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पृथ्वी, चंद्रमा एवं सूर्य
तमिल नाडु के कन्याकुमारी में 12 वर्षीय रश्मिका एक सुबह उत्सुकतापूर्वक साइकिल चला कर विद्यालय जा रही थी। वह बहुत उत्साहित थी क्योंकि उसके विज्ञान शिक्षक ने सुनिश्चित किया था कि उस दिन के एक कालांश में सभी विद्यार्थी अपने कुछ रोचक अनुभवों को साझा करेंगे तथा उनकी व्याख्या करने का प्रयास भी करेंगे।
रश्मिका का ध्यान प्रायः इस बात पर जाता था कि अपराह्न में विद्यालय से लौटते समय नारियल के वृक्षों की छाया प्रातः काल की इनकी छाया की अपेक्षा छोटी होती थी। इस विषय पर विचार करने के पश्चात वह इस निर्णय पर पहुँची कि दिन के समय आकाश में सूर्य की स्थिति में परिवर्तन होने से छाया के आमाप में परिवर्तन होता है। इसके साथ ही उसे कक्षा 6 (विज्ञान की पाठ्यपुस्तक जिज्ञासा के अध्याय 'पृथ्वी से परे') में पढ़ा हुआ तथ्य याद आया कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है और वह द्वंद्व में पड़ गई। अब वह संशय में थी कि आकाश में सूर्य गतिमान है अथवा पृथ्वी !
12.1 पृथ्वी का घूमना
आपने यह भी देखा होगा कि सूर्य पूर्व में उदित होता है और पश्चिम में अस्त होता है। क्या आपने कभी यह सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? आइए, हम इसको समझने का प्रयास करते हैं। क्या आपने किसी उद्यान में अथवा अपने विद्यालय में चक्रीय हिंडोले पर सवारी का आनंद लिया है? आइए, हिंडोले की सवारी के लिए चलते हैं।- एक चक्रीय हिंडोले पर बाहर की ओर मुख करके बैठिए जैसा कि चित्र 12.1 में दर्शाया गया है।
- चित्र 12.1 में दर्शाए अनुसार किसी व्यक्ति से हिंडोले को धीरे से वामावर्त दिशा में घुमाने के लिए कहिए। जब आप घूमते हुए हिंडोले में बैठे हुए हों तब अपने आस-पास देखिए। क्या आपको आस-पास की वस्तुएँ घूमती हुई प्रतीत होती हैं? ये वस्तुएँ किस दिशा में घूमती हुई प्रतीत होती हैं? जब आप वामावर्त दिशा में घूमते हैं तो आपको अपने आस-पास की वस्तुएँ विपरीत दिशा अर्थात दक्षिणावर्त दिशा में घूमती हुई प्रतीत होती हैं।
- वामावर्त दिशा में घूमते हिंडोले में बैठे हुए आप अपने सामने के किसी विशेष वृक्ष (अथवा किसी भवन) पर अपनी दृष्टि टिका दीजिए।
आप अपने सामने के इस वृक्ष को किस दिशा में घूमते हुए पाते हैं? क्या यह प्रत्येक क्षण आपकी दृष्टि में बना रहता है?
वृक्ष आपके परितः विपरीत अर्थात दक्षिणावर्त दिशा में, घूमता हुआ प्रतीत होता है। वामावर्त दिशा में घूमते हिंडोले से देखने पर आपको वृक्ष आपके बाएँ ओर से प्रकट होता हुआ प्रतीत होता है और दाएँ ओर से दृष्टि से ओझल होता हुआ प्रतीत होता है।आइए, चक्रीय हिंडोले में सवारी करते समय हमारे अवलोकनों का उपयोग करके विचार करें। जब हम पृथ्वी से देखते हैं तो सूर्य पूर्व दिशा में प्रकट होता हुआ प्रतीत होता है। यह आकाश में पूर्व से पश्चिम की ओर गति करता है और पश्चिम में ओझल हो जाता है। क्या यह इंगित करता है कि सूर्य आकाश में गतिमान है? अथवा यह भी तो हो सकता है कि पृथ्वी घूर्णन कर रही हो और सूर्य केवल घूमता हुआ प्रतीत हो रहा हो?
