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अध्याय 3

स्थलरूप एवं जीवन

मनुष्यों के भार से मुक्त; अनेक प्रकार की ऊँचाइयों, ढलानों ‍तथा विशाल
सम‍तल भूमि से ‍युक्त; अनेक प्रकार की शक्तियों से संपन्न पेड़-पौधों को
आधार प्रदान करती हुई, हम सभी के लिए विस्तार को प्राप्त हो ‍तथा अपनी
संपन्न‍ता को प्रदर्शित करे | पृथ्वी मेरी मा‍ता है ‍तथा मैं उसकी सं‍तान |
— अथर्ववेद, ‘भूमि सूक्त’ (पृथ्वी के लिए स्त्रोत्र)
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महत्वपूर्ण प्रश्न

  1. स्थलरूपों के प्रमुख प्रकार कौन-से हैं और जीवन तथा संस्कृति के लिए इनका क्या महत्व है?
  2. प्रत्येक स्थलरूप के साथ संबंधित जीवन की क्या चुनौतियाँ एवं अवसर हैं?

परिचय

अन्य स्तनधारी जीवों के समान, मानव भी पृथ्वी पर निवास करता है | जैसा कि आपने देखा है, भूमि के अनेक रूप और विशेषताएँ हैं | एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में इसका स्वरूप बहुत परिवर्तित हो जाता है | मान लीजिए कि आप झारखंड के छोटा नागपुर क्षेत्र से सड़क द्वारा यात्रा कर रहे हैं और उत्तर प्रदेश के प्रयागराज पहुँचते हैं और फिर उत्तराखंड मे अल्मोड़ा तक जाते हैं | इस रास्ते में आप अलग-अलग दृश्यभूमि (लैंडस्केप) को देखेंगे | वास्तव में, आपको तीन प्रकार के स्थलरूप (लैंडफॉर्म्स) दिखाई देंगे, जिनके बारे में हम आगे चलकर अन्वेषण करेंगे |

आइए पता लगाएँ

  • कक्षा की गतिविधि के रूप में चार अथवा पाँच विद्यार्थियों के समूह बनाइए और विद्यालय के आस-पास के क्षेत्रों का अवलोकन कीजिए | आपको किस प्रकार की दृश्यभूमि दिखाई देती है? क्या कुछ किलोमीटर की दूरी पर दृश्यभूमि में कोई परिवर्तन दिखाई देता है? क्या लगभग 50 किलोमीटर के भीतर परिदृश्य में बदलाव होगा? अन्य समूहों द्वारा दी गई जानकारी के साथ इनकी तुलना कीजिए |
  • इन्हीं समूहों के साथ भारत के किसी भी ऐसे क्षेत्र की यात्रा के बारे में चर्चा कीजिए, जहाँ वे जा चुके हैं | उन क्षेत्रों में दिखाई देने वाली विभिन्न प्रकार की दृश्यभूमियों की सूची बनाइए | अन्य समूहों द्वारा दी गई जानकारी के साथ इनकी तुलना कीजिए |

स्थलरूप, पृथ्वी की सतह का एक भौतिक स्वरूप है | स्थलरूप लाखों वर्षों में आकार लेते हैं और पर्यावरण तथा जीवन के साथ इनका महत्वपूर्ण संबंध है | इन्हें व्यापक रूप से तीन श्रेणियों में बाँटा जा सकता है—पर्वत, पठार और मैदान (चित्र 3.1) |

इन स्थलरूपों में विभि‍न्न प्रकार की जलवायु और अलग-अलग प्रकार के पेड़-पौधे तथा जीव-जंतु पाए जाते हैं | मानव ने सभी स्थलरूपों के अनुसार स्वयं को ढाला है, किंतु विभिन्न प्रकार के स्थलरूपों पर रहने वाले लोगों की संख्या विश्व-भर में भिन्न-भिन्न होती है |

पर्वत

पर्वत वे स्थलरूप हैं जो आस-पास की भूमि से कुछ अधिक ऊँचे होते हैं | इन्हें चौड़े आधार, खड़ी ढलान (चढ़ाई) और सँकरे शिखर (चोटियों) के रूप में पहचाना जा सकता है | कुछ पर्वत अपनी अधिक ऊँचाई के कारण हिम से ढँके होते हैं | ग्रीष्म ॠतु में कम तुंगता (एल्टीट्यूड) पर हिम पिघल जाती है और जल में बदलने के बाद नदियों मे

