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अध्याय 8


ताल या तालम और राग या रागम

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हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में ताल

कहरवा ताल

मात्रा-8 

विभाग 2

ताली  - पहली मात्रा पर

खाली   -पाँचवी मात्रा पर

ताल  चिन्ह
x


0


मात्रा 1 2 3 4 5 6 7 8
बोल
धा गे ति धि




दादरा ताल

मात्रा-6 
विभाग-2

ताली  -   पहली मात्रा पर 
खाली -  चौथी मात्रा पर

ताल  चिन्ह
x

0

मात्रा
1 2 3 4 5 6
बोल
धा धी ना धा ती ना


त्रि  ताल

मात्रा 16 

विभाग-4

ताली पहली, पाँचवी, तेहरवी मात्रा पर

खाली - नैावी मात्रा पर

ताल  चिन्ह
x






0


3


मात्रा
1 2 3 4 5 6 7 8 9 10 11 12 13 14 15 16
बोल
धा  धि धि धा धा धि धि धा धा ति ति ता ता धि धि धा


क्या आप जानते हैं?

हिंदुस्तानी संगीत की ताल पद्धति में पहली मात्रा को 'सम' कहा जाता है|

उद्देश्य -  उत्तर और दक्षिण भारतीय शास्त्रीय संगीत में राग और ताल को समझने का प्रयास |



क्या आप जानते हैं?

संगीत कलानिधि और पद्मभूषण से अलंकृत सुप्रसिद्ध मृदंगम वादक पालघाट मणि अय्यर' ने 10 वर्ष की आयु में अपनी पहली प्रस्तुति दी थी| उन्होंने वादन की शिक्षा तंजावुर श्री वैद्यनाथ अय्यर के सान्निध्य में प्राप्त की| मणि अय्यर ने मूंदगम पर न केवल प्रस्तुतियों में लय और ताल प्रदान करके सहयोग किया अपितु अपने वादन से उन प्रस्तुतियों को समृद्ध किया| उन्होंने अपने समय के प्रसिद्ध कलाकारों के साथ मृदंगम पर संगत भी की| उनके प्रंशसकों ने थानी अवतरणम् (एकल वादन) का खूब आनंद लिया| उनके कई शिष्य लोकप्रिय कलाकारों के रूप में सक्रिय हैं|

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 कर्नाटक संगीत में तालम

कर्नाटक संगीत में तालम का प्रयोग ताल देने की प्रक्रिया के लिए किया जाता है| प्रत्येक तालम में मात्राओं की एक निश्चित संख्या होती है, जिसकी पुनरावृत्ति की जाती है| इसे तालम चक्र या आवरतनम के नाम से जाना जाता है| तालम के भागों को अंगम कहा जाता है|


लघु- यह अँगुलियों की गिनती के पश्चात दी जाने वाली ताली होती है| यह 3, 4, 5, 7 या 9 मात्रा तक की हो सकती है|  इसे 1 मात्रा की संख्या के अनुसार दर्शाया गया है| सब स्क्रिप्ट के रूप में

जब लघु में तीन मात्रा होती हैं, तब हम इसे त्रिस्त्र जाति कहते हैं|


जब लघु में चार मात्रा होती हैं, तब हम इसे चतुरस्त्र जाति कहते हैं|

जब लघु में पाँच मात्रा होती हैं, तब हम इसे खण्ड जाति कहते हैं|

जब लघु में सात मात्रा होती हैं, तब हम इसे मिश्र जाति कहते हैं|

जब लघु में नौ मात्रा होती हैं, तब हम इसे संकीर्ण जाति कहते हैं|

 द्रुतम- इसे हाथ हिलाने के बाद हाथ से ताली देकर दिखाया जाता है| इसमें दो मात्रा होती हैं| जिसे लिखते समय  के रूप में दर्शाया जाता है|

अनुद्रुतम - यह केवल ताली है| इसमें एक मात्रा होती है| इसे यू आकार के रूप में दर्शाया जाता है और उपरोक्त दोनों की तुलना में प्रयोग में कम लाया जाता है|

