धागों से बने प्रतिरूप
अपने परिवेश का ध्यान से निरीक्षण कीजिए। क्या आपने पक्षियों को घोंसला बनाते या मकड़ियों को जाले बुनते हुए देखा है? प्रकृति छिपे हुए कलाकारों — पशुओं, पक्षियों और कीटों से भरी है जो बुनते, सिलते, रचते और यहाँ तक कि वस्तुओं को आपस में चिपकाते हैं।
नीचे दिए गए चित्र को देखिए। आपको क्या दिखाई दे रहा है?
क्या आप जानते हैं कि हमारे पर्यावरण में एक ऐसा छुपा हुआ कलाकार भी है जिसने मानवों से पहले बुनाई का कार्य शुरू कर दिया था।
नर बया एक बुनकर पक्षी है जो घास से लटकने वाले सुंदर घोंसले बनाते हैं। घोंसले को सुदृढ़ करने के लिए वे ऊपर और नीचे तंतु बुनते हैं। घोंसले की आकृति किसी थैली के जैसी होती है और यह वृक्ष की टहनियों से लटका रहता है। कुशल बया पक्षी अत्यंत उत्कृष्ट घोंसले बुनते हैं जबकि उनके बच्चे जिन्होंने अभी यह कला सीखनी प्रारंभ की है, वे ऊबड़-खाबड़ घोंसले बनाते हैं।
बुनाई में किसी सामग्री की पट्टियों या धागों को जोड़कर या बुनकर एक प्रतिरूप वाला कपड़ा तैयार किया जाता है। धागों का एक समूह रैखिक और दूसरा उसके लंबवत बिछाया जाता है। जब इन धागों को सावधानीपूर्वक क्रमिक रूप से एक-दूसरे के ऊपर और नीचे से पार किया जाता है तो एक जुड़ी या बुनी संरचना तैयार होती है, जैसे — चटाई, टोकरी या अनेक अन्य वस्तुएँ।
बहुत लंबे समय से लोग नारियल के रेशों एवं ताड़ के सरकंडों, बाँस, घास, जूट, कपास और रेशम जैसी अनेक प्रकार की प्राकृतिक सामग्रियों को बुनकर चटाइयाँ, टोकरियाँ और चादरें बनाते रहे हैं।
चर्चा कीजिए
क्या आपने घर पर अथवा किसी अन्य स्थान पर प्राकृतिक सामग्रियों से बनी हुई वस्तुएँ देखी हैं? वे कौन-सी वस्तुएँ हैं?
- नीले कागज की 5–6 पट्टियाँ लीजिए और उन्हें ऊपर की ओर से किसी सतह पर टेप से चिपका दीजिए।
- पीले कागज की पट्टियों का एक और समूह (सेट) लें और उन्हें नीली पट्टियों के ऊपर-नीचे से क्रमशः निकालकर बुनें।
- यह क्रम तब तक दोहराइए जब तक आपकी चटाई पूरी न हो जाए।
- क्या आप इस विधि का उपयोग टोकरी बनाने के लिए कर सकते हैं?
कागज के अतिरिक्त अन्य सामग्रियों, जैसे — तारों, रस्सियों, रिबनों या सरकंडों का उपयोग करने का प्रयास कीजिए।
आप अपनी कक्षा में ऐसी कौन-सी वस्तुएँ देखते हैं जिन्हें बुनकर तैयार किया गया है? यदि हम कागज की पट्टियों के स्थान पर धागों से बुनाई करें तो वह कपड़ा बन जाता है।
किसी कपड़े के टुकड़े को आवर्धक काँच से या मोबाइल फोन के कैमरे पर ज़ूम (बड़ा) करके देखिए। यह कोई कमीज या कोई अन्य पोशाक हो सकती है जो आपने पहनी हुई हो। क्या आपको यह अद्भुत ताने-बाने का प्रतिरूप (पैटर्न) दिखाई दे रहा है?
बुनाई की परंपराएँ
भारत में लोग 4000 साल पहले भी बुनाई करना जानते थे। पारंपरिक बुनाई करघे नामक एक उपकरण पर हाथ से की जाती है। इस विधि का उपयोग करके बने कपड़े को हथकरघा कपड़ा कहा जाता है। भारत में कुछ सर्वोत्कृष्ट हथकरघा बुनकर हैं जो अपने हस्तशिल्प में निपुण हैं।
भारत में अनेक हथकरघा परंपराएँ हैं जिनमें से प्रत्येक की अपनी अनूठी तकनीक और प्रतिरूप है, जैसे — तमिलनाडु में कांजीवरम, कश्मीर में पश्मीना तथा ओडिशा और गुजरात में इकत।
बुनाई केवल कपड़े बनाने तक सीमित नहीं है। यह अनेक परिवारों को आजीविका भी प्रदान करती है और हमारे पारंपरिक कौशल और अभिकल्पनाओं (डिजाइनों) को जीवित रखती है। यही कारण है कि भारत के लिए बुनाई इतनी विशेष है— इसकी संस्कृति के लिए और उन लोगों के लिए भी जो अपनी आजीविका हेतु इस पर निर्भर हैं।
कपड़ा मिलें बड़ी मात्रा में धागा कातने और कपड़ा बुनने के लिए आधुनिक मशीनों का उपयोग करती हैं।
धागा
हमने देखा कि कैसे धागों को बुनकर कपड़ा बनाया जाता है। किंतु धागे कैसे बनते हैं?
