अध्याय-2
न्याय की कुर्सी
उज्जैन की प्राचीन और ऐतिहासिक नगरी के बाहर एक लंबा-चौड़ा मैदान था। यहाँ-वहाँ टीले थे। एक दिन लड़कों का एक झुंड वहाँ खेल रहा था। एक लड़का कूदता-भागता एक टीले पर चढ़ गया। अचानक वह ठोकर खाकर गिर पड़ा। उसने इधर-उधर देखा कि किस चीज से ठोकर लगी है। उसको एक बड़े चिकने पत्थर के अलावा और कुछ नहीं दिखा। वह उठकर गया और अपने मित्रों को बुलाकर वह शिला दिखाई। फिर शान से उस पर बैठकर बोला, "यह सिंहासन है मेरा। मैं राजा हूँ और तुम सब मेरे दरबारी। तुम अपनी-अपनी फरियाद लेकर आओ। फिर मैं उनका फैसला करूँगा।"
दूसरे लड़कों को यह खेल पसंद आया। वे एक-एक करके आते और कोई काल्पनिक फरियाद सुनाते। फिर गवाह बुलाए जाते। उनकी गवाही ली जाती। उसके बाद राजा बना हुआ लड़का उनसे सवाल करता और अपना फैसला सुनाता।
इस खेल में उनको इतना आनंद आया कि वे रोज ही यह खेल खेलने लगे। शिकायतें सुनी जातीं, अपराधी पेश किए जाते, बयान लिए जाते, फिर शिला पर बैठा हुआ लड़का अपना फैसला सुनाता।
बात इधर-उधर फैलने लगी। लोग लड़के की न्याय-बुद्धि की चर्चा करने लगे और कहने लगे कि अवश्य ही उस लड़के में कोई दैवी शक्ति है।
एक दिन दो किसानों के बीच जमीन को लेकर झगड़ा उठ खड़ा हुआ। मामला गंभीर था। टीलेवाले लड़के की इतनी चर्चा थी
कि वे राजा के दरबार में जाने के बजाय उसी के पास गए और | उसको अपने झगड़े के बारे में बताया। लड़के ने बड़ी गंभीरता से दोनों किसानों के बयान सुने। उसके बाद उसने जो फैसला दिया, उसे सुनकर वे दंग रह गए।
उस दिन के बाद से तो नगर के सभी लोग अपनी फरियाद लेकर यहीं आने लगे। राजा के दरबार में कोई न जाता। और ऐसा कभी नहीं हुआ कि लड़के के फैसले से उन्हें संतोष न हुआ हो।
धीरे-धीरे यह बात राजा के कानों तक पहुँची। उसको बहुत क्रोध आया। उसने गरजकर कहा, "उस छोकरे की यह मजाल कि अपने को मुझसे अच्छा न्यायकर्ता समझे? मैं इन किस्सों में विश्वास नहीं करता। मैं खुद जाकर देखूँगा।"
ऐसा कहकर राजा अपने लाव-लश्कर के साथ उस मैदान में पहुँचा जहाँ लड़के अपना प्रिय खेल खेल रहे थे। बड़ी देर तक राजा उनका खेल देखता रहा। वह स्तंभित रह गया। उसने अपने मंत्री से कहा, "लड़का सचमुच बहुत बुद्धिमान है। इतनी छोटी उम्र में इतनी बुद्धि का होना आश्चर्य की बात है। इसकी न्याय-बुद्धि के आगे तो बड़े-बड़ों को लोहा मानना पड़ेगा।"
उसी समय किसी ने राजा को बताया, "लेकिन महाराज, यह तो रोज वाला लड़का नहीं है। वह बीमार हो गया है, इस कारण कोई नया ही लड़का टीले पर बैठा है।"
"यह तो और भी आश्चर्य की बात है! हो न हो, पत्थर की इस कुर्सी में ही कोई चमत्कार है। मैं इसकी जाँच करूँगा।"
राजा का इशारा पाते ही उस स्थान को खोदकर पत्थर को बाहर निकाला गया। राजा ने देखा कि वह पत्थर नहीं, बहुत ही सुंदर सिंहासन था। उस पर बहुत बारीक और खूबसूरत मूर्तियाँ खुदी हुई थीं। उसके चारों पायों पर चार देवदूतों की मूर्तियाँ बनी हुई थीं। चारों ओर खबर फैल गई। बात ही बात में वहाँ अच्छी खासी भीड़ जमा हो गई। विद्वान पंडितों
ने बताया कि वह कोई ऐसा-वैसा सिंहासन नहीं था- सदियों पुराना, राजा विक्रमादित्य का सिंहासन था। राजा विक्रमादित्य अपने न्याय और विवेक के लिए बहुत प्रसिद्ध थे।
राजा ने आज्ञा दी कि सिंहासन को ले जाकर राजदरबार में रख दिया जाए। उसने कहा, “मैं इस पर बैठकर अपनी प्रजा की फरियाद सुनूँगा और उनका फैसला करूँगा।" अगले दिन राजा दरबार में आया और सीधे उस सिंहासन की ओर बढ़ा। वह उस पर बैठने ही वाला था कि किसी की आवाज सुनाई दी, "ठहरो!"