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चित्र 3.1—इस आरेख में तीन स्थलरूप दिए गए हैं—पृष्ठ भूमि में पर्वत (इनमें से दो को हिमाच्छादित दिखाया गया है) बार्इं ओर एक पठार है और आगे एक मैदान जहाँ पर्वतों से आती हुई नदी दिखाई गई है |

पहुँचती है | बहुत अधिक ऊँचाइयों (तुंगता) पर हिम कभी नहीं पिघलती है और ये पर्वत स्थायी रूप से हिम से ढँके होते हैं |

कम ऊँचाई वाले अन्य ऊँचे स्थान, जहाँ कम खड़ी चढ़ाइयाँ और गोल आकार के शीर्ष होते हैं, उन्हें पहाड़ी (छोटे पहाड़ या हिल) कहते हैं |

आइए विचार करें

हिम क्या है? यदि आप हिमालयी क्षेत्र (जैसे– कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश आदि) में नहीं रहते हैं, तो संभव है कि आपने हिम नहीं देखी होगी! शेष भारत में अधिकांश वर्षण, वर्षा और ओले के रूप में ही होता है | बहुत ऊँचे स्थानों पर यदि काफी ठंडक है, तो वहाँ हिम गिरेगी और वहाँ पर हिम का एक नर्म और सुंदर आवरण बन जाएगा | हिम और ओले का गिरना वास्तव में जल का ठोस रूप में गिरना है |

वर्षण वायुमंडल से भूमि पर किसी भी रूप में जल का गिरना— वर्षा, हिमपात और ओले गिरना, वर्षण के सामान्य रूप हैं |

तुंगता (एल्टीट्यूड) समुद्र तल से किसी वस्तु/लक्ष्य वस्तु की ऊँचाई | उदाहरणार्थ – पर्वत की ऊँचाई, एक उड़ती हुई चिड़िया अथवा उड़ते हुए वायुयान की ऊँचाई, एक उपग्रह की ऊँचाई |

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चित्र 3.2— विश्व के छह पर्वतों के चित्र

विश्व के अधिकांश पर्वतों को पर्वत सृन्खलाओं के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जैसे– एशिया में हिमालय, यूरोप मे आल्प्स तथा दक्षिणी अमेरिका में एडीज | इनमें से कुछ सृन्खलाएँ हजारों किलोमीटर तक फैली हुई हैं |

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चित्र 3.3— विश्व के छह पर्वतों की सापेक्ष ऊँचाई दर्शाने वाला एक रेखाचित्र

चित्र 3.2 में विश्व के छह पर्वत दिखाए गए हैं | चित्र 3.3 इन्हें, ऊपर से नीचे तक उनकी सापेक्षिक ऊँचाइयों का दृश्य प्रभाव देने के लिए एक साथ प्रस्तुत करता है | माउंट एवरेस्ट (नेपाल तथा तिब्बत के बीच) और कंचनजूंगा (भारत के सिक्किम राज्य और नेपाल के बीच) हिमालय पर्वत सृंखला की दो सबसे ऊँची चोटियाँ (शिखर) हैं | एंडीज पर्वत सृंखला (दक्षिणी अमेरिका) की सबसे ऊँची चोटी माउंट अकोंकागुआ है | पूर्वी अफ्रीका में माउंट किलि‍मंजारो एक पृथक पर्वत है, जो किसी सृंखला से संबंधित नहीं है | पश्चिमी यूरोप में मोंट ब्लांक आल्प्स का सबसे ऊँचा पर्वत है | अनाईमुडी (केरल में इसे ‘अनाई शिखर’ भी कहते हैं) दक्षिण भारत का सबसे ऊँचा पर्वत है |

