काका कालेलकर ;1885 .1982द्ध काका कालेलकर का जन्म महाराष्ट्र के सतारा नगर में सन् 1885 में हुआ। काका की मातृभाषा मराठी थी। उन्हें गुजराती, हिंदी, बांग्ला और अंग्रेशी का भी अच्छा ज्ञान था। गांधीजी के साथ राष्ट्रभाषा प्रचार में जुड़ने के बाद काका हिंदी में लेखन करने लगे। आशादी के बाद काका जीवनभर गांधीजी के विचार और साहित्य के प्रचार - प्रसार में जुटे रहे। महात्मा गांधी के अनन्य अनुयायियों में विनोबा भावे, सीमांत गांधी अब्दुल गफ्ऱ पफार खाँ औऱकाका कालेलकर समान रूप से याद किए जाते हैं। नयी दिल्ली में गांधी संग्रहालय के निकट सन्िनिा में काका के जीवन से जुड़ी बहुत - सी वस्तुएँ और उनका साहित्य आज भी देखा जा सकता है। देश के प्रायः कोने - कोने में यायावर की तरह भ्रमण करने वाले काका की चचिर्त कृतियाँ हैं: हिमालयनो प्रवास, लोकमाता ;यात्रा वृत्तांतद्ध, स्मरण यात्रा ;संस्मरणद्ध, धमोर्दय ;आत्मचरितद्ध, जीवननो आनंद, अवारनवार ;निबंध संग्रहद्ध। काका ने कइर् वषो± तक मंगल प्रभात पत्रा का संपादन भी किया। काका के लेखन की भाषा सरल, सरस, ओजस्वी और सारगभ्िार्त है। विचारपूणर् निबंध हो या यात्रा संस्मरण, सभी विषयों की तवर्फपूणर् व्याख्या काका की लेखन शैली की विशेषता रही है। एक हिंदीतर भाषी लेखक द्वारा मूलतः हिंदी में लिखे इस ललित निबंध कीचड़ का काव्य में काका ने कीचड़ की उपयोगिता का काव्यात्मक शैली में बखान किया है। काका कहते हैं कि हमें कीचड़ के गंदेपन पर नहीं, अपितु उसकी मानव और पशुओं तक के जीवन में उपयोगिता पर ध्यान देना चाहिए। उत्तर - पूवीर् राज्यों में सबसे श्यादा पैदा होनेवाली धान की पफसल कीचड़ में ही उग पाती है। कीचड़ न होता तो क्या - क्या न होता, मानव और पशु किन नियामतों से वंचित रह जाते, इसकी एक बानगी यह निबंध बखूबी दशार्ता है। कीचड़ हेय नहीं श्र(ेय है, यह लेखक ही नहीं पाठक भी स्वीकारता है। कीचड़ का काव्य आज सुबह पूवर् में वुफछ खास आकषर्क नहीं था। रंग की सारी शोभा उत्तर में जमी थी। उस दिशा में तो लाल रंग ने आज कमाल ही कर दिया था। परंतु बहुत ही थोड़े से समय के लिए। स्वयं पूवर् दिशा ही जहाँ पूरी रँगी न गइर् हो, वहाँ उत्तर दिशा कर - करके भी कितने नखरे कर सकती? देखते - देखते वहाँ के बादल श्वेत पूनी जैसे हो गए और यथाक्रम दिन का आरंभ ही हो गया। हम आकाश का वणर्न करते हैं, पृथ्वी का वणर्न करते हैं, जलाशयों का वणर्न करते हैं। पर कीचड़ का वणर्न कभी किसी ने किया है? कीचड़ में पैर डालना कोइर् पसंद नहीं करता, कीचड़ से शरीर गंदा होता है, कपडे़ मैले हो जाते हैं। अपने शरीर पर कीचड़ उडे़ यह किसी को भी अच्छा नहीं लगता और इसीलिए कीचड़ के लिए किसी को सहानुभूति नहीं होती। यह सब यथाथर् है। विंफतु तटस्थता से सोचें तो हम देखेंगे कि कीचड़ में वुफछ कम सौंदयर् नहीं है। पहले तो यह कि कीचड़ का रंग बहुत संुदर है। पुस्तकों के गत्तों पर, घरों की दीवालों पर अथवा शरीर पर के कीमती कपड़ों के लिए हम सब कीचड़ के जैसे रंग पसंद करते हैं। कलाभ्िाज्ञ लोगों को भऋी में पकाए हुए मि‘ी के बरतनों के लिए यही रंग बहुत पसंद है। पफोटो लेते समय भी यदि उसमें कीचड़ का, एकाध ठीकरे का रंग आ जाए तो उसे वामर्टोन कहकर विज्ञ लोग खुश - खुश हो जाते हैं। पर लो, कीचड़ का नाम लेते ही सब बिगड़ जाता है। नदी के किनारे जब कीचड़ सूखकर उसके टुकडे़ हो जाते हैं, तब वे कितने संुदर दिखते हैं। श्यादा गरमी से जब उन्हीं टुकड़ों में दरारें पड़ती हैं और वे टेढे़ हो जाते हैं, तब सुखाए हुए खोपरे जैसे दीख पड़ते हैं। नदी किनारे मीलों तक जब समतल और कीचड़ का काव्यध्57 