अध्याय 7
भारत की सांस्कृतिक जड़ें
" वह जिसे चुराया नहीं जा सकता; जिसे कोई शासक छीन नहीं सकता; ...जो बोझ नहीं है क्योंकि इसका अपना कोई भार न नहीं है; जिसका उपयोग करने से हर दिन इसमें वृद्धि ही होती है- यह सबसे बड़ी संपत्ति है, सच्चे ज्ञान की संपत्ति | "
- सुभाषित (नीतिशतक)

एक ऋषि (हम्पी, कर्नाटक) | बुद्ध (भूटान) | महावीर (बिहार)

महत्वपूर्ण प्रश्न ?
- वेद क्या हैं? इनका संदेश क्या है?
- प्रथम सहस्त्राब्दी सा.सं.पू. में भारत में कौन-कौन से नए दर्शन/मत उभरे? इनके मूल सिद्धांत क्या हैं?
- लोक और जनजातीय परंपराओं का भारतीय संस्कृति में क्या योगदान रहा है?
भारतीय संस्कृति, किसी भी अनुमान के अनुसार अनेक सहस्त्राब्दियों वर्ष पुरानी है | किसी प्राचीन वृक्ष के समान इसमें अनेक जड़ें और अनेक शाखाएँ हैं | जड़ें एक सामान्य = तने को पोषण देती हैं | इस तने से अनेक शाखाएँ निकलती हैं, जो भारतीय संस्कृति के विभिन्न पहलुओं को दर्शाती हैं, हालाँकि ये एक सामान्य तने से जुड़ी हुई हैं |
इसमें से कुछ शाखाएँ कला, साहित्य, विज्ञान, चिकित्सा, धर्म, शासन पद्धति, मार्शल आर्ट्स (युद्ध कलाएँ) आदि हैं | कुछ ऐसे दर्शन भी हैं जिनसे हमारा तात्पर्य उन विचारकों के समूह या आध्यात्मिक साधकों से है जो मानव जीवन, विश्व आदि के बारे में समान विचार रखते हैं |
अनेक पुरातत्व विज्ञानियों तथा विद्वानों ने बताया है कि भारतीय संस्कृति की कुछ जड़ें सिंधु या हड़प्पा अथवा सिंधु-सरस्वती सभ्यता की ओर जाती हैं (जिन्हें हम अध्याय 6 में पढ़ चुके हैं) | आगे चलकर समय बीतने के साथ भारत में सैकड़ों प्रकार के जीवन दर्शन उभरे | हम यहाँ ऐसे कुछ प्रारंभिक दर्शनों के बारे में बात करेंगे जिन्होंने भारत को एक विशिष्ट व्यक्तित्व वाले देश के रूप में आकार दिया है | इन्हें तथा इनकी जड़ों को समझकर ही हम 'इंडिया अर्थात भारत' को भलीभाँति समझ सकेंगे |
आध्यात्मिक आत्मा से संबंधित (संस्कृत तथा अनेक भारतीय भाषाओं में) | आध्यात्मिकता हमारे वर्तमान व्यक्तित्व से परे एक गहरे या ऊँचे आयाम की खोज है |
साधक ऐसा व्यक्ति जो इस दुनिया के सत्य को जानना चाहता है | यह एक ऋषि, संत, योगी, दार्शनिक आदि हो सकता है |
(क) वेद क्या हैं ?
वेद शब्द विद् से आया है जिसका अर्थ है 'ज्ञान' (उदाहरण के लिए, विद्या) | हमने पिछले अध्यायों में ऋग्वेद का उल्लेख किया है | वास्तव में चार वेद हैं- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद | ये भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं और वस्तुतः विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथों में से एक हैं |
वेदों में हजारों ऋचाएँ (कविताओं और गीतों के रूप में प्रार्थनाएँ) हैं | ये लिखित रूप में नहीं थीं, अपितु इनका मौखिक पाठ किया जाता था | ये ऋचाएँ सप्तसिंधु क्षेत्र में रची गईं (जिनके बारे में हम अध्याय 5 में पढ़ चुके हैं) | यह कहना कठिन है कि इन चारों ग्रंथों में से प्राचीनतम ग्रंथ ऋऋग्वेद की रचना कब हुई | विशेषज्ञों ने इनकी रचना पाँचवीं से दूसरी सहस्त्राब्दी सा.सं.पू. के बीच किए जाने का प्रस्ताव किया है | इस प्रकार यह ग्रंथ 100 से 200 पीढ़ियों तक गहन प्रशिक्षण के माध्यम से स्मृतिबद्ध किए गए एवं मौखिक रूप से बिना किसी विशेष परिवर्तन के आगे संप्रेषित किए गए |
ध्यान रखें
हजारों वर्षों से किए गए वैदिक पाठशेली के इस सुव्यवस्थित संप्रेषण को 2008 में यूनेस्को ने 'मानवीयता के मौखिक और अमूर्त विरासत की अनुपम कोटि' के रूप में मान्यता दी |
वैदिक ऋचाओं की रचना ऋषियों (कवि) और ऋषिकाओं (कवियत्रियाँ) द्वारा संस्कृत भाषा के एक प्रारंभिक रूप में की गई थी | यह ऋचाएँ अनेक देवों (देवताओं और देवियों) जैसे - इंद्र, अग्नि, वरुण, मित्र, सरस्वती, उषा और अन्य को काव्यात्मक रूप से संबोधित करती थीं | इन दृष्टाओं के साथ मिलकर देवों ने मानव जीवन और ब्रह्मांड में ऋत या सत्य और क्रम को बनाए रखा |
आद्य ऋषियों और ऋषिकाओं ने देवताओं और देवियों को अलग नहीं, बल्कि एक ही माना | जैसा कि एक प्रसिद्ध ऋचा में कहा गया है-
एकम् सत् विप्रा बहुधा वदन्ति...