वस्तुतः सूर्य इसलिए घूमता हुआ प्रतीत होता है क्योंकि हम इसे पृथ्वी से देखते हैं जो स्वतः घूर्णन कर रही है।
पृथ्वी अपने स्थान पर किस दिशा में घूम रही है? आइए, इसे समझने हेतु कुछ घूर्णन करती हुई वस्तुओं का स्मरण करते हैं। क्या आपने लड्डू को अपनी धुरी पर घूर्णन करते हुए देखा है (चित्र 12.2 क)? अथवा घूमते हुए पंखे को देखा है (चित्र 12.2 ख)? अथवा किसी गेंद को घूर्णन कराने का प्रयास किया है (चित्र 12.2 ग)?

आइए, हम और खोजें और समझें कि पृथ्वी के घूर्णन के कारण पृथ्वी पर दिन और रात कैसे होते हैं?
- सूर्य को निरूपित करने हेतु एक टॉर्च लीजिए। क्रियाकलाप के आगे के चरणों को करने हेतु अपेक्षाकृत अँधेरे कमरे में जाइए।
- अब टॉर्च से लगभग 1.5 m दूरी पर रखे ग्लोब पर प्रकाश डालिए जैसा कि चित्र 12.4 (ख) में दर्शाया गया है। क्या आपने ध्यान दिया कि किस प्रकार ग्लोब का आधा भाग टॉर्च के प्रकाश से प्रकाशमान होता है जबकि दूसरे आधे भाग में अँधेरा रहता है? ग्लोब के जिस आधे भाग में प्रकाश पड़ता है वहाँ दिन का समय होता है और दूसरे आधे भाग में रात का समय होता है।
- भारत में सूर्योदय सर्वप्रथम पूर्वी भाग में होता है और इसके पश्चात अन्य भागों में होता है। ग्लोब पर भारत के पूर्वी भाग को देखते हुए ग्लोब को एक दिशा में घुमाइए और इसके पश्चात इसे विपरीत दिशा में घुमाइए। जब प्रकाश सर्वप्रथम भारत के पूर्वी भाग पर पड़ता है तब घूर्णन की दिशा क्या होती है? जब ग्लोब उत्तरी-दक्षिण अक्ष के सापेक्ष पश्चिम से पूर्व की ओर घूमता है तो प्रकाश सर्वप्रथम भारत के पूर्वी भाग पर पड़ता है।
- अब ग्लोब को पश्चिम से पूर्व की ओर घुमाते हुए पृथ्वी पर अपनी अवस्थिति का अवलोकन कीजिए। क्या यह दिन और रात के चक्र से गुजरती है?
सूर्योदय तब होता है जब आपकी अवस्थिति प्रकाशमान क्षेत्र में आती है और सूर्यास्त तब होता है जब आपकी अवस्थिति अंधेरे में आती है।
पृथ्वी के पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन के कारण दिन-रात का चक्र चलता है। जैसा कि चित्र 12.5 में दर्शाया गया है, पृथ्वी पर सूर्य के सामने वाले भाग में दिन होता है जबकि दूसरे भाग में अँधेरा होने के कारण रात होती है।
अब आप कल्पना कीजिए कि आप पृथ्वी की विषुवत रेखा पर खड़े हैं और पृथ्वी के एक घूर्णन के दौरान आकाश का अवलोकन कर रहे हैं जबकि पृथ्वी पश्चिम से पूर्व की ओर घूर्णन कर रही है। आप क्या अवलोकन करेंगे? क्या आपका अवलोकन चित्र 12.6 में दर्शाई गई बालिका के अवलोकन के समान होगा?