- रूई का एक गोला लें और उससे धीरे से खींचकर एक रेशा बना लीजिए।
- अब अपनी उँगलियों से रेशे को धीरे-धीरे बाँटने का प्रयास कीजिए। ध्यान दीजिए कि जैसे-जैसे आप इसे बाँटते हैं, यह सुदृढ़ होता जाता है।
- एक पेंसिल लीजिए। अब रूई के रेशे या तंतु को पेंसिल पर लपेटिए और रूई के गोले से अधिकाधिक रूई खींचकर इसकी लंबाई बढ़ाइए।
सूती रेशों को एक साथ लपेटकर धागा या सूत बनाने की प्रक्रिया को कताई कहते हैं। चरखा सूती धागे को कातने में सहायक होता है, ठीक उसी प्रकार जैसे आपने पेंसिल से किया।
कपास के धागे को खोलने पर जो पतला बाल जैसा धागा प्राप्त होता है उसे तंतु या रेशा कहते हैं।
गांधी जी ने हमें सिखाया कि आत्मनिर्भर बनना हमारे लिए कितना महत्वपूर्ण है। कपास से धागा बनाना और इससे कपड़ा बुनना स्वतंत्रता संग्राम और आत्मनिर्भर बनने के मार्ग का प्रतीक बन गया। इस विधि से बने कपड़े को खादी कहते हैं।
हमें रेशे केवल कपास से ही नहीं मिलते। रेशों के कई अन्य प्राकृतिक स्रोत भी हैं।
प्राकृतिक रेशे
एक छोटा कीट जिसे रेशमकीट कहा जाता है उसके कृमिकोष (कोकून) से रेशम बनता है। कृमिकोष को गर्म पानी में डालकर रेशम के रेशों को धीरे से बाहर निकाला जाता है और फिर उनसे धागा बनाया जाता है। इन धागों का उपयोग रेशमी कपड़ा बनाने के लिए किया जाता है।
शिक्षक विद्यार्थियों के लिए किसी कपड़ा मिल या हथकरघे से कपड़ा बनाने वाले किसी स्थान के अवलोकन की व्यवस्था करवा सकते हैं। अन्यथा किसी स्थानीय हथकरघा बुनकर को विद्यालय में आमंत्रित कर सकते हैं।
रेशमकीट का जीवन-चक्र
मानवों द्वारा कृत्रिम सामग्रियों का उपयोग करके कृत्रिम रेशे बनाए जाते हैं। हम प्राकृतिक और कृत्रिम दोनों प्रकार के रेशों से बनी वस्तुओं का उपयोग करते हैं।
कृत्रिम रेशे
शिक्षक ‘जीवन-चक्र’ की अवधारणा से विद्यार्थियों का परिचय करा सकते हैं तथा इसे विकास और परिवर्तन के उस क्रम के रूप में प्रस्तुत कर सकते हैं जिसमें प्रत्येक जीव जन्म से लेकर मृत्यु तक गुजरता है। उदाहरण के लिए एक तितली या एक आम का पौधा। इसे रोचक और प्रासंगिक बनाने के लिए चित्र या वीडियो दिखाइए।
कुछ ऐसे कपड़ों, थैलों या अन्य वस्तुओं का अवलोकन कीजिए जिनका आप प्रतिदिन उपयोग करते हैं। इनमें प्रयुक्त होने वाली सामग्रियों की सूची बनाइए। क्या वे प्राकृतिक रेशों से बनी हैं या कृत्रिम रेशों से बनी हैं? नीचे दी गई तालिका में प्रत्येक के सामने लिखें कि उसकी कौन-सी विशेषता आपको पसंद है।
| वस्तु | प्राकृतिक | कृत्रिम | मुझे क्या पसंद है? |
|---|---|---|---|
सुई और धागे से शिल्पकला
प्रकृति अद्भुत वस्तुओं से भरी है।
क्या आप जानते हैं कि एक नन्हा-सा हरा पक्षी है जो अपना घोंसला सिलता है? इसका नाम फुदकी (टेलरबर्ड) है।
