परिचय — सामाजिक विज्ञान क्यो


आइए पता लगाएँ
ऊपर दिए गए चित्र को देखिए | आपने क्या देखा?- झील में पानी कहाँ से आ रहा है?
- सड़क का निर्माण किसने एवं
क्यों किया?
- इन छोटे-छोटे घरों में रहने वाले लोग क्या-क्या गतिविधियाँ करते होंगे? उनका क्या
इतिहास रहा होगा? उनका क्या भविष्य है?
अब, मुखपृष्ठ पर दिए गए चित्र को देखिए, आपके मन में क्या-क्या सवाल आते हैं? उनको लिखिए |
इन दो चित्रों से संबंधित प्रश्नों के उत्तरों को जानने के लिए आप किस प्रकार प्रयास करेंगे?

विश्व-भर में, अधिकाधिक लोग यह सोच रहे हैं कि मानवता के समक्ष आने वाली समस्याओं को किस प्रकार हल करें? हमारा समाज किस प्रकार शांति एवं समरसता के साथ जीवन जीना सीखे? हम किस प्रकार इस सुंदर ग्रह पृथ्वी ( जिसे हम सभी साझा करते हैं ) की रक्षा न केवल अपने लिए अपितु इस पर रहने वाली सभी प्रजातियों के लिए करें |
यह मौलिक प्रश्न बहुत सरल है, परंतु इसके उत्तर उतने सरल नहीं हैं | यह सरल हो भी नहीं सकते क्यों कि मानव समाज अधिक विविध एवं जटिल है | यदि हम इन प्रश्नों के उत्तर खोजना एवं उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करना चाहते हैं, तो हमें विश्व को और विशेष रूप से मानव समाज को समझना होगा | यही सामाजिक विज्ञान का सार है |
आप सोच रहे होंगे कि सामाजिक विज्ञान, भौतिकी या रसायन विज्ञान की तरह कोई विज्ञान है, किंतु ऐसा नहीं है | यह विषय जहाँ तक संभव है, वैज्ञानिक तरीकों का उपयोग करता है(आप इस पाठ्यपुस्तक में कुछ उदाहरण देखेंगे), लेकिन इसका केंद्र मानव समाज है जो स्वयं में इतना विविधतापूर्ण है कि विज्ञान की तरह निर्धारित प्रक्रियाओं को अपनाने और निश्चित परिणामों को प्राप्त करने की संभावना को क्षीण कर देता है |
सामाजिक विज्ञान के कई उपविषय हैं, जैसे – भूगोल, इतिहास, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, मानव विज्ञान, पुरातत्व विज्ञान, मनोविज्ञान इत्यादि | आपको इन शब्दों से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है! इनमें से कुछ उपविषयों का अध्ययन आप माध्यमिक स्तर पर करेंगे, मध्य स्तर पर हमने इस तरह का वर्गीकरण नहीं किया है | इसकी जगह हमने पाँच प्रमुख विषयों का उपयोग किया है | आइए, इस पर एक दृष्टि डालते हैं |
विषय (क) — भारत एवं
विश्व : भूभाग एवं उनके निवासी
विषय (ख) — अतीत के चित्रपट
विषय (ग) — हमारी सांस्कृतिक विरासत एवं ज्ञान परंपराए
विषय (घ) — शासन और लोकतंत्र
विषय (ङ) — हमारे आस-पास का आर्थिक जीव
आपने देखा कि पिछले अनुच्छेद में कई प्रश्न हैं | यह ठीक उसी प्रकार के हैं, जैसा इन्हें होना चाहिए | सामाजिक विज्ञान भी सही प्रश्न पूछने की कला के विषय से संबंधित है | जब हम सही प्रश्न पूछते हैं, तभी हम सही उत्तरों की खोज कर सकते हैं | इस पुस्तक के प्रत्येक अध्याय की शुरुआत ‘महत्वपूर्ण प्रश्न’ से की गई है, जो उपरोक्त तथ्य की पुष्टि करता है |
भूगोल से संबंधित अध्यायों में शतरंज के खेल और कुछ प्राचीन तमिल कविताएँ आपको रुचिकर लगेंगी | सांस्कृतिक विरासत वाले अध्याय में साड़ी के उपयोग पर चर्चा की गई है | अर्थव्यवस्था केंद्रित अध्याय में सेवा की अवधारणा और त्योहारों का वर्णन किया किया गया है |ऐसा जान-बूझकर किया गया है | हम विभिन्न क्षेत्रों के समस्त पहलुओं को एक साथ लाने में विश्वास करते हैं (इसे बहुविषयकता कहा जाता है, जिसे आप बाद में पढ़ेंगे |) यह हमारे दृिष्टकोण को समृद्ध करता है | वास्तव में, जब जीवन अनगिनत तत्वों का मिश्रण करता है, तो हमें क्यों नहीं करना चाहिए?