राजा ने रुककर चारों ओर देखा। कोई नजर नहीं आया। वह फिर सिंहासन की ओर बढ़ा। फिर इसी प्रकार आवाज आई, "ठहरो !" इस बार राजा ने आश्चर्य से देखा कि सिंहासन के एक पाये पर बनी मूर्ति बोल रही है।
मूर्ति ने कहा, "क्या तुम इस सिंहासन पर बैठने योग्य हो? क्या तुम्हें पूरा विश्वास है कि तुमने कभी चोरी नहीं की है?"
राजा ने लज्जा से सर झुका लिया। "यह सच है कि हाल में ही मैंने अपने एक दरबारी की जमीन पर कब्जा कर लिया था क्योंकि मैं उससे नाराज हो गया था।"
“तब तो तुम इसके योग्य नहीं हो”, मूर्ति ने कहा। "तुमको तीन दिन तक प्रायश्चित करना होगा।" यह कहकर मूर्ति अपने पंख फैलाकर आकाश में उड़ गई।
राजा ने तीन दिन तक उपवास किया और प्रार्थना की। चौथे दिन वह फिर दरबार में आया। ज्यों ही सिंहासन पर बैठने लगा, दूसरी मूर्ति ने कहा, “ठहरो! तुम विश्वास के साथ कह सकते हो कि तुमने कभी झूठ नहीं बोला?"
राजा सकपकाया। झूठ तो उसने किसी न किसी मुसीबत से बचने के लिए कई बार बोला था। राजा पीछे हट गया। दूसरी मूर्ति भी पंख फैलाकर आकाश में उड़ गई।
राजा ने तीन दिन तक फिर उपवास और पूजा-पाठ किया। तीसरी बार वह फिर सिंहासन पर बैठने के लिए आगे बढ़ा। हिचकिचाते हुए वह आगे बढ़ा। वह बैठने ही वाला था कि तीसरी मूर्ति ने पूछा, "बैठने के पहले यह बताओ कि क्या तुमने कभी किसी को चोट नहीं पहुँचाई है?"
राजा पीछे हट गया। तीसरी मूर्ति भी अपने पंख फैलाकर उड़ गई। फिर तीन दिन तक उपवास और प्रार्थना करने के बाद राजा सिंहासन की ओर बढ़ा। उसके पैर लड़खड़ा गए। चौथी मूर्ति ने कहा, “ठहरो! जो लड़के इस सिंहासन पर बैठते थे, वे भोले-भाले थे। उनके मन में कलुष नहीं था। अगर तुमको विश्वास है कि तुम इस योग्य हो तो इस सिंहासन पर बैठ सकते हो।"
राजा बड़ी देर तक सोचता रहा। फिर उसने मन ही मन कहा, "अगर एक लड़का इस पर बैठ सकता है तो भला मैं क्यों नहीं बैठ सकता हूँ। मैं राजा हूँ। मुझसे ज्यादा धनवान, बलवान और बुद्धिमान भला और कौन होगा? मैं अवश्य इस सिंहासन पर बैठने योग्य हूँ।"
यह कहकर राजा सिंहासन की ओर दृढ़ कदमों से बढ़ा। लेकिन उसी समय चौथी मूर्ति पंख फैलाकर सिंहासन समेत आकाश में उड़ गई।
-लीलावती भागवत
(राष्ट्रीय पुस्तक न्यास से प्रकाशित 'स्वर्ग की सैर तथा अन्य कहानियाँ' पुस्तक से साभार)
बातचीत के लिए
- 1.आपका प्रिय खेल कौन-सा है? आप उसे कैसे खेलते हैं?
