गणेशशंकर विद्याथीर् ;1891 . 1931द्ध गणेशशंकर विद्याथीर् का जन्म मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में सन् 1891 में हुआ। एंट्रेंस पास करनेके बाद वे कानपुर करेंसी दफ्ऱतर में मुलािाम हो गए। पिफर 1921 में ‘प्रताप’ साप्ताहिक अखबार निकालना शुरू किया। विद्याथीर् आचायर् महावीर प्रसाद द्विवेदी को अपना साहित्ियक गुरफ मानते थे। उन्हीं की प्रेरणा से आशादी की अलख जगानेवाली रचनाओं का सृजन और अनुवाद उन्होंने किया। इसी उद्देश्य की पूतिर् के लिए उन्होंने सहायक पत्राकारिता की। विद्याथीर् के जीवन का श्यादातर समय जेलों में बीता। इन्हें बार - बार जेल में डालकर भी अंग्रेश सरकार को स्ंातुष्िट नहीं मिली। वह इनका अखबार भी बंद करवाना चाहती थी। कानपुर में 1931 में मचे सांप्रदायिक दंगों को शांत करवाने के प्रयास में विद्याथीर् को अपने प्राणों की बलि देनी पड़ी। इनकी मृत्यु पर महात्मा गांधी ने कहा था: काश! ऐसी मौत मुझे मिली होती। विद्याथीर् अपने जीवन में भी और लेखन में भी गरीबों, किसानों, मशलूमों, मशदूरों आदि के प्रति सच्ची हमददीर् का इशहार करते थे। देश की आशादी की मुहिम में आड़े आनेवाले किसी भीकृत्य या परंपरा को वह आड़े हाथों लेते थे। देश की आशादी उनकी नशर में सबसे महत्त्वपूणर् थी। आपसी भाइर्चारे को नष्ट - भ्रष्ट करनेवालों की वे जमकर ‘खबर’ लेते थे। उनकी भाषा सरल, सहज, लेकिन बेहद मारक और सीधा प्रहार करनेवाली होती थी। प्रस्तुत पाठ ‘धमर् की आड़’ में विद्याथीर् जी ने उन लोगों के इरादों और वुफटिल चालों को बेनकाब किया है, जो धमर् की आड़ लेकर जनसामान्य को आपस में लड़ाकर अपना स्वाथर् सि( करने की प्ि़ाफराक में रहते हैं। धमर् की आड़ में अपना स्वाथर् सि( करनेवाले हमारे ही देश में हों, ऐसा नहीं है। विद्याथीर् अपने इस पाठ में दूर देशों में भी धमर् की आड़ में वैफसे - वैफसे वुफकमर् हुए हैं, वैफसी - वैफसी अनीतियाँ हुइर् हैं, कौन - कौन लोग, वगर् और समाज उनके श्िाकार हुए हैं, इसका खुलासा करते चलते हैं। धमर् की आड़ इस समय, देश में धमर् की धूम है। उत्पात किए जाते हैं, तो धमर् और इर्मान के नाम पर, और जिद की जाती है, तो धमर् और इर्मान के नाम पर। रमुआ और बु(ू मियाँ धमर् और इर्मान को जानें, या न जानें, परंतु उनके नाम पर उबल पड़ते हैं और जान लेने और जान देने के लिए तैयार हो जाते हैं। देश के सभी शहरों का यही हाल है। उबल पड़नेवाले साधारण आदमी का इसमें केवल इतना ही दोष है कि वह वुफछ भी नहीं समझता - बूझता, और दूसरे लोग उसे जिधर जोत देते हैं, उधर जुत जाता है। यथाथर् दोष है, वुफछ चलते - पुरशे, पढे़ - लिखे लोगों का, जो मूखर् लोगों की शक्ितयों और उत्साह का दुरफपयोग इसलिए कर रहे हैं कि इस प्रकार, जाहिलों के बल के आधार पर उनका नेतृत्व और बड़प्पन कायम रहे। इसके लिए धमर् और इर्मान की बुराइयों से काम लेना उन्हें सबसे सुगम मालूम पड़ता है। सुगम है भी। साधारण से साधारण आदमी तक के दिल में यह बात अच्छी तरह बैठी हुइर् है कि धमर् और इर्मान की रक्षा के लिए प्राण तक दे देना वाजिब है। बेचारा साधारणआदमी धमर् के तत्त्वों को क्या जाने? लकीर पीटते रहना ही वह अपना धमर् समझता है। उसकी इस अवस्था से चालाक लोग इस समय बहुत बेजा पफायदा उठा रहे हैं।