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किशोरावस्था वृद्धि एवं परिवर्तन की अवस्था
पादप की यात्रा सामान्यतः बीज के अंकुरण से आरंभ होती है। उचित पोषण से बीज नवोद्भिद बन जाता है और फिर तरुण पादप में विकसित हो जाता है। यह यात्रा कुछ विशिष्ट परिवर्तनों द्वारा चिह्नित होती है। इनमें से कुछ परिवर्तन दृष्टिगत होते हैं, जैसे- उसकी ऊँचाई में वृद्धि, अधिक पत्तियों एवं फूलों, फलों और नए बीजों का विकास। इन बीजों से नए पौधों का उगना।
इसकी संभावना न के बराबर है कि नवोद्भिदों में अंकुरण के तत्काल बाद ही बीज उत्पन्न करने की क्षमता विकसित हो जाए। बीज उत्पन्न करने में सक्षम होने के लिए उसे बड़ा और परिपक्व होना आवश्यक है। इसी प्रकार जंतुओं को भी जनन करने से पूर्व बड़ा और परिपक्व होने की आवश्यकता होती है। कुछ जंतु अंडे देते हैं जिन्हें सेने से बच्चे निकलते हैं जबकि अन्य जंतु, जैसे - मनुष्य शिशुओं को जन्म देते हैं। दोनों ही स्थितियों में वे क्रमशः क्रमिक वृद्धि से समय के साथ विकसित होते हैं।
विद्युत केतली, मिक्सर ग्राइंडर, टोस्टर, अवन, माइक्रोवेव...
मनुष्य की जीवन-यात्रा को विभिन्न अवस्थाओं में विभाजित किया जा सकता है, से- शैशवावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था, वयस्क अवस्था और वृद्धावस्था। प्रत्येक क्ति इन अवस्थाओं का अनुभव अपनी वृद्धि और विकास-गति की दर के अनुसार करता और हर व्यक्ति में प्रत्येक अवस्था की समयावधि अलग-अलग हो सकती है। शैशवावस्था वयस्क अवस्था तक हमारे शरीर में विभिन्न परिवर्तन होते हैं। 10 से 12 वर्ष की आयु तक धिकांश परिवर्तन लंबाई और भार से संबंधित होते हैं। इसके पश्चात अन्य स्पष्ट परिवर्तन ने आरंभ हो जाते हैं जो किशोरावस्था के आरंभ होने को इंगित करते हैं। यह द्रुत वृद्धि और कास की अवधि है जो विशिष्ट रूप से 10 से 19 वर्ष की आयु की अवधि में होती है।
कशोरावस्था के दौरान शरीर वयस्क होने के लिए तैयार होने लगता है। अधिकांश सजीवों की भाँति मानव-शिशु भी जन्म के तत्काल बाद जनन नहीं कर सकते जनन करने में सक्षम होने के लिए मानव-शिशु के शरीर को वृद्धि कर परिपक्व अवस्था तक हुँचने की आवश्यकता होती है।
मनुष्य जैसे-जैसे वृद्धि और विकास करते हैं, वे महत्वपूर्ण शारीरिक, संवेगात्मक और वहारगत परिवर्तनों का अनुभव करते हैं और जनन करने की क्षमता अर्जित करते हैं। इनमें से न्छ परिवर्तन अत्यंत स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर हो सकते हैं जबकि अन्य आंतरिक रूप से होते हैं गैर ये दृष्टिगोचर नहीं होते हैं। इस अध्याय में आप किशोरावस्था के संबंध में जानकारी प्राप्त रंगे तथा इसका महत्त्व समझेंगे और यह सीखेंगे कि इस अवस्था का दायित्वपूर्ण निर्वहन कैसे करेंगे
6.1 आय के साथ वृद्धि - किशोरवय के वर्ष
ग्रीष्मावकाश के दौरान वेंकटेश अपने नाना-नानी के घर गया। जैसे ही उसने घर में प्रवेश किया तब उसकी 12 वर्षीय ममेरी बहन देवयानी उसका अभिवादन करने के लिए दौड़ती हुई आई।
आइए, वेंकटेश और देवयानी के मध्य हुई इस रुचिकर परिचर्चा को समझने का प्रयत्न करते हैं।
क्रियाकलाप 6.1 - आइए, चर्चा करें
- एक पात्र और कुछ कागज की पचिया लीजिए।
- उन परिवर्तनों को पर्ची पर लिखिए जो आप कक्षा 5 से लेकर कक्षा 8 तक के विद्यार्थियों में देख सकते हैं।
- ये लंबाई, बल, व्यवहार अथवा किसी अन्य पहलू से संबंधित हो सकते हैं। पर्चियों पर विद्यार्थी अपने नाम न लिखें।
- पर्चियों को मोड़कर पात्र में रखिए।
- कक्षा के सभी विद्यार्थियों से प्राप्त पर्चियों को मिला दीजिए और एक-एक करके इन्हें खोलिए। पर्चियों के ऊपर लिखी जानकारियों के आधार पर कक्षा में विद्यार्थियों से इन परिवर्तनों पर चर्चा कीजिए।