आइए, देखें कैसे लघु द्रुतम को ताल के रूप में प्रस्तुत किया जाता है|

रूपक तालम - इस तालम में एक द्रुतम के बाद एक लघु होता है| यह चतुस्त्र जाति रूपक ताल है, इसीलिए 6 मात्रा [द्रुतम (2) + लघु (4)] का एक चक्र है इसे OI [द्रुतम, लघु] के रूप में दर्शाया जा सकता है|

आदिताल (त्रिपुट तालम- चतुरस्त्र जाति में)- इस तालम में एक लघु उसके बाद दो द्रुतम है| यह 8 मात्रा [लघु (4)+ द्रुतम (2)+ द्रुतम (2)] का एक चक्र है| इसे 100 (लघु, द्रुतम, द्रुतम) के रूप में दर्शाया जा सकता है|

 रोचक शब्दावलियाँ


कर्नाटक संगीत  शब्दावली
हिंदुस्तानी  संगीत   शब्दावली
रागम
राग
आरोहनम
आरोह
अवरोहनम
अवरोह
गमकम

गमक

लयम
लय

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तानपुरा

 हिंदुस्तानी संगीत में राग

 भारत में शास्त्रीय संगीत की दो शैलियाँ हैं कर्नाटक या दक्षिणात्य भारतीय शास्त्रीय संगीत और हिंदुस्तानी या उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत| प्रत्येक शैली के स्वरों के विषय में आपको पहले के पृष्ठों में समझाया जा चुका है| कर्नाटक संगीत में वीणा, वायलिन, बाँसुरी, नागस्वरम, मृदंगम, घटकम, खंजीरा और मोर्सिंग जैसे वाद्ययत्रों का प्रयोग होता है| इनकी रचनाएँ सामान्यतयाः संस्कृत, तेलगू, कन्नड़, मलयालम और तमिल भाषा में बद्ध होती हैं| वहीं हिंदुस्तानी संगीत में तानपूरा, बाँसुरी, वायलिन, सितार, सरोद, सारंगी, संतूर, तबला और पखावज वाद्ययंत्रों का प्रयोग होता है| इनकी रचनाएँ प्रायः हिंदी, संस्कृत और बृजभाषा में बद्ध होती हैं|

राग और ताल के विषय में समझने के लिए वीडियो देखिए

राग एक सप्तक पर आधारित होता है| प्रत्येक सप्तक में स्वरों का निश्चित आरोह व अवरोह क्रम होता है| स्वरों से बनी सीढ़ियों की कल्पना कीजिए! राग के अनुसार सप्तक में स्वर परिवर्तित होते रहते हैं|

 लिपि प्रणाली या स्वर लिपि

स्वरों को लिखते समय तार सप्तक के स्वरों को स्वर के ऊपर लगे एक बिंदु द्वारा दर्शाया जाता है, जैसे- 'सां' (तार सप्तक)| इसी प्रकार मंद्रसप्तक के स्वरों के नीचे बिंदु लगाकर दर्शाया जाता है 'ति' (मंद्र सप्तक)| वहीं (मध्य सप्तक) में स्वर को 'सा' के रूप में लिखा जाता है|

राग की जातियाँ

आइए, रागों में प्रयुक्त होने वाले रोचक शब्दावलियों के विषय में जानें, जो कि एक विशिष्ट समूह के लिए उपयोग की जाती है| यदि किसी राग में पाँच स्वरों का प्रयोग होता है, तो उसे 'औड़व जाति' का कहा जाता है| यदि किसी राग में छह स्वरों का प्रयोग होता हो, तो उसे 'षाड़व जाति' का कहा जाता है| वहीं यदि किसी राग में सात स्वर हों, तो उसे 'संपूर्ण जाति' का कहा जाता है|

