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जंतुओं में जैव प्रक्रम
यदि आपके द्वारा किया गया भोजन आपके पुनः भोजन करने से पहले पूरी तरह पच गया है तो आपको पीड़ा के लिए औषधि की आवश्यकता नहीं होगी।
- थिरुकुरल 942
'सजीव - विशेषताओं का अन्वेषण' वाले कक्षा 6 के अध्याय में हमने सजीवों की उत्तरजीविता के लिए आवश्यक प्रकार्यों, जैसे- पोषण, श्वसन, उत्सर्जन और जनन के विषय में सीखा, इन्हें सामूहिक रूप से जैव प्रक्रम कहते हैं। इस अध्याय में हम पोषण और श्वसन जैसे जैव प्रक्रमों के संबंध में विस्तार से जानेंगे।
अपने परिवेश का अवलोकन कीजिए एवं इस पर ध्यान दीजिए कि जंतु क्या खाते हैं? जंतु विभिन्न प्रकार के भोजन ग्रहण करते हैं। मधुमक्खी और शकरखोरा पुष्पों का मकरंद चूसते हैं तथा मानव शिशु एवं अन्य जंतुओं के शावक अपनी माँ का दूध पीते हैं। अजगर (पाइथन) जैसे सर्प उन जंतुओं को निगलते हैं जिनका वे शिकार करते हैं। कुछ जलीय जंतु अपने आस-पास के जल में तैरते हुए भोजन के छोटे-छोटे कणों को छान कर खाते हैं।
मानव तथा सभी जंतु भोजन से ऊर्जा प्राप्त करते हैं जिससे वे विभिन्न जैव प्रक्रमों को करने में सक्षम होते हैं। जंतु ऐसा भोजन ग्रहण करते हैं जो कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा जैसे जटिल घटकों से बना होता है। इन जटिल खाद्य घटकों को शरीर द्वारा उपयोग में लाने से पहले सरल रूपों में तोड़ा जाना आवश्यक है। परंतु यह प्रक्रिया कैसे होती है?
जटिल भोजन-घटकों का अपेक्षाकृत सरल रूपों में विघटन आहार नाल नामक एक लंबी नलिका में होता है। यह प्रक्रिया मुख से आरंभ होती है और गुदा में समाप्त हो जाती है (चित्र 9.1)। जैसे-जैसे भोजन इस नलिका में आगे बढ़ता है, वैसे-वैसे विभिन्न भागों से स्रावित पाचक रस इसे सरल रूपों में विघटित कर देते हैं। भोजन का यह सरल रूप हमारी आहार नाल के विभिन्न हिस्सों द्वारा अवशोषित कर शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचाया जाता है ताकि विभिन्न प्रकार्यों को पूरा किया जा सके।
9.1 जंतुओं में पोषण
विभिन्न जंतुओं में जटिल भोजन-घटक किस प्रकार सरल रूपों में विघटित होकर शरीर द्वारा उपयोग किए जाते हैं? क्या सभी जंतुओं में यह प्रक्रम एक समान होता है अथवा अलग-अलग होता है? आइए, सर्वप्रथम इसी प्रक्रम को हम मनुष्यों में समझने का प्रयास करते हैं।9.1.1 मानव में पाचन
आइए, हम अपने शरीर के अंदर आहार नाल के विभिन्न भागों में से होकर जाने वाले भोजन की यात्रा का पता लगाएँ।
मुख गुहा से भोजन यात्रा का आरंभ
भोजन के मुख में प्रवेश करते ही आपके द्वारा खाए जाने वाले भोजन की यात्रा आरंभ हो जाती है। हमारे दाँत संदलन (क्रशिंग) एवं चर्वण की प्रक्रिया के द्वारा भोजन को छोटे टुकड़ों में विघटित करते हैं। भोजन को आरंभिक विघटन द्वारा छोटे-छोटे टुकड़ों में परिवर्तित करने की प्रक्रिया को यांत्रिक पाचन कहते हैं। आप अपने प्रिय भोजन के विषय में सोचिए। क्या आपके मुँह में पानी आ जाता है? जब हम अपने प्रिय भोजन के विषय में सोचते हैं तो मुँह में अधिक लार स्रावित होने के कारण ऐसा होता है।
आपके विचार से आपके मुख में लार की क्या भूमिका है? जब आप रोटी खाते हैं तो आपको क्या अनुभव होता है? आइए, पता लगाते हैं।
आप रोटी का एक ग्रास (टुकड़ा) लें अथवा इसकी समान मात्रा में उबले हुए चावल लें और इन्हें 30-60 सेकंड तक अच्छी तरह चबाएँ। सबसे पहले आपको रोटी अथवा चावल का अपना सामान्य स्वाद आया होगा परंतु इसे चबाते रहने पर क्या आपको इसके स्वाद में कोई अंतर का अनुभव होता है? इसके स्वाद में मिठास आने लगती है। क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है?
