अध्याय 2 झरोखे से
चित्रकला की कक्षा का समय हो गया था। विद्यार्थी अपनी कला-सामग्री को मेज पर सुव्यवस्थित करके उत्साह से अपनी शिक्षिका की प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके सीखने के उत्साह को देखते हुए पुरस्कारस्वरूप उन्हें कक्षा से बाहर उद्यान में जाने का अवसर दिया गया। जहाँ माली से स्वतंत्रतापूर्वक वार्तालाप करते हुए वे पौधों, पुष्पों और तितलियों का चित्रण कर सकते थे।
परंतु उनकी आशाओं पर उस समय पानी फिर गया जब तेज गर्जना के साथ भारी वर्षा होने लगी और तभी शिक्षिका कक्षा में प्रवेश करती हैं और विद्यार्थियों को खिड़कियों के पास ले जाकर बाहर झाँकने के लिए कहती हैं।
वर्षा से धरती धुल गई थी और सब कुछ ताजा और स्वच्छ दिखाई दे रहा था। शिक्षिका ने लताओं की ओर इंगित करते हुए बताया कि ये पतली और कोमल होने के कारण वर्षा के तेज प्रभाव से झुक गई थीं फिर भी ये बेलें इतनी सुदृढ़ता से अपने आस-पास के पौधों, पेड़ों और खंभों से चिपकी हुई थीं कि वे गिरी नहीं।
यद्यपि लताओं के बीज अंधकार में भूमिगत अंकुरित होते हैं किंतु अनेक बाधाओं को पार करते हुए भी वे ऊपर उठने के लिए कृत-संकल्प रहते हैं। जिस प्रकार नदियाँ प्रत्येक भौगोलिक बाधाओं को पार कर अपना मार्ग बनाती हैं, उसी प्रकार कोमल लताएँ भी कभी बढ़ना नहीं छोड़ती हैं। इसके साथ ही वे हमें पुष्प, फल और शाक भी प्रदान करती हैं।
बेलें और लताएँ हमें कोमलता, लचीलापन और विश्वास जैसे कई जीवन मूल्य सिखाती हैं। वे बिना किसी संकोच के आश्रय लेती हैं और आश्वस्त रहती हैं कि उनका परिवेश उन्हें पोषण प्रदान करेगा। जैसे-जैसे वे बढ़ती हैं, वैसे-वैसे वे स्थान को सुंदरता और जीवन से भर देती हैं-चाहे वह स्थान घर के भीतर हो या बाहर।
गतिविधि 2.1
स्थापत्य कलाओं में उत्कीर्ण में बेलें एवं लताएँबेलें और लताएँ किस प्रकार अन्य पौधों से भिन्न होती हैं? उनके पतले और लचीले तने वृद्धि के समय मुड़ते हैं, घूमते हैं और लहराते हैं।
इनकी प्रवाहमान रेखाओं से प्रेरित होकर कलाकारों ने उन्हें मूर्तियों, चित्रों, वस्त्रों, स्थापत्य और अन्य कलारूपों में चित्रित किया है।
ऐसी ही एक परंपरा मेहंदी की है जो भारत के विभिन्न भागों में प्रचलित है। मेहंदी ताजी या सूखी हिना की पत्तियों से बनाई जाती है तथा गाढ़े लेप के रूप में तैयार कर शंकु (कीप) में भर ली जाती है। तत्पश्चात इसे प्रायः हथेलियों, भुजाओं और पैरों पर लगाया जाता है।
मेहंदी के सूखने पर आप पाएँगे कि इसकी रेखाएँ थोड़ी उभरी हुई हैं तथा शेष त्वचा की तरह समतल नहीं हैं। इसे ही उत्कीर्ण कहा जाता है। यह मूर्तिकला और नक्काशी में प्रयोग की जाने वाली एक तकनीक है।
अपने अभिभावकों और स्थानीय समुदाय के मेहंदी कलाकारों के साथ मिलकर बेलों और लताओं से प्रेरित डिजाइन बनाइए। अपने मित्रों, परिवार के सदस्यों और आस-पास के जनों की सहमति लेकर उनकी हथेलियों पर मेहंदी लगाइए।
नीचे दिए गए स्थान पर अपने हाथ की छाप लगाइए और उस पर मेहंदी का डिजाइन बनाइए।
दृष्टिबाधित विद्यार्थियों के लिए एक विशेष गतिविधि
◆ एक शंकु में ऐसी गाढ़ी-चिपचिपी बनावट वाली सामग्री भरें जो सरलता से चिपक सके और सूखकर ठोस हो जाए। ध्यान रखें कि उस सामग्री में कोई चिपकाने वाला पदार्थ अवश्य हो, जैसे- गोंद।
◆ शंकु का उपयोग करते हुए अपने डिजाइन की रूपरेखा किसी समतल सतह पर बनाइए, जैसे- पुराने गत्ते, कागज या कपड़े पर और उसे सूखने के लिए छोड़ दें। ये उभरी हुई रेखाएँ आपके दृष्टिबाधित सहपाठी के लिए एक पथ-प्रदर्शक के रूप में कार्य करेंगी। वे उभरी हुई रेखाओं को स्पर्श करके रंग भरने हेतु निचले स्थान को सरलता से पहचान सकेंगे।
◆ तूलिका के साथ रंगों का चयन करने में उनकी सहायता करें।
◆ उनके साथ मिलकर रंग भरने का आनंद लें।
गतिविधि 2.2
रंगों से चमत्कारहोली रंगों का एक पर्व है जिसे भारत के विभिन्न क्षेत्रों में उल्लासपूर्वक मनाया जाता है। इस पर्व में लोग एक-दूसरे के साथ रंगों से खेलकर आनंद लेते हैं।
आपको रंगों से खेलना कब अच्छा लगता है?
