अध्याय 8
विविधता में एकता या ‘एक में अनेक’
" हे ईश्वर! मेरी यह प्रार्थना स्वीकार करें कि मैं अनेकता में एकता के स्पर्श का आनंद कभी न गवाँ सकँ |
—रवींद्रनाथ टैगोर
...विविधता में एकता का सिद्धांत सदैव से भारत के लिए स्वाभाविक रहा है और यह उसकी प्रकृति एवं अस्तित्व के लिए आवश्यक है | एक में अनेक का यह भाव भारत को उसके स्वभाव व स्वधर्म की सुनिश्चित नींव पर स्थापित करेगा | "
—श्री अरविंद


महत्वपूर्ण प्रश्न ?
- भारतीय परिदृश्य में ‘विविधता में एकता’ का क्या अर्थ है?
- भारत की विविधता के कौन-से पक्ष सर्वाधिक उल्लेखनीय हैं?
- हम विविधता में निहित एकता का कैसे पता
लगाते हैं?
समृद्ध विविधता
यदि आप रेल द्वारा भारत की यात्रा करते हैं, तो आप न केवल बदलते भूदृश्यों को देखेंगे,
बल्कि विभिन्न प्रकार के परिधान और भोजन का भी अनभुव करेंगे | इसके अतिरिक्त,
आप परिचित एवं
अपरिचित भाषाएँ सुनेंगे और विभिन्नलिपियों को देखेंगे | यहाँ तक कि
आप अपने क्षेत्र में भी भारत के विभिन्न भागों से आए अलग-अलग रीति-रिवाजों और
परंपराओं वाले लोगों से मिलेंगे | यही भारत की समृद्ध विविधता है और सामान्यत: यही
वह पहला पक्ष है जो हमारे देश में आने वाले पर्यटकों को प्रभावित करता है |
1.4 अरब से भी अधिक निवासियों वाले इस देश (विश्व की जनसंख्या का लगभग
18 प्रतिशत भाग) में इस प्रकार की विविधता आश्चर्यजनक नहीं है | 20वीं शताब्दी के अंत में भारत के एक राष्ट्रिय संगठन, भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण ने ‘भारत के लोग
परियोजनाʼ के अंतर्गत देश के सभी राज्यों में 4,635 समुदायों का एक व्यापक सर्वेक्षण
किया | इसमें 25 लिपियों का उपयोग करने वाली 325 भाषाओं की गणना की गई | इस सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि अपने जन्म स्थान के निकट या अपने मूल समुदाय के
साथ न रहने के कारण अनेक भारतीयों को प्रवासी भी कहा जा सकता है |
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कक्षा की एक गतिविधि के रूप में (1) कम से कम 5 सहपाठियों और उनके माता-पिता के जन्म स्थानों तथा (2) उनकी मातृ भाषाओं और उन्हें ज्ञात अन्य भाषाओं की सुचियाँ बनाइए | विविधता के परिप्रेक्ष्य में इस गतिविधि के परिणामों पर चर्चा कीजिए |
विविधता वास्तव में सुंदर है, परंतु इसका अर्थ निकालना इतना सरल नहीं है | एक शताब्दी से भी अधिक पहले ब्रिटिश इतिहासकार विंसेंट स्मिथ ने विस्मयपूर्वक कहा था—
"इस अचंभित करने वाली विविधता में भारत का इतिहास किस प्रकार लिखा जा सकता है? ... इस प्रश्न का उत्तर इस तथ्य में निहित है कि भारत 'विविधता में एकता' प्रदर्शित करता है |"
'विविधता में एकता' का अर्थ क्या है? हम इस एकता या 'एक में अनेक' को कैसे समझें और व्यक्त करें? इस प्रश्न के उत्तर के लिए हम भारतीय जीवन के कुछ आयामों को समझने का प्रयास करेंगे |
सभी के लिए भोजन
आपमें से कुछ विद्यार्थियों ने भारत के विभिन्न क्षेत्रों के पकवानों का सेवन अवश्य किया होगा | आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हमारे देश भारत में आप, लाखों न सही, किंतु हजारों प्रकार के व्यंजनों और पकवानों का स्वाद चख सकते हैं | फिर भी कुछ निश्चित अनाज जैसे – चावल, जौ और गेहूँ, बाजरा, ज्वार और रागी तथा विभिन्न प्रकार की दालों का लगभग पूरे भारत में उपयोग होता है | ये सभी अधिकांश भारतीयों का प्रमुख

