अध्याय -17
आइए, डिजाइन बनाएँ

मंचीय तकनीक 1
रंग रचना के संसार में,
रूप सज्जा बनती है एक कहानी,
खुलती है भावों की गठरी
जब छूती है चेहरे को रंगों की कुंची|
पोशाक के चित्रपट
पर उभरते हैं नित-नए किरदार
सामंजस्य और दृश्य के विधान से रच देते हैं
अनूठा, अकल्पनीय, रंग-रचना का संसार |
दृश्य 3– रंगमंच प्रस्तुति
किसी एक सफल प्रस्तुति में, हम देखते हैं कि अभिनेता अभिनय करता है और प्रशंसा पाता है| लेकिन उसके लिए बहुत से अन्य संबंधित कला विभागों के प्रयास और कार्य भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, ताकि उसका अभिनय दर्शकों को पूरी तरह से प्रभावित कर सके| हम यहाँ उन मूलभूत कलाओं को समझेंगे -
- रूप-सज्जा
- वस्त्र-विन्यास
- मंच-विन्यास
प्रथम दृष्टि में किसी की पहचान उसके चेहरे से होती है| इसलिए एक अभिनेता के लिए मंच पर विश्वसनीय दिखने हेतु प्राथमिक रूप से जिस तत्व पर विचार किया जाना चाहिए वह है- रूप-सज्जा|
रूप-सज्जा
क्या आपने कभी अभिनेता के चेहरे पर लगे रंगों पर गौर किया है? कुछ को देखकर अच्छा लगता है, कुछ-कुछ डरावने लगते हैं और कुछ को देखकर हँसी आती है| ये सब रूप-सज्जा का कमाल होता है| यह योजनाबद्ध तरीके से, भूमिकाओं के अनुसार किया जाता है| मंच पर प्रदर्शन करने वाले प्रत्येक पात्र चाहे वह किसी जेंडर, आयु या समुदाय आदि का हो, उसकी रूप-सज्जा करनी पड़ती है|
प्रस्तुत अवधारणाएँ
- रूप-सज्जा और वस्त्र-विन्यास
- मंच
- नाट्य-लेखन

कक्ष, जिसे ग्रीन कक्ष भी कहा जाता है, अच्छी रोशनी वाला और हवादार होना चाहिए|
आपका सवाल हो सकता है, लेकिन क्यों? रूप-सज्जा क्यों आवश्यक है? हम अपने दैनिक जीवन में तो रूप-सज्जा नहीं करते, मंच पर यह क्यों आवश्यक है?
आपका उत्तर होगा
1. दृश्यता और प्रदर्शन- रूप-सज्जा चेहरे से संबंधित विशेषताओं को बढ़ाती है, यह सुनिश्चित करती है कि भाव और अभिव्यक्तियाँ दर्शकों को दूर से भी स्पष्ट दिखाई दें|
2. चरित्र रूपांतरण -अभिनेताओं को किसी पात्र विशेष में ढालने के लिए रूप-सज्जा एक शक्तिशाली उपकरण है| यह किसी भी कलाकार को बूढ़ा दिखाने, युवा दिखाने या पात्र विशेष में ढालने के लिए न केवल सहायक होती है, बल्कि समग्र रूप से पात्र की प्रामाणिकता को भी बढ़ाती है|
3. चेहरे के भावों को उभारना -रूप-सज्जा चेहरे और आँखों के विशेष भावों को प्रमुखता से रेखांकित करने का कार्य भी करती है, जिससे दर्शकों को सूक्ष्मतम बारीकियाँ दिखाई दे सकें|
4. मंचीय-प्रकाश के साथ सामंजस्य- मंच मच पर उपयोग की जाने वाला रोशनी का प्रकाश अत्यधिक सघन होता है जिससे तवचा के प्राकृतिक रंग में बदलाव आ सकता है | मंच की रोशनी के प्रयोग में अभिनेता के चेहरे को फीकेपन एवं आवश्यकता से अधिक अधंकारमय होने स बचाने के लिए रूप-सज्जा का प्रयोग संतुलन बनाने के लिए किया जाता है