क्या आपने कभी अनुभव किया है कि दो परस्पर रंग मिलकर कैसे परिवर्तित हो जाते हैं? यह चमत्कारिक होता है।
रंग-चक्र कलाकारों के लिए एक महत्त्वपूर्ण उपकरण होता है जिसकी सहायता से वे रंगों में विविधता का सृजन करते हैं।
आइए रंग-चक्र बनाना सीखें।
ऐसे रंग जिन्हें किन्हीं अन्य रंगों को मिलाकर प्राप्त नहीं किया जा सकता है, वे प्राथमिक रंग कहलाते हैं। ये रंग हैं- लाल, नीला और पीला।
◆ दाहिनी ओर बने वृत्त के प्रत्येक खंड में एक-एक प्राथमिक रंग भरें।
◆ संबंधित खंडों के ऊपर प्राथमिक रंगों के नाम लिखें। दो प्राथमिक रंगों को परस्पर मिलाने पर एक द्वितीयक रंग बनता है।
◆ एक और वृत्त बनाइए और उसे छ: खंडों में विभाजित कीजिए।
◆ प्राथमिक रंगों को एक-एक करके वैकल्पिक खंडों में भरिए।
◆ दो प्राथमिक रंगों को मिलाकर जो नया रंग बनता है, उसे उन दोनों रंगों के बीच वाले रिक्त खंड में भरिए।
◆ द्वितीयक रंगों में सुंदर प्रतिरूप भी जोड़िए।
◆ वृत्त के चारों ओर सभी रंगों के नाम लिखिए।
क्या आप इस पाठ्यपुस्तक के विभिन्न पृष्ठों पर रंग-चक्र ढूँढ़ सकते हैं?
गर्म और ठंडे रंग
गर्म वस्तुएँ प्राय: लाल, पीले और नारंगी रंगों की आभा में होती हैं। ठंडी वस्तुएँ सामान्यतः नीले, हरे और बैंगनी रंगों की आभा (रंगों के हल्के-गहरे रूप) में दिखाई देती हैं। रंग-चक्र में इन्हें ध्यान से देखिए और पहचानिए।
टिप्पणी - यदि आप रंगों का उपयोग कर रहे हैं तो प्रत्येक रंग के बाद तूलिका को अच्छी तरह धोएँ अथवा प्रत्येक रंग के लिए भिन्न तूलिका का उपयोग करें।
गतिविधि 2.3
बाह्य दृश्य का चित्रणक्या आपने कभी भ्रमण-भोजन (पिकनिक) के समय समूह के साथ बाहर कोई फोटो खिंचवाई है?
