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अध्याय 6

भारतीय सभ्यता का प्रारंभ

" भारत की सबसे प्राचीन सभ्यता, जो हड़प्पा, सिंधु अथवा सिंधु-सरस्वती सभ्यता के नाम से जानी जाती है, वास्तव में कई मायनों में एक अनूठी सभ्यता थी... (इसने दिखाया कि कैसे) एक सम्यक रूप से संतुलित समुदाय रहता है- जहाँ धनवान और निर्धन के बीच बहुत अधिक अंतर नहीं है... संक्षेप में, हड़प्पा के सामाजिक परिदृश्य में शोषण नहीं, बल्कि आपसी सामंजस्य दिखाई देता है | "

— बी.बी.लाल

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चित्र 6.1—धौलावीरा ‘किला’ क्षेत्र का उत्तरी प्रवेश द्वार

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महत्वपूर्ण प्रश्न ?

  1. सभ्यता क्या है?
  2. भारतीय उपमहाद्वीप की आरंभिक सभ्यता कौन-सी थी?
  3. उसकी मुख्य उपलब्धियाँ क्या थीं?

सभ्यता क्या है?

अध्याय 4 के अंत में हमने देखा कि कैसे मनुष्य का पहला समूह एक स्थान पर रहने लगा, कृषि करने लगा, कैसे उसने कुछ तकनीकों (जैसे- भवन निर्माण, धातु विज्ञान, यातायात साधन) का विकास किया और सभ्यता की ओर उन्मुख हुआ |

आखिर सभ्यता है क्या? सामान्यतः इस शब्द का प्रयोग मानव समाज के उन्नत चरण के लिए किया जाता है | इसे और स्पष्ट करने के लिए, हम यहाँ इस बात पर विचार करेंगे कि एक 'सभ्यता' में कम से कम निम्नलिखित विशेषताएँ होनी चाहिए -

  • शासन और प्रशासन का कोई रूप - जटिल समाज और उसके अनेक कार्यकलापों के प्रबंधन हेतु |
  • नगरीकरण - नगर योजना, नगरों का विकास और उनका प्रबंधन, जिसमें सामान्यतः जल प्रबंधन और जल निकास व्यवस्था आती है |
  • विभिन्न प्रकार के शिल्प - कच्चे माल (जैसे पत्थर और धातु) का प्रबंधन और तैयार माल (जैसे - आभूषण और उपकरण) का उत्पादन |
  • व्यापार – सभी प्रकार की वस्तुओं के आदान-प्रदान के लिए आंतरिक (एक नगर अथवा एक क्षेत्र के अंदर) और बाहरी (दूरस्थ अथवा विश्व के अन्य भागों के साथ) व्यापार |
  • लेखन का कोई रूप - अभिलेखों को रखने और संवाद बनाने के लिए आवश्यक |
  • जीवन और विश्व के बारे में सांस्कृतिक विचार- कला, स्थापत्य, साहित्य, श्रुति परंपराओं और सामाजिक रीति-रिवाजों के माध्यम से जीवन और विश्व की अभिव्यक्ति |
  • कृषि उत्पादकता - जो गाँव ही नहीं, बल्कि नगरों को भीं भोजन उपलब्ध करा सके |

धातु विज्ञान धातु विज्ञान के अंतर्गत प्रकृति से धातु निष्कर्षण, उन्हें शुद्ध करने, आपस में मिलाने की तकनीकों और साथ-साथ धातु और उसके गुणों का वैज्ञानिक अध्ययन शामिल है |

आइए विचार करें

ऊपर बताई गई विशेषताओं में से आप किसे मूलभूत विशेषता मानते हैं अर्थात ऐसी विशेषता, जो अन्य सभी के विकास के लिए अनिवार्य है?

आइए पता लगाएँ

ऊपर दी गई सूची में प्रत्येक विशेषता के लिए क्या आप उस समय के समाज में विद्यमान व्यवसाय और रोजगार की सूची तैयार कर सकते हैं?

आज विश्व के अधिकांश समाजों में इन सभी विशेषताओं को आसानी से देखा जा सकता है | जिस तरह हमने सभ्यता को परिभाषित किया है, उस अर्थ में सभ्यता का आरंभ कब हुआ?

