अध्याय-5
सुंदरिया
हरियाणा के किसी गांव में हीरासिंह नामक एक किसान था। उसकी समझ में यह नही आता था कि वह अपने बीवी-बच्चों और अपनी प्यारी गाय सुंदरिया की परवरिश कैसे करे?सुंदरिया गाय डील-डौल में काफी बड़ी थी। उसे देखकर लोगों को ईर्ष्या होती थी। गरीबी के कारण हीरासिंह गाय का चारा भी नहीं जुटा पाता था। खाने-पीने की कमी होने लगी तो हीरासिंह ने सोचा- 'मैं सुंदरिया को बेच दूँ?' पर उसका बड़ा लड़का जवाहरसिंह सुंदरिया को मौसी कहा करता था। इसलिए वह उसे बेचने से डरता था।
नौकरी की तलाश में वह दिल्ली चला आया। वहाँ उसे एक सेठ के यहाँ चौकीदार की नौकरी मिल गई। एक रोज सेठ ने हीरासिंह से कहा- "तुम तो हरियाणा के रहने वाले हो। वहाँ की गायें अच्छी होती हैं। एक गाय का बंदोबस्त कर दो।"
हीरासिंह सुंदरिया की बात सोचने लगा। उसने कहा – “एक है मेरी निगाह में।"
सेठ ने कहा - "कैसी गाय है?"
हीरासिंह बोला- "गाय तो ऐसी है कि दूध देने में कामधेनु। पंद्रह सेर दूध उसके तले उतरता है। उसके दो सौ रुपए तक लग चुके हैं।"
सेठ बोला - "चलो, पाँच हम ज्यादा दे देंगे?"
हीरासिंह ने तब साफ-साफ ही कह दिया - "सेठ जी, सच यह है कि वह गाय अपनी ही है।"
सेठ जी ने खुश होकर कहा- "तब तो अच्छी बात है। तुम्हारे लिए जैसे दो सौ, वैसे दो सौ पाँच।"
हीरासिंह लाज से गड़ गया कि वह कैसे बताए कि सुंदरिया उसके परिवार का अंग है। पर उसने सोचा कि सेठ के यहाँ रहकर गाय तो उसकी आँखों के आगे रहेगी। सेठ ने सौ रुपए मँगाकर उसी वक्त हीरासिंह को थमा दिए। कहा - "देखो हीरासिंह, आज ही चले जाओ। कब तक वापस आ जाओगे?”
हीरासिंह ने कहा – “पाँच दिन तो लगेंगे ही।"
सेठ जी ने कहा - "पर ज्यादा दिन मत लगाना।"
हीरासिंह उसी रोज गाय लेने चला गया। जैसे-तैसे जवाहरसिंह को समझा-बुझाकर वह गाय ले आया। गाय देखकर सेठ बहुत खुश हुए। सचमुच वैसी सुंदर, स्वस्थ गाय उन्होंने अब तक न देखी थी। हीरासिंह ने खुद उसे सानी-पानी दिया, सहलाया और अपने हाथों से दुहा। दूध पंद्रह सेर से कुछ ऊपर ही बैठा। सेठ जी ने सौ के ऊपर सात रुपए उसे और दे दिए। सौ रुपए वह पहले ही ले चुका था। घोसी को बुलाकर सेठ जी ने गाय उसके सिपुर्द कर दी।
रुपए तो ले लिए लेकिन हीरासिंह का जी भरा जा रहा था। जब घोसी गाय को ले जाने लगा, तब गाय उसके साथ जाना ही नहीं चाहती थी।
हीरासिंह बोला – “गाय की नौकरी पर मुझे लगा दीजिए। चाहे तनख्वाह कम कर दीजिए।"
सेठ जी ने कहा - "हीरासिंह, तुम्हारे जैसा ईमानदार चौकीदार हमें दूसरा कहाँ मिलेगा? तनख्वाह तो तुम्हारी हम एक रुपया और भी बढ़ा सकते हैं, पर तुमको ड्योढ़ी पर ही रहना होगा।"
हीरासिंह क्या कहता ! उसने गाय को पुचकारकर कहा - "सुंदरिया जाओ, जाओ।" गाय ने उसकी ओर देखा। जैसे पूछना चाहती थी – “क्या सचमुच ही इसके साथ चली जाऊँ?"
