वंफचा ह नीम के पेड़ों की घनी छाँव से होता हुआ सियार की कहानी का मशा लेता आ रहा था। हिलते - डुलते उसका बस्ता दोनों तरप़्ाफ झूमता - खनकता था। स्लेट कभी छोटी शीशी से टकराती तो कभी पेंसिल से। यों वे सब उस बस्ते के अंदर टकरा रहे थे। मगर वह न वुफछ सुन रहा वह चलते - चलते दुकान के सामने पहुँचा। वहाँ अलमारी में काँच के बड़े - बड़े जार कतार में रखे थे। उनमें चाॅकलेट, पिपरमेंट और बिस्वुफट थे। उसकी नशर उनमें से किसी पर नहीं पड़ी। क्यों देखे? उसके पिता जी उसे येे चीशें बराबर ला देते हैं। वंफचा पिफर भी एक नए जार ने उसका ध्यान आवृफष्ट किया। वह वंफध्े से लटकते बस्ते का पफीता एक तरपफ हटाकर, उस जार वेफ़सामने खड़ा टुकर - टुकर ताकता रहा। नया - नया लाकर रखा गया है। उससे पहले उसने वह चीश यहाँ नहीं देखी है। पूरे जार में वंफचे हैं। हरी लकीरवाले बढि़या सपेफद गोल वंफचे। बड़े आँवले जैसे। कितने खूबसूरत हैं! अब तक ये कहाँ थे?़शायद दुकान के अंदर। अब दुकानदार ने दिखाने के लिए बाहर रखा होगा। उसके देखते - देखते जार बड़ा होने लगा। वह आसमान - सा बड़ा हो गया तो वह भी उसके भीतर आ गया। वहाँ और कोइर् लड़का तो नहीं था। पिफर भी उसे वही पसंद था। छोटी बहन के हमेशा के लिए चले जाने के बाद वह अकेले ही खेलता था। वह वंफचे चारों तरप़्ाफ बिखेरता मशे में खेलता रहा। तभी एक आवाश आइर्। फ्लड़के, तू उस जार को नीचे गिरा देगा।य् वह चैंक उठा। जार अब छोटा बनता जा रहा था। छोटे जार में हरी लकीरवाले सप़्ोफद गोल वंफचे। छोटे आँवले जैसे। सिप़्ार्फ दो जने वहाँ हैं। वह और बूढ़ा दुकानदार। दुकानदार के चेहरे पर वुफछ चिड़चिड़ाहट थी। फ्मैंने कहा न! जो चाहते हो वह मैं निकालकर दूँ।य् वह उदास हो अलग खड़ा रहा। फ्क्या वंफचा चाहिए?य् दुकानदार ने जार का ढक्कन खोलना शुरू किया। उसने निषेध् में सिर हिलाया। 87 वसंत भाग - 2 फ्तो पिफर?य् सवाल खूब रहा। क्या उसे वंफचा चाहिए? क्या चाहिए? उसे खुद मालूम नहीं है। जो भी हो, उसने वंफचे को छूकर देखा। जार को छूने पर वंफचे का स्पशर् करने का अहसास हुआ। अगर वह चाहता तो वंफचा ले सकता था। लिया होता तो? स्वूफल की घंटी सुनकर वह बस्ता थामे हुए दौड़ पड़ा। देर से पहुँचनेवाले लड़कों को पीछे बैठना पड़ता है। उस दिन वही सबके बाद पहुँचा था। इसलिए वह चुपचाप पीछे की बेंच पर बैठ गया। सब अपनी - अपनी जगह पर हैं। रामन अगली बेंच पर है। वह रोश समय पर आता है। तीसरी बेंच के आख्िार में मल्िलका के बाद अम्मु बैठी है। जाॅजर् दिखाइर् नहीं पड़ता। लड़कों के बीच जाॅजर् ही सबसे अच्छा वंफचे का ख्िालाड़ी है। कितना भी बड़ा लड़का उसके साथ खेले, जाॅजर् से मात खाएगा। हारने पर यों ही विदा नहीं हो सकता। हारे हुए को अपनी बंद मुऋी शमीन पर रखनी होगी। तब जाॅजर् वंफचा चलाकर बंद मुऋी के जोड़ों की हंी तोड़ेगा। जाॅजर् क्यों नहीं आया? अरे हाँ! जाॅजर् को बुखार है न! उसे रामन ने यह सूचना दी थी। उसने मल्िलका को सब बताया था। जाॅजर् का घर रामन के घर के रास्ते में पड़ता है। 