विश्व के विभिन्न भागों में अलग-अलग समय पर सभ्यताओं का आरंभ हुआ | जिस क्षेत्र को मेसोपोटामिया (आधुनिक इराक और सीरिया) के नाम से जाना जाता है, वहाँ लगभग 6,000 वर्ष पहले सभ्यता का आरंभ हुआ और इसके कुछ शताब्दियों के बाद प्राचीन मिस्र की सभ्यता का आरंभ हुआ | आप इन सभ्यताओं और अन्य सभ्यताओं के बारे में आगे की कक्षाओं में पढ़ेंगे | सही अर्थों में उन प्राचीन सभ्यताओं के बहुत बड़े योगदान और प्रगति के कारण ही मानवता आज वर्तमान स्थिति में पहुँच सकी है |

अभी, हम केवल भारतीय उपमहाद्वीप और उसके उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र पर दृष्टि डालेंगे, जहाँ से हमारी कहानी आरंभ होती है |

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चित्र 6.2— 2600 से 1900 सा.सं .पू. तक सिन्धु-सरस्वती सभ्यता का समय दर्शाती समय-रेखा

गाँव से नगर

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पंजाब (आज भारत और पाकिस्तान में विभाजित) और सिंघ (अब पाकिस्तान में) के विशाल मैदानों को सिंधु नदी और उसकी सहायक नदियाँ सिंचित करती हैं | सिंधु नदी ने इन मैदानों को उपजाऊ और कृषि के अनुकूल बनाया | इन मैदानों की पूर्व दिशा में कुछ सहस्त्राब्दियों पहले एक अन्य नदी सरस्वती, हिमालय की तलहटी से हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और गुजरात (चित्र 6.3 देखिए) के कुछ क्षेत्रों से होकर प्रवाहित होती थी | 3500 सा.सं.पू से इस पूरे क्षेत्र में गाँᾷ, नगरों मे परिवर्तित हो गए और लगभग 2600 सा.सं.पू. में बढ़ते व्यापार और अन्य विनिमयों के कारण नगर, महानगरों में परिवर्तित हो गए |

इस सभ्यता को पुरातत्ववेत्ताओं ने सिंधु सभ्यता, हड़प्पा सभ्यता अथवा सिंधु-सरस्वती सभ्यता जैसे नाम दिए | हम इन सभी नामों का प्रयोग करेंगे | इस सभ्यता के निवासियों को हड़प्पाई या हड़प्पावासी कहते थे | यह विश्व की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक है |

इस विकास प्रक्रिया को 'भारत का पहला नगरीकरण' भी कहा जाता है |

सहायक नदी वह नदी जो किसी बड़ी नदी (या झील) में मिलती है | उदाहरणार्थ, यमुना नदी गंगा नदी की सहायक नदी है |

ध्यान रखें

वर्तमान में इस सभ्यता के निवासियों को 'हड़प्पाई या हड़प्पावासी' क्यों कहते हैं? इसका सीधा-सा उत्तर है कि लगभग एक शताब्दी पहले 1920-21 में हड़प्पा (आज के पाकिस्तान का पंजाब) इस सभ्यता से संबंधित पहला उत्खनित नगर था |


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चित्र 6.3— सिंधु-सरस्वती सभ्यता की कुछ प्रमुख बस्तियों का मानचित्र | पर्वत सृंखलाओं द्वारा बनी प्राकृतिक सीमाओं को देखि‍ए (भूरे रंग में) |

आइए पता लगाएँ

इस सभ्यता के कुछ प्रमुख नगरों को मानचित्र (चित्र 6.3) में दर्शाया गया है | क्या आप (कक्षा में गतिविधि के माध्यम से) इन दर्शाए गए नगरों का अगले पष्ठ पर दी गई तालिका में दिए गए आधुनिक राज्यों अथवा प्रदेशों के साथ मिलान कर सकते हैं?

हड़प्पाई नगर/हड़प्पा के नगर आधुनिक राज्य या प्रदेश
धौलावीरा पंजाब
हड़प्पा गुजरात
कालीबंगा सिंध
मोहनजो-दड़ो हरियाणा
राखीगढ़ी राजस्थान

सरस्वती नदी

मानचित्र (पृष्ठ 89 पर चित्र 6.3) में सिंधु और उसकी पाँच सहायक नदियों को दर्शाया गया है | मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे नगर इन नदियों के किनारे विकसित हुए | सरस्वती नदी, जिसे आज भारत में घग्गर और पाकिस्तान में हाकरा (अतः इसे घग्गर-हाकरा भी कहा जाता है) के नाम से जाना जाता है, के किनारे भी अनेक पुरास्थल मिले हैं | आज यह एक मौसमी नदी है जो मात्र वर्षा ऋतु के दौरान बहती है |