हीरासिंह ने उसे थपथपाया तो वह घोसी के पीछे-पीछे चली गई। हीरासिंह एकटक देखता रहा। लेकिन अगले दिन गड़बड़ हुई। सेठ जी ने हीरासिंह को बुलाकर कहा - "तुमने मुझे धोखे में क्यों रखा? गाय से सवेरे पाँच सेर दूध भी तो नहीं उतरा।"
हीरासिंह ने कहा - "मैंने खुद पंद्रह सेर से ऊपर दूध दुहकर आपको दिया था।”
सेठ जी ने कहा- "तो जाकर गाय को देखो।" हीरासिंह गाय के पास गया। पुचकारकर कहा - "सुंदरिया, मेरी रुसवाई क्यों कराती है?"
गाय ने मुँह ऊपर उठाया मानो पूछ रही हो – “बोलो मुझे क्या करना है?” हीरासिंह ने घोसी से कहा - "बालटी लाओ।"
घोसी ने कहा – “मैं तो पहले ही दुह चुका हूँ।"
“पर तुम बालटी तो लाओ।” हीरासिंह बोला।
उसके बाद साढ़े तेरह सेर दूध उसके तले से तोलकर हीरासिंह ने घोसी को दे दिया। कहा – “यह दूध सेठ जी को दे देना।" फिर गाय के गले पर सिर रखकर बोला – “सुंदरिया, देख... मेरी ओछी मत करा। मैं दूर हूँ तो क्या! इसमें मुझे सुख है?"
गाय मुँह झुकाए वैसी ही खड़ी रही। दूसरे दिन फिर वही हुआ। लाख कोशिश के बाद भी गाय ने पूरा दूध नहीं दिया। सेठ जी ने हीरासिंह को बुलाकर कहा – “क्यों हीरासिंह, यह क्या है? यह तो सरासर धोखा है।” हीरासिंह चुप रहा। सेठ जी ने कहा - "ऐसा ही है तो ले जाओ अपनी गाय और मेरे रुपए वापस करो।" लेकिन रुपए हीरासिंह गाँव भेज चुका था। उसमें से काफी रुपया मकान की मरम्मत में लग गया था। अब सेठ जी को देने के लिए रुपए कहाँ से लाए?
उसे चुप देख, सेठ जी बोले – “अच्छा, तनख्वाह में से रकम कटती जाएगी। जब पूरी हो जाएगी तो अपनी गाय ले जाना।”
अगले दिन सवेरे बहुत-सा दूध ड्योढ़ी में बिखरा हुआ था। उससे पहली शाम गाय ने दूध देने से बिलकुल इनकार कर दिया था।
सेठ जी ने पूछा – “हीरा, यह क्या बात है?” हीरासिंह सिर झुकाकर रह गया। -
फिर उसने पूछा – “रात गाय खुली तो नहीं रह गई थी? आप इसकी खबर तो लीजिए।"
घोसी को बुलाकर पूछा गया तो उसने कहा - "कल रात मैंने गाय को खुद खूँटे से बाँधा था।"
हीरासिंह ने कहा - "नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। गाय रात को आकर ड्योढ़ी में खड़ी रही है और अपना दूध गिरा गई है।"
सेठ जी बोले – “ऐसी मसनूई बातें औरों से कहना। जाओ, खबर लगाओ कि वह कौन आदमी है, जिसकी करतूत है?"
