अध्याय 4
इतिहास की समय-रेखा एवं
उसके स्रोत


महत्वपूर्ण
प्रश्न ?
- हम ऐतिहासिक काल की गणना किस प्रकार करते हैं?
- इतिहास को समझने के लिए विभिन्न स्रोत हमारी किस प्रकार सहायता कर सकते हैं?
- आदिमानव किस प्रकार रहते थे?
हम अतीत का अध्ययन किस प्रकार करते हैं?
आइए विचार करें
- आपकी अपने अतीत की सबसे पुरानी स्मृति कौन-सी है? क्या आपको याद है कि उस
समय आपकी आयु क्या थी? संभवत: पाँच या छह वर्ष पूर्व तक की यह सभी स्मृतियाँ आपके अतीत का हिस्सा हैं |
- आपको क्या लगता है, अतीत को समझने से हमें वर्तमान विश्व को समझने में कैसे
सहायता मिलेगी?
आपको विज्ञान की कक्षा में पता चलेगा कि पृथ्वी का एक बहुत ही लंबा इतिहास है
जिसमें से हम मानवों का इतिहास नवीनतम और एक छोटा-सा भाग है |
इतिहास मानव के अतीत का अध्ययन

अनेक लोग पृथ्वी के इतिहास का अध्ययन करते हैं | उनमें से कुछ लोग पृथ्वी की
सतह के नीचे के रहस्यों को जानने के लिए प्रशिक्षित होते हैं | इस तरह वे पृथ्वी के
अतीत के साथ ही हमारे अतीत को भी समझने में सहायता करते हैं |

चित्र 4.2.1— भू-विज्ञानी चित्र 4.2.2— जीवाश्म विज्ञानी चित्र 4.2.3— मानव विज्ञानी चित्र 4.2.4— पूरातत्व विज्ञान
- भू-विज्ञानी (चित्र 4.2.1) पृथ्वी के भौतिक स्वरूपों जैसे– मृदा, पत्थरों, पहाड़ियों, पर्वतों, नदियों, महासागरों एवं पृथ्वी के अन्य हिस्सों का अध्ययन करते हैं |
- जीवाश्म विज्ञानी (चित्र 4.2.2) जीवाश्म के रूप में करोड़ों वर्ष पूर्व के पेड़ों, पशुओं एवं मानवों के अवशेषों का अध्ययन करते हैं |
- मानव विज्ञानी (चित्र 4.2.3) मानव समाजों एवं संस्कृतियों का अतीत से लेकर वर्तमान तक अध्ययन करते हैं |
- पुरातत्व विज्ञानी (चित्र 4.2.4) मानव, पौधों एवं
पशुओ द्वारा अपने पीछे छोड़े
गए अवशेषों जैसे– उपकरण, घड़े, पात्र, मनके , मूर्तियाँ, खिलौने, हड्डियाँ,
पशुओ और मानवों के दाँत, जले हुए अनाज, घरों एवं र्इंटों के हिस्से एवं अन्य
वस्तुओ का उत्खनन करके अतीत का अध्ययन करते हैं |
इतिहास में समय की गणना किस प्रकार की जाती है?
प्रत्येक समाज एवं संस्कृति के पास समय की गणना करने की अपनी प्रणालियाँ रही हैं | प्रमुख घटनाएँ जैसे – किसी व्यक्ति विशेष का जन्म अथवा किसी शासक के शासन का आरंभ, एक नए युग का आरंभ माना जाता रहा है | आज के समय में विश्व-भर में सामान्यत: ग्रेगोरियन कै लेंडर (तिथिपत्र) का उपयोग होता है; साथ ही त्योहारों की तिथियों की गणना एवं अन्य मांगलिक कार्यों के लिए हिन्दू , मूस्लिम, यहुदी, चीनी आदि अन्य तिथिपत्रों का भी उपयोग होता है |
पश्चिम में, सामान्यत: ईसा मसीह के जन्म वर्ष से कैलेंडर का आरंभ माना जाता है | इस बिंदु से आगे के वर्षों की गणना की जाती है एवं इसे अंग्रेजी में ‘ए.डी.’ से इंगित किया जाता रहा है (ए.डी. लैटिन भाषा का एक शब्द-संक्षेप है, जो ईसा के जन्म के बाद के वर्षों को इंगित करता है), परंतु अब विश्व-भर में इसे अंग्रेजी में ‘कॉमन एरा’ अथवा सी.ई. कहा जाता है | उदाहरणार्थ भारत 1947 में स्वतंत्र हुआ, इसे 1947 ई. (कभी-कभी ई. सन 1947) अथवा 1947 सी.ई. (अंग्रेजी में) लिख सकते हैं |
इसी प्रकार ईसा मसीह के जन्म की पांरपरिक तिथि से पूर्व के वर्षों की गणना उल्टे (अवरोही) क्रम में की जाती है एवं इसे अंग्रेजी में बी.सी. से इंगित किया जाता था | इसे अब अंग्रेजी में ‘बिफोर कॉमन एरा’ (बी.सी.ई.) से इंगित किया जाता है |
उदाहरण के लिए 560 सा.सं
.पू. गौतम बुद्ध (जिनके बारे में हम अध्याय 7 में जानेंगे)
के जन्म की अनुमानित तिथी है | क्या आप गणना कर सकते हैं कि उनका जन्म आज से
कितने वर्ष पूर्व हुआ था?