छायाचित्रकार सामान्यतः लोगों को बताता है कि कहाँ खड़े होना है, कैसी भंगिमा देनी है और वे छायाचित्र (फ्रेम) में क्या-क्या लाने का प्रयास कर रहे हैं। किसी चित्र, छायाचित्र या दृश्य-कलाकृति में स्थान का व्यवस्थित रूप से उपयोग करना अत्यंत आवश्यक होता है।
चित्र में मुख्यतः तीन प्रकार के स्थान होते हैं—
1.अग्रभूमि - चित्र में अग्रभूमि वह स्थान होता है जहाँ मुख्य विषय दर्शक के सबसे निकट होता है और बड़ा दिखाई देता है। इसके रंग और विवरण स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।
2.मध्यभूमि - चित्र में मध्यभूमि वह स्थान होता है जो मुख्य विषय के पीछे स्थित होता है। इसमें कुछ विवरण होते हैं और यह दृश्य में गहनता का अनुभव कराता है।
3.पृष्ठभूमि - चित्र में पृष्ठभूमि वह स्थान होता है जो दर्शक से सबसे दूर होता है। इसमें सबसे कम विवरण होता है और हल्के रंग होते हैं।
दाहिनी ओर दिए गए चित्र 5 में अग्रभूमि, मध्यभूमि और पृष्ठभूमि को चिह्नित कीजिए।
गतिविधि 2.4
समय एवं ऋतुओं के रंगयदि रंग ऊष्मा और ठंडक को व्यक्त कर सकते हैं तो क्या वे समय और ऋतु को भी दर्शा सकते हैं?
| अपनी स्मृतियों के आधार पर विभिन्न ऋतुओं में प्रकृति में दिखाई देने वाले रंगों की सूची बनाइए।
ग्रीष्म ऋतु
वर्षा ऋतु
शीत ऋतु
वसंत ऋतु
|
अपने अवलोकन के आधार पर दिन के भिन्न-भिन्न समय में आकाश में दिखाई देने वाले रंगों की सूची बनाइए।
प्रातः
मध्याह्न
संध्या
रात्रि
|
दिन के समय में किसी वस्तु या वृक्ष की छाया का अवलोकन कीजिए। यह भी लिखिए कि उस वस्तु की लंबाई किस समय छोटी, मध्यम या लंबी है।
प्रातः
मध्याह्न
संध्या
रात्रि
|
एक पृष्ठ को चार समान भागों में विभाजित कीजिए।
पहले भाग में अपने आस-पास दिखाई देने वाला एक बाहरी दृश्य चित्रित कीजिए।
यह विचार कीजिए कि आप अग्रभूमि, मध्यभूमि और पृष्ठभूमि में क्या चित्रित करेंगे।
इसी चित्र को अन्य तीन भागों में भी बनाइए।
प्रत्येक भाग के लिए किसी एक ऋतु का और दिन का एक समय चुनें। उदाहरण के लिए, भाग 1– ग्रीष्म ऋतु की दोपहर, भाग 2-शीत ऋतु की संध्या एवं इसी प्रकार अन्य समय एवं ऋतु।
प्रत्येक भाग में चयनित ऋतु और समय के अनुसार रंग भरिए।
चित्रों में वस्तुओं की छाया का चित्रांकन अवश्य करें जिससे समय का संकेत मिल सके।
रंगों को मिलाकर अधिक विविधता प्रस्तुत करने का प्रयास कीजिए।
नीचे दिए गए स्थान में चित्र बनाइए और पूरा होने के बाद अपने सहपाठियों के समक्ष प्रस्तुत कीजिए।
आकलन
| अध्याय 2 - झरोखे से | ||||
|---|---|---|---|---|
| पाठ्यचर्या लक्ष्य | दक्षताएँ | अधिगम प्रतिफल | शिक्षक | स्वयं |
| CG-1 | C-1.1 | विभिन्न समयों और ऋतुओं में देखे गए प्राकृतिक दृश्यों का चित्रण करते हैं। | ||
| CG-2 | C-2.1 | प्रकृति में दिखाई देने वाली वस्तुओं के प्रतिरूपों को कल्पना द्वारा दृश्य तत्वों का उपयोग करके बनाते हैं। | ||
| CG-2 | C-2.2 | किसी दिए गए चित्र में अग्रभूमि, मध्यभूमि और पृष्ठभूमि की पहचान करते हैं और अपनी कलाकृति में इन स्थानिक विभाजनों का प्रयोग करते हैं। | ||
| CG-3 | C-3.2 | प्राथमिक रंगों को मिलाकर द्वितीयक रंगों को बनाते हुए सामान्य रंग-चक्र तैयार करते हैं। | ||
| CG-3 | C-3.2 | उपयुक्त माध्यम का उपयोग करते हुए उत्कीर्ण चित्र बनाने के चरणों का पालन करते हैं। | ||
| कक्षा में पूर्ण सहभागिता करते हैं। | ||||
शिक्षक-अवलोकन
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अन्य टिप्पणियाँ—————————
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