विज्ञान एवं समाज
मुख का स्वास्थ्य बनाए रखने के लिए इसे स्वच्छ रखना आवश्यक है। हमें दिन में दो बार अपने दाँतों पर मंजन करना चाहिए और जीभ को साफ करना चाहिए। दंतक्षय और मुख की दुर्गंध से बचने के लिए हमें हर बार भोजन करने के बाद कुल्ला करना चाहिए। इसके साथ ही उन युक्तियों का पता लगाइए जिनसे हमारे बुजुर्ग मुख की स्वच्छता को बनाए रखते थे।
क्रियाकलाप 9.1 – आइए, जाँच करें
* दो परखनलियाँ लीजिए और उनको 'क' और 'ख' के रूप में नामांकित कीजिए।* परखनली 'क' में एक छोटा चम्मच उबले हुए चावल डालिए और परखनली 'ख' में भी एक छोटा चम्मच उबले हुए चावल को 30-60 सेकंड चबाने के बाद डालिए।
* दोनों परखनलियों में 3-4 mL जल डालिए।
* तालिका 9.1 में चावल एवं जल के मिश्रण के आरंभिक रंग को लिखिए।
* एक बिंदुपाती की सहायता से दोनों परखनलियों में आयोडीन विलयन की 3-4 बूँदें डालिए। इन्हें अच्छी तरह मिलाइए और अवलोकन कीजिए।
अपने अवलोकनों को तालिका 9.1 में अभिलेखित कीजिए।
तालिका 9.1- मंड पर लार की क्रिया
| परखनली | आयोडीन मिलाने से पूर्व मूल रंग | आयोडीन मिलाने के पश्चात रंग | रंग में परिवर्तन का संभावित कारण (यदि कोई हो) |
|---|---|---|---|
| (क) उबले हुए चावल | |||
| (ख) चबाए गए उबले चावल | |||
क्या आपने अवलोकन किया कि परखनली 'क' में उबले हुए चावल का रंग परिवर्तित होकर नीला-काला हो गया जबकि परखनली 'ख' में चबाए गए उबले चावल का रंग परिवर्तित नहीं हुआ अथवा बहुत हल्का नीला-काला रंग विकसित हुआ। परखनली 'क' में रंग परिवर्तित होने का क्या कारण है? कक्षा 6 में हमने सीखा था कि मंड पर आयोडीन की अभिक्रिया-स्वरूप नीला-काला रंग प्राप्त होता है। परखनली 'क' में नीले और काले रंग का दिखाई देना मंड की उपस्थिति को इंगित करता है। परखनली 'ख' में चबाए गए उबले चावल का रंग परवर्तित न होना इसमें मंड की अनुपस्थिति को इंगित करता है। यदि रंग में केवल हल्का परिवर्तन होता है तो यह मंड की बहुत कम मात्रा में उपस्थिति को इंगित करता है। यहाँ लार की क्रिया के कारण मंड सरल शर्कराओं में विघटित हो गया है। यदि परखनली 'ख' में अभी भी रंग दिखाई देता है तो इसमें आगे और अन्वेषण करने के लिए आप क्रियाकलाप में क्या परिवर्तन करेंगे? क्या चबाने का समय बढ़ाने से उसके रंग में परिवर्तन होगा? क्रियाकलाप को पुनः करके इसका पता लगाने का प्रयास कीजिए।
अब हम जान गए हैं कि मुख में लार के स्राव से मंड को शर्करा में विघटित करने में सहायता मिलती है। शरीर में जटिल भोजन-घटकों को सरल रूप में विघटित करने का यह प्रक्रम पाचन कहलाता है। भोजन आंशिक रूप से मुख में ही पच जाता है। आइए, हम सीखते हैं कि यह आंशिक रूप से पचा हुआ भोजन आहार नाल के अन्य भागों में किस प्रकार और अधिक पचता है।
भोजन नली (ग्रासनली) - मुख से आमाशय तक का पथ
जब आप अपना भोजन चबाते हैं तो आपकी लार न केवल मंड के पचने में सहायता करती है अपितु भोजन को आर्द्र भी करती है जिससे यह मृदु (नरम) हो जाता है और सरलता से निगला
जा सकता है। आपकी जिह्वा चबाए गए भोजन को लार के साथ मिलाती है। यह इस मृदुकृत भोजन को आगे धकेलने में सहायता करती है जहाँ से यह भोजन लंबी एवं लचीली नलिका में प्रवेश करता है, जिसे ग्रासनली (चित्र 9.2) कहा जाता है। परंतु भोजन नीचे की ओर कैसे जाता है?
भोजन नली की भित्तियाँ धीरे-धीरे लहरदार गति से संकुचित और शिथिल होती हैं जिससे भोजन आमाशय में धकेला जाता है। यह गति
संपूर्ण आहार नाल में होती है और भोजन को आगे की ओर धकेलती जाती है।
आमाशय
आमाशय में भोजन के मंथन के लिए भित्तियाँ संकुचित और शिथिल होती हैं। तत्पश्चात मथा गया भोजन आमाशय के आंतरिक आस्तर (inner lining) से स्रावित होने वाले स्राव के साथ मिश्रित होता है। आमाशय के इस स्राव में अम्ल, पाचक रस और श्लेष्मा होते हैं (चित्र 9.3)।
आमाशय का पाचक रस भोजन में उपस्थित प्रोटीन को अपेक्षाकृत सरल घटकों में विघटित करता है। अम्ल न केवल प्रोटीन को विघटित करने में सहायता करता है अपितु अनेक हानिकारक जीवाणुओं को भी नष्ट करता है। श्लेष्मा आमाशय के आस्तर की अम्ल से सुरक्षा करती है और क्षति को रोकती है। आमाशय में भोजन आंशिक रूप से पचता है और अर्धतरल पदार्थ में परिवर्तित हो जाता है। अब यह पाचन के अगले चरण के लिए तैयार है।
रोचक तथ्य
मानव शरीर के अंदर होने वाले पाचन प्रक्रम के विषय में वैज्ञानिकों को कैसे पता चला ?