जीवाश्म जीव-जंतुओं के पदचिन्हों या पौधों के अवशेष चिन्हों जो कि मृदा अथवा शिलाओं की परतों के बीच संरक्षित पाए जाते हैं |
युग
समय का
एक निश्चित
कालखंड |
ग्रेगोिरयन कै लेंडर (तिथिपत्र) इस कै लेंडर का उपयोग अब विश्व-भर में होता है, जिसमें 365 दिन मिलकर बारह माह का निर्माण करते हैं एवं प्रत्येक चार वर्ष में एक अधिवर्ष होता है | इस प्रकार शताब्दी वर्ष जैसे– 1800, 1900, 2000 आदि सभी अधिवर्ष (लीप वर्ष) होंगे यदि वह 400 से विभाजित हो सकते हों | इसीलिए दिए गए शताब्दी वर्षों में से केवल 2000 ही लीप वर्ष होगा |
मांगलिक
अनुकूल
अथवा भाग्य
लाने वाला शुभ समय, उदाहरणार्थ
एक मांगलिक शुरुआत |

इस पाठ्यपुस्तक में हमने बी.सी.ई. के लिए सामान्य संवत पूर्व (सा.सं
.पू.) तथा
सी.ई. के लिए सामान्य संवत (सा.सं
.) शब्दों का प्रयोग किया है |
आइए पता लगाएँ
- इस प्रकार की गणना सरल होती है परंतु इसमें एक समस्या रहती है | ग्रेगोरियन तिथिपत्र में कोई भी वर्ष ‘शुन्य’ के रूप में चिन्हीत नहीं किया गया है | वर्ष 1 सा.सं ., 1 सा.सं .पू. के तुरंत बाद आता है | 2 सा.सं .पू. से लेकर 2 सा.सं. तक एक समय-रेखा बनाइए | आप देखेंगे कि ‘शुन्य वर्ष’ की अनुपस्थिति के कारण इन दो तिथियों के मध्य केवल 3 वर्ष ही होंगे |
- किसी भी सा.सं .पू. तथा सा.सं. की तिथियों के बीच के वर्षों की गणना करते समय हमें सदैव दोनों को जोड़कर उनके योग में से 1 को घटा देना चाहिए | ऊपर दी गई स्थिति में 2+2–1=3
- अपने सहपाठियों के साथ कुछ ऐसे उदाहरणों का अभ्यास कीजिए | उदाहरणार्थ, यदि हम
महात्मा बुद्ध के प्रश्न पर पुन: लौटें, मान लीजिए हम आज 2024 सा.सं
. में हैं, तो महात्मा बुद्ध का जन्म 560+2024–1=2583 वर्ष पूर्व हुआ था |

इस प्रकार की घटनाओं को चिह्नित करने के लिए समय-रेखा एक सुविधाजनक उपकरण है (पृष्ठ संख्या 62 व 63 पर चित्र 4.3 को देखिए), क्योंकि यह किसी विशेष अवधि में तिथियों और घटनाओं के अनुक्रम को दिखाता है | यहाँ दर्शाई गई सरलीकृत समय-रेखा पर मानव सभ्यता के आरंभ से वर्तमान तक की यात्रा को दर्शाया गया है |
समय-रेखा पर बिंदुओं के माध्यम से प्रमुख एेतिहासिक घटनाओं को चिह्नित किया
गया है | ध्यान रखिए कि समय-रेखा पर बिंदुकृत हिस्सा छोड़े गए कालखंड को दर्शाता है; अन्यथा यह समय-रेखा लगभग 3 मीटर लंबी हो जाती |

समय-रेखा ऐतिहासिक घटनाओं के क्रम को समझने में भी सहायक होती है |
उदाहरणार्थ, तिथियाँ देखे बिना भी अब आप देख सकते हैं कि बुद्ध का जन्म, ईसा