5. ऐतिहासिक और नाटकीय शैलियाँ- मंच-विन्यास या शैली के अनुसार, शैली विशेष को उसी रूप में प्रस्तुत करने के लिए भी रूप-सज्जा की जाती है| यह अभिनेताओं को निर्देशक द्वारा परिकल्पित किसी कालावधि संस्कृतियों या काल्पनिक दुनिया के अनुरूप ढालने में सहायक होती है|
संक्षेप में, मंच पर अभिनेताओं के लिए रूप-सज्जा का अर्थ केवल अच्छा दिखना या सौंदर्यबोध होना नहीं है| यह एक व्यावहारिक और कलात्मक आवश्यकता है| ऐसा इसलिए, क्योंकि यह किसी भी नाट्य प्रदर्शन की सफलता में अपना महत्वपूर्ण योगदान देती है| यह अभिनेताओं को दर्शकों के साथ प्रभावी ढंग से संवाद स्थापित करने में सहायक होती है, उनके चरित्र चित्रण को निखारती है, तथा समग्र रूप से - प्रस्तुति के दृश्यों को वांछित प्रभाव प्रदान करती है|
नाटक और भूमिका के आधार पर रूप-सज्जा विभिन्न प्रकार की होती हैं|
- साधारण रूप-सज्जा- सरल एवं मूलभूत विशेषताओं को रेखांकित करने वाली|
- चरित्र रूप-सज्जा - इनमें आयु, पेशा, व्यक्तित्व और परिस्थिति जैसे तत्वों को दिखाया जाता है|
- विशेष प्रभाव- इनमें घाव, धब्बों या सींग आदि जैसी अतिरिक्त विशेषताओं को सम्मिलित किया जाता है|

उपरोक्त विवरण के आधार पर रूप-सज्जा के प्रकार को पहचानिए और लिखिए|
- काल्पनिक या अमूर्त रूप-सज्जा- आधुनिक रंगों के साथ अनूठे, अपरिचित पात्रों का निर्माण किया जाता है|
- माइम या पैटर्न रूप- सज्जा -एक आकर्षक फेस कवर जो आमतौर पर तटस्थ होता है|
लोगों का सर्वप्रथम ध्यान चेहरे पर जाता है| उसके बाद वस्त्र, पोशाक या कपड़े ध्यान आकर्षित करते हैं| नाटक में किसी भी व्यक्ति का चरित्र उसके द्वारा पहने जाने वाले कपड़ों से निर्धारित होता है| इसलिए मंच के पात्रों के लिए निश्चित रूप से यह बहुत ही महत्वपूर्ण तत्व है|
वस्त्र-विन्यास
हम विभिन्न अवसरों पर भिन्न- भिन्न प्रकार के कपड़े पहनते हैं| आप घर में जो पहनते हैं, उसे स्कूल में नहीं पहनते| इसी तरह गाँव के किसी त्योहार के दौरान आप जिन कपड़ों को पहनकर मंदिर में जाते हैं, वो आपके रात में पहनकर सोने वाले कपड़ों से अलग होते हैं| हैं ना?
इसी तरह एक अभिनेता विभिन्न पात्रों को रचने के लिए भिन्न-भिन्न वस्त्र पहनता है| इससे दर्शकों को पात्र को समझने, पहचानने और उससे जुड़ने में मदद मिलती है|
यहाँ प्रश्न हो सकता है, जब हमारे पास चुनने के लिए अनेकों कपड़े और विकल्प उपलब्ध हैं, तो कोई यह कैसे तय कर सकता है कि किसी चरित्र के लिए क्या उपयुक्त रहेगा? इसे कुछ बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है- वस्त्रों को निम्नलिखित श्रेणियों के अनुसार परिकल्पित किया गया है-
- जेंडर विशेष- पुरुषों और महिलाओं के कपड़े भिन्न-भिन्न होते हैं|
- पात्र की आयु- भिन्न-भिन्न आयु में लोग भिन्न-भिन्न तरह के कपड़े पहनते हैं|
- नाटक की समय रेखा -किसी भी संस्कृति की प्रवृत्तियाँ या वेशभूषा बदलते समय के साथ विकसित और परिवर्तित होती रहती है (शिवाजी महाराज के समय जॉस-पेंट का कोई अस्तित्व नहीं होता था)|