चित्र 8.1 - भारत के विभिन्न क्षेत्रों से अनाजों और दालों के कुछ उदाहरण
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- कक्षा की एक गतिविधि के रूप में अपने घर में उपयोग की जाने वाली भोजन सामग्रियों (अनाज, मसालों आदि) की सूची बनाइए |
- किसी भी एक हरी सब्जी को लीजिए एवं विचार कीजिए कि उससे आप कितने प्रकार के व्यंजन बना सकते हैं?
वस्त्र एवं परिधान
भारत के प्रत्येक क्षेत्र के लोगों ने वस्त्रों और परिधानों की अपनी स्वयं की शैली विकसित की है | फिर भी, हम कुछ पारंपरिक भारतीय परिधानों में एक समानता पाते हैं, भले ही उनमें किसी भी प्रकार की सामग्री का उपयोग किया गया हो | इसका एक स्पष्ट उदाहरण भारत के अधिकांश भागों में पहने जाने वाला और विभिन्न प्रकार के सूत या धागे से बना एक लंबा परिधान 'साड़ी' है | ये मुख्यतः कपास अथवा रेशम के धागे से बनती हैं, परंतु आजकल कृत्रिम (सिंथेटिक) कपड़ों से भी बनाई जाती हैं |

चित्र 8.2 - वैशाली (वर्तमान बिहार में) से प्राप्त साड़ी पहने हुए एक स्त्री की पत्थर पर उकेरी गई आकृति

इन्हें बुनाई एवं डिजाइन की विभिन्न विधियों से तैयार किया जाता है (चित्र 8.3) | कुछ डिजाइन कपड़े का ही हिस्सा होते हैं, जबकि कुछ को कपड़े की बुनाई के उपरांत उस पर छापा जाता है | अंततः रंगों में अनेक विविधताएँ होती है जो कई प्रकार के रंगों से उत्पन्न की जाती हैं |
इस तरह साड़ी का एक लंबा इतिहास रहा है | कुछ शताब्दी सा.सं.पू. वैशाली (आज के बिहार) में पत्थर पर उकेरी गई आकृति में साड़ी पहनी हुई स्त्री को दर्शाया गया है | (चित्र 8.2, पृष्ठ 128)
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साड़ी का उदाहरण एकता और विविधता को कैसे प्रतिबिंबित करता है, व्याख्या कीजिए (100-150 शब्दों में) |
उकेरी गई आकृति एक डिजाइन जो समतल सतह के ऊपर उकेरी गई हो | ग्रह पत्थर, लकड़ी, मृत्तिका (सेरेमिक) या अन्य सामग्री की बनी हो सकती है |
ध्यान रखें
बहुत लंबे समय तक भारत, विश्व में सर्वाधिक महीन सूत का उत्पादन करता रहा और उन कपड़ों का यूरोप जैसे सुदूर स्थानों तक निर्यात करता रहा | 17वीं शताब्दी में एक सूती कपड़े पर छपा हुआ डिजाइन 'छींट', यूरोप में इतना अधिक लोकप्रिय हुआ कि इसके कारण यूरोपीय परिधानों की कीमतों में बहुत बड़ी गिरावट आई | अंततः अपने स्वयं के उत्पादों के संरक्षण के लिए इंग्लैंड और फ्रांस को भारत से 'छींट' के आयात पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लेना पड़ा |
साड़ी को पहनने के अनेक तरीके हैं | ये एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र और एक समुदाय से दूसरे समुदाय में भिन्न होते हैं | वास्तव में, इसे बाँधने व पहनने के नए-नए तरीके अभी भी खोजे जा रहे हैं, लेकिन अंततोगत्वा यह एक ही प्रकार का परिधान - 'साड़ी' है |