मसीह के जन्म से पहले हुआ था |
ध्यान रखें
वर्ष एवं
दशक (दस वर्षों का कालखंड) के साथ ही इतिहास में लंबी अवधि का अध्ययन करते
समय हम सामान्यत: दो अन्य विशेष शब्दों का भी उपयोग करते हैं |
- शताब्दी – यह किसी भी 100 वर्षों का कालखंड है | इतिहास में, 1 सा.सं. से लेकर
प्रत्येक सौ वर्षों के लिए शताब्दी की गणना की जाती है | उदाहरणार्थ, वर्तमान में हम
21वीं शताब्दी में हैं, जो 2001 से आरंभ होकर 2100 तक चलेगी |
ईसा पूर्व की गणना करने के लिए हम 1 सा.सं.पू. से आरंभ करके समय में पीछे की
ओर लौटते हैं | उदाहरणार्थ, तीसरी शताब्दी सा.सं
.पू. में 300 सा.सं.पू. से लेकर 201 सा.सं.पू. तक का समय सम्मिलित होगा |
- सहस्त्राब्दी – यह किसी भी 1000 वर्षों का कालखंड है | इतिहास में, 1 सा.सं. से लेकर
प्रत्येक सहस्त्र वर्षों के लिए सहस्त्राब्दी की गणना की जाती है | उदाहरणार्थ, हम तीसरी सहस्त्राब्दी हैं, जो 2001 सा.सं. से आरंभ होकर 3000 सा.सं. तक चलेगी |
शताब्दी की तरह ही सा.सं.पू. सहस्त्राब्दी की गणना के लिए 1 सा.सं.पू. से
आरंभ करके समय में पीछे की ओर लौटते हैं | उदाहरणार्थ, 1 सहस्त्राब्दी सा.सं.पू. में 1
सा.सं.पू. से लेकर 1000 सा.सं.पू. तक का समय सम्मिलित होगा | पृष्ठ 62 एवं
63
(चित्र 4.3) में दी गई समय-रेखा में क्या आप आठवीं सहस्त्राब्दी सा.सं. पू. को चिह्नित
कर सकते हैं?
आइए पता लगाएँ
1900 सा.सं. से लेकर आज तक की एक समय-रेखा बनाइए | इस पर अपने दादा-दादी,
नाना-नानी, माता-पिता, भाई-बहन एवं
अपनी जन्मतिथियों को अंकित कीजिए | साथ ही
20 वीं शताब्दी सा.सं. के आरंभ वर्ष व अंतिम वर्ष को भी अंकित कीजिए |ध्यान रखें
क्या आप जानते हैं कि भारत में पारंपरिक तिथिपत्रों का निर्माण किस प्रकार किया जाता रहा
है? अनेक भारतीय तिथिपत्र महीनों एवं दिनों के निर्धारण के लिए सूर्य एवं चंद्रमा की स्थिति पर
निर्भर करते हैं | ‘पंचांग’ तालिकाओं की एक पस्तुक है जिसमें प्रत्येक माह के दिनों के साथ-साथ
संबंधित खगोलीय आँकड़ों को सुचीबद्ध किया जाता है | उदाहरणार्थ यह सूर्यग्रहण, चद्रंग्रहण, सूर्योदय एवं सूर्यास्त आदि जैसी घटनाओं का सटीक आंकलन करता है | मौसम के पूर्वानुमान, त्योहारों की तिथियों और समय-निर्धारण आदि के लिए आज भी भारत में पंचांग का बड़े स्तर
पर उपयोग होता है |इतिहास के स्रोत क्या-क्या हैं?
आइए पता लगाएँ
क्या आप अपने माता एवं पिता के परिवार की तीन पीढ़ियों की जानकारी एकत्र कर सकते हैं?