अब तक यह स्पष्ट हो गया होगा कि सामाजिक विज्ञान वर्तमान को समझने के लिए एवं बेहतर भविष्य के निर्माण के लिए अतीत का निरंतर उपयोग करता है | यह अन्वेषणपूर्ण एवं रोमांचक कार्य है |
अध्याय 1
पृथ्वी पर स्थानों की स्थिति
" पृथ्वी अंतरिक्ष में स्थित है, जो जल, पृथ्वी, अगनी और वायु से बनी है और
यह गोलाकार है | यह सभी स्थलीय और जलीय प्राणियों से घिरी हुई है | "
—आर्यभट्ट (लगभग 500 सा.सं
.)


महत्वपूर्ण प्रश्न ?
- मानचित्र क्या है और हम इसका उपयोग कैसे करते हैं? इसके मुख्य घटक क्या हैं?
- निर्देशांक क्या हैं? पृथ्वी पर किसी स्थान को अंकित करने के लिए अक्षांश और देशांतर का उपयोग कैसे किया जा सकता है?
- देशांतर से स्थानीय समय और मानक समय कैसे
संबंधित हैं?
कल्पना कीजिए कि आप पहली बार किसी नगर की यात्रा कर रहे हैं | उस नगर में आप जिन स्थानों की यात्रा करना चाहते हैं, उनका पता कैसे लगाएँगे? आप सहायता के लिए किसी स्थानीय व्यक्ति से पूछ सकते हैं अथवा उस नगर के मानचित्र को देख सकते हैं | पिछली कक्षाओं में आपने मानचित्र के बारे में कुछ बातें सीखी थीं और इस अध्याय में हम उनका विस्तारपूर्वक अध्ययन करेंगे |
आइए, एक खेल खेलते हैं | नीचे दिए गए एक लघु नगर के मानचित्र का निरीक्षण
कीजिए (चित्र 1.1) | कल्पना कीजिए कि आप रेलवे स्टेशन पर एक रेलगाड़ी से अभी-अभी
उतरे हैं और मानचित्र पर अकिंत बैंक में जाना चाहते हैं | आप किस मार्ग से जाएँगे? क्या
कोई अन्य संभावित मार्ग भी हैं? क्या आप इसी मानचित्र में सार्वजानिक उद्यान, विद्यालय
और संग्रहालय का भी पता लगा सकते हैं? यदि आप बैंक से बाजार तक जाना चाहते हैं, तो
आप किस मार्ग को चुनेंगे? ऐसी परिस्थिति में ही एक मानचित्र उपयोग में आता है |

आइए पता लगाएँ
पृष्ठ 8 पर दिए गए चित्र 1.1 में —
- चिकित्सालय को अंकित कीजिए |
- नीले रंग से दिखाए गए क्षेत्र क्या दर्शा रहे हैं?
- विद्यालय, नगर पंचायत या सार्वजनिक उद्यान में से रेलवे स्टेशन से कौन-सा स्थान सबसे अधिक दूरी पर है?