हिमालय जैसे ऊँचे और नुकीली चोटियों वाले पर्वत अपेक्षाकृत नवीन हैं, जिसका अर्थ है कि पृथ्वी के इतिहास में ये हाल ही में निर्मित (युवा) पर्वत हैं— किंतु फिर भी इन्हें बने हुए लाखों वर्ष हो चुके हैं! कुछ छोटे और अधिक गोलाकार पर्वत और पहाड़ियाँ जैसे अरावली सृंखला, काफी पुरानी है और अपरदन के कारण ये गोल आकार की हो गई हैं | जैसा कि हिमालय के साथ हुआ, उन्नयन और अपरदन आज भी चल रहा है (आप इन प्रक्रियाओं और उनके कारणों के बारे में विज्ञान में और अधि‍क पढ़ेंगे; यहाँ इतना ही कहा जा सकता है कि विश्व के कुछ पर्वतों, जैसे– हिमालय की ऊँचाई आज भी बढ़ रही है) |

पर्वतीय परिवेश

पर्वतों की ढलानों पर प्राय: एक प्रकार का वन होता है जिसे पर्वतीय वन कहते हैं और यहाँ शंकुधारी वक्षृ जैसे पाइन (चीड़), फर, स्प्रूस, देवदार आदि सामान्य रूप से पाए जाते हैं | इन पेड़ों की ऊँचाई अधिक होती है और ये शंकु के आकार के होते हैं तथा इनकी पत्तियाँ पतली, नोंकदार होती हैं | अधिक ऊँचाई पर पेड़ों की जगह घास, मॉस (काई) और लाइकेन उग जाते हैं |

पर्वतीय वन पर्वतीय क्षेत्र में उगने वाले वनों का एक प्रकार |

मॉस   फूलों और वास्तविक जड़ों से रहित छोटा हरा पौधा या वनस्पति, जो बहुधा मखमली आवरण की तरह फैलता है |

लाइकेन पौधे के समान जीव, जो सामान्यत: चट्टानों, दीवारों या पेड़ों से चिपके हुए होते हैं |

कम से कम 1,500 वर्ष पूर्व, प्राचीन भारत के महान कवि कालिदास के काव्य से यहाँ दो श्लोक दिए गए हैं | उनका काव्यग्रंथ ‘कुमारसंभव’ हिमालय की स्तुति से आरंभ होता है (यहाँ उन संस्कृत श्लोकों का सरल हिदी अनुवाद दिया गया है |)

भारत के उत्तरी भाग में देवता सदृश पूजनीय हिमालय नाम का पर्वतों का राजा है, जो पश्चिमी से लेकर पूर्वी समुद्र तक फैला हुआ है | देखकर ऐसा लगता है कि मानो व‍ह पृथ्वी को नापने का मापदंड है |

गंगा के झरनों की फुहारों से युक्त, देवदार के वृक्षों को हिलाने और मोर पंखों को फरफराने वाली शीतल, मंद और सुगंधित वायु से पर्वतवासी जो मृगों की खोज में हिमालय में घूमते रहते हैं, अपनी थकान मिटाते हैं |

कक्षा में इन श्लोकों तथा निम्नलिखित प्रश्नों पर चर्चा कीजिए—

  • ‘पश्चिमी से पूर्वी समुद्र तक’ से क्या तात्पर्य है? चित्र 5.2 में क्या आप इनकी और ‘पर्वतों के देवता’ की स्थिति को दिखा सकते हैं?
  • गंगा का उल्लेख क्यों किया गया है? (संकेत – इसके अनेक कारण हो सकते हैं |)

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चित्र 3.4— कुछ पहाड़ी जीव-जंतु

पर्वतों में घने वन, बहती नदियाँ, झीलें, घास के मैदान और कंदराएँ अनेक प्रकार के जीवों को आश्रय प्रदान करते हैं, जैसे कि गोल्डन ईगल (सुनहरा गरुड़), पेरेग्रिन फाल्कन (घुमंतू बाज), कैनेडियन लिंक्स, हिम तेंदुआ, आइबेक्स (जंगली भेड), हिमालयन तहर, पर्वतीय खरगोश, याक, ग्रे फॉक्स, भालू और बहुत से अन्य प्राणी |

ध्यान रखें
हिमालय से निकलने वाली भारतीय नदियों में से गंगा विशालतम है | अग्रेजी भाषा में इसे गैंजेज भी कहते हैं | लगभग 2,500 कि.मी. लंबी इस नदी की बहुत सी सहायक नदियाँ (उसमें आकर मिलने वाली अन्य नदियाँ) हैं | उनमें से कुछ, जैसे– यमुना और घाघरा भी हिमालय से निकलती हैं | अन्य नदियाँ जैसे– सोन, गंगा के मैदान के दक्षिण में पड़ने वाले विंध्यांचल की सृंखलाओं से निकलती हैं |