अर्थात, परम सत्य एक ही है,
किंतु मनीषी इसे अनेक नाम देते हैं |
इस वैश्विक दर्शन में कुछ मान्यताएँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण थीं जो 'सत्य' से आरंभ हुई, जो ईश्वर का दूसरा नाम था | ऋग्वेद के अंतिम मंत्रों में लोगों के बीच एकता का भी आह्वान किया गया |
यूनेस्को यूनेस्को का पूरा नाम संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन है | यह संगठन शिक्षा, विज्ञान और संस्कृति के माध्यम से लोगों और राष्ट्रों के बीच संवाद को बढ़ावा देता है |
ब्रह्मांड विश्व या ब्रह्मांड की सुव्यवस्थित और संतुलित संरचना |
वैश्विक दर्शन विश्व का एक निश्चित दर्शन या समझ, इसका उद्भव या इसकी कार्य प्रणाली |
साथ मिलकर चलें, साथ मिलकर बोलें,
एक हो हमारा मन, हमारे विचार मिलें...
एक हो हमारा उद्देश्य,एक हो हमारा हृदय...
हमारे विचार एक हों, अत: सभी सहमत हों |
(ख) वैदिक समाज
प्रारंभिक वैदिक समाज विभिन्न जनों (अर्थात, लोगों का बड़ा समूह) में संगठित था | ऋग्वेद में ही ऐसे 30 से अधिक जनों की सूची दी गई है, उदाहरणार्थ- भरत, पुरु, कुरु, यदु, तुर्वश आदि | प्रत्येक जन उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी भाग के एक विशेष क्षेत्र के साथ जुड़ा था |

वैदिक ग्रंथों में अनेक व्यवसायों का उल्लेख है, जैसे किसान, बुनकर, कुम्हार, शिल्पकार, बढ़ई, आरोग्यकर्ता, नर्तक-नर्तकी, नाई, पुजारी आदि |
आरोग्यकर्ता राहत देने या रोग ठीक करने के लिए पारंपरिक प्रथाओं का उपयोग करने वाला व्यक्ति
आइए पता लगाएँ
क्या आप जानते हैं कि उस समाज को क्या कहते हैं, जहाँ लोग अपने नेता का चयन करते हैं? आपके विचार से लोगों को ऐसी स्थिति से कैसे लाभ होता है? यदि वे अपने द्वारा नहीं चुने गए नेता के अधीन रहते हैं तो क्या हो सकता है? (संकेत- 'शासन और लोकतंत्र' विषय में आपने जो पहले पढ़ा है, उस पर विचार कीजिए) अपने विचार 100-150 शब्दों में लिखिए |
(ग) वैदिक दर्शन
वैदिक संस्कृति में अनेक अनुष्ठान (यज्ञ आदि) विकसित हुए जो विभिन्न देवों (देवी-देवताओं) के प्रति व्यक्तिगत अथवा सामूहिक हितों तथा मंगल के लिए समर्पित या निर्देशित थे | दैनिक अनुष्ठान सामान्य रूप से प्रार्थनाओं तथा अग्नि देव (अग्नि से संबंधित देव) को आहुति और प्रार्थना के रूप में होते थे, किंतु ये अनुष्ठान समय के साथ और अधिक जटिल होते चले गए |
*उपनिषद् वैदिक संकल्पनाओं के आधार पर रचित हैं तथा इनमें कुछ नई संकल्पनाएँ प्राप्त होती हैं, जैसे कि पुनर्जन्म (बार-बार जन्म लेना) और कर्म (हमारे कर्म और कर्म-फल) | एक दर्शन, जिसे सामान्यतः 'वेदांत' के नाम से जाना जाता है, के अनुसार सब कुछ - मानव जीवन, प्रकृति और ब्रह्मांड - एक दैवी तत्व है, जिसे 'ब्रह्म' (यह ब्रह्मा देव से भिन्न है) अथवा कभी-कभी केवल 'तत्' कहा जाता है | दो प्रसिद्ध मंत्रों में इसे सरलता, किंतु गहराई से व्यक्त किया गया है-
अहम् ब्रह्मास्मि
"मैं ब्रह्म हूँ" (अर्थात, मैं दिव्य हूँ)
तत् त्वम् असि...
"वह ब्रह्म आप ही हैं""
आइए विचार करें
क्या आपने इस महत्वपूर्ण संदेश को प्रदान करने वाली कोई अन्य कहानी सुनी या पढ़ी है? उनसे आपको किन मूल्यों की शिक्षा मिली?