हमारे शरीर में आमाशय की कार्य-प्रणाली की खोज संयोगवश हुई। सन् 1822 में ऐलेक्सिस सेंट मार्टिन नामक एक व्यक्ति को दुर्घटनावश पेट में गोली लगी। उसका उपचार चिकित्सक विलियम ब्यूमोंट द्वारा किया गया। सेंट मार्टिन का घाव कभी पूरी तरह से ठीक नहीं हुआ और उसमें स्थायी रूप से एक छोटा सा छिद्र रह गया। इस छिद्र से डॉ. ब्यूमोंट ने आमाशय में हो रही पाचन क्रिया को प्रत्यक्ष देखा। उन्होंने सेंट मार्टिन के आमाशय में विविध खाद्य पदार्थों के विघटन पर प्रयोग किए। इसके साथ ही उन्होंने पाचन पर संवेगों के प्रभाव का भी अध्ययन किया।
क्षुद्रांत्र (छोटी आँत)
आंशिक रूप से पचा हुआ भोजन आमाशय से होकर अपनी यात्रा के पश्चात क्षुद्रांत्र में प्रवेश करता है। चित्र 9.4 को देखिए। यह फैली हुई आहार नाल का चित्र है। इसकी लंबाई का अनुमान लगाइए। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि यद्यपि इसे क्षुद्रांत्र (छोटी आँत) कहते हैं परंतु यह लगभग 6 मीटर लंबी होती है जो आपकी कक्षा की छत की ऊँचाई से लगभग दोगुनी होती है। आपको यह जान कर भी आश्चर्य होगा कि क्षुद्रांत्र आहार नाल का सबसे लंबा भाग है।
क्षुद्रांत्र तीन स्रोतों से पाचक स्राव प्राप्त करती है जिनमें से एक स्वयं क्षुद्रांत्र का आंतरिक आस्तर होता है और अन्य दो आहार नाल से संबद्ध शरीर की दो संरचनाएँ - यकृत और अग्न्याशय होती हैं (चित्र 9.4)। यकृत से पित्तरस का स्रवण होता है जो थोड़ा क्षारीय होता है। अध्याय 'पदार्थों का अन्वेषण- अम्लीय, क्षारीय एवं उदासीन' में वर्णित उदासीनीकरण अभिक्रिया का स्मरण कीजिए। पित्तरस आमाशय से आने वाले भोजन में उपस्थित अम्ल को उदासीन करता है और वसा को छोटी गोलिकाओं में विघटित कर देता है जिससे उनका पाचन सरल हो जाता है।
अग्न्याशय से अग्न्याशयी रस का स्राव होता है जो क्षारीय प्रकृति का होता है और भोजन में उपस्थित अम्ल को उदासीन करने में सहायता करता है। इसके अतिरिक्त अग्न्याशयी रस कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और वसा को भी विघटित करता है। क्षुद्रांत्र की भित्ति से स्रावित पाचक रस वसा और आंशिक रूप से पचे हुए कार्बोहाइड्रेट तथा प्रोटीन को और अधिक सरल रूपों में विघटित करता है।
पचे हुए पोषक क्षुद्रांत्र की भित्तियों में पाए जाने वाली रक्त-वाहिनियों में उपस्थित रक्त में प्रविष्ट होते हैं। इस प्रक्रम को पोषकों का अवशोषण कहते हैं। ये पोषक क्षुद्रांत्र से कैसे
अवशोषित होते हैं? क्षुद्रांत्र का आंतरिक आस्तर पतला होता है और इस पर अँगुली जैसे हजारों प्रवर्ध (प्रोजेक्शन) होते हैं (चित्र 9.5) जो कि पोषकों के प्रभावी अवशोषण हेतु सतही क्षेत्रफल की वृद्धि कर देते हैं। ये प्रवर्ध पचे हुए पोषकों को रक्त में भेजते हैं जो उन्हें शरीर के विभिन्न भागों में ले जाते हैं। इसके साथ ही ये पोषक शरीर को सुचारू रूप से कार्य करने हेतु ऊर्जा प्रदान करते हैं और वृद्धि एवं मरम्मत के कार्यों में सहायक होते हैं।
विज्ञान एवं समाज
सीलिएक रोग एक ऐसी अवस्था है जिसमें शरीर गेहूँ, जौ और राई में पाए जाने वाले ग्लूटेन नामक प्रोटीन के प्रति प्रतिक्रिया करता है। यह प्रतिक्रिया क्षुद्रांत्र के आतंरिक आस्तर को क्षति पहुँचाती है जहाँ पोषक अवशोषित होते हैं। फलस्वरूप क्षुद्रांत्र सुचारू रूप से कार्य नहीं कर पाती है। सिलिएक रोग के प्रबंधन का एकमात्र उपाय ग्लूटेन युक्त भोजन खाने से बचना है। इसके लिए भोजन में कदन्नों, जैसे- ज्वार, बाजरा, रागी का उपयोग किया जाना अच्छा विकल्प है क्योंकि ये प्राकृतिक रूप से ग्लूटेन रहित होते हैं।
बृहदांत्र (बड़ी आँत)
अधिकांश पोषकों के क्षुद्रांत्र में अवशोषित होने के तथा पच जाने के पश्चात शेष बिना पचे हुए भोजन का क्या होता है? यह बृहदांत्र में चला जाता है। बृहदांत्र की लंबाई लगभग 1.5 मीटर होती है। इसकी लंबाई क्षुद्रांत्र से कम होती है इसके पश्चात भी इसे बृहदांत्र क्यों कहते हैं? इसका कारण यह है कि यह क्षुद्रांत्र से अधिक चौड़ी होती है। बृहदांत्र बिना पचे भोजन में से जल को और कुछ लवणों को अवशोषित करती है जिसके कारण अपशिष्ट अर्ध ठोस हो जाता है। इस अर्ध ठोस अपशिष्ट को मल कहते हैं। यह मल शरीर द्वारा मल-त्याग होने तक बृहदांत्र के निचले भाग में एकत्रित होता है जिसे मलाशय कहते हैं। फलों, सब्जियों और साबुत अनाज (चोकर युक्त अनाज) जैसे रेशे (फाइबर) समृद्ध भोजन खाने से बृहदांत्र सुचारू रूप से कार्य करती है जिससे सरलता से मल-त्याग होता है। अंततः इसे गुदा के द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है और इस प्रक्रम को बहिःक्षेपण के रूप में जाना जाता है। इस प्रकार आपका शरीर अनावश्यक अपशिष्ट को निकाल देता है और आप स्वस्थ रहते हैं।
क्या यह जानना रोचक नहीं है कि भोजन के प्रत्येक तत्त्व का उपयोग और अनावश्यक अपशिष्ट से मुक्ति सुनिश्चित करते हुए पाचन तंत्र कैसे कार्य करता है?