हीरासिंह चुपचाप अपनी कोठरी में जाकर लुढ़क गया। कब आँख लगी, कुछ पता नहीं। रात को अचानक लगा कि दरवाजे की ओर से रगड़ की आवाज आई। उठकर दरवाजा खोला। देखा, सुंदरिया खड़ी है। मुँह ऊपर उठाकर सुंदरिया उसे अपराधी की आँखों से देख रही थी। मानो क्षमा याचना कर रही हो। जैसे कहती हो- 'मैं अपराधिनी हूँ। लेकिन मुझे क्षमा कर देना। मैं बड़ी दुखिया हूँ।'
देखकर हीरासिंह विह्वल हो उठा। उसके आँसू रोके न रुके। वह सुंदरिया की गर्दन से लिपट देर तक सिसकता रहा।
अगले सवेरे उसने सेठ जी से कहा -"आप मुझसे जितने महीने चाहें कसकर चाकरी करवाएँ, पर गाय आज ही यहाँ से गाँव चली जाएगी।
रुपए जब आपके चुकता हो जाएँ, मुझसे कह दीजिएगा। तब मैं भी छुट्टी कर लूँगा।”
और सेठ जी कुछ कहें, इससे पहले ही हीरासिंह गाय को लेकर चल दिया।
- जैनेंद्र कुमार
शिक्षण-संकेत – इस कहानी में कुछ ऐसे शब्दों का प्रयोग हुआ है जो प्रारंभिक हिंदी में प्रचलित थे। उदाहरण के लिए सिपुर्द, रुसवाई, मसनूई आदि। इनका अर्थ क्रमशः सौंपना, अपमान और बनावटी है। शिक्षक, बच्चों को ऐसे अन्य शब्द उनके अर्थ सहित शब्दकोश की सहायता से ढूँढ़ने तथा वाक्यों में प्रयोग करने के लिए प्रेरित करें।
बातचीत के लिए
- 1. जवाहरसिंह अपनी गाय को मौसी कहकर बुलाता है। आप अपने घर या आस-पास के पशु-पक्षियों को क्या कहकर पुकारते हैं?
- 2. सुंदरिया के दूर चले जाने के बाद जवाहरसिंह को कैसा लगा होगा? जब आपका कोई प्रिय आपसे दूर हो जाए तो आपको कैसा लगता है?
- 3. जवाहरसिंह सुंदरिया की देखभाल के लिए क्या-क्या करता होगा?
- 4. आप अपने आस-पास के पशु-पक्षियों के लिए क्या-क्या करते हैं?
पाठ से
नीचे दिए गए प्रश्नों के सही उत्तर पर(😀 ) का चिह्न बनाइए। प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी सही हो सकते हैं -
- 1. लोग सुंदरिया को देखकर ईर्ष्या क्यों करते थे? ( )
- (क) सुंदरिया को खाने-पीने को बहुत कुछ मिलता था। ( )
- (ख) सुंदरिया बहुत आकर्षक थी। ( )
- (ग) सुंदरिया बहुत दूध देती थी। ( )
- (घ) सुंदरिया सभी से प्रेम करती थी। ( )
- 2. हीरासिंह के मन में सुंदरिया को बेचने की बात क्यों आई? ( )
- (क) सुंदरिया सभी को परेशान करने लगी थी। ( )
- (ख) सुंदरिया के लिए चारे का प्रबंध करना कठिन हो गया था। ( )
- (ग) सुंदरिया हीरासिंह के घर नहीं रहना चाहती थी। ( )
- (घ) सुंदरिया पड़ोसियों को परेशान करती थी। ( )
- 3. हीरासिंह ने स्वयं को गाय की नौकरी पर लगाने की बात क्यों कही?
- (क) सुंदरिया को ठीक से चारा नहीं मिलता था। ( )
- (ख) वह गाय से बिछोह सहन नहीं कर पा रहा था। ( )
- (ग) उसे रुपयों की आवश्यकता थी। ( )
- (घ) गाय घोसी के व्यवहार से प्रसन्न नहीं थी। ( )
- 4. गाय घोसी के साथ क्यों नहीं जाना चाहती थी?
