Skip to content

इकाई 5

Screenshot 2024-08-02 151545

योग


"समग्र स्वास्थ्य और आरोग्य के लिए योग" की दुनिया में आपका स्वागत है। आइए, इस इकाई में हम योग की प्राचीन कला और इसके वैज्ञानिक पक्ष का अन्वेषण करें। योग एक ऐसी विलक्षण पद्धति है जो भारत में उत्पन्न हुई है और हजारों वर्षों से चली आ रही है। भारत में विगत कई पीढ़ियों से नई संततियों को दी जा रही योग की विविध क्रियाओं को अब विश्वभर में अपनाया जा रहा है और इसका आनंद लिया जा रहा है।

योग आत्मनिरीक्षण की एक यात्रा है, जो हमारे शरीर को सुदृढ़ बनाती है और मन को शांत रखती है। हम योग की समृद्ध पद्धतियों में गहराई तक उतरेंगे, इसके इतिहास, दर्शन और व्यावहारिक अनुप्रयोगों की खोज करेंगे। स्वस्थ जीवन के मूलभूत सिद्धांतों से लेकर विभिन्न यौगिक पद्धतियों की जटिलताओं तक, प्रत्येक अनुभाग में योग आपकी समझ और अभ्यास की वृद्धि के लिए मूल्यवान है। ये मानव जाति को अंतर्दृष्टि और व्यावहारिक गतिविधियाँ प्रदान करता है।

यह एक भ्राँति है कि योग केवल शारीरिक व्यायाम का एक रूप है, जिसमें जटिल श्वसन तकनीक और पेशियों व संधियों में घुमाव और खिंचाव होता है। अपने वास्तविक अर्थ में योग एक गहन विज्ञान है, जो मानव मन और आत्मा की अनंत क्षमताओं को प्रकट कर सकता है।

चाहे आप योग की यात्रा आरंभ करने वाले अभ्यस्त व्यक्ति हों या अपने ज्ञान को गहन करने वाले इच्छुक साधक हों, यह इकाई योग के क्षेत्र में आपकी खोज और विकास को प्रोत्साहित करने के लिए एक व्यापक स्रोत के रूप में कार्य करेगी। आइए, हम अपने तन व मन को रूपांतरित करने वाली इस यात्रा पर चलकर, योग के रहस्यों को उजागर करें और हम सभी के अंदर उपस्थित अनंत क्षमताओं की खोज करें।

यह इकाई योग के परिचय से आरंभ होती है, उसके पश्चात हम यम (सामाजिक अनुशासन) और नियम (व्यक्तिगत अनुशासन) तथा दैनिक जीवन में उनके अनुप्रयोग, सूक्ष्म व्यायाम, शिथिलीकरण व्यायाम, आसन, प्राणायाम (श्वास क्रिया), प्रत्याहार (इंद्रियों पर नियंत्रण), विश्राम, धारणा (एकाग्रता), ध्यान (नादानुसंधान) और क्रीड़ा योग की समझ विकसित करेंगे।

योग सत्र संरचना


प्रत्येक योग सत्र का प्रारंभ नीचे दी गई प्रार्थना से करें। यह एक विद्यार्थी और शिक्षक के बीच पवित्र बंधन से संबद्ध है। दोनों मिलकर प्रार्थना करते हैं कि ईश्वर उनके मार्ग को सुरक्षित और ज्ञान से पोषित करें। वे सर्वत्र प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक स्थान के लिए शांति की कामना करते हैं।

प्रार्थना आरंभ करने के बाद सत्र योजना के अनुसार गतिविधियाँ संचालित कीजिए। इसमें यम और नियम, सूक्ष्म व्यायाम, कूल-डाउन (शीतलीकरण) व्यायाम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, विश्राम, धारणा, ध्यान और क्रीड़ा योग (योग खेल) जैसे योग अभ्यास सम्मिलित हैं।

प्रारंभिक प्रार्थना
ॐ सह नाववतु |
सह नौ भुनक्तु |
सह वीर्यं करवाव है |
तेजस्वि नावधीतमस्तु मा  विद्विषाव है |
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ||

प्रार्थना का अर्थ

हम दोनों (गुरु और शिष्य) सुरक्षित रहें।

हम दोनों का पोषण हो। हम सकारात्मक ऊर्जा और ओज के साथ अभ्यास करें।

ज्ञानार्जन फलदायी हो व आलोकित करें।

हम में कभी परस्पर घृणा का भाव ना आए।

प्रारंभिक प्रार्थना के बाद सत्र-संरचना के अनुसार गतिविधियाँ संचालित कीजिए। इसमें यम और नियम, सूक्ष्म व्यायाम, कूल-डाउन (शीतलीकरण) व्यायाम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, विश्राम, धारणा, ध्यान और क्रीड़ा योग जैसे योग अभ्यास सम्मिलित हैं।

योग सत्र को नीचे दी गई प्रार्थना के साथ समाप्त करें। सत्रावसान के बाद की प्रार्थना विद्यार्थियों द्वारा अर्जित ज्ञान को आत्मसात करने और दिन को आनंददायक व सकारात्मक बनाने में सहायता करती है।

समापन प्रार्थना
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः |
सर्वे सन्तु निरामयाः |
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु |
मा कश्चित दुःख भाग्भवेत |
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ||

प्रार्थना का अर्थ

सभी सुखी रहें। 

सभी व्याधियों से मुक्त रहें। 

सभी का मंगल हो। 

कोई भी व्यक्ति दुःख ना सहे। 

सर्वत्र शांति हो।

योग सत्र शुरू करने और समाप्त करने के लिए सामान्य निर्देश-

  • सुखासन की आरामदायक मुद्रा में बैठें।
  • पीठ सीधी रखें, आँखें बंद रखें और चेहरे पर स्मित मुस्कान रखें।
  • अपने हाथों को चिन मुद्रा में रखें और अपनी श्वास पर ध्यान केंद्रित रखें।
  • कुछ सैकेंड के लिए श्वास का निरीक्षण करें, फिर गहरी श्वास लें और श्वास छोड़ते हुए ओम का जाप करें।
  • अपने हाथों को नमस्कार मुद्रा में रखें और प्रार्थना का उच्चारण करें।
  • जप करने के बाद होने वाले परिवर्तनों का अनुभव करें।
  • हथेलियों को धीरे-धीरे रगड़ें, पात्रनुमा आकृति बनाकर उन्हें अपनी आँखों पर रखें।

अध्याय 1

दैनिक जीवन में योग


विद्यार्थियों के रूप में, आपके पास कक्षा कार्य, गृहकार्य, गतिविधियों और परियोजनाओं से युक्त व्यस्त कार्यक्रम होता है। योग आपके मस्तिष्क को तनावमुक्त और एकाग्र रखकर इन गतिविधियों का प्रबंधन करने में आपकी सहायता कर सकता है। यह आपके शारीरिक स्वास्थ्य को उत्तम बनाएगा, जिससे खेल और अन्य गतिविधियों में भाग लेना सरल हो जाएगा। योग को अपनी दैनिक गतिविधियों में सम्मिलित करके, आपका पूरा दिन शांत और ऊर्जावान बना रहेगा।

योग आपको ध्यान केंद्रित करने और अपने विचारों और भावनाओं के प्रति अधिक सचेत होने में सहायता करता है। यह आपको दृढ़ और अधिक लचीला बनाने में सहायता प्रदान करता है। यह आपकी एकाग्रता में वृद्धि करता है, इसलिए आपको कक्षा कार्य या गृहकार्य को ध्यान से करने में सहायक होता है। विशेषकर आप अगर विद्यालय या अन्य स्थिति में तनाव अनुभव कर रहे हैं, तो उस समय योग आपको आनंदित और सहज बनाता है। प्रतिदिन कुछ समय के लिए योग करने से आप में बहुत परिवर्तन आ सकते हैं। योग शरीर और मस्तिष्क की देखभाल करने का एक शानदार संसाधन हैं।

योग का इतिहास

योग की जड़ें भारत के सबसे प्राचीन पवित्र वेद ग्रंथों में पाई जाती है। उस कालखंड में, मानव प्रकृति और ईश्वर से जुड़ने के लिए योग साधना करते थे। महाभारत महाकाव्य में उल्लिखित भगवदगीता के प्रत्येक अध्याय का नाम विभिन्न योग के नाम पर रखा गया है, जिसमें कर्म योग, भक्ति योग, ज्ञान योग और राज योग सम्मिलित हैं।

महर्षि पतंजलि ने 2,000 वर्ष से भी पूर्व योग को 196 योग सूत्रों में संकलित किया था। इन सूत्रों के व्यवस्थित अभ्यासों के माध्यम से समाधि (आनंद) की उच्चतम अवस्था को प्राप्त किया जा सकता है। महर्षि पतंजलि ने इनको आठ चरणों में वर्णित किया है, जिन्हें अष्टांग योग कहा जाता है। इस अध्याय में हम अष्टांग योग के संदर्भ में और अधिक जानेंगे।

योग में सदैव से नए अभ्यासों और विचारों को विकसित किया जाता रहा है। हठ योग, जो योग के प्रायोगिक व व्यावहारिक पक्ष का परिचय देता है, लगभग 1,500 वर्ष पूर्व विकसित किया गया था।

19वीं और 20वीं सदी में स्वामी विवेकानंद, परमहंस योगानंद, महर्षि अरविंद और बी. के. एस. अयंगर जैसे योग गुरुओं ने योग को विश्व के अन्य भागों में पहुँचाया। आज, योग की साधना विश्व स्तर पर की जाती है। 21 जून को 190 से अधिक देशों में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस को मनाते हैं।

योग क्या है?

प्राचीन भारतीयों ने पाया कि योग साधना करने से व्यक्ति अच्छे स्वास्थ्य एवं आरोग्य को प्राप्त करता है। योग को स्वस्थ और सुखमय जीवन जीने के विज्ञान के रूप में परिभाषित किया जाता है। यह हमें अपने कार्य, अध्ययन और अन्य गतिविधियों में शांतिपूर्ण और कुशल बनने में सहायता प्रदान करता है व हमारी क्षमताओं के पूर्ण निष्पादन को सुनिश्चित करता है।

योग शब्द संस्कृत शब्द 'युज' धातु से लिया गया है जिसका अर्थ है 'एकजुट होना या एकीकृत करना'। यह शरीर, मन और आंतरिक स्व के एकीकरण को दर्शाता है। योग स्वयं के अंदर और अपने आस-पास की दुनिया के साथ संतुलन, सामंजस्य और एकता की भावना को जन्म देता है। यह मन को शांत और सभी विकर्षणों से मुक्त करने में भी सहायता करता है।

योग में अव्यवस्थित क्रियाएँ नहीं होतीं, अपितु सुसंयोजित अभ्यास किए जाते हैं। अनुशासित प्रयासों के माध्यम से ही क्रियाओं से लाभ प्राप्त किया जा सकता है। आइए, अष्टांग योग के आठ पहलुओं का अध्ययन करें, जिसमें महर्षि पतंजलि के द्वारा संकलित व्यवस्थित प्रक्रियाएँ सम्मिलित हैं।

इन आठ तत्वों का वर्णन निम्नलिखित है-


Screenshot 2024-10-24 120707

  1. यम (सामाजिक अनुशासन या नैतिकता)- यम दूसरों के प्रति कैसा व्यवहार करना है, जैसे दयालु और ईमानदार आदि के दिशानिर्देश इसके अंर्तगत आते हैं।
  2. नियम (व्यक्तिगत अनुशासन)- ये स्वयं की देखरेख रखने के संदर्भ में दिशानिर्देश हैं, जैसे स्वच्छता रखना और संतुष्ट रहना।
  3. आसन - अपने शरीर को मानसिक रूप से दृढ़ और शारीरिक रूप से लचीला बनाने के लिए प्रतिदिन योगासन का अभ्यास करना।
  4. प्राणायाम (श्वास पर नियंत्रण या श्वसन तंत्र पर प्रभुत्व)- यह श्वास को नियंत्रित करने से संबधित है। आप शरीर और मन को शांत करने के लिए गहरी, शांत श्वास लेना सीखते हैं।
  5. प्रत्याहार (इंद्रियों पर प्रभुत्व-स्वाद, स्पर्श, गंध, दृष्टि और श्रवण)- अपने ध्यान को स्वयं की ओर परिवर्तित करना या स्वयं पर ध्यान केंद्रित करना तथा बाहरी वस्तुओं से विचलित न होना प्रत्याहार के अंतर्गत आते हैं।
  6. धारणा (एकाग्रता)- इसका अर्थ है मन को स्थिर रखना और एकाग्र रहना।
  7. ध्यान- ध्यान का अर्थ है आत्मावलोकन, आत्म-मनन, मैडीटेशन।
  8. समाधि (आनंद और शांति की स्थिति)- यह गहन शांति और प्रसन्नता की स्थिति है जो अन्य सभी चरणों का अभ्यास करने से आती है। यह योग का अंतिम लक्ष्य है, जहाँ आप पूरी तरह से आनंद और शांति का अनुभव करते हैं।
योग एक जीवन यात्रा है। हमें प्रतिदिन इसका अभ्यास करना चाहिए। आइए हम अपनी यात्रा का प्रारंभ पहले दो चरणों, यम और नियम से करते हैं।

यम

अष्टांग योग के अनुसार दूसरों के साथ सुखमय जीवनयापन के लिए पाँच महत्वपूर्ण दिशानिर्देश हैं। इन सामाजिक अनुशासनों को यम कहा जाता है। यम अष्टांग योग का प्रथम अंग है।

आइए, इन पाँच यमों के बारे में जानें-

  1. अहिंसा का अर्थ है दयालु होना और किसी भी जीवित प्राणी को कष्ट न पहुँचाना, जिसमें पौधे और जानवर भी सम्मिलित हैं।
  2. सत्य का अर्थ है हमेशा सच बोलना और ईमानदार होना।
  3. अस्तेय आपको सिखाता है कि जिन वस्तुओं या चीजों पर आपका स्वामित्व नहीं है उन पर अधिकार ना करें। उन्हें न लें।
  4. ब्रह्मचर्य का अर्थ है अपनी ऊर्जा का बुद्धिमानी से उपयोग करना और आत्म-नियंत्रण रखना।
  5. अपरिग्रह का अर्थ है लालच न करना और जो आपके पास है, उसी में प्रसन्न रहना (हम इस अध्याय में बाद में अपरिग्रह के बारे में विस्तार से जानेंगे)।