पर्चियों पर लिखे अनुसार विद्यार्थियों में सामान्यतः दृष्टिगत परिवर्तन कौन-से थे? इन्हें नालिका 6.1 में सूचीबद्ध कीजिए।।
| क्र.सं. | परिवर्तन | आपके अवलोकन |
|---|---|---|
| 1. | लंबाई/कद | |
| 2. | भार और बल | |
| 3. | स्वरूप | |
| 3. | --- |
क्या आपने भी इनमें से कुछ परिवर्तनों का अनुभव किया है? यदि हाँ, तो इसका कारण यह है कि आप भी क्रमिक रूप से इस अवस्था में पहुँच रहे हैं। यह अवस्था लगभग 10 वर्ष की आयु से आरंभ होकर 19 वर्ष की आयु तक बनी रह सकती है। यह प्रायः बाल्यावस्था और वयस्क अवस्था के मध्य विकास की अवस्था है जिसे किशोरावस्था कहते हैं।
तालिका 6.1 का विश्लेषण करने पर आपने संभवतः निम्नलिखित परिवर्तनों को देखा होगा
जन्म के साथ ही हमारे शरीर में निरंतर वृद्धि और विकास होता रहता है जिसमें लंबाई या कद का बढ़ना सम्मिलित है। तथापि किशोरावस्था के दौरान लंबाई में वृद्धि अधिक स्पष्टतया दिखाई देती है।
लड़कों में वृद्धि के समय लंबाई के साथ-साथ उनके भार में वृद्धि होती है तथा उनका सीना और कंधे थोड़े चौड़े हो जाते हैं। लड़कियों के शरीर में भी लंबाई और भार में परिवर्तन होते हैं तथा अन्य परिवर्तन भी होते हैं, जैसे- स्तनों का विकास।
किशोरवय लड़कों में वाक्-यंत्र की वृद्धि होने से उनकी आवाज भारी हो जाती है। वाक्-यंत्र हमारे गले में स्थित एक संरचना है जो हमें बोलने में सहायता करती है। इस वृद्धि को गले के क्षेत्र में एक उभार के रूप में भी देखा जा सकता है जिसे कंठमणि (एडम्स एप्पल) कहते हैं। यद्यपि यह सभी व्यक्तियों में स्पष्ट दिखाई नहीं देता है। किशोरवय लड़कियों में भी वाक्-यंत्र विकसित होता है परंतु वह लड़कों के वाक्-यंत्र जितना बड़ा नहीं होता जिससे उनकी आवाज में बहुत कम परिवर्तन होता है।
किशोरावस्था के वर्षों में होने वाला एक अन्य सामान्य परिवर्तन ऐक्नी नामक त्वचा-संबंधी स्थिति है जिसमें छोटे लाल मुँहासे दिखाई देते हैं। ये सामान्यतः चेहरे पर दिखाई देते हैं। ऐक्नी किशोरावस्था में त्वचा से होने वाले तैलीय स्रावों के बढ़ने के कारण होता है जो त्वचा के छिद्रों को अवरुद्ध करके संक्रमण कर सकता है। ऐक्नी एक स्थिति है और मुँहासे होना उसकी अभिव्यक्ति हैं।
परिवर्तन चाहे लंबाई या कद में हो, आवाज में हो अथवा चेहरे के बालों में हो, यह जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है कि विभिन्न व्यक्तियों में इन परिवर्तनों का समय, उनकी प्रकृति और उनकी मात्रा अलग-अलग होती है। ये भिन्नताएँ पूर्णतः सामान्य हैं। प्रत्येक व्यक्ति किशोरावस्था का अनुभव अपनी वृद्धि और विकास की दर के अनुसार करता है। इसकी समयावधि भी एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भिन्न होती है।
अब हम किशोरावस्था में होने वाले कुछ परिवर्तनों को समझ गए हैं विशेष रूप से ऐसे परिवर्तनों को जो सरलता से दिखाई देते हैं। इनमें से कुछ विशेषताएँ, जैसे - आवाज में परिवर्तन, लड़कों में चेहरे और सीने पर बालों का उगना और लड़कियों में स्तनों का विकास होना जनन की प्रक्रिया में प्रत्यक्षतः सम्मिलित नहीं हैं। परंतु ये विशेषताएँ स्त्रियों और पुरुषों के मध्य अंतर करने में सहायक होती हैं। इस कारण से यह द्वितीयक लैंगिक विशेषताएँ कहलाती हैं।
द्वितीयक लैंगिक विशेषताएँ वे प्राकृतिक संकेत हैं जो यह दर्शाते हैं कि शरीर वयस्क-अवस्था के लिए तैयारी कर रहा है। ये यौवनारंभ को चिह्नित करती हैं। यौवनारंभ वह अवस्था है जिसमें किशोर के शरीर में बाह्य और आंतरिक परिवर्तन होते हैं जिनसे वह जनन करने में सक्षम एक वयस्क व्यक्ति में परिवर्तित हो जाता है।
