् हैं जिनमें 4ए90ए000 उद्यम हैं जिनमें 75 लाख लोग रोशगार से लगे हैं तथा जिसका वाष्िार्क उत्पादन 1ए60ए000 करोड़ रुपए हैं। पिछले दस वषो± में इन समूहों में उद्यमियों की संख्या में 15 - 18 प्रतिशत वाष्िार्क की दर से वृि हुइर् है। इनके साथ - साथ भारत में लगभग 2000 ग्रामीण एवं दस्तकारी पर आधारित वेंफद्र हैं। वुफछ भारतीय ैैम् समूह तो इतने बड़े हैं कि भारत में वुफछ चुनीन्दा उत्पादों के वुफल उत्पादन का 90 प्रतिशत इनके द्वारा होता है। इनके उदाहरण हैं लुध्ियाना की बुने वस्त्रों की मण्िडयाँ तथा तमिलनाडु में त्रिापुर की हौजरी मंडी। लगभग पूरा का पूरा हीरे एवं जवाहरात का नियार्त सूरत एवं मुंबइर् की मंडियों से होता है। इसी प्रकार से चेन्नइर्, आगरा एवं कलकत्ता की औद्योगिक बस्ितयाँ चमड़े एवं चमड़े के उत्पादों के लिए प्रसि( हैं। लेकिन भारत के अध्िकांश वेंफद्र विशेषतः हस्तकला क्षेत्रा में बहुत छोटे हैं जिनमें अध्िक से अध्िक 100 लोग काम करते हैं लेकिन इतनी विश्िाष्टता लिए हुए हैं कि विश्व में और कहीं उनकी जोड़ की वुफशलता नहीं है और न ही उनके उत्पादों जैसी गुणवत्ता। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र में पैथानी साडि़यों की मंडी है। लेकिन ऐसे श्िाल्प के बहुत ही छोटे एवं कम संख्या में वेंफद्र हैं जो वैश्िवक प्रतियोगी हैं। भारतीय अथर्व्यवस्था के उदारीकरण एवं इसके भूमण्डलीय अथर्व्यवस्था में घुल - मिल जाने के कारण ैैम् क्षेत्रा के लिए जो भारी चुनौतियाँ पैदा हुइर् हैं उसने लघु पैमाने के उद्यमों ;ैैम्द्ध के विकास के अभ्िानव मागर् में भारत में कापफी रुचि पैदा की है। परिणामस्वरूप ;निजी एवं सावर्जनिक क्षेत्रा के संस्थानद्ध वेंफद्रीय एवं राज्य स्तर के औद्योगिक बस्ितयों के विकास के लिए पहल कर रहे हैं। ड्डोत - ूूूण्ेउंससपदकनेजतल पदकपंण्बवउ को अविकसित से उभरती एवं विकसित के स्तर में परिवतिर्त कर रहे हैं। 7. स्थानीय समुदायों पर प्रभाव - उद्यमिता अपने प्राकृतिक स्वरूप अथार्त् छोटे व्यवसायों के द्वारा समता लाती है। आप सूची 13 से जान सकते हैं। भारत सरकार की लघु पैमाने के उद्योग मंत्रालय कि लघु पैमाने की उद्यमिता के कारण पिछड़े वगर् जैसे कि महिलाएँ, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति एवं अन्य पिछड़े वगर् अपने आथ्िार्क सपनों को पूरा कर सकते हैं। उद्यमी के लिए कोइर् शैक्षण्िाक योग्यता की आवश्यकता नहीं है इसीलिए यह पिछड़े वगो± के लिए एक आकषर्क जीवनवृिा विकल्प है। कृष्िा आधरित ग्रामीण उद्योग एवं श्िाल्प आधारित वुफटीर उद्योग वास्तव में स्थानीय समुदायों के सामाजिक - आथ्िार्क सपफलता की कहानी बन सकते हैं। स्थानीय सरकारें, इकाइयों में पारस्परिक गठबंध्न को प्रोत्साहित करने एवं सामान्य सुविधओं के विकास को ध्यान में रखते हुए इन उद्यमिता बस्ितयों के विकास के लिए वुफछ न वुफछ करती हैं। देखें बाॅक्स भारत पिछड़े वगर् के समूहों में लघु पैमाने की उद्यमिता। स्थानीय समुदायों को प्रभावित करने के लिये उद्यमिता के विकास के संदभर् में वुफछ निगमित क्षेत्रा द्वारा की गइर् पहल का वणर्न करना आवश्यक है इनमें विशेष हैं आइर्. टी. सी. की इर् - चैपाल ;जाएं ीजजचरूध्ध् ूूूण्पजबचवतजंसण्बवउध्ंहतप.मगचवतजेध्म बीवनचंस.दमूण्ीजउद्ध एवं एच.एल. एल. की ‘शक्ित’ ;जाएं ूूूण्ीससेीाजपएबवउण्द्ध जिन्होंने पहल कर स्थानीय उद्यमियों को आथ्िार्क ढाँचे के निम्नतम स्तर के लोगों की स्िथति में सुधर के लिए एक जुट करने का बीड़ा उठाया है। 8. अन्वेषण, प्रयोग एवं साहस की भावना का पोषण - आथ्िार्क विकास के लिए अन्य बातों के साथ परम्पराओं एवं विश्वासों की उन बेडि़यों से छुटकारा पाना है जो विकास में अवरोध् पैदा करते हैं। जैसे कि, समुद्र का लंघन निषेध् था उसके रहते न तो विदेशी व्यापार हो सकता था और जिसके परिणाम स्वरूप न हीं आथ्िार्क विकास हो पाता था। जीवन के ढरेर् में बदलाव अनिवायर् है तथा इस परिवतर्न को सुधर के अवसर के रूप में स्वीकारना चाहिए न कि इससे भयभीत होना चाहिए। उद्यमी वुफछ नया करने की अपनी चाहत, परिवतर्न को एक अवसर के रूप में ग्रहण करना, अभ्िानव विचारों पर प्रयोग करना तथा उनकी परीक्षा का साहस दिखाना, के माध्यम से निरंतर आथ्िार्क विकास के लिए उपजाऊ भूमि तैयार करते हैं। वह दबे हुए हो सकते हैं लेकिन वह शक्ितशालियों को भी चुनौती दे देते हैं। अपने हिन्दी की लगान पिफल्म तो देखी होगी जिसमें मुख्य पात्रा भुवन गाँव के उन लोगों की एक वि्रफकेट टीम तैयार कर लेता है जिन्होंने इस खेल को कभी देखा भी नहीं था। क्या ‘निरमा’ के कषर्ण भाइर् पर साहसिक उद्यमी के रूप में गवर् नहीं करेंगे जिसने शक्ितशाली हिन्दुस्तान लीवर लि. के ‘सपर्फ’ को चुनौती दे डाली? उद्यमिता विकास 425 अतः चाहें तो आथ्िार्क विकास को संवुफचित अथो± में सकल घरेलू उत्पाद में वृि के रूप में देखें या पिफर आथ्िार्क, संस्थागत एवं सामाजिक परिवतर्न के व्यापक संदभर् में लें तो उद्यमिता एक महत्त्वपूणर् भूमिका निभाता है। ग्लोबल एन्ट्री प्रन्योरश्िाप मोनीटाॅर अध्ययन के अनुसार उद्यमिता संबंधी गतिविध्ियों एवं आथ्िार्क विकास के बीच 1 - 2 वषर् का अंतर होता है अथार्त् उद्यमिता के आथ्िार्क विकास पर प्रभाव पड़ने में समय लगता है। यहाँ एक महत्त्वपूणर् विचारणीय बात यह है कि उद्यमिता के कारण आथ्िार्क विकास होता है तथा आथ्िार्क विकास के कारण उद्यमिता का विकास होता। अथार्त् आथ्िार्क विकास उद्यमिता के विकास का पोषण करता है। विकसित हो रही अथर्व्यवस्थाएँ उद्यमिता के पफलने पूफलने के लिए उपजाऊ भूमि के समान हैं। इस पक्ष पर उद्यमिता विकास की विवेचना के समय चचार् करेंगे। उद्यमियों की अपने उद्यमों में भूमिका उद्यमियों की अपने उद्यमों के संबंध् मेें क्या भूमिका है इसको समझने के लिए हम संगीत शास्त्रा से इसकी तुलना करेंगे। हम कह सकते हैं कि उद्यमी केवल संगीत का रचनाकार एवं वादक वृन्द का निदेशक ही नहीं होता बल्िक वह एक व्यक्ित, दल या समूह ;ठंदकद्ध होता है। हमारे देश जैसे विकासशील देशों में उसकी भूमिका एवं उसके कायो± का क्षेत्रा बहुत अध्िक व्यापक हो जाता है। देखें बाॅक्स जिसका शीषर्क है उद्यमी की अपने स्वयं के उद्यम के संबंध् में भूमिका एवं कायर्। अतः किसी व्यवसाय के स्थापना की प्रिया को देखें तो एक उद्यमी व्यवसाय के अवसरों की खोज में रहता है एवं उन्हें ढूंढ़ लेता है, उसका उद्यमी की अपने उद्यम में भूमिका एवं कायर् विनिमय संबंधें का विकस 1.