कल्पना कीजिए कि आप कलाकारों के एक बड़े समूह के साथ रह रहे हो, जो प्रतिदिन केवल नाट्य प्रस्तुतियाँ करते हैं और उसी के सहारे अपनी आजीविका भी चलाते हैं| ये प्रतिदिन अभ्यास करेंगे, वेश-भूषा पहनेंगे, रूप-सज्जा करेंगे और प्रतिदिन प्रस्तुतियाँ भी करेंगे| ये सभी एक साथ खाते-पीते, खेलते, सोते-जागते और यहाँ तक की प्रस्तुतियाँ देने के लिए सभी एक साथ यात्रा भी करते हैं| इसीलिए इन्हें 'कंपनी रंगमंच' के नाम से जाना जाता है| यह शैली 18वीं, 19वीं और 20वीं शताब्दी में विद्यमान थी| वर्तमान में, उनमें से कुछ मंडलियाँ ही जीवित बची हैं|
आइए, हम इस 'कंपनी थिएटर' के मोहक विचार की एक झलक देखें, जो लगभग विलुप्त होने को है|
'कंपनी थिएटर' शब्द का इस्तेमाल कलाकारों की व्यावसायिक कंपनी के लिए किया जाता है, जो विभिन्न
तरह के नाटकीय प्रदर्शनों को प्रस्तुत किया करते है| ऐसा देखा गया है कि इन मंडलियाँ में ऊँचे पदों पर लोगों का ऐसा समूह होता था, जो अपने निजी और पेशेवर जीवन में आत्मनिर्भर होते थे| मुख सज्जा करने वाला, वस्त्र की सिलाई करने वाला, मंच अभिकल्पक, चित्रकार, प्रकाश तकनीशियन, अभिनेता, नर्तक, गायक, लेखक, रसोइया, प्रबंधक और लेखपाल आदि सभी लोग इन मंडलियों में सम्मिलित होते थे| अधिकांशतया बच्चों के साथ संपूर्ण परिवार इन समूहों का भाग होता था| उन लोगों ने आजीवन एक साथ काम किया, प्रदर्शन किए और यात्राएँ कीं|
भारत के विभिन्न क्षेत्रों में यात्रा करने वाली सबसे पहली 'कंपनी थिएटर' मंडली महाराष्ट्र के मुंबई में स्थित 'पारसी थिएटर कंपनीज' थीं, जिन्होंने 1850 से 1930 के दशक के दौरान संपूर्ण भारत में नाटकों का प्रदर्शन किया|
1853 में "पारसी नाटक मंडली" नामक पहली पारसी रंगमंच कंपनी ने अपना पहला नाटक 'रुस्तम जबीली और सोहराब' का प्रदर्शित किया| इसके बाद क्रमश- राजा अफरासियाब, रुस्तम पहलवान और पादशाह फरेदुन की प्रस्तुतियाँ दी गई| 1860 तक मुंबई में 20 से अधिक पारसी नाटक मंडलियाँ बन चुकी थीं|
उनकी इन प्रोसेनियम शैलियों की प्रस्तुतियों ने संपूर्ण भारतवर्ष की नाट्य प्रस्तुतियों को प्रेरित किया| आगे चलकर 'कंपनी थिएटर' का प्रारूप महाराष्ट्र, बगांल, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश के अन्य भागों के साथ संपूर्ण भारत में विस्तृत हो गया|
पारसी नाटक मंडली
लोकप्रिय कंपनियाँ, प्रदर्शन और कहानियाँ
'सुरभि थिएटर' या श्री वेंकटेश्वर नाट्य मंडली 1885 में आंध्र प्रदेश में बनाई गई थी| उनका पहला नाटक 'कीचक वध' था| यह एक पारिवारिक थिएटर कंपनी है, जो हिंदू परंपरा और इतिहास पर आधारित कहानियों का मंचन करती है| यह उन मंडलियों में से एक है, जो गत 138 वर्षों से निरंतर प्रस्तुतियाँ दे रही है|
तर्क से परे विस्मयकारी दृश्य, वी. एफ. एक्स. का प्रयोग एवं मायावी संसार रचना इनकी प्रमुख विशेषताएँ हैं|