गतिविधि

नीचे दिए गए उदाहरणों के लिए सबसे उपयुक्त यम की पहचान करें-

  1. अपने पालतू कुत्ते के साथ सौम्य व्यवहार करें, उसके साथ खेलें और उसे कभी न मारें न ही डराएँ।
  2. यदि आप घर पर कुछ तोड़ते हैं और आपकी माँ इसके बारे में पूछती है, तो आप सच बताएँ और इसे छिपाएँ नहीं।
  3. आपको वीडियो गेम खेलने की तीव्र इच्छा होती है, लेकिन आप यह भी जानते हैं कि आपको अपना विज्ञान का गृहकार्य पूरा करना है। आप वीडियो गेम खेलने की इच्छा को नियंत्रित करते हैं और गृहकार्य पूरा करते हैं।
  4. कक्षा में समूह चर्चा के दौरान, आप अपने दोस्त के विचार को अपने विचार के रूप में बताने के लिए ललचाते हैं, लेकिन फिर आप उसे चुराने का फैसला नहीं करते।
  5. आपको एक दुकान पर एक परिधान पसंद आता है और आपके साथ उपस्थित बड़े लोग पूछते हैं कि क्या आप इसे खरीदना चाहते हैं। अपने घर में रखे कपड़ों के बारे में सोचते हुए आप एक और परिधान न खरीदने का निर्णय करते है, वयोंकि आपको अभी इसकी आवश्यकता नहीं है।


अपरिग्रह

अपरिग्रह का अर्थ है अधिक से अधिक की चाहत को त्यागना और जो आपके पास पहले से है, उसके लिए आभारी होना। यह आपको एक सरल जीवन जीने और दूसरों के साथ उदार होने में सहायता करता है।


Screenshot 2024-08-02 155301

आइए, लाल बहादुर शास्त्री, जो भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे, की प्रेरक कहानी के माध्यम से अपरिग्रह के बारे में जानें।

सादा जीवन और उच्च विचार


Screenshot 2024-08-02 155510

भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री एक बार अपनी पत्नी के लिए साड़ी खरीदने के लिए कपड़े की दुकान पर गए। दुकान के मालिक ने उन्हें कुछ सुंदर साड़ियाँ दिखाई, लेकिन जब शास्त्री जी ने उनकी कीमत पूछी, तो उन्हें वे बहुत महंगी लगीं। उन्होंने दुकानदार से कम कीमत वाली साड़ियाँ दिखाने को कहा, लेकिन फिर भी उन्हें वे बहुत महंगी लगी।

दुकानदार को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने कहा, "शास्त्री जी, आपको मूल्य की चिंता करने की आवश्यकता नहीं है। आप भारत के प्रधानमंत्री हैं। आपको ये साड़ियाँ उपहार में देना मेरे लिए सम्मान की बात होगी।"

शास्त्री जी ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैं आपकी दयालुता की सराहना करता हूँ, लेकिन मैं केवल इसलिए उपहार स्वीकार नहीं कर सकता क्योंकि मैं प्रधानमंत्री हैं। मैं केवल वही साड़ी खरीदूँगा जो मेरी क्रय-सीमा के उपयुक्त हो।" शास्त्री जी जो कुछ भी खरीदने के लिए स्वयं को पात्र मानते थे उसी में संतुष्ट थे और आवश्यकता से अधिक कुछ पाने के बारे में नहीं सोचते थे।

अपरिग्रह का अर्थ है 'विनम्र होना' और 'जो हमारे पास है, उसी में संतुष्ट रहना'। आइए, हम लाल बहादुर शास्त्री की तरह बनें और लालची न बनें और अपनी आवश्यकता से अधिक वस्तुएँ न रखें।

शिक्षक के लिए निर्देश

  • विद्यार्थियों को उनके आस-पास से अनुकरणीय व्यक्तित्व की पहचान करने में सहायता करें और उनके साथ साक्षात्कार के लिए प्रश्नावली बनाने में उनका मार्गदर्शन करें।
  • विद्यार्थियों के साथ उनकी आवश्यकताओं और इच्छाओं पर चर्चा करें और बताएँ कि शांतिपूर्वक और सुखमय रहने के लिए लालच से कैसे बचें?


गतिविधि

  • अपने परिवार या पड़ोस में किसी ऐसे व्यक्ति की पहचान करें, जो सरल जीवन जी रहा हो।
  • उनसे पूछें कि उन्होंने सरल जीवन जीने का विकल्प क्यों चुना और उनके इस निर्णय के परिणामस्वरूप उन्हें क्या अनुभव हुए?
  • अपनी कक्षा को उस व्यक्ति के साथ अपनी चर्चा के बारे में बताएँ और उनके अनुभव भी सुनें।

गतिविधि

  • विद्यार्थियों से कोई नई, छोटी वस्तु लाने के लिए कहें, जो उन्हें पसंद हो लेकिन अक्सर प्रयोग में नहीं ली गई हो। (कोई किताब, कोई खिलौना आदि)।
  • एक वृत्त में बैठे और सभी विद्यार्थी उस वस्तु के बारे में चर्चा करें, जो उन्होंने खरीदी है।
  • उन्हें उस वस्तु को अपने किसी मित्र या किसी जरूरतमंद को देने के लिए प्रोत्साहित करें।
  • बच्चे, देने की खुशी का अनुभव करेंगे और स्वामित्व को त्यागने का अभ्यास करेंगे।


नियम


अष्टांग योग का दूसरा चरण नियम है, जिसमें व्यक्तिगत अनुशासन के लिए पाँच महत्वपूर्ण दिशानिर्देश या आदतें सम्मिलित हैं। आइए, इन पाँच नियमों के बारे में और जानें-

  1. शौच का अर्थ है अपने शरीर, मन और आस-पास को साफ रखना। यह मन और शरीर की स्वच्छता और शुद्धता के बारे में बताता है।
  2. संतोष का अर्थ है, जितना प्राप्त है उतना पर्याप्त है। अर्थात जो हमारे पास है, उसमें प्रसन्न और संतुष्ट रहना और लालच न करना।
  3. तप का अर्थ है, अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए आत्म-अनुशासन और दृढ़-संकल्प होना, भले ही वे कठिन हों।
  4. स्वाध्याय का अर्थ है आत्म-अध्ययन और अपने ज्ञान में सुधार करना।
  5. ईश्वर प्रणिधान अपने से बड़े किसी तत्व पर विश्वास करने की बात करता है।

गतिविधि

निम्नलिखित उदाहरणों में सबसे उपयुक्त नियम की पहचान करें-
  1. एक सप्ताह के लिए एक व्यक्तिगत लक्ष्य निर्धारित करें, जैसे कि किसी परियोजना को पूरा करना या प्रतिदिन व्यायाम करना या घर पर सहायता करना। प्रत्येक लक्ष्य के साथ अपनी प्रगति का पता करें।
  2. प्रत्येक दिन अच्छी किताबें पढ़ें या परावर्ती दैनंदिनी (डायरी) लिखें।
  3. कक्षा को साफ करें और सजाएँ।
  4. कृतज्ञता प्रकट करें।
  5. अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करें और विश्वास रखें कि चीजें वैसे ही होंगी जैसा कि होनी चाहिए।

आइए, एक प्रेरक कहानी के माध्यम से तप को जानें।

तप

पाँच नियमों में से एक तपस का अर्थ है- आत्म-अनुशासन, दृढ़ संकल्प और दृढ़ता।

कल्पना कीजिए कि आपके सामने एक बड़ी परीक्षा आने वाली है और आखिरी क्षण तक प्रतीक्षा करने के बजाय, आप प्रत्येक दिन थोड़ा-थोड़ा अध्ययन करने का निर्णय लेते हैं। यह सतत प्रयास ही तप है।

यह किसी खेल प्रतियोगिता के लिए प्रशिक्षण लेने, किसी यंत्र का अभ्यास करने या घर के कामों में सहायता करने जैसा है- नियमित रूप से काम करना, तब भी जब आपको ऐसा करने का मन न हो। तप सिखाता है कि कड़ी मेहनत और समर्पण हमें अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने और स्वयं को श्रेष्ठ बनाने में सहायता कर सकता है। तप का अभ्यास करके हम प्रतिबद्धता के महत्व को सीखते हैं और छोटे-छोटे कार्य निरंतर करते रहने से किस प्रकार बड़े लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं।

हमारे जीवन में तप-

अध्ययन के प्रति समर्पण, आत्म-अनुशासन, अच्छे स्वास्थ्य के लिए नियमित व्यायाम, हमेशा पौष्टिक भोजन खाना, साफ-सफाई रखना, सदैव सत्य बोलना, प्रतिदिन योगाभ्यास करना आदि।

हम अपने आस-पास कई महान व्यक्तित्वों को देखते हैं, उनकी सफलता हमें अपने जीवन में उच्च लक्ष्य निर्धारित करने के लिए प्रेरित करती है। क्या आपने इन महान व्याक्तित्वों की तपस्या के बारे में सुना है? आइए, तप की शक्ति को समझने के लिए मल्ली मस्तान बाबू - भारत के माऊंटेनमैन की प्रेरक कहानी को जानें।

मल्ली मस्तान बाबू का दृढ़-निश्चय

मल्ली मस्तान बाबू का जन्म आंध्र प्रदेश के एक छोटे से गाँव में हुआ था और उनके पिता एक किसान थे। वे एक प्रतिभाशाली छात्र थे जो नई वस्तुओं के बारे में जानने के लिए उत्सुक रहते थे। बाबू ने बहुत मेहनत से पढ़ाई की और भारत के कुछ उत्तम स्कूलों में गए। उन्होंने अभियांत्रिक एवं प्रबंधन में उपाधि प्राप्त की।

अपनी पढ़ाई के दौरान, बाबू को पर्वतारोहण में गहरी रुचि उत्पन्न हो गई। पहाड़ों की चुनौतियाँ और नैसर्गिक सौन्दर्य से प्रेरित होकर, उन्होंने अपने व्यावसायिक जीवन के साथ-साथ इस प्रबल चाह को भी आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। उन्होंने कड़े प्रशिक्षण प्राप्त किए और चढ़ाई के बारे में सब कुछ सीखा। उन्होंने शारीरिक शक्ति, लचीलापन और मानसिक रूप से केंद्रित रहने के लिए योग का अभ्यास किया। जिससे उन्हें चुनौतीपूर्ण चढ़ाई में सहयोग मिला। योग सहित शारीरिक दक्षता के प्रति उनके समर्पित प्रयास, उनके अनेक अभियानों की सफलता के महत्वपूर्ण कारक रहे।

पर्वतारोहण के प्रति उनका दृष्टिकोण अटूट आत्मबल और समर्पण से प्रेरित था। वह अपनी सीमाओं से आगे बढ़ने में विश्वास करते थे और ऊँचाई पर चढ़ने के समय आने वाली चुनौतियों को स्वीकार करते थे। उनका लक्ष्य चढ़ाई के माध्यम से दूसरों को अपने सपनों को पूरा करने और बाधाओं को दूर करने के लिए प्रेरित करना था। चाहे वे कितनी भी कठिन क्यों न लगें।

बाबू, जब भी अभियान पर होते, प्रत्येक अंतिम विवरण की योजना बनाते। वह दिन की शुरुआत जल्दी करते थे, अपना भार स्वयं उठाते थे और पूरे दिन एक स्थिर गति से चलते थे। अपने अभियान के समय वह अपना तंबू स्वयं लगाते थे, अपना खाना स्वयं बनाते थे और अपने मार्गदर्शक के साथ अगले दिन की योजना स्वयं बनाते थे।

बाबू की अभूतपूर्व उपलब्धि यह थी कि उन्होंने 172 दिनों में सात महाद्वीपों की सात सबसे ऊँची चोटियों पर चढ़ाई पूरी की। इसके साथ, बाबू ने शारीरिक और मानसिक सहनशक्ति और उत्कृष्टता का एक नया मानदंड स्थापित किया। वह यह कीर्तिमान बनाने वाले पहले भारतीय और दक्षिण एशियाई व्यक्ति बने, जिससे उन्हें अंतर्राष्ट्रीय पहचान और प्रशंसा मिली।

भले ही वह अब हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी कहानी असाधारण साहस, दृढ़ संकल्प और आत्मबल की है। उनका जीवन हमें बड़े सपने देखने, कड़ी मेहनत करने और हमेशा अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने के लिए प्रेरित करता है। वह उन लोगों के लिए एक प्रेरणा बने हुए हैं, जो अपनी सीमाओं को पार करने और आसमान तक पहुँचने का साहस करते हैं।

गतिविधि

  • कक्षा में अपने आदर्श व्यक्तित्व की कहानी सुनाएँ।
  • सुनाई गई सभी कहानियों में समान विषयों पर चर्चा करें।
  • चिंतन करें और चर्चा करें कि जीवन में लक्ष्य का होना क्यों आवश्यक है।
  • उस समय के बारे में लिखें जब उन्होंने कुछ प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम किया। उन्होंने अनुभव से क्या सीखा और लक्ष्य प्राप्त करने के बाद उन्होंने कैसा अनुभव किया?

शिक्षक के लिए निर्देश

विद्यार्थियों के साथ चर्चा करें कि वैज्ञानिक, प्रशासक, राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता, खिलाड़ी आदि महान सफल व्यक्तित्व दृढ़ संकल्प और निरंतर प्रयास के साथ अपने लक्ष्यों तक कैसे पहुँचे?