प्रथम सहस्त्राब्दी सा.सं.पू. के आरंभ में वेदों से कुछ अन्य दर्शनों का विकास हुआ | इनमें से एक था - योग, जिसने किसी व्यक्ति की चेतना में ब्रह्म का आत्म-बोध प्राप्त करने के उद्देश्य से अनेक विधियाँ विकसित की | इन सभी दर्शनों से मिलकर कुछ आधारभूत विचार बने, जिन्हें हम आज 'हिंदू दर्शन' कहते हैं |
बौद्ध मत
कुछ अन्य दर्शनों का भी अविर्भाव हुआ, जिन्होंने वेदों की प्रभुता को नहीं स्वीकार किया और अपनी स्वयं की पद्धति विकसित की | उनमें से एक बौद्ध मत है |
लगभग ढाई सहस्त्राब्दी पूर्व राजकुमार सिद्धार्थ गौतम ने लुंबिनी (वर्तमान नेपाल में) में जन्म लिया | उनके जन्म के समय के विषय में विद्वानों में सर्वसम्मति नहीं है | अध्याय 4 में हमने 560 सा.सं.पू. को उनका अनुमानित जन्म वर्ष माना है | इससे हमारी यह कहानी आगे किसी भी प्रकार प्रभावित नहीं होगी |
कथा के अनुसार, सिद्धार्थ गौतम राजमहल में एक सुरक्षित वातावरण में बड़े हुए | एक दिन, 29 वर्ष की आयु में उन्होंने रथ पर बैठकर नगर में घूमने की इच्छा प्रकट की और उस समय उन्होंने अपने जीवन में पहली बार एक वृद्ध, एक रोगी, और एक शव को देखा | उन्होंने एक संन्यासी को भी देखा, जो प्रसन्न और शांत लग रहा था | इन सब का अनुभव करने के बाद सिद्धार्थ ने अपने राजसी जीवन, अपनी पत्नी और बेटे को त्यागने का विचार किया | एक संन्यासी की तरह पैदल चलते हुए और अन्य संन्यासियों तथा विद्वानों से मिलते हुए उन्होंने मानव जीवन में दुखों के मूल कारण को खोजा | बोधगया (वर्तमान बिहार) में एक पीपल के वृक्ष के नीचे कई दिनों तक ध्यानरत रहने के बाद उन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ |
चेतना जागृत होने का गुण या अवस्था, उदाहरण के लिए व्यक्ति को स्वयं की चेतना होना |
संन्यासी वह व्यक्ति जो चेतना का उच्चतर स्तर प्राप्त करने के लिए कठोर अनुशासन में रहता है |
उपनिषदों की कई कथाओं से हमें प्रश्न पूछने के महत्व का पता चलता है | फिर चाहे ये प्रश्न किसी महिला, पुरुष या बच्चे ने पूछे हों |

श्वेतकेतु और यथार्थबोध का बीज (छांदोग्य उपनिषद्)
ऋषि उद्दालक आरुणि ने अपने पुत्र श्वेतकेतु को वेदों के अध्ययन के लिए गुरुकुल भेजा | जब 12 वर्ष बाद श्वेतकेतु वापस आया, तो उसके पिता ने यह अनुभव किया कि वह अपने ज्ञान के कारण बहुत अहंकारी हो गया है | इसलिए उद्दालक ने ब्रह्म के स्वरूप पर उसके ज्ञान का परीक्षण करने के लिए प्रश्न पूछे जिनका उत्तर श्वेतकेतु नहीं दे सका |
उद्दालक ने उसे समझाया कि किस प्रकार ब्रह्म अदृश्य रहते हुए भी सर्वव्यापी है, जैसे बरगद के फल का बीज खोलने पर रिक्त (खाली) दिखाई देता है, किंतु इसमें बरगद के वृक्ष का भावी रूप निहित होता है अथवा जैसे एक ही प्रकार की मिट्टी से अलग-अलग प्रकार के बर्तन बनाए जा सकते हैं, उसी प्रकार हमारे चारों ओर जो कुछ भी है, एक ही तत्व - ब्रह्म से उसका उद्भव हुआ है | उन्होंने अपनी सीख यह कहकर समाप्त की, "सभी में यही सूक्ष्म तत्व व्याप्त है... तुम वही हो, श्वेतकेतु |"
नचिकेता और उसकी ज्ञान पिपासा (कठोपनिषद्)
एक बार, एक व्यक्ति यज्ञ के समय अपनी समस्त संपत्ति का दान दे रहे थे | उनके पुत्र नचिकेता ने उनसे पूछा कि वे उसे किस देवता को अर्पित करेंगे? नचिकेता द्वारा चार-बार यही प्रश्न पूछने पर पिता क्रोध में आ गए और उत्तर दिया, "मैं तुम्हें यम अर्थात मृत्यु के देवता को अर्पित करता हूँ |"

इसके बाद, नचिकेता यमलोक की ओर निकल पड़े | लंबी प्रतीक्षा के बाद वे अति शक्तिमान देव से मिले | उनके मन में एक प्रश्न था, "शरीर की मृत्यु के बाद क्या होता है |" यम ने पहले तो बालक के प्रश्न का उत्तर टालने का प्रयास किया, किंतु नचिकेता के निरंतर आग्रह करते रहने पर अंततः यम देव ने प्रसन्न होकर उन्हें आत्मा के बारे में समझाया जो सभी जीवों में निहित है | इसका न तो जन्म होता है और न ही मृत्यु होती है; यह अमर है | इस गहन ज्ञान की प्राप्ति के बाद नचिकेता अपने पिता के पास वापस आए जिन्होंने उल्लासपूर्वक उसका स्वागत किया |