मानचित्र और उसके घटक
एटलस (मानचित्रावली) मानचित्रों की एक पुस्तक या संग्रह है |
जैसा कि आप जानेंगे, मानचित्र अनेक प्रकार के होते हैं—
- भौतिक मानचित्र मुख्य रूप से प्राकृतिक आकृतियों, जैसे– पर्वतों, महासागरों और नदियों को दर्शाते हैं | (उदाहरण के लिए, पाठ्यपुस्तक में चित्र 5.2)
- राजनैतिक मानचित्र देशों या राज्यों, सीमाओं, नगरों आदि को दर्शाते हैं | (उदाहरण के लिए, सभी राज्यों, केंद्रशासित प्रदेशों और उनकी राजधानियों को दर्शाता भारत का एक मानचित्र)
- थिमैटिक मानचित्र विशिष्ट प्रकार की सूचना प्रदान करते हैं | (उदाहरण के लिए, पाठ्यपुस्तक में चित्र 6.3 और 8.1)
क्या आप कभी अचंभित हुए हैं कि एक वृहद क्षेत्र को कागज के एक छोटे टुकड़े पर कैसे प्रस्तुत किया जा सकता है? यह मानचित्र के स्केल की सहायता से किया जाता है | आइए, हम एक लघु नगर ( चित्र 1.1) के हमारे मानचित्र पर वापस जाते हैं | मानचित्र, जैसा कि यहाँ मुद्रित है, इसका प्रत्येक सेंटीमीटर धरातल पर एक निश्चित दूरी का प्रतिनिधित्व करता है | माना कि यह 500 मीटर है, तो हम कहेंगे कि स्केल 1 सेंटीमीटर = 500 मीटर है | अब इस पाठ्यपुस्तक के अध्याय 5 के चित्र 5.2 में भारत के मानचित्र को देखिए |
स्केल, नीचे बाएँ कोने में एक रूलर के द्वारा दर्शाई गई है जिसकी लंबाई के ऊपर ‘500’ और किनारे पर ‘कि.मी.’ लिखा हुआ है | सामान्यत: इसका अर्थ यह होता है कि जो रूलर मुद्रित मानचित्र में 2.5 से.मी. मापता है, वह भूमि पर 500 किलोमीटर को दर्शाता है |
इसलिए मानचित्र पर चिह्नित किन्हीं दो बिंदुओं के बीच की वास्तविक दूरी उस स्केल पर निर्भर है, जिसका मानचित्र उपयोग करता है |
आइए पता लगाएँ
- किसी विद्यालय के खेल-मैदान का एक साधारण मानचित्र बनाइए | मान लीजिए कि यह
40 मीटर लं
बा और 30 मीटर चौड़ा आयताकार क्षेत्र है | इसे अपने रूलर की सहायता से
1 सेंटीमीटर = 10 मीटर के स्केल पर सटीक ढँग से खींचिए |
- अब इस आयताकार क्षेत्र के विकर्ण को मापिए | आपके द्वारा की गई मापकितने सेंटीमीटर
की है? स्केल की सहायता से खेल-मैदान के विकर्ण की वास्तविक लं
बाई की मीटर में
गणना कीजिए |

आइए पता लगाएँ
लघु नगर के मानचित्र पर पुनः विचार कीजिए | नीचे दी गई सुची में सही और गलत कथनों की पहचान कीजिए—- बाजार, चिकित्सालय के उत्तर में है |
- संग्रहालय, बैंक के दक्षिण-पूर्व में है |
- रेलवे स्टेशन, चिकित्सालय के उत्तर-पश्चिम में है |
- झील, आवासीय भवन के उत्तर-पश्चिम में है |
प्रतीक चिन्ह मानचित्रों का एक और महत्वपूर्ण घटक है | हमारे मानचित्र में वास्तविक भवनों और कुछ अन्य अवयवों के लघु आरेख (ड्राइंग्स) हैं, लेकिन एक बड़े नगर या एक देश के मानचित्र पर इन सभी के चित्रण के लिए पर्याप्त स्थान नहीं होगा | इसकी जगह, इन आकृतियों के रेखांकन के लिए चिन्हों का उपयोग किया जाता है, उदाहरण के लिए, भवनों के विभिन्न प्रकारों (जैसे— रेलवे स्टेशन, विद्यालय, डाकघर), मार्गों, रेलवे लाइनों और नदी, ताल या वन के लिए प्रतीक चिन्ह | इस तरीके से मानचित्र पर उपलब्ध सीमित स्थान पर अनेक विवरण दर्शाए जा सकते हैं |
आइए पता लगाएँ
अपने घर, विद्यालय और कुछ अन्य महत्वपूर्ण भू-चिह्नों सहित अपने स्थान या अपने गाँव का एक मानचित्र बनाइए | चतुर्दिश को दर्शाइए और दर्शाई गई कुछ महत्वपूर्ण आकृतियों को अकिंत करने के लिए कुछ चिह्नों का उपयोग कीजिए जो चित्र 1.2 में दर्शाए गए हैं |रेलवे लाइन— बड़ी लाइन, छोटी लाइन, रेलवे स्टेशन
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सड़कें— पक्की, कच्ची