गतिविधि

  1. लक्ष्य निर्धारित करना- प्रत्येक विद्यार्थी एक लक्ष्य लिखता है, जिसे वह प्राप्त करना चाहता है, जैसे कि प्रतिदिन 20 मिनट पढ़ना, किसी खेल का अभ्यास करना या घर के कार्यों में सहायता करना।
  2. योजना- इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए विभिन्न सोपान लिखें।
  3. प्रगति पर ध्यान रखना- दैनिक प्रगति का पता करने के लिए एक सरल सारणी बनाएँ।
  4. चिंतन - सप्ताह के अंत में चर्चा करें कि आपने आत्म-अनुशासन के बारे में क्या सीखा है और लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में कार्य करना कैसा लगा।

प्रत्याहार

प्रत्याहार अष्टांग योग का पाँचवाँ चरण है, जो अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण करना और मन को एकाग्र करना सिखाता है।

कल्पना कीजिए कि आप एक शोरगुल वाले कमरे में हैं, लेकिन आपको अपने गृहकार्य पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता है। प्रत्याहार का अर्थ है संयमित होना या पीछे हट जाना, उन चीजों से विचलित न होना जिन्हें आप देखते, सुनते, सूँघते, चखते या अनुभव करते हैं।

प्रत्याहार आपको शोर को अनसुना करने और विकर्षणों को दूर करके, आप जो कर रहे हैं उस पर ध्यान केंद्रित करने में सहायता करता है।

इसका अभ्यास करके आप अपना ध्यान अपने आस-पास की वस्तुओं से हटाकर अंदर की ओर परिवर्तित करना सीखते हैं और अपने विचारों और भावनाओं के प्रति अत्यधिक सजग हो जाते हैं।

हम अपने आस-पास की दुनिया को पाँच इंद्रियों के माध्यम से अनुभव करते हैं। वांछित गतिविधि पर ध्यान केंद्रित करने और विकर्षणों से बचने के लिए, हमें अभ्यास के माध्यम से इन इंद्रियों पर स्वामित्व की आवश्कता है।

आइए, कुछ गतिविधियों पर दृष्टि डालें जो हमें अपनी इंद्रियों को अंतर्मुखी बनाने में सहायक होंगी।

  1. शांत वातावरण - बिना किसी व्यवधान (कोई टी.वी., मोबाइल फोन या तीव्रध्वनि) के शांत बैठने के लिए एक आरामदायक एकांत स्थान खोजें। अपनी आँखें बंद करें और अपनी श्वास पर ध्यान केंद्रित करें।
  2. ध्यानपूर्वक भोजन करना भोजन करते समय टी.वी. बंद कर दें और संबंधित विद्युतीय उपकरणों को दूर रखें। भोजन के स्वाद, प्रस्तुतीकरण और सुगंध पर ध्यान दें। धीरे-धीरे चबाएँ और प्रत्येक निवाले का आनंद लें।
  3. प्रकृति के साथ समन्वय बैठाएँ किसी पार्क या बगीचे में टहलने जाएँ। विचारों में खोए बिना या विद्युतीय उपकरणों का उपयोग किए बिना अपने आस-पास के दृश्यों, ध्वनियों और गंधों का निरीक्षण करें।
  4. संगीत सुनना कुछ सुखदायक संगीत चुनें, शांत बैठें और कुछ भी किए बिना ध्वनियों को ध्यान से सुनें।
  5. शयन से पूर्व कुछ मिनट शांत बैठें अपनी आँखें धीरे से बंद करें और अपनी श्वासों पर ध्यान केंद्रित करें। शयन से कम से कम 30 मिनट पहले विद्युतीय उपकरणों के उपयोग से बचें, इसके स्थान पर कोई पुस्तक पढ़ने की कोशिश करें।

ये गतिविधियाँ आपके ध्यान केंद्रित करने की क्षमता को बढ़ाने, तनाव को कम करने और स्वयं तथा अपने आस-पास के वातावरण के साथ अधिक गहराई से जुड़ने में आपकी सहायता करेंगी।

हमारे व्यक्तित्व के विकास में भोजन की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इसके अतिरिक्त, हमें मौसम के अनुसार और संतुलित मात्रा में स्वस्थ भोजन का सेवन करना चाहिए। इसलिए, आयुर्वेद (प्राचीन भारतीय चिकित्सा विज्ञान) के अनुसार स्वस्थ भोजन की आदतें विकसित करना आवश्यक है।

क्या आप जानते हैं?

आयुर्वेद के अनुसार स्वस्थ भोजन की आदतें -

डितभुक - स्वस्थ एवं पौष्टिक भोजन का सेवन करें।
मितभुक- मध्यम मात्रा में भोजन करें।
ऋतभुक ऋतु के अनुसार भोजन ग्रहण करें।

ACTIVITY

  1. दिन में कम से कम एक बार अपने परिवार के साथ घर का बना भोजन ग्रहण करें।
  2. भोजन करते समय यह सुनिश्चित करें कि आप प्रत्येक छोटे निवाले का स्वाद ले रहे हैं।
  3. भोजन करते समय अपने मोबाइल फोन और टी.वी. जैसे विद्युतीय उपकरणों का उपयोग न करें।
  4. अपने परिवार के सदस्यों को भोजन और पानी परोसने के लिए स्वयंसेवक बनें।

अध्याय 2

यौगिक अभ्यासों की तैयारी


युवा योग साधको, नमस्ते! क्या आप यौगिक अभ्यासों के साथ यात्रा पर निकलने के लिए तैयार हैं?

पिछले अध्याय में आपने यम और नियम के बारे में सीखा। यहाँ हम आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान के बारे में जानेंगे। हम योग के कुछ अन्य पहलुओं के बारे में भी जानेंगे, जैसे कि क्रीड़ा योग, जो कि अगले अध्यायों में प्रारंभिक अभ्यासों से शुरू होगा।

विद्यालय में अपने शिक्षक के मार्गदर्शन में इन अभ्यासों को सीखें और घर पर प्रतिदिन उनका अभ्यास करके उनमें प्रवीणता प्राप्त करें। नियमित योग साधना से हम दृढ़-निश्चयी, मनप्रवाह से लचीले और मनस्थिति से शांत बनते हैं। यह हमें अपने गृहकार्य के समय, खेल खेलते समय या अन्य कार्यों के समय ध्यान केंद्रित करने में हमारी सहायता करता है व शांतभाव प्रदान करता है।

तो आइए, हम अपनी योग की चटाई बिछाएँ, गहरी श्वास लें और साथ मिलकर इस अद्भुत साहसिक कार्य का प्रारंभ करें !

याद रखें कि योग हमें अच्छा अनुभव करवाता है। अभ्यास के दौरान आपके शरीर को कैसा अनुभव हो रहा है, इस पर ध्यान देना आवश्यक है। कभी भी स्वयं को ऐसी मुद्रा का अभ्यास न करें। जिससे किसी प्रकार का दर्द या कष्ट हो।

आसन और प्राणायाम शुरू करने से पूर्व, श्वसन का अभ्यास, सूक्ष्म व्यायाम और शिथिलीकरण व्यायाम करके स्वयं को तैयार करना आवश्यक है।

समस्त यौगिक प्रक्रियाओं की साधना से पूर्व पालन किए जाने वाले सामान्य दिशानिर्देश-

  1. आसन करते समय स्वयं को गहरी श्वास लेने या श्वास रोकने के लिए बाध्य न करें। आसन करते समय सामान्य रूप से श्वास लें। श्वास सदेव नासिका से लें।
  2. अभ्यास करते समय हमेशा सतर्क और सावधान रहें। अपनी मुद्रा पर ध्यान केंद्रित करें। अपने शिक्षकों को ध्यान से देखें और उनके निर्देशों पर ध्यान दें।
  3. आसन करते समय जूते या मोजे न पहनें।
  4. जब भी आप बीमार या अस्वस्थ महसूस करें, तो आपको विश्राम करना चाहिए। अगर आपको सर्दी, खाँसी, सिरदर्द, पेट दर्द, टखने में मोच आदि है, तो अपने शिक्षक से मार्गदर्शन और परामर्श लें।
  5. विशेषकर लड़कियों के लिए, जब उनको मासिक धर्म हो, तो अभ्यास से पूर्व अपने शिक्षक को सूचित करें या उनसे परामर्श लें।

श्वसन अभ्यास

प्राणायाम सीखने से पूर्व फेफड़ों की कार्यप्रणाली को सुधारना आवश्यक है। स्वस्थ फेफड़ों के लिए उचित श्वसन प्रक्रिया का अभ्यास करना अति आवश्यक है।

आइए, शशक (खरगोश) और श्वान (कुत्ते) की श्वास प्रकिया के बारे में जानें। खरगोश की श्वसन पद्धति गहरी, लयबद्ध श्वासों पर केंद्रित होती हैं। कुत्ते की श्वसन प्रक्रिया तीव्र और उथली होती है, जो शरीर से गर्मी को बाहर निकालने और श्वास पर नियंत्रण में सुधार करने हेतु सहायता कर सकती है।

Screenshot 2024-10-24 154637
श्वास अभ्यास फेफड़ों की क्षमता को बढ़ाता है, श्वसन क्षमता में सुधार करता है, विश्राम को बढ़ावा देता है तथा तनाव को कम करता है।
Screenshot 2024-08-02 165324

सीमाएँ- मिर्गी से पीड़ित व्यक्तियों को इस अभ्यास से बचना चाहिए।

शशांक समान श्वसन



Screenshot 2024-10-24 154957
स्थिति दंडासन
Screenshot 2024-10-24 155051
चरण 1- दोनों घुटनों को मोड़कर वज्रासन में बैठें।

Screenshot 2024-10-24 155111
चरण 2- आगे झुकें और दोनों अग्रबाहु आगे ले जाते हुए कोहनियों को घुटनों से जोड़ें हथेलियाँ भूमि की ओर, हाथ एक-दूसरे से समानांतर, पेट जंघाओं के ऊपर हो। जिह्वा को आधा बाहर निकाल कर जल्दी-जल्दी श्वास अंदर बाहर करें 10 से 30 बार दोहराएँ।
Screenshot 2024-10-24 155141
चरण 3- अभ्यास के उपरांत पुनः वज्रासन की स्थिति में आएँ।
Screenshot 2024-10-24 155210
चरण 4- दोनों पैर सीधे कर के दंडासन की स्थिति में आएँ।
Screenshot 2024-10-24 155238
विश्रांति- शिथिल दंडासन
शिथिल दंडासन की स्थिति में आराम करें।


श्वान समान श्वसन


Screenshot 2024-10-24 160002
स्थिति दंडासन
Screenshot 2024-10-24 160113
चरण 1- दोनों घुटनों को मोड़कर वज्रासन में बैठें।
Screenshot 2024-10-24 160200
चरण 2- हथेलियों की अँगुलियों को पीछे की ओर करते हुए घुटने के पास भूमि पर रखें और जिह्वा को पूरा बाहर निकाल लें। इतनी तेजी से श्वास लें व छोड़ें कि पेट तेजी से अंदर व बाहर होने लगे। शुरुआत में 10 से 20 बार अभ्यास करें, पारंगत होने पर धीरे-धीरे 50 बार तक बढ़ाएँ।
Screenshot 2024-10-24 160245
चरण 3- अभ्यास के बाद पुनः वज्रासन की स्थिति में आएँ।
Screenshot 2024-10-24 160310
चरण 4– दोनों पैरों को सीधा कर के पुनः दंडासन की स्थिति में आएँ।
Screenshot 2024-10-24 160332
विश्रांति- शिथिल दंडासन
शिथिल दंडासन की स्थिति में आराम करें।

शिक्षक के लिए निर्देश

  • विद्यार्थियों से चर्चा करें कि अभ्यास के बाद उन्हें कैसा लगा?
  •  उनसे पूछें कि क्या श्वसन अभ्यास के समय वह श्वास पर ध्यान केंद्रित कर पा रहे थे?

सूक्ष्म व्यायाम

सूक्ष्म व्यायाम, व्यायामों की एक श्रृंखला है। जो संधियों को शिथिल करने (तनाव दूर करने) और लचीलेपन में सुधार करने के लिए बनाई की गई है। सूक्ष्म व्यायाम शब्द संस्कृत से आया है, जहाँ 'सूक्ष्म' का अर्थ है 'महीन' और 'व्यायाम' का अर्थ है 'शारीरिक अंगों की गति'। ये व्यायाम क्रियात्मक रूप से सरल हैं, और इन व्यायामों का अभ्यास सभी आयु वर्ग और विभिन्न शारीरिक क्षमताओं वाले व्यक्ति कर सकते हैं।

इन व्यायामों में छोटी व सूक्ष्म गति को सम्मिलित किया गया है जो शरीर के विभिन्न अंगों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। इन व्यायामों से रक्त संचार को बढ़ाने, संधियों की गतिशीलता में वृद्धि करने और मांसपेशियों के तनाव को दूर करने में सहायता मिलती है। सूक्ष्म व्यायामों से शरीर के विभिन्न भागों में रक्त प्रवाह बढ़ता है, जिससे रक्त संचार निर्बाध होता है और ऊतकों में प्राण वायु की मात्रा की वृद्धि होती है।

प्रत्येक गतिविधि श्वास के साथ समन्वित होती है, जिससे पूरे शरीर में प्राण ऊर्जा का प्रवाह बढ़ जाता है। सूक्ष्म व्यायाम सरलता के कारण सभी के लिए सुलभ हैं, जिसमें वरिष्ठ जन, सीमित गतिशीलता वाले जन या योग में अनभ्यस्त सम्मिलित हैं। ये व्यायाम बैठकर अथवा खड़े होकर किए जा सकते हैं।

सूक्ष्म व्यायाम में ग्रीवा के व्यायाम, स्कंध का घुमाव, अँगुलियों और कलाई के प्रसार, घुटने, टखने और पैरों के व्यायाम आदि सम्मिलित हैं।

आइए, ग्रीवा के लिए सूक्ष्म व्यायाम का अभ्यास करें।

ग्रीवा की गतियाँ (ग्रीवासंचालन)

ग्रीवा के व्यायामों का यह युग्म ग्रीवा की संधियों और मांसपेशियों की शक्ति तथा लचीलेपन को बढ़ाता है।

1. ऊर्ध्व और अधोगति

Screenshot 2024-10-24 161954
वज्रासन में बैठें, चिन मुद्रा बनाएँ और हाथों को जाँघों पर रखें।
Screenshot 2024-10-24 162028
श्वास अंदर लेते हुए ग्रीवा को पीछे की ओर झुकाएँ।
Screenshot 2024-10-24 162055
श्वास छोड़ते हुए ग्रीवा को आगे की ओर नीचे झुकाएँ, ठोड़ी छाती को छू जाए।
Screenshot 2024-10-24 162120
अभ्यास के बाद पुनः स्थिति में आएँ।


2. बाएँ और दाएँ घुमाना


Screenshot 2024-10-24 162427
श्वास छोड़ते हुए सिर को दाएँ ओर घुमाएँ और श्वास लेते हुए केंद्र में ले आएँ।
Screenshot 2024-10-24 162451
श्वास छोड़ते हुए सिर को बाएँ ओर घुमाएँ और श्वास लेते हुए केंद्र में ले आएँ

3. ग्रीवा का एक तरफ झुकना

Screenshot 2024-10-24 162517
श्वास छोड़ते हुए सिर को दाएँ ओर झुकाएँ और श्वास लेते हुए केंद्र में ले आएँ।
Screenshot 2024-10-24 162541
श्वास छोड़ते हुए सिर को बाएँ ओर झुकाएँ और श्वास लेते हुए केंद्र में ले आएँ।

4. ग्रीवा को दक्षिणावर्त और वामावर्त घुमाएँ

Screenshot 2024-10-24 165520
समस्त व्यायामों के उपरांत शिथिल दंडासन की स्थिति में विश्राम करें।

ऊपर वर्णित प्रत्येक व्यायाम के पाँच चक्र करें, फिर उन्हीं का पुनः दक्षिणावर्त अभ्यास करें।

शिक्षक के लिए निर्देश

  • सुनिश्चित करें कि अभ्यास के दौरान विद्यार्थी अपनी मेरूदंड सीधी रखें।
  • जाँच करें कि अभ्यास करने में उन्हें सहजता अनुभव हो रही है या नहीं।
  • ग्रीवा में किसी भी तरह की चोट लगने की स्थिति में इस अभ्यास से बचना चाहिए।

शिथिलीकरण व्यायाम (गतिशील अभ्यास)


शिथिलीकरण व्यायाम की एक श्रृंखला है जो शरीर को अधिक गहन योग अभ्यासों के लिए तैयार करती है।