6.2 जनन क्षमता को इंगित करने वाले परिवर्तन
किशोरावस्था की पहचान न केवल शारीरिक रूप से परिलक्षित परिवर्तनों द्वारा होती है अपितु आंतरिक परिवर्तनों के द्वारा भी होती है जो बाहर से दिखाई नहीं देते हैं। ऐसा ही एक परिवर्तन जनन में सम्मिलित विभिन्न संरचनाओं की परिपक्वता है।
लड़के और लड़कियाँ दोनों ही क्रमिक रूप से इन परिवर्तनों का अनुभव करते हैं और ये परिवर्तन बड़े होने के सहज (स्वाभाविक) भाग हैं। किशोरवय लड़कियों से संबंधित एक महत्वपूर्ण आंतरिक परिवर्तन आर्तव चक्र (ऋतु चक्र) का आरंभ है। यह प्रति 28-30 दिन में होता है और इसे प्रचलित रूप से माहवारी (पीरियड्स) कहते हैं। कई स्वस्थ लड़कियों में ऋतु चक्र 21-35 दिन का हो सकता है जो सामान्य अवधि (28-30 दिन) से कम या अधिक हो सकता है। ऋतु चक्र एक प्रमुख प्राकृतिक प्रक्रिया है और यह अच्छे जनन स्वास्थ्य के संकेतों में से एक है। चक्र का वह चरण जिसमें शरीर से रक्त-स्राव होता है, उसे मासिक धर्म कहा जाता है। इस चक्र की अवधि तीन से सात दिनों तक की हो सकती है। कुछ लड़कियों को इन दिनों में पेट के निचले भाग में दर्द या कष्ट का अनुभव हो सकता है। सामान्यतः 45-55 वर्ष की आयु के मध्य मासिक धर्म स्वाभाविक रूप से बंद हो जाता है जो किसी स्त्री के जीवन में जनन क्षमता के अंत को चिह्नित करता है।
मासिक धर्म के विषय में अनेक गलत धारणाएँ प्रचलित हैं, जिनसे लड़कियों को प्रायः अनावश्यक डर, लज्जा यहाँ तक कि अपराध का बोध भी होता है। इन धारणाओं ने कुछ मिथकों और वर्जनाओं को जन्म दिया है। ऐसे मिथकों और वर्जनाओं में ऋतुस्रावक लड़कियों को अन्य परिवारजनों से अलग रखना दुर्भाग्यवश आज भी प्रचलन में है। मासिक धर्म एक प्राकृतिक प्रक्रिया है और इन मिथकों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। मासिक धर्म के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण को प्रोत्साहित कर के हम महिलाओं के अच्छे जनन स्वास्थ्य को बढ़ावा देने की आवश्यकता को समझने में समाज की सहायता कर सकते हैं और महिलाओं के द्वारा एक स्वच्छ जीवन शैली अपनाने की दिशा में सकारात्मक योगदान दे सकते हैं।
किशोरावस्था केवल शारीरिक परिवर्तनों या जनन क्षमता से संबंधित परिवर्तनों के बारे में ही नहीं है अपितु इसमें संवेगात्मक तथा व्यवहारगत परिवर्तन भी सम्मिलित हैं। आइए, हम इन पर चर्चा करें।
6.3 किशोरावस्था में संवेगात्मक और व्यवहारगत परिवर्तन
कुछ समय लेकर सोचिए और बताइए कि क्या आपके या आपके साथियों के संवेगों में और व्यवहार में विगत एक या दो वर्षों में कोई विशेष परिवर्तन आया है। ये परिवर्तन रोमांचक, भ्रामक अथवा दोनों प्रकार के हो सकते हैं।
आइए, हम तालिका 6.2 में कुछ ऐसे संवेगात्मक परिवर्तनों और उनके कारण व्यवहार में होने वाले संभावित प्रभावों एवं सकारात्मक वद्धि और विकास के प्रकारों को सचीबद्ध करें।
| मुख्य संवेगात्मक परिवर्तन | व्यवहार पर संभावित प्रभाव | सकारात्मक वृद्धि एवं विकास के प्रकार |
|---|---|---|
| मनोदशा में बारंबार परिवर्तन | संगीत, नृत्य या खेल जैसी विभिन्न गतिविधियों में भागीदारी | आत्म-अन्वेषण और ऐसी गतिविधियों में सम्मिलित होना जो रचनात्मकता और नवाचार को जन्म दे सकती हैं |
| प्रबल संवेग | संवेदनशीलता में वृद्धि | दया-भाव, सामाजिक कार्यों में भागीदारी |
| अन्य कोई |
तालिका 6.2 पर चर्चा करते समय आपने किशोरों में विविध व्यवहारगत परिवर्तनों का पता लगाया होगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि किशोरावस्था में प्रायः बाल्यावस्था की तुलना में संवेग अधिक प्रबल होते हैं। ये संवेग उनके व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं जैसे वंचितों और अभावग्रस्त व्यक्तियों की सहायता करने हेतु सामाजिक पहल करना या उनमें सम्मिलित होना अथवा नए क्षेत्रों में गहरी रुचि विकसित करना।
