21 - हाथी साइकिल चला रहा था
हाथी साइकिल चला रहा था,
पीछे चींटी बैठी थी,
झूम रहा था हवा में हाथी ,
चींटी शान से ऐंठी थी।
तभी चढ़ाई सीधी आई,
लगे हाँफने हाथी दद्दा,
चरर-मरर-चूँ रुकी साइकिल,
लगा सरकने पीछे चक्का।

चींटी चट कूदी साइकिल से,
बोली-मत घबराना दद्दा,
आप पाँव पैडल पर मारो,
मैं हूं न, देती हूँ धक्का !
-श्याम सुशील
बातचीत के लिए
आइए, इस कविता पर एक कहानी बनाएँ। दिए गए खाली स्थान को भरकर कहानी पूरी कीजिए -
हाथी ...................चला रहा था, उसके पीछे ...........................बैठी
थी। हाथी मज़े से ...............था और चींटी .....................थी।
आगे सीधी..........आई और साइकिल चलाते-चलाते हाथी
............लगा। साइकिल ..................की आवाज़ करती
हुई रुक गई और उसका .............सरकने लगा। हाथी की सहायता
करने के लिए चींटी चट से ............. कूदी और उसने हाथी को कहा
कि ..........................आप बिलकुल भी मत........................| आप बस
पैडल पर अपने ........................'मारो, मैं हूँ न, मैं.......................धक्का।
मेरी कहानी
इस कविता में भी एक कहानी छुपी है, आप उस कहानी को आगे बढ़ाइए –
चींटी ने साइकिल को ज़ोर से धक्का दिया। पर साइकिल आगे ही नहीं बढ़ रही थी।
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ऊपर दिए गए चित्रों में एक कहानी छुपी है। छुपी कहानी को अपने शब्दों में लिखिए।
मिलकर पढ़िए
डरो मत !
नरेंद्र को चंपक का पेड़ बहुत पसंद था। चंपक के पेड़ पर लटककर झूलना
उन्हें और भी पसंद था। चंपक
का यह पेड़ उनके मित्र के घर
लगा था।
नरेंद्र आठ साल की उम्र से ही
अपने मित्र के घर खेलने जाया
करते थे। हर दिन की तरह वे
चंपक के पेड़ पर झूल रहे थे।
तभी उनके मित्र के दादाजी वहाँ
आए और बोले – “ नरेंद्र, पेड़
से उतरो। दुबारा इस पेड़ पर मत
चढ़ना।"
"क्यों दादाजी?”
“ इस पेड़ पर एक दैत्य रहता है।"
" उस दैत्य के बारे में
कुछ बताइए न, दादाजी!"
दादाजी को डर था कि
कहीं पेड़ की डाल टूट गई
तो नरेंद्र पेड़ से गिर पड़ेंगे
और उन्हें चोट लग जाएगी।
दादाजी ने बताया, “वह दैत्य बहुत डरावना है।"
दादाजी की बात सुनकर नरेंद्र को अचरज हुआ। वे बोले, "दादाजी दैत्य के
बारे में और बताइए न!"
"वह पेड़ पर चढ़ने वालों की गर्दन तोड़ देता है।"
नरेंद्र दादाजी की सारी बातें ध्यान से सुन आगे बढ़ गए। यह देख दादाजी
मुस्कुराए और वे भी आगे बढ़ गए। उन्हें लगा कि बालक दैत्य की बात
सुनकर डर गया है। अब वह पेड़ पर नहीं चढ़ेगा।
लेकिन दादाजी जैसे ही कुछ आगे बढ़े,
नरेंद्र फिर से पेड़ पर चढ़ गए और
डाल पर झूलने लगे।
यह देख उनका मित्र जोर से चीखा,
“ नरेंद्र, तुमने दादाजी की बात
नहीं सुनी? वह दैत्य तुम्हारी गर्दन
तोड़ देगा।"
नरेंद्र ने हँसकर कहा, "तुम भी
कितने भोले हो! अगर दादाजी की
बात सच होती तो मेरी गर्दन टूट चुकी होती।
लेकिन ऐसा हुआ क्या?”
"नहीं तो।"
"यही तो! किसी ने तुमसे कुछ कहा है, उस पर यकीन मत करो। खुद
सोचो। इसलिए डरो मत!"
आगे चलकर यही बालक
नरेंद्र स्वामी विवेकानंद के
नाम से प्रसिद्ध हुए।
स्वामी विवेकानंद बचपन
से ही निडर और समझदार थे।
- आस्तिक सिन्हा