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11 कविता का कमाल

बहुत पुरानी बात है। मदन नाम का एक लड़का अपनी माँ के साथ गाँव में रहता था। माँ-बेटा बहुत गरीब थे। उनके पास कमाई का कोई साधन नहीं था। फिर भी मदन दिनभर खेल-कूद में ही समय बिता देता था।

परेशान होकर एक दिन उसकी माँ ने कहा, “अब मैं तुझे बिठाकर नहीं खिला सकती। जा, कुछ पैसे कमाकर ला।”

मदन घर से निकल पड़ा। वह गहरी सोच में डूबा था कि कैसे पैसे कमाए? अचानक उसे ढिंढोरा पीटने की आवाज सुनाई दी।

"सुनो, सुनो, सुनो! राजदरबार में कवि-सम्मेलन हो रहा है। सबसे अच्छी कविता सुनाने वाले को सौ अशर्फियाँ पुरस्कार में मिलेंगी।” मदन चौकन्ना हो गया। सौ अशर्फियाँ, यह तो बना-बनाया अवसर है। वह सीधे राजमहल की ओर चल पड़ा। चलते-चलते वह सोच रहा था कि उसने कभी कविता तो रची न थी। क्या सुनाएगा

वहाँ पहुँचकर? उसने सोचा कि रास्ते में कुछ-न-कुछ सूझ ही जाएगा। थोड़ी दूर पहुँचा तो उसे एक कुत्ता दिखाई दिया। कुत्ता पंजों से जमीन खोदने में लगा था। मदन ने अपनी कविता की एक पंक्ति सोच ली।

"खुदुर-खुदुर का खोदत है?" यह पंक्ति उसे इतनी पसंद आई कि उसे दोहराते हुए वह एक तालाब के पास पहुँचा। वहाँ एक भैंस पानी पी रही थी।

मदन बोल पड़ा, “सुरुर-सुरुर का पीबत है?" मुस्कुराते हुए वह आगे बढ़ा। इतने में उसे पेड़ की एक डाल पर चिड़िया बैठी दिखाई पड़ी। पत्तियों के बीच से वह सिर निकालकर इधर-उधर झाँक रही थी। उसे देखते ही मदन के

मुँह से निकल पड़ा, “ताक-झाँक का खोजत है?” तीनों पंक्तियों को रटते हुए वह चलता गया। रटते-रटते उसे अपने आप एक और पंक्ति सूझ गई, "हम जानत का ढूँढ़त है!"

अब तो सचमुच उसके मन में लड्डू फूटने लगे। कितने आराम से वह कविता रचता चला जा रहा था। तभी उसे 'सर्र' की आवाज सुनाई पड़ी। मदन ने चौंककर देखा कि एक साँप रेंगता जा रहा * था। उसने आगे की पंक्तियाँ भी तैयार कर लीं, “सरक-सरक कहाँ भागत है? जानत हो हम देखत हैं। हमसे न बच सकत है।" अब केवल एक पंक्ति बाकी रह गई थी। पर मदन निश्चिंत था कि वह पंक्ति भी चलते-चलते सूझ जाएगी।

राजधानी पहुँचा तो राजमहल का रास्ता ढूँढ़ने की समस्या खड़ी हुई। पास में खड़े एक आदमी से मदन ने पूछा, "भैया, आपको राजमहल का रास्ता मालूम है?” “क्यों नहीं”, उस आदमी ने उत्तर दिया। "मुझे नहीं तो और किसे मालूम होगा?" मदन ने सोचा कि अवश्य यह राजमहल का ही कोई कर्मचारी होगा। उसने पूछा, "आप कौन हैं, साहब?” उत्तर मिला, "धन्नू शाह।”

मदन के दिमाग में एकाएक बिजली कौंधी, "धन्नू शाह, भाई धन्नू शाह!" क्या बढ़िया शब्द थे! उसने इन्हीं शब्दों से अपनी कविता बना डाली। वह खुशी-खुशी राजमहल पहुँचा। अंदर घुसने से पहले उसने अपनी कविता फिर दोहराई –

खुदुर-खुदुर का खोदत है?
सुरुर-सुरुर का पीबत है?
ताक-झाँक का खोजत है?
हम जानत का ढूँढ़त है!
सरक-सरक कहाँ भागत है?
जानत हो हम देखत हैं।
हमसे न बच सकत है।
धन्नू शाह, भाई धन्नू शाह!