88 अप्पू कक्षा की तरप़्ाफ ध्यान नहीं दे रहा है। वंफचा मास्टर जी! उसने हड़बड़ी में पुस्तक खोलकर सामने रख ली। रेलगाड़ी का सबक था। रेलगाड़ी...रेलगाड़ी। पृष्ठ सैंतीस। घर पर उसने यह पाठ पढ़ लिया है। मास्टर जी बीच - बीच में बेंत से मेश ठोकते हुए उँफची आवाश में कह रहे थेμफ्बच्चो! तुममें से कइर् ने रेलगाड़ी देखी होगी। उसे भाप की गाड़ी भी कहते हैं क्योंकि उसका यंत्रा भाप की शक्ित से ही चलता है। भाप का मतलब पानी से निकलती भाप से है। तुम लोगों के घरों के चूल्हे में भी...।य् अप्पू ने भी सोचाμरेलगाड़ी! उसने रेलगाड़ी देखी है। छुक - छुक...यही रेलगाड़ी है। वह भाप की भी गाड़ी का मतलब...। मास्टर जी की आवाश अब कम उँफची थी। वे रेलगाड़ी के हर एक हिस्से के बारे में समझा रहे थे। फ्पानी रखने के लिए खास जगह है। इसे अंग्रेशी में बाॅयलर कहते हैं। यह लोहे का बड़ा पीपा है।य् लोहे का एक बड़ा काँच का जार। उसमें हरी लकीरवाले सपेफद गोल वंफचे।़बड़े आँवले जैसे। जाॅजर् जब अच्छा होकर आ जाएगा, तब उससे कहेगा। उस समय जाॅजर् कितना खुश होगा! सिप़्ार्फ वे दोनों खेलेंगे। और किसी को साथ खेलने नहीं देंगे। उसके चेहरे पर चाॅक का टुकड़ा आ गिरा। अनुभव के कारण वह उठकर खड़ा हो गया। मास्टर जी गुस्से में हैं। फ्अरे, तू उध्र क्या कर रहा है?य् उसका दम घुट रहा था। फ्बोल।य् वह खामोश खड़ा रहा। फ्क्या नहीं बोलेगा?य् वे अप्पू के पास पहुँचे। सारी कक्षा साँस रोके हुए उसी तरप़्ाफ देख रही है। 89उसकी घबराहट बढ़ गइर्। वसंत भाग - 2 फ्मैं अभी किसके बारे में बता रहा था?य् कमर्ठ मास्टर जी उस लड़के का चेहरा देखकर समझ गए कि उसके मन में और वुफछ है। शायद उसने पाठ पर ध्यान दिया भी हो। अगर दिया है तो उसका जवाब उसके मन से बाहर ले आना है। इसी में उनकी सपफलता है। पड़ोसी कक्षा की टीचर ने दरवाशे से झाँककर देखा। पिफर सम्िमलित हँसी। रोकने की पूरी कोश्िाश करने पर भी वह अपना दुख रोक नहीं सका। सुबकता रहा। रोते - रोते उसका दुख बढ़ता ही गया। सब उसकी तरपफ देख - देखकर उसकी़हँसी उड़ा रहे हैं। रामन, मल्िलका...सब। बेंच पर खड़े - खड़े उसने सोचा, दिखा दूँगा सबको। जाॅजर् को आने दो। जाॅजर् जब आए...जाॅजर् के आने पर वह वंफचे खरीदेगा। इनमें से किसी को वह खेलने नहीं बुलाएगा। वंफचे को देख ये ललचाएँगे। इतना खूबसूरत वंफचा है। हरी लकीरवाले सप़्ोफद गोल वंफचे। बड़े आँवले जैसे। तब..शक हुआ। वंफचा मिले वैफसे? क्या माँगने पर दुकानदार देगा? जाॅजर् को साथ 90 लेकर पूछें तो, नहीं दे तो? वंफचा फ्किसी को शक हो तो पूछ लो।य् मास्टर जी ने उस घंटे का सबक समाप्त किया। फ्क्या किसी को कोइर् शक नहीं?