- 2. क्या आपने कभी किसी समस्या का समाधान किया है? अपना अनुभव साझा कीजिए।
- 3. यदि आप राजा के स्थान पर होते और आपको लड़के के बारे में पता चलता तो आप क्या करते?
- 4. लड़के के अंदर ऐसे कौन-कौन से गुण होंगे जिनके कारण वह सिंहासन पर बैठ पा रहा था?
पाठ से
नीचे दिए गए प्रश्नों के सही उत्तर के आगे तारे का चिह्न (*) बनाइए। एक से अधिक विकल्प भी सही हो सकते हैं -
- 1. राजा को लड़के द्वारा न्याय करने के विषय में कैसे पता चला?
- (क) लड़के द्वारा की गई शरारतों को सुनकर ( )
- (ख) लोगों द्वारा लड़के के न्याय की प्रशंसा सुनकर ( )
- (ग) लड़के द्वारा अपने न्याय की बुराई सुनकर ( )
- (घ) मंत्रियों द्वारा लड़के की बुद्धि की प्रशंसा सुनकर ( )
- 2. राजा को सबसे अधिक आश्चर्य किस बात से हुआ?
- (क) बच्चे खेल-खेल में न्याय कर रहे थे।
- (ख) लोग राजा के दरबार में नहीं आ रहे थे।
- (ग) सिंहासन पर बैठने वाला लड़का सही न्याय करता था। ( )
- (घ) स्वयं सिंहासन में ही कोई चमत्कारी शक्ति विद्यमान थी। ( )
3. लड़कों को यह खेल इतना अच्छा क्यों लगा कि वे प्रतिदिन इसे खेलने लगे?
- (क) क्योंकि वे राजा जैसा बनने का आनंद ले रहे थे। ( )
- (ख) क्योंकि यह अन्य खेलों से अधिक मनोरंजक था। ( )
- (ग) क्योंकि उन्हें न्याय करने का अनुभव अच्छा लगा। ( )
- (घ) क्योंकि इस खेल से वे नगर भर में प्रसिद्ध हो गए थे। ( )
- 4. राजा ने उपवास और प्रायश्चित क्यों किया?
- (क) ताकि वह सिंहासन पर बैठने के योग्य बन सके। ( )
- (ख) क्योंकि उसे अपने कर्मों पर पछतावा था। ( )
- (ग) क्योंकि मूर्तियों ने उसे ऐसा करने के लिए कहा था। ( )
- (घ) क्योंकि जनता ने उसे ऐसा करने को कहा था। ( )
सोचिए और लिखिए
नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए -
- 1. सभी लड़के सिंहासन पर बैठ पा रहे थे लेकिन राजा नहीं बैठ पाया। ऐसा क्यों?
- 2. क्या राजा को प्रायश्चित करने के बाद सिंहासन पर बैठने का अधिकार मिलना चाहिए था? अपने उत्तर का कारण भी बताइए।
- 3. दोनों किसानों ने अपने झगड़े के निपटारे के लिए राजा के दरबार में जाने के बजाय लड़के के पास जाने का फैसला क्यों किया?
- 4. चौथी मूर्ति सिंहासन के साथ आकाश में क्यों उड़ गई?
- 5. इस कहानी को एक नया शीर्षक दीजिए और बताइए कि आपने यह शीर्षक क्यों चुना?
अनुमान और कल्पना
- 1. कहानी में सिंहासन की मूर्तियाँ उड़कर किसी और जगह चली जाती हैं। वे कहाँ जाती होंगी और वहाँ क्या करती होंगी?
