Skip to content

13 पेड़ की बात

क्या आपने कभी कोई बीज बोया है? बीज से पेड़ बनने की कहानी बहुत रोचक है। कैसे अंकुर फूटता है, पौधा बनता है, धीरे-धीरे बढ़ता है और बड़ा पेड़ बन जाता है। आइए जानते हैं पेड़ की बात......

बहुत दिनों तक मिट्टी के नीचे बीज पड़े रहे। इसी तरह महीना-दर-महीना बीतता गया। सर्दियों के बाद वसंत आया। उसके बाद वर्षा की शुरूआत में दो-एक दिन पानी बरसा। अब और छिपे रहने की आवश्‍यकता नहीं थी! मानों बाहर से कोई शिशु को पुकार रहा हो, ‘और सोए मत रहो, ऊपर उठ जाओ, सूरज की रोशनी देखो।’ आहिस्ता-आहिस्ता बीज का ढक्कन दरक गया, दो सुकोमल पत्तियों के बीच अंकुर बाहर निकला। अंकुर का एक अंश नीचे माटी में मज़बूती से गड़ गया और दूसरा अंश माटी भेदकर ऊपर की ओर उठा। क्या तुमने अंकुर को उठते देखा है? जैसे कोई शिशु अपना नन्हा-सा सिर उठाकर आश्‍चर्य से नई दुनिया को देख रहा है!

वृक्ष का अंकुर निकलने पर जो अंश माटी के भीतर प्रवेश करता है, उसका नाम जड़ है और जो अंश ऊपर की ओर बढ़ता है, उसे तना कहते हैं। सभी पेड़-पौधों में ‘जड़ व तना’ ये दो भाग मिलेंगे। यह एक आश्‍चर्य की बात है कि पेड़-पौधों को जिस तरह ही रखो, जड़ नीचे की ओर जाएगी व तना ऊपर की ओर उठेगा। एक गमले में पौधा था। परीक्षण करने के लिए कुछ दिन गमले को औंधा लटकाए रखा। पौधे का स‍िर नीचे की तरफ़ लटका रहा और जड़ ऊपर की ओर रही। दो-एक दिन बाद क्या देखता हूँ कि जैसे पौधे को भी सब भेद मालूम हो गया हो। उसकी सब पत्तियाँ और डालियाँ टेढ़ी होकर ऊपर की तरफ़ उठ आर्इं तथा जड़ घूमकर नीचे की ओर लटक गई। तुमने कई बार सर्दियों में मूली काटकर बोई होगी। देखा होगा, पहले पत्ते व फूल नीचे की ओर रहे। कुछ दिन बाद देखोगे कि पत्ते और फूल ऊपर की ओर उठ आए हैं।

हम जिस तरह भोजन करते हैं, पेड़-पौधे भी उसी तरह भोजन करते हैं। हमारे दाँत हैं, कठोर चीज़ खा सकते हैं। नन्हें बच्चों के दाँत नहीं होते वे केवल दूध पी सकते हैं। पेड़-पौधों के भी दाँत नहीं होते, इसलिए वे केवल तरल द्रव्य या वायु से भोजन ग्रहण करते हैं। पेड़-पौधे जड़ के द्वारा माटी से रस-पान करते हैं। चीनी में पानी डालने पर चीनी गल जाती है। माटी में पानी डालने पर उसके भीतर बहुत-से द्रव्य गल जाते हैं। पेड़-पौधे वे ही तमाम द्रव्य सोखते हैं। जड़ों को पानी न मिलने पर पेड़ का भोजन बंद हो जाता है, पेड़ मर जाता है।

सूक्ष्मदर्शी से अत्यंत सूक्ष्म पदार्थ स्पष्‍ट रूप से देखे जा सकते हैं। पेड़ की डाल अथवा जड़ का इस यंत्र द्वारा परीक्षण करके देखा जा सकता है कि पेड़ में हज़ारों-हज़ार नल हैं। इन्हीं सब नलों के द्वारा माटी से पेड़ के शरीर में रस का संचार होता है।