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सीमा — अंतरराष्ट्रीय, राज्य, जिला
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नदी, कुआँ, तालाब, नहर, सेतु
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मंदिर, गिरजाघर, मस्जिद, छत्री
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डाकघर, डाक एवं टेलीग्राफ कार्यालय, पुलिस स्टेशन
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बस्तियाँ, कब्रिस्तान
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वृक्ष , घास
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चित्र 1.2—मानचित्रों में सामान्यतः उपयोग किए जाने वाले प्रतीक चिन्ह
पृथ्वी का मानचित्रण
पृथ्वी का मानचित्रण कुछ अधिक कठिन है क्यों कि हमारे ग्रह का आकार चपटा नहीं है |
इसकी आकृति लगभग गोलाकार है (हम ‘लगभग’ इसलिए कहते हैं क्यों कि यह पूर्ण गोलाकार नहीं है, अपितु ध्रुवों पर थोड़ी चपटी है | हम इसे व्यावहारिक दृष्टि से गोलाकार
मानेंगे) | कागज के एक समतल पृष्ठ पर एक गोलाकार वस्तु को यथावत चित्रित करना
संभव नहीं है | ऐसा क्यों है, इसे समझने के लिए एक संतरे को इस प्रकार छीलिए कि
आपके पास उसके छिलकों के केवल तीन अथवा चार टुकड़े हों | इसके बाद, एक मेज
पर उन्हें चपटा करने का प्रयास कीजिए | आप पाएँगे कि किनारों को तोड़े बिना आप यह
नहीं कर सकते |

अब एक ग्लोब पर विचार कीजिए, जो एक गोल आकृति जैसा है और उस पर एक मानचित्र बनाया गया है | यह पृथ्वी, चंद्रमा, मंगल ग्रह, तारों और तारा-मंडल आदि का भी एक मानचित्र हो सकता है | इस पृष्ठ पर दिए गए प्रथम चित्र पर दर्शाई गई वह भौतिक वस्तु, जो गोलाकार है, सामान्यतः धातु, प्लास्टिक या कार्डबोर्ड से बनी होती है |;
हम यहाँ पृथ्वी के भूगोल का प्रतिनिधित्व करने वाले ग्लोब का अध्ययन करेंगे | चूँकि ग्लोब और पृथ्वी का आकार एक समान (गोलाकार) होता है, इसलिए एक ग्लोब, किसी समतल मानचित्र की तुलना में पृथ्वी के भूगोल का बेहतर प्रतिनिधित्व करता है |
आइए, इसकी कुछ विशेषताओं का पता करें |
(क) निर्देशां
क को समझना

अब शतरंज के पटल पर विचार करते हैं | आगे बढ़ने वाले खिलाड़ी की चालों को दर्ज करने के लिए मुख्य खानों पर अक्षर (‘क’ से ‘ज’ तक) और दोनों ओर के बीच अंक (1 से 8 तक) लगाए जाते हैं (चित्र देखिए) | इस साधारण प्रणाली से खिलाड़ी प्रत्येक वर्ग को अंकित कर पाते हैं और प्रत्येक चाल चिह्नित करते हैं | यहाँ पर सफेद पक्ष की रानी के सामने वाले प्यादे को दो चाल आगे बढ़ाकर (एक बहुत सामान्य चाल) खेल का आरंभ किया गया है | अत: प्यादा ‘घ’ 2 से ‘घ’ 4 की ओर आगे बढ़ा है |
आइए पता लगाएँ
यदि आपको काले पक्ष की ओर से खेलना हो और उसी विधि से प्रत्युत्तर देना हो, तो इन्हीं
नियमों का उपयोग करते हुए अपनी चाल लिखिए |इन दो उदाहरणों में प्रयुक्त प्रणाली को निर्देशांक प्रणाली कहा जा सकता है | इनके दो निर्देशांकों की सहायता से स्टेशनरी की दुकान के साथ-साथ शतरंज के पटल पर वर्गाकृति को भी ठीक-ठीक निर्धारित किया जा सकता है |
मानचित्र पर किसी स्थान की स्थिति के निर्धारण के लिए निर्देशांकों की इसी प्रणाली का प्रयोग किया जाता है | आइए, देखें यह प्रणाली कैसे काम करती है |
(ख) अक्षांश
आइए, ग्लोब को पुन: देखते हैं | इस पर उत्तर ध्रुव और दक्षिण ध्रुव की पहचान करना सरल है | ग्लोब को घुमाइए | जब यह घुमाया जाता है तो ऊपरी और निचले स्तर पर स्थित बिंदु दो ध्रुव हैं | इनके मध्य में भूमध्य रेखा (विषुवत वृत्त) होती है | उस वृत्त को पहचानिए जो इसे चिह्नित करता है (चित्र 1.3) |