रोचक तथ्य
बृहदांत्र में विभिन्न प्रकार के सूक्ष्मजीव जैसे कि जीवाणु होते हैं जो पाचन में सहायता प्रदान करते हैं। यह जीवाणु हमारे पाचन-तंत्र को स्वस्थ रखते हैं। वे बिना पचे भोजन विशेषतः रेशों को विघटित करते हैं और आवश्यक पोषकों का उत्पादन करते हैं। रेशे से समृद्ध भोजन और विशेषतः 'किण्वित भोजन' (जैसे - दही, छाछ, श्रीखंड, कांजी, अचार, गुंद्रुक और पोइता भात) स्वस्थ पाचन तंत्र और समग्र स्वास्थ्य के लिए उत्तम होते हैं।
विज्ञान एवं समाज
शताब्दियों से यह सर्वविदित है कि उत्तम स्वास्थ्य को बनाए रखने में पाचन का बहुत महत्त्व है। प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथ चरक संहिता में सरलता से पचने वाले भोजन की भूमिका पर और पाचन को बढ़ाने के लिए अदरक, काली मिर्च एवं जीरे जैसे मसालों के उचित उपयोग पर बल दिया गया है। पोषण के क्षेत्र में विज्ञान में हुए उन्नयन भी पाचन स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए मुख्य कारकों के रूप में उपयुक्त समय पर भोजन करने, उचित आहार ग्रहण करने और भूख से अधिक भोजन न करने को महत्व देते हैं।
9.1.2 क्या सभी जंतुओं में भोजन का पाचन मनुष्यों की भाँति ही होता है?
मैंने गायों को अपना भोजन चबाते हुए देखा है जबकि उस समय न तो वे कुछ खा रही थी और न ही चर रही थी। ऐसा क्यों होता है?
घास खाने वाले जंतु जैसे कि गाय (चित्र 9.6) और भैंस आंशिक रूप से घास चबाते हैं और उसे निगल लेते हैं जहाँ से वह आमाशय में जाती है। आमाशय में भोजन का आंशिक पाचन होता है। आंशिक रूप से पचा हुआ भोजन धीरे-धीरे चबाए जाने के लिए वापस मुँह में लाया जाता है। इस प्रक्रिया को रोमंथन कहा जाता है और इन जंतुओं को रोमंथी कहते हैं। गाय दिन के लगभग 8 घंटे अपना भोजन चबाने में लगाती है और पूर्णतः चबाया गया यह भोजन और अधिक पाचन हेतु पुनः आहार नाल में चला जाता है।
पक्षियों के दाँत नहीं होते हैं परंतु उनके आमाशय में एक माँसपेशीय प्रकोष्ठ होता है जिसे पेषणी (गिजार्ड) कहते हैं (चित्र 9.7)। पक्षियों द्वारा पेषणी की भित्तियों के संकुचन और शिथिलन के माध्यम से भोजन को विघटित किया जाता है जो प्रायः निगले गए छोटे कंकड़ और बजरी की सहायता से होता है।
यह दर्शाता है कि जंतुओं ने भोजन के पाचन के विभिन्न प्रकारों के अनुकूलन के लिए अपने आहार नाल की संरचना और प्रकार्य में कुछ विभिन्नताएँ विकसित की हैं।
हमने सीखा है कि पचाए गए भोजन के पोषक शरीर के विभिन्न भागों में ले जाए जाते हैं। कुछ पोषक शरीर की वृद्धि और मरम्मत करने में सहायता करते हैं जबकि शर्करा जैसे अन्य तत्त्व ऊर्जा प्रदान करने हेतु शरीर के अंदर विघटित होते हैं। वह प्रक्रिया जिसके द्वारा पोषक प्रयोज्य ऊर्जा में परिवर्तित होते हैं श्वसन कहलाती है। आइए, अब पता लगाएँ कि जंतुओं में यह प्रक्रिया किस प्रकार होती है।
9.2 जंतुओं में श्वसन
हमने कक्षा 6 के अध्याय 'सजीव- विशेषताओं का अन्वेषण' में सीखा कि सभी सजीव श्वसन करते हैं। क्या सभी जंतुओं में श्वसन की प्रक्रिया एक जैसी ही होती है? आइए, पहले हम मनुष्यों में श्वसन प्रक्रिया को समझते हैं।
9.2.1 मनुष्यों में श्वसन
आप जानते हैं कि हम निरंतर श्वास लेते हुए वायु को शरीर के अंदर लेते हैं और बाहर निकालते हैं। वायु को शरीर के अंदर लेना अंतः श्वसन तथा वायु को शरीर के बाहर निकालना उच्छवसन कहलाता है। इस प्रक्रिया द्वारा हम ऑक्सीजन प्राप्त करते हैं और कार्बन डाइऑक्साइड निर्मुक्त करते हैं। शरीर में इस ऑक्सीजन का उपयोग कैसे किया जाता है? क्या श्वास लेना और श्वसन भिन्न हैं? आइए पता लगाएँ।
हम श्वास कैसे लेते हैं?
वायु को शरीर के अंदर लेने और बाहर निकालने की प्रक्रिया श्वास लेना कहलाती है। भोजन के बिना एक सप्ताह तक और पानी के बिना एक अथवा दो दिन तक जीवित रहना कठिन है परंतु श्वास लिए बिना हम सामान्यतः कुछ मिनट से अधिक जीवित नहीं रह सकते हैं। ऐसा क्यों है? हम सब जीवित हैं क्योंकि हम श्वास लेते हैं। केवल मनुष्य ही नहीं अपितु पादप तथा अन्य जंतु भी श्वास लेते हैं। आइए जानते हैं कि हम श्वास कैसे लेते हैं?