इसके अलावा वृक्ष के पत्ते हवा से आहार ग्रहण करते हैं। पत्तों में अनगिनत छोटे-छोटे मुँह होते हैं। सूक्ष्मदर्शी के जरिए अनगिनत मुँह पर अनगिनत होंठ देखे जा सकते हैं। जब आहार करने की ज़रूरत न हो तब दोनों होंठ बंद हो जाते हैं। जब हम श्‍वास-प्रश्‍वास ग्रहण करते हैं तब प्रश्‍वास के साथ एक प्रकार की विषाक्‍त वायु बाहर निकलती है, उसे ‘अंगारक’ वायु कहते हैं। अगर यह ज़हरीली हवा पृथ्वी पर इकट््ठी होती रहे तो तमाम जीव-जंतु कुछ ही दिनों में उसका सेवन करके नष्‍ट हो सकते हैं। ज़रा विधाता की करुणा का चमत्कार तो देखो, जो जीव-जंतुओं के लिए जहर है, पेड़-पौधे उसी का सेवन करके उसे पूर्णतया शुद्ध कर देते हैं। पेड़ के पत्तों पर जब सूर्य का प्रकाश पड़ता है, तब पत्ते सूर्य-ऊर्जा के सहारे ‘अंगारक’ वायु से अंगार निःशेष कर डालते हैं। और यही अंगार वृक्ष के शरीर में प्रवेश करके उसका संवर्द्धन करते हैं। पेड़-पौधे प्रकाश चाहते हैं। प्रकाश न मिलने पर ये बच नहीं सकते। पेड़-पौधों की सर्वाधिक कोशिश यही रहती है कि किसी तरह उन्हें थोड़ा-सा प्रकाश मिल जाए। यदि खिड़की के पास गमले में पौधा रखो, तब देखोगे कि सारी पत्तियाँ व डालियाँ अंधकार से बचकर प्रकाश की ओर बढ़ रही हैं। वन-अरण्‍य में जाने पर पता लगेगा कि तमाम पेड़-पौधे इस होड़ में सचेष्‍ट हैं कि कौन जल्दी से सिर उठाकर पहले प्रकाश को झपट ले। बेल-लताएँ छाया में पड़ी रहने से, प्रकाश के अभाव में मर जाएँगी। इसलिए वे पेड़ों से लिपटती हुई, निरंतर ऊपर की ओर अग्रसर होती रहती हैं।

अब तो समझ गए होंगे कि प्रकाश ही जीवन का मूलमंत्र है। सूर्य-किरण का स्पर्श पाकर ही पेड़ पल्लवित होता है। पेड़-पौधों के रेशे-रेशे में सूरज की किरणें आबद्ध हैं। ईंधन को जलाने पर जो प्रकाश व ताप बाहर प्रकट होता है, वह सूर्य की ही ऊर्जा है। पेड़-पौधे व समस्त हरियाली प्रकाश हथियाने के जाल हैं। पशु-डाँगर, पेड़-पौधे या हरियाली खाकर अपने प्राणों का निर्वाह करते हैं। पेड़-पौधों में जो सूर्य का प्रकाश समाहित है वह इसी तरह जंतुओं के शरीर में प्रवेश करता है। अनाज व सब्ज़ी न खाने पर हम भी बच नहीं सकते हैं। सोचकर देखा जाए तो हम भी प्रकाश की खुराक पाने पर ही जीवित हैं।

कोई-कोई पेड़ एक वर्ष के बाद ही मर जाते हैं। सब पेड़ मरने से पहले संतान छोड़ जाने के लिए व्यग्र हैं। बीज ही उनकी संतान है। बीज की सुरक्षा व सार-सँभाल के लिए पेड़ फूल की पंखुड़ियों से घिरा एक छोटा-सा घर तैयार करता है। फूलों से आच्छादित होने पर पेड़ कितना सुंदर दिखलाई पड़ता है। जैसे फूल-फूल के बहाने वह स्वयं हँस रहा हो। फूल की तरह सुंदर चीज़ और क्या है? ज़रा सोचो तो, पेड़-पौधे तो मटमैली माटी से आहार व विषाक्‍त वायु से अंगारक ग्रहण करते हैं, फिर इस अपरूप उपादान से किस तरह ऐसे सुंदर फूल खिलते हैं। तुमने कथा तो सुनी होगी— स्पर्शमणि की अर्थात पारस पत्थर की, जिसके स्पर्श से लोहा सोना हो जाता है। मेरे विचार से माँ की ममता ही वह मणि है। संतान पर स्नेह न्‍योछावर होते ही फूल खिलखिला उठते हैं। ममता का स्पर्श पाते ही मानो माटी व अंगार के फूल बन जाते हैं।