अपने माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, परदादा-परदादी, परनाना-परनानी की एक वंशावली
बनाइए | उनके नामों का पता लगाइए और यह भी कि वह जीवन-यापन के लिए क्या करते थे
एवं उनका जन्म कहाँ हुआ था? साथ ही आप उन स्रोतों का भी उल्लेख कीजिए जहाँ से आपने
ये सूचनाएँ प्राप्त की हैं |
| संबंध | नाम | व्यवसाय | जन्म-स्थान | सूचना के स्रोत |
|---|---|---|---|---|
| दादा-दादी | ||||
| नाना-नानी | ||||
| परदादा-परदादी | ||||
| परनाना-परनानी | ||||
आपने अपने परिवार के अतीत के संबंध में जानकारियाँ कैसे प्राप्त कीं? इन
जानकारियों को प्राप्त करने के लिए क्या आपने छायाचित्रों, डायरियों, पहचान-पत्रों
आदि का उपयोग किया या आप केवल अपने माता-पिता और संबंधियों की स्मृतियों पर निर्भर थे?
आइए विचार करें

प्रत्येक वस्तु अथवा संरचना एक कहानी बताती है और वह चित्र-खंड पहेली
(जिग्साॅ) के हिस्से की तरह होती है | जिन वस्तुओं को आप अपने घर में देखते हैं,
वह आपको अपने परिवार के इतिहास के विषय में कुछ बताती हैं | इसी प्रकार हम
ऐतिहासिक घटनाओं के बारे में विभिन्न स्रोतों से जानकारी एकत्रित कर सकते हैं | एक
बात सदैव याद रखनी चाहिए कि इतिहास के मामले में पहेली के कुछ हिस्से गायब रह
सकते हैं |

पृष्ठ 67 पर दिए गए इतिहास के स्रोत संबंधी चित्र को देखिए | यह इतिहास के प्रमुख स्रोतों को एक साथ प्रदर्शित करता है | आपको अभी इन सभी को याद रखने की आवश्यकता नहीं है; हम आगे चलकर इनमें से कुछ का उपयोग करेंगे | उदाहरणार्थ, जब इतिहासकार 1,500 वर्ष पूर्व के किसी राजा या रानी, प्राचीन स्मारक, युद्ध या व्यापार की कुछ वस्तुओं के बारे में जानकारी जुटाने का प्रयास करते हैं, तो वे बड़े ध्यान से अधिक से अधिक स्रोतों से जानकारी संकलित करने का प्रयास करते हैं | कभी-कभी ये स्रोत एक-दूसरे की पुष्टि करते हैं (जैसे चित्र-खंड पहेली (जिग्सॉ) के टुकड़े मेल खाते हैं), तो कभी यह एक-दूसरे के विपरीत सूचनाएँ प्रदान करते हैं (जैसे चित्र-खंड पहेली (जिग्सॉ) के टुकड़े मेल नहीं खाते) | ऐसी परिस्थितियों में यह निर्णय लेना पड़ता है कि किस स्रोत पर अधिक विश्वास किया जाए | इस प्रकार इतिहासकार जिस कालखंड का अध्ययन कर रहे होते हैं, वे उसके इतिहास का पुनर्निर्माण करने का प्रयास करते हैं |
इतिहास के इन सभी स्रोतों में कौन योगदान देता है? इतिहासकारों के साथ ही पूरातत्व विज्ञानी, पुरालेखशास्त्री (जो प्राचीन अभिलेख पढ़ते हैं), मानव विज्ञानी (जो
मानव समाज व संस्कृतियों का अध्ययन करते हैं), साहित्य व भाषा के विशषज्ञ आदि
इसमें अपना योगदान दतेे हैं | साथ ही पिछले 50 वर्षों में वैज्ञानिक अध्ययनों ने इतिहास
के पुनर्निर्माण में अधिक से अधिक योगदान दिया है | उदाहरणार्थ प्राचीन जलवायु का
अध्ययन, उत्खनन की गई सामग्री का रासायनिक अध्ययन और प्राचीन मानव की
आनुवांशिकी के अध्ययन ने एक नया दृष्टिकोण दिया है जिससे और पूरक स्त्रोत प्राप्त
हुए हैं | साथ ही जब इतिहासकार आधनिुक इतिहास (साधारणत: जिसका अर्थ है,
पिछली दो अथवा तीन शताब्दियों का इतिहास) का अध्ययन करते हैं, तो समाचार-पत्र
एक अन्य महत्वपूर्ण स्रोत हो सकता है | पिछले कुछ दशकों के अध्ययन के लिए
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया (टी.वी., इंटरनेट आदि) का भी उपयोग किया जा सकता है |