जिस प्रकार आपके पाचन तंत्र में भोजन एक विशिष्ट पथ का अनुसरण करता है उसी प्रकार शरीर में श्वास लेने और श्वसन के लिए भी एक विशिष्ट तंत्र होता है। यह तंत्र श्वसन तंत्र कहलाता है। श्वसन तंत्र के विभिन्न भाग होते हैं जैसा कि चित्र 9.8 में दर्शाया गया है। इस तंत्र में गैसों का विनिमय (आदान-प्रदान) एक विशिष्ट पथ के द्वारा होता है। जिस पथ से वायु शरीर के अंदर जाती और बाहर निकलती है, उसमें श्वसन तंत्र के विभिन्न भाग सम्मिलित होते हैं। ये भाग श्वास लेने और श्वसन की प्रक्रिया में सहायक होते हैं।
श्वसन तंत्र का आरंभ नासारंध्रों से होता है जिसे नासाद्वार कहते हैं जिनसे हम वायु को अंतः श्वसित और उच्छवसित करते हैं (चित्र 9.8)। यह वायु एक छोटे युगल पथ से होकर निकलती है जिसे नासा पथ कहते हैं। क्या आपने अपने नासाद्वार में सूक्ष्म रोमों पर ध्यान दिया है? ये रोम श्लेष्मा के साथ मिलकर हमारी श्वास के साथ आने वाली वायु में से धूल और गंदगी को पाशित कर (फँसा) लेते हैं। इसलिए हमें नाक से ही श्वास लेनी चाहिए, मुख से नहीं। नासा पथ से वायु श्वासनली से होकर हमारे फेफड़ों (फुफ्फुसों) में जाती है। श्वासनली दो शाखाओं में विभक्त हो जाती है जो दोनों फेफड़ों में जाती है। फेफड़ों में ये शाखाएँ पुनः अपेक्षाकृत छोटी और महीन शाखाओं में विभक्त हो जाती हैं जिनका अंत छोटे गुब्बारे जैसे कोश में होता है जिनको कूपिकाएँ कहते हैं (चित्र 9.8)। हमारे फेफड़े पसली पिंजर के द्वारा सुरक्षित रहते हैं।
आइए, हम श्वास लेने की क्रियाविधि को एक सरल प्रतिरूप (मॉडल) बनाकर समझते हैं।
क्रियाकलाप 9.2 - आइए, प्रतिरूप बनाएँ* प्लास्टिक की एक चौड़ी पारदर्शी ढक्कनदार बोतल लीजिए तथा इसके पेंदे को हटा दीजिए।
* बोतल के ढक्कन में एक छेद कीजिए।
* एक वाई (Y) के आकार की खोखली नली लीजिए जैसा चित्र 9.9 में दर्शाया गया है।
* नली के शाखित सिरों पर बिना फुलाए हुए दो गुब्बारे लगाइए और उन पर रबर बैंड लगाकर उन्हें वायुरोधी बना दीजिए।
* नली के सीधे सिरे को बोतल के पेंदे से डालते हुए ढक्कन से होकर निकालिए। ढक्कन को चिकनी मिट्टी से बंद करके उसे वायुरोधी बना दीजिए।
*बोतल के खुले पेंदे पर रबर की एक पतली शीट तानकर उसे एक बड़े रबर बैंड से कसकर बांध दीजिए।रबर शीट को पकड़कर पेंदे के आधार के केंद्र से नीचे की ओर खींचिए और गुब्बारों को देखिए [चित्र 9.9 (क)]। आपने क्या देखा? अब रबर शीट को ऊपर की ओर छोड़िए और गुब्बारों को देखिए [चित्र 9.9 (ख)]। आपको गुब्बारों में क्या परिवर्तन दिखाई दिए? जब आप रबर शीट को नीचे की ओर खींचते हैं तो गुब्बारे फूल जाते हैं। इसके विपरीत जब आप रबर शीट को ऊपर की ओर छोड़ते हैं तो गब्बारे पिचक जाते हैं।
जब आप श्वास अंदर लेते हैं (अंतःश्वसन) तो आपकी पसलियाँ ऊपर तथा बाहर की ओर गति करती हैं और आपका वक्ष विस्तरित हो जाता है। अंतः श्वसन के दौरान डायाफ्राम (फेफड़ों के नीचे एक गुंबदाकार पेशी) नीचे की ओर गति करता है [चित्र 9.1] | इससे वक्ष-गुहा का विस्तार होता है और वायु फेफड़ों में प्रवेश कर जाती है। जब आप श्वास बाहर की ओर छोड़ते हैं (उच्छवसन) तो पसलियाँ नीचे अर्थात अंदर की ओर गति करती हैं और डायाफ्राम वापस ऊपर आ जाता है [चित्र 9.1(- 9) ] जिससे वक्ष-गुहा का विस्तार कम हो जाता है और वायु फेफड़ों से बाहर धकेल दी जाती है।
चित्र 9.9 में दर्शाए गए प्रतिरूप में गुब्बारे किसे प्रदर्शित करते हैं? रबर शीट किसे प्रदर्शित करती है? इस प्रतिरूप में गुब्बारे फेफड़ों को और रबर शीट डायाफ्राम को प्रदर्शित करती है।
स्वस्थ जीवन के लिए श्वसन अभ्यास
शताब्दियों से भारत और विश्व भर की विभिन्न संस्कृतियों में श्वसन अभ्यास किए जाते रहे हैं। प्राणायाम श्वसन तंत्र के स्वास्थ्य, चित्त-शांति और एकाग्रता को बढ़ाने के लिए भली भाँति जाना जाता है। लद्दाख में लोग तुम्मो श्वास का अभ्यास करते हैं। यह एक ऐसी तकनीक है जो ठंडे मौसम में शरीर में ऊष्मा उत्पन्न करने और फेफड़ों के प्रकार्य को सुधारने में सहायक होती है। इसी प्रकार गहरी श्वास लेने की तकनीकों का उपयोग अच्छे स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है। कुछ परंपराओं में गहरी श्वास लेने को मंत्रोच्चार के साथ जोड़ा गया है और इनमें विश्रांति और मानसिक स्पष्टता के संवर्धन हेतु लयबद्ध श्वास नियंत्रण का उपयोग किया जाता है।
हम श्वास के द्वारा क्या छोड़ते हैं?