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चित्र 3.5—उत्तरी भारत में सीढ़ीदार (वेदिका) कृषि

पर्वतीय जीवन

पर्वतीय भूभाग सामान्य रूप से खड़े ढलानों के साथ ऊबड़-खाबड़ या ऊँचे-नीचे होते हैं, इसलिए कुछ ही घाटियों में नियमित रूप से कृषि की जा सकती है | ढलानों पर वेदिका कृषि अर्थात ढलान की भूमि को काटकर सीढ़ीनुमा स्थान पर कृषि करना एक प्रचलित प्रथा है | विश्व-भर के अनेक पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि की जगह पशुपालन को अधिक महत्व दिया जाता है |

पर्यटन, पर्वतीय लोगों के लिए आय का महत्वपूर्ण साधन है | पर्वतों की स्वच्छ हवा और मनोरम प्राकृतिक दृश्य सभी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं | कुछ पर्यटक पर्वतों पर साहसिक खेलाें के लिए भी जाते हैं; जैसे– स्कीइंग, हाइकिंग, पर्वता रोहण और पैरा ग्लाइडिंग | अनेक शताब्दियों से लोग पवित्र स्थलों की तीर्थयात्रा पर जाने के लिए पर्वतों की यात्राएँ करते रहे हैं, परंतु बहुत सारे पर्यटकों के एक साथ आने से पर्वतों के पर्यावरण पर दबाव पड़ता है | प्राय: इनमें सही संतुलन बनाए रखना कठिन हो जाता है |

भूभाग भौतिक आकृतियों की दृष्टि से भूमि का एक खंड |
घाटी पहाड़ों के बीच का एक निचला क्षेत्र, जिसमें प्राय: नदी अथवा जलधारा बहती है |
ध्यान रखें

बछेंद्री पाल ने बहुत कम आयु में ही पर्वतारोहण प्रारंभ कर दिया था और उन्होंने अनेक महिलाओं द्वारा किए जाने वाले पर्वतारोहण अभियानों का नेतृत्व किया | बछेंद्री पाल 1984 में माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने वाली प्रथम भारतीय महिला थीं | इसके लिए उन्हें पद् मश्री (1984) एवं पद् मभूषण (2019) से सम्मानित किया गया |

अरुणिमा सिन्हा जब 31 वर्ष की थी, तब एक दुर्घटना में उन्होंने अपना एक पैर गवाँ दिया था | बछेंद्री पाल के प्रोत्साहन एवं प्रशिक्षण से 2013 में उन्होंने माउंट एवरेस्ट पर चढ़ाई की | इसके बाद उन्होंने सभी महाद्वीपों की सबसे ऊँची चोटियों पर भी चढ़ाई की | अंटार्कटिक की माउंट विंसन सहित इन उपलब्धियों पर उन्हें 2015 में पद् मश्री से सम्मानित किया गया |

आइए पता लगाएँ

चित्रों के माध्यम से (चित्र 3.6, पृष्ठ 50) पर्वतों पर रहने वाले लोगों के सामने आने वाली चुनौतियों को दर्शाया गया है | कक्षा में समुह बनाकर चर्चा कीजिए और प्रत्येक पर एक अनुच्छेद लिखिए | यह भी विचार कीजिए कि जब पर्वतों पर इतनी सारी चुनौतियाँ हैं, फिर भी लोग वहाँ क्यों रहते हैं?

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चित्र 3.6— पर्वतीय जीवन के कई सकारात्मक पक्ष हैं, जैसे– शुद्ध वायु, मनोरम दृश्य आदि | इसमें प्राकृतिक और मानव-निर्मित दोनों तरह की कठिन चुनौतियाँ भी सम्मिलित हैं, जिनमें से कुछ को चित्रों में दर्शाया गया है |