इतिहासकार ऐसा व्यक्ति जो अतीत का अध्ययन करता है एवं उसके विषय में लिखता है |
आनुवांशिकी
जीव विज्ञान की
वह शाखा जो यह
अध्ययन करती है कि किस प्रकार
पौधों, जानवरों या
मनुष्यों की कुछ
विशेषताएँ एवं गुण एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहूँचते हैं |
आइए पता लगाएँ
अगले पृष्ठ पर इतिहास के स्रोतों से संबंधित कुछ चित्र दिए गए हैं | ये वस्तुएँ कौन-कौन सी हैं एवं आपके अनुसार क्या दर्शाती हैं? चित्र के सम्मुख दिए गए स्थान में वस्तु से संबंधित प्राप्त जानकारी को लिखिए |

मानव इतिहास का प्रारंभ
होमो सेपियंस (मानव) लगभग 3,00,000 (तीन लाख) वर्ष पूर्व से पृथ्वी पर रह रहे हैं | यह एक लंबा समय प्रतीत होता है, परंतु यह पृथ्वी के इतिहास का एक छोटा-सा अंश मात्र है | आइए, अपने आरंभिक इतिहास को संक्षेप में जानें |

आइए पता लगाएँ
ऊपर दिए गए चित्र में शैलाश्रय में आरंभिक मानव से संबंधित कुछ गतिविधियों को देखिए | आप इनमें से किस-किस गतिविधि को पहचान सकते हैं? प्रत्येक का संक्षिप्त विवरण दीजिए |
आदिमानव को प्रकृति से अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा | एक-दूसरे की सहायता करने के लिए वे टोलियों अथवा समूहों में रहते थे | वे मुख्यतः आखेटक एवं खाद्य संग्राहक थे तथा भोजन एवं आश्रय की निरंतर खोज करते रहते थे | इसका अर्थ है कि वे अपने जीवन के लिए खाने योग्य पौधों एवं फलों के संग्रह व आखेट पर निर्भर थे | हमारे आदि पूर्वजों के प्राकृतिक तत्वों को लेकर कुछ निश्चित विश्वास थे, संभवत उनकी मरणोपरांत जीवन को लेकर भी कुछ धारणाएँ थी |
यह समूह अस्थायी शिविरों, शैलाषयों अथवा गुफाओं में रहते थे एवं एक-दूसरे से जिन भाषाओं में संवाद करते थे, वे अब लुप्त हो चुकी हैं | उन्होंने अग्नि का उपयोग किया | पत्या की उन्नत कुल्हाड़ियों एवं ब्लेम, नुकीले तीरों एवं अन्य उपकरणों आदि के निर्माण ने उनके जीवन को सरल बना दिया | संपूर्ण विश्व की सैकड़ों गुफाओं के शैल-चित्रों में उनके जीवन के विविध आयाम दिखाई देते हैं | इनमें से कुछ चित्र साधारण आकृतियों एवं प्रतीकों के है, जबकि कुछ अन्य चित्र अधिक विस्तृत है एवं उनमें पशुओं एवं मानवों के दृश्य है | समय के साथ इन आदिमानवों ने पाथर एवं मनकों की माला, पशुओं के दांतों के पेंडेंट आदि जैसे साधारण आभूषण बना लिए और कभी-कभी वे दूसरे समूही के साथ इनका आदान-प्रदान करने लगे |
पहली उपज
एक लंबे समय में पृथ्वी की जलवायु में अनेक परिवर्तन आए हैं | एक समय पृथ्वी पर बहुत ठंड थी एवं इसका एक बड़ा भाग हिमाच्छादित (बर्फ से वैका हुआ था, इसलिए इसे हिम युग' कहा जाता था | इसके विषय में आप विज्ञान में विस्तार से अध्ययन करेंगेो बाद में जब जलवायु गाम होने लगी तो हिन का कुछ भाग पिघल गया जिसके कारण तत्कालीन नदियों में जलभराव हो गया जो बाद में समुद्र में समाहित होगी हिमयुग लगभग 1,00,000 (एक लाख) वर्ष पूर्व से लेकर 12,000 वर्ष पूर्व तक रहा |
इसके उपरांत मानव के लिए जीने योग्य परिस्थितियों में सुधार आया | विश्व के कई हिस्सों में उन्होंने एक स्थान पर बसना तथा अनाज उगाना आरंभ कर दिया | उन्होंने गाय, बकरी आदि जैसे जानवरों का घरेलूकरण भी आरंभ कर दिया | भोजन की अधिक उपलब्धता के कारण ये समूह अपने आकार व संख्या में बढ़ गए | ये प्रायः नदियों के किनारे बसने लगे थे, लेकिन इसका एकमात्र कारण जल की उपलब्धता नहीं थी अपितु यहाँ की मृदा का अधिक उपजाऊ होना भी था | इससे अन्न उगाने की प्रक्रिया अधिक सरल हो गई |