- (क) गाय हीरासिंह और उसके परिवार से अलग नहीं होना चाहती थी। ( )
- (ख) गाय को भय था कि घोसी उसे स्नेह से नहीं पालेगा। ( )
- (ग) गाय को अपने गाँव के सभी लोगों की याद आ रही थी। ( )
- (घ) गाय बीमार थी और चल नहीं पा रही थी। ( )
सोचिए और लिखिए
- 1. हीरासिंह गाय को बेचने से क्यों डर रहा था?
- 2. सेठ हीरासिंह की गाय को देखकर क्यों प्रसन्न हुआ?
- 3. "तुमने मुझे धोखे में क्यों रखा?" सेठ ने हीरासिंह से ऐसा क्यों कहा?
- 4. सेठ के कुछ कहने से पहले ही हीरासिंह गाय को लेकर क्यों चल दिया?
सुंदरिया और हीरासिंह
- 1. कहानी में सुंदरिया की बहुत-सी विशेषताओं का पता चलता है। उन विशेषताओं को नीचे लिखिए। आपकी सुविधा के लिए एक उदाहरण दिया जा रहा है -
- वह बहुत आकर्षक है।
- .....................
- .....................
- .....................
- .....................
- 2. अब आप हीरासिंह की विशेषताओं को अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए।
समझ और अनुभव
- 1. क्या आपको लगता है कि पशु-पक्षी भी हमारी भावनाएँ समझते हैं? कोई अनुभव साझा कीजिए।
- 2. जवाहरसिंह सुंदरिया को मौसी कहकर क्यों संबोधित करता होगा?
- 3.हम देखते हैं कि नगरों में बड़े पशुओं (गाय, भैंस, ऊँट आदि) को पालतू बनाने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है। आपको इसके क्या कारण लगते हैं?
- 4. पशु-पक्षी मनुष्य की तरह बोल तो नहीं पाते परंतु वे भी आपस में अपनी बातें करते होंगे। क्या आप इस बात से सहमत हैं? अपने उत्तर के लिए उदाहरण भी दीजिए।
- 1.गाय का नाम 'सुंदरिया' किसने एवं क्यों रखा होगा?
- 2. हीरासिंह के घर से सुंदरिया की विदाई के दृश्य की कल्पना कीजिए।
- 3. सुंदरिया को वापस घर लेकर जाते हुए हीरासिंह को कैसा लग रहा होगा एवं क्यों?
अनुमान और कल्पना
भाषा की बात
- 1. नीचे दिए गए मुहावरों का प्रयोग कहानी में किया गया है। कहानी में इन्हें ढूंढ़िए और इनके अर्थ लिखकर अपनी लेखन-पुस्तिका में वाक्य बनाइए —
- लाज से गड़ जाना
- दूध देने में कामधेनु
- जी भर जाना
- एकटक देखना
- आँख लगना
- 2. नीचे कुछ वाक्य दिए गए हैं। वाक्यों में रेखांकित शब्द से मिलते-जुलते अर्थ वाले शब्द चुनकर वाक्य पुनः लिखिए -
- (क) सुंदरिया की सुंदरता से कई लोगों को जलन होती थी। (प्रसन्नता/ईर्ष्या)
- (ख) वहाँ की गायें अच्छी होती हैं। एक गाय का बंदोबस्त कर दो। (प्रबंध/संकेत)
- (ग) सुंदरिया मेरी रुसवाई क्यों कराती है? (प्रशंसा/अपमान)
- (घ) सुंदरिया को देखकर हीरासिंह विह्वल हो उठा। (भावुक/प्रसन्न)
- (ङ) आप मुझसे जितने महीने चाहें, कसकर चाकरी करवाएँ। (नौकरी/बागवानी)
- 3. कहानी में से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं। इन्हें ध्यानपूर्वक पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ आया? अपने विचार समूह में साझा कीजिए -
- (क) रुपए तो ले लिए लेकिन हीरासिंह का जी भरा जा रहा था।
- (ख) गाय की नौकरी पर मुझे लगा दीजिए। चाहे तनख्वाह कम कर दीजिए।
- (ग) गाय ने उसकी ओर देखा। जैसे पूछना चाहती थी- "क्या सचमुच ही इसके साथ चली जाऊँ?"