बाशार में अवसरों की पहचान करना 2.दुलर्भ संसाध्नों पर अध्िकार करना 3.आगत का क्रय करना 4.उत्पादों का विपणन एवं प्रतियोगिता के लिए तैयार रहना राजनैतिक प्रशासन 5.राज्य की अपफसरशाही को साध्ना ;स्वीकृति, छूट, टैक्सद्ध 6.पफमर् के भीतर मानवीय संबंधें का प्रबंध्न 7.ग्राहक एवं आपूतिर्कतार् के बीच संबंधें का प्रबंध्न प्रबंध् नियंत्राण 8.वित्त प्रबंध्न 9.उत्पादन प्रबंध्न तकनीकी 10.कारखाने का अध्िग्रहण करना एवं उसके समुच्चयन की निगरानी करना 11.औद्योगिक यान्ित्राकी ;वतर्मान उत्पादन प्रिया में आगत को न्यूनतम रखनाद्ध 12.उत्पादन प्रिया एवं उत्पादन की गुणवत्ता के स्तर में सुधर करना 13.नये उत्पादन तकनीक एवं नये उत्पादों को लाना नोट - उद्यमितीय कायो± का क्षेत्रा अथर्व्यवस्था जिसमें उद्यमी कायर् कर रहा है, के स्तर, उत्पादन। परिचालन का पैमाना एवं प्रबंध् में जुड़े कमर्चारियों से काम लेने की उद्यमी की तुलनात्मक क्षमता के अनुसार अलग - अलग होता है। विकसित देशों में उद्यमियों पर अभ्िानवता का उत्तरदायित्व होता है तथा वुफछ समय पश्चात् वह प्रबंधकों का मागर् प्रशस्त करते हैं। बड़े पैमाने के संगठनों में उद्यमी नेतृत्व प्रदान करते हैं तथा वहाँ प्रबध्ंकों की एक टीम होती है जो उद्यम के वुफछ विशेष पहलूओं पर ध्यान देती है। इसी प्रकार से जो उद्यमी अध्िकार अंतरण की योग्यता एवं इच्छा रखते हैं वह उद्यम के वुफछ चुनीदा महत्त्वपूणर् पहलूओं पर ध्यान वेंफित करते हैं। ड्डोत - पीटर किल्बी, ;संस्करणद्ध, उद्यमिताा एवं आथ्िार्क विकास, न्यूयावर्फ, दि प्रफी प्रेस, 1971। उद्यमिता विकास विकास का निणर्य एवं उसका प्रबंध्न व्यवसाय स्थापना की प्रिया मूल्यांकन करता है, इसको एक उत्पाद/सेवा के स्वरूप के रूप में विकसित करता है, संसाध्नों को जुटाता है तथा इसके संचालन को सुनिश्िचत करता है। देखें चित्रा उपयुर्क्त घटकों का चित्रा के अनुसार क्रम में होना आवश्यक नहीं है। उद्यमी को इन सभी तत्त्वों को एक साथ लेकर चलना होता है। प्रत्येक उद्यमी अपनी पृष्ठभूमि के अनुसार किसी एक चरण को दूसरे से पहले ले सकता है। जैसे कि तकनीकी व्यक्ितयों पर उत्पादन पक्ष बहुत अध्िक हावी रहता है जबकि विपणन की पृष्ठभूमि के व्यक्ित बाशार निमार्ण पर अध्िक शोर देते हैं। जो उद्यमी निवेश में अिाक रुचि रखते हैं उनकी चिंता परियोजना से लाभ प्राप्ित की अध्िक होती है। व्यक्ित को व्यवसाय को अपने संवुफचित दृष्िटकोण से देखने से बचना चाहिए। अब हमारे लिए यह रहेगा कि प्रत्येक स्िथति के विभ्िान्न समस्याओं का संक्षेप में वणर्न करें। अवसर की खोज करना - उद्यमतीय अवसरों की सियता से तलाश की जानी चाहिए। हम अपनी निजी परख, खोज अथवा आविष्कार पर आश्रित हो सकते हैं। व्यवसाय की अवसरों की पहचान में व्यक्ितगत/पेशेवर संबंध्/कायर्तंत्रा एवं अनुभव भी सहायक हो सकते हैं। विकल्प स्वरूप हम प्रकाश्िात रिपोटर् विरचो लेबोरेटरी सवर्ेक्षण तथा इसी प्रकार के अन्य साध्नों का सहारा ले सकते हैं। नारायण रेंी जब एक पफामार्स्यूटिकल वंफपनी में कायर्रत थे तो उनके स्वयं के द्वारा खोज किए गए अणु को आधार बनाया। अवलोकन का अथर् है उद्देश्य को ध्यान में रखना, देखना/सुनना/सूंघना/अवसर की पहचान के लिए किसी वस्तु अथवा घटना को उद्यमिता की दृष्िट से देखने की प्रवृफति पहले से ही होनी चाहिए। हममें से अिाकांश की सोच एक उपभोक्ता की होती है। जब भी हम कोइर् इच्िछत वस्तु देखते हैं जैसे कि पेन, लैपटाॅप, मोबाइल पफोन का नवीनतम माॅडल अथवा कोइर् व्यक्ित पीशा या बगर्र खा रहा है तो उसे अपने लिए पाने की प्रबल इच्छा होती है। लेकिन यदि उद्यमिता की सोच है तो हम सोचेंगे कि बाशार कितना बड़ा होगा, इस वस्तु का उत्पादन कहाँ किया जाएगा, इसका मूल्य क्या होगा, क्या मैं वतर्मान व्यवसायियों से ग्राहकों को अपनी ओर ला पाऊँगा। इसके लिए क्या इसे सस्ता बेचा जाए, मूल्य की तुलना में अध्िक उपयोगी बनाया जाए या पिफर अच्छी सेवा प्रदान की जाए इत्यादि। उद्यमिता संबंध्ी अवसर की पहचान अंतरार्र्ष्ट्रीय, घरेलू, क्षेत्राीय/औद्योगिक विश्लेषण की प्रिया के माध्यम से भी की जा सकती है। उदाहरण के लिए विश्व व्यापार संगठन ;ॅज्व्द्ध की स्थापना के पश्चात् अंतरार्ष्ट्रीय व्यापार एवं निवेश रुकावटों से मुक्त हो गए हैं। कपड़ों पर से कोटा समाप्त किये जा रहे हैं तथा भारत से कपड़ा एवं इससे बने उत्पादों के नियार्त की बहुत संभावनाएँ हैं। वैश्िवक बाह्य ड्डोतीकरण बढ़ रहा है तथा भारत में तकनीकी श्रम शक्ित का विपुल एवं विभ्िान्नता लिए हुए भंडार है। इससे विश्व के विनिमार्ण एवं सूचना प्रौद्योगिकी समपिर्त सेवाओं ;प्ज्म्ैद्ध की कम लागत पर उपलब्ध्ता का उचित स्थान है। विक्रय के विश्िाष्ट उत्पादों की पहचान - यदि हम पयार्वरण की जाँच करें तो हमें व्यवसाय की और अिाक सामान्य संभावनाओं का पता लग सकेगा। लेकिन आवश्यकता है कि किसी विश्िाष्ट उत्पाद अथवा सेवा की पहचान की जाए। उदाहरण के लिए, विश्व व्यापार संगठन की स्थापना के पश्चात् के व्यापार उदारीकरण से नियार्त के अवसर बढ़े हैं लेकिन प्रश्न पैदा होता है कि नियार्त किस चीश का किया जाए एवं कहाँ किया जाए? इसके लिए आपको देश - उत्पाद साँचा तैयार करना होगा जिससे कि इस संबंध् में निणर्य लिया जा सके। ;देखेें चित्रा।द्ध इससे आप उत्पाद - बाशार समिश्रण को ज्ञात कर सकते हैं जो तेशी से बढ़ते आयात तथा आपके लिए नियार्त की संभावनाओं को दशार्ता है। किस उत्पाद को बेचा जाए इसी के लिए उद्यमी की सृजनात्मकता एवं अभ्िानवता की सवार्ध्िक आवश्यकता होती है। पिफर भी एक प्रतियोगी पयार्वरण में आप अपने बिक्री के उत्पाद से भ्िान्न कर सकते हैं भले ही अन्य सभी के उत्पाद समान हैं तथा एक ही आवश्यकता की पूतिर् करते हैं। स्पष्टतया उत्पाद विशेष के उत्पादन का निणर्य लेने के लिए इस का निणर्य लेना आवश्यक है कि क्षेत्रा/उद्योग की स्िथति उद्यमतीय अवसरों के लिए आइर्.डी.