कल्पना कीजिए कि आप भूमध्य रेखा पर खड़े हैं और दोनों ध्रुवों में से किसी एक ध्रुव की ओर यात्रा कर रहे हैं | ऐसा करते समय भूमध्य रेखा से आपकी दूरी बढ़ती जाएगी |
अक्षांश, भूमध्य रेखा से इसी दूरी को मापता है | आप इस यात्रा के किसी भी बिंदु पर
एक काल्पनिक रेखा खींच सकते हैं जो भूमध्य रेखा के समानांतर पूर्व से पश्चिम की ओर
जाती है | इस प्रकार की रेखा को अक्षांश (समानांतर) कहा जाता है और यह पृथ्वी चारों ओर एक वृत्त बनाती है | पुन: ग्लोब पर यह सुनिश्चित करना सरल है कि सबसे बड़ा वृत्त, विषुवत वृत्त है, जबकि हम जैसे ही उत्तर की ओर या दक्षिण की ओर आगे बढ़ते हैं
तो अक्षांश द्वारा अंकित किए गए वृत्त छोटे होते जाते हैं (चित्र 1.3) |
अक्षांशों को अंशों (डिग्री) में व्यक्त किया जाता है | परंपरागत रूप से विषुवत वृत्त अक्षांश 0° या शुन्य अंश है, जबकि दो ध्रुवों के अक्षांश क्रमशः 90 अंश उत्तर और 90 अंश दक्षिण है | इसे 90° उ० और 90° द० के रूप में लिखा जाता है |
अक्षांश और जलवायु के बीच एक संबंध है | भूमध्य रेखा के चारों ओर जलवायु
सामान्यतः गरम (इसे उष्ण भी कहा जाता है) होती है | जैसे ही आप भूमध्य रेखा से दूर दो ध्रुवों में से किसी एक की ओर यात्रा करते हैं, तब अक्षांश की डिग्री बढ़ती जाती है और
जलवायु शीतोष्ण हो जाती है | उत्तर या दक्षिण ध्रुव के निकट जलवायु शीत ( ठंडी ) होती
है | आप विज्ञान में पढ़ेंगे कि एेसा क्यों होता है और यह भी कि हम एक वर्ष की समयावधि
में विभिन्न ऋतुओं का अनुभव क्यों करते हैं?

चित्र 1.3— यह ग्लोब अक्षांशों के समानांतरों और देशांतरों के याम्योत्तरों,
दोनों को दर्शाता है |
(ग) देशांतर
अब कल्पना कीजिए कि आप संभवत: सर्वाधिक छोटी रेखा पर उत्तर ध्रुव से दक्षिण ध्रुव की ओर यात्रा कर रहे हैं | ग्लोब का अवलोकन कीजिए | आप पाएँगे कि यूरोप और
अफ्रीका के मार्ग से जाने की जगह आप एशिया के मार्ग से भी जा सकते हैं और दूरी एक समान होगी | इन रेखाओ को देशांतरीय याम्योत्तर (मेरिडियन ऑफ लाँगिट्यूड)
(चित्र 1.3) कहा जाता है | ये अर्धवृत्त हैं, जो एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव तक जाते हैं |
आप विज्ञान में यह भी सीखेंगे कि पृथ्वी अपनी धूरी पर घूमती है | इसे सरलता से
समझने के लिए एक टेबल लैंप को अपने ग्लोब से थोड़ा दूर रखिए और कल्पना कीजिए
कि यह सूर्य है, जो पृथ्वी को प्रकाशित कर रहा है | ग्लोब को पूर्व की ओर घुमाने पर हम
देख सकते हैं कि पृथ्वी पर कुछ स्थानों पर प्रात: काल है, अन्य स्थानों पर मध्याह्न, सांय या रात्रि है | जब एक देश में प्रात: नाश्ते का समय होता है, अन्य देश में मध्याह्न भोजन
का समय होता है और किसी तीसरे देश में लोग रात्रि भोजन कर गहरी नींद में सो रहे होते
हैं | इसी कारण एक स्थान के देशांतर के माप द्वारा हम उस स्थान के समय को भी मापेंगे |
आइए, देखें कि यह कैसे होता है |
देशांतर को मापने के लिए हमारे द्वारा प्रमुख याम्योत्तर (पृष्ठ 14 पर चित्र 1.3) कहे
जाने वाले संदर्भ बिंदु को परिभाषित करना आवश्यक है | इसे ग्रिनिच याम्योत्तर भी कहते
हैं क्योंकि वर्ष 1884 में कुछ देशों ने तय किया कि इंगलैंड में लंदन के एक क्षेत्र ग्रिनिच से गुजरने वाली याम्योत्तर, प्रमुख याम्योत्तर के लिए अंतरराष्ट्रीय मानक मानी जाएगी | इसे 0°
देशांतर के रूप में अकिंत किया जाता है |
यदि आप ध्रुवों में से किसी एक की ओर यात्रा करते हैं तो जिस प्रकार अक्षांश भूमध्य रेखा से दूरी का एक माप है, उसी प्रकार यदि आप भूमध्य रेखा के साथ-साथ यात्रा करते हैं