आकस्मिक बाढ़ स्थान विशेष में अकस्मात बाढ़ आना, बहुधा ऐसा बादल फटने से होता है |

भूस्खलन पर्वतीय भूखंड के एक बड़े भाग या एक चट्टान का अकस्मात टूटकर गिरना |

हिमधाव (ऐवलांश) पर्वत से अकस्मात हिम का गिरना, हिमपात अथवा चट्टानें टूटकर गिरना, ऐसा प्राय: तब होता है जब हिम का पिघलना आरंभ होता है |बादल फटना  अचानक प्रचंड तूफान सहित वर्षा होना |

ध्यान रखें
विश्व-भर के अनेक पारंपरिक समुदाय पर्वतों को पवित्र स्थल मानते हैं और उनकी पूजा करते हैं | माउंट एवरेस्ट विश्व का सबसे ऊँचा पर्वत है, जिसकी ऊँचाई 8849 मीटर है और इसके अनेक नाम हैं | तिब्बती लोग इसे ‘चोमोलूंगमा’ कहते हैं, जिसका अर्थ है ‘जगत जननी’ और पर्वत की उसी रूप में पूजा करते हैं | नेपाल निवासी इसे ‘सागरमाथा’ कहते हैं, जिसका अर्थ है ‘आकाश की देवी’ | इसी प्रकार तिब्बत में कैलाश पर्वत है जिसे हिन्दू दर्शन, बौद्ध मत, जैन मत और बॉन (तिब्बत का एक प्राचीन धर्म) के अनुयुयी पवित्र मानते हैं | पर्वत शिखरों के लिए इतनी श्रद्धा-भावना भारत के साथ-साथ विश्व के अन्य भागों में भी देखी जाती है |

पठार

पठार एक ऐसी स्थलाकृति है जो आस-पास की भूमि से उठी होती है और प्राय: इसकी सतह चपटी होती है | इसके कुछ पार्श्व सीधी ढलान वाले होते हैं | पर्वतों के समान कुछ पठार पृथ्वी के इतिहास के संदर्भ में नवीन और प्राचीन हो सकते हैं | पठारों के दो उदाहरण हैं— तिब्बत का पठार, जो विश्व का सबसे बड़ा और ऊँचा पठार है, और दूसरा दक्षिणी पठार | पठारों की ऊँचाई कुछ सौ मीटर से लेकर कई हजार मीटर तक हो सकती है |

ध्यान रखें
  • तिब्बत के पठार की औसत ऊँचाई 4,500 मीटर है, जिसके कारण इसे ‘विश्व की छत’ का नाम दिया गया है! पूर्व से पश्चिम दिशा तक यह लगभग 2,500 किलोमीटर लंबा है—अर्थात चंडीगढ़ से कन्याकुमारी तक की दूरी जितना |
  • मध्य और दक्षिण भारत के दक्कन का पठार विश्व के सबसे पुराने पठारों में से एक है, जो कई लाख वर्ष पहले ज्वालामुखी की सक्रियता के कारण बना था |

पर्वतों की तरह, पठारों में खनिजों का प्रचुर मात्रा में जमाव देखने को मिलता है | इस कारण इन्हें खनिजों का भंडार-गृह भी कहा जाता है | परिणामस्वरूप पठारों में खनन मुख्य गतिविधि है, जहाँ विश्व की सबसे बड़ी खानें पाई जाती हैं | उदाहरणतया, पूर्वी अफ्रीका का पठार सोने और हीरे के खनन के लिए प्रसिद्ध है | भारत में छोटा नागपुर के पठार में लौह, कोयला और मैगनीज के प्रचुर भंडार हैं |

विश्व-भर में पठारों का पर्यावरण बहुत विविधतापूर्ण है | कई पठारों में चट्टानी मिट्टी पाई जाती है जो उन्हें मैदानी मिट्टी की तुलना में कम उपजाऊ बनाती है (अगला भाग देखि‍ए) | इसलिए पठार कृषि के लिए कम अनुकूल होते हैं | लेकिन ज्वालामुखी क्रियाओं से निर्मित लावा पठार उपजाऊ होते हैं, क्योंकि उनमें समृद्ध काली मिट्टी पाई जाती है |

पठारों में अनेक आकर्षक जल प्रपात भी होते हैं | दक्षिण अफ्रीका में स्थित जम्बेजी नदी पर विक्टोरिया जल प्रपात, छोटा नागपुर पठार में सुवर्ण रेखा नदी पर हूंडरू जल प्रपात और पश्चिमी घाट में शरावती नदी पर जोग जल प्रपात, ऐसे ही कुछ जल प्रपात हैं | चेरापुंजी (मेघालय) के पठार में नहकालीकाई जल प्रपात (चित्र 3.7) 340 मीटर की ऊँचाई से गिरता है |