गार्गी और याज्ञवल्क्य का शास्त्रार्थ (बृहदारण्यक उपनिषद्)

एक बार विद्वान राजा जनक ने एक दार्शनिक शास्त्रार्थ के विजेता को पुरस्कार देने की घोषणा की | याज्ञवल्क्य नामक सुप्रसिद्ध ऋषि राजदरबार में आए और गार्गी (एक ऋषिका) के प्रश्न पूछने से पहले तक अनेक विद्वानों को पराजित किया | इसके बाद गार्गी ने विश्व के स्वरूप पर याज्ञवल्क्य से अनेक प्रश्न पूछे और अंत में ब्रह्म के स्वरूप पर भी प्रश्न पूछे | तब याज्ञवल्क्य ने उन्हें आगे प्रश्न पूछने से मना किया | हालाँकि कुछ समय बाद गार्गी ने पुनः प्रश्न पूछा, तब याज्ञवल्क्य ने समझाया कि कैसे ब्रह्म ही संसार, ऋतुओं, नदियों तथा अन्य सभी चीजों का निर्माण करता है |
उन्होंने अनुभव किया कि 'अविद्या' और 'मोह' मानवीय कष्ट के स्रोत हैं और इन दोनों कारणों को दूर करने की विधि संकल्पित की | इसके बाद सिद्धार्थ बुद्ध के नाम से जाने गए जिसका अर्थ है- 'ज्ञानी' या 'जागृत' व्यक्ति |
बुद्ध ने जो ज्ञान प्राप्त किया, उसका उपदेश देना आरंभ किया | उनके उपदेशों में 'अहिंसा' का विचार निहित है, जिसका मूल अर्थ है- चोट नहीं पहुँचाना या नुकसान नहीं पहुँचाना | उन्होंने निष्ठापूर्वक आंतरिक अनुशासन पर भी बल दिया | उनकी कही गई निम्न बातों में इसे सरल तरीके से समझाया गया है |

बुद्ध ने संघ की स्थापना की, जो भिक्षुओं (आगे चलकर भिक्षुणियों) का एक समुदाय है जिन्होंने स्वयं को बुद्ध के उपदेशों के पालन और प्रसार के लिए समर्पित कर दिया है | भारत और पूरे एशिया पर उनका गहरा प्रभाव था जिसे हम आगे पढ़ेंगे | यह प्रभाव आज भी अनुभव किया जा सकता है |
मोह किसी व्यक्ति या वस्तु के साथ संबंध की स्थिति, सामान्य रूप से भावना या आदत के माध्यम से |
भिक्षु एक ऐसा व्यक्ति जो दुनिया के सामान्य जीवन को त्याग, स्वयं को किसी धार्मिक या आध्यात्मिक लक्ष्य के लिए समर्पित कर देता है | भिक्षु सामान्य तौर पर व्रत लेता है, अर्थात वचनबद्ध रहता है कि वह अनुशासित जीवन के लिए कठोर नियमों का पालन करेगा |
भिक्षुणी महिला भिक्षु
"जल से व्यक्ति शुद्ध नहीं हो सकता, जबकि कई लोग यहाँ (पवित्र नदी में)
स्नान करते हैं | परंतु वह व्यक्ति शुद्ध है जिसमें सत्य और धर्म निवास करते हैं |"
युद्ध के मैदान में हजारों व्यक्तियों पर हजारों बार विजय पाने की तुलना में स्वयं पर विजय पाना अधिक बड़ी उपलब्धि है |"

आइए पता लगाएँ
- उपरोक्त कृति में बुद्ध को कैसे दर्शाया गया है, इस पर चर्चा कीजिए |
- क्या आप भारत के कुछ राज्यों या कुछ अन्य देशों के नाम बता सकते हैं जहाँ आज भी बौद्ध मत एक प्रमुख मत है | इन स्थानों को विश्व के मानचित्र पर अंकित करने का प्रयास कीजिए |
जैन मत
जैन मत एक अन्य महत्वपूर्ण दर्शन है जो उसी समय काफी लोकप्रिय हुआ, यद्यपि इस मत को अधिक प्राचीन माना जाता है | सिद्धार्थ गौतम के समान ही राजकुमार वर्धमान का जन्म छठी शताब्दी सा.सं.पू. के आरंभ में वैशाली (वर्तमान बिहार में) नगर के समीप हुआ था | उन्होंने 30 वर्ष की आयु में अपना घर त्यागने और आध्यात्मिक ज्ञान की खोज का निर्णय लिया | उन्होंने संन्यासी जीवन के अनुशासन का पालन किया और 12 वर्ष बाद उन्हें 'अनंत' ज्ञान या सर्वोपरि विवेक प्राप्त हुआ | उन्हें 'महावीर' या 'महानायक' के नाम से जाना जाने लगा और उन्होंने अपने अर्जित ज्ञान का उपदेश देना आरंभ किया |
ध्यान रखें
'जैन' शब्द 'बिन' से आया है जिसका अर्थ है 'विजेता' | इसका अर्थ किसी क्षेत्र या शत्रुओं पर विजय पाने से नहीं है, बल्कि अविद्या और मोह पर विजय पाने से है, ताकि ज्ञान प्राप्त किया बा सके |

महावीर वर्धमान का एक पारंपरिक चित्र