एस. विश्लेषण उत्पाद देश क ख ग घ ड पिछले वषो± के आयात संबंध्ी आँकड़े 1 2 3 4 5 1 2 3 4 5 1 2 3 4 5 1 2 3 4 5 1 2 3 4 5 ग्1 ग्2 ग्3 ग्4 ग्5 सहायताथर् देश - उत्पाद मैटिªक्स इस उत्पाद का क्रय कौन करेगा तथा इससे क्या उपयोगिता प्राप्त होगी। आप तभी सपफल होंगे जबकि आपका ऐसी उपयोगिता एवं गुणों वाला उत्पाद होगा जो ग्राहक की वांछनीयता से भी अध्िक होगा तथा ग्राहक कह उठेगा ‘वाह’ क्या चीश है। संभाव्यता विश्लेषण - किसी भी उत्पाद को लाने का विचार तकनीकी दृष्िट से संभाव्य होना चाहिए अथार्त् दी गइर् तकनीक से इसको वास्तविकता में परिवतिर्त करना संभव होना चाहिए। लागत भी उतनी हो कि मूल्य इसे पूरा कर सके। दूसरे शब्दों में आथ्िार्क रूप में भी प्रस्तावित उत्पाद लाभप्रद होना चाहिए। परियोजना की लागत उपलब्ध् संसाध्नों तक सीमित होनी चाहिए तथा संसाध्नों को उपलब्ध् कराने वालों को भी विश्वास होना चाहिए कि उन्हें उनके निवेश पर पयार्प्त प्रतिपफल लाभ एवं उनका ग्राहक की आवश्यकता सामान्य उत्पाद विश्िाष्ट उत्पाद को अन्य से भ्िान्न करने के उदाहरण भोजन बगर्र ऽ आकार ऽ इंतशार का समय शून्य ऽ बैठ कर खाएँ/ले जाएँ ऽ अतिरिक्त पदाथर् जैसे कि पेय पदाथर् अथवा कोइर् सजावट नहीं ऽ तले हुए/भुने हुए का विकल्प ऽ ऊपर से डालना, घटकों का विकल्प उत्पाद विभेदन निवेश सुरक्ष्िात रहेगा तथा समय पर उसकी वापसी हो जाएगी। अथार्त् प्रस्तावित उत्पाद वित्त की दृष्िट से भी व्यवहारिक होगा। तुरन्त पयार्प्त बिक्री होनी चाहिए तथा भविष्य में वृि की संभावना होनी चाहिए। प्रस्तावित उत्पाद की वाण्िाज्ियक दृष्िट से भी सपफलता सुनिश्िचत होनी चाहिए। आजकल तो यह सुनिश्िचत करना भी महत्त्व रखता है कि व्यवसाय की स्थापना में कोइर् पयार्वरण संबंध्ी या कोइर् अन्य कानूनी रोक तो नहीं है अथवा किसी प्रकार की पूवर् अनुमति की आवश्यकता तो नहीं है। इसका भी निणर्य लेना होता है कि व्यवसाय के संगठन का स्वरूप एकल स्वामित्व होगा अथवा साझेदारी, वंफपनी या पिफर सहकारी संगठन होगा। स्पष्ट है कि जिस उत्पाद का भी चयन किया जाए वह विभ्िान्न दृष्िटकोणों से लाभप्रद होना चाहिए। आपको इनसे जुड़ी जानकारी को व्यवसाय योजना के रूप में एकत्रिात करना होगा। इस योजना को ध्न उपलब्ध् कराने वाले अध्िकारियों के समक्ष रखना होगा। भारत में यह आपके क्षेत्रा का राज्य वित्त निगम है। इनके पास एक निधर्रित पफामर् होता है जिसमें व्यवसाय योजना के संबंध् में विस्तृत जानकारी देनी होती है तथा इसी के अनुसार सूचना तत्त्व जुटाए जाते हैं। सामान्य रूप से व्यवसाय योजना के सूचना तत्व प्रदशर् में से लिए जा सकते हैं। व्यवसाय योजना का मूल्यांकन कोष उपलब्ध कराने वाले संस्थान द्वारा किया जायेगा और यदि वह संतुष्ट हो जाती है कि आपकी परियोजना को सहायता प्रदान की जा सकती है तथा सुरक्षा राश्िा जमा कर दिये जाने के पश्चात् यह )ण की राश्िा को स्वीकृति प्रदान कर देगी। याद करें नारायन रें ी एवं उसके दो सहयोगियों ने 8 लाख रुपए दिये आंध्र प्रदेश राज्य वित्त निगम ;।च्ैथ्ब्द्ध ने पूरी परियोजना की वुफल 28 लाख रुपए की लागत में 20 लाख रुपए का योगदान किया। परियोजना को स्वीकृति मिल जाने पर उद्यमी परियोजना पर कायर् प्रारंभ करने के लिए कदम उठा सकता है अथार्त् कारखाना परिसर सुनिश्िचत करना, विनिमार्ण कायर् प्रारंभ करने के लिये आगत माल प्राप्त करना तथा उत्पाद की बिक्री करना। जैसा कि पहले ही बताया जा चुका है व्यवसाय के कायर् प्रारंभ के साथ ही उद्यमिता संबंधी कायो± का समापन नहीं हो जाता। उद्यमी कइर् बार व्यवसाय के प्रतिदिन के कायो± को देखता है तथा इसकी बढ़ोतरी एवं स्िथरता के लिए प्रयत्न करता है। उद्यमिता की भूमि का एवं उसके कायर् वास्तव में बड़े कष्टप्रद होते हैं। शायद इसीलिए बहुत से लोग इसके स्थान पर सरल, कम उत्तरदायित्व वाले एवं सुरक्ष्िात रोशगार एवं पेशे को चुनते हैं। उद्यमिता को निभाना कठिन होता है लेकिन उद्यमिता ही कठिन कायो± को पूरा करती है। इस बात की चिंता न करें कि आज आपके पास वह सामथ्यर्, मूल्य एवं रुझान नहीं है। आपको तो उद्यमिता को अपना वैफरियर बनाने के लिए केवल मन बनाना है तथा अपने आपको उसके लिये तैयार करना है। इससे अब हम, उद्यमिता विकास की प्रिया की विवेचना की ओर बढ़ते हैं। उद्यमिता विकास की प्रिया उद्यमिता स्वयं से उत्पन्न नहीं होती है। यह तो व्यक्ित एवं पयार्वरण के बीच संवाद की गतिशील प्रिया का परिणाम है। वैसे तो उद्यमिता को वैफरियर के रूप में चुनना व्यक्ित को स्वयं तय करना है पिफर भी वह इसे विकल्प के रूप में ले सकता है क्योंकि यह उसकी अपेक्षा के अनुवूफल भी हो सकता है और लाभप्रद भी। इस संदभर् में पयार्वरण एवं व्यक्ित में उन तत्वों पर ध्यान देना अनिवायर् हो जाता है जो अपेक्षानुवूफलता एवं संभाव्यता की उपलब्िध् के कापफी समीप ले जाते हैं और इस प्रकार से उद्यमिता का विकास होता है। इसीलिए हम उद्यमिता विकास की प्रिया को चित्रा के अनुसार तय कर सकते हैं। का सहयोग इन सभी का उद्यमिता पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है वुफछ विशेषरूप से स्थापित एवं समपिर्त सस्थान हैं जो उद्यमिता जागरुकता एवं उद्यमिता विकास कायर्क्रम चलाते हैं। इससे उद्यमिता को बढ़ावा मिलता है। यह संस्थान हैं राष्ट्रीय उद्यमिता संस्थान एवं लघु व्यवसाय विकास संभाव्यता विश्लेषण के पहलू सामान्यतः पंँूजीवादी अथर्व्यवस्था जिसमें व्यक्ितगत उपलब्िध् पर जोर दिया जाता है उद्यमिता के लिए अध्िक उपयुक्त रहती है। व्यक्ितगत आय पर नीची दर से कर एवं सामान्य मुद्रास्पफीति उद्यमीय ियाओं को प्रोत्साहित करती है। ;सोचिए ऐसा वैफसे होता है?द्ध घरेलू मुद्रा का बाहर की मुद्रा में मूल्य थोड़ा कम है या दूसरे शब्दों में विनिमय दर थोड़ी नीची है तो इससे आयात पूरक तथा नियार्त संवध्र्न उद्यमिता को प्रोत्साहन मिलेगा। क्या आप समझ सकते हैं कि ऐसा वैफसे हो सकता है?