- 2. यदि इस कहानी के अंत में राजा सिंहासन पर बैठने में सफल हो जाता तो क्या होता?
भाषा की बात
नीचे दी गई पंक्तियों को ध्यान से पढ़िए -
यह तो और भी आश्चर्य की बात है हो न हो पत्थर की इस कुर्सी में
ही कोई चमत्कार है मैं इसकी जाँच करूँगा
ऊपर दिए गए वाक्यों को ध्यान से देखिए। आपको इसका अर्थ समझने में कुछ कठिनाई हो रही है न? अब इसी वाक्य को एक बार फिर पढ़िए -
"यह तो और भी आश्चर्य की बात है! हो न हो, पत्थर की इस कुर्सी में ही कोई चमत्कार है। मैं इसकी जाँच करूँगा।"
अब आपको इन वाक्यों का अर्थ और भाव ठीक-ठीक समझ में आ रहा होगा। इसका कारण है कुछ विशेष चिह्न, जैसे - "" ।!
इस प्रकार के चिह्नों को 'विराम चिह्न' कहते हैं। विराम चिह्नों से पता चलता है कि लिखे हुए वाक्यों में कहाँ ठहराव है और उनका क्या भाव है।
अब नीचे दिए गए वाक्यों में उचित स्थानों पर विराम चिह्न लगाइए -
- (क) चौथी मूर्ति ने कहा ठहरो जो लड़के इस सिंहासन पर बैठते थे वे भोले भाले थे उनके मन में कलुष नहीं था अगर तुमको विश्वास है कि तुम इस योग्य हो तो इस सिंहासन पर बैठ सकते हो
- (ख) राजा बड़ी देर तक सोचता रहा फिर उसने मन ही मन कहा अगर एक लड़का इस पर बैठ सकता है तो भला मैं क्यों नहीं बैठ सकता हूँ मैं राजा हूँ मुझसे ज्यादा धनवान बलवान और बुद्धिमान भला और कौन होगा मैं अवश्य इस सिंहासन पर बैठने योग्य हूँ
2. "तीसरी मूर्ति भी उड़ गई।" इस वाक्य के आधार पर प्रश्नों के उत्तर लिखिए -
(क) इस वाक्य में संज्ञा शब्द कौन-सा है?
...................................
ख) कौन-सा शब्द इस संज्ञा शब्द के गुण या विशेषता को बता रहा है?
...................................
3. कहानी में से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं। इनमें विशेषण शब्द पहचानकर उनके नीचे रेखा खींचिए
-- (क) एक दिन लड़कों का एक झुंड वहाँ खेल रहा था।
- (ख) उज्जैन की प्राचीन और ऐतिहासिक नगरी के बाहर एक लंबा-चौड़ा मैदान था।
- (ग) इतनी छोटी उम्र में इतनी बुद्धि का होना आश्चर्य की बात है।
- (घ) राजा ने देखा कि वह पत्थर नहीं, बहुत ही सुंदर सिंहासन था।
- (ङ) बात ही बात में वहाँ अच्छी खासी भीड़ जमा हो गई।
4. आपमें कौन-कौन सी विशेषताएँ होनी चाहिए जिससे आप कहानी के सिंहासन पर बैठ सकें? लिखिए -
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पाठ से आगे
- 1. कहानी में गाँव वाले न्याय करवाने या झगड़े सुलझाने बच्चों के पास जाया करते थे। आप अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए किन-किनके पास जाते हैं? आप उन्हीं के पास क्यों जाते हैं?
- 2. क्या कभी ऐसा हुआ है कि किसी ने आपके साथ अन्याय किया हो? आपने उस स्थिति का सामना कैसे किया?