- (घ) फिर गाय के गले पर सिर रखकर बोला - "सुंदरिया, देख... मेरी ओछी मत करा। मैं दूर हूँ तो क्या! इसमें मुझे सुख है?"
- 4. रेखांकित शब्द किसके लिए प्रयोग किए गए हैं? पहचानकर लिखिए -
- (क) उसे एक सेठ के यहाँ चौकीदार की नौकरी मिल गई।
- हीरासिंह के लिए
- (ख) उसे देखकर लोगों को ईर्ष्या होती थी।
- (ग) वह कैसे बताए कि सुंदरिया उसके परिवार का अंग है।
- (घ) सचमुच वैसी सुंदर, स्वस्थ गाय उन्होंने अब तक न देखी थी। -
- (ङ) गाय उसके साथ जाना ही नहीं चाहती थी।
- 1. नीचे कुछ चित्र दिए गए हैं। इनको देखते हुए अपने समूह में चर्चा कर यह सुझाइए कि हम पशु-पक्षियों के लिए क्या-क्या कर सकते हैं। आप इनके अतिरिक्त भी कुछ और बिंदु जोड़ सकते हैं।
पाठ से आगे
- 2. आपके घर में दूध कहाँ से आता है? यह भी पता कीजिए कि किन-किन पशुओं का दूध पीने के लिए उपयोग किया जाता है।
- 3. किसी गौशाला अथवा दुग्ध उत्पादन केंद्र (डेयरी फार्म) का भ्रमण कर पता कीजिए कि पशुओं का लालन-पालन कैसे किया जाता है। आप इस गतिविधि में शिक्षकों एवं अभिभावकों की सहायता ले सकते हैं।
कल्पना की उड़ान
सेठ के घर से लौटकर जाते हुए हीरासिंह सुंदरिया को बहुत प्यार करता है, उसको सहलाता है एवं उससे बातें करता है। यदि सुंदरिया भी बोल सकती तो कल्पना कीजिए कि सुंदरिया और हीरासिंह के बीच क्या बातचीत होती ।
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नाटक-मंचन
आपने 'सुंदरिया' कहानी पढ़ी। इस कहानी को नाटक के रूप में बदलकर कक्षा में अपने समूह के साथ नाटक-मंचन कीजिए।
बूझो पहेली
राग सुरीला रंग से काली,
सबके मन को भाती।
बैठ पेड़ की डाली पर जो,
मीठे गीत सुनाती।
सबके मन को भाती।
बैठ पेड़ की डाली पर जो,
मीठे गीत सुनाती।
जल-थल दोनों में है रहता,
धीमी जिसकी चाल।
खतरा पाकर सिमट जाए झट,
बन जाता खुद ढाल।
धीमी जिसकी चाल।
खतरा पाकर सिमट जाए झट,
बन जाता खुद ढाल।
लकड़ी का एक ऐसा घर,
जो है जल में चलता।
सबको अपने साथ बिठाकर,
पार सभी को करता।
उत्तर-कोयल,कछुआ,नाव
जो है जल में चलता।
सबको अपने साथ बिठाकर,
पार सभी को करता।
पुस्तकालय एवं अन्य स्रोत
इस पाठ में दूध की मात्रा को 'सेर' द्वारा दर्शाया गया है जो मापन की एक प्राचीन भारतीय इकाई थी। इसी प्रकार वस्तुओं की मात्रा के मापन की और भी प्राचीन भारतीय इकाइयाँ प्रचलित थीं। आप पुस्तकालय से मापन से संबंधित पुस्तकें ढूँढ़कर मापन की अन्य प्राचीन भारतीय इकाइयों का पता लगाइए। इसके लिए आप अपने शिक्षक और अभिभावक की भी सहायता ले सकते हैं। कक्षा में सहपाठियों के साथ इसे साझा कीजिए।
भूल-भुलैया
जवाहरसिंह ने सुंदरिया के बारे में जानने के लिए अपने पिता हीरासिंह को पत्र लिखा है। महिला डाकिया उस पत्र को हीरासिंह तक पहुँचाना चाहती है। आपको इस पहेली को हल करते हुए उसे बाहर निकालना है ताकि वह हीरासिंह तक पहुँच सके।
- बाएँ से दाएँ का सूचक
- 1. हीरासिंह कहाँ रहता था?