तो देशांतर प्रमुख याम्योत्तर से दूरी का एक माप है | देशांतर को भी डिग्री में मापा जाता है | पश्चिम हो या पूर्व, इसका मान 0° से 180° तक बढ़ता है तथा इसमें पश्चिम के लिए ‘प०’
तथा पूर्व के लिए ‘पू०’ वर्णों को जोड़ा जाता है | उदाहरणतया, पूर्णांक का उपयोग करते हुए न्यूयॉर्क का देशांतर 74°प० है, जबकि दिल्ली का 77°पू० और टोक्यो का 140°पू० है |
ध्यान रखें
जैसा कि आप देशांतर के याम्योत्तर को ग्लोब पर देख सकते हैं, 180° प० और 180° पू० एक ही देशांतर हैं | इसलिए इस देशांतर को प० या पू० न लिखकर 180° ही लिखा जाता है |
अक्षांश और देशांतर मिलकर एक स्थान के दो निर्देशांक होते हैं | इनके साथ आप अब पृथ्वी पर किसी स्थान का पता लगाने में सक्षम हैं | इस प्रकार जब यह कहा जाता है कि “दिल्ली 29° उ० अक्षांश और 77°पू० देशांतर पर स्थित है”, तो इसे आप भलीभाँति समझ सकते हैं | यद्यपि यह डिग्री आनुमानिक रूप से पूर्ण है, किंतु सटीक नहीं है |
पृष्ठ 14 पर चित्र 1.3 में नीली रेखाएँ ग्लोब पर अक्षांश और देशांतर के याम्योत्तर
को दर्शाती हैं | यह सभी रेखाएँ मिलकर ग्लोब पर एक ग्रिड बनाती है जिन्हें ग्रिड रेखाएँ
भी कहा जाता है |
आइए, पता लगाएँ
यदि आपकी कक्षा में ग्लोब या मानचित्रावली में स्पष्ट रूप से अक्षांश और देशांतर अंकित हैं,
तो (1) मुंबई (2) कोलकाता (3) सिंगापुर और (4) पेरिस के अक्षांश और देशांतर के लगभग
मान को लिखने का प्रयास कीजिए |

ध्यान रखें
वास्तव में ग्रिनिच याम्योत्तर, पहली ज्ञात प्रमुख याम्योत्तर रेखा नहीं है | अतीत में अन्य प्रकार के याम्योत्तर भी थे | वास्तव में यूरोप से अनेक शताब्दियों पूर्व भारत की स्वयं की एक प्रमुख याम्योत्तर थी (चित्र 1.5), जिसे मध्य रेखा कहा जाता था और यह उज्जयिनी (वर्तमान उज्जैन) के मध्य से गजुरती थी | उज्जैन अनेक शताब्दियों तक खगोल विद्या का एक प्रतिष्ठित केंद्र रहा है | लगभग 1500 वर्ष पूर्व प्रसिद्ध खगोलविद वराहमिहिर भी यहाँ रहे और अपना कार्य किया |
भारतीय खगोलविद शुन्य और प्रमुख याम्योत्तर सहित अक्षांश और देशांतर से परिचित थे | उज्जयिनी याम्योत्तर सभी भारतीय खगोलीय ग्रंथों में गणनाओं के लिए एक प्रमुख संदर्भ बन गया था |
इस मानचित्र में उज्जयिनी याम्योत्तर के निकट के कुछ प्राचीन शहरों को दर्शाया गया है |
कुछ शहर इसके अत्यधिक निकट हैं, जबकि अन्य कुछ दूरी पर हैं | ऐसा इसलिए है कि देशांतर
को मापने के लिए सही-सही समय रखना आवश्यक है और यह वर्तमान की तुलना में तब उतना
सटीक नहीं था |


समय क्षेत्र (टाइम जोन) को समझना

आइए, पता लगाएँ
एक दिन ढलती दोपहर में दो मित्र, एक पोरबंदर (गजुरात) में और दूसरा तिनसुकिया (असम) में बैठे हुए फोन पर बातचीत कर रहे हैं | तिनसुकिया वाला मित्र कहता है कि असम में सूर्यास्त हो गया है और अब अँधेरा, जबकि पोरबंदर वाला मित्र चकित होकर कहता है— “लेकिन यहाँ तो अभी भी दिन का प्रकाश है!” बताइए कि ऐसा क्यों है? और कक्षा की एक गतिविधि के रूप में इन दो शहरों के बीच स्थानीय समय के अंतर की गणना कीजिए (संकेत – पोरबंदर और तिनसुकिया के बीच देशांतर में 30° के अतंर पर विचार कीजिए और इसके बाद आप उचित मान प्राप्त कर सकते हैं) | इस विधि का पृथ्वी पर किसी भी स्थान के स्थानीय समय की गणना करने में उपयोग
किया जा सकता है | लेकिन यह विधि किसी देश के अंदर अनेक स्थानीय समयों के
उपयोग के संदर्भ में उचित नहीं होगी | इसी कारण अधिकतर देश उनके मध्य से गुजरने
वाले याम्योत्तर पर आधारित एक मानक समय को अपनाते हैं | भारतीय मानक समय
(इडिंयन स्टैंडर्डटाइम या आई.एस.टी.) ग्रिनिच (जिसे ग्रिनिच मीन टाइम या जी.एम.टी.