द्ध भली भाँति विकसित वित्तीय प(ति, अच्छा बुनियादी ढाँचा नौकरशाही ;जाए ं दममेइनकण्दपबण्पदद्धए भारतीय उद्यमिता विकास संस्थान ;जाए ं ूूूण् मकपपदकपंण्वतहद्ध। उद्यमिता की आपूतिर् अथवा कमी का कारण प्रचलित सामाजिक सांस्कृतिक है। जो समाज लोगों की व्यवसाय के चयन की स्वतंत्राता का सम्मान करता है, जो पूछताछ खोज एवं प्रयोग की भावना को प्रोत्साहित करता है, किसी व्यक्ित की सपफलता पर जश्न मनाता है तथा सामान्य रूप से उद्यमियों को महत्त्व देता है, उस समाज को ऐसे योग्य एवं इच्छुक लोगों की नियमित आपूतिर् मिलती रहेगी जो उद्यमिता को जीविका का माध्य/वैफरियर बनाना चाहते हैं। उद्यमिता विकास में व्यक्ित की भूमिका नारायण रेंी एक छोटे स्तर का उद्योग प्रारंभ करना चाहते थे तथा उनमें सामथ्यर् और इस पर काम करने की इच्छा भी थी। उनके पास योग्यता अनुभव एवं आवश्यक मूल्य, प्रवृिा एवं प्रोत्साहन भी था। ;प्रारंभ्िाक घटना में इसका विस्तृत वणर्न नहीं है। इस का वणर्न हम उपयुक्त स्थान पर करेंगेद्ध। आप भी यह जानना चाहेंगे कि इच्छानुवूफलता - सामथ्यर् की बिसात पर आपका स्थान कहाँ है। क्या नहीं चाहेंगे? ;देखे चित्राद्ध जैसा कि चित्रा - से स्पष्ट है योग्य एवं इच्छुक स्त्राी एवं पुरुष उद्यमिता के तैयार ड्डोत हैं। ऐसे व्यक्ित स्वतंत्रा अस्ितत्व का पहला अवसर मिलते ही लपक लेते हैं। नारायण रेंी भी गल्पफ से लौटते ही जैसे दो डाॅक्टरों से मिले तो उन्होंने अवसर को हाथ से नहीं जाने दिया। ऐसे स्त्राी पुरुष सदा मिल जाएँगे जो अपना स्वयं का व्यवसाय प्रारम्भ करना चाहते हैं लेकिन उनको अपने उद्यमिता संबंधी बाध का ज्ञान है। हो सकता है कि उनको वह संसाधनों की कमी ;या यूं कहें कि संसाधन हैं ही नहींद्ध, ज्ञान अथवा अनुभव या पिफर कौशल की कमी के कारण अपनी सामथ्यर् की कमी का अहसास है। इन सभी को मिलाकर उपयुक्तता कहा जाता है। अब हम इस पर ध्यान देंगे। उद्यमीय उपयुक्तता प्रत्येक भूमिका एवं कायर् का प्रत्येक अवसर एवं इसका सामान्य निष्पादन के लिए विशेष योग्यता की आवश्यकता होती है। यह उद्यमिता के लिए भी उतनी ही सही है। देखें बाॅक्स जिसका शीषर्क ;ब्ंेीद्ध अथवा ;ज्ञ।ैभ्द्ध। व्यवसाय योजना 1.कायर्कारी सारांश 2.व्यवसाय/उद्योग की पृष्ठभूमि 3.प्रस्तावित उत्पाद/सेवा 4.बाशार विश्लेषण 5.विक्रय एवं विपणन रणनीति 6.उत्पादन/परिचालन रणनीति 7.प्रबंध् 8.जोख्िाम के तत्व 9.आवश्यक कोष 10.निवेश से प्राप्ित एवं निवेश की वापसी 11.बिक्री से प्राप्त राश्िा का उपयोग 12.वित्तीय सारांश 13.परिश्िाष्ट जैसे कि बाशार सवेर्क्षण की रिपोटर्, वित्तीय विवरण, प्रगति का ब्यौरा आदि। सामथ्यर् का अथर् है किसी व्यक्ित का ज्ञान, कायर् कौशल एवं पयार्प्त मनोवैज्ञानिक गुण ;जिनमें सम्मलित हैं दृष्िट कोण एवं प्रोत्साहन जिन पर हम अलग से चचार् करेंगे मिश्रण जिन से वह किसी कायर् को प्रभावी रूप से कर सकता है। यहाँ वाक्यांश ‘मिश्रित’ बहुत महत्त्वपूणर् है। उदाहरण के उद्यमिता विकास लिए सक्षमता अथार्त् स्वप्न को संपे्रष्िात करने की योग्यता लेखन/ बोलने के कौशल में प्रवीणता से अिाक होती है। इसमें स्वप्न की स्पष्टता, श्रोताओं की पृष्ठ भूमि की समझ, रुचि एवं तत्परता, मीडिया के संबंध में ज्ञान तथा उपयुक्त मीडिया का चयन, ध्यान आकृष्िात करना, बात को कहना, केवल छाप ही छोड़ना नहीं बल्िक प्रभावित करना एवं प्रभावपूणर्ता का मूल्यांकन करना। अतः टेलीविजन साक्षात्कार में जब उद्यमी ने ;बाॅक्सद्ध में सपफल उद्यामिता के निधार्रक तत्व के रूप में ज्ञ।ैभ् शब्द कहा तो वास्तव में वह क्षमताओं का उल्लेख कर रहा था। सामान्य रूप से मानव संसाधन के विकास एवं विशेष रूप से उद्यमिता विकास के लिए सामथ्यर् के मागर् को 1960 के दशक के अंत में तथा 1970 के दशक के प्रारंभ में हारवडर् विश्वविद्यालय के मैकक्ली लैंड ने पथ प्रदशर्क रूप में स्थापित किया। ;मैकक्ली लैंड के कायर् के संबंध में आप और अिाक जान सवेंफगे जब हम उद्यमीय अभ्िाप्रेरणा की विवेचना करेंगे।द्ध मैकक्ली लैंड ने सामथ्यर् के अव्ययवों को परिभाष्िात करने का प्रयत्न किया है कि इनका उपयोग कायर् निष्पादन के लिए किया जा सकता है तथा जाति, लिंग अथवा आथ्िार्क सामाजिक तत्वों से प्रभावित नहीं है। परिणाम - स्वरूप इसका ज्ञान रखना अिाक महत्त्वपूणर् कि कोइर् व्यक्ित क्या करता है न कि वह कौन है। इसीलिए प्रबंधन एवं उद्यमिता को इस रूप में परिभाष्िात किया जा सकता है कि मैनेजर एवं उद्यमी क्या करता है। सक्षमता को श्िाक्षा एवं विकास के द्वारा विकसित किया जा सकता है इसीलिए हम कह सकते हैं कि उद्यमी बनाए जाते हैं। उद्यमिता के लिए विश्िाष्ट क्षमताएँ कौन - सी हैं? इस संबंध में भारतीय उद्यमिता विकास संस्थान जो उद्यमिता श्िाक्षण, अनुसंधान एवं विकास के क्षेत्रा का राष्ट्रीय संसाधन संस्थान है का हवाला दिया जा सकता है। ;ूूूण् मकपपदकपंण्वतहद्ध। इच्छा निम्न उच्चइच्छुक उद्यमी तैयार उद्यमी उद्यमी - तैयार नहीं क्षमतावान उद्यमी निम्न उच्च स्वयं की सामथ्यर् सामथ्यर् - इच्छा मैटिªक्स ब्ंेी अथवा ज्ञ।ैभ् एक व्यवसायी बनने के लिए आपको किस चीश की आवश्यकता होती है? एक टेलीवीजन साक्षात्कार में ऐंकर का पहला वाक्य था जो उसने एक नामी ग्रामी व्यवसायी से पूछा। ‘वैफश’ ;ब्ंेीद्ध इस उत्तर को सुनकर उसने सोच लिया कि यह साक्षात्कार कायर्क्रम नष्ट हो गया क्योंकि उत्तर इतना स्वभाविक एवं पूणर् था कि आगे कोइर् बात करने की आवश्यकता ही नहीं थी। उद्यमी ने उसको उबार लिया। बात - चीत जारी रखते हुए उसने कहा नौजवान स्त्राी आपने शायद इसका गलत अथर् निकाला है मेरा अभ्िाप्राय बंेी से वैफश अथार्त् रुपया पैसा नहीं बल्िक ज्ञ।ैभ्त्रज्ञ।ैभ् है। साक्षात्कार सही दिशा में चल पड़ा। उद्यमी ने विस्तार से बताया कि उसका अभ्िाप्रयाः क्या है। ज्ञत्र ज्ञदवूसमसहव ज्ञान, ।त्र ।