यह समझना कि हमारे संवेग किस प्रकार हमारे व्यवहार और कार्यों को प्रभावित करते हैं तथा ये हमें अपेक्षाकृत अधिक अच्छे विकल्पों के चयन में और परिस्थितियों के अनुरूप सोच-समझ कर प्रतिक्रिया करने में सहायता कर सकते हैं।
6.4 किशोरावस्था को एक सुखद अनुभव बनाना
किशोरावस्था की यात्रा एक अनूठा अनुभव है। जीवन की इस अवस्था के दौरान अत्यधिक जिज्ञासा और उत्तेजना हमें अपने या अपने आस-पास की लगभग सभी वस्तुओं या घटनाओं या परिस्थितियों के प्रति एक नया दृष्टिकोण देती है। अच्छी आदतें, सोच समझ कर लिए गए निर्णय और कुछ छोटे-छोटे कार्य किशोरों के समग्र स्वास्थ्य पर सशक्त सकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। आइए, इसके विषय में जानें।
6.4.1 पोषण संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति
कक्षा 6 के अध्याय 'उचित आहार- स्वस्थ शरीर का आधार' में आपने स्वास्थ्यवर्धक आहार की आवश्यकता के विषय में सीखा। वृद्धि और विकास का काल होने के कारण किशोरावस्था में शरीर में अनेक परिवर्तन होते हैं। अतः इस समय पौष्टिक आहार का अत्यधिक महत्व होता है।
स्थानीय रूप से उपलब्ध खाद्य पदाथों, स्वास्थयवर्धक खाद्य स्रोतों और इनमे उपस्थित ये पोषक वृद्धि और विकास में किस प्रकार सहायक हो सकते हैं, इनके आधार पर तालिका 6.3 को भरिए।
| खाद्य स्रोत | इनसे प्राप्त होने वाले पोषक | इन पोषकों के कार्य |
|---|---|---|
| दूध, श्री अन्न (मिलेट), दही, पनीर और चीज़ | कैल्सियम, प्रोटीन, वसा | अस्थियों की इष्टतम वृद्धि में सहायता करना |
| ------- | प्रोटीन ------- | समुचित वृद्धि, बल प्राप्त करने में सहायता करना और ऊर्जा स्तर बढ़ाने में सहायता करना --------- |
| पालक, राजमा और सूखे मेवे जैसे किशमिश और अंजीर | आयरन (लौह तत्त्व) ------ | रक्त के बनने में सहायता करना |
किशोर विशेषकर किशोरवय लड़कियाँ शरीर में लौह तत्त्व अथवा विटामिन B12 की कमी के कारण बहुधा रक्त-संबंधी स्वास्थ्य विकारों से पीड़ित होती हैं।
- ऐसे स्वास्थ्य विकारों के बारे में पता लगाइए।
- हम अपने शरीर में लौह तत्त्व की कमी की पूर्ति कैसे कर सकते हैं?
- ऐसी सरकारी योजनाओं के बारे में पता लगाइए जिनका उद्देश्य इन तत्वों की कमी से होने वाले रोगों की रोकथाम करना है।
डोरोथी हॉजकिन एक प्रतिभावान वैज्ञानिक थीं जिन्होंने विटामिन B12 की संरचना का अध्ययन किया था। सामान्य संवत् 1964 में नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर रसायन विज्ञान के क्षेत्र में यह पुरस्कार जीतने वाली वह तीसरी महिला बनी। क्या आप जानते हैं कि मानव शरीर को समुचित रूप से कार्य करने के लिए विटामिन B12 की आवश्यकता होती है? अधिकांश विटामिनों की तरह यह मानव शरीर में निर्मित नहीं हो सकता है। यह केवल हमारे द्वारा ग्रहण किए जाने वाले भोजन से प्राप्त किया जाता है। अपने शिक्षक के साथ विटामिन B12 के स्रोतों पर चर्चा कीजिए।
6.4.2 व्यक्तिगत स्वच्छता
किशोरावस्था के दौरान पोषण के अतिरिक्त व्यक्तिगत स्वच्छता भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। शरीर की स्वच्छता बनाए रखना विशेष रूप से बगल और जघन क्षेत्र की स्वच्छता हमें संभावित संक्रमणों से बचा सकती है। लड़कियों में मासिक धर्म के दौरान स्वच्छता बनाए रखना उनके आराम और स्वास्थ्य दोनों के लिए आवश्यक होता है। मासिक धर्म स्वच्छता विभिन्न उपलब्ध उत्पादों यथा सेनीटरी पैड (चित्र 6.1) एवं पुनः प्रयोज्य वस्त्र के पैड का उपयोग करके बनाए रखी जा सकती है?