क्रियाकलाप 9.3 - आइए, खोज करें -
शिक्षक द्वारा प्रदर्शन हेतु
* चित्र 9.11 में दर्शाए अनुसार दो परखनलियों 'क' और 'ख' में ताजा बनाए गए चूने के पानी की समान मात्रा लीजिए।* परखनली 'क' में पिचकारी अथवा सिरिंज की सहायता से वायु प्रवाहित कीजिए [चित्र 9.11 (क)]। यह वही वायु है जिसे आप अंतःश्वसन में लेते हैं।
* परखनली 'ख' में स्ट्रॉ का उपयोग करके अपने मुँह से चूने के पानी में बार-बार वायु पूँकिए [चित्र 9.11 (ख)]।
*क्या आपको चूने के पानी के रंग में कोई परिवर्तन दिखाई देता है?
परखनली 'ख' में चूने का पानी दूधिया हो गया परंतु परखनली 'क' में चूने का पानी दूधिया नहीं हुआ? यह क्या इंगित करता है? चूने का पानी कार्बन डाइऑक्साइड के साथ प्रतिक्रिया करने पर दूधिया हो जाता है जो यह इंगित करता है कि अंतःश्वसित वायु की तुलना में उच्छवसित वायु में अधिक कार्बन डाइऑक्साइड होती है।
गैसों का विनिमय कैसे होता है?
श्वसन की प्रक्रिया के दौरान बाहर से वायु फेफड़ों में प्रवेश करती है और कूपिकाओं को भर देती है। कूपिकाओं की भित्तियाँ पतली होती हैं जो रक्त से पूरित महीन नलिकाओं से घिरी होती हैं (चित्र 9.12)1
रक्त शरीर से कार्बन डाइऑक्साइड को कूपिकाओं तक ले जाता है और वहाँ से इसे वायु में निर्मुक्त किया जाता है। इसी समय कूपिकाओं से ऑक्सीजन रक्त में जाती है और शरीर के सभी भागों में पहुँचाई जाती है।
क्या आपने कभी सोचा है कि आप जो भोजन ग्रहण करते हैं उससे आपको किस प्रकार ऊर्जा मिलती है? प्राप्त ऊर्जा केवल भोजन पर ही नहीं अपितु श्वास के साथ ग्रहण की जाने वाली ऑक्सीजन पर भी निर्भर करती है। जब हम खाना खाते हैं तो हमारा शरीर उसे शर्करा (ग्लूकोस) जैसे सरल पदार्थों में विघटित कर देता है। इसके साथ ही ऊर्जा निर्मुक्त करने के लिए ऑक्सीजन ग्लूकोस को विघटित करने में सहायक होता है। इस प्रक्रिया को श्वसन कहते हैं।
श्वसन की प्रक्रिया का शब्द समीकरण इस प्रकार है -ग्लूकोस + ऑक्सीजन कार्बन डाइऑक्साइड + जल + ऊर्जा
श्वास लेने के दौरान हम अपने वातावरण से वायु को अंतःश्वसित करते हैं और उच्छवसित वायु में अंतः श्वसित वायु की अपेक्षा अधिक कार्बन डाइऑक्साइड होती है। ध्यान दीजिए कि अंतःश्वसित वायु में उपस्थित पूरी ऑक्सीजन का उपयोग नहीं होता है (चित्र 9.13)। कुछ जंतु श्वसन के दौरान ऑक्सीजन के अधिक भाग का उपयोग कर सकते हैं। गैसों का यह विनिमय सुनिश्चित करता है कि हमारे शरीर के प्रत्येक भाग को ऊर्जा उत्पन्न करने और अपशिष्ट पदार्थों को बाहर निकालने के लिए ऑक्सीजन मिले। सरल शब्दों में कहें तो श्वास लेने के दौरान ऑक्सीजन शरीर के अंदर आती है और कार्बन डाइऑक्साइड बाहर निकलती है जबकि श्वसन में ऑक्सीजन का उपयोग भोजन के विघटन हेतु और ऊर्जा को निर्मुक्त करने के लिए किया जाता है। यह ऊर्जा हमें चलने, दौड़ने, खेलने और यहाँ तक कि सोचने में भी सहायता करती है।
श्वास लेना एक शारीरिक प्रक्रिया है जबकि श्वसन एक रासायनिक प्रक्रिया है जो कि शरीर के अंदर होती है। दोनों ही प्रक्रियाएँ जीवित रहने के लिए अनिवार्य होती हैं।
हमारे शरीर में पोषकों, ऑक्सीजन और अन्य पदार्थों के परिवहन के लिए एक विशिष्ट तंत्र होता है। इस तंत्र को परिसंचरण तंत्र कहते हैं। इसमें हृदय, रुधिर और रुधिर-वाहिकाएँ सम्मिलित होती हैं। हृदय रुधिर-वाहिकाओं के माध्यम से रुधिर को पंप करता है जिससे शरीर के सभी भागों में पोषकों, ऑक्सीजन और अन्य पदार्थों का परिवहन सुनिश्चित होता है जबकि अपशिष्ट पदार्थों को शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है।
विज्ञान एवं समाज
धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए अत्यधिक हानिकारक होता है। यह फेफड़ों को हानि पहुँचाता है और फेफड़ों के कैंसर सहित अनेक श्वसन रोगों के जोखिम को भी बढ़ा देता है। इससे लगातार खाँसी आती है और बार-बार संक्रमण होता है।
धुआँ धूम्रपान करने वाले को हानि पहुँचाने के साथ-साथ वायु में हानिकारक रसायनों को निर्मुक्त करता है। यह धुआँ आस-पास के व्यक्तियों के स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर सकता है। धूम्रपान नहीं करने वाले व्यक्ति जब इस प्रदूषित वायु में श्वास लेते हैं तो वे भी अनैच्छिक रूप से निष्क्रिय धूम्रपान करने के लिए बाध्य होते हैं। यह निष्क्रिय धूम्रपान बच्चों, वृद्धजनों और गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष रूप से हानिकारक है। इन जोखिमों के कारण। धूम्रपान से बचना न केवल हमारे व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है अपितु यह हमारे आस-पास के लोगों के स्वास्थ्य को बनाए रखने में भी सहायता करता है।
9.2.2 क्या अन्य जंतु भी मानवों की भाँति श्वास लेते हैं?