जजपजनकम रुझान / सोच, ैत्रैापससे कौशल एवं भ्त्र भ्ंइपजे आदतें। उद्यमिता विकास संसथान ने 15 ऐसी योग्यताओं की पहचान की है जिनका उद्यमीय निष्पादन एवं सपफलता में योगदान होता है। पहल करना - किसी दवाब के कारण नहीं बल्िक पसंद के कारण कायर् करना, अग्रणी बनना बजाय इसके कि दूसरों के द्वारा प्रारंभ करने का इंतजार करें। अवसरों को ढूंढ़ना एवं उनपर कायर् करना - एक ऐसी सोच कि व्यक्ित दिन प्रतिदिन के अनुभवों में ही व्यवसाय के अवसर ढूंढ़ने में प्रश्िाक्ष्िात होता है। संतरों के उदाहरण को याद करें। दृढ़ता - कभी हार नहीं मानने की भावना, सरलता से हार नहीं मानना, जब तक सपफलता न मिल जाए तब तक पीछे लगे रहना। सूचना प्राप्त करना - जानकारी प्राप्त करना यह जानना कि यह जानकारी किससे मिल सकती है, विशेषज्ञों की राय लेना संबंिात विषय को पढ़ना तथा वुफल मिलाकर विचार एवं सूचना के लिए खुलापन। कायर् की उच्च गुणवत्ता पर ध्यान देना - बारीकियों पर ध्यान देना तथा पूवर् स्थापित मानक एवं सामान्य मूल्यों पर ध्यान देना। हाथ में कायर् के प्रति वचनब(ता - कायर् को समय पर पूरा करने के लिए व्यक्ितगत रूप से ध्यान देना। कायर्वुफशलता मूलक - समय, धन एवं परिश्रम की बचत को ध्यान में रखना। व्यवस्िथत नियोजन - जटिल कायर् को वुफछ भागों में विभक्त करना, इन भागों का बारीकी से अध्ययन करना तथा सम्पूणर् के संबंधी में निष्कषर् निकालना। जैसे कि व्यवसाय संबंिा रणनीति ;समग्रद्ध के विभ्िान्न पहलू ;हिस्सेद्ध उत्पादन, विपणन एवं वित्त पर एक साथ ध्यान देना समस्या का समाधान - लक्षणों की पहचान, निदान एवं उपचार। आत्म विश्वास - व्यवसाय की जोख्िामों से डरना नहीं तथा इसके सपफलता प्रबंधन के लिए अपनी स्वयं की योग्यता पर निभर्र करना। अिाकार जताना - अपने स्वप्न को जोर देकर दूसरों को बताना तथा उन्हें इसके महत्व का विश्वास दिलाना। सहमत करना - उद्यम के लिए अन्य लोगों का समथर्न प्राप्त करना। उद्यमीय उपयुक्तता प्रभावित करने की रणनीति का उपयोग - नेतृत्व आप यह जानना चाहेंगे कि इन क्षमताओं का प्रदान करना। निमार्ण किस प्रकार से किया जाए। ज्ञान क्षमता निगरानी रखना - योजनानुसार प्रगति को सुनिश्िचत ;आप तथ्यों, तकनीकी, पेशे, प्रिया, कायर् संगठन करना। आदि के संबंध में क्या जानते हैं?द्ध का विकास अध्ययन एवं ज्ञानी लोगों से संवाद के द्वारा किया जाकमर्चारी के कल्याण को ध्यान रखना - यह विश्वास रखना कि प्रतियोगी होने एवं सपफलता की सकता है। कायर् कौशल की क्षमता ;जो आप कहते वुंफजी कमर्चारी का कल्याण है तथा कमर्चारी के है अथवा करते हैं उसका परिणाम अच्छे या बुरे कल्याण कायर्क्रम चलाना। निष्पादन के रूप में निकलता देद्ध अभ्यास से प्राप्त उपलब्िध की आवश्यकता आथ्िार्क एवं उद्यमिता विकास को वैफसे प्रेरित करती है। उपलब्िध की आवश्यकता की भूमिका की जाँच एवं इसे सामने लाने का श्रेय हारवडर् के प्रोपेफसर मैकक्ली लैंड को जाता है जिनके संबंध में हमने अपने मानव संसाधन एवं उद्यमिता विकास की योग्यता आधारित व्यवहार पर चचार् में कहा है। उन्होंने जाँच की कि वुफछ देश दूसरों से क्यों अिाक विकसित हैं। इस प्रश्न का उत्तर उन्होंने इस प्रस्ताव की जाँच में ढूंढ़ा कि आथ्िार्क विकास के स्तर में अंतर के लिए उपलब्िध अभ्िाप्रेरणा स्तर में अंतर उत्तरदायी है। इसके लिए उसने देशों की प्रसि( कहानियाँ एवं जन श्रुतियाँ तथा प्राथमिक कक्षा तक पढ़ने वालों की जाँच की जिससे कि वह जान सके कि क्या वह व्यक्ितगत उपलब्िध, मानवीय साहस की जीत तथा परिस्िथतियों से हटकर प्रत्यत्न आदि पर ध्यान देते थे। मैकक्ली लैंड के अनुसंधान ने इस धारणा की पुष्िट की कि कहानियों एवं पढ़ने वालों के विश्लेषण से यह स्पष्ट हुआ कि आथ्िार्क विकास में अंतर का कारण उपलब्िध अभ्िाप्रेरणा है। वैफसे? इसकी प्रिया क्या होगी? मैकक्ली लैंड ने माना कि उद्यमिता एक ऐसा माध्यम बन जाता है। जिसके द्वारा उपलब्िध अभ्िाप्रेरणा सुस्पष्ट होती है तथा विकास गति पकड़ती है। होती है। आपने यह तो सुना होगा कि अभ्यास से व्यक्ित संपूणर्ता को प्राप्त करता है। उदाहरण के लिए ‘सहमति प्राप्त करने’ एवं ‘प्रभावी रणनीति का उपयोग’ के लिए प्रस्तुतीकरण में निपुणता की आवश्यकता होती है। आप कहना क्या चाहते हैं, वैफसे कहना चाहते हैं, आप किसको सुनाना चाहते हैं तथा उनकी पृष्ठभूमि क्या है जो प्रश्न आप पूछना चाहते हैं वह क्या हैं, उनके उत्तर क्या हो सकते हैं आदि पर आपको घर में दोहरी मेहनत करनी होगी। इसका बार - बार अभ्यास कीजिए चाहे तो शीशे के सामने कीजिए या पिफर अपने दोस्तों के सामने कीजिए जब आप वास्तविकता से दो - चार होंगे तो आप कायर् को भली - भाँति कर पायेंगे। उद्यमीय अभ्िाप्रेरणा जिन स्त्राी एवं पुरुषों को स्वयं की समाथ्यर् का बोध है तथा जो अभी स्वयं स्वामी बनने में रुचि नहीं रखते हैं अथवा अभ्िाप्रेरित नहीं हैं उद्यमिता के लिए सक्षम एवं भविष्य के ड्डोत हैं। वह क्या है जो किसी व्यक्ित को अभ्िाप्रेरित करता है एक ऐसा प्रश्न है जिसका उत्तर सरल नहीं है। नारायण रेंी अपनी अणु की खोज को व्यवसाय के अवसर के रूप में प्रयोग करने की इच्छा से प्रेरित हुए। यदि हम माॅसलो के आवश्यकता सि(ांत को देखें तो कह सकते हैं कि नारायणा रेंी स्वयं की संतुष्िट की आवश्यकता से प्रेरित हुए। क्योंकि उद्यमीय स्िथति की विशेषता है प्रतियोगी स्िथति में व्यक्ितगत उपलब्िध एवं उच्च स्तरीय श्रेष्ठता इसीलिए उद्यमीय व्यवहार के मूल प्रेरणा के रूप में हमारे सामने उपलब्िध की आवश्यकता ;छ.ंबीद्ध का नाम आता है। देखें बाॅक्स शीषर्क है उद्यमिता एवं आथ्िार्क विकास को प्रेरित करता है। उद्यमिता विकास 437 कायर् सिि की आवश्यकता ;छण्।बीद्धदृ कायर् सिि की आवश्यकता से अभ्िाप्रायः किसी कठिन चीज को पूरा करने की इच्छा है। भौतिक पदाथर्, व्यक्ित अथवा व्यक्ितगत सृजनात्मकता एवं नवीनता के उपयोग पर प्रभुत्व जमाना प्रवीणता प्राप्त करना अथवा उन्हें संगठित करना आपकी प्रगति विकास को दबा देती है। आप अपनी योग्यताओं एवं रुचि के अनुरूप कायर् करने का वातावरण पैदा कर सकते हैं। अिाकार की आवश्यकता ;छण्च्वूद्धदृ अिाकार की आवश्यकता का कारण निधार्रित दिशा में चलने एवं इच्िछत उद्देश्य की प्राप्ित के लिए लोगों को अथवा उनके व्यवहार को प्रभावित करने की कामना है। सामान्य धारणा के अनुसार राजनेता, सामाजिक एवं धामिर्क नेता, मुख्य कायर्कारी अिाकारी ;ब्म्व्ेद्धए सरकारी अपफसर/नागरिक सेवा अिाकारी अिाकार की आवश्यकता के प्रतीक हैं। यह धारणा इस विश्वास पर आधारित लगती है कि शक्ित का ड्डोत संगठन अथवा समाज में व्यक्ित का पद है। इसी शृंखला में व्यवसाय का स्वामित्व भी शक्ित की इच्छा है। लेकिन यह तो मानें कि व्यवसाय की स्थापना में व्यक्ित को पूँजीदाता, उपकरण एवं सामान के आपूतिर्कतार्, कमर्चारी एवं ग्राहकों का विश्वास तो जीतना ही होगा। यदि आपके पास शक्ित है तो आप इसका प्रयोग केवल अपने हितों को साधने के लिए ही नहीं कर सकते बल्िक इससे वुफछ हटकर दूसरों के जीवन को श्रेष्ठ बनाने के लिए भी कर सकते हैं। उद्यमी शक्ित प्राप्ित के इस सामाजिक पक्ष से प्रेरित होते हैं। यह उन संगठनों को ढूंढ़ते हैं जो अनेक लोगों की जीविका एवं आत्म सम्मान का ड्डोत हैं। दूसरों से जुड़ना ;छण् ।