़पाश्चात्य देशों में, धनी लोगों की, गरीब मशदूरों की झोंपड़ी का मशाक उड़ाती हुइर् अ‘ालिकाएँ आकाश से बातें करती हैं! गरीबों की कमाइर् ही से वे मोटे पड़ते हैं, और उसी के बल से, वे सदा इस बात का प्रयत्न करते हैं कि गरीब सदा चूसे जाते रहें। यह भयंकर अवस्था है! इसी के कारण, साम्यवाद, बोल्शेविश्म आदि का जन्म हुआ। 64ध्स्पशर् हमारे देश में, इस समय, धनपतियों का इतना शोर नहीं है। यहाँ, धमर् के नाम पर, वुफछ इने - गिने आदमी अपने हीन स्वाथोर्± की सिि के लिए, करोड़ांे आदमियों की शक्ित का दुरफपयोग किया करते हैं। गरीबों का धनाढ्यों द्वारा चूसा जाना इतना बुरा नहीं है, जितना बुरा यह है कि वहाँ है धन की मार, यहाँ है बुि पर मार। वहाँ धन दिखाकर करोड़ांे को वश में किया जाता है, और पिफर मन - माना धन पैदा करने के लिए जोत दिया जाता है। यहाँ है बुि पर परदा डालकर पहले इर्श्वर और आत्मा का स्थान अपने लिए लेना, और पिफर, धमर्, इर्मान, इर्श्वर और आत्मा के नाम पर अपनी स्वाथर् - सिि के लिए लोगों को लड़ाना - भ्िाड़ाना। मूखर् बेचारे धमर् की दुहाइयाँ देते और दीन - दीन चिल्लाते हैं, अपने प्राणों की बाजियाँ खेलते और थोडे़ - से अनियंत्रिात और धूतर् आदमियों का आसन उँफचा करते और उनका बल बढ़ाते हैं। धमर् और इर्मान के नाम पर किए जाने वाले इस भीषण व्यापार वफो रोकने के लिए, साहस और दृढ़ता के साथ, उद्योग होना चाहिए। जब तक ऐसा नहीं होगा, तब तक भारतवषर् में नित्य - प्रति बढ़ते जाने वाले झगडे़ कम न होंगे। धमर् की उपासना के मागर् में कोइर् भी रफकावट न हो। जिसका मन जिस प्रकार चाहे, उसी प्रकार धमर् की भावना को अपने मन में जगावे। धमर् और इर्मान, मन का सौदा हो, इर्श्वर और आत्मा के बीच का संबंध हो, आत्मा को शु( करने और उँफचे उठाने का साधन हो। वह, किसी दशा में भी, किसी दूसरे व्यक्ित की स्वाधीनता को छीनने या वुफचलने का साधन न बने। आपका मन चाहे, उस तरह का धमर् आप मानें, और दूसरों का मन चाहे, उस प्रकार का धमर् वह माने। दो भ्िान्न धमोर्± के मानने वालों के टकरा जाने के लिए कोइर् भी स्थान न हो। यदि किसी धमर् के मानने वाले कहीं शबरदस्ती टाँग अड़ाते हों, तो उनका इस प्रकार का कायर् देश की स्वाधीनता के विरफ( समझा जाए। देश की स्वाधीनता के लिए जो उद्योग किया जा रहा था, उसका वह दिन निःसंदेह, अत्यंत बुरा था, जिस दिन, स्वाधीनता के क्षेत्रा में ख्िालापफत, मुल्ला,़मौलवियों और धमार्चायोर्± को स्थान दिया जाना आवश्यक समझा गया। एक प्रकार से उस दिन हमने स्वाधीनता के क्षेत्रा में, एक कदम पीछे हटकर रखा था। अपने ध्मर् की आड़ध्65 उसी पाप का पफल आज हमें भोगना पड़ रहा है। देश को स्वाधीनता के संग्राम ही ने मौलाना अब्दुल बारी और शंकराचायर् को देश के सामने दूसरे रूप में