पेड़ों पर मुस्कराते फूल देखकर हमें कितनी खुशी होती है! शायद पेड़ भी कम प्रफुल्लित नहीं होते! खुशी के मौके पर हम अपने परिजनों को निमंत्रित करते हैं। उसी प्रकार फूलों की बहार छाने पर पेड़-पौधे भी अपने बंधु-बांधवों को बुलाते हैं। स्नेहसिक्‍त वाणी में पुकार सकते हैं, “कहाँ हो मेरे बंधु, मेरे बांधव, आज मेरे घर आओ। यदि रास्ता भटक जाओ, कहीं घर पहचान नहीं सको, इसलिए रंग-बिरंगे फूलों के निशान लगा रखे हैं। ये रंगीन पंखुड़ियाँ दूर से देख सकोगे।” मधुमक्खी व तितली के साथ वृक्ष की चिरकाल से घनिष्‍ठता है। वे दल-बल सहित फूल देखने आती हैं। कुछ पतंगे दिन के समय पक्षियों के डर से बाहर नहीं निकल सकते। पक्षी उन्हें देखते ही खा जाते हैं, इसलिए रात का अँधेरा घिरने तक वे छिपे रहते हैं। शाम होते ही उन्हें बुलाने की खातिर फूल चारों तरफ़ सुगंध-ही-सुगंध फैला देते हैं।

वृक्ष अपने फूलों में शहद का संचय करके रखते हैं। मधु-मक्खी व तितली बड़े चाव से मधुपान करती हैं। मधु-मक्खी के आगमन से वृक्ष का भी उपकार होता है। तुम लोगों ने फूल में पराग-कण देखे होंगे। मधुमक्खियाँ एक फूल के पराग-कण दूसरे फूल पर ले जाती हैं। पराग-कण के बिना बीज पक नहीं सकता।

इस प्रकार फूल में बीज फलता है। अपने शरीर का रस पिलाकर वृक्ष बीजों का पोषण करता है। अब अपनी जिं़दगी के लिए उसे मोह-माया का लोभ नहीं है। तिल-तिल कर संतान की खातिर सब-कुछ लुटा देता है। जो शरीर कुछ दिन पहले हरा-भरा था, अब वह बिल्कुल सूख गया है। अपने ही शरीर का भार उठाने की शक्त्ति क्षीण हो चली है। पहले हवा बयार करती हुई आगे बढ़ जाती थी। पत्ते हवा के संग क्रीड़ा करते थे। छोटी-छोटी डालियाँ ताल-ताल पर नाच उठती थीं। अब सूखा पेड़ हवा का आघात सहन नहीं कर सकता। हवा का बस एक थपेड़ा लगते ही वह थर-थर काँपने लगता है। एक-एक करके सभी डालियाँ टूट पड़ती हैं। अंत में एक दिन अकस्मात पेड़ जड़ सहित भूमि पर गिर पड़ता है।

इस तरह संतान के लिए अपना जीवन न्योछावर करके वृक्ष समाप्‍त हो जाता है।

लेख‍क— जगदीशचंद्र बसु

अनुवादक— शंकर सेन

लेखक से परिचय

(1928–2020)

प्रसिद्ध वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बसु का बचपन प्रकृति का अवलोकन करते हुए बीता। पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं से प्रेम करते हुए उनकी शिक्षा आरंभ हुई। वे जीवविज्ञान, भौतिकी, वनस्‍पति विज्ञान तथा विज्ञान कथा ले‍खन में रूचि रखने वाले एक बहुविद् व्‍यक्‍त‍ि थे। उन्‍होंने सिद्ध‍ किया कि पौधों का एक निश्‍च‍ित जीवनचक्र व एक प्रजनन प्रणाली होती है और वे अपने परिवेश के प्रति जागरूक होते हैं। इस प्रकार वे यह स्‍थापित करने वाले विश्‍व के पहले व्यक्ति थे कि पौधे किसी भी अन्‍य जीव रूप के समान होते हैं। विज्ञान जैसे विषय को भी चित्रात्मक साहित्यिक स्वरूप प्रदान करने वाले जगदीशचंद्र बसु ने सर्वप्रथम रेडियो तरंगों के द्वारा संचार स्थापित कर एक बड़ी वैज्ञानिक खोज की थी। ‘पेड़ की बा’ का बांग्‍ला से हिंदी में अनुवाद शंकर सेन ने किया है।

पाठ से

मेरी समझ से

(क) नीचे दिए गए प्रश्‍नों का सटीक उत्तर कौन-सा है? उसके सामने तारा () बनाइए—

(1) जैसे पौधे को भी सब भेद मालूम हो गया हो पौधे को कौन-सा भेद पता लग गया?