शिथिलीकरण व्यायाम का प्रारूप शरीर को ऊष्मीकृत करने, विभिन्न मांसपेशियों के प्रसारण व संकुचन और मेरुदंड को लचीला बनाने के लिए तैयार किया गया है। यह संधियों की गतिशीलता को सुचारू करता है और रक्त संचार को बढ़ाता है। इनका उपयोग अधिकतर योग सत्र के प्रारंभ में किया जाता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि मेरुदंड और बड़ी मांसपेशियाँ आसनों के लिए पर्याप्त रूप से तैयार हैं।

शिथिलीकरण व्यायाम या गतिशील अभ्यास-

  1. अपने स्थान पर यथावत धीमी गति से दौड़ना- धीमी गति से दौड़ने के विभिन्न रूप (धीमी, पीछे, आगे और पार्श्व की ओर) ये क्रियाएँ हृदय गति को बढ़ाती हैं और शरीर को ऊष्मीकृत करती हैं।
  2. आगे, पीछे और पाश्व की ओर झुकना- कटिक्षेत्र (कमर) की गतिशीलता और लचीलेपन में सुधार करता है।
  3. पैर हिलाना और घुमाना निचले शरीर में गतिशीलता बढ़ाने के लिए गतिविधियाँ।
  4. मेरुदंड को मोडना मेरुदंड को सजगता से खींचें और विश्राम दें।
आइए, इस कक्षा में हम अपनी मेरुदंड की संधियों को स्वस्थ रखने के लिए पवनमुक्तासन क्रिया का अभ्यास करते हैं। इसका अभ्यास एक पैर और दोनों पैरों की क्रियाओं से किया जाता है।
  1. एकपाद पवनमुक्तासन क्रिया (एक पैर)
  2. द्विपाद पवनमुक्तासन क्रिया (दोनों पैर)

Screenshot 2024-10-25 091833
स्थिति- पीठ के बल लेटने की मुद्रा
Screenshot 2024-10-25 091900
चरण 1
Screenshot 2024-10-25 091925
चरण 2
Screenshot 2024-10-25 091949
चरण 3
Screenshot 2024-10-25 092017
चरण 4
Screenshot 2024-10-25 092043
चरण 5
Screenshot 2024-10-25 092212
विश्रांति- शवासन

स्थिति में आएँ-पीठ के बल लेट जाएँ।

चरण 1- श्वास लेते हुए दाएँ पैर को 45° तक उठाएँ।

चरण 2- फिर श्वास लें और दाएँ पैर को 90° तक उठाएँ।

चरण 3- श्वास छोड़ते हुए दाएँ पैर को घुटने से मोड़ें, श्वास लेते हुए दाएँ घुटने को दोनों हाथों से पकड़े और पीछे की ओर खींचें।

चरण 4– श्वास छोड़ते हुए सिर को ऊपर उठाएँ और ठोड़ी या सिर को घुटने से स्पर्श करें और साथ के साथ ही बाएँ पैर को ऊपर उठाएँ।

चरण 5- दाएँ पैर को पाँच बार दक्षिणावर्त और वामावर्त घुमाएँ।


पैरों को छोड़ें और शवासन में विश्राम करें। इसी प्रक्रिया को बाएँ पैर से दोहराएँ।

द्विपाद पवन मुक्तासन क्रिया

इस क्रिया में निम्नलिखित क्रियाएँ सम्मिलित हैं-

क्रिया के लिए तैयारी के चरण

1. क्रिया अभ्यास

क. रॉक एंड रोल

ख. बाएँ और दाएँ गति

ग. घूर्णन

2. अभ्यास के बाद पैरों को विश्राम देने के चरण

Screenshot 2024-10-25 094659

स्थिति- पीठ के बल लेटने की मुद्रा

Screenshot 2024-10-25 094723

चरण 1

Screenshot 2024-10-25 094746

चरण 2

Screenshot 2024-10-25 094812

चरण 3 चरण 4

स्थिति में आएँ पीठ के बल लेट जाएँ

चरण 1- श्वास लेते हुए, दोनों पैरों को 45° तक उठाएँ।

चरण 2- फिर, श्वास लें और दोनों पैरों को 90° तक उठाएँ।

चरण 3- श्वास छोड़ते हुए, दोनों पैरों को घुटने से मोड़ें और श्वास लेते हुए, दोनों हाथों को घुटनों से पकड़ें और उन्हें पीछे की और खींचें।

चरण 4- श्वास छोड़ते हुए, सिर को ऊपर उठाएँ और ठोड़ी या सिर को घुटने से स्पर्श करें।

1. आइए, क्रिया का अभ्यास करें

क. रॉक एंड रोल

पीठ के बल लेटकर पाँच राउंड तक आगे और पीछे झूला झूलें।

Screenshot 2024-10-25 095647

पीछे की ओर लुढ़कते समय श्वास लें और ऊपर की ओर उठते समय श्वास छोड़ें। ऊपर की ओर उठते समय पैरों पर शरीर का भार लाने का प्रयास करें।

ख. बाएँ और दाएँ

Screenshot 2024-10-25 095932

श्वास छोड़ते हुए शरीर को धीरे-धीरे बाएँ और ले जाएँ।

Screenshot 2024-10-25 095953

श्वास अंदर लेते हुए शरीर को केंद्र में लाएँ।

Screenshot 2024-10-25 100023

श्वास छोड़ते हुए शरीर को धरि-धीर दाहिनी ओर ले जाएँ।

ग. घूर्णन

शरीर को दक्षिणावर्त और वामावर्त दिशा में पाँच चक्र तक घुमाना शुरू करें और वापस केंद्र में ले आएँ।

Screenshot 2024-10-25 100506

2. अभ्यास के बाद पैरों को विश्राम देने के लिए नीचे दिए गए चरणों का पालन करें और शवासन में वापस आएँ

Screenshot 2024-10-25 101546

चरण 5

Screenshot 2024-10-25 101608

चरण 6

Screenshot 2024-10-25 101632

चरण 7

Screenshot 2024-10-25 101853

चरण 8

Screenshot 2024-10-25 101915

विश्रांति शवासन

स्थिति में आएँ पीठ के बल लेटना

चरण 5- श्वास लेते हुए, हाथों को विश्राम दें।

चरण 6- गहरी श्वास को अंदर लेते हुए, पैरों को 90° तक फैलाएँ।

चरण 7- श्वास छोड़ते हुए, पैर को 45° तक लाएँ।

चरण 8- थोड़ी और श्वास छोड़ते हुए, अपने पैरों को वापस चटाई पर रखें।

शवासन में विश्राम करें।


Screenshot 2024-10-24 154637
  1. पवनमुक्तासन के नियमित अभ्यास से पेट की वसा को कम किया जा सकता है।
  2. यह पाचन नलिका की वायु को बाहर निकालता है और पाचन में सुधार करता है।
  3. यह भूख बढ़ाता है और भोजन को पचाने की क्षमता में वृद्धि करता है।
  4. यह कब्ज से बचाता है।
Screenshot 2024-08-02 165324

सीमाएँ - इस अभ्यास से उन विद्यार्थियों को बचना चाहिए, जिनकी हाल ही में पेट की शल्य चिकित्सा हुई हो या जिन्हें गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ हों।


शिक्षक के लिए निर्देश

सुनिश्चित करें कि विद्यार्थी सहजता से व्यायाम करें और व्यायाम के पश्चात शरीर को विश्राम देने के लिए समय निकालें।

विद्यार्थियों से कहें कि वे व्यायाम के बाद अपनी श्वसन प्रक्रिया में होने वाले परिवर्तनों का निरीक्षण करें।


सूर्य नमस्कार

सूर्य नमस्कार, 12 शक्तिशाली योग आसनों की एक श्रृंखला है, जिसे एक क्रम में किया जाता है। पारंपरिक रूप से यह अभ्यास सुबह सूर्य को नमस्कार करने और दिनभर के लिए शरीर को ऊर्जावान बनाने के लिए किया जाता है। सूर्य नमस्कार में आसन (मुद्राएँ), प्राणायाम (श्वास के प्रति जागरूकता) और मंत्र-जप सम्मिलित हैं, जो शरीर और मन के लिए एक व्यापक व्यायाम है। यह अधिक उन्नत योग अभ्यासों के लिए, ऊष्मीकरण के लिए भी उपयोगी है अथवा सूर्य नमस्कार का महत्व समग्र स्वास्थ्य और आरोग्य बनाए रखने के लिए एक स्वतंत्र दिनचर्या के रूप में भी है।

आइए, अब सूर्य नमस्कार की विभिन्न प्रारंभिक तकनीकों को जानें।

1. अर्द्धचक्रासन से पादहस्तासन

Screenshot 2024-10-25 103151
श्वास अंदर लेते हुए अर्द्धचक्रासन में आएँ
Screenshot 2024-10-25 103218
श्वास छोड़ते हुए पादहस्तासन में आएँ

2. पादहस्तासन से अश्वसंचालनासन (बारी-बारी से दोनों पैरों से करें)

Screenshot 2024-10-25 103331
श्वास लेते हुए पाद हस्तासन करें।
Screenshot 2024-10-25 103350
श्वास छोड़ते हुए अश्वसंचालनासन करें।

3. दंडासन से शशांकासन


Screenshot 2024-10-25 103414
श्वास लेते हुए दंडासन करें।
Screenshot 2024-10-25 105007
श्वास छोड़ते हुए शशांकासन करें।

4. दंडासन से साष्टांग नमस्कार

Screenshot 2024-10-25 105038
श्वास लेते हुए दंडासन करें।
Screenshot 2024-10-25 105349
श्वास छोड़ते हुए साष्टांग करें।

5. ऊर्ध्वमुख श्वानासन से अधोमुख श्वानासन

Screenshot 2024-10-25 105413
श्वास लेते समय ऊर्ध्वमुख श्वानासन करें।

Screenshot 2024-10-25 105434
श्वास छोड़ते समय अधोमुख श्वानासन करें।

प्रत्येक आसन के पाँच चक्र पूर्ण करें।

Screenshot 2024-10-24 154637
  1. सूर्य नमस्कार मांसपेशियों को सशक्त करता है। लचीलेपन को बढ़ाता है और हृदय वाहिका स्वास्थ्य तंत्र को शक्ति प्रदान करता है।
  2. यह पाचन तंत्र को उद्दीप्त करता है और पाचन एवं चयापचय मेटाबॉलिज्म में सुधार करता है।
  3. सूर्य नमस्कार सचेतन श्वास के साथ तनाव एवं चिंता को कम करने एवं मानसिक स्पष्टत्ता और ध्यान को बढ़ावा देने में सहयोग करता है।
Screenshot 2024-08-02 165324

सीमाएँ- उन विद्यार्थियों को प्रारंभिक अभ्यास से बचना चाहिए जिनकी हाल ही में पेट की शल्य चिकित्सा हुई है और जिन्हें स्वास्थ्य संबंधी गंभीर समस्याएँ हैं।

शिक्षक के लिए निर्देश

  • जब विद्यार्थी यौगिक अभ्यास करें तब सुनिश्चित कर लिया जाए कि वे आसनों को झटके से न करें।
  • श्वास गति समान एवं लयबद्ध होनी चाहिए।

अध्याय 3

आसन

आसन अष्टांग योग का तीसरा अंग है, इसमें शरीर की विशिष्ट मुद्राएँ हैं जो हमारे शरीर को लचीला, सशक्त, संतुलित और रोगमुक्त बनाने में सहायता करती हैं। महर्षि पतंजलि द्वारा आसन को "स्थिरसुखमासनम्" के रूप में परिभाषित किया है। जिसका अर्थ है 'लंबे समय तक आरामदायक स्थिति में रहने हेतु सक्षम होना। जब आसन को श्वसन क्रिया के साथ समन्वित करते हैं, तो वे शरीर एवं मस्तिष्क के साथ गहरा संबंध विकसित करते हैं। वे शारीरिक व्याधियों को भी दूर करते हैं और मानव को ध्यान के लिए तैयार करते हैं।

प्रतिदिन आसन के कई लाभ हैं, इनमें से कुछ नीचे दिए गए हैं-

  1. शक्ति एवं लचीलापन - आसन के नियमित अभ्यास से मांसपेशियों में शक्ति, लचीलापन और संतुलन का विकास होता है। विभिन्न मुद्राएँ विभिन्न मांसपेशीय समूह को लक्षित करती हैं, जिससे संपूर्ण शारीरिक क्षमता बढ़ती है।
  2. आंतरिक कार्यप्रणाली में सुधार- आसन शरीर के सभी भागों में रक्त प्रवाह और ऑक्सीजन वितरण में सुधार करते हैं। कई आसन आंतरिक अंगों की गतिविधियों को उद्दीप्त करते हैं, जिससे पाचन एवं चयापचय तंत्र में सुधार होता है।
  3. एकाग्रता और विश्रांति - आसन का अभ्यास मन को शांत करने और श्वास एवं शरीर पर ध्यान केंद्रित करके तनाव को कम करने में सहयोग करता है।
  4. मन और तन का संबंध- आसन शरीर और मन के बीच एक सामंजस्यपूर्ण संबंध बनाते हैं, जो आध्यात्मिक विकास और आत्म-जागरूकता के लिए आवश्यक है।

क्या आप अपनी योग यात्रा निरंतर रखने के लिए तैयार हैं। संधियों को तनावमुक्त करें, मेरुदंड को झुकाएँ और अपने मन मस्तिष्क को खड़ी अवस्था में, बैठकर, पीठ के बल और पेट के बल लेटकर, आसन करने के लिए तैयार करें।

आसनों के अभ्यास के लिए दिशानिर्देश-

  1. योगाभ्यास स्वच्छ एवं हवादार स्थान पर करना चाहिए।
  2. अभ्यास के लिए सदेव चटाई, मेट आदि का उपयोग करें।
  3. आसन हमेशा खाली पेट करना चाहिए। भोजन करने के बाद कम से कम चार घंटे तक आसन के अभ्यास से बचें। स्कूल जाने से पहले सुबह का समय सबसे अच्छा होता है।
  4. अभ्यास करने से पहले चश्मा, कलाई घड़ियाँ और आभूषण हटा देने चाहिए।
  5. ढीले एवं आरामदायक कपड़े पहने।
  6. प्रत्येक आसन के लिए दिए गए चरणों का पालन करें और यदि संभव हो तो प्रत्येक आसन को आँखें बंद करके करें।
  7. . अभ्यास करते समय शरीर को विश्रांति की अवस्था में रखें और अपनी श्वास लेते समय एकाग्र रहें।
  8. यदि कोई स्वास्थ्य समस्या है तो योगाभ्यास करने से पूर्व अपने शिक्षक को सूचित करें।
  9. आसन करने के बाद आराम करें।
  10. सभी आसन किसी शिक्षक के मार्गदर्शन में ही करें।
इस कक्षा में हम निम्नलिखित आसन सीखेंगे-

