खानपान की बदलती तसवीर छले दस - पंद्रह वषो± में हमारी खानपान की संस्वृफति में एक बड़ा बदलाव आया है। इडली - डोसा - बड़ा - साँभर - रसम अब केवल दक्ष्िाण भारत तकसीमित नहीं हैं। ये उत्तर भारत के भी हर शहर में उपलब्ध हैं और अबतो उत्तर भारत की ‘ढाबा’ संस्वृफति लगभग पूरे देश में पैफल चुकी है। अब आप कहींभी हों, उत्तर भारतीय रोटी - दाल - साग आपको मिल ही जाएँगे। ‘पफास्ट प़़्ाूफड’ ;तुरंत भोजनद्ध का चलन भी बड़े शहरों में खूब बढ़ा है। इस ‘प़़्ाफास्ट पूफड’ में बगर्र, नूडल्स जैसी कइर् चीशें शामिल हैं। एक शमाने में वुफछ ही लोगों तक सीमित ‘चाइनीश नूडल्स’ अब संभवतः किसी के लिए अजनबी नहीं रहे। ‘टू मिनट्स नूडल्स’ के पैकेटबंद रूप से तो कम - से - कम बच्चे - बूढे़ सभी परिचित हो चुके हैं। इसी तरह नमकीन के कइर् स्थानीय प्रकार अभी तक भले मौजूद हों, लेकिन आलू - चिप्स के कइर् विज्ञापित रूप तेशी से घर - घर में अपनी जगह बनाते जा रहे हैं। गुजराती ढोकला - गाठिया भी अब देश के कइर् हिस्सों में स्वाद लेकर खाए जाते हैं और बंगाली मिठाइयों की केवल रसभरी चचार् ही नहीं होती, वे कइर् शहरों में पहले की तुलना में अिाक उपलब्ध हैं। यानी स्थानीय व्यंजनों के साथ ही अब अन्य प्रदेशों के व्यंजन - पकवान भी प्रायः हर क्षेत्रा में मिलते हैं और खानपान की बदलती तसवीर स्थानीय व्यंजनों की दुनिया में छोटी हुइर् है। जानकार ये भी बताते हैं कि मथुरा के पेड़ों और आगरा के पेठे - नमकीन में अब वह बात कहाँ रही! यानी जो चीशेंबची भी हुइर् हैं, उनकी गुणवत्ता में प़्ाफवर्फ पड़ा है। पिफर मौसम और ट्टतुआंे के अनुसार पफलों - खाद्यान्नों से जो व्यंजन और पकवान बना करते थे, उन्हें बनाने की पुफरसत भी अब कितने लोगों को रह गइर् है। अब गृहिण्िायों या कामकाजी महिलाओं के लिए खरबूशे के बीज सुखाना - छीलना और पिफर उनसे व्यंजन तैयार करना सचमुच दुःसाध्य है। यानी हम पाते हैं कि एक ओर तो स्थानीय व्यंजनों में कमी आइर् है, दूसरी ओर वे ही देसी - विदेशी व्यंजन अपनाए जा रहे हैं, जिन्हें बनाने - पकाने में सुविधा हो। जटिल प्रवि्रफयाओं वाली चीशें तो कभी - कभार व्यंजन - पुस्ितकाओं के आधार पर तैयार की जाती हैं। अब शहरी जीवन में जो भागमभाग है, उसे देखते हुए यह स्िथति स्वाभाविक लगती है। पिफर कमरतोड़ महँगाइर् ने भी लोगों को कइर् चीशों से धीरे - धीरे वंचित किया है। जिन व्यंजनों में बिना मेवों के स्वाद नहीं आता, उन्हें बनाने - पकाने के बारे में भला कौन चार बार नहीं सोचेगा! 103 वसंत भाग - 2 खानपान की जो एक मिश्रित संस्वृफति बनी है, इसके अपने सकारात्मक पक्ष भी हैं। गृहिण्िायों और कामकाजी महिलाओं को अब जल्दी तैयार हो जानेवाले विविध व्यंजनों की वििायाँ उपलब्ध हैं। नयी पीढ़ी को देश - विदेश के व्यंजनों को जानने का सुयोग मिला हैμभले ही किन्हीं कारणों से और किन्हीं खास रूपों में ;क्योंकि यह भी एक सच्चाइर् है कि ये विविध व्यंजन इन्हें निखालिस रूप में उपलब्ध नहीं हैंद्ध। आशादी के बाद उद्योग - धंधों, नौकरियों - तबादलों का जो एक नया विस्तार हुआ है, उसके कारण भी खानपान की चीशेें किसी एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश में पहुँची हैं। बड़े शहरों के मध्यमवगीर्य स्वूफलों में जब दोपहर के ‘टिप्ि़ाफन’ के वक्त बच्चों के टिप्ि़ाफन - डिब्बे खुलते हैं तो उनसे विभ्िान्न प्रदेशों के व्यंजनों की एक खुशबू उठती है। हम खानपान से भी एक - दूसरे को जानते हैं। इस दृष्िट से देखें तो खानपान की नयी संस्वृफति में हमें राष्ट्रीय एकता के लिए नए बीज भी मिल सकते हैं। बीज भलीभाँति तभी अंवुफरित होंगे जब हम खानपान से जुड़ी हुइर् दूसरी चीशों की ओर भी ध्यान देंगे। मसलन हम उस बोली - बानी, भाषा - भूषा आदि को भी किसी - न - किसी रूप में श्यादा जानेंगे, जो किसी खानपान - विशेष से जुड़ी हुइर् है। इसी के साथ ध्यान देने की बात यह है कि ‘स्थानीय’ व्यंजनों का पुनरफ(ार अचरज नहीं कि पहले उत्तर भारत में जो चीशें गली - मुहल्लों की दुकानों में आम हुआ करती थीं, उन्हें अब