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चित्र 3.7— चेरापुंजी पठार से गिरता नहकालीकाई जल प्रपात

मैदान

मैदान ऐसी स्थलाकृति होती है जिसका विस्तृत सपाट अथवा हल्का तरंगित धरातल होता है | उसमें कोई ऊँची पहाड़ीयाँ अथवा गहरी घाटियाँ नहीं पाई जाती हैं | सामान्यत: मैदान की ऊँचाई समुद्र तल से 300 मीटर से अधिक नहीं होती |

पर्वत सृंखलाओं से निकलने वाली नदियों की बाढ़ से निर्मित ये समतल भूमि है | यहाँ नदियाँ रेत, चट्टानों के कणों और गाद को एकत्र करती हैं जिन्हें तलछट कहा जाता है | नदियाँ इन तलछटों को अपने साथ बहाकर समतल भूमि में लाकर जमा कर देती हैं और मिट्टी को उपजाऊ बनाती हैं | फलस्वरूप ये मैदान सभी प्रकार की फसलों को उपजाने के लिए उपयुक्त होते हैं | इस प्रकार के भूभागों में लोगों का मुख्य आर्थिक व्यवसाय कृषि होता है | मैदान विविध प्रकार की वनस्पतियों और जीव-जंतुओ का भरण-पोषण करते हैं |

समुद्र तल समुद्र की सतह का औसत स्तर, इसे ‘माध्य समुद्र तल’ भी कहते हैं |

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चित्र 3.8— यह विश्व - मानचित्र कुछ प्रमुख पर्वत सृंखलाओ, पठारों और मैदानों को दर्शाता है |

आइए पता लगाएँ

चित्र 3.8 में दर्शाए गए स्थलरूपों में रंगों के कोड का प्रयोग कीजिए | उदाहरणार्थ – तिब्बत का पठार, रॉकी सृंखला, नील नदी का मैदान (आपको मानचित्र में दिए नाम स्मरण करने की आवश्यकता नहीं है) |

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चित्र 3.9— गंगा के मैदान का उपग्रह से लिया गया चित्र

आइए पता लगाएँ

कक्षा की गतिविधि के रूप में बहुत ऊँचाई से लिए गए उत्तर भारत के क्षेत्र के उपग्रह चित्र (चित्र 3.9) का अवलोकन कीजिए और उस पर चर्चा कीजिए—
  • गंगा के मैदान का रंग कौन-सा है?
  • सफे द रंग किस वस्तु को दर्शा रहा है?
  • उपग्रह चित्र के नीचे बार्इं ओर भूरे रंग का फैलाव क्या दर्शा रहा है?

मैदानी जीवन

हजारों वर्ष पहले, आरंभिक सभ्यताएँ नदियों के उपजाऊ मैदानों के आस-पास विकसित हुई थीं | हमारे समय में भी विश्व की अधिकांश जनसंख्या मैदानों में रहती है |

भारत की कुल जनसंख्या की एक-चौथाई से अधिक, अर्थात लगभग 40 करोड़ की जनसंख्या भारत के गंगा के मैदान में रहती है | विश्व के बहुत से अन्य मैदानों के समान इन क्षेत्रों में रहने वालों का मुख्य व्यवसाय मत्स्य पालन और कृषि है | यहाँ चावल, गेहूँ, मक्का, जौ और मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, रागी) जैसी खाद्य फसलें उगाई जाती हैं | साथ ही कपास, जूट और सन जैसी रेशेदार फसलें भी उगाई जाती हैं | परंपरागत कृषि मुक्यतः वर्षा पर निर्भर होती है (अर्थात, वर्षा जल से फसलों को जल मिलता है), किंतु हाल के दशकों में नहरों के जाल (नेटवर्क) द्वारा और भूमि गत जल को पंप से निकालकर खेतों की सिंचाई करने में वृद्धि‍ हुई है |