किसी पौधे के रेशों या मकड़ी के रेशम का उपयोग करके यह अपनी चोंच से एक बड़े पत्ते के किनारों को सिल देता है। इसके लिए यह पत्ते के किनारों पर छेद करता है और अपनी चोंच से धागे को इसमें डालकर खींचता है, ठीक वैसे ही जैसे दर्जी सुई और धागे से कपड़ा सिलकर कुर्ते की बाँह बनाता है।
इस हरी बाँह में गद्दीदार तह लगाकर यह अंडे देने और बच्चों के पालन-पोषण के लिए एक नरम और सुरक्षित घोंसला बनाता है।
छोटे-छोटे समूहों में पलाश, सागवान, कटहल या इसी तरह के चौड़े पत्तों वाले पौधों के ताजा पत्ते एकत्र कीजिए। यदि पत्ते उपलब्ध न हों तो कागज का उपयोग करके यह गतिविधि कीजिए।
इसके अतिरिक्त कुछ छोटी-छोटी पतली लकड़ी की डंडियाँ एकत्रित कीजिए। अब पत्तों या कागज के टुकड़ों को छोटी-छोटी डंडियों का उपयोग करके आपस में जोड़िए और इसे थाली अथवा चम्मच का रूप दीजिए।
क्या आपने कभी सिलाई करने का प्रयास किया है? किसी कपड़े के टुकड़े को सिलने के लिए आपको सुई और धागे की आवश्यकता होगी। क्या आप फटे हुए कपड़े को ठीक कर सकते हैं या बटन लगा सकते हैं? आइए, थोड़ी सिलाई सीखें।
- क्या आपने कभी घर पर या आस-पड़ोस में किसी को सिलाई करते देखा है? वे क्या बना रहे थे या क्या सिल रहे थे?
- अपनी कमीज या बस्ते को देखिए। क्या आप यह पता लगा सकते हैं कि कपड़े के टुकड़ों को कहाँ-कहाँ सिलाई करके जोड़ा गया है?
आइए कच्चे टाँके लगाना सीखकर हम अपना सिलाई अभ्यास आरंभ करते हैं।
- सुई में धागा डालिए और उसके एक सिरे पर गाँठ बाँध दीजिए।
- कपड़े के पीछे से टाँका लगाना आरंभ कीजिए। सुई को बिंदु ‘क’ पर ऊपर लाइए।
- सुई को बिंदु ‘ख’ पर नीचे की ओर निकालिए।
- इसे बिंदु ‘ग’ पर ऊपर लाइए और फिर बिंदु ‘घ’ पर नीचे ले जाइए।
- इसी प्रकार सीधी रेखा में ऊपर, नीचे, ऊपर, नीचे टाँके लगाते हुए सिलाई करें।
- इसे कच्चा टाँका (रनिंग स्टिच) कहा जाता है।
कपड़ों को सिलकर आपस में जोड़ना
अब आइए इन टाँकों का उपयोग करके वस्त्र के दो टुकड़ों को आपस में जोड़ें।
- दर्जी की दुकान पर बचे हुए छोटे-छोटे वस्त्रों के टुकड़े या पुराने वस्त्रों के कुछ टुकड़े एकत्रित कीजिए।
- कपड़े का एक टुकड़ा मेज पर सीधा बिछाइए। दूसरे कपड़े के टुकड़े को उसके ऊपर थोड़ा आच्छादित (overlap) करते हुए रखिए।
सुई-धागे से सिलाई सावधानीपूर्वक करनी चाहिए। चरणों का अनुकरण धीरे-धीरे और ध्यानपूर्वक करें। विद्यार्थियों को सुइयों से नहीं खेलना चाहिए। चोट से बचने के लिए इनका उपयोग सावधानीपूर्वक करना चाहिए। गतिविधि से पहले विद्यार्थियों को स्पष्ट निर्देश दिए जाने चाहिए।
- अब उन्हें एक साथ जोड़ने के लिए एक सुई और धागे का उपयोग करके ऊपर बताई गई विधियों के अनुसार कच्चे टाँके लगाइए।
- मेजपोश, चटाई, कोस्टर, सफाई का कपड़ा या अपनी रुचि की कोई भी सामग्री बनाने के लिए इसी प्रकार और अधिक टुकड़े जोड़िए।
अपने दैनिक जीवन में हम कच्चे टाँकों का उपयोग और कहाँ कर सकते हैं?
यदि आपकी सिलाई में कहीं पर धागा या एक टाँका टूट जाए तो आपको क्या लगता है कि शेष टाँकों का क्या होगा?