खास दुकानों में तलाशा जाता है। यह भी एक कड़वा सच है कि कइर् स्थानीय व्यंजनों को हमने तथाकथ्िात आधुनिकता के चलते छोड़ दिया है और पश्िचम की नकल में बहुत सी ऐसी चीशें अपना ली हैं, जो स्वाद, स्वास्थ्य और सरसता के मामले में हमारे बहुत अनुवूफल नहीं हैं। हो यह भी रहा है कि खानपान की मिश्रित संस्वृफति में हम कइर् बार चीशों का असली और अलग स्वाद नहीं ले पा रहे। अकसर प्रीतिभोजों और पाटिर्यों में एक साथ ढेरों चीशें रख दी जाती हैं और उनका स्वाद गंमं होता रहता है। खानपान की मिश्रित या विविध संस्वृफति हमें वुफछ चीशें चुनने का अवसर देती है, हम उसका लाभ प्रायः नहीं उठा रहे हैं। हम अकसर एक ही प्लेट में कइर् तरह के और कइर् बार तो बिलवुफल विपरीत प्रवृफतिवाले व्यंजन परोस लेना चाहते हैं। इसलिए खानपान की जो मिश्रित - विविध संस्वृफति बनी हैμऔर लग यही रहा है कि यही और अिाक विकसित होनेवाली हैμउसे तरह - तरह से जाँचते रहना शरूरी है। ऽ निबंध से 1.खानपान की मिश्रित संस्कृति से लेखक का क्या मतलब है? अपने घर के उदाहरण देकर इसकी व्याख्या करें? 2.खानपान में बदलाव के कौन से पफायदे हैं? पिफर लेखक इस बदलाव को़लेकर ¯चतित क्यों है? 3.खानपान के मामले में स्थानीयता का क्या अथर् है? 105 वसंत भाग - 2 निबंध से आगे 1.घर में बातचीत करके पता कीजिए कि आपके घर में क्या चीशें पकती हैं और क्या चीशें बनी - बनाइर् बाशार से आती हैं? इनमें से बाशार से आनेवाली कौन सी चीशें आपके माँ - पिता जी के बचपन में घर में बनती थीं? 2.यहाँ खाने, पकाने और स्वाद से संबंिात वुफछ शब्द दिए गए हैं। इन्हें ध्यान से देख्िाए और इनका वगीर्करण कीजिएμ 3.छौंक चावल कढ़ी ्र इन शब्दों में क्या अंतर है? समझाइए। इन्हें बनाने के तरीके विभ्िान्न प्रांतों में अलग - अलग हैं। पता करें कि आपके प्रांत में इन्हें वैफसे बनाया जाता है। 4.पिछली शताब्दी में खानपान की बदलती हुइर् तसवीर का खाका खींचें तो इस प्रकार होगाμ सन् साठ का दशक μ छोले - भटूरे सन् सत्तर का दशक μ इडली, डोसा सन् अस्सी का दशक μ तिब्बती ;चीनीद्ध भोजन सन् नब्बे का दशक μ पीशा, पाव - भाजी ्र इसी प्रकार आप वुफछ कपड़ों या पोशाकों की बदलती तसवीर का खाका 106 खींचिए। खानपान की बदलती तसवीर 5.मान लीजिए कि आपके घर कोइर् मेहमान आ रहे हैं जो आपके प्रांत का पारंपरिक भोजन करना चाहते हैं। उन्हें ख्िालाने के लिए घर के लोगों की मदद से एक व्यंजन - सूची ;मेन्यूद्ध बनाइए। अनुमान और कल्पना 1.‘पफास्ट प़्ाूफड’ यानी तुरंत भोजन के नप़् ़ोफ - नुकसान पर कक्षा में वाद - विवाद करें। 2.हर शहर, कस्बे में वुफछ ऐसी जगहें होती हैं जो अपने किसी खास व्यंजन के लिए जानी जाती हैं। आप अपने शहर, कस्बे का नक्शा बनाकर उसमें ऐसी सभी जगहों को दशार्इए। 3.खानपान के मामले में शु(ता का मसला काप़्ाफी पुराना है। आपने अपने अनुभव में इस तरह वफी मिलावट को देखा है? किसी प्ि़ाफल्म या अखबारी खबर के हवाले से खानपान में होनेवाली मिलावट के नुकसानों की चचार् कीजिए। भाषा की बात 1.खानपान शब्द, खान और पान दो शब्दों को जोड़कर बना है। खानपान शब्द में और छिपा हुआ है। जिन शब्दों के योग में और, अथवा, या जैसे योजक शब्द छिपे हों, उन्हें द्वंद्व समास कहते हैं। नीचे द्वंद्व समास के वुफछ उदाहरण दिए गए हैं। इनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए और अथर् समझिएμ सीना - पिरोना भला - बुरा चलना - पिफरना लंबा - चैड़ा कहा - सुनी घास - पूफस 2.कइर् बार एक शब्द सुनने या पढ़ने पर कोइर् और शब्द याद आ जाता है। आइए शब्दों की ऐसी कड़ी बनाएँ। नीचे शुरुआत की गइर् है। उसे आप आगे बढ़ाइए। कक्षा में मौख्िाक सामूहिक गतिवििा के रूप में भी इसे दिया जा सकता हैμ इडली - दक्ष्िाण - केरल - ओणम् - त्योहार - छु‘ी - आराम..वुफछ करने को ऽ उन विज्ञापनों को इकऋा कीजिए जो हाल ही के ठंडे पेय पदाथो± से जुड़े हैं। उनमें स्वास्थ्य और सप़्ाफाइर् पर दिए गए ब्योरों को छाँटकर देखें कि हकीकत क्या है। 107

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