द्धििदृ आपने अपने अविभावकों को कहते सुना होगा कि वह जो वुफछ भी करते हैं अपने बच्चों के लिए करते हैं। जब भी कोइर् व्यक्ित पारस्परिक संबंधों की सोचता है तो इसका अथर् हुआ कि वह दूसरों से संबंध बनाने का इच्छुक है। इसका अथर् है कि अन्य चीशों के साथ लोगों का सम्मान उन लोगों की इच्छाओं एवं मान्यताओं को स्वीकार करना है जिनका उनके लिए कोइर् महत्व है। सामाजिक कायर् में लगे लोग, पयार्वरण पोषक, अध्यापक, डाॅक्टर एवं नसर् इनसे सवार्िाक प्रेरित होते हैं। ऐसा माना जाता है कि उद्यमी दूसरों से जुड़ने के संबंध में कम इच्छुक रहते हैं क्योंकि वह नयापन लाने वाले, दूसरों के लिए आदशर् स्थापित करने वाले एवं परम्परा को तोड़ने वाले होते हैं और उन्हें ऐसा होना भी चाहिए। लेकिन यह आवश्यक नहीं कि सम्ब(ता उपलब्िध को ही प्रभावित करे। वुफछ संस्कृति तो ऐसी हैं कि परिवार वह आधारभूत पट्टðा हैं न कि जिन पर सपफल जीवन वृिा का निमार्ण होता है। लोग स्वयं की संतुष्िट के लिए कायर् नहीं करते हैं बल्िक परिवार के लिए कायर् करते हैं। अपने परिवार एवं अपनी जाति के व्यवसाय के परम्परा को जारी रखने की इच्छा को सम्ब(ता की आवश्यकता के रूप में देखा जा सकता है। हमारे जैसे देश जिन का अतीत उपनिवेश का रहा है स्वतंत्रा भारत के उद्यमियों की पहली पीढ़ी देश भक्ित एवं विदेशी शासकों द्वारा छोड़ी गतिहीन अथर् व्यवस्था के पुनः निमार्ण की इच्छा से प्रेरित थी। ऐसा ही वुफछ घटनाओं में सम्ब(ता की अभ्िाप्रेरणा के तत्वों को ढूँढ़ा जा सकता है। स्वयत्तता की आवश्यकता ;छण्ंनजद्धदृ स्वयत्तता की आवश्यकता स्वतंत्राता की इच्छा एवं निष्पादन के लिए किसी बाहरी शक्ित के प्रति उत्तरदायी एवं जवाबदेह न होकर स्वयं के प्रति उत्तरदायी एवं जवाबदेह होने की इच्छा है। यह एक ऐसे अवसर की इच्छा है जिसमें वह अपने योग्यताओं का भली - भाँति प्रदशर्न कर सके। उद्यमिता के संदभर् में इसे किसी अन्य के लिए काम न करने के निश्चय के रूप में देखा जाता है अिाकांश कायर् स्िथतियों व्यक्ितगत कायर् विश्िाष्टताओं की सुरक्षा हेतु उद्यमिता जिन उद्योगों के पास अपने स्वयं के शक्ित सयंत्रा हैं उनमें एक दिन के लिए भी यह बंद हो जाये तो करोड़ों रुपए की हानि हो सकती है। एक सावर्जनिक क्षेत्रा के बहुत बड़े संगठन में कायर्रत एक इंजीनियर के लिए ग्राहकों की सेवा करते समय अपफसरशाही के व्यवहार से तालमेल बिठाना वास्तव में बहुत कठिन हो रहा था। उसका व्यक्ितगत दृष्िटकोण था कि ग्राहक की समस्या का समाधान पहले किया जाए कागजी कायर्वाही पिफर भी हो सकती है और अपफशाही का इससे टकराव हो रहा था। उसने नौकरी छोड़ दी तथा टबार्इन की मरम्मत एवं उन्हें दुरुस्त करने की वंफपनी शुरू कर दी। इससे संबंिात एक तथ्य है कि टबार्इन की मरम्मत अथवा उसको दुरुस्त करने पर व्यय अिाक हो रहा था। यदि टबार्इन को वंफपनी तक लाया जाता था, इससे परिवहन का खचार् एवं समय दोनों लगते थे इसलिए वंफपनी ने टबार्इन के पास स्वयं जाकर सेवा देना शुरू कर दिया जिससे काम करने का समय भी कम हो गया तथा ग्राहक भी खुश हो गया। बाद में वंफपनी ने एकदम चालू हालत में तैयार टबार्इन देने के आधार पर पुजर्े बनाने तथा वंफपनियों के अंदर उनके स्वयं के शक्ित संयत्रा लगाने प्रारंभ कर दिये। में कमर्चारियों को निणर्य लेने एवं कायर्वाही का मागर् निश्िचत करने में अपनी मजीर् की बहुत थोड़ी स्वतंत्राता दी जाती है। जिसके कारण वह अपने स्वयं का व्यवसाय करने के लिए प्रेरित होते हैं। शक्ित की आवश्यकता अपने अिाकारी से स्वतंत्रा होने की अपेक्षा अपने अहम की संतुष्िट के लिए अिाक होती है इसके लिए हैदराबाद के एक उद्यमी का उदाहरण लेते हैं। देखें बाॅक्स शीषर्क है व्यक्ितगत कायर् विश्िाष्टताओं को सुरिक्षत रखने के लिए उद्यमिता। उपयुर्क्त विवेचना का उद्यमिता विकास से क्या अभ्िाप्राय है। इसका अथर् है कि उद्यमिता के प्रवतर्न के लिए सही अभ्िाप्रेरणा का प्रदीपण एवं जागृति महत्त्वपूणर् है। अभ्िाप्रेरणा के अभाव में योग्य से योग्य व्यक्ित भी उद्यमिता को नहीं अपनाना चाहेगा। प्रत्येक उद्यमिता जागरुकता कायर्क्रम अथवा उद्यमिता विकास कायर्क्रम में उद्यमिता सक्षमता के सत्रा के साथ - साथ उद्यमिता अभ्िाप्रेरणा पर विशेष सत्रा भी होता है। आप ध्यान रखें अभ्िाप्ररणा एवं योग्यता एक दूसरे को सकारात्मक रूप से पुष्ट करते हैं। जिन लोगों के पास योग्यता है वह अपनी इस योग्यता को दिखाने के लिए अवसर तलाशते हैं इसीलिए वह उद्यमिता की ओर आवफ£षत होते हैं। जो व्यक्ित स्वतन्त्रा रूप से कायर् करना चाहता है वह अपने स्वप्नों को साकार करने के लिए का अथक परिश्रम करता है किसी ने सच ही कहा है कि उद्यमी वह स्वप्नदृष्टा होते हैं जो इसे साकार करते हैं। उद्यमिता अभ्िाप्रेरणा को समझने एवं विकसित करते समय यह श्िाक्षा प्राप्त करना महत्त्वपूणर् है कि अलग - अलग व्यक्ित अलग - अलग ढंग से अभ्िाप्रेरित होते हैं तथा कोइर् व्यक्ित अपने उद्यम से एक से अिाक आवश्यकताओं की संतुष्िट का प्रयत्न कर उद्यमिता विकास 439 सकता है। आथ्िार्क सि(ांत बड़े सरल शब्दों में कहता है कि किसी व्यावसायिक इकाइर् का उद्देश्य अथवा उद्यमी का उद्देश्य अिाकतम लाभ कमाना है। उद्यमिता मूल्य एवं दृष्िटकोण जब भी मनुष्य के व्यवहार का वणर्न होता है तो व्यक्ित का वास्ता दो शब्दों, मूल्य एवं मान्यताओं से पड़ता है। इन दो शब्दों में अंतर करने के स्थान पर यह कहना पयार्प्त होगा कि यदि उद्यमीय मूल्य एवं मान्यताओं को एक साथ लिया जाए तो इसका अथर् है लोगों के द्वारा उद्यमिता में सपफलता के लिए व्यवहारात्मक चयन करना। यहाँ शब्द चयन महत्त्वपूणर् है क्योंकि वैफसे व्यवहार किया जाता है इसके भी कइर् प्रकार हैं। उद्यमिता में बड़ी संख्या में व्यावहारिक प्रवृिायाँ अथवा अनुरूपण बताए गए हैं जिनका सपफलता में योगदान होता है। वैफश अथवा ज्ञ।