सरस्वती नदी का वर्णन सबसे पहले प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में मिलता है | इसके बारे में हम अध्याय 7 में पढ़ेंगे | ऋग्वेद में सरस्वती को एक देवी और पर्वत से निकलकर समुद्र तक बहने वाली एक नदी, दोनों रूपों में पूजा गया है | बाद के ग्रंथों में इस नदी के सूखने और अंततः लुप्त हो जाने का वर्णन मिलता है |

नगर-योजना

हड़प्पा और मोहनजोदड़ो (जो अब पाकिस्तान में है) इस सभ्यता के सबसे पहले दो नगर हैं जिनकी खोज लगभग एक शताब्दी पूर्व 1924 में की गई | सिंधु नदी के मैदानों में बहुत से पुरास्थल मिले हैं जिसके कारण इस सभ्यता को आरंभ में सिंधु घाटी की सभ्यता कहा गया |

बाद में, अन्य प्रमुख नगर जैसे धौलावीरा (गुजरात में), राखीगढ़ी (हरियाणा में), गँवेरीवाला (पाकिस्तान के चोलिस्तान मरुस्थल में) और सैकड़ों छोटे स्थलों (जैसे - गुजरात में लोथल) की खोज की गई एवं कुछ की खुदाई भी की गई | इस प्रकार की खोजें आज भी जारी हैं | यह रोचक है कि सरस्वती नदी की द्रोणी (बेसिन) में न

आइए विचार करें

आपने सिंधु घाटी सभ्यता के बारे में सुना होगा और आपने इस बात पर ध्यान दिया होगा कि हमने इसका प्रयोग नहीं किया है | मानचित्र पर दृष्टि डालें (पृष्ठ 89 पर चित्र 6.3) तो हम पाएँगे कि घाटी शब्द का अब इस्तेमाल नहीं करते हैं क्योंकि अब हम जानते हैं कि यह सभ्यता सिंधु क्षेत्र से बहुत आगे तक फैली हुई थी |

केवल दो महानगर - राखीगढ़ी और गवेरीवाला आते हैं, बल्कि छोटे-छोटे अनेक नगर (हरियाणा में फरमाना, राजस्थान में कालीबंगा) और कुछ अन्य नगर (हरियाणा के दो नगर भिर्राना और बनावली) भी आते हैं | निस्संदेह मानचित्र में (पृष्ठ 89 पर चित्र 6.3) दिए गए क्षेत्र में पुरास्थलों की सघनता स्पष्ट दिखती है |

अधिकांश हड़प्पा सभ्यता के नगर सुनियोजित योजना के अंतर्गत निर्मित किए गए थे | उन नगरों में चौड़ी सड़कें थी (पृष्ठ 92 पर चित्र 6.4 और 6.5) जो सामान्यतः चारों दिशाओं की ओर उन्मुख होती थीं | अधिकांश नगरों के चारों ओर किलेबंदी की गई मिलती है और नगर के दो विशिष्ट भाग मिलते हैं 'ऊपरी नगर', जहाँ संभवतः अभिजात वर्ग के लोग रहते थे और 'निचला नगर', जहाँ साधारण लोग रहते थे |

कुछ बड़े भवनों का उपयोग सामूहिक उद्देश्यों के लिए किया जाता था- उदाहरणार्थ गोदाम, जहाँ परिवहन किए जाने वाली वस्तुओं को रखा जाता था | सड़कों और गलियों में विभिन्न आकारों के निजी घर मिलते हैं | रोचक बात यह है कि बड़े और छोटे घरों के निर्माण की गुणवत्ता एक समान मिलती है | सामान्यतः उन भवनों के निर्माण में ईंटों का प्रयोग किया गया है |

कुछ संरचनाओं के निर्माण का उद्देश्य आज भी चर्चा का विषय हो सकता है | मोहनजो-दड़ो (पृष्ठ 93 पर चित्र 6.6) का प्रसिद्ध 'महास्नानागार' एक छोटा और विस्तृत स्नानागार है जिसका आकार 12×7 मीटर है | सबसे ऊपर जमायी गईं ईंटों पर जल रोधक सामग्री (जैसे - डामर के रूप में प्राकृतिक बिटुमन) की परत चढ़ाई गई है | स्नानागार के चारों ओर छोटे-छोटे कमरे मिलते हैं, उनमें से एक कमरे के अंदर कुआँ मिला है | समय-समय पर स्नानागार के पानी को खाली करने के लिए कोने में एक नाली भी है | इस स्नानागार को स्वच्छ पानी से समय-समय पर भरा जाता था |