जैन मत के उपदेशों में अहिंसा, 'अनेकांतवाद' और •अपरिग्रह' शामिल हैं | ये विचार काफी हद तक बौद्ध तथा वेदांत दर्शन के विचारों को साझा करते हैं जो कि भारतीय संस्कृति के केंद्र में हैं | इनमें से प्रथम विचार को महावीर के इस कथन द्वारा समझाया जा सकता है-
"सभी सांस लेने वाले, उपस्थित, जीवित, संवेदनशील जीवों को मारा न जाए, न ही उनके साथ हिंसा की जाए, न दुर्व्यवहार किया जाए, न ही सताया जाए तथा न ही दूर हटाया जाए |"
अंतिम दो बातों को सरल शब्दों में समझते हैं-
- अनेकांतवाद का अर्थ है, 'केवल एक' पक्ष या दृष्टिकोण नहीं | अर्थात, सत्य के अनेक पक्ष हैं और इसे केवल एक कथन द्वारा पूरी तरह समझाया नहीं जा सकता है |
- अपरिग्रह का अर्थ है, 'असंग्रह' | इसके अंतर्गत पार्थिव वस्तुओं से दूर और स्वयं को जीवन में केवल अनिवार्य वस्तुओं तक सीमित रहने की सलाह दी जाती है |
जातक कथाएँ पीढ़ियों से भारतीय बच्चों और वयस्कों को समान रूप में आह्लादित करती रही हैं | ये बुद्ध के पूर्व जन्मों की कहानियाँ हैं और बड़े ही सरल तरीके से बौद्ध आदर्शों को व्यक्त करती हैं |
एक प्रसिद्ध कथा में, बुद्ध वानरों के एक बड़े समूह के राजा थे | वे एक विशालकाय वृक्ष के समीप रहते थे जिस पर मीठी सुगंध वाले और स्वादिष्ट फल लगे हुए थे | वानर-राज के आदेश के बावजूद कि उस वृक्ष का कोई भी फल किसी और के हाथ न लगे, एक दिन एक पका हुआ फल नीचे नदी में जा गिरा | पानी की धारा के साथ बहकर वह फल जाल में फँसा और उसे राजमहल ले जाया गया | राजा उस फल के स्वाद से इतना सम्मोहित हुए कि उन्होंने अपने सैनिकों से उस फल के वृक्ष को ढूँढ़ निकालने के लिए कहा |

वानर-राज की कथा दर्शाने वाली पत्थर की कृति (चित्र – मध्यप्रदेश)
लंबे समय तक खोजने के बाद उन्हें वह वृक्ष मिल गया और उन्होंने देखा कि वानर उन फलों का आनंद उठा रहे थे | सैनिकों ने वानरों पर हमला किया | वानर-राज के पास अपने वानरों को बचाने का केवल एक ही रास्ता था कि नदी पार कराने में उनकी सहायता की जाए | किंतु वे अपने आप ऐसा नहीं कर पा रहे थे | उनसे आकार में बहुत बड़े होने के नाते वानर-राज ने नदी के दूसरे किनारे पर एक पेड़ को पकड़ा और उन्हें नदी पार कराने के लिए अपने शरीर को मानो एक पुल बना दिया | इस प्रक्रिया के दौरान उनका शरीर घायल हो गया और अंत में उनकी मृत्यु हो गई |
राजा ने कुछ दूरी से यह दृश्य देखा और वह वानर-राज के इस निःस्वार्थ बलिदान से बहुत अधिक प्रभावित हुआ | वह भी प्रजा के साथ अपनी भूमिका पर सोच-विचार करने लगा |
एक जैन कथा
रोहिनेय एक बहुत कुशल चोर था, जो पकड़े जाने के सभी प्रयासों को विफल कर देता था | एक बार नगर की ओर जाते हुए रास्ते में उसने अकस्मात ही अज्ञान के साधारण जीवन से मुक्ति पाने के बारे में महावीर द्वारा दिए जा रहे उपदेश के कुछ वाक्य सुन लिए | रोहिनेय के नगर पहुँचने के बाद उसे पहचान लिया गया और गिरफ्तार कर लिया गया | उसने स्वयं को एक साधारण कृषक बताया | एक मंत्री ने उसे अपनी पहचान प्रकट करने का दबाव डालने के लिए चतुराई से एक योजना बनाई, किंतु महावीर के शब्दों को याद रखते हुए रोहिनेय मंत्री की योजना समझ गया और उसके जाल से बच निकला |
बाद में रोहिनेय को बहुत पछतावा हुआ | वह महावीर के पास गया और अपने अपराधों को स्वीकार किया | उसने चुराया हुआ धन वापस किया एवं अपने अपराधों के लिए क्षमा माँगी | वह भिक्षु बन गया और उसे अपने अब तक के भ्रमपूर्ण जीवन का एहसास हुआ | तत्पश्चात उसने आध्यात्मिक ज्ञान अर्जित करने पर अपना ध्यान केंद्रित किया |
यह कहानी सम्यक कर्म और सम्यक विचारों के महत्व को दर्शाती है और यह भी बताती है कि हर व्यक्ति को जीवन में दूसरा अवसर मिलना चाहिए |

आइए पता लगाएँ
उपरोक्त भित्तिचित्र (नई दिल्ली के एक जैन मंदिर से) का अवलोकन कीजिए | इसमें क्या विशेष दिखाई दे रहा है? इसमें क्या संदेश निहित है?