ैभ् में उद्यमियों ने इन्हें आदत का नाम दिया है तो वुफछ अनुसंधानकतार्ओं ने इन्हें नीति अथवा रणनीतियाँ कहा है। चाहे आप उद्यमिता को अपनी जीवनवृिा के रूप में चुनने का निणर्य लेने या पिफर निराश्िा उत्पाद वृि की रणनीति, लाभ अजर्न एवं सामाजिक उत्तरदायित्व के संबंध में है। आप को चयन तो करना ही होगा। जो भी चुनाव आप करेंगे उसका आपके कायर् निष्पादन पर भारी प्रभाव पड़ेगा। हम किसी व्यवसाय को प्रारंभ करने एवं उसके प्रबंधन से जुड़ी समस्याओं एवं संबंिात वैकल्िपक व्यवहार, ;यहाँ हम दो उदाहरण को ले रहे हैंद्ध का खाका तैयार करेंगे। हमने उन विकल्पों को प्रमुखता दी है जिन्हें सामान्यतः श्रेष्ठ निष्पादन से जुड़ा पाया गया है। देखें तालिका उद्यमिता की समता के विभ्िान्न आचरण क्र. सं.आयाम वैकल्िपक आचरण 1.उद्यमिता का प्रकार पथप्रदशर्क/अभ्िानव उत्पादों को चुने जाँचें परखें उत्पादों को चुने, 2.व्यवसाय संबंधी निणर्य योग्यता/अनुभव को ध्यान में रख कर व्यवसाय का चुनाव करें जो भी अवसर मिले उसका तुरंत लाभ उठाएँ, 3.मानव संसाधन प्रबंधन भतीर् की नीति विश्वास करने योग्य, निभर्र करने योग्य एवं आज्ञाकारी कमर्चारियों की भतीर् करें योग्यता प्राप्त एवं प्रश्िाक्ष्िात पेशेवर कमर्चारियों की भतीर् करें 4.बढ़ोतरी का प्रबंधन गति केवल प्रबंध योग्य गति/ सीमा को ध्यान में रखकर बढ़ोतरी करें जितना वुफशलता से संभाल सवेंफ व्यवसाय का उतना ही विस्तार करें 5.‘संगठन’ः अध्िकार अंतरण की योग्यता ध्यान से पयर्वेक्षण करें अिाकारों का अंतरण एंव विवेंफद्रीयकरण करें 6.विपणन प्रबंध विपणन की अवधारणा जिस चीज का भी उत्पादन करें उसे बेचकर रहें ग्राहक की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उत्पादन करें 7.मानव संसाधन प्रबंधः क्षति - पूतिर् अतिरिक्त बढ़ोतरी/पदोन्नति दे अच्छे कायर् के परितोष्िाक के रूप में परितोषक क्या हो इसका निणर्य स्वंय लें 8.विकास/वृि का प्रबंधनः निदेशन मूल क्षमता के इदर् - गिदर् विकास करें जो भी अवसर मिलें उसे हाथ से न जाने दें 9.विपणन प्रबंध उत्पाद नियोजन बहुत ही आवश्यक हो तभी उत्पान को बदलें एवं विकास निरंतरता में नीवनता/सुधार लाएँ 10.परिचालन प्रबंधन स्थान का निणर्य व्यवसाय की स्थापना लोगों के समीप करें स्थानीयकरण के लिए केवल आ£थक दृष्िट से सपफलता को ध्यान में रखें 11.परिचालन प्रबंधनः उचित लागत आपू£तकतार्, कमर्चारी एवं ग्राहकों से भली - भाँति सौदेबाजी कर लाभ में वृि करें ऊपरी व्ययों में कटौती कर तथा कायर्वुफशलता में सुधार कर लागत कम करें 12.प्रतियोगिता का प्रबंधन प्रतियोगिता का सामना करें प्रतियोगिता से बचें 13.नियोजनः निणर्य लेने का तरीका व्यवसाय के संबंध में सूचना के लिए पयार्वरणा की सूक्षमता से जाँच करें अंतरात्मा न्यायोचित निणर्य पर निभर्र करें 14.संगठनः औपचारिक बनाना जो वुफछ करें स्वयं करें विशेषज्ञों की नियुक्ित करें एवं प्रणाली को पेशेवर बनाएँ 15.नैतिकता व्यावसायिक नैतिकता पर कोइर् समझौता न करें प्यार, यु( एवं व्यवसाय में सभी वुफछ जायश है 16.उत्तरािाकार संबंधी योजना उत्तरािाकारियों के संबंध में पूवर् निणर्य लें एवं उन्हें प्रश्िाक्ष्िात करें व्यवसाय स्वयं उत्तरािाकारी ढूँढ़ लेगा 17.नियोजनः समय सीमा लम्बी अविा को ध्यान में रखें प्रतिदिन परिस्िथतियों के अनुसार व्यवसाय चलाएँ 18.परिचालन प्रबंधनः अनुसंधान अनुसंधान एवं विकास में पैसा लगाएँ एवं विकास अनुसंधान एवं विकास ऐसी विलासता है जिसको वहन करना कठिन है मुख्य शब्दावली उद्यमिता उद्यम उद्यमिता जोख्िाम अनुसंधन अन्वेषण ग्रामीण उद्यमिता उद्यमिय अवसर उद्यमीय उपयुक्तता सारंाश उद्यमी, उद्यमिता एवं उद्यम शब्दों को अंग्रेजी भाषा में वाक्य की संरचना के समकक्ष रखकर समझा जा सकता है। उद्यमी व्यक्ित ;कतार्द्ध उद्यमिता प्रिया ;ियाद्ध तथा उद्यम व्यक्ित की रचना एवं प्रिया का निगर्त ;प्रयोजनद्ध होते हैं। उद्यमियों की आ£थक विकास एवं उद्यम दोनों में महत्त्वपूणर् भूमिका होती है। आ£थक विकास के संदभर् में उद्यमी अन्य लोगों के लिए व्यवसाय के अवसर पैदा करने तथा उस समाज में जिसमें वह रहते हैं जीवन की गुणवत्ता में सुधार के अतिरिक्त उद्यमी सकल घरेलू उत्पाद में वृि में पूँजी निमार्ण रोशगार पैदा करने में योगदान करते हैं। जहाँ तक उद्यम का संबंध है उद्यमी व्यवसाय का विचार करने, उसकी सम्भाव्यता का आकलन करने तथा अंततोगत्वा इस विचार को व्यावसायिक इकाइर् का रूप प्रदान करने तक अनेक कायर् करते हैं। वह व्यवसाय से जुड़ी अनिश्िचताओं एवं जोख्िामों को वहन करते हैं नये उत्पाद, नया बाशार नयी तकनीक तथा अन्य बहुत सी नवीनताओं का परिचय कराते हैं। विकासशील देशों के संदभर् में वह उद्यम के दिन प्रतिदिन के प्रबंधन का दायित्व भी लेते हैं। व्यापक स्तर पर आ£थक विकास एवं संवुफचित स्तर पर व्यवसाय प्रारंभ में इसकी अहम् भूमिका को ध्यान में रखें तो यह अनिवायर् है कि उद्यमिता को एक जीवन वृिा के विकल्प के रूप में लोकपि्रय बनाने के लिए चैतन्यता से प्रत्यन करना चाहिए। इसमें उद्यमिता जागरुकता कायर्क्रम ;उ.जा.का.द्ध एवं उद्यमिता विकास कायर्क्रम ;उ.वि.क.द्ध महत्त्वपूणर् भूमिका निभा सकते हैं। इसके साथ - साथ उद्यमिता मित्रा पयार्वरण तैयार करने की भी आवश्यकता है। उद्यमिता व्यक्ित विशेष एवं पयार्वरण के बीच गतिशील संवाद की देन होती है इसीलिए उद्यमिता की योग्यता, अभ्िाप्रेरणा मूल्य एवं उसके प्रति रुझान को विकसित करने की भी आवश्यकता है। अभ्यास बहुविकल्पीय प्रश्न निम्न प्रश्नों के सवार्िाक उपयुक्त उत्तर के आगे सही ; द्ध का निशान लगाएँ। 1.उद्यमी उठाता है। ;कद्ध सोची समझी जोख्िाम ;खद्ध उच्च जोख्िाम ;गद्ध निम्न जोख्िाम ;घद्ध सामान्य एवं तय की गइर् जोख्िाम। 2.अथर्शास्त्रा में निम्न में से कौन - सा उद्यमी का कायर् नहीं है। ;कद्ध जोख्िाम उठाना ;खद्ध पूँजी का प्रावधान एवं उत्पादन का संगठन ;गद्ध अभ्िानवता ;घद्ध दिन प्रतिदिन के व्यवसाय का संचालन। उद्यमिता विकास 3. निम्न में से कौन - सा कथन उद्यमिता एवं प्रबंध में अंतर को स्पष्ट नहीं करता है। ;कद्ध उद्यमी व्यवसाय को ढूँढ़ते हैंऋ प्रबंधक उसको चलाते हैं। ;खद्ध उद्यमी अपने व्यवसाय के स्वामी होते हैंऋ प्रबंधक कमर्चारी ;गद्ध उद्यमी लाभ कमाते हैंऋ प्रबंधकों को वेतन मिलता है ;घद्ध उद्यमी एक ही बार का कायर् हैऋ प्रबंधन निरंतर चलने वाली िया है। 