- कहानी का भौगोलिक स्थान - संस्कृतियों और देशों के अनुसार अंतर होता है (कर्नाटक का पारंपरिक पहनावा बंगाल से भिन्न है)|
- पात्र का व्यवसाय- पुलिस, वकील और डॉक्टरा |
- पात्र की विशेषताएँ- एक व्यक्ति जो हमेशा गंदे वस्त्र पहनता है और एक, जो हमेशा स्वच्छ वस्त्र पहनता है|

इन सभी तत्वों को वस्त्र-विन्यास में कैसे सम्मिलित किया जाता है? निम्न का सही तरीके से प्रयोग करके- वस्त्र या सामग्री समय सीमा और भौगोलिक स्थिति का मिलान किया जाए (प्राचीन भारत के हिमालय की एक कहानी के लिए सिंथेटिक शिफॉन का उपयोग करना संभव नहीं है, क्योंकि प्राचीन भारत में शिफॉन मौजूद ही नहीं था और यह हिमालय के ठंडे मौसम के अनुकूल भी नहीं होगा)|
रंग- यह निम्नलिखित का प्रतिनिधित्व करते हैं, जैसे-
- समय – काल (वैदिक काल के किसी दृश्य के लिए निऑन नीले रंग का प्रयोग उचित नहीं है)|
- प्रत्येक रंग एक निश्चित अर्थ का प्रतिनिधित्व करता है (नकारात्मक पात्रों के लिए गहरे रंग)|
- सांस्कृतिक पहलू (शोक या अंतिम संस्कार जैसे दृश्यों में लाल रंग का प्रयोग नहीं किया जाता है)|
विन्यास और पद्धति (पैटर्न और डिजाइन) – कपड़ों पर कुछ पैटर्न ऐसे होते हैं, जो राजघराने के लिए विशेष होते हैं, कुछ जनजातीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि कुछ ग्रामीण परिवेश के लिए विशिष्ट होते हैं|
स्टाइलिंग - आभूषण, मुकुट, दुपट्टा, बेल्ट, बैग, चश्मा आदि अतिरिक्त सामग्री|
वेशभूषा के आधार पर आप इन चरित्रों के बारे में क्या समझते हैं, नीचे लिखिए|

गतिविधि - आइए, अभिकल्पन करें!
अभिकल्पन (डिजाइन) का पहला चरण योजना बनाना है और यह रेखाचित्र के माध्यम से किया जाता है|
1. रूप-सज्जा योजना- बाल और सिर से संबंधित तत्व बनाएँ तथा नीचे दिए गए पात्र को प्राप्त करने के लिए आवश्यक रूप- सज्जा के साथ इसे रंग दीजिए| आप इसे अपनी अभ्यास पुस्तिका में बना सकते हैं और बार-बार अभ्यास कर सकते हैं|
संभव हो सके आप अपनी ओर से इसे रचनात्मक और रुचिपूर्ण बनाएँ| मुकुट, सिर का पहनावा, बाल आदि का प्रयोग कीजिए| इस बात का ध्यान रखिए कि आप इसे किसी ऐसे व्यक्ति के चरित्र जैसा बनाएँ जिसका वास्तव में अस्तित्व हो (जैसे – गांधी जी, सुभाष चंद्र बोस आदि)| इसे यथासंभव सरल किंतु परिशुद्ध रखिए|


उदाहरण
2. वस्त्र-विन्यास अब हम उसी तरह से वस्त्र-विन्यास करने का प्रयास करेंगे!
जिस पात्र की आपने रूप-सज्जा की थी, अब उसी के लिए वस्त्र विन्यास कीजिए!
समयावधि, कार्य की प्रकृति, रंग और अन्य विवरण का ध्यान रखिए| आप दिखाए गए चित्र के अनुसार कपड़े के टुकड़े बना सकते हैं या चिपका सकते हैं|
पोशाक पहन ली गई है, रूप-सज्जा हो गई है, लेकिन आप इसे मंचित कहाँ करेंगे?


इसका उत्तर आपके प्रश्न में ही छुपा है|
मंच से जुड़ी कुछ रोचक बातें रंगमंच शब्द की उत्पत्ति ग्रीक प्रदर्शन स्थल 'थिएट्रीन' के नाम से हुई है|
एक मंच पर!