आइए विचार करें
बौद्ध मत और जैन मत दोनों में ही अहिंसा का अर्थ व्यक्ति या जीव के प्रति शारीरिक हिंसा न करने से भी कहीं अधिक है | इसमें विचारों की हिंसा से भी संयम रखने के लिए कहा गया है, जैसे कि किसी के बारे में बुरी भावना नहीं रखना | यदि हम अपने आप को ध्यान से देखें तो हमें ऐसे नकारात्मक विचार स्वयं में अनुभव होते हैं और हमें इन्हें सकारात्मक विचारों में बदलना सीखना चाहिए | कभी-कभार ये नकारात्मक विचार स्वयं हमारी ओर भी निर्देशित होते हैं |

बौद्ध एलोरा (महाराष्ट्र) में छठवीं और दसवीं शताब्दी सा.सं. के बीच पहाड़ों में काटकर गुफाएँ बनाई गई | इनमें से कुछ गुफाएँ हिंदू दर्शन से हैं, जबकि अन्य बौद्ध और जैन मतों से संबंधित हैं |
आइए विचार करें
अंग्रेजी भाषा में हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख मतों को 'धर्म' का नाम दिया जाता है | हमने इन शब्दों का प्रयोग नहीं किया है, यहाँ इन्हें 'दर्शन' या 'मत' और (इस अध्याय में आगे) 'विश्वास' कहा गया है | इसका कारण यह है कि इन मतों और दर्शनों के अनेक आयाम हैं, जिनका हम आगे अध्ययन करेंगे, जैसे कि उनका दार्शनिक पक्ष, आध्यात्मिक पक्ष, नैतिक पक्ष, सामाजिक पक्ष, धार्मिक पक्ष इत्यादि | अनेक विद्वान मानते हैं कि अंग्रेजी का शब्द 'रिलिजन' भारतीय सभ्यता के संदर्भ में बहुत सीमित है |
उस समय अन्य अनेक मत भी प्रचलित थे | उदाहरण के लिए, इनमें से एक 'चार्वाक' दर्शन है जिसे कभी-कभी 'लोकायत' भी कहा जाता है | इसके अनुसार यह भौतिक जगत ही एकमात्र सत्य है और इसलिए मृत्यु के पश्चात जीवन का होना असंभव है | ऐसा प्रतीत होता है कि इस दर्शन को अधिक लोकप्रियता नहीं मिली और समय के साथ यह विलुप्त हो गया | हमने इसका उल्लेख यहाँ इसलिए किया ताकि यह दर्शाया जा सके कि यहाँ बौद्धिक या आध्यात्मिक विश्वास प्रथाओं में व्यापक विविधता थी और लोग अपने अनुसार इन्हें चुनने के लिए स्वतंत्र थे |
यद्यपि वैदिक, बौद्ध और जैन दर्शनों में महत्वपूर्ण भिन्नताएँ थी तथापि उनमें कुछ समान संकल्पनाएँ भी थीं, जैसे धर्म, कर्म, पुनर्जन्म, दुखों और अज्ञानता के अंत की खोज एवं अनेक अन्य महत्वपूर्ण मूल्य आदि | वास्तव में यह उस वृक्ष का तना या मूल भाग है जिसके उदाहरण के साथ हमने इस अध्याय की शुरुआत की थी |
लोक और जनजातीय जड़ें
हमने अब तक जिन सांस्कृतिक जड़ों को देखा है, उन्हें कई शास्त्रों में वर्णित किया गया है | भारत में समृद्ध मौखिक परंपराएँ भी रही हैं | इसका अर्थ है, उन उपदेशों और प्रथाओं के बारे में ज्ञान जो कि नित्य अभ्यास के द्वारा आगे संचारित हुआ, न कि लिखित शास्त्रों के द्वारा | वेदों के संदर्भ में यह लागू होता है | इनमें अनेक लोक प्रथाएँ हैं, जो आम लोगों द्वारा प्रसारित होती हैं और जनजातीय परंपराएँ जनजातियों द्वारा प्रसारित होती हैं |
जनजाति क्या है?