किलेबंदी आम तौर पर सुरक्षात्मक उद्देश्यों से किसी बस्ती या नगर के चारों ओर बनाई गई एक विशाल दीवार |

अभिजात वर्ग यहाँ यह शब्द समाज के उच्च स्तर, जैसे- शासक, अधिकारी, प्रशासक और प्रायः पुरोहित या पुजारी को संदर्भित करता है |

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(ऊपर) चित्र 6.4— कालीबंगा (राजस्थान) के निचले नगर में एक चौड़ी सड़क


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चित्र 6.5— धौलावीरा के मध्य नगर के आवासीय क्षेत्र की लंबवत गलियाँ या सड़कें (धौलावीरा में तीन अलग-अलग क्षेत्र थे, न कि अन्य नगरों की तरह दो क्षेत्र) | इस नगर में अधिकांश भवनों की नींव पत्थरों से बनाई गई थी |

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चित्र 6.6— मोहनजो-दड़ो का महास्नानागार

इसके निर्माण का उद्देश्य क्या रहा होगा? पुरातत्ववेत्ताओं ने अनेक संभावित व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं- सार्वजनिक स्नान के लिए स्नानागार, केवल राजसी परिवार के लिए स्नानागार, धार्मिक कार्यों के लिए प्रयोग होने वाला स्नानागार | हालाँकि पहली व्याख्या अब स्वीकार्य नहीं है क्योंकि यह पाया गया है कि इस नगर के अधिकांश घरों में स्नानागार बने हुए थे |

आइए पता लगाएँ

अंतिम दो व्याख्याओं के बारे में कक्षा में चर्चा कीजिए | क्या आप कोई अन्य व्याख्या सोच सकते हैं? ध्यान दीजिए कि इस विषय में हमारे पास इतिहास के अन्य स्रोत नहीं हैं, जैसे न कोई शिलालेख, न कोई ग्रंथ और न ही किसी यात्री का विवरण |


जल प्रबंधन

हड़प्पावासी जल प्रबंधन और स्वच्छता को बहुत महत्व देते थे | उनके घरों में स्नान के लिए अलग स्नानागार हुआ करते थे | ये नगर जल-निकास प्रणाली (चित्र 6.7) से जुड़े हुए थे, जो साधारणतः सड़कों के नीचे होती थीं जिनमें अपशिष्ट जल बहता था |

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चित्र 6.7— लोथल (गुजरात) में जल-निकास प्रणाली

मोहनजो दड़ो में लोग ईंटों से बनाए कुंओं से पानी निकाला करते थे | किंतु अन्य क्षेत्रों में तालाब, पास के झरनों अथवा मानव निर्मित जलाशयों से पानी लेते होंगे | धौलावीरा में (गुजरात में कच्छ के रन में) 73 मीटर लंबा सबसे बड़ा जलाशय मिला है |

जलाशय विशाल प्राकृतिक या कृत्रिम स्थान, जहाँ जल का भंडारण किया जाता है |

आइए पता लगाएँ

कक्षा की एक गतिविधि के रूप में किसी फीते (इंच टेप) से अपनी कक्षा, विद्यालय के गलियारे या खेल के मैदान की लंबाई मायें | इस लंबाई की तुलना धौलावीरा के सबसे विशाल जलाशय की लंबाई से कीजिए |

धौलावीरा में पत्थरों और यहाँ तक कि चट्टान को काटकर (चित्र 6.8 कम से कम छह विशाल जलाशयों का निर्माण किया गया था | इनमें से अधिकांश को कुशल जल संचयन और वितरण के लिए भूमिगत नालियों से जोड़ा गया था |

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चित्र 6.8— धौलावीरा में चट्टान को काटकर बनाया गया 33 मीटर लंबा विशाल जलाशय

आइए विचार करे

जलाशयों के इस प्रकार के निर्माण के लिए आवश्यक श्रमिकों की बड़ी संख्या के बारे में सोचिए | आपके विचार से उनके कार्य को सुनियोजित करने के लिए निश्चित निर्देश किसने दिए होंगे? आपके विचार में उन्हें उनकी मजदूरी के लिए भुगतान कैसे किया गया होगा? (संकेत- उस समय आज की तरह मुद्रा का प्रचलन नहीं था) | चूँकि समय-समय पर जलाशयों की सफाई करना आवश्यक था, इसलिए क्या उनके रख-रखाव के लिए कोई स्थानीय प्राधिकारी थे? इस नगर के शासक और नगर प्रशासन के बारे में इससे हमें क्या संकेत मिलते हैं?