चित्र 8.4 - महिलाएँ साड़ी का प्रायः एक परिधान के अतिरिक्त अन्य प्रकार से भी उपयोग करती हैं (चित्र – दक्षिण भारत से) |
विगत शताब्दियों में भारत आने वाले विभिन्न विदेशी यात्री इसकी सादगी, सुलभता और पहनने के विविध तरीकों को देखकर अभिभूत हुए | इसके अतिरिक्त, महिलाएँ साड़ी का एक परिधान के रूप में उपयोग करने के अलावा अन्य कार्यों में भी उपयोग करती रही हैं | चित्र 8.4 में छह चित्रों के माध्यम से इसके रचनात्मक उपयोगों को दर्शाया गया है |
आइए पता लगाएँ
- क्या आप ऊपर दिए गए चित्रों से यह पहचान सकते हैं कि साड़ी का उपयोग कितने प्रकार से किया गया है?
- क्या आप साड़ी के अन्य उपयोगों से परिचित हैं अथवा क्या आप उसके अन्य उपयोगों की कल्पना कर सकते हैं?

- जिस प्रकार आपने साड़ी के विभिन्न रूपों और उपयोगों को देखा, उसी प्रकार एक अन्य परिधान धोती के कपड़े (फैब्रिक) तथा उपयोगों को ध्यान में रखते हुए उसके विभिन्न रूपों की एक सूची तैयार कीजिए | इस गतिविधि से आपको क्या समझ में आया?
त्योहारों की विविधता
भारत में त्योहारों की अपार विविधता है | आपने देखा होगा कि कुछ त्योहार एक ही समय पर पूरे भारत में मनाए जाते हैं, हालाँकि उनके नाम अलग-अलग होते हैं | हम एक उदाहरण के माध्यम से इसे देखेंगे, जैसे कि 14 जनवरी के आस-पास मनाया जाने वाला मकर संक्राति का पर्व | यह पर्व भारत के विभिन्न भागों में फसलों की कटाई का सूचक है |

चित्र 8.5 - मानचित्र लगभग एक ही तिथि पर एक ही त्योहार के विभिन्न नामों को प्रदर्शित करता है |
आइए पता लगाएँ
- आपका सबसे प्रिय त्योहार कौन-सा है एवं यह आपके क्षेत्र में किस प्रकार मनाया जाता है? क्या आप जानते हैं कि यह भारत के किसी अन्य भाग में भी वस्तुतः किसी अन्य नाम से मनाया जाता है?
- अक्तूबर-नवंबर माह में भारत में कई प्रमुख त्योहार मनाए जाते हैं | उनमें से कुछ प्रमुख त्योहारों एवं देश के विभिन्न भागों में उन्हें जिन नामों से पुकारा जाता है, उनकी सूची बनाइए |
महाकाव्य का विस्तार
साहित्य, विविधता में एकता का एक अन्य उत्कृष्ट उदाहरण है | भारतीय साहित्य बहुत विविध है एवं विश्व के सबसे धनी साहित्यों में से एक है | भाषा, लेखन शैली की तकनीक आदि में अंतर होने के बावजूद सदियों से भारतीय साहित्य ने विश्व के महत्वपूर्ण विषयों एवं चिंताओं को साझा किया है | उदाहरण के लिए, पंचतंत्र के बारे में किसने नहीं सुना है? मुख्य पात्रों के रूप में पशुओं के माध्यम से मनोरंजक कथाओं का यह संग्रह हमें महत्वपूर्ण जीवन-कौशल सिखाता है | इसका मूल संस्कृत पाठ लगभग 2,200 वर्ष पुराना है, परंतु इसका रूपातंरण लगभग हर भारतीय भाषा में किया जा चुका है | वास्तव में, यह भारत से बाहर दक्षिण-पूर्वी एशिया, अरब देशों तथा यूरोप में भी पढ़ा जाता है | ऐसा अनुमान है कि पंचतंत्र के 50 से अधिक भाषाओं में 200 से अधिक रूपातंरण उपलब्ध हैं | इस क्रम में इसने कथाओं के नए संग्रह को प्रेरित किया है | यह प्रदर्शित करता है कि 'एक' कहानियों का संग्रह किस प्रकार 'अनेक' में परिवर्तित हो गया | यद्यपि भारत के सबसे प्रभावशाली दो महाकाव्य रामायण एवं महाभारत हैं |
महाकाव्य सामान्यतः एक लंबी कविता जो अतीत के महान नायकों एवं योद्धाओं की कथाओं का व्याख्यान करती है |
अपने मूल संस्करण में लगभग 7,000 पृष्ठों में समाहित ये दोनों संस्कृत के महाकाव्य हैं, जिसमें नायक धर्म की पुनर्स्थापना के लिए युद्ध करते हैं | महाभारत में पांडव, श्री कृष्ण की सहायता से अपने चचेरे भाइयों 'कौरवों' से अपने राज्य की प्राप्ति के लिए युद्ध करते हैं | रामायण में भी श्री राम अपने भाई लक्ष्मण एवं हनुमान की सहायता से उस राक्षस रावण को पराजित करते हैं, जिसने उनकी पत्नी सीता का अपहरण किया था | इन कथाओं में कई और छोटी कथाएँ/उपकथाएँ भी हैं, जो नैतिक मूल्यों पर केंद्रित हैं और लगातार प्रश्न पूछती हैं कि क्या सत्य और क्या असत्य है |