य् अप्पू की शंका अभी दूर नहीं हुइर् थी। वह सोच रहा थाμक्या जाॅजर् को साथ ले चलने पर दुकानदार वंफचा नहीं देगा? अगर खरीदना ही पड़े तो कितने पैसे लगेंगे? रामन ने मास्टर जी से सवाल किया और उसे सवाल का जवाब मिला। अम्िमण्िा ने शंका का समाधन कराया। कइर् छात्रों ने यह दुहराया। फ्अप्पू, क्या सोच रहे हो?य् मास्टर जी ने पूछा। फ्हूँ, पूछ लो न? शंका क्या है?य् क्या करेगा?य् 91 वसंत भाग - 2 वह खेलेगा। जाॅजर् के साथ खेलेगा। रेलगाड़ी नहीं, वंफचा। चपरासी एक नोटिस लाया। मास्टर जी ने कहा, फ्जो पफीस लाए़हैं, वे आॅप्िाफस जाकर जमा कर दें।य़्बहुत से छात्रा गए। राजन ने जाते - जाते अप्पू के पैर में चिकोटी काट ली। उसने पैर खींच लिया। उसे याद आया। उसे भी प़्ाफीस जमा करनी है। पिता जी ने उसे डेढ़ रुपया इसके लिए दिया है। उसने अपनी जेब टटोलकर देखाμ एक रुपये का नोट और पचास पैसेे का सिक्का। वह बेंच से उतरा। फ्किध्र?य् मास्टर जी ने पूछा। उसके वंफठ से खुशी के बुलबुले उठे। फ्प़्ाफीस देनी है।य् फ्पफीस मत देना।य् मास्टर ने कहा।़वह झिझकता रहा। फ्आॅन दि बेंच।य् वह बेंच पर चढ़कर रोने लगा। फ्क्या भविष्य में कक्षा में ध्यान से पढ़ेगा?य् फ्ध्या...ध्यान दूँगा।य़्वह दफ्रतर गया।दफ्ऱतर में बड़ी भीड़ थी। बच्चो, एक - एक करके आओ। क्लवर्फ बाबू बता रहे हैं। पहले मैं आया हूँ।92 वंफचा हूँ...मैं ही आया हूँ। मेरे बाकी पैसे? इस शोरगुल से अप्पू दूर खड़ा रहा। रामन ने पफीस जमा की। मल्िलका ने जमा की। अब थोड़े से लड़के ही़बचे हैं। वह सोच रहा थाμजाॅजर् को साथ लेकर चलूँ तो देगा न? शायद दे। नहीं तो कितने पैसे लगेंगे? पाँच पैसे - दस पैसे। हरी लकीरोंवाले गोल सपेफद वंफचे।़घंटी बजने पर प़्ाफीस जमा किए हुए सभी बच्चे उध्र से चले। वह भी चला, मानो नींद से जागकर चल रहा हो। फ्क्या सब प़्ाफीस जमा कर चुके?य् कक्षा छोड़ने के पहले मास्टर जी ने पूछा। वह नहीं उठा। शाम को थोड़ी देर इध्र - उध्र टहलता रहा। लड़के गीली मि‘ी में छोटे गइे खोदकर वंफचे खेल रहे थे। वह उनके पास नहीं गया। पफाटक के सींखचे थामे, उसने सड़क की तरप़्ाफ देखा। वहाँ उस मोड़ पर दुकान है। दुकान में अलमारी। बाहर खड़े - खड़े छू सकेगा। अलमारी में शीशे के जार हैं। उनमें एक जार में पूरा..बस्ता वंफध्े पर लटकाए वह चलने लगा। दुकान नशदीक आ रही है। उसकी चाल की तेशी बढ़ी। वह अलमारी के सामने खड़ा हो गया। दुकानदार हँसा। उसे मालूम हुआ कि दुकानदार उसके इंतशार में है। वह भी हँसा। फ्वंफचा चाहिए, है न?य् उसने सिर हिलाया। दुकानदार जार का ढक्कन जब खोलने लगा तब अप्पू ने पूछाμफ्अच्छे वंफचे हैं न?य् 93 वसंत भाग - 2 फ्बढि़या, पफस्टर् क्लास वंफचे। तुम्हें कितने वंफचे चाहिए?य़्कितने वंफचे चाहिए, कितने चाहिए, कितने? उसने जेब में हाथ डाला। एक रुपया और पचास पैसे हैं। उसने वह निकालकर दिखाया। दुकानदार चैंकाμफ्इतने सारे पैसों के?य् फ्सबके।य् पहले कभी किसी लड़के ने इतनी बड़ी रकम से वंफचे नहीं खरीदे थे। फ्इतने वंफचों की शरूरत क्या है?