 गतिविधि 1- राग भूप

राग भूप में निम्नलिखित स्वर होते हैं- 

आरोह/आरोहन ----सा  रे  ग  प  ध   सां 

अवरोह /अवरोहनम -----सां  ध   प  ग रे   सा


राग हंसध्वनि में निम्नलिखित स्वर होते हैं- 

आरोह /अवरोहनम ---सा  रे  ग  प  नी सां 

अवरोह /अवरोहनम ----सा    नी  प  ग  रे   सा


यदि आप एक सप्तक को गमक (अलंकार) का प्रयोग कर सजाते हैं, एक निश्चित स्वरों और विशेष स्वर समुदायों को बजाते हैं, तो यह एक 'राग' बन सकता है| प्रत्येक राग कुछ प्रमुख स्वरों और विशेष स्वर समूहों से अंलकृत होता है|

   संस्कृत में 'राग' का अर्थ होता है, जो 'मन का रंजन करे' प्रत्येक राग मन में कुछ भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं| इसे 'रस' कहते हैं|

राग और उससे संबंधित भावनात्मक प्रतिक्रिया को समझने के लिए राग और रस पर आधारित वीडियो देखिए|

   भारतीय शास्त्रीय संगीत में रचना से तात्पर्य संगीत के तत्वों, जैसे माधुर्य (राग), गति (ताल) और उसकी नियमित आवृति-लय और बोल की संरचित व्यवस्था से है|

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उत्तर भारतीय शास्त्रीय संगीत में रचना को मुख्य रूप से 'बंदिश' निबद्ध कहा जाता है और कर्नाटक संगीत में उसे 'कृति' कहते हैं|

गतिविधि 2- राग बिलावल में स्वरमालिका सीखें

जब किसी रचना में सरगम अर्थात स्वरों का प्रयोग करवाया जाए, जो उसे 'स्वरमालिका' कहते हैं| स्वरमालिका को अलग-अलग रागों में भी बद्ध किया जा सकता है| आइए, राग बिलावल में एक स्वरमालिका सुनें, जो कि तीनताल में बद्ध है|


स्वरमालिका

राग- बिलावल

ताल- तीनताल

रचनाकार- पारंपरिक


आरोह सारेगमपधनीसां 

अवरोह सांनी धपमगरेसा

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 रोचक शब्दावली

राग यमन का प्रमुख भाव श्रृंगार या प्रेम है| इस राग पर आधारित कई लोकप्रिय फिल्मी गाने भी बने हैं| राग यमन पर आधारित प्रसिद्ध गीतों को ढूँढ़ने का प्रयास करें| उन्हें सीखें और गाएँ|


गतिविधि 3- राग यमन पर आधारित एक बंदिश सीखें


राग यमन में बंदिश सीखने के लिए यह वीडियो देखें|


राग यमन में आरोह या आरोही क्रम इस प्रकार है----- नी  रे  ग  मं  ध  नी  सां

 इस राग का अवरोह या अवरोही क्रम इस प्रकार है ----सा  नी   ध   प   म  ग  रे  सा

      ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस राग का मध्यम स्वर नियमित मध्यम स्वर से ऊँचा है, जिसे आपने पहले गाया है| एक सुर में यह छोटा-सा परिवर्तन गाने का भाव भी परिवर्तित कर देता है|

इस गीत में भगवान कृष्ण को बाँसुरी बजाते हुए और वृंदावन की गोपियों को उस मुरली की धुन पर नाचते हुए वर्णित किया गया है|

राग यमन

 छोटा ख्याल - कान्हा बाँसुरी

स्थायी 

आज बजाई कान्हा बाँसुरी मोह लई सगरी बृज नारी प्यारी||

अंतरा 

वृंदावन की कुंज गलिन में संग बृखबान दुलारी प्यारी |


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आइए, गुरु पर आधारित राग यमन में (क्रमिक पुस्तक मालिका खंड एक से रचना) एक बंदिश (निबद्ध, रचना) सीखें


स्थायी

गुरु बिन कैसे गुण गावे 

गुरु ना माने तो गुण नहीं आए

 गुनियन में बेगुनी कहावे|

अंतरा

माने तो रिझावे सबको चरण गहे

सादिकन के जब आवे अचपल ताल सुर|

ताल - तीनताल


*S एक शब्द के विस्तार को दर्शाता है|

*- हिंदुस्तानी संगीत स्वरलिपि पद्धति में एक स्वर के विस्तार को दर्शाता है|


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क्या आप जानते हैं?


पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे ने स्वरलिपि पद्धति को हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में प्रचलित किया| वे पेशे से वकील थे| वे विद्वान और दीर्घ स्मरणशक्ति से संपन्न थे| उन्होंने पूरे देश का भ्रमण कर कई महान संगीतकारों से सांगीतिक रचनाएँ एकत्रित की| कई प्रकार की बाधाओं के बावजूद उन्होंने कई प्रकार की भिन्न-भिन्न रचनाएँ संकलित की और उन्हें क्रमिक पुस्तक मालिका में प्रकाशित भी किया, जो कि छह खंडों में विभाजित है|

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गतिविधि 4- आइए, सीखें

राग कल्याणी में एक गीतम

राग कल्याणी में गीतम के स्वर (नोट्स) और साहित्य (गीत) सीखने के लिए ऑडियो सुनें| गीतम कर्नाटक शास्त्रीय संगीत ईश्वर या देवी पर आधारित स्तुतिपरक रचना है| यह गीतम राग कल्याणी पर आधारित है और त्रिपुट ताल में बद्ध है| त्रिपुट ताल में सात मात्राएँ होती हैं, जो 3+2+2 के विभाग में विभाजित हैं| कल्याणी के स्वर शंकराभरणम से सादृश्य हैं, केवल मध्यम स्वर को छोड़कर, क्योंकि कल्याणी में मध्यम ऊँचा है|

काव्य

कमला जादला

 विमला सुनयना 

कारीवरदा करुणाम बुद्धे 

करुणा शारदे कमला कांता

 केशी नरका सुरा विभेदना 

वरदा वेल्लापुरा सुरोत्तमा 

करुणा शारदे कमला कांता

यह गीत भगवान विष्णु पर आधारित है, जो ब्रह्मांड के संरक्षक हैं| इस गीत में उनकी करुणा और वैभव का वर्णन है|




कमलाजादला

रागम -कल्याणी 

ताल- त्रिपुर

 रचनाकार- पुरन्दादास

आरोहनम- सा   रे ग म प ध नी सां 

अवरोहनम -सां  नी  ध  प  म  ग रे  सा


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कर्नाटक संगीत के त्रिमूर्ति


त्यागराज, मुथुस्वामी दीक्षितर और श्यामा शास्त्री को कर्नाटक संगीत का 'त्रिमूर्ति' कहा जाता है| ये सभी कर्नाटक संगीत के अग्रणी रचनाकार माने जाते हैं| त्यागराज अपनी रचनाओं में अपना नाम त्यागराज ही लिखते थे, जबकि मुथुस्वामी दीक्षितर की कृतियाँ 'गुरुगुहा' और श्यामा शास्त्री की कृतियाँ 'श्यामकृष्णा' नाम से थी| त्यागराज की अधिकांश गीत भगवान राम से संबंधित हैं| मुथुस्वामी स्वामी दीक्षितर संस्कृत भाषा के विद्वान थे| उन्होंने विभिन्न देवी-देवताओं पर आधारित कृतियाँ गाईं| श्यामा शास्त्री ने देवी कामाक्षी पर विद्वतापूर्ण कृतियों की रचना की|

 


यहाँ रागम कल्याणी में कुछ स्वर अभ्यास दिए गए हैं| उनकी बात सुनिए और अभ्यास कीजिए|

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गायन तकनीक


गमक वह विशेष अलंकरण है जिनका प्रयोग कलाकार अपने गायन को सुंदर और अभिव्यंजक बनाने के लिए करते हैं| स्वर की तारता को अगले स्वर तक विस्तार (काकु) द्वारा कंपन करते हुए नियंत्रित किया जाता है|