य‍द्यपि सिंचाई से कृषि उत्पादन में वृद्धि हुई है, किंतु इससे भूमिगत जलस्तर में गिरावट आर्इ है | इससे इस क्षेत्र में कृषि के भविष्य को लेकर चुनौतीपूर्ण स्थिति भी उत्पन्न हो गई है | गंगा के मैदानी भागों को प्रभावित करने वाली कुछ अन्य समस्याएँ भी हैं, जैसे– बढ़ती हुई जनसंख्या और प्रदूषण |

चाहे पर्वत हों या मैदान, विश्व में बहने वाली नदियाँ बहुत से सांस्कृतिक मूल्यों का वहन करती हैं | विशेष रूप से, बहुत से समुदाय नदी के स्रोत और एक दो नदियों के संगम स्थल को पवित्र स्थल मानते हैं | भारत में इन स्थानों पर बहुत से त्योहार, समारोह और धार्मिक कृत्य किए जाते हैं |

मैदान में हल्की ढलान होती है, अत: वहाँ नदी में नौका-संचालन सुगम होता है और इससे बहुत-सी आर्थिक गतिविधियों को भी सहायता मिलती है | पहले लोग एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने के लिए नदी मार्ग का ही व्यापक रूप से प्रयोग करते थे | आज भी गंगा के किनारे ऐसे स्थान हैं जहाँ लोग आने-जाने के लिए नाैकाओं का ही प्रयोग करते हैं (चित्र 3.10, पृष्ठ 56) |

संगम स्थल दो या दो से अधिक नदियों के मिलने का स्थान |

आइए पता लगाएँ

  • क्या आप अपने प्रदेश की नदी के स्रोतों अथवा संगम के कुछ उदाहरण दे सकते हैं जिन्हें किसी समुदाय द्वारा पवित्र स्थल माना जाता है?
  • अपने पास की नदी पर जाइए और वहाँ होने वाली सभी अर्थिक या सांस्कृति क गतिविधियों का अवलोकन कीजिए | उन्हें लिखकर अपने सहपाठियों के साथ उन पर चर्चा कीजिए |
  • भारत के कुछ लोकप्रिय पर्यटन स्थलों के नाम बताइए | साथ ही पहचानिए कि वे पर्यटन स्थल किस प्रकार के स्थलरूप से संबंधित हैं |

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चित्र 3.10— गंगा नदी में नौका-परिवहन

इस अध्याय में हमने पूरी पृथ्वी के तीन प्रमुख स्थलरूपों के बारे में समझा | परंतु, इसका स्वरूप जटिल है और विशेषज्ञ प्राय: कुछ और स्थलरूपों के बारे में भी बताते हैं | इनमें से एक स्थलरूप मरुस्थल है | यदा-कदा वर्षाप्राप्त करने वाले मरुस्थल व्यापक व दूर-दूर  तक शुष्कता का फैलाव लिए होते हैं | उनके वनस्पति जगत और प्राणि जगत विलक्षण ही होते हैं | कुछ मरुस्थल गर्म होते हैं, जैसे कि अफ्रीका का सहारा मरुस्थल अथवा भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिम में स्थित थार मरुस्थल | कुछ अन्य मरुस्थल ठंडे हैं, जैसे कि एशिया का गोबी मरुस्थल | कुछ विशेषज्ञ aाअंर्कटिक महाद्वीप को भी मरुस्थल मानते हैं |

जीवन जीने की कठिन परिस्थितियों के उपरांत भी लोगों ने अधिकांश मरुस्थलों के पर्यावरण के अनुसार अपने आप को ढाल लिया है | भारत के थार मरुस्थल में रहने वाले समुदाय अथवा समय-समय पर वहाँ से जाने वाले लोग मरुस्थल में गाए और सुनाए जाने वाले लोक गीतों और किंवदंतियों या दतं कथाओं जैसी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को सँजोकर रखते हैं |

मानव ने जिस प्रकार सभी स्थलाकृतियों में विभिन्न प्रकार से अपने घर बनाए हैं, वह हमारे अनुकूलन अर्थात स्थिति के अनुसार स्वयं को ढाल लेने और लचीलेपन का साक्षी है |

लचीलापन (रेजिलियंस) चुनौतियों और कठिनाइयों का सामना करने अथवा उनके अनुसार ढलने की क्षमता |