  • उसे उल्‍टा लटकाया गया है।
  • उसे किसी ने सजा दी है।
  • बच्चे को गमला रखना नहीं आया।
  • प्रकाश ऊपर से आ रहा है।

(2) पेड़-पौधे जीव-जंतुओं के मित्र कैसे हैं?

  • हमारे जैसे ही साँस लेते हैं।
  • हमारे जैसे ही भोजन ग्रहण करते हैं।
  • हवा को शुद्ध करके सहायता करते हैं।
  • धरती पर हमारे साथ ही जन्मे हैं।

(ख) अब अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए और कारण बताइए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?

पंक्‍तियों पर चर्चा

पाठ में से चुनकर कुछ पंक्‍तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें ध्यान से पढ़िए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपने समूह में साझा कीजिए और अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए।

(क) पेड़-पौधों के रेशे-रेशे में सूरज की किरणें आबद्ध हैं। ईंधन को जलाने पर जो प्रकाश व ताप बाहर प्रकट होता है, वह सूर्य की ही ऊर्जा है।

(ख) मधुमक्खी व तितली के साथ वृक्ष की चिरकाल से घनिष्‍ठता है। वे दल-बल सहित फूल देखने आती हैं।

मिलकर करें मिलान

पाठ में से चुनकर कुछ वाक्यांश नीचे दिए गए हैं। अपने समूह में इन पर चर्चा कीजिए और इन्हें इनके सही अर्थ या संदर्भ से मिलाइए। इसके लिए आप शब्दकोश, इंटरनेट या अपने शिक्षकों की सहायता ले सकते हैं।

वाक्यांश

अर्थ या संदर्भ

1. बीज का ढक्कन दरक गया

1. मटमैली माटी और विषाक्‍त वायु से सुंदर-सुंदर फूलों में परिवर्तित होते हैं।

2. उसे ‘अंगारक’ वायु कहते हैं

2. जीवन के लिए सूर्य का प्रकाश आधारशक्‍ति या महत्वपूर्ण है।

3. पत्ते सूर्य ऊर्जा के सहारे ‘अंगारक’ वायु से अंगार निःशेष कर डालते हैं

3. अपनी संपन्नता और भावी पीढ़ी की उत्पत्ति से प्रसन्न-संतुष्‍ट।

4. प्रकाश ही जीवन का मूलमंत्र है

4. साँस छोड़ने पर निकलने वाली वायु-कार्बन डाईआक्साइड।

5. जैसे फूल-फूल के बहाने वह स्वयं हँस रहा हो

5. सूर्य के प्रकाश से पत्ते विषाक्‍त वायु के प्रभाव को नष्‍ट कर देते हैं।

6. इस अपरूप उपादान से किस तरह ऐसे सुंदर फूल खिलते हैं

6. बीज के दोनों दलों में दरार आ गई या फट गए।

सोच-विचार के लिए

पाठ को एक बार फिर से पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए—

(क) बीज के अंकुरित होने में किस-किस का सहयोग मिलता है?

(ख) पौधे अपना भोजन कैसे प्राप्‍त करते हैं?

लेख की रचना

इस लेख में एक के बाद एक विचार को लेखक ने सुसंगत रूप से प्रस्तुत किया है। गमले को औंधा लटकाना या मूली काटकर बोना जैसे उदाहरण देकर बात कहना इस लेख का एक तरीका है। अपने तथ्य को वास्तविकता या व्यावहारिकता से जोड़ना भी इस लेख की विशेषता है।

(क) जैसे लेखक ने ‘पेड़ की बात’ कही है वैसे ही अपने आस-पास की चीजें़ देखिए और किसी एक चीज़ पर लेख लिखिए, जैसे—गेहूँ की बात।

(ख) उसे कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए।

अनुमान या कल्‍पना से

अपने समूह में मिलकर चर्चा कीजिए।

(क) “इस तरह संतान के लिए अपना जीवन न्‍योछावर करके वृक्ष समाप्‍त हो जाता है।” वृक्ष के समाप्‍त होने के बाद क्या होता है?