कल्पना कीजिए और अपने शिक्षक के साथ चर्चा कीजिए | पुरातत्ववेत्ता भी इन प्रश्नों के बारे में चर्चा करते हैं और उनके उत्तर सदैव निर्णायक नहीं होते!

हड़प्पावासी क्या खाते थे?

हड़प्पावासियों ने अपनी अनेक बस्तियाँ बड़ी और छोटी नदियों के किनारे बसाई थीं | यह सिर्फ जल स्रोतों तक आसानी से पहुँचने के लिए ही नहीं, बल्कि कृषि की दृष्टि से भी एक औचित्यपूर्ण विकल्प रहा होगा क्योंकि नदियाँ अपने आस-पास की भूमि को उपजाऊ बनाती हैं | पुरातात्विक खोजें यह दर्शाती हैं कि हड़प्पावासी दलहन और अनेक किस्म की सब्जियों के अतिरिक्त जौ, गेहूँ, कुछ मोटे अनाज, बाजरा और कभी-कभी धान जैसे अनाज की खेती करते थे | यूरेशिया में कपास उगाने में भी वे सर्वप्रथम थे, जिसका उपयोग वे कपड़ा बुनने में किया करते थे | उन्होंने हल सहित खेती के कई उपकरण बनाए (चित्र 6.9), जिनमें से कुछ का उपयोग आधुनिक समय में भी किसानों द्वारा किया जाता है |

दलहन  फसलों की श्रेणी, जिसमें सेम, मटर के दाने और दालें स‍म्‍म‍िलित हैं |

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चित्र 6.9— मिट्टी से निर्मित हल का लघुप्रतिरूप (हरियाणा में बनावली से प्राप्त)

यह गहन कृषि गतिविधि सैकड़ों छोटे ग्रामीण स्थलों अथवा गाँवों द्वारा संचालित की जाती थी | अभी की तरह तब भी ग्रामीण क्षेत्रों से पर्याप्त कृषि उपज प्रतिदिन उपलब्ध होने पर ही नगर जीवित रह सकते थे

हड़प्पावासियों ने मांस के सेवन के लिए अनेक पशुओं को पाला और मछलियों के लिए वे नदियों एवं समुद्रों पर निर्भर रहते थे | खुदाई में बड़ी संख्या में पाई गई पशुओं की हड्डियों और मत्स्य जीवाश्म से इसका पता चलता है |

हड़प्पावासियों के खाना पकाने के पात्रों में क्या होता था? मिट्टी के पात्रों की वैज्ञानिक जाँच से कुछ प्रश्नों के उत्तर मिलते हैं, जिसमें प्रत्याशित (दुग्ध उत्पाद) और अप्रत्याशित (जैसे- हल्दी, अदरक और केले) दोनों प्रकार के अवशेष हैं | स्पष्ट है कि उनके भोजन में बहुत विविधता थी |

आइए पता लगाएँ

मान लीजिए कि आप हड़प्पा के एक घर में खाना पकाते हैं | आप ऊपर दी गई जानकारी के आधार पर कौन-से व्यंजन बनाएँगे?

सक्रिय व्यापार

हड़प्पावासी न केवल अपनी सभ्यता (आस-पास या बहुत दूर के अन्य नगरों) में, बल्कि भारत के भीतर और बाहर की अन्य सभ्यताओं और संस्कृतियों के साथ भी सक्रिय रूप से व्यापार किया करते थे | उन्होंने आभूषणों, लकड़ी, दैनिक उपयोग की कुछ वस्तुओं (पृष्ठ 98 पर चित्र 6.11), संभवतः सोने एवं कपास और कुछ खाद्य वस्तुओं का निर्यात किया | उनके सर्वाधिक प्रिय आभूषण कार्नेलियन के मोती (पृष्ठ 98 पर चित्र 6.10) थे, जो अधिकतर गुजरात में पाए जाने वाले लाल रंग के अल्प मूल्यवान पत्थर होते थे | हड़प्पा के कारीगरों ने उनमें छेद करने की तकनीक भी विकसित की थी ताकि धागे को डालकर उन्हें तरह-तरह से सजाया जा सके | उन्होंने शंखों से बहुत सुंदर चूड़ियाँ भी बनाईं | चूँकि शंख का खोल सख्त होता है, अतः उन चूड़ियों को बनाने के लिए परिष्कृत तकनीक की आवश्यकता भी होती होगी |