आपने सीखा है कि विभिन्न जंतु अलग-अलग पर्यावासों में रहते हैं। आपने चिड़ियों को उड़ते और मछलियों को तैरते देखा होगा। वे कैसे श्वास लेते हैं? जंतु जैसे - पक्षी, हाथी, शेर, गाय, बकरी, छिपकली और साँप अपने फेफड़ों से श्वास लेते हैं। यद्यपि इन सभी जंतुओं में फेफड़े होते हैं परंतु प्रत्येक जंतु में फेफड़ों की संरचना भिन्न होती है। अधिकांश जलीय जंतुओं जैसे मछली में क्लोम (गलफड़े) नामक विशेषीकृत संरचनाएँ होती हैं (चित्र 9.14)। इनमें रक्त-वाहिकाओं की प्रचुर आपूर्ति होती है। रक्त और पानी में घुली गैसों के बीच ऑक्सीजन और कार्बन-डाइऑक्साइड का विनिमय क्लोम के द्वारा होता है।
उभयचर जैसे- मेंढक थल और जल दोनों में जीवनयापन करते हैं। वे अपने जीवन की विभिन्न अवस्थाओं में श्वास लेने के लिए शरीर के भिन्न-भिन्न भागों का उपयोग करते हैं। उदाहराणार्थ टैडपोल जल में क्लोमों से श्वास लेते हैं जबकि वयस्क मेंढक थल पर श्वास लेने के लिए फेफड़ों का उपयोग करते हैं और जब वे जल में होते हैं तब वे त्वचा के द्वारा गैसों का विनिमय करते हैं।
यह अनुकूलन उन्हें जल और थल दोनों में जीवित रहने में सहायता करता है और यह दर्शाता है कि जंतु समय के साथ विभिन्न परिवेशों के लिए कैसे अनुकूलित हुए हैं। केंचुए ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड के आदान-प्रदान के लिए अपनी नम त्वचा का उपयोग करते हैं।
अतः विभिन्न जंतुओं में अपने विशिष्ट पर्यावासों के अनुकूल श्वास लेने के तरीके भिन्न-भिन्न होते हैं। जीवन के निर्वहन हेतु विभिन्न कार्यों को संपन्न करने के लिए पाचन तंत्र, श्वसन तंत्र और परिसंचरण तंत्र के अतिरिक्त शरीर में अन्य तंत्र भी हैं जो एक-दूसरे के साथ समन्वयन में कार्य करते हैं। आप इनके विषय में उच्चतर कक्षाओं में अध्ययन करेंगे।
संक्षेप में
* पोषण, परिसंचरण, श्वसन, उत्सर्जन और जनन जैसे जैव प्रक्रम सजीवों की उत्तरजीविता के लिए अनिवार्य शारीरिक प्रकार्य हैं।*मानव पाचन तंत्र में आहार नाल होती है जिसमें मुख, ग्रासनली, आमाशय, क्षुद्रांत्र, बृहदांत्र, गुदा और संबद्ध भाग यथा यकृत और अग्न्याशय होते हैं।
*पचे हुए भोजन को प्राथमिक रूप से क्षुद्रांत्र की भित्तियों के द्वारा अवशोषित कर लिया जाता है।
*अवशोषित पोषक रक्त के माध्यम से शरीर के विभिन्न भागों में वितरित किए जाते हैं जहाँ उनका उपयोग भिन्न-भिन्न कार्यों के लिए किया जाता है।
*बृहदांत्र बिना पचे हुए भोजन से बचे हुए अधिकांश जल और कुछ लवणों को अवशोषित कर लेती है।
*घास खाने वाले जंतुओं जैसे गाय और बकरी को रोमंथी जंतु कहते हैं। ये जंतु भोजन को आंशिक रूप से चबा कर निगल लेते हैं। बाद में आंशिक रूप से पचा हुआ भोजन जंतुओं द्वारा अपने मुँह में वापस लाया जाता है और फिर वे उसे अच्छी तरह चबाते हैं।
*श्वास लेने में वायु का फेफड़ों में जाना (अंतःश्वसन) और फेफड़ों से बाहर निकलना (उच्छवसन) सम्मिलित है।
*ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड का विनिमय फेफड़ों की कूपिकाओं में होता है।
*श्वसन में हमारे द्वारा अंतःश्वसित वायु से ऑक्सीजन का उपयोग ग्लूकोस के कार्बन डाइऑक्साइड तथा जल में विघटन के लिए किया जाता है। जिस प्रक्रिया द्वारा पोषक प्रयोज्य ऊर्जा में परिवर्तित हो जाते हैं वह श्वसन कहलाती है।
*परिसंचरण तंत्र पोषकों और ऑक्सीजन को शरीर के सभी भागों में ले जाता है। इसमें हृदय सम्मिलित है जो रुधिर को पंप करता है और जो रुधिर-वाहिकाओं द्वारा शरीर के सभी भागों में ऑक्सीजन तथा पोषकों को पहुँचाता एवं अपशिष्ट पदार्थों को निकालता है।
*श्वास लेना एक शारीरिक प्रक्रिया है तथा श्वसन एक रासायनिक प्रक्रिया है।
*विभिन्न जंतुओं में उनके पर्यावासों के अनुरूप अनुकूलित श्वास लेने की भिन्न-भिन्न कार्य-प्रणालियाँ होती हैं।
आइए, और अधिक सीखें
1. रिक्त बक्सों को उपयुक्त भागों से भर कर आहार नाल के द्वारा भोजन की यात्रा को पूरा कीजिए।
भोजन →मुख→...............→आमाशय → ........→ ......... →गुदा
2. साहिल ने परखनली 'क' में रोटी के कुछ टुकड़े डाले। नेहा ने परखनली 'ख' में रोटी के टुकड़ों को चबा कर डाला और संतुष्टि ने परखनली 'ग' में उबले हुए आलू मसल कर डाले। उन सभी ने क्रमशः परखनली 'क', 'ख' और 'ग' में आयोडीन विलयन की कुछ बूंदें डालीं। उनके क्या अवलोकन होंगे? कारण बताइए।
3. श्वास लेने में डायाफ्राम की क्या भूमिका है?- (i) वायु को निस्यंदित करना
- (ii) ध्वनि उत्पन्न करना
- (iii) अंतःश्वसन और उच्छवसन में सहायता करना
- (iv) ऑक्सीजन अवशोषित करना
4. निम्नलिखित का मिलान कीजिए
| भाग का नाम | प्रकार्य |
|---|---|
| (i) नासाद्वार | (क) बाहर से हवा प्रवेश करती है। |
| (ii) नासा पथ | (ख) गैसों का विनिमय होता है। |
| (iii) श्वासनली | (ग) फेफड़ों को सुरक्षा प्रदान करते हैं। |
| (iv) कूपिकाएँ | (घ) सूक्ष्म रोम और श्लेष्मा हमारे द्वारा ग्रहण की गई वायु में से धूल और गंदगी को रोकने में सहायक हैं। |
| (v) पसली पिंजर | (ङ) इस भाग से होकर वायु हमारे फेफड़ों तक पहुँचती है। |
5.अनिल ने अपनी सहपाठी सान्वी से कहा कि श्वसन और श्वास लेना एक ही प्रक्रिया है। अनिल को यह समझाने के लिए कि यह कथन सही नहीं है, सान्वी उससे क्या प्रश्न पूछ सकती है?