(ख) पेड़-पौधों के बारे में लेखक की रुचि कैसे जागृत हुई होगी?

प्रवाह चार्ट

बीज से बीज तक की यात्रा का आरेख पूरा कीजिए—

अंकुरण

  • मिट्टी के किसी भी पात्र में मिट्टी भरकर उसमें राजमा या चने के 4–5 बीज बो दीजिए।
  • हल्का-सा पानी छिड़क दीजिए।
  • 3–4 दिन तक थोड़ा-थोड़ा पानी डालि‍ए।
  • अब इसमें आए परिवर्तन लेखन पुस्‍ति‍का में लिखिए।

(संकेत— एक दिन में पौधे की लंबाई कितनी बढ़ती है, कितने पत्ते निकले, प्रकाश की तरफ़ पौधे मुड़े या नहीं आदि।)

शब्दों के रूप

नीचे दिए गए चित्र को देखिए।

यहाँ मिट्टी से जुड़े, कुछ शब्‍द नीचे दिए गए हैं जो उसकी विशेषता बता रहे हैं। अब आप पेड़, सर्दी, सूर्य जैसे शब्‍दों की विशेषता बताने वाले शब्‍द बॉक्‍स बनाकर लिखिए—

पाठ से आगे

मेरे प्रिय

नीचे दी गई तालिका से प्रत्‍येक के लिए अपनी पसंद के तीन-तीन नाम लिखिए—

फूल
पक्षी
वृक्ष
पुस्तक
खेल

आज की पहेली

इस शब्द सीढ़ी में पाठ में आए शब्द हैं। उन्हें पूरा कीजिए और पाठ में रेखांकित कीजिए—

खोजबीन के लिए

इंटरनेट कड़ियों का प्रयोग करके आप जगदीशचंद्र बसु के बारे में और जान-समझ सकते हैं—

जगदीशचंद्र बसु

• जगदीशचंद्र बसु— एक विलक्षण और संवेदनशील वैज्ञानिक

पढ़ने के लिए

आओ बच्चो तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिंदुस्तान की

आओ बच्चो, तुम्हें दिखाएँ झाँकी हिंदुस्तान की

इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की

वंदे मातरम्। वंदे मातरम्।

उत्तर में रखवाली करता पर्वतराज विराट है

दक्षिण में चरणों को धोता सागर का सम्राट है

जमुना जी के तट को देखो गंगा का ये घाट है

बाट-बाट में हाट-हाट में यहाँ निराला ठाठ है

देखो, ये तस्वीरें अपने गौरव की अभिमान की

इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की

वंदे मातरम्। वंदे मातरम्।

ये है अपना राजपूताना नाज इसे तलवारों पे

इसने सारा जीवन काटा बरछी तीर कटारों पे

ये प्रताप का वतन पला है आज़ादी के नारों पे

कूद पड़ी थी यहाँ हज़ारों पदि‍्म‍नियाँ अंगारों पे

बोल रही है कण-कण से कुर्बानी राजस्थान की

इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की

वंदे मातरम्। वंदे मातरम्।

देखो, मुल्क मराठों का ये यहाँ शिवाजी डोला था

मुगलों की ताकत को जिसने तलवारों पे तोला था

हर पर्वत पे आग जली थी हर पत्थर एक शोला था

बोली हर-हर महादेव की बच्चा-बच्चा बोला था

शेर शिवाजी ने रखी थी लाज हमारी शान की

इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की

वंदे मातरम्। वंदे मातरम्।

जलियाँवाला बाग ये देखो, यहीं चली थी गोलियाँ

ये मत पूछो किसने खेली यहाँ खून की होलियाँ

एक तरफ़ बंदूकें दन-दन एक तरफ़ थी टोलियाँ

मरनेवाले बोल रहे थे इंकलाब की बोलियाँ

यहाँ लगा दी बहनों ने भी बाज़ी अपनी जान की

इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की

वंदे मातरम्। वंदे मातरम्।

ये देखो बंगाल यहाँ का हर चप्पा हरियाला है

यहाँ का बच्चा-बच्चा अपने देश पे मरनेवाला है

ढाला है इसको बिजली ने भूचालों ने पाला है

मुट्ठी में तूफ़ान बँधा है और प्राण में ज्वाला है

जन्मभूमि है यही हमारे वीर सुभाष महान की

इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की

वंदे मातरम्। वंदे मातरम्।

— कवि प्रदीप