य् फ्वह मैं नहीं बताउँफगा।य् दुकानदार समझ गया। वह भी किसी शमाने में बच्चा रहा था। उसके साथी मिलकर खरीद रहे होंगे। यही उनके लिए खरीदने आया होगा। वह वंफचे खरीदने की बात जाॅजर् के सिवा और किसी को बताना नहीं चाहता था। दुकानदार ने पूछाμफ्क्या तुम्हें वंफचा खेलना आता है?य् वह नहीं जानता था। फ्तो पिफर?य् वैफसे - वैफसे सवाल पूछ रहा है। उसका ध्ीरज जवाब दे रहा था। उसने हाथ पैफलाया। फ्दे दो।य् दुकानदार हँस पड़ा। वह भी हँस पड़ा। कागश की पोटली छाती से चिपटाए वह नीम के पेड़ों की छाँव में चलने लगा। वंफचे अब उसकी हथेली में हैं। जब चाहे बाहर निकाल ले। 94 उसने पोटली हिलाकर देखा। वंफचा वह हँस रहा था। उसका जी चाहता थाμ काश! पूरा जार उसे मिल जाता। जार मिलता तो उसके छूने से ही वंफचे को छूने का अहसास होता। एकाएक उसे शक हुआ। क्या सब वंफचों में लकीर होगी? उसने पोटली खोलकर देखने का निश्चय किया। बस्ता नीचे रखकर वह धीरे से पोटली खोलने लगा। पोटली खुली और सारे वंफचे बिखर गए। वे सड़क के बीचोंबीच पहुँच रहे हैं। क्षणभर सकपकाने के बाद वह उन्हें चुनने लगा। हथेली भर गइर्। वह चुने हुए वंफचे कहाँ रखे? स्लेट और किताब बस्ते से बाहर रखने के बाद वंफचे बस्ते में डालने लगा। एक, दो, तीन, चार..एक कार सड़क पर ब्रेक लगा रही थी। वह उस वक्त भी वंफचे चुनने में मग्न था। ड्राइवर को इतना गुस्सा आया कि उस लड़के को कच्चा खा जाने की इच्छा हुइर्। उसने बाहर झाँककर देखा, वह लड़का क्या कर रहा है? हाॅनर् की आवाश सुन वंफचे चुनते अप्पू ने बीच में सिर उठाकर देखा। सामने एक मोटर है और उसके भीतर ड्राइवर। उसने सोचाμक्या वंफचे उसे भी अच्छे लग रहे हैं? शायद वह भी मशा ले रहा है। 95 वसंत भाग - 2 एक वंफचा उठाकर उसे दिखाया और हँसाμफ्बहुत अच्छा है न!य् ड्राइवर का गुस्सा हवा हो गया। वह हँस पड़ा। बस्ता वंफध्े पर लटकाए, स्लेट, किताब, शीशी, पेंसिलμसब छाती से चिपकाए वह घर आया। उसकी माँ शाम की चाय तैयार कर उसकी राह देख रही थी। बरामदे की बेंच पर स्लेट व किताबें पेंफककर वह दौड़कर माँ के गले लग गया। उसके लौटने में देर होते देख माँ घबराइर् हुइर् थी। उसने बस्ता शोर से हिलाकर दिखाया। फ्अरे! यह क्या है?य् माँ ने पूछा। फ्मैं नहीं बताउँफगा।य् वह बोला। फ्मुझसे नहीं कहेगा?य् फ्कहूँगा। माँ, आँखें बंद कर लो।य् माँ ने आँखें बंद कर लीं। उसने गिना, वन, टू, थ्री..माँ ने आँखें खोलकर देखा। बस्ते में वंफचे - ही - वंफचे थे। वह वुफछ और हैरान हुइर्। फ्इतने सारे वंफचे कहाँ से लाया?य् फ्खरीदे हैं।य् फ्पैसे?य् पिता जी की तसवीर की ओर इशारा करते हुए उसने कहाμफ्दोपहर को दिए थे न?य् माँ ने दाँतों तले उँगली दबाइर्। पफीस के पैसे? इतने सारे वंफचे काहे को लिए?़आख्िार खेलोगे किसके साथ? उस घर में सिप़्ार्फ वही है। उसके बाद एक मुन्नी हुइर् थी। उसकी छोटी बहन। मगर..