  • खड़े होकर - अर्द्ध-कटिचक्रासन
  • बैठकर - पद्मासन
  • पेर के बल - भुजंगासन और शलभासन
  • पीठ के बल - उत्तानपादासन

प्रत्येक आसन को शिक्षक के मार्गदर्शन में ओर दिए गए चरणों के अनुसार करें।

अर्द्ध-कटिचक्रासन पार्श्व वक्र मुद्रा (पार्श्व झुकना)

Screenshot 2024-10-25 120635

स्थिति- ताड़ासन   सोपान 1   सोपान 2

Screenshot 2024-10-25 120725

सोपान 3 सोपान 4 विश्रांति- शिबिल ताड़ासन

ताड़ासन की मुद्रा में आएँ

सोपान 1- श्वास लेते हुए दाहिने हाथ को 180° के कोण पर ऊपर उठाएँ। हथेली को बाईं ओर रखते हुए दाएँ बाइसेप्स (द्विशिरिस्का) को दाएँ कान को स्पर्श करें। श्वास लें और अँगुलियों तक खिंचाव अनुभव करें।

सोपान 2- श्वास छोड़ते हुए धड़ क्षेत्र के बाएँ ओर झुकें। पंजों से अंगुलियों तक खिंचाव अनुभव करें। बाएँ ओर दाब अनुभव करें और बाएँ ओर विस्तारण अनुभव करें। इस मुद्रा में कुछ मिनटों तक आराम और आनंद के साथ रहें।

सोपान 3- श्वास भरते हुए दाहिने हाथ को 180° के कोण पर वापस लाएँ, श्वास लें और अँगुलियों तक खिंचाव अनुभव करें।

सोपान 4- अब श्वास छोड़ते समय हाथ को नीचे की ओर लाएँ। शिथिल ताड़ासन में आराम करें।


बाएँ ओर से आसान दोहराएँ

Screenshot 2024-10-24 154637
  1. अर्द्ध-कटिचक्रासन कमर के भाग के आस-पास की वसा को कम करने में मदद करता है। रीढ़ की हड्डी को पार्श्व लोच प्रदान करता है और यकृत के कार्य में सुधार करता है।
  2. यह अभ्यास रीढ़ की हड्डी को लचीला और स्वस्थ रखने में सहयोग करता है। यह पैरों घुटनें, जाँघों और पिंडली की मांसपेशियों को शक्ति प्रदान करता है।
Screenshot 2024-08-02 165324
सीमाएँ इस आसन की कोई सीमा नहीं है।

शिक्षक के लिए निर्देश

सुनिश्चित करें कि विद्यार्थी आगे या पीछे की ओर न झुकें, बल्कि पार्श्व में झुकें।

पद्मासन (कमलमुद्रा)

Screenshot 2024-10-25 124046
स्थिति- दंडासन    सोपान 1  सोपान 2
Screenshot 2024-10-25 124123
सोपान 3    सोपान 4    विश्रांति- शिथिल दंडासन

दंडासन की मुद्रा में आएँ

सोपान 1- श्वास लेते हुए दाएँ पैर को मोड़कर बाई जाँघ पर रखें।

सोपान 2- श्वास छोड़ते हुए बाएँ पैर को मोड़कर दाई जाँघ पर रखें। दोनों हाथों को चिन मुद्रा में रखें। पीठ सीधी, गर्दन मुक्त और चेहरा मुस्कुराता हुआ रखें। आँखें बंद करें और कुछ मिनटों तक विश्राम और आनंद के साथ इस मुद्रा में रहें।

सोपान 3- श्वास लेते हुए बायाँ पैर खोलें।

सोपान 4- श्वास छोड़ते हुए दाहिने पैर को खोलें और दंडासन में विश्राम करें। शिथिल दंडासन में आराम करें।


बाएँ ओर से आसान दोहराएँ

Screenshot 2024-10-24 154637
  1. प‌द्मासन को रोग विनाशक कहा जाता है यह एक अच्छा ध्यानात्मक आसन है।
  2. यह कटि के निचले भाग में तंत्रिकाओं को उद्दीप्त करता है और रक्त प्रवाह को बढ़ाता है।
Screenshot 2024-08-02 165324

सीमाएँ-जिन विद्यार्थियों को घुटने और एड़ी में कष्ट हो, उनके लिए अभ्यास वर्जित है।

शिक्षक के लिए निर्देश

यह सुनिश्चित करें कि विद्यार्थियों की पीठ सीधी हो।


भुजंगासन (सर्पासन)

Screenshot 2024-10-25 164410
स्थिति— पेट के बल की स्थिति
Screenshot 2024-10-25 164431
सोपान 1
Screenshot 2024-10-25 164458
सोपान  2
Screenshot 2024-10-25 164535
सोपान  3
Screenshot 2024-10-25 164603
सोपान 4
Screenshot 2024-10-25 164706
विश्रांति — मकरासन 

पेट के बल लेटने की स्थिति में आएँ

सोपान 1— हाथों को छाती के बगल में रखें, हथेलियाँ नीचे की ओर रहेंगी और ठुड्डी भूमि पर रहेगी।

सोपान 2— श्वास भरते हुए शरीर को तब तक उठाएँ, जब तक हाथ सीधे न हो जाएँ। अपनी आँखे बंद रखें, कुछ मिनटों तक इसी मुद्रा में रहें।

सोपान 3— श्वास छोड़ते हुए धीरे-धीरे नीचे आएँ और ललाट को भूमि पर रखें।

सोपान 4— दोनों हाथों को सिर के ऊपर ले जाएँ, हथेलियाँ नीचे की ओर हों, अपने ललाट को भूमि पर टिकाएँ और अपनी आँखे बंद ही रखें। मकरासन में विश्राम करें।


Screenshot 2024-10-24 154637
  1. भुजंगासन रीढ़ की हड्डी में लचीलापन लाता है और रीढ़ की मांसपेशियों को शक्ति प्रदान करता है।
  2. यह पेट की वसा को कम करता है।
  3. यह श्वसन संबंधी विकारों के लिए उपयोगी है।
Screenshot 2024-08-02 165324

सीमाएँ- जिन विद्यार्थियों की हाल ही में पेट की शल्य-चिकित्सा हुई है, उन्हें इस अभ्यास से बचना चाहिए।

शिक्षक के लिए निर्देश

  • सुनिश्चित करें कि विद्याथी हथेलियों छाती के किनारों पर रखें और कोहनियाँ फैलाएँ नहीं।
  • नाभि के नीचे शरीर का भूमि से स्पर्श रहना चाहिए।

शलभासन (टिड्डी आसन)

Screenshot 2024-10-25 164410
स्थिति- पेट के बल
Screenshot 2024-10-28 100308
सोपान 1
Screenshot 2024-10-28 100325
सोपान 2
Screenshot 2024-10-28 100343
सोपान 3
Screenshot 2024-10-25 164603
सोपान 4
Screenshot 2024-10-25 164706
विश्रांति- मकरासन

पेट के बल लेटने की स्थिति में आएँ

सोपान 1– दोनों हाथों की मुट्ठी बनाएँ और उन्हें जाँघों के नीचे रखें, फिर अपनी ठोड़ी को भूमि पर रखें।

सोपान 2- श्वास लेते हुए दोनों पैरों को बिना घुटने मोड़े ऊपर उठाएँ। कुछ मिनट के लिए आँखें बंद रखें और इसी स्थिति में रहें।

सोपान 3 श्वास छोड़ते हुए धीरे-धीरे पैरों को भूमि पर रखें।

सोपान 4- हाथों को सिर के ऊपर उठाएँ। हथेलियाँ भूमि की ओर होंगी माथा भूमि पर होगा, आँखें बंद ही रहेंगी।

मकरासन की स्थिति में विश्राम करें।


Screenshot 2024-10-24 154637
  1. शलभासन मेरुदंड को स्वस्थ एवं लचीला बनाने में सहायक है।
  2. यह नितंब, जाँध, घुटने और पिंडली की मांसपेशियों को शक्तिशाली बनाता है।
  3. वृक्क की कार्यप्रणाली में वृद्धि करता है।
Screenshot 2024-08-02 165324

सीमाएँ - हृदय रोग और मधुमेह वाले विद्यार्थी इस अभ्यास को न करें।

शिक्षक के लिए निर्देश

  • यह सुनिश्चित करें कि जिन के पीठ के निचले भाग में कष्ट है, वो सावधानी से करें।
  • विद्यार्थियों से पूछें कि क्या उन्हें अंतिम मुद्रा को बनाएँ रखने में असुविधा तो नहीं होती।
  • अभ्यास के दौरान विद्यार्थियों को अपनी श्वास को अनुभव करते रहने के लिए कहें।

उत्तानपादासन

Screenshot 2024-10-28 095733
स्थिति- पीठ के बल लेटते हुए
Screenshot 2024-10-28 095757
सोपान 1
Screenshot 2024-10-28 095818
सोपान 2
Screenshot 2024-10-28 095837
सोपान 3
Screenshot 2024-10-28 095858
सोपान 4
Screenshot 2024-10-28 095923
विश्रांति- शवासन

पीठ के बल लेटने की स्थिति में आएँ

सोपान 1- श्वास लेते हुए दोनों पैरों को 45° के कोण पर उठाएँ।

सोपान 2- श्वास गहरी करते हुए दोनों पैरों को 90° के कोण पर उठाएँ। इस स्थिति को लंबे समय तक बनाएँ रखें और श्वास सामान्य रखें।

सोपान 3- श्वास छोड़ते हुए, धीरे-धीरे दोनों पैरों को 45° कोण पर लेकर आएँ।

सोपान 4- श्वास छोड़ते हुए दोनों पैरों को चटाई या मैट पर ले आएँ। शवासन में विश्राम करें।


Screenshot 2024-10-24 154637
  1. उत्तानपादासन मेरुदंड में लचीलापन लाता है और मेरुदंड की मांसपेशियों को सुदृढ़ बनाता है।
  2. पेट की अतिरिक्त वसा को कम करता है।
Screenshot 2024-08-02 165324

सीमाएँ- जिन विद्यार्थियों को पीठ के निचले भाग में कष्ट रहता है, उन्हें ये आसन नहीं करना चाहिए।

शिक्षक के लिए निर्देश

यह सुनिश्चित करें कि विद्यार्थियों के पैर बिना घुटने को मोड़े सीधे रहें।

विश्रांति

आसनों के अभ्यास के बाद विश्राम करने की सलाह दी जाती है, यह शरीर के तनाव को मुक्त करने और मन को शांत करने में सहायक है।

पीठ के बल लेटते हुए पैरों के बीच हाथों में अंतर रखें। हथेलियाँ छत की ओर खुली हुई होंगी। पूरे शरीर को ढीला छोड़ें और विश्राम करें।

Screenshot 2024-10-28 101505

उदर की गति का अवलोकन

जब आप श्वास लेते हैं, तो उदर के ऊपर उठने और नीचे गिरने की गति पर पाँच चक्र (राउंड) तक ध्यान लगाएँ।

लयबद्ध श्वसन के साथ उदर की गति

  • उदर की गति के साथ श्वास को धीमा करें और लयबद्ध करें।
  • श्वास लेते हुए उदर ऊपर की ओर उठता है एवं श्वास छोड़ते हुए नीचे की ओर आता है।
  • श्वास का लेना और छोड़ना एक चक्र होगा, पाँच चक्र पूरे होने तर्फ ध्यान करें।
संवेगों का स्वावलोकन

  • श्वास लेते समय अनुभव करें कि शरीर हल्का हो रहा है व ऊर्जा से भर रहा है।
  • जब श्वास छोड़ रहे हैं तो शरीर को निढाल छोड़ दें व विश्रांति का अनुभव करें।
  • पाँच चक्रों तक अवलोकन करें।

अध्याय 4

प्राणायाम

श्वास जीवन की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता है। श्वसनतंत्र के निरंतर कार्य करने से ही हम जीवित रह पाते हैं। श्वास की गुणवत्ता हमारे जीवन की गुणवत्ता पर महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है। योग में 'प्राण' (जीवन शक्ति) है एवं 'आयाम' प्राणशक्ति का नियंत्रण एवं विस्तार है। प्राणायाम में तीन महत्वपूर्ण अभ्यास होते हैं।

  1. पूरक- श्वास का लेना
  2. रेचक- श्वास को छोड़ना
  3. कुंभक श्वास को रोकना

यह शरीर के महत्वपूर्ण तंत्रों (पाचन, परिसंचरण, श्वसन, उर्सजन और तंत्रिका तंत्र) को सतत करता है। मन को शांत करता है। एकाग्रता में वृद्धि और समग्र सद्भाव और आरोग्य को प्राप्त करने में सहायता करता है।

प्राणायाम गहरी और लयबद्ध श्वास लेने और श्वास के प्रति जागरूक रहने की आदतें विकसित करने के लिए श्वसन प्रक्रिया के अभ्यास से शुरू होता है। प्राणायाम नीरवता और सुस्पष्टता को बढ़ावा देने वाली ऊर्जा प्रणाली को उद्दीप्त, शांत और संतुलित करता है। भ्रामरी प्राणायाम तंत्रिका तंत्र को स्निग्ध करता है और मानसिक तनाव को कम करता है। आक्सीजन की आपूर्ति बढ़ाने, शरीर को ऊर्जा देने और फेफड़ों का व्यायाम करने के लिए अन्य कई तकनीकें हैं।

आइए सीखते हैं, जीवन प्रवाह के सुदृढ़ीकरण के लिए प्राणायाम कई प्रारूपों में किया जाता है-

  1. अनुभागीय श्वसन
  2. नाड़ीशुद्धि प्राणायाम
  3. भ्रामरी

शिक्षक के मार्गदर्शन में इन तकनीकों का अभ्यास करें और नीचे दिए गए निर्देशों का अनुसरण करें-

  1. प्राणायाम में श्वसन केवल नासिकों के माध्यम से किया जाना चाहिए।
  2. प्राणायाम के अभ्यास के दौरान चेहरा, कंधे और शरीर के अन्य भाग तनावमुक्त होने चाहिए।
  3. आँखें बंद, गर्दन, सिर और मेरुदंड सीधा रखें।
  4. प्राणायाम अभ्यास के दौरान उदर की गति पर ध्यान लगाएँ।
  5. इसे समझने के लिए प्रत्येक अभ्यास को पाँच बार दोहराएँ और निपुणता को प्राप्त करने के लिए इसका प्रतिदिन धीरे-धीरे अभ्यास करें।

अनुभागीय श्वसन

अनुभागीय श्वसन प्राणायाम की एक तकनीक है, जिसमें प्राणवायु को श्वसन क्षमता व अभिज्ञता के वर्धन हेतु सचेतनता से फेफड़ों के विशिष्ट भागों की ओर निर्देशित किया जाता है। इससे अभ्यास करने वाले विद्यार्थी श्वसन तंत्र के विभिन्न अंगों का उपयोग कर उसकी कार्यक्षमता को उन्नत कर सकते हैं। यह मनोमय श्वसन द्वारा रक्त में आक्सीकरण की मात्रा बढ़ाते हुए दुश्चिंता को कम करता है।