पेश किया, उन्हें अिाक शक्ितशाली बना दिया और हमारे इस काम का पफल यह हुआ है कि इस समय, हमारे हाथों ही से बढ़ाइर् इनकी और इनके से लोगों की शक्ितयाँ हमारी जड़उखाड़ने और देश में मशहबी पागलपन, प्रपंच और उत्पात का राज्य स्थापित कर रही हैं। महात्मा गांधी धमर् को सवर्त्रा स्थान देते हैं। वे एक पग भी धमर् के बिना चलने के लिए तैयार नहीं। परंतु उनकी बात ले उड़ने के पहले, प्रत्येक आदमी का कतर्व्य यह है कि वह भली - भाँति समझ ले कि महात्माजी के ‘धमर्’ का स्वरूप क्या है?धमर् से महात्माजी का मतलब धमर् उँफचे और उदार तत्त्वों ही का हुआ करता है। उनके मानने में किसे एतराश हो सकता है। अजाँ देने, शंख बजाने, नाक दाबने और नमाश पढ़ने का नाम धमर् नहीं है।शु(ाचरण और सदाचार ही धमर् के स्पष्ट चिÉ हैं। दो घंटे तक बैठकर पूजा कीजिए और पंच - वक्ता नमाश भी अदा कीजिए, परंतु इर्श्वर को इस प्रकार रिश्वत के दे चुकने के पश्चात्, यदि आप अपने को दिन - भर बेइर्मानी करने और दूसरों को तकलीप़्ाफ पहँुचाने के लिए आशाद समझते हैं तो, इस धमर् को, अब आगे आने वाला समय कदापि नहीं टिकने देगा। अब तो, आपका पूजा - पाठ न देखा जाएगा, आपकी भलमनसाहत की कसौटी केवल आपका आचरण होगी। सबके कल्याण की दृष्िट से, आपको अपने आचरण को सुधारना पडे़गा और यदि आप अपने आचरण को नहीं सुधारेंगे तो नमाश और रोशे, पूजा और गायत्राी आपको देश के अन्य लोगों की आशादी को रौंदने और देश - भर में उत्पातों का कीचड़ उछालने के लिए आशाद न छोड़ सकेगी। ऐसे धामिर्क और दीनदार आदमियों से तो, वे ला - मशहब और नास्ितक आदमी कहीं अिाक अच्छे और उफॅँचे हैं, जिनका आचरण अच्छा है, जो दूसरों के सुख - दुःख का खयाल रखते हैं और जो मूखो± को किसी स्वाथर् - सिि के लिए उकसाना बहुत बुरा समझते हैं। इर्श्वर इन नास्ितकों और ला - मशहब लोगों को अिाक प्यार करेगा, और वह अपने पवित्रा नाम पर अपवित्रा काम करने वालों से यही कहना पसंद करेगा, मुझे मानो 66ध्स्पशर् या न मानो, तुम्हारे मानने ही से मेरा इर्श्वरत्व कायम नहीं रहेगा, दया करके, मनुष्यत्व को मानो, पशु बनना छोड़ो और आदमी बनो! प्रश्न - अभ्यास मौख्िाक निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर एक - दो पंक्ितयों में दीजिएμ 1.आज धमर् के नाम पर क्या - क्या हो रहा है? 2.धमर् के व्यापार को रोकने के लिए क्या उद्योग होने चाहिए? 3.लेखक के अनुसार स्वाध्ीनता आंदोलन का कौन सा दिन सबसे बुरा था? 4.साधारण से साधारण आदमी तक के दिल में क्या बात अच्छी तरह घर कर बैठी है? 5.धमर् के स्पष्ट चिÉ क्या हैं? लिख्िात ;कद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;25.30 शब्दों मेंद्ध लिख्िाएμ 1.चलते - पुरशे लोग धमर् के नाम पर क्या करते हैं? 2.चालाक लोग साधारण आदमी की किस अवस्था का लाभ उठाते हंै? 3.आनेवाला समय किस प्रकार के धमर् को नहीं टिकने देगा? 4.कौन - सा कायर् देश की स्वाधीनता के विरफ( समझा जाएगा? 5.पाश्चात्य देशों में धनी और निधर्न लोगों में क्या अंतर है? 