मंच एक वह स्थान है, जहाँ आप नाटक प्रस्तुत करते हैं| रंगमंच के इतिहास में मंच के विभिन्न प्रकार देखने को मिलते हैं|
नाटकों का मंचन अनेक स्थलों पर किया गया है, जिनमें भारतीय नाट्यगृह, ग्रीक थिएट्रॉन से लेकर विश्य में नाटक के लिए विभिन्न तरह के रंगमंच, जैसे सड़कों पर नाटक प्रस्तुति और अंत में 'प्रोसीनियम' नामक आधुनिक इंडोर प्रेक्षागृह सम्मिलित हैं| 'प्रोसीनियम' आज के प्रदर्शनों में सबसे लोकप्रिय और सामान्य रूप से प्रयोग की जानी वाली संरचना है|
प्रोसीनियम
प्रोसीनियम मंच की उत्पत्ति सीधे विधुत और प्रकाश बल्ब, जैसी वैज्ञानिक खोजों से जुड़ी हुई है|
पहले, अधिकांश नाटक दिन में, मंच पर पड़ते सूर्य के प्रकाश में होता था या रात में बड़े तेल के दीयों के प्रकाश में होता था, जैसा कि प्राचीन समय में प्रचलित था| बाद में विधुत और विधुत बल्बों का प्रयोग कर प्रकाश, उसकी तीव्रता और अन्य पहलुओं को नियंत्रित किया जा सका|
इससे नाट्य प्रदर्शन किसी बंद भवन के अंदर ही किया जाने लगा, जहाँ न तो तीव्र धूप, न ठंडी हवाएँ और न ही भारी बारिश प्रदर्शन के मंचन में बाधक बन सकें|
मंच के प्रमुख भाग
साइड विंग्स - विंग्स मंच के दोनों ओर लगे होते हैं, जो कलाकारों को मंच पर प्रवेश करने तथा पुनः वापस जाने में मदद करते हैं|
एप्रन - यह घुमावदार भाग होता है, जो मंच से आगे की ओर निकलकर दर्शकों की ओर जाता है, सामान्यतया इस भाग का प्रयोग फुट लाइट और फुट माइक लगाने के लिए किया जाता है|
प्रोसीनियम- प्रोसीनियम मंच के आगे की ओर लगा हुआ फ्रेम या वृत्तखंड होता है|
साइक्लोरामा - मंच की पिछली दीवार पर लगा एक बड़ा, हल्का नीला या सफेद रंग का कपड़ा, जो मंच पर प्रदर्शित किए जाने वाले दृश्य को अनुकूल बनाता है| जिसका प्रयोग आकाश, बादल,…सूर्योदय आदि जैसे विशेष प्रभाव को उत्पन्न करने के लिए किया जाता है |
सी. - सेंटर
सी. आर. - सेंटर राइट
सी. एल. - सेंटर लेफ्ट
यू. आर. अप राइट
यू. सी. - अप सेंटर
यू. एल. - अप लेफ्ट
डी. आर. डाउन राइट
डी. सी. - डाउन सेंटर
डी. एल. - डाउन लेफ्ट
गतिविधि
अब तक सीखी हुईं समस्त क्रियाओं को एक साथ प्रयोग करने के लिए निम्नलिखित कार्य कीजिए-
1. अपनी किसी प्रिय कहानी का चयन कीजिए|
2. अपने पसंद के किन्हीं दो पात्रों को चुनिए| उनके लिए वस्त्र-विन्यास और रूप-सज्जा कीजिए (पुस्तक में पढ़ी हुई किसी कहानी की नकल न कर स्वयं बनाएँ)|
3. दिखाए गए चित्र के अनुसार गत्ते की सहायता से एक मंच का प्रतिरूप तैयार कीजिए, जिसमें साइड विंग्स भी हो (इसे समूह में भी किया जा सकता है)|
4. योजना बनाएँ कि मंच और सामग्री का उपयोग करते हुए मंच पर किसी एक दृश्य को कैसे अभिनीत किया जा सकता है (कुर्सियाँ, मेज आदि या पेड़, झोंपड़ी आदि)|
वैकल्पिक रूप से इसका एक चित्र बनाइए|

दृश्य 4- ठीक से लिखिए
आलेख एक कैची है, कहानीकार की,
रंगती जो दुनिया को अपने शब्दों से,
नृत्य के लिए आमंत्रित करता पात्रों को
गढ़ता है एक ऐसा जादू,
मंत्र-मुग्ध कर देता है, जो दर्शक को|
एक अच्छा आलेख (पटकथा) का होना सफल प्रस्तुति की ओर पहला कदम है| जिस प्रकार किसी भवन की पक्की नींव किसी भी संरचना का सबसे महत्वपूर्ण पहलू होता है ठीक उसी प्रकार सही आलेख भी कौशल और रचनात्मक विकास के लिए एक आधार तैयार करता है| आइए, सबसे पहले हम उन शब्दों और शब्दावलियों को समझें, जो सामान्यतया प्रयोग में आते हैं- कहानी, नाटक, आलेख, संवाद| क्या ये सब एक ही हैं? नहीं!