आइए, निम्नलिखित तीन अनुभागों में, श्वसन को सीखते हैं-

  • डायफ्राम के माध्यम से श्वसन (उदरस्थ अथवा मध्यपटीय श्वसन)
  • वक्षीय अथवा अंतरपर्शकापेशीय (अंतराशिरीय) श्वसन
  • हंसली अथवा ऊर्ध्ववक्षीय श्वसन

वज्रासन, वीरासन, प‌द्मासन या सुखासन में मेरुदंड सीधा चेहरा तनावमुक्त और आँखों को हल्के से बंद रखते हुए बैठें।

उदरस्थ अथवा मध्यपटीय श्वसन- अधम श्वास

Screenshot 2024-10-28 102503

  1. चिन मुद्रा में आएँ और अपने बाएँ हाथ को अपनी जाँघ पर रखें, दाएँ हाथ उदर पर रखें।
  2. श्वास को पूर्णतया अंदर लें, जिससे उदर चाहर निकले और डायफ्राम (मध्यपट) नीचे की ओर जाएँ।
  3. धीरे-धीरे और पूर्णतया श्वास बाहर छोड़ें, जिससे उदर अंदर की ओर जाए और डायफ्राम (मध्यपट) पुनः सामान्य अवस्था में लौटे।
  4. अंतःश्वसन और बाह्य य श्वसन, धीमा, गहरा, निर्वाहन, आरामदायक और लयात्मक होना चाहिए।
  5. संपूर्ण प्रक्रिया में कोई झटका नहीं देना चाहिए।
  6. अभ्यास को पाँच चक्रों तक दोहराएँ।

वक्षीय अथवा अंतरपर्शुका श्वसन - मध्यम श्वास

Screenshot 2024-10-28 102530
  1. चिन्मय मुद्रा ग्रहण करें और अपने हाथ अपनी जाँघ पर रखें।
  2. अपने दाएँ हाथ को अपने वक्ष पर रखें।
  3. वक्ष को विस्तारित करते हुए गहरी श्वास लें।
  4. वक्ष को संकुचित करते हुए श्वास को पूर्णतया बाहर निकलें।
  5. वक्षीय श्वसन के दौरान वायु दोनों नासाद्वारों से धीरे-धीरे और निरंतर प्रवाहित होती है और फेफड़ों की मध्यखंड खुलते हैं।
  6. पाँच चक्रों तक इस अभ्यास को दोहराएँ।

हंसली अथवा ऊपरी खंडीय श्वसन अध्य श्वास

Screenshot 2024-10-28 102550
  1. आदि मुद्रा ग्रहण करें और अपने हाथ को अपनी जाँघ पर रखें।
  2. अपने दाएँ हाथ को अपने बाएँ कंधे पर रखें।
  3. हँसली अस्थियों को ऊपर उठाते समय गहरी श्वास लें।
  4. हँसली अस्थियों को पुनः सामान्य स्थिति में ले जाते हुए धीरे-धीरे श्वास छोड़ें।
  5. पाँच चक्रों तक इस अभ्यास को दोहराएँ।

पूर्ण यौगिक श्वसन - पूर्ण श्वास

Screenshot 2024-10-28 102611
  1. चित्रानुसार ब्रह्मा मुद्रा अपनाएँ और हाथों को नाभि के नीचे रखें।
  2. उदर को बाहर, वक्ष को विस्तारित और हँसली की अस्थियों को ऊपर उठाते समय गहरी श्वास लें।
  3. उदर को अंदर, वक्ष की संकुचित और हँसली की अस्थियों को वापस नीचे लाते समय धीरे-धीरे श्वास छोड़ना है।

एकांतर नासिक श्वसन – नाड़ीशुद्धि प्राणायाम

नाड़ीशुद्धि प्राणायाम एक साधारण और शक्तिशाली तकनीक होती है, जो प्राण (जीवन ऊर्जा) के संचार को संतुलित और सूक्ष्म ऊर्जा प्रणाली को शुद्ध करती है। नाड़ी से तात्पर्य ऊर्जा प्रणाली और शुद्धि से तात्पर्य स्वच्छता होता है। संतुलित और लयात्मक श्वसन प्रणानी मन को शांत, दुश्चिंता में कमी और भावनात्मक स्थिरता में वृद्धि करता है।

नाड़ीशुद्धि प्राणायाम के अभ्यास के लिए कुछ बिंदु हैं-

  1. इस प्राणायाम का दैनिक अभ्यास दीर्घकालीन लाभ देता है।
  2. अभ्यास के दौरान जागरूक रहें।
  3. श्वास को स्वाभाविक रूप से संचालित होने दें।
  4. अभ्यास के दौरान झटके से बचने की कोशिश करें।

शिक्षक के लिए निर्देश

  • विद्यार्थियों को गतिविधि और श्वसन के बीच समन्वय के लिए प्रोत्साहित करें।
  • सुनिश्चित करें कि विद्यार्थियों द्वारा अनुभागीय श्वसन को सुचारु रूप से किया जा रहा है।

आइए, अब नाड़ीशुद्धि प्राणायाम का अभ्यास करते हैं
Screenshot 2024-10-28 103752

सोपान 1 - प‌द्मासन, वज्रासन या सुखासन में मेरुदंड सीधा, चेहरा तनावमुक्त और आँखों को हल्के से बंद रखते हुए बैठे।

सोपान 2- दाएँ हाथ की तर्जनी और मध्यमा अँगुली को मोड़ते हुए नासिका मुद्रा अपनाएँ इसे दाईं जाँघ पर रखें। अँगूठा, अनामिका और कनिष्ठा अँगुली को खुला रखें। अब बाएँ हाथ से चिन मुद्रा अपनाएँ और बाई जाँघ पर रखें।

सोपान 3- अँगूठे से दाएँ नासिका रंध्र को बंद करें और बाएँ नासिका रंध्र से श्वास बाहर छोड़ें। बाएँ नासिका रंध्र से गहरी श्वास लें और श्वास को रोके, दाएँ नासिका रंध्र से अँगूठे को हटाएँ और अनामिका एवं कनिष्ठा अँगुली से बाएँ नासिका रंध्र को बंद करें।

सोपान 4- दाएँ नासिका रंध्र से धीमे-धीमे श्वास बाहर छोड़ें। दाएँ नासिका रंध्र से गहरी श्वास लें। बाएँ नासिका रंध्र से अनामिका और कनिष्ठा अँगुली को उठाएँ और अँगूठे से दाएँ नासिका रंध्र को बंद करें।

सोपान 5- बाएँ नासिका रंध्र से धीरे-धीरे श्वास छोड़ें। इस प्रकार आपका एक चक्र पूर्ण हो गया। इस अभ्यास को तीन से पाँच चक्रों के लिए दोहराएँ।

सोपान 6- अभ्यास के पश्चात दाएँ हाथ को नीचे लें लाएँ, चिन मुद्रा अपनाएँ और परिवर्तनों का अवलोकन करें।


नाड़ीशुद्धि व्यायाम के लाभ
  1. नाड़ीशुद्धि प्राणायाम नासिका मार्ग को स्वच्छ करने के अतिरिक्त दोनों नासिका रंध्रों के मध्य संतुलन को सुनिश्चित करता है।
  2. यह भूख में वृद्धि करता है।
  3. यह तनाव जनित हार्मोन को कम करने में सहायता करता है।

शिक्षक के लिए निर्देश

  • विद्यार्थियों को चिन मुद्रा और नासिका मुद्रा प्रदर्शित करें और सुनिश्चित करें कि वह इसे उपयुक्त तरीके से करें।
  • वाएँ और बाएँ नासिका रंध श्वसन के पूर्ण चक्र को निर्देशों सहित प्रदर्शित करें।
  • तकनीक की समझ में उनकी सहायता के लिए अभ्यास के दौरान अंगूठे, अनामिका और कनिष्ठा अँगुली की स्थिति का अवलोकन करें और सोपानों का उपयुक्त तरीके से अनुसरण करें।
  • विद्यार्थियों से पूछें कि अभ्यास के पश्चात उन्होंने कैसा अनुभव किया और क्या शांतचित्त का अनुभव किया?

भ्रमरी प्राणायाम

Screenshot 2024-10-28 104541

भ्रामरी प्राणायाम तकनीक मधुमक्खी की गुनगुनाहट ध्वनि की नकल है। यह नाम संस्कृत के 'भ्रामरी' शब्द की उत्पत्ति है, जिसका अर्थ मादा मधुमक्खी होता है। भ्रामरी प्राणायाम नीरवता की एक तकनीक है। जिसका मन और तंत्रिका तंत्र पर शांतिदायक प्रभाव होता है। इसके अंतर्गत गहरी श्वास लेना और श्वास बाहर निकालने के समय धीमी गुनगुनाहट वाली ध्वनि उत्पन्न करना सम्मिलित है।

भ्रामरी प्राणायाम के कई लाभ हैं-

  1. तनाव और दुश्चिंता को कम करना।
  2. एकाग्रता और स्मृति में सुधार।
  3. निद्रा की गुणवत्ता में सुधार।
  4. गहरे विश्राम की अवस्था को प्रेरित करना।
  5. रक्तचाप को संतुलित रखना।

आइए, भ्रामरी प्राणायाम करना सीखते हैं-

  • सुखासन में मेरुदंड को सीधा रखकर स्मित मुस्कान और आँखों को हल्के से बंद करते हुए बैठेंगे।
  • दोनों नासिका रंध्रों से गहरी श्वास लेते हुए दोनों फेफड़ों में प्राणवायु भरेंगे।
  • श्वास बहार निकालते समय मधुमक्खी के समान निरंतर धीमी गुनगुनाहट की ध्वनि निकालें (ओमकार, उच्चारण से मकर ध्वनि)।
  • संपूर्ण सिर और शरीर में ध्वनि के कंपन का अनुभव करें।
  • अभ्यास को पाँच बार दोहराएँ।

शिक्षक के लिए निर्देश

विद्यार्थियों से पूछें कि क्या अभ्यास के दौरान उन्होंने प्रतिध्वनि को अनुभव किया। अभ्यास उपरांत उनके मन की अवस्था के बारे में पूछे।


प्रत्याहार

वर्तमान समय के तीव्र गतिशील विश्व में प्रत्याहार एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। चूँकि हमारे समस्त संवेदी अंग बर्हिमुखी हो जाते हैं, वह गति की प्रतिक्रिया करने लगते हैं। यह आवयश्क हो रहा है कि हम अपनी इंद्रियों की प्रतिक्रिया मंद करने की कला अथवा शमन के विभिन्न तरीके सीखें।

प्रत्याहार का अभ्यास आहार, मनोरंजन, निद्रा और समस्त क्रियाओं में नियंत्रण द्वारा हर्ष की वृद्धि में सहायक है। प्रत्याहार के अभ्यास द्वारा व्यक्ति इंद्रियों द्वारा उत्पन्न अवांछित ध्यानाकर्षणों से बच सकते हैं। पूर्व अध्यायों में हमने प्रत्याहार क्रियाओं के माध्यम से इंद्रियों के प्रबंधन के विभिन्न तरीके को सीखा।

अध्याय 5

धारणा, ध्यान और समाधि

इस अध्याय में, हम ध्यान करने से पूर्व सर्वप्रथम ध्यान केंद्रित करना सीखेंगे।

क्या आप कभी आँखों को बंद करके शांतिपूर्वक बैठे हैं।

जब हमारी आँखें खुली होती हैं, हम विश्व को बाहर से देखते हैं और जब हमारी आँखें बंद होती हैं, हम विश्व को हमारे अंदर अनुभव कर सकते हैं।

धारणा, ध्यान और समाधि अष्टांग योग के तीन अंग हैं, जो शांति और प्रसन्नता अनुभव करने, मन को एकाग्र रखने, शांत रखने में सहयोगी हैं और मनोदैहिक समभाव प्रदान करते हैं।

अपने अंदर शांति का अनुभव करने की दिशा में पहला कदम अपने विचलित मन को किसी तत्व पर केंद्रित करना है। यह श्वास, मोमबत्ती की लो, बाहर फैले हुए हाथ के अँगूठे को निर्बाद्ध देखने से हो सकता है। इस एकल बिंदु एकाग्रता को धारणा कहते हैं। धारणा के अंतर्गत मन को स्थिर रखना और एकाग्रता बनाए रखना सम्मिलित है।

आइए, हम कंधों और अँगूठों का उपयोग करके जत्रु त्राटक का अभ्यास करके ध्यान केंद्रित करना सीखते हैं। यह एक ऐसा अभ्यास है, जिसमें दृष्टि किसी वस्तु या लक्ष्य पर स्थिर रहती है।

जत्रु त्राटक

जत्रु त्राटक एक बिंदु पर ध्यान केंद्रित करके एकाग्रता की क्षमता कर उन्नयन करता है। इस अभ्यास में बिंदु अपरिवर्तनीय अचल रहता है।

ऊपर और नीचे देखना

Screenshot 2024-10-28 105807

सोपान 1 वज्रासन या सुखासन में से बैठें। आँखें खुली और हाथों को जाँघों पर रखें।

सोपान 2 दाएँ हाथ को कंधे के स्तर पर सामने की ओर उठाएँ और अँगूठे को पार्श्व की ओर रखते हुए मुड्डी बनाएँ।

सोपान 3 अँगूठे की नोक पर दृष्टि को केंद्रित करें और धीरे-धीरे दाएँ हाथ को ऊपर ले जाना प्रारंभ करें।

सोपान 4 हाथ को ऊपैर ऊपर और नीचे गति करते समय दोनों आँखों को अँगूठे की नोक पर केंद्रित रखें। सिर की गति न कराएँ, केवल दृष्टि को ऊपर और नीचे की गति कराएँ।

सोपान 5 अभ्यास के पश्चात दोनों हथेलियों को आपस में मिलाकर धीरे से आँखों पर लगाएँ और वज्रासन या सुखासन में विश्राम करें।


इस अध्यास को बाएँ हाथ से भी दोहराएँ

दाएँ और बाएँ देखना

Screenshot 2024-10-28 110251

सोपान 1 वज्रासन या सुखासन में बैठें। आँखें खुलीं और हाथों को जाँघ पर रखें।

सोपान 2 दाएँ हाथ को सामने की ओर लाएँ और अँगूठे को ऊपर की ओर उठाते हुए मुट्ठी बनाएँ।

सोपान 3 दाएँ हाथ के सतह के समानांतर दाएँ कंधे की ओर ले जाएँ और अँगूठे की नोंक पर दृष्टि रखें। हाथ को दाएँ ओर रोकते हुए इसे स्थिति को बनाए रखें।