माँ की पलवेंफ भीग गईं। उसकी माँ रो रही है। अप्पू नहीं जान सका कि माँ क्यों रो रही हैै। क्या वंफचा खरीदने से? ऐसा 96 तो नहीं हो सकता। तो पिफर? उसकी आँखों के सामने बूढ़ा दुकानदार और कार का ड्राइवर खड़े - खड़े हँस रहे थे। वे सब पसंद करते हैं। सिपर्फ माँ को वंफचे क्यों पसंद नहीं आए?़शायद वंफचे अच्छे नहीं हैं। बस्ते से आँवले जैसे वंफचे निकालते हुए उसने कहाμफ्बुरे वंफचे हैं, हैं न?य् फ्नहीं, अच्छे हैं।य् फ्देखने में बहुत अच्छे लगते हैं न?य् फ्बहुत अच्छे लगते हैं।य् वह हँस पड़ा। उसकी माँ भी हँस पड़ी। आँसू से गीले माँ के गाल पर उसने अपना गाल सटा दिया। अब उसके दिल से खुशी छलक रही थी। ऽ कहानी से 1.वंफचे जब जार से निकलकर अप्पू के मन की कल्पना में समा जाते हैं, तब क्या होता है? 2.दुकानदार और ड्राइवर के सामने अप्पू की क्या स्िथति है? वे दोनांे उसको देखकर पहले परेशान होते हैं, पिफर हँसते हैं। कारण बताइए। 3.‘मास्टर जी की आवाश अब कम उँफची थी। वे रेलगाड़ी के बारे में बता रहे थे।’ मास्टर जी की आवाश धीमी क्यों हो गइर् होगी? लिख्िाए। कहानी से आगे 1.वंफचे, गिल्ली - डंडा, गेंदतड़ी ;पिट्ठ 97 वसंत भाग - 2 अनुमान और कल्पना 1.जब मास्टर जी अप्पू से सवाल पूछते हैं तो वह कौन सी दुनिया में खोया हुआ था? क्या आपके साथ भी कभी ऐसा हुआ है कि आप किसी दिन क्लास में रहते हुए भी क्लास से गायब रहे हों? ऐसा क्यों हुआ और आप पर उस दिन क्या गुशरी? अपने अनुभव लिख्िाए। 2.आप कहानी को क्या शीषर्क देना चाहेंगे? 3.गुल्ली - डंडा और िकेट में वुफछ समानता है और वुफछ अंतर। बताइए, कौन सी समानताएँ हैं और क्या - क्या अंतर हैं? भाषा की बात 1.नीचे दिए गए वाक्यों में रेखांकित मुहावरे किन भावों को प्रकट करते हैं? इन भावों से जुड़े दो - दो मुहावरे बताइए और उनका वाक्य में प्रयोग कीजिए। ्रमाँ ने दाँतों तले उँगली दबाइर्। ्रसारी कक्षा साँस रोके हुए उसी तरप़्ाफ देख रही है। 2. विशेषण कभी - कभी एक से अिाक शब्दों के भी होते हैं। नीचे लिखे वाक्यों में रेखांकित हिस्से क्रमशः रकम और वंफचे के बारे में बताते हैं, इसलिए वे विशेषण हैं। पहले कभी किसी ने इतनी बड़ी रकम से वंफचे नहीं खरीदे। बढि़या सपेफद गोल वंफचे़्र इसी प्रकार के वुफछ विशेषण नीचे दिए गए हैं इनका प्रयोग कर वाक्य बनाएँμ ठंडी अँधेरी रात ख‘ी - मीठी गोलियाँ ताशा स्वादिष्ट भोजन स्वच्छ रंगीन कपड़े वुफछ करने को „ मुंशी प्रेमचंद की कहानी ‘इर्दगाह’ खोजकर पढि़ए। ‘इर्दगाह’ कहानी में हामिद चिमटा खरीदता है और ‘वंफचा’ कहानी में अप्पू वंफचे। इन दोनों बच्चों में सेकिसकी पसंद को आप महत्त्व देना चाहेंगे? हो सकता है, आपके वुफछ साथी चिमटा खरीदनेवाले हामिद को पसंद करें और वुफछ अप्पू को। अपनी कक्षा में इस98 विषय पर वाद - विवाद का आयोजन कीजिए।

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