6.निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सत्य है और क्यों?
अनु - हम वायु को अंतःश्वसित करते हैं।
शानू - हम ऑक्सीजन को अंतःश्वसित करते हैं।
तनु - हम ऑक्सीजन से समृद्ध वायु को अंतःश्वसित करते हैं।
7. जब हम श्वास के साथ धूल भरी वायु को अंदर लेते हैं तो प्रायः हम छींकते हैं। इसके संभावित कारण क्या हो सकते हैं?
8. कक्षा 7 की छात्राएँ परिधि और अनुषा ने अपने प्रातःकालीन व्यायाम के लिए दौड़ना आरंभ किया। अपनी दौड़ पूरी करने के बाद उन्होंने प्रति मिनट ली जाने वाली श्वासों की गिनती की। अनुषा परिधि की अपेक्षा अधिक तेजी से श्वास ले रही थी। परिधि की अपेक्षा अनुषा द्वारा अधिक तेजी से श्वास लेने के कम से कम दो संभावित कारण बताइए।
9. यदु ने अपने एक विचार के परीक्षण के लिए एक प्रयोग किया। उसने दो परखनलियाँ 'क' और 'ख' लीं। परखनलियों को पानी से आधा भरकर और उनमें एक चुटकी चावल का आटा मिला कर उन्हें अच्छी तरह हिलाया। परखनली 'ख' में उसने कुछ बूँदें लार की मिलाई। दोनों परखनलियों को उसने 35-40 मिनट के लिए यथावत रहने दिया। उसके बाद उसने दोनों परखनलियों में आयोडीन विलयन डाला। प्रयोग के परिणाम चित्र 9.15 में दर्शाए गए हैं। आपके विचार से वह क्या परीक्षण करना चाहता है?
10. रक्षिता ने दो स्वच्छ परखनलियाँ 'क' और 'ख' लेकर एक परीक्षण अभिकल्पित किया। उसने दोनों परखनलियों को चित्र में दर्शाए अनुसार चूने के पानी से भर दिया। परखनली 'क' में अंतःश्वसित वायु को नली द्वारा चूषित करके प्रवाहित किया गया। परखनली 'ख' में नली के द्वारा उच्छवसित वायु को फूंक कर प्रवाहित किया गया। (चित्र 9.16) आपके विचार से वह क्या जाँचना चाहती है? वह कैसे अपने निष्कर्षों की पुष्टि कर सकती है?
अन्वेषणात्मक परियोजनाएँ
*मुख की स्वच्छता को बनाए रखने की उत्तम विधियाँ क्या हैं? इस संबंध में पुस्तकों या समाचार पत्रों से अथवा अपने से बड़े व्यक्तियों से वार्तालाप करके जानकारी एकत्रित कीजिए। इस पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।*पाचन तंत्र को स्वस्थ बनाए रखने के विभिन्न उपाय खोजिए। पाचन तंत्र को उत्तम बनाए रखने में सहायता करने वाली कुछ खाने की वस्तुओं का सुझाव दीजिए। एक रिपोर्ट बनाइए और कक्षा में इसे प्रस्तुत कीजिए।
*रंगीन चिकनी मिट्टी का प्रयोग करके पाचन तंत्र का त्रिआयामी (3D) प्रतिरूप बनाइए और काले कागज की पर्चियों का प्रयोग करके पाचन तंत्र के सभी भागों को नामांकित कीजिए।*वायु गुणवत्ता और ए.क्यू.आई. क्या हैं? विभिन्न क्षेत्रों में कार्य करने वाले व्यक्तियों के, किसानों के, कारखानों में काम करने वाले श्रमिकों के तथा ठेले वालों के श्वसन तंत्र पर वायु गुणवत्ता के प्रभाव का पता लगाइए।
*समावृत्ति प्राणायाम (बॉक्स ब्रीदिंग) तकनीक के विषय में पढ़ने का प्रयास कीजिए (चित्र 9.17)1 इसके क्या लाभ हैं?* पक्षियों और स्तनधारियों दोनों में श्वास लेने हेतु फेफड़े होते हैं किंतु पक्षी ऊँचाई पर उड़ सकते हैं जहाँ ऑक्सीजन का स्तर कम होता है। उनको इन स्थितियों में जीवित रखने के लिए उनका श्वसन तंत्र किस प्रकार अनुकूलित होता है?