चिकना कीचड़ एक - सा पैफला हुआ होता है, तब वह दृश्य वुफछ कम खूबसूरत नहीं होता। इस कीचड़ का पृष्ठ भाग वुफछ सूख जाने पर उस पर बगुले और अन्य छोटे - बडे़ पक्षी चलते हैं, तब तीन नाखून आगे और अँगूठा पीछे ऐसे उनके पदचिÉ, मध्य एश्िाया के रास्ते की तरह दूर - दूर तक अंकित देख इसी रास्ते अपना कारवाँ ले जाने की इच्छा हमें होती है। पिफर जब कीचड़ श्यादा सूखकर शमीन ठोस हो जाए, तब गाय, बैल, पाडे़, भैंस, भेड़, बकरे इत्यादि के पदचिÉ उस पर अंकित होते हैं उसकी शोभा और ही है। और पिफर जब दो मदमस्त पाडे़ अपने सींगों से कीचड़ को रौंदकर आपस में लड़ते हैं तब नदी किनारे अंकित पदचिÉ और सींगों के चिÉों से मानो महिषवुफल केभारतीययु(का पूरा इतिहास ही इस कदर्म लेख में लिखा हो - ऐसा भास होता हैै। कीचड़ देखना हो तो गंगा के किनारे या सिंधु के किनारे और इतने से तृप्ित न हो तो सीधे खंभात पहुँचना चाहिए। वहाँ मही नदी के मुख से आगे जहाँ तक नशर पहुँचे वहाँ तक सवर्त्रा सनातन कीचड़ ही देखने को मिलेगा। इस कीचड़ में हाथी डूब जाएँगे ऐसा कहना, न शोभा दे ऐसी अल्पोक्ित करने जैसा है। पहाड़ के पहाड़ उसमें लुप्त हो जाएँगे ऐसा कहना चाहिए। हमारा अन्न कीचड़ में से ही पैदा होता है इसका जाग्रत भान यदि हर एक मनुष्य को होता तो वह कभी कीचड़ का तिरस्कार न करता। एक अजीब बात तो देख्िाए। पंक शब्द घृणास्पद लगता है, जबकि पंकज शब्द सुनते ही कवि लोग डोलने और गाने लगते हैं। मल बिलवुफल मलिन माना जाता है विंफतु कमल शब्द सुनते ही चित्त में प्रसन्नता और आींादकत्व पूफट पड़ते हैं। कवियों की ऐसी युक्ितशून्य वृिा उनके सामने हम रखंे तो वे कहेंगे कि फ्आप वासुदेव की पूजा करते हैं इसलिए वसुदेव को तो नहीं पूजते, हीरे का भारी मूल्य देते 58ध्स्पशर् हैं विंफतु कोयले या पत्थर का नहीं देते और मोती को वंफठ में बाँधकर पिफरते हैं विंफतु उसकी मातुश्री को गले में नहीं बाँधते!य् कम - से - कम इस विषय पर कवियों के साथ तो चचार् न करना ही उत्तम! प्रश्न - अभ्यास मौख्िाक निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर एक - दो पंक्ितयों में दीजिए - 1.रंग की शोभा ने क्या कर दिया? 2.बादल किसकी तरह हो गए थे? 3.लोग किन - किन चीशों का वणर्न करते हैं? 4.कीचड़ से क्या होता है? 5.कीचड़ जैसा रंग कौन लोग पसंद करते हैं? 6.नदी के किनारे कीचड़ कब सुंदर दिखता है? 7.कीचड़ कहाँ सुंदर लगता है? 8.‘पंक’ और ‘पंकज’ शब्द में क्या अंतर है? लिख्िात ;कद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;25.30 शब्दों मेंद्ध लिख्िाए - 1.कीचड़ के प्रति किसी को सहानुभूति क्यों नहीं होती? 2.शमीन ठोस होने पर उस पर किनके पदचिÉ अंकित होते हैं? 3.मनुष्य को क्या भान होता जिससे वह कीचड़ का तिरस्कार न करता? 4.पहाड़ लुप्त कर देनेवाले कीचड़ की क्या विशेषता है? ;खद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;50.60 शब्दों मेंद्ध लिख्िाए - 1.कीचड़ का रंग किन - किन लोगों को खुश करता है? 2.कीचड़ सूखकर किस प्रकार के दृश्य उपस्िथत करता है? 3.सूखे हुए कीचड़ का सौंदयर् किन स्थानों पर दिखाइर् देता है? 4.कवियों की धारणा को लेखक ने युक्ितशून्य क्यों कहा है? कीचड़ का काव्यध्59 ;गद्ध निम्नलिख्िात का आशय स्पष्ट कीजिए - 1.नदी किनारे अंकित पदचिÉ और सींगों के चिÉों से मानो महिषवुफल के भारतीय यु( का पूरा इतिहास ही इस कदर्म लेख में लिखा हो ऐसा भास होता हैै। 2.फ्आप वासुदेव की पूजा करते हैं इसलिए वसुदेव को तो नहीं पूजते, हीरे का भारी मूल्य देते हैं विंफतु कोयले या पत्थर का नहीं देते और मोती को वंफठ में बाँधकर पिफरते हैं विंफतु उसकी मातुश्री को गले में नहीं बाँधते!