प्राचीन तमिल संगम कविता की पाँच टिनै पाँच दृश्यभूमि हैं, जो कुछ विशिष्ट देवताओं, जीवन-शैलियों, मनोदशाओं अथवा भावनाओं (जैसे – प्रेम, अनुराग, अलगाव, झगड़ा आदि) से जुड़ी हैं | यह तालिका केवल पाँच दृश्यभूमिूयों की विशेषताओं और प्रत्येक में मुख्य मानव व्यवसायों को सुचीबद्ध करती है |

टिनै दृश्यभूमि मुख्य व्यवसा
कुरिंजी पर्वतीय क्षेत्र आखेट और संग्रह करना
मुल्लाई घास के मैदान और वन पशु पालन
मरूदम उपजाऊ कृषि‍ के मैदान कृषि
नेयदल तटीय क्षेत्र मत्स्य पालन और समुद्री यात्रा
पालै शुष्क, मरुस्थल जैसे प्रदेश घुमंतू और युद्धरत

अभी तक हमने जिन स्थलरूपों को देखा है, उनकी अपेक्षा ये पाँच टिनै भिन्न प्रकार का वर्गीकरण है | परंतु ये विविधता वाले प्रदेशों और उनकी विशेषताओं के प्रति गहन जागरूकता को दिखाते हैं | ये हमारे और पर्यावरण के बीच गहन संबंध को भी दर्शाते हैं | (आपको टिनै के विवरण को याद रखने की आवश्यकता नहीं है, परंतु उससे प्रतिबिंबित अवधारणाओं को समझने की आवश्यकता है) |


आगे बढ़ने से पहले...

  • स्थलरूप तीन प्रकार के होते हैं—पर्वत, पठार और मैदान | उनकी भौतिक विशेषताएँ और पर्यावरण बहुत अलग-अलग प्रकार के होते हैं |
  • ऐतिहासिक समय से लोगों द्वारा किए जाने वाले क्रियाकलाप उस स्थलरूप से संबधित होते हैं जिसमें वे निवास करते हैं | ये स्थलरूप विश्व की संस्कृति के अभिन्न भाग हैं; विशेष रूप से भारतीय संस्कृति विविध प्रकार से उन्हें मनाती रही है |
  • प्रत्येक स्थलरूप, विभिन्न प्रकार की चुनौतियों के साथ-साथ अवसरों को भी प्रस्तुत करता है |

प्रश्न, क्रियाकलाप और परियोजनाएँ

  1. आपका कस्बा या गाँव या नगर किस प्रकार के स्थलरूप पर स्थित है? इस अध्याय में बताई गई विशेषताओं में से कौन-सी विशेषताएँ आप अपने आस-पास देखते हैं?
  2. आइए, छोटा नागपुर से प्रयागराज और अल्मोड़ा की हमारी आरंभिक यात्रा पर चलें | इस मार्ग में आने वाले तीन स्थलरूपों के बारे में बताइए |
  3. भारत के कुछ प्रसिद्ध तीर्थ स्थलों की सूची बनाइए | यह भी लिखिए कि वे कौन-से स्थलरूप के अंतर्गत आते हैं |
  4. सही या गलत बताइए—
  • हिमालय गोल शिखरों वाली नवीन पर्वत सृंखला है |
  • पठार प्राय: एक ओर से उठे हुए होते हैं |
  • पर्वत और पहाड़ि‍याँ एक ही प्रकार के स्थलरूप हैं |
  • भारत में पर्वत, पठार और नदियों में एक ही प्रकार के वनस्पति और प्राणी जगत पाए जाते है |
  • गंगा, यमुना की सहायक नदी है |
  • मरुस्थल का वनस्पति जगत और प्राणी जगत विलक्षण होता है |
  • हिम के पिघलने से नदियों में जल आता है |
  • मैदानों में नदियों द्वारा एकत्र किए गए तलछट भूमि को उपजाऊ बनाते हैं |
  • सभी मरुस्थल गर्म होते हैं |
5. शब्दों के जोड़े बनाइए—

माउंट एवरेस्ट अफ्रीका
राफ्टिंग विश्व की छत
ऊँट धान के खेत
पठार मरुस्थल
गंगा का मैदान नदी
जलमार्ग गंगा
माउंट किलिमंजारो सहायक नदी
यमुना पर्वतारोहण