मैं स्वूफल से लौट रही थी। घर पर दो लोगों को अपनी बात सबसे पहले बताना चाहती थी। वे मेरी बातों से सबसे श्यादा खुश होते हैं। पहली तो हैं मेरी नानी। वे उत्सुक रहती हैं मेरी बातें सुनने को। वे मेरे स्वूफल से लौटने का इंतशार करती हैं। उनकी उम्र वुफछ श्यादा है और उनकी कमर में भी ददर् रहता है। नानी उफँचा सुनती हैं और दिखता भी कम है। रोश सुबह पापा उनको अखबार शोर - शोर से पढ़कर सुनाते हैं। नानी अपना बाकी सारा काम खुद करती हैं। उनकी कोइर् मदद करे, तो वे परेशान हो जाती हंै। दिखता है कम पर सब्शी काटने का बहुत शौक है। कहती हैं μ आजकल के बच्चों को सब्शी भी काटनी नहीं आती। मोटा - मोटा और टेढ़ा - मेढ़ा काटकर रख देते हैं।दूसरे हैं, मेरे रवि भैया। रवि भैया हमारे घर में ही रहते हैं। मैं उन्हें रवि भैया कहती हँू और वे मेरे पापा - मम्मी को कहते हैं μ भैया - भाभी। हमारा क्या रिश्ता है, मैं नहीं जानती पर वे हैं मेरे प्यारे भैया। वे मेरे सवालों का उत्तर देने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। कभी नहीं कहा μ बाद में बताउफँगा। रवि भैया काॅलेज में पढ़ाते हैं। कालॅजेफ बच्चे उनकी बहुत इज्शत करते हैं। वुफछ तो उनसे पढ़ने घर भी आते हैं। रवि भैया को संगीत सुनने, नाटकों में भाग लेने, दोस्तों के साथ घूमने और बातें करने का त शौक है। खूब हँसते - हँसाते भी हैं। भैया जब घर के बाहर जाते हैं, तब ़ोफद छड़ी ले जाते हैं। उनको घर के अंदर घूमता देख कोइर् नहीं कह सकता कि उन्हें दिखता नहीं है। वे अपना काम स्वयं करना चाहते हैं। कोइर् उन्हें शबरदस्ती सहारा दे तो वे नाराश हो जाते हैं। जब कभी उन्हें मदद की शरूरत होती है तो वे माँग लेते हैं। वुफछ बच्चे रवि भैया से काॅलेज की किताबें ले जाते हैं और वुफछ दिन बाद किताबों के साथ उन्हें टेप दे जाते हैं। रवि भैया टेप पर ही उन किताबों को सुनते रहते हैं। भैया के पास मोटे कागश की भी कइर् किताबें हैं, जिनमें बहुत सारे उभरे बिंदु हैं। उन पर वे हाथ पेफरकर पढ़ते हैं। भैया को छेड़ने के लिए मैं कभी - कभी उनकी छड़ी की जगह बदल देती हँू। वे परेशान तो होते हैं, पर नाराश नहीं। मैं उनकी प्यारी बहन सीमा जो ठहरी! मैं अभी दरवाशे पर पहँुची ही थी कि भैया बोल उठे μ क्यों सीमा, बहुत खुश हो? भैया मुझे ही नहीं, घर के सभी लोगों को उनकी आहट से पहचान लेते हैं। अक्सर यह भी भाँप लेते हैं कि मैं खुश हँू या उदास। भैया! आख्िार मैं पुफटबाॅल टीम में शामिल हो ही गइर् हँू μ मैंने भैया को अपनी खबर सुनाइर्। भैया मेरी पीठ थपथपाकर बोले μ आज से तुम ही हो मेरी पुफटबाॅल की उस्ताद! ❉ सीमा के पापा उसकी नानी को अखबार शोर - शोर से पढ़कर सुनाते हैं। तु़म बडी उम्र वाले लोगों की वैफसे मदद करते हो? ❉ जब कोइर् व्यक्ित बूढ़ा हो जाता है, तब उनको क्या - क्या तकलीपेंफ हो़सकती हैं? ❉ रवि भैया बिना देखे कइर् सारी बातें वैफसे जान जाते हैं? कहानियों में बच्चे रुचि लेते हैं तथा कहानी के पात्रों की मदद से संवेदनशीलता पैदा की जा सकती है। ❉ क्या तुम्हें कभी छड़ी की शरूरत पड़ी है? कब? ❉ क्या तुम सोच सकते हो तुम्हें छड़ी की शरूरत कब पड़ सकती है? ❉ हम उन लोगों की मदद वैफसे कर सकते हैं, जिन्हें दिखता नहीं है? क्या तुम्हारे परिवार में कोइर् ऐसा सदस्य है, जो देख, बोल या सुन नहीं सकता? क्या तुम किसी ऐसे व्यक्ित को जानते हो? इनके काम में लोग वैफसे मदद करते हैं? तुमने कहानी में पढ़ा कि रवि भैया देख नहीं सकते। लेकिन वे अपने सारे काम खुद ही करते हैं। वे अलग तरह की किताबें पढ़ते हैं। वे वैफसे