आइए पता लगाएँ
पृष्ठ 134 पर चित्र 8.6 में दर्शाए गए प्रसंग की पहचान कीजिए एवं उससे संबंधित घटनाओं पर कक्षा में चर्चा कीजिए |
दो सहस्त्राब्दियों से अधिक समय से इन दो महाकाव्यों का भारत एवं भारत से बाहर अनुवाद व रूपांतरण किया जाता रहा है | इसके साथ ही इनके अनगिनत लोक संस्करण भी हैं | कुछ वर्ष पूर्व एक विद्वान ने केवल तमिलनाडु में किए गए अपने सर्वेक्षण में लोक कथाओं के रूप में महाभारत के 100 से अधिक स्वरूपों को पाया | अब आप अनुमान लगाइए कि पूरे भारत में इन लोक कथाओं की कितनी संख्या होगी!

चित्र 8.7- पंच पांडव, तमिलनाडु के नीलगिरि के जंगलों में पाँच पांडवों को दर्शाता नक्काशीदार पत्थर | इरूला जनजाति द्वारा मंदिर में इस पत्थर को सुरक्षित रखा गया है, जो इस बात का स्मरण कराता है कि पांडव इस क्षेत्र से गुजरे थे |
वास्तव में बहुत से समुदायों में रामायण एवं महाभारत के अपने संस्करण भी हैं | उन्होंने इन महाकाव्यों के साथ अपने इतिहास को जोड़ने वाली किंवदंतियों को भी संरक्षित रखा है | भील, गोंड, मुंडा जैसे भारत के कई अन्य जनजाति समुदायों के संदर्भ में ये विशेष रूप से सत्य है | भारत के पूर्वोत्तर तथा हिमालय क्षेत्र (जिसमें कश्मीर भी सम्मिलित है) की अधिकांश जनजातियों के पास इन दोनों अथवा किसी एक की अपनी लोककथा भी उपलब्ध है | ये जनजातीय रूपांतरण मौखिक रूप से प्रसारित हुए | इनके साथ ही ये किंवदंतियाँ भी प्रसारित हुईं कि किस प्रकार रामायण अथवा महाभारत से जुड़े हुए पात्र (सभी या कोई एक सामान्यतः पांडव, उनकी पत्नी द्रौपदी, कभी-कभी उनके शत्रु दुर्योधन एवं चचेरे भाई) उनकी जनजातियों से संबंधित क्षेत्रों में आए |
मानवविज्ञानी के. एस. सिंह द्वारा निर्देशित 'भारत के लोग' परियोजना, जिसका हमने पृष्ठ 126 पर उल्लेख किया था, में वे महाभारत के विषय में विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं, "लोककथाओं के अनुसार इस देश में शायद ही ऐसा कोई स्थान हो जहाँ महानायक पांडव न गए हों |" और यही बात रामायण के संदर्भ में भी कही जा सकती है | सदियों से, किसी अन्य साहित्य की अपेक्षा इन दो महाकाव्यों ने भारत एवं एशिया के विभिन्न भागों के मध्य एक सांस्कृतिक सूत्र के गहन तंत्र को विकसित किया | यह विविधता में एकता का एक अन्य उदाहरण है |