मासिक धर्म-संबंधी स्वच्छता को बेहतर बनाने के लिए सरकार भी लड़कियों और महिलाओं के लिए इन उत्पादों को निःशुल्क या कम मूल्य पर उपलब्ध कराने का प्रयास करती है। एक समाज के रूप में हम सभी को मासिक धर्म की स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए विद्यालयों और सार्वजनिक स्थलों पर आवश्यक सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के प्रयास करने चाहिए। हमें सेनीटरी पैड के प्रति वर्जनाओं को कम करने के लिए एकजुट होकर आगे बढ़ना चाहिए और मासिक धर्म संबंधी स्वच्छता को बढ़ावा देने में अपना योगदान देना चाहिए।
उपयोग के पश्चात् सेनीटरी पैड को अखबार या कागज में लपेट कर कूड़ेदान में डालकर निपटान भी महत्वपूर्ण है। इसके द्वारा हम समुदायिक स्वास्थ्य और पर्यावरणीय स्वच्छता सुनिश्चित कर सकते हैं। आजकल जैवनिम्नीकरणीय सेनीटरी पैड भी उपलब्ध हैं जो पर्यावरण के अनुकूल होते हैं।
मासिक धर्म संबंधी स्वच्छता को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने अनेक पहल की हैं-
- मासिक धर्म स्वच्छता योजना (MHS)- भारत सरकार द्वारा चलाई गई इस योजना के अंतर्गत ग्रामीण क्षेत्रों में किशोर लड़कियों को निःशुल्क अथवा रियायती दामों पर सेनीटरी पैड उपलब्ध कराए जाते हैं। लड़कियों को मासिक धर्म संबंधी स्वच्छता और स्वास्थ्य के संबंध में शिक्षित करने के लिए जागरूकता कार्यक्रमों का आयोजन भी किया जाता है।
- राष्ट्रीय किशोर स्वास्थ्य कार्यक्रम (RKSK) - इसका लक्ष्य किशोरों के सम्पूर्ण स्वास्थ्य को सुधारना है जिसमें मासिक धर्म संबंधी स्वास्थ्य एवं स्वच्छता भी सम्मिलित है। इसमें साथियों द्वारा सीखने को प्रोत्साहन मिलता है जहाँ पुराने विद्यार्थी अपने नए साथियों को इन विषयों पर जानकारी देते हैं।
- सुविधा सेनीटरी नैपकिन पहल - इस पहल के अंतर्गत जन औषधि केंद्रों के माध्यम से सस्ते दामों पर जैवनिम्नीकरणीय सेनीटरी पैड उपलब्ध कराए जाते हैं। इस पहल का उद्देश्य महिलाओं और किशोर लड़कियों तक स्वच्छता संबंधी उत्पादों की पहुँच को सुगम बनाना है।
- राज्य स्तरीय पहल - कुछ राज्य सरकारों के अपने कार्यक्रम हैं जैसे- कर्नाटक में 'शुचि योजना' और तमिलनाडु और ओडिसा जैसे राज्यों में निःशुल्क सेनीटरी नैपकिन योजनाएं। इन कार्यक्रमों का उद्देश्य सरकारी विद्यालयों में सेनीटरी पैड का निःशुल्क वितरण है।
6.4.3 शारीरिक गतिविधियाँ
किशोरावस्था के समय नियमित व्यायाम करना और शारीरिक गतिविधियाँ भी अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं। क्या आप नियमित रूप से व्यायाम अथवा खेल-कूद में सहभागिता करते हैं? आप किस प्रकार का व्यायाम करते हैं? इन गतिविधियों से आपका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य उत्तम रहेगा, आपका आंतरिक बल बढ़ेगा और आपकी मनोदशा सुदृढ़ होगी (चित्र 6.2)।

6.4.4 संतुलित सामाजिक जीवन
हम सभी समाज में रहते हैं और दैनिक जीवन में एक-दूसरे के साथ परस्पर संवाद करते हैं। हम सबको एक-दूसरे के प्रति नम्र और आदरपूर्ण होना चाहिए (चित्र 6.3)। यह सभी के लिए अनुकूल एवं सुरक्षित वातावरण निर्मित करने में सहायता करता है।
चूँकि किशोरावस्था जीवन की एक ऐसी अवस्था होती है जहाँ किशोरों को नए अनुभव होते हैं और उनमें नवीन भावनाएँ उपजती हैं उनमें अतः हमें दूसरों के साथ व्यक्तिगत रूप से या सोशल मीडिया के माध्यम से बातचीत करते समय अधिक विचारशील एवं उत्तरदायी होना चाहिए। यह वह समय है जब किशोर अपने साथियों के प्रति आकर्षित हो सकते हैं और उनके व्यवहार का अनुसरण कर सकते हैं। आजकल बहुधा वे एक-दूसरे के साथ ऑनलाइन बातचीत करते हैं।