सोपान 4 अँगूठे की नोंक पर दृष्टि रखते हुए दाएँ हाथ को धीरे से मूल स्थिति में वापस लाएँ। सिर की गति न कराएँ केवल दृष्टि को पार्श्व की ओर लेकर जाएँ।

सोपान 5 अभ्यास के पश्चात दोनों हथेलियों को आपस में रगड़कर धीरे से आँखों पर लगाएँ और वज्रासन या सुखासन में विश्राम करें।


इस अध्यास को बाएँ ओर भी दोहराएँ

सामान्य पमिंग (हथेलियों को ऊष्मीकृत करने के लिए परस्पर रगड़ना फिर आँखों को संकना) कार्यविधि-

  1. दोनों हथेलियों को गर्म होने तक रगड़ें।
  2. हथेलियों की अंजुलि (कप) बनाएँ और आँखों पर सहजता से रखें। नेत्र गोलकों पर दबाव ना डालें।
  3. आँखों को बंद रखें।
हथेलियों को 10-15 सैकंड आँखों पर रखें फिर धीरे से हटा लें।

Screenshot 2024-10-28 110802
Screenshot 2024-10-24 154637
  1. जत्रु त्राटक एकाग्रता, बुद्धिमता और स्मृति में वृद्धि करता है।
  2. यह आँखों की दृष्टि और दर्शनक्षमता में वृद्धि करता है।
  3. यह आत्मविश्वास, धैर्य और इच्छाशक्ति में वृद्धि करता है।
Screenshot 2024-08-02 165324

सीमाएँ गंभीर सिरदर्द वाले विद्यार्थी इस अभ्यास से बचें।

शिक्षक के लिए निर्देश

  • सुनिश्चित करें कि विद्यार्थी अपने चरमे और घड़ियाँ उतार दें।
  • अभ्यास के दौरान सिर, ग्रीवा और सीधे मेरुदंड के साथ बैठने के लिए विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करें, आँखों को हमेशा पलकें झपकते हुए खोलें।
  • प्रत्येक अभ्यास के पश्चात हथेलियों से आँखों को ऊष्मा देना सुनिश्चित करें।

ध्यान

ध्यान से तात्पर्य मैडिटेशन या उच्चतम स्तर पर ईश्वरीय चिंतन अथवा ईश्वर से प्रतिबिंबित होना है। जब एकाग्रता, धारा के समान बाधारहित और निरंतर प्रवाह करती है यह ध्यान में परिवर्तित हो जाती है। ध्यान में बिना विचलन के चयनित केंद्र बिंदु की ओर एकाग्रता का निरंतर प्रवाह होता है। धारणा के विपरीत जहाँ एकाग्रता बनाए रखने के लिए प्रयास की आवश्यकता होती है। ध्यान की विशेषता-ध्यान लगाए गए तत्व में सहज सतत उपस्थिति व उसके अस्तित्व में डूब जाने की अवस्था को प्राप्त करना है।

ध्यान की क्रिया का अभ्यास करने से आंतरिक स्थिरता और शांति की गहन अनुभूति होती है। ध्यान के नियमित अभ्यास से मानसिक स्पष्टता, एकाग्रता और संज्ञानक क्रिया में वृद्धि होनी है एवं दुश्चिंता में कमी होती है।

ध्यान का कई तरीके से अभ्यास किया जा सकता है। इस कक्षा में हम नादानुसंधान (ध्वनि पर ध्यान लगाना) के बारे में सीखेंगे।

ध्यान के अभ्यास के लिए दिशानिर्देश
  1. शांत एवं स्वच्छ स्थान को खोजें। मेरुदंड को सीधा कर शिथिल शरीर के साथ पद्मासन या सुखासन में बैठें।
  2. ध्यान के माध्यम जैसे श्वास या कोई मंत्र या कोई दृष्टिगत वस्तु का चयन करें और उस पर ध्यान केंद्रित करें। अभ्यास के दौरान अपनी आँखे बंद रखें।
  3. अभ्यास के दौरान आने वाले विचारों और भावनाओं के प्रति अप्रतिक्रियात्मक रहें।
  4. प्रारंभ में लंबे समय तक श्वास पर ध्यान बनाए रखना सामान्यया कठिन होता है। अगर आपका मन विचलित होता है, तो धीमे लेकिन दृढ़ता से अपने ध्यान को पुनः अपनी श्वास पर लाएँ।
  5. निरंतरता महत्वपूर्ण है। ध्यान का प्रतिदिन अभ्यास करें, प्रारंभ में कुछ मिनट करें, फिर धीरे-धीरे अवधि बढ़ाए

नादानुसंधान (ध्वनि ध्यान)

नाद से तात्पर्य ध्वनि और अनुसंधान से तात्पर्य जाँच या अन्वेषण से होता है। इसलिए नादानुसंधान के अर्थ ध्वनि और कंपन पर गहरा ध्यान केंद्रित करना है। विभिन्न प्रकार की ध्वनि, जैसे- अ, उ, म और 'ऊँ' का धीरे-धीरे उच्चारण करें जिससे कि संपूर्ण शरीर में एक प्रतिध्वनि उत्पन्न हो।

  • मेरुदंड सीधा, चेहरा शिथिल और आँखों को सहजता से बंद रखते हुए वज्रासन या सुखासन में बैठे।
  • दोनों हाथों से चिनमुद्रा अपनाते हुए इन्हें जाँघों पर रखें।
  • तीन से पाँच चक्रों तक "अकार" का उच्चारण करें और निचले शरीर (उदर) में प्रतिध्वनि अनुभव करें।
  • तीन से पाँच चक्रों तक "उकार" का उच्चारण करें और शरीर के मध्य भाग (वक्ष क्षेत्र) में प्रतिध्वनि अनुभव करें।
  • तीन से पाँच चक्रों तक "मकार" का उच्चारण करें और शरीर के ऊपरी भाग (मस्तक क्षेत्र) में प्रतिध्वनि अनुभव करें।
  • तीन से पाँच चक्रों तक "ओमकार" का उच्चारण करें और शरीर में प्रतिध्वनि का अनुभव करें।
  • नादानुसंधान को दिन में कई बार दोहराएँ। यह सजगता के विस्तार में सहायता करता है।

समाधि

समाधि चेतना का उच्चतम स्तर है। इसे ध्यानावस्था के समय प्राप्त किया जा सकता है, इसमें मन व मस्तिष्क, विशुद्ध व उच्चतम रूप से सर्वोच्च सत्ता या ईश्वरीय तत्व पर केंद्रित करना है।

Screenshot 2024-10-28 112437


अध्याय 6

क्रीड़ा योग

योग की अवधारणाओं को खेल-खेल में समझने के लिए विभिन्न खेल सृजित किए गए हैं। संस्कृत में, क्रीड़ा का अर्थ खेलना' या शारीरिक क्रिया है। इसलिए क्रीड़ा योग का अर्थ खेल के माध्यम से योग सीखना है। क्रीड़ा योग, योग के कुछ सिद्धांतों को विकसित करने में सहयोग करता है, जैसे- आनंदित होना, सचेत रहना, एकाग्रता, श्वसनप्रणाली को शक्तिशाली बनाना, रचनात्मकता और प्रेम। क्रीड़ा योग तनाव और दुश्चिंता को कम करने, मानसिक आरोग्यता और भावनात्मक संतुलन को बढ़ावा देने में भी सहयोग करता है।

क्रीड़ा योग, योग को आनंददायक एवं परस्पर संवादात्मक बनाकर, इसे आजीवन रुचिकर बनाने में सहयोग करता है और समग्र विकास को सुनिश्चित करता है।

नीचे कुछ खेल दिए गए हैं, आप नए खेल सृजित कर सकते हैं। योग के सिद्धांतों पर और कक्षा में अपने सहपाठियों या अपने परिवार के सदस्यों के साथ खेलें।

पदार्थग्राही - ध्यानपूर्वक भोजन करना

ध्यानपूर्वक भोजन करना एक अभ्यंतरिक (इंडोर) खेल है। जो अधिकतर समूहों में खेला जाता है, इस खेल को 'तंद्रा तोड़ने' (सुगम पूर्वाभ्यास) के लिए भी उपयोग करते हैं। यह खेल अवरोधों पर विजय पाने, विद्यार्थियों में सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा को निखारने, स्वस्थ व पौष्टिक भोजन करने की आदतें विकसित करने, आत्मविश्वास को प्रोत्साहित करने हेतु भी खेला जाता है। भोजन को एक मूल विषय (थीम) के रूप में उपयोग किया जाता है। यह खेल रचनात्मकता, जागरूकता और भावनात्मक संस्कृति का प्रस्तुतीकरण है।

कैसे खेलें

  1. विद्यार्थियों को निर्देश दिया जाता है कि वे अपने बाएँ हाथ को एक थाली की तरह अपनी छाती के पास रखें।
  2. शिक्षक विभिन्न खाद्य पदार्थों के नाम पुकारता है और तेजी से खाने योग्य चीजों को अपने हाथ में ले लेता है। उदाहरण के लिए, सब्जियों के नाम गाजर, कट्टू, चुकंदर, पत्ता गोभी, आलू, सहजन, सेम, मूली, फलों के नाम सेब, आम, चीकू, अंगूर, संतरा, केला, अंगूर, अनानास, पपीता।
  3. जब शिक्षक किसी स्वस्थ खाद्य पदार्थ का नाम बोलें तो विद्यार्थियों को अपने दाहिने हाथ से थाली में से खाने की नकल करते हुए कहना चाहिए "हम खाते है" उदाहरण के लिए, यदि शिक्षक "गाजर" कहता है तो विद्यार्थी खाने की क्रिया करें और "हम खाते हैं" कहे।
  4. शिक्षक बीच-बीच में विभिन्न अखाद्य वस्तुओं, जैसे मृदा, पत्थर आदि या अस्वास्थ्यकर भोजन का नाम बोलें। अखाद्य एवं अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों के लिए विद्यार्थी मोन रहें।
  5. जो विद्यार्थी अखाद्य या अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थ के लिए "हम खाते हैं" कहते हैं, उन्हें बाहर कर दिया जाता है।
  6. जो विद्यार्थी अंत तक बने रहते हैं, उन्हें विजेता घोषित किया जाता है।
Screenshot 2024-10-28 112937

शिक्षक के लिए निर्देश

  • शिक्षक स्वस्थ भोजन (हम खाते हैं) और अस्वस्थ्यकर खाद्यपदार्थ (मूक) का नाम ले सकते हैं।
  • चावल, डोसा, दाल, चपाती, इडली, उपमा आदि खाद्य पदार्थों का भी उपयोग किया जा सकता है।

पंचभूत

एक समूह खेल है, जिसके माध्यम से बच्चे पाँच तत्वों या पंचभूतों के नाम सीखते हैं, वैसा कि नीचे चित्र में दिखाया गया है। यह खेल जागरूकता, ध्यान, सुनने की समझ और शरीर और मस्तिष्क के बीच समन्वय पर केंद्रित है। प्रारंभ में शिक्षक को खेल निर्देशों को समझने के लिए विद्यार्थियों के साथ क्रियाएँ करनी होती हैं।

पंचभूत
पृथ्वी आप अग्नि वायु आकाश
धरती पानी आग हवा आकाश

कैसे खेलें

  1. शिक्षक को केंद्र में रखते हुए विद्यार्थियों को एक घेरे में खड़ा होना चाहिए।
  2. जब शिक्षक किसी पंचभूत तत्व का नाम बोलें, तो विद्यार्थियों को उन तत्वों के रूप में कार्य करना चाहिए, जैसा कि तालिका में दिया गया है।
  3. इन क्रियाओं की गति को धीरे-धीरे बढ़ाया जा सकता है और पंचभूतों के क्रम को आगे-पीछे किया जा सकता है।
  4. असंगत गतिविधि करने वाले विद्यार्थी बाहर हो जाते हैं। जो विद्यार्थी अंत तक बना रहता है, वह खेल जीता जाता है।

शिक्षक के लिए निर्देश

  • खेल को रोचक बनाने के लिए विविधताओं को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • सुनिश्चित करें की सभी विद्यार्थी खेल में भाग लें।

पृथ्वी विद्यार्थी को उकडू बैठना या पैरों को व्युत्क्रमी करके (आलती-पालती) की अवस्था में बैठना चाहिए। Screenshot 2024-10-28 115459
आप विद्यार्थी को मुँह में पानी की ध्वनि निकालनी होगी (जैसे गलगलगल) Screenshot 2024-10-28 115538
अग्नि विद्यार्थी को सभी अँगुलियों को खोलकर (फैलाकर) अग्नि की लपट समान आग जलाने का अनुकरण करना होता है। Screenshot 2024-10-28 115919
वायु विद्यार्थी को दोनों हाथ ऊपर उठाकर दाएँ-बाएँ विपरीत दिशा में घुमाने चाहिए। Screenshot 2024-10-28 120028
आकाश विद्यार्थी को अपने दोनों हाथों को ऊपर उठाकर हथेलियाँ आसमान की ओर रखनी चाहिए और ऊपर की ओर देखना चाहिए। Screenshot 2024-10-28 115944


शिक्षकों के लिए सुझावात्मक सत्र योजना

प्रथम माह

तृतीय कालांश
छठा कालांश
नौवाँ कालांश
बारहवाँ कालांश
दैनिक जीवन के लिए योग
दैनिक जीवन के लिए योग- परिचय 
(10 मिनट)
योग का इतिहास (10 मिनट)
योग क्या है? (10 मिनट)
यम का परिचय (10 मिनट)
योग साधना
ग्रीवा व्यायाम (5 मिनट)
ग्रीवा व्यायाम (5 मिनट) 
श्वानश्वसन (5 मिनट) एकपद पवनमुक्तासन (10 मिनट)
सूर्य नमस्कार की तकनीक
क्रीड़ा योग का परिचय ध्यानपूर्वक भोजन करना (15 मिनट) 
शशांक श्वसन (5 मिनट)
योग साधना
अर्धचक्रासन से पादहस्तासन व पैर बदलते हुए अश्वसंचालनासन (10 मिनट)
योग साधना
ध्यानपूर्वक भोजन करना (15 मिनट)
सूर्य नमस्कार की तकनीक अर्धचक्रासन से पादहस्तासन (5 मिनट)
आसन का परिचय अर्धकटिचक्रासन