'सुरभि थिएटर' अभी भी निम्नलिखित नाटकों को प्रदर्शित करती हैं -
श्री कृष्ण लीलालु - कृष्ण की बाल-लीला|
जय पाताल भैरवी - लोक चरित्र थोटा रामाडु की कथा|
भक्त प्रह्लाद - विष्णु भक्ति में समर्पित बालक प्रह्लाद की कथा|
माया बाजार - दानवराज घटोत्कच्छ की कथा|
श्री वेंकटेश्वर उद्भवम (श्रीनिवास कल्याणम्)|
बालानागम्मा - एक दुष्ट जादूगर की कथा|
कर्नाटक नाटक मंडली की स्थापना वर्ष 1874 में कर्नाटक के गडग नामक स्थान पर हुई थी| इसके पीछे सक्करी बालाचार्य (शांता कवि) का अथक प्रयास था| उन दिनों कीचक, बाणासुर और वस्त्रहरण जैसे नाटक मंच पर बहुत लोकप्रिय थे|
लगभग उसी समय, कर्नाटक के बीजापुर जिले के हलासंगी में 'हलासंगी नाटक मंडली' की शुरुआत की गई| वेंकन्नाचार्य अगलगट्टी द्वारा लिखित श्रीमती परिणय, मदालसा परिणय, द्रौपदी वस्त्रहरण और भौमासुर वध आदि जैसे लोकप्रिय नाटक हुए|
उन्हें मैसूर के महाराजाओं का संरक्षण प्राप्त था, जिन्होंने उनका समर्थन के साथ-साथ दृश्य कलाओं
को प्रोत्साहित करने के लिए उदारतापूर्वक दान भी दिया|
'श्री चन्नबसवेश्वर नाटक मंडली या गुब्बी कंपनी', उन दिनों कर्नाटक की सबसे प्रसिद्ध थिएटर कंपनी थी| उनके लोकप्रिय नाटकों में से एक सदारामे, सुभद्रा, हेमारेड्डी मल्लम्मा आदि प्रमुख थे| जिनके प्रदर्शन हमेशा दर्शकों से खचाखच भरे होते थे| लोग इनके टिकट क्रय करने के लिए कई-कई दिनों तक लंबी पंक्तियों में खड़े रहते थे|
कुछ अनूठी विशेषताएँ -
- यह ऐसी मंडली थी, जिसने सबसे पहले महिलाओं को अभिनय करने की अनुमति प्रदान की थी|
- कन्नड़ के प्रसिद्ध अभिनेता डॉ. राजकुमार ने इसी कंपनी से अपने थिएटर व्यवसाय का आरंभ किया था|
- कर्नाटक के प्रसिद्ध रंगमंच निर्देशक बी.वी. कारंत ने भी अपने रंगमंचीय यात्रा का आरंभ इसी कंपनी से किया था|
वर्तमान स्थिति
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत में 'कंपनी थिएटरों' का काल धीरे-धीरे खत्म होता चला गया| इसके कई प्रमुख कारण थे -
- . अधिकांश कंपनियों का वित्तीय लेन-देन और प्रबंधन मांग के अनुरूप नहीं किया गया|
- सिनेमा उद्योग, जैसी अभिनव तकनीकें सशक्त दावेदार के रूप में उभरकर सामने आईं|
विषय-वस्तु और कहानियाँ न्यूनाधिक पारिवारिक माहौल के प्रतिकूल होती गईं| चूँकि कुछ कंपनियों ने अधिक कमाई के लिए अश्लील हास्यों का सहारा लिया|
अव्यावसायी रंगमंच या हव्यसी रंगमंच शैली की अवधारणाओं ने अपनी सुविधा के अनुसार अधिक लोकप्रियता प्राप्त की|
भारत में व्यावसायी रंगमंच
वर्तमान में, कंपनी थिएटर में गिरावट आई है, आज भी कई व्यावसायी कंपनियाँ हैं, जो उच्च गुणवत्ता वाली प्रस्तुतियाँ प्रदर्शित करती हैं| विज्ञान और प्रौद्योगिकी के युग में थिएटर तकनीकों ने भी उन्नति की है और इसके अच्छे परिणाम परिलक्षित भी हुए हैं|