राजमहल में कवि सम्मेलन शुरू हो चुका था। एक-एक करके कवि अपनी कविता सुना रहे थे।

बारी आने पर मदन ने भी अपनी कविता सुनाई। सुनने वाले एक-दूसरे का मुँह ताकने लगे। क्या अर्थ था इस विचित्र कविता का? पर किसी ने भी यह नहीं दिखाया कि उसे कविता समझ में नहीं आई थी। राजा के सामने वे मूर्ख नहीं दिखना चाहते थे।

उस रात राजा साहब की भी नींद गायब हो गई। मदन की कविता उनको सता रही थी। छज्जे पर खड़े होकर वे कविता दोहराने लगे। सोचा कि शायद इसी तरह इस पहेली को बूझ पाएँ। संयोग से उसी समय कुछ चोर राजा के खजाने में सेंध लगा रहे थे। उनमें से एक चोर वही धन्नू शाह था जिसने आज दिन में मदन को राजमहल का रास्ता बताया था।

ऊँची आवाज में राजा साहब बोलते जा रहे थे, "खुदुर-खुदुर का खोदत है?”

चोरों ने सुना तो वे चौंककर रुक गए। क्या किसी ने देख लिया था उन्हें? डर के मारे चोरों का गला सूखने लगा। अपने साथ जमीन को मुलायम करने के लिए वे पानी लाए थे। धन्नू शाह ने उठकर एक-आध घूँट निगला।

तभी राजा साहब बोले, “सुरुर-सुरुर का पीबत है?”

चोरों को काटो तो खून नहीं। सहमकर इधर-उधर झाँकने लगे कि कोई पकड़ने तो नहीं आ रहा है? राजा ने फिर कहा, "ताक-झाँक का खोजत है? हम जानत का ढूँढ़त है।"

यह सुनकर चोरों ने सोचा कि किसी तरह जान बचाकर भागा जाए। वे दबे पाँव बाहर सरकने लगे। पर राजा की फिर आवाज आई, "सरक-सरक कहाँ भागत है? जानत हो हम देखत हैं! हमसे न बच सकत है। धन्नू शाह, भाई धन्नू शाह!"

धन्नू शाह की तो साँस वहीं रुक गई। उसने सोचा, “अब कोई चारा नहीं। बस, राजा साहब से दया की भीख माँग सकता हूँ।" दौड़कर उसने राजा साहब के पैर पकड़ लिए और विनती करने लगा, "क्षमा कर दीजिए महाराज! अब मैं भूलकर भी ऐसा काम नहीं करूँगा। वैसे हमने कुछ लिया ही नहीं। आपका खजाना सही-सलामत है।"

राजा साहब हक्के-बक्के रह गए। उन्होंने तुरंत सिपाहियों को बुलाकर छानबीन करवाई तो पता चला कि उनका खजाना लुटते-लुटते बचा था।

मदन को बुलवाया गया। राजा ने शाबाशी देकर कहा, “यह सब तुम्हारी कविता का कमाल है।” मदन को सोने-चाँदी से मालामाल कर दिया गया। वह खुशी-खुशी अपने गाँव लौट आया। अब उसके पास अपने और अपनी माँ के खाने-पीने के लिए पर्याप्त धन था।

- रा.शै.अ.प्र.प., छत्तीसगढ़ से साभार

बातचीत के लिए

  1. 1. क्या आपको कथा-कहानी सुनना-सुनाना पसंद है? अपने उत्तर का कारण बताइए।
  2. 2. इस लोककथा का सबसे रोचक हिस्सा कौन-सा है और क्यों?
  3. 3. राजा का खजाना मदन की कविता के कारण बचा या राजा के कारण जो कविता को जोर-जोर से बोल रहे थे?
  4. 4. राजमहल में जब मदन ने अपनी कविता सुनाई तो सुनने वाले एक-दूसरे का मुँह क्यों ताकने लगे?
  5. 5. आप इस कहानी का कोई और शीर्षक सुझाइए तथा बताइए कि यह शीर्षक क्यों देना चाहते हैं।

कविता की बात

उपयुक्त शब्द का चयन कर वाक्य पूरा कीजिए -

1. सुरुर-सुरुर का .............. है?

  1. (क) पीयत
  2. (ख) खोजत
  3. (ग) पीबत
  4. (घ) चलत

2. ........... का खोदत है?