- 3. जवाहरसिंह सुंदरिया को क्या कहा करता था?
- 4. सेठ के यहाँ हीरासिंह को कौन-सी नौकरी मिली?
- 7. दूध से क्या बनता है?
- 8. सुंदरिया ने स्वयं को क्या कहा?
- 9. सुंदरिया सेठ को दिखने में कैसी लगी?
- 10. हीरासिंह कैसा व्यक्ति था?
- ऊपर से नीचे का सूचक
- 2. गाय का नाम क्या था?
- 5. मापन की एक प्राचीन इकाई।
- 6. सुंदरिया को क्या कहा गया है?
- 11. 'दार' प्रत्यय से एक शब्द बनाइए।
- 12. 'सिपुर्द' का अर्थ क्या है?
हाथी और चींटी
आपने कक्षा 3 की पाठ्यपुस्तक 'वीणा' में चींटी और हाथी की छुपन-छुपाई का आनंद लिया होगा। आइए, अब उनके साथ कुश्ती देखने चलते हैं।
एक बार की बात है, चींटी रानी अपनी फटफटिया मोटर साइकिल पर बैठकर कुश्ती देखने जा रही थी। रास्ते में मिले, हाथी भाई। हाथी भाई ने हाथ दिखाया तो चींटी रुक गई और बोली, "क्या हाल है, हाथी भाई? क्यों रोका?" हाथी बोला, “मैं सोच रहा था कि मेरे जैसे पहलवान को छोड़कर तुम्हें अकेले कुश्ती देखने में आनंद नहीं आएगा।"
चींटी ने कहा, “ठीक है पहलवान भाई, पीछे बैठ जाइए।" हाथी के बैठते ही चींटी ने सरपट फटफटिया दौड़ा दी। न जाने कहाँ से कोई रोड़ा रास्ते में आ गया। फटफटिया पलट गई। हाथी के सिर पर बहुत चोट लगी पर चींटी को मामूली-सी खरोंच भर आई। सोचिए, चींटी को चोट क्यों नहीं आई?
उतर-चीटी ने हेलमेट पहन रखा था
चींटी बनें हाथी नहीं। ट्रैफिक नियमों का पालन करें। आप क्या-क्या कर सकते हैं
चलने के लिए सड़क के किनारे बनी पटरियों का उपयोग करें। यदि आपको सड़क पार करनी हो तो सावधानी बरतें। लाल बत्ती होने की प्रतीक्षा करें। जब लाल बत्ती जलती है, तब वाहनों को रुकना होता है। आप सड़क के दोनों ओर देखें तथा जेब्रा क्रॉसिंग के चिह्न पर चलकर सड़क पार करें। यदि आप अपने अभिभावकों के साथ हों तो उनका हाथ अवश्य पकड़ें। सड़क पार करते समय न तो बातचीत करें और न ही दौड़ें, वरना ध्यान भटक सकता है।
अब आप नीचे दिए गए सड़क संकेतों (रोड साइन) को पहचानिए और समझिए -
अब आप नीचे दिए गए सड़क संकेतों (रोड साइन) को पहचानिए और समझिए -