सिलाई करें और सजाएँ
क्या आप जानते हैं कि भारत के विभिन्न भागों में लोग अनेक प्रकार के टाँके लगाते हैं? ये टाँके केवल कपड़े जोड़ने के लिए ही नहीं लगाए जाते अपितु इनका उपयोग वस्त्र को सुंदरता से सजाने के लिए भी किया जाता है। प्रत्येक टाँका हमें किसी स्थान, वहाँ के लोगों और उनकी परंपराओं की कहानी सुनाता है।
| भारत की पारंपरिक कढ़ाई और उद्गम स्थल | ||
|---|---|---|
| 1. |
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चिकन और चिकनकारी लखनऊ, उत्तर प्रदेश |
| 2. |
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बंजारा राजस्थान |
| 3. | ![]() |
कंथा | पश्चिम बंगाल, ओडिशा और त्रिपुरा जैसे पूर्वी भारतीय राज्य |
| 4. | ![]() |
गोटा | राजस्थान |
| 5. | ![]() |
फुलकारी | पंजाब |
| 6. | ![]() |
टोडा | तमिलनाडु |
| 7. | ![]() |
कश्मीरी | कश्मीर |
| 8. | ![]() |
खनेन्ग कढ़ाई | मेघालय |
पुनर्चक्रण
हमारे देश में लोग कपड़ों को प्राय: फेंकते नहीं हैं। यदि कपड़े हमारे शारीरिक आकार से छोटे या बड़े हों तो हम उन्हें सामान्यतः अपने छोटे या बड़े भाई-बहन या किसी ऐसे व्यक्ति को दे देते हैं जो उन्हें पहन सकें। कभी-कभी हमारे वयस्क उनसे कुछ और बना लेते हैं। हमारे देश में कपड़ों के छोटे-छोटे टुकड़ों को जोड़कर सुंदर रजाइयाँ बनाने की भी एक पुरानी परंपरा है।
प्रदर्शनी
आपने बहुत-सी अद्भुत सामग्रियाँ बनाई हैं। आपके द्वारा बनाई गई चटाई, कपड़ों के टुकड़ों को जोड़कर बनाई गई वस्तुओं और पत्तों से बनी चम्मच, पत्तल, दौने आदि की एक प्रदर्शनी लगाइए। नाम पट्टियों और छोटे विवरण पत्र लगाकर बताइए कि आपने इन्हें कैसे बनाया। अपने अन्य सहपाठियों या माता-पिता को भी इसे देखने के लिए आमंत्रित कीजिए।
- क्या आपने कभी पुराने कपड़ों का पुनरुपयोग या पुनर्चक्रण किया है? आपने या आपके परिवारजनों ने उनसे क्या बनाया था?
- यदि सिले हुए कपड़े या बुनी हुई चटाई में से एक धागा टूट जाए तो क्या होगा? प्रत्येक धागा क्यों महत्वपूर्ण है?
- किसी वयस्क व्यक्ति के साथ किसी दर्जी या हथकरघे की दुकान पर जाइए। वहाँ आपने कौन-से मशीन या उपकरण उपयोग में आते हुए देखे?
- पता लगाइए कि आपके क्षेत्र या राज्य में किस प्रकार की बुनाई या सिलाई का काम प्रसिद्ध है। उसका नाम बताइए।
- हमें पुराने कपड़े नहीं फेंकने चाहिए। क्यों?
- नीचे रेशमकीट के जीवन-चक्र के चरणों को आगे-पीछे दिया गया है। इन्हें पढ़िए और सही क्रम में 1 से 6 तक संख्याएँ लिखिए।
- वयस्क रेशमकीट कोकून से बाहर आता है।
- अंडों से छोटे-छोटे रेशमकीट (लावा) निकलते हैं।
- रेशमकीट अंडे देता है।
- चक्र पुन: आरंभ होता है।
- रेशमकीट (लावा) शहतूत के पत्ते खाते हैं और बड़े हो जाते हैं।
- रेशमकीट (लावा) अपने चारों ओर कृमिकोष (कोकून) बुनते हैं।
7. अपने घर से या आस-पास के दर्जी से विभिन्न प्रकार के वस्त्रों के 5–6 टुकड़े (बचे हुए कपड़े) लीजिए। इन वस्त्रों का ध्यानपूर्वक अवलोकन करके तालिका पूरी कीजिए। किसी बड़े से पूछें या अपनी पुस्तक में ढूँढ़कर पता करें कि ये वस्त्र किस पदार्थ (रेशे) से बने हैं — सूती, ऊनी, रेशमी, जूट, पॉलिएस्टर या नायलॉन।
| वस्त्रों की क्रम संख्या | कैसा अनुभव हुआ? (चिकना, खुरदुरा) | मोटा/ पतला | चमकदार (हाँ/नहीं) | खिंचाव (हाँ/नहीं) | आपके अनुमान के अनुसार यह किस पदार्थ (रेशे) से बना है? |
|---|---|---|---|---|---|
| 1. | |||||
| 2. | |||||
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| 4. | |||||
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