इस अध्याय की विषयवस्तु को और अधिक समझाने के लिए हम अपनी यात्रा को जारी रख सकते हैं और भारतीय संस्कृति के और अधिक पहलुओं की ओर ध्यान दे सकते हैं | उदाहरण के लिए, भारतीय शास्त्रीय कलाओं (जिसमें शास्त्रीय वास्तुकला सम्मिलित है) में विविधता एवं एकता को सरलता से देखा जा सकता है (आप इन क्षेत्रों का अध्ययन कला पाठ्यचर्या के दौरान करेंगे) |
अंत में हमें यह याद रखना चाहिए कि भारतीय संस्कृति विविधता को संपन्नता के रूप में प्रचारित करती है, किंतु साथ ही विविधता को पोषित करने वाली अंतर्निहित एकता को भी दृष्टि से ओझल नहीं होने देती है |
आगे बढ़ने से पहले...
- भारत में विभिन्न परिदृश्यों, व्यक्तियों, भाषाओं, परिधानों, भोजन, त्योहारों एवं परंपराओं की विविधता है |
- विभिन्न क्षेत्रों में विविधता दृष्टिगोचर होती है, परंतु इसमें अंतर्निहित एकता भी है |
- भारतीय एकता, विविधता का उत्सव मनाती है क्योंकि विविधता विभाजित नहीं, अपितु समृद्ध करती है |
प्रश्न, क्रियाकलाप और परियोजनाएँ
- पाठ के आरंभ में दिए गए दो उद्धरणों पर कक्षा में चर्चा कीजिए |
- राष्ट्रगान को पढ़िए | इसमें आप विविधता एवं एकता को कहाँ-कहाँ देखते हैं? इस पर दो अथवा तीन अनुच्छेद लिखिए |
- पंचतंत्र की कुछ कहानियाँ चुनिए और चर्चा कीजिए कि उनके संदेश किस प्रकार आज भी प्रासंगिक हैं | क्या आप अपने क्षेत्र से संबंधित कोई अन्य कहानियाँ भी जानते हैं?
- अपने क्षेत्र से कुछ लोककथाएँ एकत्रित कीजिए एवं उनके संदेशों पर चर्चा कीजिए |
- क्या आपने किसी प्राचीन कहानी को कला के माध्यम से दर्शात या चित्रित होते हुए देखा है? यह एक मूर्तिकला, चित्रकला, नृत्य प्रस्तुति या कोई चलचित्र भी हो सकता है | अपने सहपाठियों के साथ कक्षा में चर्चा कीजिए |
- भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा स्वतंत्रता से पहले भारत के कई भागों की यात्रा के उपरांत कही गई निम्न पंक्तियों पर कक्षा में चर्चा कीजिए -
हर जगह मुझे एक सांस्कृतिक पृष्ठभूमि मिली, जिसने उनके जीवन पर प्रभावशाली असर डाला | ... भारत के महाकाव्य, रामायण एवं महाभारत और अन्य प्राचीन पुस्तकें, लोकप्रिय अनुवादों और व्याख्याओं में जनता के बीच व्यापक रूप से जानी जाती थीं | उनमें उपस्थित प्रत्येक लोकप्रिय घटना, कहानी और नैतिकता की बातें जनमानस के अंतर्मन पर अंकित थीं जो कि उसे सार्थक एवं समृद्ध बनाती थीं | निरक्षर ग्रामीणों को भी सैकड़ों श्लोक कंठस्थ थे एवं उनकी आपसी बातचीत में इन महाकाव्यों अथवा कुछ पुरानी कालजयी कहानियों के संदर्भों की प्रचुरता होती थी जो नैतिकता को प्रतिस्थापित करती थीं |