इस सामाजिक इकाई की अनेक परिभाषाएँ दी गई हैं | आज के समय में मानव वैज्ञानिक (मानव विज्ञान का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिक) जनजाति को उन परिवारों या वंशों का समूह मानते हैं, जो एक सामान्य उत्पत्ति, संस्कृति और भाषा साझा करते हैं; आपस में निकट संबंध बनाए रखते हुए समुदाय में रहते हैं; जिसके एक मुखिया होते हैं और उनके पास अपनी कोई निजी संपत्ति नहीं होती है |
यह जानना रुचिकर है कि प्राचीन भारत में 'जनजाति' के लिए कोई शब्द नहीं था - जनजातियाँ केवल अलग-अलग जन थीं जो एक विशेष परिवेश में रहती थीं, जैसे कि वन या पहाड़ | भारत के संविधान में अंग्रेजी में इनके लिए 'ट्राइब' और 'ट्राइबल कम्युनिटी' और हिंदी में 'जनजाति' शब्द का उपयोग किया गया है |
आधिकारिक आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2011 में भारत के अधिकांश राज्यों में 705 जनजातियाँ निवास करती थीं, जिनकी संख्या लगभग 104 मिलियन थी- यह आस्ट्रेलिया और युनाइटेड किंगडम की कुल जनसंख्या से अधिक है |
19वीं शताब्दी में जनजातियों का अध्ययन करने वाले मानव वैज्ञानिकों ने उन्हें प्रायः सभ्य मानवों की तुलना में 'आदिम' या 'हीन' बताया है | जनजातीय समुदायों तथा उनकी समृद्ध एवं जटिल संस्कृतियों के गहन अध्ययन के बाद इस प्रकार के पक्षपातपूर्ण विचारों को अधिकांशतः नकार दिया गया है |


जैसा कि हमने इस अध्याय में उल्लेख किया है, लोक और जनजातीय परंपराओं तथा प्रमुख विचारधाराओं के बीच निरंतर संपर्क होता रहा है | दोनों ही दिशाओं में देवताओं, संकल्पनाओं, दंतकथाओं और रीतियों का आपस में आदान-प्रदान होता रहा है | उदाहरण के लिए, पंरपरा के अनुसार पुरी (ओडिशा) के भगवान जगन्नाथ मूल रूप से जनजाति देवता थे | देवी माताओं के जिन विभिन्न रूपों की पूजा की जाती है, उनके लिए भी यही बात कही जा सकती है | दूसरी ओर, कुछ जनजातियों में हिंदू देवों को काफी समय पहले ही अपना लिया गया था और महाभारत तथा रामायण के उनके अपने रूप हैं- यह भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों से लेकर तमिलनाडु तक बहुत अच्छी तरह लिखा गया है |
इस प्रकार के परस्पर संपर्क इतने लंबे समय से तथा इतनी सहजता से कैसे होते रहे हैं? ऐसा इसलिए हो सका क्योंकि लोक, जनजातियों और हिंदू विश्वास में अनेक समान प्रकार की संकल्पनाएँ थीं | उदाहरण के लिए, तीनों में प्राकृतिक तत्वों जैसे कि पर्वतों, नदियों, पेड़ों, पौधों और जंतुओं तथा कुछ पत्थरों को भी पवित्र माना गया, क्योंकि इन सबमें चेतना है | निस्संदेह, जनजातियों द्वारा उन प्राकृतिक तत्वों से संबंधित कई देवताओं की पूजा की जाती है | उदाहरण के लिए, तमिलनाडु के नीलगिरि पर्वत में निवास करने वाली टोडा जनजाति (इनमें से एक की तस्वीर बाईं ओर दी गई है) के अनुसार इस पर्वत के 30 से अधिक शिखर देवी-देवताओं के निवास स्थान हैं; ये शिखर इतने पवित्र माने गए हैं कि टोडा जनजाति के लोग अपनी अंगुली से इनकी ओर संकेत भी नहीं करते हैं |
देवताओं में इतनी बहुलता के पश्चात, हिंदू धर्म के समान अनेक जनजातियों में भी उच्चतर देवत्व या परमात्मा की संकल्पना है | उदाहरण के लिए, अरुणाचल प्रदेश की अनेक जनजातियाँ डोनीपोलो की पूजा करती हैं, जो सूर्य और चंद्रमा के मिले-जुले रूप माने गए हैं और इन्हें आगे चलकर परमात्मा माना गया | मध्य भारत के क्षेत्र में खंडोबा भगवान के संबंध में भी ऐसा ही है | पूर्वी भारत में, मुंडा और संथाल जनजातियाँ अन्य दैविक शक्तियों के साथ सिंगबोंगा की पूजा करती हैं, जिन्हें वे परमेश्वर कहते हैं और जिन्होंने यह संपूर्ण विश्व बनाया हैं | ऐसे अनेक उदाहरण हैं |
भारतीय समाजशास्त्री आंद्रे बेते ने इस स्थिति के बारे में कुछ इस तरह बताया है-
"भारतीय उपमहाद्वीप में रहने वाली हजारों जातियाँ और जनजातियाँ इतिहास के आरंभिक समय तथा उससे भी पहले से आपस में एक-दूसरे की धार्मिक आस्थाओं और प्रथाओं को प्रभावित करती रही हैं | जनजातीय धर्मों पर हुए हिंदू दर्शन के प्रभाव को व्यापक रूप से स्वीकार किया गया है, किंतु यह भी सत्य है कि न केवल इसके निर्माण के चरण में, बल्कि इसके पूरे विकास-क्रम में हिंदू दर्शन जनजातीय आस्थाओं से प्रभावित हुआ है |"
स्पष्ट रूप से, इस लंबे समय के परस्पर संपर्क का परिणाम आपसी समृद्धि रही है | इस प्रकार लोक और जनजातीय मान्यताएँ और प्रथाएँ भारत की सांस्कृतिक जड़ों में महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं | हम अगले अध्याय में इस विषय को और भी विस्तार से बताएँगे |
आगे बढ़ने से पहले...