विकसित प्रौद्योगिकियों ने सभी के लिए सूचना प्राप्त करने, संपर्क करने, वार्तालाप करने, परस्पर सूचना साझा करने हेतु ऑनलाइन प्लेटफॉर्म उपलब्ध कराए हैं। हमें सभी के सामूहिक कल्याण हेतु इन प्लेटफॉर्मों का उपयोग सोच-समझकर और दायित्व बोध के साथ करना चाहिए। सामान्यतः हम जानबूझ कर या अनजाने में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग असावधानीपूर्वक करते हैं। अपने से बड़ों और शिक्षकों के मार्गदर्शन से हम इन प्लेटफॉर्मों का सकारात्मक उपयोग कर सकते हैं।

साइबर उत्पीड़न में भ्रामक संदेश भेजकर, झूठी अफवाहें फैलाकर अथवा बिना अनुमति के व्यक्तिगत जानकारी साझा कर के दूसरों को परेशान करने के लिए फोन, कंप्यूटर या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्मों का उपयोग सम्मिलित है (चित्र 6.4)। तथापि यदि कोई आपको उत्पीड़ित करना चाहता है तो यह महत्वपूर्ण है कि आप भयभीत अथवा असहाय महसूस न करें अपितु समझदारी से काम लें तथा अपने माता-पिता और शिक्षकों से सहायता लीजिए।
इसके अतिरिक्त कोई भी फोटो ऑनलाइन अपलोड करते समय अथवा अपरिचित के साथ अपनी व्यक्तिगत जानकारी साझा करते समय आपको सावधान रहना चाहिए।
उत्तरदायित्वपूर्ण सोशल मीडिया व्यवहार के विभिन्न पहलुओं के विषय में पोस्टर और प्रचारपत्र के अभिकल्पन के लिए समूहों में कार्य कीजिए और उन्हें विद्यालय में निर्धारित स्थानों पर चिपकाइए। अपने सामूहिक अवलोकनों के आधार पर तालिका 6.4 को भी भरिए।
| करें | न करें |
|---|---|
| सम्मानपूर्ण और दयालु बनिए | व्यक्तिगत फोटो अपरिचितों या ऑनलाइन मित्रों के साथ साझा मत कीजिए |
| पोस्ट करने से पहले सोचिए | -------------- |
| निजता की सुरक्षा कीजिए | --------------- |
6.4.5 हानिकारक पदार्थों से बचना- 'ना' कहना सीखे
कुछ लोग जिनमें आपके सहपाठी भी सम्मिलित हो सकते हैं, वे आपको हानिकारक पदार्थों जैसे तंबाकू, गुटखा, सिगरेट, बीड़ी, एल्कोहॉल यहाँ तक कि जीवन के लिए घातक अवैध ड्रग्स का सेवन करने के लिए उकसा सकते हैं, फुसला सकते हैं, बाध्य कर सकते हैं अथवा दबाव बना सकते हैं। चूँकि किशोरावस्था में जिज्ञासा और उत्तेजना होती है तो किशोर इस प्रकार के व्यक्तियों द्वारा प्रभावित होकर इन पदार्थों का सेवन करने का प्रयास कर सकते हैं।
ये पदार्थ न केवल शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं अपितु इनकी आदत या लत हो जाती है। इसका अर्थ है कि एक बार व्यक्ति जब इनका उपभोग करते हैं तो उन्हें बार-बार इसका सेवन करने की तीव्र इच्छा होती है और वे नियमित रूप से इसका सेवन करने लगते हैं। इसे मादक पदार्थों की लत कहते हैं।

मादक पदार्थों के उपयोग से उत्पन्न गंभीर स्वास्थ्य समस्याएँ जैसे श्वास लेने में कठिनाई, स्मरणशक्ति का क्षय और फेफड़ों की क्षति सेवन किए गए पदार्थ पर निर्भर करती है (चित्र 6.5)। स्वस्थ रहने के लिए इन पदार्थों का उपयोग करने से हमें पूर्णतः बचना चाहिए और इनके स्थान पर स्वास्थ्यकारी पदार्थों का चयन करना चाहिए। इसके लिए आपका आत्मविश्वास बनाए रखना और अपने 'ना' के निर्णय पर अडिग रहना महत्त्वपूर्ण है।
इस व्यसन से मुक्ति पाने का प्रथम चरण है- परिवार और मित्रों से सहायता लेना और माता-पिता और शिक्षकों जैसे विश्वसनीय लोगों से बात करना। इस प्रकार की स्थितियों से निपटने के लिए परामर्श और चिकित्सकीय सलाह लेना भी सहायक हो सकता है। याद रखिए कि आपका स्वास्थ्य और आपका भविष्य आपके हाथों में है- अपना मार्ग समझदारी से चुनें।
नशा मुक्त भारत अभियान
सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा नशा मुक्त भारत अभियान का आरंभ किया गया। इसका मंतव्य जन साधारण तक पहुँचना और युवा, महिलाओं और समुदाय की सक्रिय सहभागिता के माध्यम से मादक पदार्थों के सेवन से बचने के संबंध में जागरूकता फैलाना है। इसमें कम आयु के बच्चों को मादक पदार्थों का सेवन करने से रोकने पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित किया गया है। मादक पदार्थों के व्यसनों से निपटने के लिए एवं व्यसनकारियों को व्यसनों को त्याग करने में सहायता हेतु भारत सरकार ने राष्ट्रीय नशा मुक्ति सहायता सेवा 14446 का आरंभ किया है।
6.5 किशोरावस्था के संदर्भ में 'क्यों प्रश्न'
किशोरावस्था में हमारे शरीर में हार्मोन नामक कुछ रसायनों के उत्पादन के कारण मासिक धर्म एवं यौवनारंभ के अन्य लक्षणों सहित अनेक परिवर्तन होते हैं। हार्मोन शरीर के प्रकार्यों को सुनिश्चित करते हुए शरीर की वृद्धि और विकास को नियंत्रित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हार्मोन शरीर के अलग-अलग अंगों में उत्पादित होते हैं और मस्तिष्क द्वारा संकेत दिए जाने की अनुक्रिया-स्वरूप उपयुक्त समय पर निर्मुक्त होते हैं। इसके साथ ही कुछ हार्मोन मनोदशा और व्यवहार को भी प्रभावित करते हैं।
जागरूक बने रहने एवं आवश्यक होने पर सहायता और मार्गदर्शन प्राप्त करने और सही निर्णय लेने से आप अपने भावी जीवन के लिए सुदृढ़ नींव का निर्माण कर सकते हैं।
संक्षेप में
- बाल्यावस्था से वयस्क-अवस्था में परिवर्तित होने की अवधि किशोरावस्था है। सामान्यतः यह लगभग 10 वर्ष की आयु से आरंभ होकर 19 वर्ष की आयु तक रहती है।
- किशोरावस्था की पहचान महत्वपूर्ण और विशिष्ट शारीरिक, जैविक और संवेगात्मक परिवर्तनों से होती है।
- वे लक्षण जो पुरुष और महिला में भेद होने की पहचान कराते हैं परंतु सीधे तौर पर जनन में सम्मिलित नहीं होते, उन्हें द्वितीयक लैंगिक विशेषताएँ कहा जाता है।
- यौवनारंभ वह अवस्था है जिसमें किशोर के शरीर में प्रत्यक्ष व आंतरिक परिवर्तन होते हैं तथा वह जनन करने में सक्षम वयस्क के रूप में विकसित होता है।
- लड़कियों में आर्तव चक्र प्रारंभ होना भी किशोरावस्था को चिह्नित करता है जिसके दौरान प्रत्येक 28-30 दिन के अंतराल पर उनके शरीर से रक्त स्राव होता है। इस प्रक्रिया को मासिक धर्म या माहवारी भी कहते हैं। मासिक धर्म यौवनारंभ के समय प्रारंभ होता है और सामान्यतः 45-55 वर्ष की आयु होने पर इसका अंत होता है।
- किशोर अनेक संवेगात्मक और व्यवहारगत परिवर्तनों का सामना करते हैं।
- संतुलित और स्वस्थ आहार ग्रहण करने से और व्यक्तिगत स्वच्छता एवं शारिरिक गतिविधियाँ बनाए रखने से किशोरों को स्वस्थ बने रहने में सहायता मिलती है।
- मादक पदार्थों, जैसे-तंबाकू, एल्कोहॉल और ड्रग्स का शरीर और मस्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इन पदार्थों के सेवन को 'ना' कहने और इनसे दूर रहने में ही समझदारी है।
- किशोरावस्था के समय शरीर में होने वाले परिवर्तन मुख्य रूप से शरीर से स्त्रावित होने वाले कुछ रसायनों द्वारा नियंत्रित होते हैं। इन रसायनों को हार्मोन कहते हैं।
- उपयुक्त मार्गदर्शन और जागरूकता किशोरों को भौतिक, संवेगात्मक और व्यवहारगत परिवर्तनों का प्रभावी रूप से प्रबंधन करने में सहायता करते हैं।
आइए, और अधिक सीखें
- 11 वर्षीय लड़के रमेश के चेहरे पर कुछ लाल दाने (मुँहासे) निकले। उसकी माँ ने उसे
बताया कि इसका कारण उसके शरीर में होने वाले जैविक परिवर्तन हैं।
- उसके चेहरे पर इन मुँहासों के होने के संभावित कारण क्या हो सकते हैं?
- इन मुँहासों से कुछ राहत पाने के लिए वह क्या कर सकता है?
- निम्नलिखित में से कौन-सा खाद्य समूह किशोरों के लिए अपेक्षाकृत अधिक उपयुक्त विकल्प होगा और क्यों?