भी कहा जाता है) पर स्थानीय समय से 5 घंटे 30 मिनट आगे है |
आइए, पता लगाएँ
गुजरात और असम में बैठे दो मित्र पुन: चर्चा करते हैं | इस उदाहरण का उपयोग स्थानीय समय और मानक समय के अंतर को स्पष्ट करने के लिए कीजिए |यह सभी मानक समय, समय क्षेत्र में गठित किए गए हैं, जो ग्राफ में 15° के क्षेत्र (चित्र
1.7) का व्यापक रूप से पालन करते हैं | यदि पृष्ठ 21 पर दिए गए विश्व मानचित्र (चित्र
1.8) पर विचार करें तो हम देख सकते हैं कि समय क्षेत्र को विभाजित करने वाली रेखाएँ पूर्णतया सीधी नहीं होती हैं | ऐसा इसलिए है कि इन्हें अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं
का पालन करते
हुए प्रत्येक देश के मानक समय का ध्यान रखना पड़ता है | मानचित्र में कुछ देशों के भीतर
लिखित संख्याओं को उनका मानक समय प्राप्त करने के लिए जी.एम.टी. में जोड़ें (यदि
उनका एक धनात्मक चिन्ह है) अथवा घटाएँ (यदि उनका ॠणात्मक चिन्ह है) |

ध्यान रखें
इस स्पष्टीकरण से यह प्रतीत होता है कि प्रत्येक देश का एक मानक समय है | यह हर एक देश में एक जैसा नहीं होता | रूस, कनाडा या संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे देश एकल समय क्षेत्र की दृष्टि से अत्यधिक विशाल हैं | संयुक्त राज्य अमेरिका में 6 समय क्षेत्र और रूस में 11 समय क्षेत्र हैं— जिसका अर्थ यह है कि पूर्व से पश्चिम की ओर रूस में यात्रा करने के लिए स्थानीय समय के साथ समन्वय के लिए आपको अपनी घड़ी को 10 बार पुनर्समायोजित करना पड़ेगा | इसी प्रकार, चित्र 1.9 में भारत पर केंद्रित ग्लोब कुछ देशों के जी.एम.टी. के सं
बं
ध में
मानक समय दर्शाता है |
ग्रिनिच पर स्थिर मख्यु याम्योत्तर, जिसके विपरीत की रेखा लगभग 180° देशां
तर पर
है, उसे अं
तर्राष्ट्रीय तिथि रेखा कहा जाता है |
जैसा कि आप मानचित्र में देख सकते हैं, +12 और –12 समय क्षेत्र इस रेखा पर
एक-दूसरे को छूते हैं | यदि आप इसे समुद्री जहाज या विमान से पार करते हैं, तो आपके
द्वारा अपनी घड़ी की तिथि में परिवर्तन करना आवश्यक है | यदि आप पूर्व की ओर से
यात्रा करते हुए इसे पार करते हैं, तो आप एक दिन (मान लीजिए, सोमवार से रविवार) घटाएँगे | यदि आप पश्चिम की ओर से इसे पार करते हैं, तो आप एक दिन (रविवार से
सोमवार) जोड़ेंगे | हमने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा लगभग 180° के देशांतर पर
है, लेकिन यह कुछ देशों में एक ही दिन का विभाजन होने से बचने के लिए टेढ़ी-मेढ़ी
होकर गुजरती है |

आगे बढ़ने से पहले…
मानचित्र पृथ्वी के क्षेत्र, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, को दर्शाने के लिए एक
अत्यधिक उपयोगी साधन है | मानचित्रों के मुख्य घटक दूरी, दिशा और प्रतीक चिन्ह हैं |पृथ्वी के प्रत्येक स्थान की एक स्थिति है जिसको अक्षांशों और देशांतरों के एक