पुस्तकालय एवं अन्य स्रोत
आपने जो कहानी पढ़ी, वह हमारे देश की सैकड़ों वर्ष पुरानी एक पुस्तक पर आधारित है। उस पुस्तक का नाम है सिंहासन बत्तीसी।
इस पुस्तक में राजा भोज को भूमि में गड़ा राजा विक्रमादित्य का सिंहासन मिलता है जिसमें बत्तीस मूर्तियाँ जड़ी होती हैं। प्रत्येक मूर्ति राजा भोज को राजा विक्रमादित्य की एक कहानी सुनाती है। इस पुस्तक की प्रत्येक कहानी बहुत रोचक है।
- पुस्तकालय में से यह पुस्तक खोजकर पढ़िए और अपनी मनपसंद कहानी कक्षा में सुनाइए।
- सिंहासन बत्तीसी की तरह भारत में अनेक पारंपरिक कहानियाँ प्रचलित हैं, जैसे – पंचतंत्र, हितोपदेश, जातक कथाएँ आदि। इन्हें भी पुस्तकालय से ढूँढ़कर पढ़िए।
पता लगाकर कीजिए
“राजा ने आज्ञा दी कि सिंहासन को ले जाकर राजदरबार में रख दिया जाए।" सिंहासन एक विशेष प्रकार की भव्य कुर्सी हुआ करती थी जिस पर राजा-महाराजा बैठा करते थे। आज भी हम बैठने के लिए अनेक प्रकार की वस्तुओं का उपयोग करते हैं। इनमें से कुछ वस्तुओं के चित्र दिए गए हैं। इनका वर्णन कीजिए और यह भी लिखिए कि आपकी भाषा में इन्हें क्या कहते हैं।
| वस्तु | वर्णन | आपकी भाषा में नाम |
|---|---|---|
चटाई |
यह घास, बाँस या प्लास्टिक से बनी होती है। इसे भूमि पर बिछाकर बैठा जाता है। | ............ |
दरी |
यह मोटे कपड़े या सूती धागों से बनी होती है। यह उत्सवों या सामाजिक कार्यक्रमों में उपयोग की जाती है। | ............ |
मूढ़ा
|
....................... . ....................... . ....................... |
............ |
चारपाई
|
....................... . ....................... . ....................... |
............ |
पीढ़ा
|
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............ |
टाट पट्टी |
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............ |
बूझो तो जानें
आज हम आपके लिए लाए हैं भारत की अलग-अलग भाषाओं की विभिन्न पहेलियाँ। हो सकता है कि इनमें से कुछ को पढ़कर आपको लगे – अरे! ये पहेली तो मेरे घर पर भी बूझी जाती है। तो आइए, बूझते हैं ये रोचक पहेलियाँ-न तो खाय न तो पीवैह,
संग मा रेंगत है।
(न खाती है, न पीती है,
संग-संग चलती है)
एक जानवर ऐसो, जिकी दूम पे पैसो। (एक जानवर ऐसा, जिसकी दुम पर पैसा)
हरो माथणो, लाल पेट, रस पी लेव भर-भर पेट। (हरे मटके का लाल पेट, रस पी लो भर-भर पेट)
एक लकड़ी की ऐसी कहानी, ऊमें लुको है मीठो पानी। एक लकड़ी की ऐसी कहानी, उसमें छिपा है मीठा पानी)
एक दिया सबतर उंजियार। (एक दीपक से चारों ओर उजियारा)
मेरा न्याय
- अपनी कक्षा से किन्हीं दो ऐसी समस्याओं को चुनिए जिन पर न्याय किया जाना है।
- कक्षा को दो समूहों में विभाजित कीजिए।
- दोनों समूह एक समस्या लेकर उस पर विचार करेंगे।
- तत्पश्चात दोनों समूह एक-एक कर नाटक-मंचन के द्वारा समस्या को सुलझाएँगे।
- दर्शक समूह प्रतिपुष्टि प्रदान करेंगे।
| क्र.सं. | प्रतिपुष्टि के बिंदु | अंक | ||||
| 1 | 2 | 3 | 4 | 5 | ||
| (क) | प्रस्तुतीकरण | |||||
| (ख) | पात्र संवाद | |||||
| (ग) | समस्या का समाधान | |||||
| (घ) | पात्रों का आत्मविश्वास | |||||
चटाई
दरी
मूढ़ा
चारपाई
पीढ़ा
टाट पट्टी