- भारत के प्राचीनतम ग्रंथ, वेदों ने अनेक दर्शनों को जन्म दिया | वेदांत और योग इनमें प्रमुख हैं |
- बौद्ध और जैन मत वेदों के प्राधिकार क्षेत्र से परे गए और उन्होंने कुछ विशिष्ट मूल्यों एवं प्रथाओं पर बल दिया |
- यद्यपि इन मतों के सिद्धांत और विधियाँ भिन्न थे, फिर भी इनमें कुछ महत्वपूर्ण संकल्पनाएँ समान थीं | ये दुख के कारण और अज्ञान के निवारण के साधनों का पता लगाने का सतत प्रयास करते रहे |
- हजारों वर्षों से जनजातीय विश्वास, प्रथाओं तथा कलाओं का हिंदू दर्शन के साथ मेल-जोल होता रहा है | इनके बीच दोनों ओर से अबाधित आदान-प्रदान चलता रहा है | जनजातीय विश्वास प्रथाएँ आम तौर पर भूमि और उसकी विशेषताओं को पवित्र मानती हैं, उनमें प्रायः देवत्व की एक उच्च संकल्पना भी होती है |
प्रश्न, क्रियाकलाप और परियोजनाएँ
- यदि आप नचिकेता होते तो आप यम से कौन-से प्रश्न पूछते? इन्हें 100-150 शब्दों में लिखिए |
- बौद्ध मत के कुछ केंद्रीय विचारों को समझाइए | इन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए |
- बुद्ध के उस उद्धरण पर कक्षा में चर्चा कीजिए जो इस प्रकार है- "जल से व्यक्ति शुद्ध नहीं हो सकता, जबकि कई लोग यहाँ (पवित्र नदी में) स्नान करते हैं" ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सबको इसका अर्थ समझ में आ गया है |
- जैन मत के कुछ मुख्य विचारों को समझाइए | इन पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए |
- कक्षा में आंद्रे बेते के कथन पर विचार-विमर्श कीजिए |
- अपने स्थानीय क्षेत्र में लोकप्रिय देवी-देवताओं तथा उनसे जुड़े त्योहारों की एक सूची बनाइए |
- कक्षा की गतिविधि के रूप में अपने क्षेत्र या राज्य के दो या तीन जनजातीय समूहों की सूची बनाइए | इनमें से कुछ की परंपरा और विश्वास प्रणालियों के बारे में लिखिए |
सही या गलत
- वैदिक ऋचाओं को ताड़-पत्र की पांडुलिपियों पर लिखा गया है |
- वेद भारत के सबसे प्राचीन ग्रंथ हैं |
- वैदिक कथन "एकम् सत् विप्रा बहुधा वदन्ति" में ब्रह्मांड की शक्तियों की एकता की मान्यता प्रकट होती है |
- बौद्ध मत वेदों से अधिक पुरानी है |
- जैन मत का उद्भव बौद्ध मत की एक शाखा के रूप में हुआ
- बौद्ध और जैन मत दोनों ही शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व तथा सभी जीवों को नुकसान न पहुँचाने का समर्थन करते हैं |
- जनजातीय विश्वास परंपराएँ आत्मा और छोटे देवों तक सीमित हैं |
कक्षा गतिविधि
- एक नाटक का मंचन कीजिए, जिसमें मृत्यु के देवता यम से अनेक बच्चे नचिकेता के रूप में जीवन के बारे में प्रश्न पूछ रहे हैं |

वटवृक्ष, अध्याय 7 और 8 की विषयवस्तुओं के लिए एक उपयुक्त दृष्टांत तथा भारतीय सभ्यता का उत्कृष्ट प्रतीक है | अपनी गहरी जड़ों, विशाल तने और सभी दिशाओं में फैली शाखाओं के साथ यह व्यापक क्षेत्र में फैलता है और अनेक शताब्दियों तक बना रहता है | यह अनेक प्रकार की वनस्पतियों और जीवों को आश्रय देता है और अपनी उन शाखाओं को, जो तने से जुड़ी होती हैं, को नई जड़ें बनाने के लिए प्रोत्साहित करता है | निस्संदेह हिंदू दर्शन और बौद्ध व जैन मतों में इस वृक्ष को पवित्र माना जाता है |