  1. (क) सरक-सरक
  2. (ख) हम जानत
  3. (ग) ताक-झाँक
  4. (घ) खुदुर-खुदुर

3. "आप कौन हैं, साहब?” उत्तर मिला -

  1. (क) धनु शाह
  2. (ग) धनी शाह
  3. (ख) धन्नु शाह
  4. (घ) धन्नू शाह

कविता की बात

1. नीचे दी गई कविता की पंक्तियों को उनके क्रम से मिलाएँ -

हमसे न बच सकत है। 6
खुदुर-खुदुर का खोदत है? 2
जानत हो हम देखत हैं। 1
सुरुर-सुरुर का पीबत है? 7
ताक-झाँक का खोजत है? 8
हम जानत का ढूँढ़त है! 3
धन्नू शाह, भाई धन्नू शाह! 4
सरक-सरक कहाँ भागत है? 5

2. रिक्त स्थानों में उपयुक्त पंक्ति लिखिए और चित्र बनाकर उनका मिलान कीजिए -

खुदुर-खुदुर का खोदत है?
सुरुर-सुरुर का पीबत है?
................
सरक-सरक कहाँ भागत है?

सोचिए और लिखिए

  1. 1. “अब मैं तुझे और बिठाकर नहीं खिला सकती।” मदन की माँ ने ऐसा क्यों कहा?
  2. 2. जब मदन ने महल का रास्ता पूछा तो धन्नू शाह ने ऐसा क्यों कहा कि अगर वह नहीं तो और कौन जानेगा?
  3. 3. कहानी में मदन की कविता को विचित्र कहा गया है। क्या आपको भी ऐसा ही लगता है? कारण सहित लिखिए।
  4. 4. राजा को मदन की कविता पहेली जैसी लगी। आपको यह कैसी लगी?

समझ और अनुभव

  1. 1. "सुरुर-सुरुर का पीबत है" पंक्ति में पीने के साथ 'सुरुर-सुरुर' शब्द का ही प्रयोग क्यों किया गया है?
  2. 2. राजदरबार में कवि-सम्मेलन हो रहा है। सबसे अच्छी कविता सुनाने वाले को सौ अशर्फियाँ पुरस्कार में मिलेंगी। सौ अशर्फियों से आप क्या समझते हैं?
  3. 3. "सरक-सरक कहाँ भागत है” पंक्ति में 'सरक-सरक' किसके लिए प्रयुक्त हुआ है? यहाँ 'सरक-सरक' का ही प्रयोग क्यों किया गया है?
  4. 4. "अब कोई चारा नहीं। बस राजा साहब से दया की भीख माँग सकता हूँ।" ऐसा धन्नू शाह ने क्यों सोचा?

अनुमान और कल्पना

  1. 1. यदि मदन रोजगार की खोज में घर से बाहर नहीं निकलता तो क्या होता?
  2. 2. अपनी कल्पना और अनुमान से बताइए कि राजमहल कैसा होता होगा।
  3. 3. राजा के खजाने में क्या-क्या होता होगा और कितना कितना होता होगा?
  4. 4. मदन की कविता से प्रसन्न होकर राजा ने उसे विदा करते समय क्या-क्या उपहार दिए होंगे?
  5. 5. राजा ने मदन को बहुत सारा धन दिया होगा। उसे यह सब कहाँ-कहाँ खर्च करना चाहिए?
क्रम संख्या खर्च करने हेतु प्रस्तावित सुझाव आपकी राय यदि कोई हो
1. माँ के लिए कपड़े खरीदना
2. कुछ रुपये बैंक में जमा करना
3. .............
4. .............
5. .............

कहो कहानी, सुनो कहानी

कहानियाँ सुनना और सुनाना सभी को पसंद होता है। नीचे दिए गए निर्देशों के अनुसार कक्षा में 'कविता का कमाल' कहानी सुनाइए -

  1. 1. स्वयं को मदन की जगह रखकर यह कहानी अपनी मातृभाषा या अपनी पसंद की भाषा में सुनाइए।
  2. 2. मदन आपका मित्र है। मदन ने कुछ समय पहले आपको यह कहानी सुनाई थी। अब आप यह कहानी अपनी कक्षा में सुनाइए।

पाठ से आगे

  1. 1. साँप रेंगकर चलते हैं। रेंगकर चलने वाले जीव-जंतुओं की सूची बनाइए और कक्षा में प्रदर्शित कीजिए।
  2. 2. राजमहल में कवि-सम्मेलन की सूचना देने के लिए ढिंढोरा पीटा जा रहा था। आजकल ऐसी सूचनाएँ कैसे दी जाती हैं?
  3. 3. आपके विद्यालय में कवि-सम्मेलन का आयोजन किया जा रहा है। आप इसकी सूचना कैसे देंगे?