एक नाटक वह कहानी होती है, जो प्रत्यक्ष रूप से आपसे कही जाती है| पात्र जीवंत हो उठते हैं और घटनाएँ आपके सामने घटित होने लगती हैं| लेकिन जब यह आलेख (लिखित रूप) के रूप में होता है, क्या यह कहानी के समान नहीं होता है?
कहानी और नाटक के आलेख में क्या अंतर है?

गतिविधि (कक्षा में)
कहानी निर्माण निर्देश- सभी एक वृत्ताकार गोले में बैठते हैं (अगर घेरा बनाना संभव न हो, तब अपनी जगह पर भी बैठा जा सकता है)| शिक्षक पहला वाक्य बोलकर शुरुआत करेंगे| आपमें से प्रत्येक एक पंक्ति जोड़कर एक कहानी का निर्माण करेगा| ध्यान से सुनिए कि अंतिम वाक्य क्या था? आपको वहीं से आगे बढ़ाना है|
कहानी पूरी करने की जल्दबाजी मत कीजिए| कहानी रोचक और जटिल बनाने की कोशिश कीजिए|
आरंभिक स्तर- प्रत्येक एक पंक्ति बोलेगा, जब तक कि सभी को अवसर न मिल जाए| अंतिम समूह के बच्चों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे उसे पूरा करें|
चर्चा
क्या यह एक रूचिपूर्ण कहानी है? क्या आपको लगता है कि यह कहीं से उबाऊ हो गई है? कहानी क्या है, क्या आप वर्णन कर सकते हैं? क्या यह किसी नाटक के आलेख की तरह है?
नाटक के आलेख में ऐसी कौन-सी बातें हैं, जो आपको कहानी की पुस्तक से भिन्न लगती है? उनमें कुछ के नाम बताइए जो भिन्न हैं|
कहानी वास्तविक या काल्पनिक घटनाओं, अनुभवों या किसी रोमांच का एक वर्णन या विवरण है. जिसे संरचित या सुसंगत रूप में प्रस्तुत किया जाता है| इसमें समय के साथ सामने आने बाली घटनाओं की एक श्रुंखला सम्मिलित होती है, जो क्रमानुसार प्रकट होती है| सामान्य रूप से चरित्रों की कथा होती है, जो चुनौतियों का सामना करते हैं, परिवर्तनों से गुजरते हैं और कथा के समग्र विकास में योगदान देते हैं|
वार्तालाप दो या दो से अधिक लोगों के बीच संवादात्मक, मौखिक आदान-प्रदान है| यह एक सामाजिक तथा संवाद प्रक्रिया है. जहाँ प्रतिभागी सम्मिलित होते है और बारी-बारी से एक संवाद बोलते हैं तथा सुनते हैं, जो आकस्मिक, औपचारिक या संरचित हो सकता है|
एक उल्लेखनीय अंतर यह है कि कहानी एक लेख के रूप में होती है, जबकि आलेख 'बातचीत' के रूप में|
मुझे विश्वास है, आप प्रत्येक दिन लोगों को घर में, सड़क पर, विद्यालय में, प्रत्येक जगह बातचीत करते देखते या सुनते होंगे| आइए, एक दुकानदार और ग्राहक के बीच किसी साधारण बातचीत को लिखने का प्रयास कीजिए| यह वह भी हो सकती है, जो आपने देखा हो या बिल्कुल ही काल्पनिक भी हो सकती है|
ग्राहक-.....................................................
दुकानदार-..............................................
ग्राहक-....................................................
दुकानदार-................................................
(यदि आप बातचीत को आगे चलाए रखना चाहते हैं, तो नोटबुक का प्रयोग कीजिए| इसे आप अपनी इच्छा के अनुसार बढ़ा सकते हैं|)

बधाई हो आपने अपना पहला आलेख लिख लिया है!
आइए, अब अगले पढ़ाव की ओर चलते हैं| अगर आप ध्यान से देखेंगे, तो पाएँगे कि जो आलेख आपने लिखा है, वह आपके देखे हुए नाटक या सुनी हुई कहानी से भिन्न है| ऐसा क्या है, जिसका अभाव है?