यह स्पष्ट नहीं है कि हड़प्पावासियों ने निर्यातित वस्तुओं के बदले में किस वस्तु का आयात किया | संभवतः यह तांबा हो सकता है क्योंकि यह धातु सामान्यतः उनके पास बहुतायत में उपलब्ध नहीं थी |

आइए पता लगाएँ

हड़प्पावासी मुलायम धातु तांबे की कलाकारी में कुशल थे | तांबे में टिन मिलाने पर कांस्य धातु बन जाती है, जो तांबे की तुलना में कठोर होती है | हड़प्पावासियों ने उपकरण तथा बर्तन बनाने में कांसे का उपयोग किया | बाद में हम इसकी बनी कुछ छोटी प्रतिमाएँ देखेंगे |

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चित्र 6.10- सूसा (वर्तमान ईरान) में खुदाई में प्राप्त कार्नेलियन मनके |

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चित्र 6.11- हड़प्पा का हाथी दाँत का कंघा जो ओमान के तट पर पाया गया (लगभग 7 सेमी. लंबा)

उन्होंने इस तरह के व्यापार को संचालित करने के लिए स्थल मार्ग एवं नदियों तथा अधिक दूरवर्ती गंतव्यों के लिए समुद्री रास्तों का उपयोग किया | यह भारत की प्रथम गहन समुद्री गतिविधि थी | वास्तव में गुजरात और सिंध के तटवर्ती क्षेत्रों में कई हड़प्पाई बस्तियाँ स्थित हैं | गुजरात में स्थित एक लघु बस्ती लोथल में आश्चर्यजनक रूप से 217 मीटर लंबाई और 36 मीटर चौड़ाई का एक विशाल बेसिन पाया गया है इसकी लंबाई फुटबॉल के दो मैदानों से थोड़ी अधिक है | इस बेसिन में बंदरगाह जैसी संरचना अवश्य रही होगी, जिसका इस्तेमाल नावों के माध्यम से वस्तुओं के आयात और निर्यात के लिए किया जाता होगा |

इस प्रकार के व्यापक स्तर के व्यापार में यह आवश्यक था कि व्यापारी अपने सामान को और एक-दूसरे को पहचानें! अनेक बस्तियों की खुदाई में मिलीं हजारों की संख्या में छोटी मुहरों का मुख्य उपयोग यही रहा होगा | ये मोहरें एक मुलायम पत्थर स्टीऐटाइट की बनी थीं जिन्हें गरम कर कठोर बनाया जाता था | इनका माप केवल कुछ

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चित्र 6.12 - लोथल में विशाल बंदरगाह

सेंटीमीटर है | सामान्यतः इनके ऊपर जानवरों के चित्र बनाए गए हैं, किंतु इन पर लेखन प्रणाली के कुछ संकेत भी मिलते हैं | इस लेखन प्रणाली और पशुओं के चित्रों के प्रतीकों के अर्थ को अभी समझा जाना बाकी है, पर यह निश्चित है कि ये किसी प्रकार के व्यापार की गतिविधियों से संबंधित हैं |

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चित्र 6.13.1, 6.13.2, 6.13.3- (बाएँ से दाएँ) एकश्रृंगी पशु, बैल, सींग वाले बाघ को दर्शाती हड़प्पा की कुछ मुहरें)

आइए पता लगाएँ

कुछ लेखन संकेतों के साथ हड़प्पा की इन तीन मुहरों को देखते हुए आपके मन में क्या विचार आता है? क्या आप इनकी कोई व्याख्या देना चाहेंगे? अपनी कल्पनाशक्ति का उपयोग कीजिए |

प्राचीन जीवन

पुरातत्ववेत्ता हड़प्पावासियों द्वारा निर्मित और उपयोग की गई अनेक वस्तुओं को सामने लेकर आए हैं |