मीडिया और आप

विजेता बनने के बाद मदन को मीडिया के प्रश्नों के उत्तर देने पड़े। अपने को मदन मानते हुए इन प्रश्नों के उत्तर दीजिए -

मीडिया – कवि-सम्मेलन में पुरस्कार पाकर आपको कैसा लग रहा है?

मदन - .........................................

मीडिया - आप इस उपलब्धि का श्रेय किसे देना चाहेंगे?

मदन - .........................................

मीडिया - आपको राजदरबार में कविता सुनाकर कैसा लगा?

मदन - .........................................

मीडिया - आगे आपकी क्या योजनाएँ हैं?

मदन - .........................................

मीडिया – बहुत-बहुत धन्यवाद मदन जी।

मदन - .........................................

आपकी कविता

रजनी, मदन की कविता को गाते हुए विद्यालय जा रही थी। उसे बहुत आनंद आ रहा था। चलते-चलते अचानक उसे एक पेड़ पर कुछ बंदर दिखाई दिए। वे एक डाल से दूसरी डाल पर कूद रहे थे। जब वह थोड़ा आगे बढ़ी तो उसे एक सियार दिखाई दिया। सियार 'हुआँ-हुआँ' कर रहा था। अब सियार को आधार बनाकर आप कविता को पूरा करने में रजनी की सहायता कीजिए।

डाल-डाल क्यों कूद रहा?
खों-खों-खों क्यों बोल रहा?
बंदर जी, भाई बंदर जी !
..................................
..................................
..................................

भाषा की बात

1. मुहावरे हमेशा एक विशेष अर्थ देते हैं जो उनके शाब्दिक अर्थ से भिन्न होता है। जैसे-'फूला न समाना' मुहावरे का अर्थ है- अत्यधिक प्रसन्न होना।

वाक्य प्रयोग – विद्यालय की खेल प्रतियोगिता में पुरस्कृत होकर राजू फूला न समा रहा था।

अब आप अपनी लेखन-पुस्तिका में निम्नलिखित मुहावरों का अर्थ लिखते हुए उनका वाक्य में प्रयोग कीजिए।

  1. (क) मन में लड्डू फूटना
  2. (ख) मुँह ताकना

2. निम्नलिखित गद्यांश में कहीं-कहीं विराम चिह्नों का प्रयोग हुआ है। इस गद्यांश को उचित ठहराव के साथ पढ़िए।

उसे देखते ही मदन के मुँह से निकल पड़ा, "ताक-झाँक का खोजत है?” तीनों पंक्तियों को रटते हुए वह चलता गया। रटते-रटते उसे अपने आप एक और पंक्ति सूझ गई, “हम जानत का ढूँढ़त है।"

3. नीचे लिखे वाक्यों में उपयुक्त विराम चिह्न लगाकर वाक्य पूरा कीजिए -

  1. (क) क्या ताक झाँक कर रहे हो .......................................
  2. (ख) अरे वाह क्या चौका मारा है .......................................
  3. (ग) आइए राजा से मिलवाता हूँ .......................................
  4. (घ) दादी देखते ही बोली कहाँ जा रहे हो .......................................

कलाकारी

ढोल, नगाड़ा या अन्य कोई वाद्ययंत्र बजाते हुए बोलिए, "सुनो, सुनो, सुनो! राजदरबार में कवि-सम्मेलन हो रहा है। सबसे अच्छी कविता सुनाने वाले को सौ अशर्फियाँ इनाम में मिलेंगी।” अब इस संवाद को अपनी मातृभाषा में हाव-भाव के साथ बोलिए।

आपकी सूझ-बूझ

एक व्यक्ति के घर के बाहर दस मीटर ऊँचा एक खजूर का पेड़ था। एक बंदर उस पर चढ़ने लगा। वह पेड़ की चोटी पर पहुँचना चाहता था। समस्या यह थी कि वह दिन के समय तो 5 मीटर चढ़ जाता था परंतु जब रात होती तो वह 4 मीटर नीचे फिसल जाता था। क्या आप बता सकते हैं कि बंदर पेड़ की चोटी पर पहुँचने में कितने दिन में सफल होगा?