6.कौन - से लोग धामिर्क लोगों से अिाक अच्छे हैं? ;खद्ध निम्नलिख्िात प्रश्नों के उत्तर ;50.60 शब्दों मेंद्ध लिख्िाएμ 1.धमर् और इर्मान के नाम पर किए जाने वाले भीषण व्यापार को वैफसे रोका जा सकता है? 2.‘बुि पर मार’ के संबंध मंे लेखक के क्या विचार हैं? 3.लेखक की दृष्िट में धमर् की भावना वैफसी होनी चाहिए? 4.महात्मा गांधी के धमर् - संबंधी विचारों पर प्रकाश डालिए। 5.सबके कल्याण हेतु अपने आचरण को सुधारना क्यों आवश्यक है? ध्मर् की आड़ध्67 ;गद्ध निम्नलिख्िात का आशय स्पष्ट कीजिएμ 1ण् उबल पड़ने वाले साधारण आदमी का इसमें केवल इतना ही दोष है कि वह वुफछ भी नहीं समझता - बूझता, और दूसरे लोग उसे जिधर जोत देते हंै, उधर जुत जाता है। 2ण् यहाँ है बुि पर परदा डालकर पहले इर्श्वर और आत्मा का स्थान अपने लिए लेना, और पिफर धमर्, इर्मान, इर्श्वर और आत्मा के नाम पर अपनी स्वाथर् - सिि के लिए लोगों को लड़ाना - भ्िाड़ाना। 3ण् अब तो, आपका पूजा - पाठ न देखा जाएगा, आपकी भलमनसाहत की कसौटी केवल आपका आचरण होगी। 4ण् तुम्हारे मानने ही से मेरा इर्श्वरत्व कायम नहीं रहेगा, दया करके, मनुष्यत्व को मानो, पशु बनना छोड़ो और आदमी बनो! भाषा - अध्ययन 1ण् उदाहरण के अनुसार शब्दों के विपरीताथर्क लिख्िाएμ सु - गम दुगर्म धमर् - ............इर्मान - ............साधारण - .............स्वाथर् - ............दुरफपयोग - ............नियंत्रिात - .............स्वाधीनता - ............2ण् निम्नलिख्िात उपसगो± का प्रयोग करके दो - दो शब्द बनाइएμ ला, बिला, बे, बद, ना, खुश, हर, गैर 3ण् उदाहरण के अनुसार ‘त्व’ प्रत्यय लगाकर पाँच शब्द बनाइएμ उदाहरणः देव $ त्व = देवत्व 4ण् निम्नलिख्िात उदाहरण को पढ़कर पाठ में आए संयुक्त शब्दों को छाँटकर लिख्िाएμ उदाहरणः चलते - पुरशे 5ण् ‘भी’ का प्रयोग करते हुए पाँच वाक्य बनाइएμ उदाहरणः आज मुझे बाशार होते हुए अस्पताल भी जाना है। 68ध्स्पशर् योग्यता - विस्तार ‘धमर् एकता का माध्यम है’μ इस विषय पर कक्षा में परिचचार् कीजिए। शब्दाथर् और टिप्पण्िायाँ उत्पात - उपद्रव, खुरापफात़इर्मान - नीयत, सच्चाइर् जाहिलों ;जाहिलद्ध - मूखर्, गँवार, अनपढ़ वािाब बेजा अ‘ालिकाएँ साम्यवाद बोल्शेविश्म धनाढ्य स्वाथर् - सिि अनियंत्रिात धूतर् ख्िालाप़्ाफत मशहबी प्रपंच उदार भलमनसाहत कसौटी ला - मशहब - उचित, उपयुक्त, यथाथर् - गलत, अनुचित - उँफचे - उँफचे मकान, प्रासाद - कालर् माक्सर् द्वारा प्रतिपादित राजनीतिक सि(ांत जिसका उद्देश्य विश्व में वगर्हीन समाज की स्थापना करना है - सोवियत क्रांति के बाद लेनिन के नेतृत्व में स्थापित व्यवस्था - धनवान, दौलतमंद - अपना स्वाथर् पूरा करना - जो नियंत्राण में न हो, मनमाना - छली, पाखंडी - खलीपफा का पद, पैगंबर या बादशाह का प्रतिनििा होना़- धमर् विशेष से संबंध रखनेवाला - छल, धोखा - महान, दयालु, उँफचे दिलवाला - सज्जनता, शरापफत़- परख, जाँच - जिसका कोइर् धमर्, मशहब न हो, नास्ितक

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