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चित्र 6.14.1 (ऊपर), 6.14.2 (दाएँ) - एक कांस्य दर्पण, एक पकी मिट्टी (टेराकोटा) का पात्र (दोनों धौलावीरा से प्राप्त)

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चित्र 6.14.3 (ऊपर), 6.14.4 (दाएँ) - भार तौलने के कुछ पत्थर, एक कांस्य छैनी (दोनों धौलावीरा से प्राप्त)

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चित्र 6.14.5.6.14.6-25 से.मी. की लंबाई वाले एक पत्थर पर उकेरा गया खेल-बोर्ड (धोलावीरा से प्राप्त) | लगभग 4 से.मी. लंबी मिट्टी की सीटी (करनपुरा, राजस्थान से प्राप्त) | हड़प्पावासियों ने वयस्कों और बच्चों, दोनों के मनोरंजन के लिए अनेक खेल तैयार किए |

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चित्र 6.15.1. 6.15.2, 6.15.3- एक छोटी मूर्ति जिसे प्रायः पुरोहित राजा' कहा जाता है (यद्यपि यह मालूम नहीं है कि यह प्रतिमा किसकी है), स्वास्तिक दर्शाती हुई मुहर, शक्तिशाली पशुओं से घिरे ऊँचे स्थान पर बैठे त्रिमुखी देवता को दर्शाती मुहर

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चित्र 6.15.4, 6.15.5, 6.15.6- मोहनजोदड़ो से प्राप्त नर्तकी' की एक लघु कांस्य प्रतिमा (यह 10.8 से.मी. ऊँची है): नमस्ते की मुद्रा में बैठी एक पकी मिट्टी (टेराकोटा) की मूर्तिः एक पात्र पर प्यासे कौए की कहानी को दर्शाता चित्रण, जिसमें वह पात्र के निचले हिस्से से जल को पीने के लिए एक चतुर तरीका निकालता है (लोबल से प्राप्त) |

आइए विचार करें

  • पृष्ठ 100 और लो पर दर्शाई गई वस्तुओं या इस अध्याय में चित्रित अन्य वस्तुओं को देखते हुए क्या आप उन गतिविधियों और जीवन के पक्षों का पता लगा सकते हैं, जो हड़प्पावासियों के लिए महत्वपूर्ण थे?

  • आइए पता लगाएँ

    • लोथल के पात्र पर दर्शाई गई कहानी को पूरा कीजिए | आपके विचार से इस कहानी को 4,000 से अधिक वर्षों से क्यों याद किया जाता रहा?
    • 'नर्तकी' की लघु प्रतिमा पर विचार कीजिए | इस लघु प्रतिमा की भाव-भंगिमा से आप क्या समझते हैं? पूरी बाँह को ढकने वाली उसकी उन चूड़ियों को ध्यान से देखिए, जो गुजरात और राजस्थान के क्षेत्रों में अभी भी महिलाएँ पहनती हैं | इस अध्याय में आपने और कहाँ पर इस तरह से चूड़ियाँ पहनने को चिह्नित किया है | इससे हमें क्या निष्कर्ष निकालना चाहिए?

    अंत अथवा नई शुरुआत?

    1900 सा.सं.पू. के आस-पास इस सिंधु-सरस्वती सभ्यता की सभी उपलब्धियों के बावजूद उसका हास हो गया | इसके नगर एक के बाद एक खाली होते गए | यदि कोई निवासी वहाँ रहे भी, तो उन्होंने परिवर्तित वातावरण में ग्रामीण जीवन-शैली को अपनाया | ऐसा प्रतीत होता है कि पूर्ववर्ती सरकार या प्रशासन अब विद्यमान नहीं रहा | धीरे-धीरे हड़प्पावासी हजारों नहीं तो सैकड़ों की संख्या में छोटी-छोटी बस्तियों के रूप में बिखर गए |

    आइए विचार करें

    हड़प्पावासी ग्रामीण बस्तियों में लौट गए क्योंकि किसी नगरीय जीवन-शैली की तुलना में ग्रामीण जीवन-शैली भोजन और जल तक सहज पहुँच प्रदान करती है | तब से लेकर अब तक नगर भोजन और कभी-कभी जल आपूर्ति के लिए गाँवों पर निर्भर रहते हैं |