यह हमें किसी कहानी या आलेख के तीन प्रमुख भागों को समझने में सहायता करता है|
| आरंभ | मध्य |
अंत |
|
पात्र कौन हैं? कहाँ हैं और कब हैं? पात्र क्या चाहते हैं? |
पात्रों की समस्या क्या है? पात्रों को क्या हुआ है? वे इस पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं| |
क्या समस्या का हल होता है? यह कैसे और कौन करता है? निष्कर्ष क्या है? |
|
||
![]() खरगोश और कछुए की दौड़ा
|
मध्य खरगोश आराम करता है, कछुआ आगे निकल जाता है |
अंत कछुआ दौड़ जीत जाता है, खरगोश हार जाता है| |
यदि आप आलेख के मध्य वाले भाग पर ध्यान दें, तो यहाँ वह समस्या दिखाई दे रही है, जिस बारे में हम बात कर रहे हैं| यह किसी भी कहानी या आलेख का सबसे महत्वपूर्ण भाग होता है| इसे 'द्वंद्व' कहा जाता है|
यहाँ एक उदाहरण दिया गया है कि कैसे इस लोकप्रिय कहानी में द्वंद्व का उपयोग किया जाता है| जिसे हम सभी जानते हैं--- खरगोश और कछुआ|
द्वंद्व (कान्फ्लिक्ट) कहानी के पात्रों या तत्वों के बीच द्वंद्व या असहमति, जो अवरोध उत्पन्न करता है और कहानी को आगे ले जाता है|
द्वंद्व कहानी कहने का आधारभूत तत्व है| क्योंकि यह उन चुनौतियों, दुविधाओं या विरोधी ताकतों को निर्माण करता है, जिन्हें पात्रों को सुलझाना होता है|
कहानी में रुचि उत्पन्न करने, दर्शकों को बाँधे रखने एवं चरित्र के विकास के लिए आवश्यक वातावरण के हेतु यह तनाव अति आवश्यक है|
उदाहरण 1- बिना किसी द्वंद्व के संवाद
ग्राहक- नमस्ते, मुझे अपनी बहन के लिए मिठाई चाहिए|
दुकानदार- ठीक है, आपको किस तरह की मिठाई चाहिए?
ग्राहक -मेरी बहन को लड्डू पसंद हैं|
दुकानदार- हमारे पास बूंदी के, बेसन के और मेवे के लड्डू हैं|
ग्राहक- मुझे बूंदी के लड्डू चाहिए|
दुकानदार--क्या इसे उपहार की तरह सज्जित डिब्बे में पैक करना है?
ग्राहक- हाँ| कृपया कर दीजिए|
दुकानदार- --ये लो, आपका उपहार| इसके पचास रुपए लगेंगे|
ग्राहक-- वे लीजिए पैसे, धन्यवाद|

आइए, देखते हैं कि द्वंद्व से क्या अंतर पड़ता है|
उदाहरण 2- द्वंद्व के साथ संवाद
ग्राहक- नमस्तेः मुझे अपनी बहन के लिए मिठाई चाहिए|
दुकानदार- ठीक है, आपको किस तरह की मिठाई चाहिए?
ग्राहक- मेरी बहन को बूंदी के लड्डू पसंद हैं|
दुकानदार- क्षमा करें| हमारे पास केवल बेसन और मावे के लड्डू है|
ग्राहक - ओहा लेकिन मेरी बहन को बूंदी के लड्डू पसंद हैं| कोई बात नहीं, आप मुझे बेसन के लड्डू दें और उसे उपहार हेतु सज्जित डिब्बे में पैक कर दें|
दुकानदार- ओह! हमारे पास सज्जित डिब्बा उपलब्ध नहीं है| क्या इसे सामान्य भूरे रंग के लिफाफे में दे दूँ?