द्वितीय माह
पंद्रहवाँ कालांश अठारहवाँ कालांश इक्कीसवाँ कालांश चौबीसवाँ कालांश
दैनिक जीवन के लिए योग अपरिग्रह की कथा (10 मिनट) प्रथम परीक्षा मूल्यांकन (10 मिनट) अपरिग्रह की गतिविधि (10 मिनट) नियम का परिचय (10 मिनट)
योग साधना
शशांक श्वसन (5 मिनट)
श्वान श्वसन (5) पवनमुक्तासन (एक व दोनों पैरों से) (5 मिनट)
अर्धचक्रासन से पादहस्तासन, दंडासन से शशांकासन (5 मिनट)
शशांक एवं श्वान श्वसन (5 मिनट)
पैर बदलते हुए अश्वसंचालनासन (5 मिनट)
योग साधना पद्मासन (10 मिनट)
दंडासन से साष्टांग नमस्कार, ऊर्ध्वमुख श्वानासन, अधोमुख श्वानासन (10 मिनट)
दंडासन से शशांकासन (5 मिनट)
प्राणायाम का परिचय (10 मिनट)
प्राणायाम का परिचय अनुभागीय श्वसन उदरस्थ श्वसन (5 मिनट)
शिथिलीकरण (5 मिनट)
अर्धकटिचक्रासन का पुनराभ्यास (10 मिनट) योग साधना योग साधना योग साधना


तृतीय माह
सत्ताईसवाँ कालांश तीसवाँ कालांश तैतीसवाँ कालांश छत्तीसवाँ कालांश
दैनिक जीवन के लिए योग नियम की गतिविधि (10 मिनट)
तपस की कथा (10 मिनट)
तपस की गतिविधि (10 मिनट)
योग साधना
योग साधना
शशांक श्वसन व श्वान श्वसन (5 मिनट)
ग्रीवा व्यायाम (10 मिनट) दंडासन से शशांकासन अश्वसंचालनासन (पैर बदलते हुए) (5 मिनट)
मध्यावधि मूल्यांकन
अर्धचक्रासन से पादहस्तासन (5 मिनट)
पवनमुक्तासन रॉकिंग और रोलिंग (5 मिनट)
योग साधना
पवनमुक्तासन दोनों पैरों से
अनुभागीय श्वसन (10 मिनट) शिथिलीकरण (5 मिनट)
शिथिलीकरण (5 मिनट) योग साधना नाड़ीशुद्धि का परिचय (10 मिनट)


चतुर्थ माह
उनतालीसवाँ कालांश बयालीसवाँ कालांश पैतालीसवाँ कालांश अड़तालीसवाँ कालांश
दैनिक जीवन के लिए योग प्रत्याहार का परिचय प्रत्याहार का परिचय
योग साधना योग साधना
योग साधना
श्वान श्वसन (5 मिनट)
श्वान श्वसन (5 मिनट)
अर्धचक्रासन से पादहस्तासन, अश्वसंचालनासन पैरों को बदलते हुए (5 मिनट)
दंडासन और साष्टांग नमस्कार, ऊर्ध्वमुख श्वानासन और अधोमुख श्वानासन (5 मिनट)
ऊर्ध्वमुख श्वानासन और अधोमुख श्वानासन (5 मिनट)
ग्रीवा के व्यायाम (5 मिनट) योग साधना योग साधना
योग साधना पवनमुक्तासन - एक पद घूर्णन (10 मिनट)
भुजंगासन और शलभासन का परिचय (10 मिनट)
पवनमुक्तासन दोनों पैरों से. रॉक एंड रोलिंग (5 मिनट)
पद्मासन (10 मिनट)
योग साधना शिथिलीकरण (5 मिनट)
अर्धकटिचक्रासन (10 मिनट)
भ्रामरी प्राणायाम का परिचय (5 मिनट)
पंचभूत (10 मिनट)
अनुभागीय श्वसन (10 मिनट) पंचभूत (10 मिनट)


पंचम माह
इक्यावनवाँ कालांश चौवनवाँ कालांश सत्तावनवाँ कालांश साठवाँ कालांश
दैनिक जीवन के लिए योग योग साधना द्वितीय परीक्षण मूल्यांकन योग साधना योग साधना
योग साधना
अर्धचक्रासन से पादहस्तासन, अश्वसंचालनासन दोनों पैरों से (5 मिनट)
ग्रीवा के व्यायाम (10 मिनट) ऊर्ध्वमुख श्वानासन और अधोमुख श्वानासन (5 मिनट) दंडासन और साष्टांग नमस्कार, ऊर्ध्वमुख श्वानासन और अधोमुख श्वानासन (10 मिनट) अर्धचक्रासन से पादहस्तासन, दंडासन से शशांकासन (5) मिनट)
योग साधना शिथिलीकरण (5 मिनट) भुजंगासन और शलभासन (10 मिनट)
उत्तानपादासन (10 मिनट)
उत्तानपादान का परिचय (10 मिनट) शिथिलीकरण (5 मिनट)
ध्यान का परिचय नादानुसंधान का अभ्यास (10 मिनट)
जत्रु त्राटक (10 मिनट)
शिथिलीकरण (5 मिनट)
धारणा का परिचय जात्रु त्राटक का अभ्यास (10 मिनट)
योग साधना योग साधना अनुभागीय श्वसन और नाड़ीशुद्धि प्राणायाम (10 मिनट)


षष्ठम माह
तिरेसठवाँ कालांश
छियासठवाँ कालांश
उनहत्तरवाँ कालांश
 बहत्तरवाँ कालांश
दैनिक जीवन के लिए योग
योग साधना
योग साधना
अष्टांग योग का पुनराभ्यास (10 मिनट)
वार्षिक मूल्यांकन
योग साधना
पवनमुक्तासन (दोनों पैरों से घर्णनू ) (10 मिनट)
दंडासन और शशांकासन, अश्वसंचालनासन (5 मिनट)
अर्धचक्रासन और पादहस्तासन (5 मिनट)
जत्रु त्राटक (10 मिनट)
आसनों का पुनराभ्यास (10 मिनट)
आसनों का पुनराभ्यास (10 मिनट)
योग साधना
शिथिलीकरण (5 मिनट)
शिथिलीकरण (5 मिनट)
नाड़ीशुद्धि और भ्रामरी प्राणायाम (10 मिनट)
भ्रामरी प्राणायाम (5 मिनट)
योग साधना
योग साधना
नादानुसंधान (5 मिनट)
योग साधना


कालांशों में गतिविधियों का प्रवाह


कालांश
इकाई सं.
सत्र प्रकार
गतिविधि का प्रकार
गतिविधि सं .
संचयी
1 इकाई 1 प्रकार 2 बर्फ-पानी शा. शि.-1 शा. शि.-1
2 इकाई 1 प्रकार 2 सात कांकर
शा. शि.-2 शा. शि.-2
3 इकाई 5 योग दैनिक जीवन में योग
योग-1 योग-1
4 इकाई 1 प्रकार 2 ऐरोबिक व्यायाम  
शा. शि.-3 शा. शि.-3
5 इकाई 1 प्रकार 2 अनुकरण
शा. शि.-4 शा. शि.-4
6 इकाई 5 योग योग का इतिहास
योग-2 योग-2
7 इकाई 1 प्रकार 2 अंकों का खेल शा. शि.-5 शा. शि.-5
8 इकाई 1 प्रकार 2 हूला हूप कूद शा. शि.-6 शा. शि.-6
9 इकाई 5 योग योग क्या हैं? योग-3 योग-3
10 इकाई 2 प्रकार 1 बाधा दौड़ शा. दक्षता-1 शा. दक्षता-1
11 इकाई 2 प्रकार 1 संतुलन क्रिया शा. दक्षता-2 शा. दक्षता-2
12 इकाई 5 योग यम से परिचय योग-4 योग-4
13 रचनात्मक आकलन आकलन-1 आकलन-1
14 इकाई 2 प्रकार 1 शिवम कहे शा. दक्षता-3 शा. दक्षता-3
15 इकाई 2 प्रकार 1 अनुकरण शा. दक्षता-4 शा. दक्षता-4
16 इकाई 5 योग अपरिग्रह की कथा योग-5 योग-5
17 & 18 इकाई 2 प्रकार 1 सहयोग से सफलता शा. दक्षता-5 शा. दक्षता-6
19 इकाई 2 प्रकार 1 केंद्र की गेंद शा. दक्षता-6 शा. दक्षता-7
20 इकाई 5 योग प्रथम परीक्षण आकलन योग-6 योग-6
21 & 22 इकाई 2 प्रकार 1 मकरगति और गेंद शा. दक्षता-7 शा. दक्षता-9
23 & 24 इकाई 2 प्रकार 1 टिक टैक टो ड्रिबल रिले शा. दक्षता-8 शा. दक्षता-11
25 रचनात्मक आकलन आकलन-2 आकलन-2
26 इकाई 5 योग अपरिग्रह की गतिविधि
योग-7 योग-7
27 इकाई 2 प्रकार 1 मकर दौड़ शा. दक्षता-9 शा. दक्षता-12
28 इकाई 2 प्रकार 3 सिर, धड़, पैर और लक्ष्य शा. दक्षता-10 शा. दक्षता-13
29 इकाई 5 योग नियम का परिचय  योग-8 योग-8
30 इकाई 3 प्रकार 3 सिटिंग-बैठक खो-खो-1 खो-खो-1
31 इकाई 3 प्रकार 3 चेजिंग-पीछा करना खो-खो-2 खो-खो-2
32 इकाई 5 योग नियम की गतिविधि योग-9 योग-9
33 इकाई 3 प्रकार 3 सिटिंग-बैठक खो-खो-3 खो-खो-3
34 इकाई 3 प्रकार 3 चेजिंग-पीछा करना खो-खो-4 खो-खो-4
35 इकाई 5 योग तपस की कथा योग-10 योग-10
36 इकाई 3 प्रकार 3 खो देना खो-खो-5 खो-खो-5
37 रचनात्मक आकलन आकलन-3 आकलन-3
38 इकाई 3 प्रकार 3 सीधी रेखा में दौड़ना खो-खो-6 खो-खो-6
39 इकाई 5 योग तपस की कथा योग-11 योग-11
40 इकाई 3 प्रकार 3 खो देना खो-खो-7 खो-खो-7
41 इकाई 3 प्रकार 4 सीधी रेखा में दौड़ना खो-खो-8 खो-खो-8
42 इकाई 5 योग तपस की कथा योग-12 योग-12
43 इकाई 3 प्रकार 3 डॉजिंग (चकमा देना) खो-खो-9 खो-खो-9
44 इकाई 3 प्रकार 4 जिग जैग दौड़ खो-खो-10 खो-खो-10
45 इकाई 5 योग योग साधना योग-13 योग-13
46 इकाई 3 प्रकार 3 डॉजिंग (चकमा देना) खो-खो-11 खो-खो-11
47 इकाई 3 प्रकार 4 जिग जैग दौड़ खो-खो-12 खो-खो-12
48 इकाई 5 योग प्रत्याहार का परिचय योग-14 योग-14
49 रचनात्मक आकलन आकलन-4 आकलन-4
50 & 51 इकाई 3 प्रकार 3 पोल टर्न (स्तंभ पर घूमना) खो-खो-13 खो-खो-14
52 इकाई 5 योग प्रत्याहार की गतिविधि योग-15 योग-15
53 to 61 वार्षिक मूल्यांकन 1 वा. म.-1 वा. म.-9
62 & 63 इकाई 3 प्रकार 4 कवरिंग चेज खो-खो-14 खो-खो-16
64 इकाई 5 योग योग साधना योग-16 योग-16
65 & 66 इकाई 3 प्रकार 3 चेन खो खो-खो-15 खो-खो-18
67 & 68 इकाई 3 प्रकार 4 फेक खो (भ्रामक खो) खो-खो-16 खो-खो-20
69 इकाई 3 प्रकार 3 पोल डाइव खो-खो-17 खो-खो-21
70 रचनात्मक आकलन आकलन-5 आकलन-5
71 इकाई 3 प्रकार 3 पोल डाइव खो-खो-18 खो-खो-22
72 & 73 इकाई 3 प्रकार 3 टो टैपिंग खो-खो-19 खो-खो-24
74 इकाई 5 योग योग साधना योग-17 योग-17
75 & 76 इकाई 3 प्रकार 3 3-2-3 चेन खो खो-खो-19 खो-खो-26
77 इकाई 4 प्रकार 3 पास देना हैंडबॉल-1 हैंडबॉल-1
78 इकाई 4 प्रकार 3 कैचिंग (लपकना) हैंडबॉल-2 हैंडबॉल-2
79 इकाई 4 प्रकार 3 पास देना हैंडबॉल-3 हैंडबॉल-3
80 इकाई 4 प्रकार 3 कैचिंग (लपकना)
हैंडबॉल-4 हैंडबॉल-4
81 इकाई 5 योग योग साधना योग-18 योग-18
82 रचनात्मक आकलन आकलन-6 आकलन-6
83 & 84 इकाई 4 प्रकार 1 10 पास खेल हैंडबॉल-5 हैंडबॉल-6
85 इकाई 5 योग द्वितीय मूल्यांकन योग-19 योग-19
86 & 87 इकाई 4 प्रकार 3 ड्रिबलिंग हैंडबॉल-6 हैंडबॉल-8
88 & 89 इकाई 4 प्रकार 3 अवरोध ड्रिबलिंग हैंडबॉल-7 हैंडबॉल-10
90 इकाई 4 प्रकार 3 शूट द बॉल हैंडबॉल-8 हैंडबॉल-11
91 इकाई 5 योग योग साधना योग-20 योग-20
92 इकाई 4 प्रकार 3 शूट द बॉल हैंडबॉल-9 हैंडबॉल-12
93 & 94 इकाई 4 प्रकार 1 चकमा गेंद हैंडबॉल-10 हैंडबॉल-14
95 रचनात्मक आकलन आकलन-7 आकलन-7
96 इकाई 5 योग योग साधना योग-21 योग-21
97 & 98 इकाई 4 प्रकार 3 ड्रिबल और शूट हैंडबॉल-11 हैंडबॉल-16
99 &100 इकाई 4 प्रकार 4 पास करना और शूट हैंडबॉल-12 हैंडबॉल-18
101 इकाई 4 प्रकार 3 शूटआउट प्रतियोगिता हैंडबॉल-13 हैंडबॉल-19
102 इकाई 5 योग योग साधना योग-22 योग-22
103 &104 इकाई 4 प्रकार 3 शूटआउट प्रतियोगिता हैंडबॉल-14 हैंडबॉल-21
105 इकाई 4 प्रकार 3 गोल रक्षक के रक्षात्मक कौशल हैंडबॉल-15 हैंडबॉल-22
106 इकाई 5 योग योग साधना योग-23 योग-23
107 इकाई 4 प्रकार 3 गोल रक्षक के रक्षात्मक कौशल हैंडबॉल-16 हैंडबॉल-23
108 इकाई 4 प्रकार 3 ब्लॉकिंग हैंडबॉल-17 हैंडबॉल-24
109 इकाई 5 योग अष्टांग योग की पुनरावृत्ति योग-24 योग-24
110 रचना आकलन-8 आकलन-8
111 इकाई 4 प्रकार 3 ब्लॉकिंग हैंडबॉल-18 हैंडबॉल-25
112 &113 इकाई 4 प्रकार 4 सम्मिलन हैंडबॉल-19 हैंडबॉल-27
114 to122 वार्षिक मूल्यांकन 2 वा. म.-1 वा. म.-9


टिप्पणी