आइए पता लगाएँ
अगले पृष्ठ पर दिए गए चित्र का अवलोकन कीजिए | यह कुछ सहस्त्राब्दी पूर्व के कृषक समुदाय की गतिविधियों को प्रदर्शित करता है | उन गतिविधियों को सूचीबद्ध कीजिए जिनकी आप पहचान कर सकते हैं |
आइए विचार करें
- पहले प्रदर्शित शैल-चित्र एवं उपर्युक्त चित्र, दोनों में ही पुरुषों एवं महिलाओं को कुछ निश्चित भूमिकाओं में दर्शाया गया है | यद्यपि ये स्वाभाविक प्रतीत होते हैं, परंतु आवश्यक नहीं कि ये सही ही हों और ये सभी परिस्थितियों पर लागू नहीं होते | उदाहरण के लिए, हो सकता है कि शैल-चित्र में महिलाओं ने गुफा में चित्रकारी करने के लिए रंगों को तैयार किया हो अथवा स्वयं चित्रकारी की हो | दोनों ही चित्रों में हो सकता है कि पुरुषों ने भोजन की कोई वस्तु बनाई हो अथवा शिशुओं की देखभाल में मदद की हो |
- ऐसी भूमिकाओं एवं परिस्थितियों पर विचार करते हुए कक्षा में चर्चा कीजिए | इस बात का ध्यान रखिए कि हमारे पास उस समय की केवल सीमित सूचनाएँ ही उपलब्ध हैं |
जैसे-जैसे समुदायों का विकास हुआ, समाज जटिल होता गया | सरदार अथवा मुखिया लोगों के कल्याण के लिए उत्तरदायी थे एवं सभी सामूहिक रूप से सामुदायिक कल्याण के लिए कार्य करते थे | उदाहरण के लिए, निजी स्वामित्व का भाव नहीं था और भूमि पर सामुदायिक रूप से कृषि की जाती थी |
जैसे-जैसे समय बीतता गया, पल्ली (उप-ग्राम) बड़े गाँवों में परिवर्तित हो गए, जो मुख्यतः भोजन, वस्त्र एवं उपकरण आदि वस्तुओं का आदान-प्रदान करने लगे | धीरे-धीरे इन गाँवों में संप्रेषण एवं आवागमन का तंत्र विकसित हुआ एवं इनमें से कुछ छोटे कस्बों में परिवर्तित हो गए | उदाहरणार्थ, मृदभांड एवं मिट्टी की अन्य वस्तुओं को बनाने एवं धातुओं के उपयोग (पहले तांबा और फिर लोहा) की तकनीक का आगमन हुआ जिससे टिकाऊ उपकरण, दैनिक उपयोग की वस्तुओं एवं आभूषणों को बनाना सरल हो गया |
हम अध्याय 6 में देखेंगे कि इन चरणों ने किस प्रकार से 'सभ्यता' के उदय में योगदान दिया | अभी यह याद रखना आवश्यक है कि मानव सभ्यता को विकास के इन प्रारंभिक चरणों में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा था | इस दौरान कुछ कठिन क्षण भी आए, जब कुछ पूर्ववर्ती प्रजातियों की भाँति मानव सभ्यता भी लुप्त हो सकती थी | हम उन आदिमानवों के बारे में कभी नहीं जान पाएँगे जिनके साहस और दृढ़ता के कारण आज हमारा अस्तित्व संभव हो पाया है |
कल्याण
स्वास्थ्य, समृद्धि
और भलाई
पल्ली एक छोटी बस्ती अथवा छोटा गाँव
आगे बढ़ने से पहले...
- हमने अपने अतीत के बारे में और अधिक जानने के कुछ तरीकों का पता लगाया | समय-रेखा की अवधारणा हमें भिन्न-भिन्न समय पर ऐतिहासिक घटनाओं के अनुक्रम को समझने में सहायता करती है |
- समय की गणना की विभिन्न विधियाँ हैं- वर्ष, दशक, शताब्दी, सहस्त्राब्दी |
- इतिहास के विभिन्न स्रोत हैं | ये ऐतिहासिक घटनाओं को समझने व उनका पुनर्निर्माण करने में सहायक होते हैं |
- हमने आरंभिक मानव जीवन को संक्षेप में समझा और यह भी जाना कि मानव-समाज कैसे समय के साथ जटिल होता गया |