ग्रिड— पूर्व से पश्चिम की ओर जाने वाली (भूमध्य रेखा के समानांतर) और उत्तर
से दक्षिण की ओर जाने वाली (एक ध्रुव से दूसरे ध्रुव तक) काल्पनिक रेखाओं की सहायता से सही-सही परिभाषित किया जा सकता है |
देशांतर से समय निर्धारित किया जाता है और समय क्षेत्र को भी परिभाषित किया
जाता है |
अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा मुख्य याम्योत्तर के विपरीत लगभग 180° के देशांतर पर
अवस्थित है | अंतर्राष्ट्रीय तिथि रेखा को पार करने पर तिथि में एक दिन का
परिवर्तन होता है |
प्रश्न, क्रियाकलाप और परियोजनाए
- इस पाठ्यपुस्तक के पृष्ठ 10 और अध्याय 5 में चित्र 5.2 के संदर्भ में, 2.5 से.मी. = 500 कि.मी. का पैमाना लेते हुए, नर्मदा नदी के मुहाने से गंगा नदी के मुहाने तक की वास्तविक दूरी की गणना कीजिए (संकेत – मानचित्र पर अपनी माप को एक सरल संख्या में पूर्णांकित कीजिए) |
- जब लंदन में दोपहर 12 बजे का समय होता है, तो उसी समय भारत में सायं के 5:30 बजते हैं, क्यों?
- हमें मानचित्र में प्रतीक चिह्नों और रंगों की आवश्यकता क्यों होती है?
- आपके घर या विद्यालय की आठ दिशाओं मे क्या-क्या स्थित है? पता लगाइए |
- स्थानीय समय और मानक समय के बीच क्या अंतर है? समूहों में चर्चा कीजिए और फिर प्रत्येक समूह 100– 150 शब्दों तक का एक उत्तर लिखे | उत्तरों की तुलना कीजिए |
- दिल्ली और बेंगलूरु के अक्षांश क्रमशः 29° उ० और 13° उ० हैं और उनका देशांतर लगभग 77°पू० एक ही है | दोनों नगरों के बीच स्थानीय समय में कितना अतर होगा?
- निम्नलिखित कथनों पर सही या गलत का चिन्ह लगाइए और इसे एक या दो
वाक्यों में समझाइए |
- अक्षांशों के सभी समानांतरों की लंबाई समान होती है |
- देशांतर के एक याम्योत्तर की लंबाई भूमध्य रेखा की आधी होती है |
- दक्षिण ध्रुव का अक्षांश 90° द० है |
- असम में स्थानीय समय और आई.एस.टी. (भारतीय मानक समय) एक ही है |
- समय क्षेत्र को पृथक करने वाली रेखाएँ देशांतर के याम्योत्तर के समान
होती हैं |
- भूमध्य रेखा एक अक्षांश वृत्त भी है |
- नीचे दी गई शब्द पहेली को हल कीजिए | (ध्यान दें– इस पहेली को
हल करने के लिए अंग्रेजी भाषा के शब्दों का उपयोग कीजिए) |
पृथ्वी पर स्थानों का पता लगाना

| बाएँ से दाए | ऊपर से नीचे |
|---|---|
| 1. मानचित्र में एक वृहद क्षेत्र को लघु
रूप में दिखाना 3. एक सुविधाजनक गोलाकार 5. सबसे लंबी समानांतर अक्षांश रेखा 7. वह स्थान जहाँ से प्रमुख याम्योत्तर गुजरती है | 9. मार्ग को खोजने का सरल साधन 11. भूमध्य रेखा से दूरी का एक माप |
2. प्रमुख याम्योत्तर से दूरी का एक माप 4. ये दोनों मिलकर एक स्थान का पता लगाने में सहायक होते हैं | 6. जो अक्षांश और देशांतर मिलकर बनाते हैं | 8. वह समय, जिसका हम भारत में अनुसरण करते हैं | 10. विश्व के शीर्षपर 12. एक रेखा के लिए शब्द संक्षेप, जिसके आर-पार दिन और तिथि में परिवर्तन होता है | |