दुकानदार- अरे! रुको... मैं कुछ व्यवस्था करता हूँ (फोन उठाकर किसी से बात करता है)| आप चिंता मत कीजिए अब आपको आपको बूंदी के लड्डू और सज्जित डिब्बा भी मिल जाएगा | मैं आपके लिए अपने गोदाम से मँगवा रहा ह | क्षमा कीजिए आपको असुविधा हुई |
ग्राहक— कोई बात नहीं | धन्यवाद |

दूसरे उदाहरण में आया टकराव या द्वंद्व पहले उदाहरण में आई नीरसता की तुलना में क्या कुछ भाव और नाटकीयता ला पाया है? इसी तरह आप अपने पूरे आलेख को रूचिपूर्ण बना सकते हैं|
अब, इसे फिर से जाँचें और देखें कि क्या आपने दुकानदार के साथ जो संवाद लिखे हैं उसमें कोई 'द्वंद्व' है? क्या कहानी निर्माण खेल में भी आपको कोई द्वंद्व दिखा? चलिए इसे फिर से खेलते हैं|
गतिविधि (कक्षा में – जारी)
आइए, कहानी निर्माण खेल के दूसरे चरण में चलते हैं और खेल शुरू करते हैं|
निर्देश - सभी एक वृत्ताकार घेरे में बैठते हैं (अगर यह संभव न हो, तो अपनी जगह पर ही बैठा जा सकता है)| शिक्षक पहले वाक्य बोलकर खेल की शुरुआत करेंगे| कहानी निर्माण के लिए आप में से प्रत्येक एक पंक्ति जोड़ता है, अंतिम वाक्य क्या था, इसे ध्यान से सुनिए, आपको वहाँ से आगे बढ़ना होगा|
कहानी पूरी करने में किसी प्रकार की शीघ्रता न करें| कहानी को रोचक बनाने का प्रयास कीजिए|
उच्च स्तर – 10-15 पर्चियाँ बनाइए, जिस पर कुछ क्रमरहित वाक्य लिखे हों, जैसे 'नायक भूल गया', या 'पात्र बहुत भूखा है', या 'अचानक बिजली चली गई'| इसका मुख्य उद्देश्य कहानी में एक 'मोड़' लाना है ... या अधिक पेशेवर भाषा में, जिसे अब आप भी जानते हैं - 'द्वंद्व' है|
जैसे, आपने पहले कहानी में एक वाक्य जोड़ा था| प्रत्येक 10 पंक्तियों के पश्चात आप एक पर्ची निकालते हैं कहानी में एक नया मोड़ आता है और आपको उसे कहानी में सम्मिलित करना होता है| आरंभ-मध्य-अंत का ध्यान रखिए| बच्चों के अंतिम समूह को कहानी में आए द्वंद्व को सुलझाना होगा और एक निश्चित निष्कर्ष तक पहुँचना होगा|
इस खेल को जितनी बार चाहें उतनी बार खेलें, बच्चों का क्रम बदलें, इससे कहानी में आने वाले प्रवाह, चिंतन और उसके समाधान से परिचित होने में सहायता मिलेगी| इन मूलभूत बातों से परिचित होने के बाद अब आप गंभीर आलेख लिख सकते है|
अपने स्वयं का नाटक लिखने के लिए यहाँ कुछ सरल चरण दिए गए हैं| पहले अपनी पुस्तिका में पीछे बताए गए तीन भागों के बारे में टिप्पणी लिखिए-
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'आरंभ' के साथ शुरुआत कीजिए |
अब आप 'मध्य के बारे में विचार कीजिए |
अंततः 'अंत' |
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पात्र कौन हैं (उनका नाम, आयु, पेशा आदि)? घटना कब और कहाँ घटित हो रही है? |
द्वंद्व क्या है? इसे कैसे प्रस्तुत किया जाता है? पात्र क्या करते हैं? |
द्वंद्व का समाधान कैसे किया गया? पात्रों के साथ क्या हुआ? निष्कर्ष |
इसकी सहायता से अब आप संवाद लेखन शुरू कर सकते हैं| |
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हमारे समय के प्रसिद्ध लेखक (अंग्रेजी) |
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कहानियाँ और उपन्यास (लेखक) |
नाटक (नाटककार) |
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सुधा मूर्ति आर. के. नारायण रस्किन बॉण्ड |
रवींद्रनाथ टैगोर शेल सिल्वरस्टीन तारो येशिमा |
दूसरों की कृतियाँ पढ़ना प्रेरणादायक होता है और इससे आपको अपने काम के लिए विचार भी मिल सकते हैं|
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आप जो भी कहानी पढ़ते हैं या कोई फिल्म देखते हैं, उसमें कहानी के तीन भागों को पहचानने का प्रयास कीजिए- आरंभ, मध्य और अंत | यह भी समझने की कोशिश कीजिए कि द्वंद्व कैसे शुरू होता है और उसका समाधान कैसे होता है| विवरण लिखिए -
| फिल्म या कहानी का नाम | कहानी का भाग |
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आरंभ........................................ मध्य (द्वंद्व) ..................................... अंत................................................. |
लिखते रहिए ...! लेखन के लिए बधाई!