    इस सभ्यता के पतन के क्या कारण थे? पुरातत्ववेत्ताओं ने इसके अनेक कारण बताए हैं | बहुत समय पहले यह सोचा गया कि युद्ध या आक्रमण ने इन नगरों का विध्वंस किया होगा, लेकिन युद्ध या आक्रमण के कोई निशान नहीं मिलते | जहाँ तक प्रमाणों की बात है, हड़प्पावासियों ने वास्तव में कभी भी कोई सेना या युद्ध के हथियार नहीं रखे | यह अपेक्षाकृत एक शांतिपूर्ण सभ्यता प्रतीत होती है |

    वर्तमान में दो कारणों पर सहमति है | पहला, 2200 सा.सं.पू. से विश्व को अत्यधिक प्रभावित करने वाले जलवायु संबंधी परिवर्तनों से वर्षा में कमी और शुष्कता की स्थिति उत्पन्न हुई | इसने कृषि कार्य को अधिक कठिन बनाया होगा और नगरों की ओर खाद्य आपूर्ति में कमी आई होगी | दूसरा, सरस्वती नदी का मध्य बेसिन सूख गया; वहाँ कालीबंगा और बनावली जैसे नगर अचानक छोड़ दिए गए | इसमें अन्य कारण भी रहे होंगे, लेकिन ये दो कारण हमें याद दिलाते हैं कि हम अपने कल्याण के लिए अपनी जलवायु और पर्यावरण पर कितने निर्भर हैं |

    यद्यपि नगर लुप्त हो गए, लेकिन हड़प्पा की संस्कृति एवं प्रौद्योगिकी अधिकांशतः बची रही और यह भारतीय सभ्यता के अगले चरण में पहुँच गई, जिसके बारे में हम अगले अध्याय में पता करेंगे |

    आगे बढ़ने से पहले ...

    • सिंधु, हड़प्पा या सिंधु-सरस्वती सभ्यता विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है | हड़प्पावासिर्या ने कुशल जल प्रबंधन, विविध शिल्पों और सक्रिय व्यापार के साथ सुनियोजित नगरों का निर्माण किया |
    • उपजाऊ कृषि से नगरों को विभिन्न प्रकार की फसलें प्राप्त हुई |
    • इस सभ्यता का जलवायु संबंधी और पर्यावरणीय परिवर्तनों के कारण अंततः हास हो गया; लोग ग्रामीण जीवन-शैली की ओर लौट गए |

    प्रश्न, क्रियाकलाप और परियोजनाएँ

    1. इस अध्याय में अध्ययन की गई सभ्यता के अनेक नाम क्यों हैं? इनके महत्वं पर चर्चा कीजिए |
    2. सिंधु-सरस्वती सभ्यता की उपलब्धियों का सार देते हुए संक्षिप्त रिपोर्ट (150 से 200 शब्द) लिखिए |
    3. कल्पना कीजिए कि आपको हड़प्पा से कालीबंगा तक यात्रा करनी है | आपके पास विभिन्न विकल्प क्या हैं? क्या आप प्रत्येक विकल्प में लगने वाले समय का अनुमान लगा सकते हैं?
    4. कल्पना कीजिए कि यदि हड़प्पा के किसी पुरुष या महिला को हम आज के भारत के सामान्य रसोईघर में ले आते हैं, तो उन्हें सबसे बड़े चार या पाँच आश्चर्य क्या लगेंगे?
    5. इस अध्याय के सभी चित्रों पर दृष्टि डालते हुए उन आभूषणों/हाव-भावों/ वस्तुओं की सूची बनाइए, जो अभी भी 21 वीं शताब्दी में परिचित प्रतीत होती हैं |
    6. धोलावीरा के जलाशयों की प्रणाली क्या सोच प्रतिबिंबित करती है?
    7. मोहनजो दड़ो में ईंटों से निर्मित 700 कुओं की गणना की गई है | ऐसा लगता है कि उनका नियमित रूप से रख-रखाव किया जाता रहा और अनेक शताब्दियों तक उनका उपयोग किया जाता रहा | निहितार्थों पर चर्चा कीजिए |
    8. सामान्यतः यह कहा जाता है कि हड़प्पावासियों में नागरिकता का उच्च भाव था | इस कथन के महत्व पर चर्चा कीजिए | क्या आप इससे सहमत हैं? वर्तमान भारत के महानगरों के नागरिकों के साथ इसकी तुलना कीजिए |