- निम्नलिखित वाक्यों में रेखांकित शब्दों को सही रूप में लिखिए-
- किशोरवय लड़कियों में 28-30 दिनों के अन्तराल पर होने वाला रक्त-स्राव सिकर्ममाध है।
- किशोरवय लड़कों की आवाज में रूक्षता बढ़े हुए त्रकवाय के कारण होती है।
- द्वितीयक लैंगिक लक्षण वे प्राकृतिक संकेत हैं जो यह इंगित करते हैं कि शरीर वयस्कता की तैयारी कर रहा है और ये संभवयौना को चिह्नित करते हैं।
- हमें लल्कोएहॉ और ग्सडू को 'ना' कहना चाहिए क्योंकि ये व्यसनकारी हैं।
- शालू ने अपनी सहपाठी से कहा "किशोरावस्था में मात्र शारीरिक परिवर्तन होते हैं जैसे लंबा होना या शरीर पर बालों का निकलना।" क्या वह सही है? आप किशोरावस्था के इस वर्णन में क्या परिवर्तन करेंगें?
- कक्षा में चर्चा के समय कुछ विद्यार्थियों ने निम्नलिखित बिंदुओं पर चर्चा की। आप किन प्रश्नों को पूछकर इन बिंदुओं के औचित्य को सिद्ध करेंगे।
- "किशोरवयों को व्यवहारगत परिवर्तनों के संबंध में चिंता करने की आवश्यकता नहीं होती।"
- "यदि कोई हानिकारक पदार्थ का एक बार सेवन कर लेता है तो वह इच्छानुसार इसका सेवन करना कभी भी बंद कर सकता है।"
- किशोर कभी-कभी मनोदशा में निरंतर परिवर्तनों का अनुभव करते हैं। किसी दिन वे स्वयं को अत्यधिक ऊर्जावान और प्रसन्न अनुभव करते हैं जबकि किसी अन्य दिन वे अत्यंत उदासीनता का अनुभव करते हैं। अन्य कौन-से व्यवहारगत परिवर्तन इस आयु से संबंधित हैं?
- शौचालय का प्रयोग करते समय मोहिनी ने ध्यान दिया कि प्रयोग किए गए सेनिटरी पैड कूड़ेदान के आस-पास बिखरे पड़ें हैं। वह असहज हो गयी और उसने इस विषय में अपनी सहेलियों को बताया। उन्होंने मासिक धर्म संबंधी स्वच्छता और स्वच्छता संबंधी अन्य अच्छी आदतों पर चर्चा की। आप अपने साथियों को मासिक धर्म संबंधी स्वच्छता और स्वच्छता संबंधी आदतों के विषय में क्या सुझाव देंगे?
- मैरी और मनोज सहपाठी और अच्छे मित्र थे। 11 वर्ष की होने पर मैरी की गर्दन में सामने की ओर एक छोटा सा उभार विकसित हुआ। वह चिकित्सक के पास गई। उन्होंने उसे औषधि दी और आयोडीनयुक्त नमक खाने को कहा। 12 वर्ष का होने पर उसी प्रकार का उभार मनोज की गर्दन के पास विकसित हुआ। तथापि चिकित्सक ने उसे बताया कि यह उसके बड़े होने का एक लक्षण है। आपके अनुसार मैरी और मनोज को अलग-अलग परामर्श देने का संभावित कारण क्या है?
- किशोरावस्था के दौरान लड़कों और लड़कियों में कुछ शारीरिक परिवर्तन होते हैं जिनमें
से कुछ निम्नलिखित हैं-
- आवाज में परिवर्तन
- स्तनों का विकास
- मूँछों में वृद्धि
- चेहरे पर बालों की वृद्धि
- चेहरे पर मुँहासे
- जघन क्षेत्र में बालों की वृद्धि
- बगल में बालों की वृद्धि इन परिवर्तनों को नीचे दी गई तालिका में वर्गीकृत कीजिए-
- किशोरों के लिए एक स्वस्थ जीवनशैली जीने के सुझावों का उल्लेख करते हुए एक पोस्टर बनाइए
| किशोरावस्था के दौरान शारीरिक परिवर्तन | ||
|---|---|---|
| केवल लड़कों में देखे गए | केवल लड़कियों में देखे गए | लड़कों और लड़कियों दोनों में देखे गए |
अन्वेषणात्मक परियोजनाएँ
- अपने आस-पास के क्षेत्र में मानसिक स्वास्थ्य को सुधारने के लिए कार्य कर रहे कुछ विशिष्ट व्यक्तित्वों और संगठनों के विषय में पता लगाइए और उनसे साक्षात्कार कीजिए। कम से कम ऐसे पाँच प्रश्न सूचीबद्ध कीजिए जिन्हें आप साक्षात्कार में पूछेंगे।
- 'बाल विवाह- एक सामाजिक कुरीति' विषय पर भूमिका निर्वहण (रोलप्ले) नाटक कराइए और रेखांकित कीजिए कि बाल विवाह किस प्रकार बच्चों पर, विशेषकर युवा लड़कियों के समग्र स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डालता है।
- 21 जून अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाया जाता है। अपने शिक्षकों की सहायता से एक छोटे शिविर का आयोजन कीजिए और कुछ आसनों का अभ्यास कीजिए।