अपना काम करते होंगे μ यह समझने के लिए पहले आँखें बंद करके पहचानने का खेल खेलो। आँख मिचैनी समूह में एक बच्चा अपनी आँखों पर पट्टðी बाँध्े। पिफर बाकी बच्चे एक - एक करके चुपचाप उस बच्चे के पास आएँ। आँखें बंद किया बच्चा दूसरे पर हाथ पेफरकर उसे पहचानने की कोश्िाश करे। ध्यान रहे कोइर् आवाश न करे। क्यों? इसी तरह बारी - बारी सभी बच्चों की आँखों पर पट्टðी बाँधे ताकि वे दूसरे बच्चों को पहचानने की कोश्िाश करें। स्वयं को किसी और की परिस्िथति में रखने से हम उनकी समस्याओं को बेहतर समझ पाते ह।ैंअब आपस में बात करो और बताओ μ ♦ कितने बच्चे छूकर किसी को पहचान पाए? ♦ कितने बच्चे आवाश सुनकर बच्चों को पहचान पाए? ♦ दोनों में से क्या श्यादा आसान था? ❉ छू कर बताओ तुम्हारे मुँह में कितने दाँत हैं। कक्षा में किन बच्चों के सबसे श्यादा दाँत हैं? ❉ क्या - क्या चीशें तुम केवल छूकर जान सकते हो? ❉ आँखें बंद करके बैठो और सुनो। किस - किस की आवाशें सुनाइर् देती हैं? किन लोगों की आहट पहचान सकते हो? ❉ केवल सूँघ कर क्या तुम किसी व्यक्ित को या किसी जानवर को पहचान सकते हो? जो लोग देख नहीं सकते उनके पढ़ने का एक खास तरीका है, जिसे बे्रल कहते हैं। ब्रेल एक मोटे कागश पर एक नुकीले औशार से बिंदु बना कर लिखा जाता है। बे्रल कागश पर हाथ पेफर कर पढ़ा जाता है कि उस पर क्या लिखा ह।ैआओ, अब यह देखते हैं कि बिना देखे किसी आकार को पहचानना मुश्िकल है या आसान। एक रेगमाल की शीट लो। उस पर मोटे उफन या सुतली को दबाकर किसी चीश का आकार बनाओ। अपने दोस्त को कहो कि वह आँखें बंद करके, हाथ पेफरकर बताए कि तुमने क्या आकार बनाया है। ❉ अपने दोस्त से इसी तरह की रेगमाल शीट पर कोइर् आकार बनाने को कहो। ❉ क्या यह उसके लिए पहचानना आसान था या मुश्िकल? अब तुम करके देखो कि क्या तुम हाथ पेफर कर आकार पहचान सवेंफ। एक मोटे कागश का टुकड़ा लो। उस पर एक प्रकार या कील की नोक से कोइर् खास आकार बनाते हुए थोड़ी - थोड़ी दूरी पर छेद कर दो। तुम देखोगे कि कागश एक तरप़्ाफ से उभरा है। अब अपने दोस्त से कहो कि वह आँखें बंद करके तुम्हारे कागश पर हाथ पेफरे और बताए कि तुमने क्या बनाया है। है न मुश्िकल यह बताना? सोचो कि लोग देखे बगैर वैफसे इतना पढ़ लेते हैं। आओ ब्रेल के बारे में जानें तुमने देखा कि रवि भैया एक खास तरह की किताबें ही पढ़ सकते हैं। ये किताबें वैफसे बनीं? इसके बारे में सबसे पहले किसने सोचा होगा? आओ, इस ब्रेल के बारे में वुफछ बातें जानें। लुइर् ब्रेल प्रफाँस देश का रहने वाला था। जब वह तीन साल का था, तब एक दिन अपने पिता के औशारों से खेल रहा था। अचानक एक नुकीले औशार से उसकी आँखों में चोट लग गइर् और आँखें खराब हो गइर्ं। उसे आँखों से दिखना बिल्वुफल बंद हो गया। उसकी पढ़ने में बहुत रुचि थी। उसने हार नहीं मानी। वह पढ़ने के लिए तरह - तरह की तरकीबें सोचता रहता था। आख्िार उसने ढूँढ़ ही लिया एक तरीका μ छूकर पढ़ने का। यह बाद में ब्रेल लिपि के नाम से जानी जाने लगी। इस तरह की लिपि में मोटे कागश पर उभरे हुए बिंदु बने होते हैं। उभरे होने के कारण इन्हें छूकर पढ़ा जा सकता है। यह लिपि छः बिंदुओं पर आधरित होती है। आजकल ब्रेल में नए - नए परिवतर्न हुए हैं, जिससे इसे पढ़ना - लिखना और भी आसान हो गया है। ब्रेल लिपि अब कंप्यूटर के द्वारा भी लिखी जा सकती है। बच्चे ब्रेल लिपि को देखेंगे तो बेहतर ढंग से समझ पाएँगें। ब्रेल लिपि की जानकारी देते समय बच्चों को वास्तविक ब्रेल शीट दिखाना अच्छा रहेगा।

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