य् कम - से - कम इस विषय पर कवियों के साथ तो चचार् न करना ही उत्तम! भाषा - अध्ययन 1ण् निम्नलिख्िात शब्दों के तीन - तीन पयार्यवाची शब्द लिख्िाए - जलाशय ....................................................................सिंधु ....................................................................पंकज ....................................................................पृथ्वी ....................................................................आकाश ....................................................................2ण् निम्नलिख्िात वाक्यों में कारकों को रेखांकित कर उनके नाम भी लिख्िाए - ;कद्ध कीचड़ का नाम लेते ही सब बिगड़ जाता है। ......................;खद्ध क्या कीचड़ का वणर्न कभी किसी ने किया है। ......................;गद्ध हमारा अन्न कीचड़ से ही पैदा होता है। ......................;घद्ध पदचिÉ उस पर अंकित होते हैं। ......................;घद्ध आप वासुदेव की पूजा करते हैं। ......................3ण् निम्नलिख्िात शब्दों की बनावट को ध्यान से देख्िाए और इनका पाठ से भ्िान्न किसी नए प्रसंग में वाक्य प्रयोग कीजिए - आकषर्क यथाथर् तटस्थता कलाभ्िाज्ञ पदचिÉ अंकित तृप्ित सनातन लुप्त जाग्रत घृणास्पद युक्ितशून्य वृिा 4ण् नीचे दी गइर् संयुक्त ियाओं का प्रयोग करते हुए कोइर् अन्य वाक्य बनाइए - ;कद्ध देखते - देखते वहाँ के बादल श्वेत पूनी जैसे हो गए। 60ध्स्पशर् ;खद्ध कीचड़ देखना हो तो सीधे खंभात पहुँचना चाहिए। ;गद्ध हमारा अन्न कीचड़ में से ही पैदा होता है। 6ण् न, नहीं, मत का सही प्रयोग रिक्त स्थानों पर कीजिए - ;कद्धतुम घर ................ जाओ। ;खद्ध मोहन कल ................ आएगा। ;गद्धउसे ................ जाने क्या हो गया है? ;घद्ध डाँटो ................ प्यार से कहो। ;घद्ध मैं वहाँ कभी ................ जाउँफगा। ;चद्ध................ वह बोला ................ मैं। योग्यता - विस्तार 1.विद्याथीर् सूयोर्दय और सूयार्स्त के दृश्य देखंे तथा अपने अनुभवों को लिखें। 2.कीचड़ में पैदा होनवाली पफसलों के नाम लिख्िाए। 3.भारत के मानचित्रा में दिखाएँ कि धान की पफसल प्रमुख रूप से किन - किन प्रांतों में उपजाइर् जाती है? 4.क्या कीचड़ ‘गंदगी’ है? इस विषय पर अपनी कक्षा में परिचचार् आयोजित कीजिए। शब्दाथर् और टिप्पण्िायाँ पूवर् - पूवर् दिशा आकषर्क - सुंदर, रोचक शोभा - संुदरता उत्तर - उत्तर दिशा, जवाब कमाल - अद्भुत चमत्कारिक कायर् नखरे - बेवजह का हाव - भाव दिखलाना पूनी - धुनी हुइर् रफइर् की बड़ी बत्ती जो सूत कातने के लिए बनाइर् जाती है जलाशय - तालाब, सरोवर कीचड़ - पैरों में चिपकने वाली गीली मि‘ी, पंक तटस्थता - निरपेक्ष, उदासीनता, किसी का पक्ष न लेना, निष्पक्षता कीचड़ का काव्यध्61 कलाभ्िाज्ञ - कला के जानकार ठीकरा - खपडे़ का टुकड़ा विज्ञ - जानकार खुश - खुश - बहुत खुश होने के लिए पुरानी हिंदी में प्रयुक्त होने वाला शब्द खोपरा ;खोपड़ाद्ध - नारियल, गरी का गोला समतल - जिसका तल या सतह बराबर हो अंकित - चिित कारवाँ - देशांतर जाने वाले यात्रिायों/व्यापारियों का झुंड मदमस्त - मतवाला, मस्त पाडे़ - भैंस के नर बच्चे महिषवुफल - भैंसांे का परिवार कदर्म - कीचड़ भास - प्रतीत, आभास, कल्पना, चमक अल्पोक्ित - थोड़ा कहना तिरस्कार - उपेक्षा आींादकत्व - हषर् का भाव युक्ितशून्य - तवर्फ शून्य, विचारहीन वृिा - तरीका, ढंग, स्वभाव, कायर्

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