4. किल्बी ने उद्यमी के जिन कायो± को बताया है उनमें से नीचे कौन - सा राजनैतिक प्रशासन का पक्ष नहीं है? ;कद्ध सरकारी अपफसरशाही से काम निकालना ;खद्ध संगठन में मानवीय संबंधों का प्रबंधन ;गद्ध उत्पादन के नये - नये तकनीक एवं नये - नये उत्पादों को लाना ;घद्ध ग्राहक एवं आपूतिर्कतार्ओं से संबंधों का प्रबंधन। 5.निम्न में से कौन - सा व्यवहार एक सपफल उद्यमिता से नहीं जुड़ा है। ;कद्ध अनुसंधान एवं विकास ;अ॰ एवं वि॰द्ध में निवेश ;खद्ध अपने व्यवसाय को दिन प्रतिदिन के आधार पर चलाना ;गद्ध निरंतर नवीनता एवं तत्कालिकता ;घद्ध ग्राहक की आवश्यकतानुसार उत्पादन। लघु उत्तरीय प्रश्न 1.‘उद्यमी’, ‘उद्यमिता’ एवं ‘उद्यम’ शब्दों के अथर् को स्पष्ट कीजिए। 2.उद्यमिता को एक रचनात्मक िया क्यों माना गया है? 3.फ्उद्यमी सामान्य जोख्िाम उठाते हैं।य् कथन की व्याख्या कीजिए। 4.उद्यमिता किस प्रकार से आ£थक ियाओं की दृश्यावली एवं क्षेत्रा को बढ़ाते हैं? 5.उद्यमिता में उपलब्ध् अभ्िाप्रेरणा की भूमिका का संक्षेप में वणर्न करें। दीघर् उत्तरीय प्रश्न 1.नये व्यवसाय को प्रारंभ करने की प्रिया के विभ्िान्न चरणों का संक्षेप में वणर्न कीजिए। 2.उद्यमिता एवं आ£थक विकास के बीच संबंध् की प्रवृफति का आकलन करें। 3.स्पष्ट करें कि अभ्िाप्रेरणा एवं योग्यताएँ किस प्रकार से व्यक्ित की उद्यमिता को जीवनवृिा के रूप में चुनने के निणर्य को प्रभावित करते हैं। अनुप्रयोगात्मक प्रश्न अंशुमन एक छोटी जड़ी - बूटी प्रसाध्न निमार्ता के यहाँ बहुत ही परिश्रमी बिक्री कायर्कारी अध्िकारी था व्यावसायिक इकाइर् के लिए जितनी बिक्री करता उसके बदले उसे अच्छा वेतन एवं कमीशन मिलता था। उसका दिल्ली के बाशार पर अच्छा अध्िकार था तथा इसके लिए वह अपरिहायर् बन गया था। वह अपनी पफमर् में स्पृहणीय स्िथति के प्रति जागरूक था तथा वह बड़ी - बड़ी बातें सोचता था - फ्किसी व्यवसाय की सपफलता की वंुफजी उसके उत्पादों का विक्रय होती है। व्यवसाय चव्रफ बिक्री पर रुकता है तथा दूसरे लोग जो कारखाने में वस्तुओं के निमार्ण कायर् में लगे हैं व्यवसाय की मशीन में पुजेर् मात्रा हैं, जिस मशीन को बिक्रीकतार् चालू रखते हैं। तो पफमर् की सपफलता में एक मामूली अंश के बदले इतने भार को क्यों ढोया जाए। बजाय इसके कि मेरी मेहनत के पफल का लाभ दूसरों को मिले क्यों न मैं अपना ही व्यवसाय प्रारंभ कर लूं?य् क्या अंशुमन को यह कदम उठाना चाहिए? अपने उत्तर के पक्ष में कारण दीजिए। समस्या उत्साहवध्र्क कायर्: दिहाड़ी मशदूर उद्यमी बना प्रकाश सिंह बृहस्पतिवार 8 माचर्, 2007 ;पटनाद्ध मैक्सीको की एक वैबसाइट ने बिहार की एक भूमिहीन महिला को एश्िाया की 25 शीषर्स्थ किसानों में नामांकित किया है। 45 वषीर्य लाल मुनी देवी दिहाड़ी पर मजदूरी करती थी जब उसने नियार्त को अपने हाथ में लेने का निणर्य लिया तथा मशरूम की खेती की सपफल किसान बन गइर्। आज केवल 600 रुपए निवेश कर प्रतिवषर् 12000 रुपए कमा लेती है। उसकी सपफलता का जिक्र मैक्सीको की वैबसाइट पर किया गया है। इस वैबसाइट ने अपनी पफोटो गैलेरी में प्रेरणा के ड्डोत 25 श्िाखर किसानों के समूह में उसे स्थान दिया है। लाल मुनी देवी कहती हैं फ्मैं एक गरीब महिला हूँ। मैंने सोचा कि मशरूम की खेती से मुझे लाभ होगा इसीलिए मैंने इसे प्रारंभ किया। अब मैं अपने परिवार के लिए जीविका अजिर्त कर सकती हूँ।य् सपफल उद्यम सपफलता की इस कहानी ने पटना के गाँव आशादपुर में कइर् महिलाओं को प्रेरित किया है। उद्यमिता विकास फ्उमिर्ला देवी कहा कहना है,य् यह एक बिना कोइर् प्रयत्न की खेती है जिसे हम अपने गाँव में भी कर सकते हैं। तपती दोपहरी में कायर् करना बड़ा थका देने वाला है। मशरूम की खेती से अध्िक लाभ मिलता है। लाल मुनी एवं अन्य भूमिहीन महिलाओं को भारतीय कृष्िा अनुसंधन परिषद् ने मशरूम की खेती करने के लिए प्रोत्साहित किया है। भारतीय कृष्िा अनुसंधन परिषद् के प्रधनाचायर् एवं वैज्ञानिक डाॅ. ए. आरखान ने कहा, यह वैकल्िपक जीवन यापन सहायक प्रणाली के माध्यम से गरीब से गरीब की सहायता करना है। इसके लिए हमने उस गाँव को चुना जहाँ लोगों के पास खेती के लिए जमीन नहीं है तथा जिन्हें पफसल काटने का कायर् करना होता है। लाल मुनी की कोश्िाशों ने अन्य बहुत सी भूमिहीन महिलाओं का मशरूम की खेती कर थोड़े से परिश्रम से अपने परिवार के जीवन यापन के लिए आय अजिर्त करने के लिए मागर् प्रशस्त कर दिया है। ड्डोत - ूूूण्दकजअण्बवउध् झलकी प्रश्न 1.लाल मुनी देवी ने प्रेरणा प्रदान करने वाला कौन सा कायर् किया? 2.क्या आप सोचते है कि आप भी एक उद्यमी बन सकते हैं? 3.लाल मुनी देवी उद्यमी के कौन से गुणों को दशार्ती है? 4.एक उद्यमी बनने से क्या लाभ तथा क्या जोख्िाम हैं? इन जोख्िामों से आप वैफसे अपनी सुरक्षा कर सकते हैं? ;अध्यापकों को उद्यमियों के गुणों को प्रमुख रूप से बताना चाहिए तथा विद्याथ्िार्यों को ऐसा करने के लिए अभ्िाप्रेरित करना चाहिए। भारत सरकार इसमें क्या सहायता कर सकती हैं। यह वैबसाइट पर ूूूण्पदकपंण्हवअण्पदण्पर उपलब्ध् हैद्ध परियोजना कायर् 1.आपके पड़ोस में कोइर् नया व्यवसाय प्रारंभ हुआ है उसको देखने जाएँ तथा उसके स्वामी का साक्षात्कार लें। उसने इस उद्यम को प्रारंभ का निणर्य वैफसे लिया तथा इसमें उसको क्या कठिनाइयाँ आइर् इस पर अपनी रिपोटर् तैयार करें। स्वामी ने इन कठिनाइयों का सामना करने के लिए क्या कदम उठाए इनको भी सम्िमलित करें। निष्कषर् की कक्षा में चचार् करें। 2.ध्ीरू भाइर् अंबानी, जमशेद जी टाटा, डी. डी. बिरला एवं किरण मजूमदार शा आदि जैसे महान उद्यमियों के जीवन इतिहास का अध्ययन कीजिए। इन लोगों में पायी गयी समान विश्िाष्टताओं की सूची तैयार कीजिए तथा कक्षा में इन पर चचार् कीजिए। क्या आप इनमें से वुफछ विश्िाष्टताओं को प्राप्त कर सकते हैं तथा अपने जीवन में कोइर् उद्यम प्रारंभ कर सकते हैं? टिप्पणी टिप्पणी टिप्पणी

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