पृथ्वी के घूर्णन के कारण ऐसा प्रतीत होता है कि सूर्य पूर्व दिशा में उदित होता है और आकाश में पूर्व से पश्चिम की ओर चलता हुआ पश्चिम दिशा में अस्त होता है (चित्र 12.6)। सूर्य के अस्त होने पर रात्रि प्रारम्भ होती है और आकाश में तारे दिखने लगते हैं।
रोचक तथ्य
इस पाठ्यपुस्तक के एक पूर्ववर्ती अध्याय 'समय एवं गति का मापन' में आपने सीखा था कि कैसे गैलीलियो नामक एक वैज्ञानिक ने लोलक के एक महत्वपूर्ण गुण का पता लगाया और सत्रहवीं शताब्दी में दूसरे वैज्ञानिक हाइगेन्स ने उस गुण का उपयोग समय मापने हेतु लोलक घड़ियाँ बनाने के लिए किया। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य में एक अन्य वैज्ञानिक लीऑन फोको ने पहली बार पृथ्वी के घूर्णन के प्रदर्शन हेतु एक लंबे लोलक का उपयोग किया। इस लोलक को उनके सम्मान में फोको पेंडुलम के नाम से जाना जाता है। इसमें एक भारी गोलक एक लंबी डोरी के साथ किसी ऊँची छत से लटका होता है।22 m की लंबाई वाला एक फोको पेंडुलम दिल्ली में भारत की नई संसद के संविधान सदन में छत-रोशनदान से लटकाया गया है। यह भारत के विचार को ब्रह्मांड की विशालता के साथ एकीकृत करने का प्रतीक है।
क्योंकि पृथ्वी घूम रही है तो क्या सूर्य की भाँति सितारे भी आकाश में घूमते हुए प्रतीत नहीं होने चाहिए? हाँ, बिल्कुल ! पृथ्वी के घूर्णन का तारों पर प्रभाव देखने हेतु चलिए। इसके साथ ही हम रात्रि-आकाश में तारों को ध्यान से देखते हैं।
- मार्च और मई के मध्य की किसी संध्या के आरंभ में कक्षा 6 विज्ञान पाठ्यपुस्तक जिज्ञासा के अध्याय 'पृथ्वी से परे' में अपनाई गई विधि का उपयोग करके सप्तर्षि (बिग डिपर) को और यदि दिखाई दे तो ध्रुव तारे को भी पहचानिए।
- अपने रात्रि-आकाश के अवलोकन का स्थान और तिथि अंकित कीजिए। यह क्रियाकलाप एक ही रात्रि में किया जाना चाहिए।
- ध्रुव तारे के सापेक्ष आकाश में सप्तर्षि की स्थिति का आरेख बनाइए। (यदि आपको ध्रुव तारा नहीं दिखता है तो सप्तर्षि की दिशा में भूमि पर किसी वृक्ष अथवा भवन की स्थिति के सापेक्ष सप्तर्षि की स्थिति का

चित्र 12.7- पुणे में अवस्थित किसी विद्यार्थी द्वारा 1-2 अप्रैल के बीच की रात्रि को देखे गए सप्तर्षि का निरूपक आरेख (क्रियाकलाप 12.3 के लिए) आरेख बनाइए)। अपने आरेख के साथ अपने अवलोकन का समय अंकित कीजिए जैसा कि चित्र 12.7 में दर्शाया गया है। - दो घंटे पश्चात सप्तर्षि का पुनः अवलोकन कीजिए। क्या यह अपनी स्थिति से हट गया है? पुनः इसकी स्थिति का आरेख बनाइए और समय अंकित कीजिए।
उत्तरी गोलार्ध से देखने पर पृथ्वी का घूर्णन-अक्ष ध्रुव तारे के बहुत निकट के बिंदु की ओर इंगित करता है। इसलिए पृथ्वी से आकाश में ध्रुव तारा लगभग स्थिर प्रतीत होता है। सभी तारे इसके चारों ओर घूमते हुए प्रतीत होते हैं। सूर्य की भाँति चंद्रमा भी पूर्व दिशा की ओर उदित और पश्चिम दिशा की ओर अस्त होता हुआ प्रतीत होता है। इसका कारण यही है कि पृथ्वी अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व की ओर घूमती है।
रोचक तथ्य
खगोल-फोटोग्राफर कैमरे के शटर को लंबे समय तक खुला रखकर दीर्घ-उदभासन छायाचित्र (फोटोग्राफ) लेते हैं। ऐसे छायाचित्र में तारों की दृष्ट गति वृत्तों के चापों के रूप में अभिलेखित होती है, जिन्हें स्टार ट्रेल्स के नाम से जाना जाता है।
रोचक तथ्य
आर्यभट सहित प्राचीन भारतीय खगोलविदों ने रात्रि-आकाश में सूर्य, चंद्रमा, ग्रहों और तारों की दृष्ट-गति का अवलोकन किया था। आर्यभट प्राचीन भारत के एक प्रसिद्ध गणितज्ञ और खगोलविद् थे जिन्होंने सामान्य संवत् 5 वीं शताब्दी में एक महत्वपूर्ण ग्रंथ आर्यभटीय लिखा था। आर्यभटीय के 'गोलापद' खंड के 9वें श्लोक में पृथ्वी के घूर्णन के कारण तारों की दृष्टगति की व्याख्या की गई है।अनुलोमगतिर्नोस्थः पश्यत्यचलं विलोमगं यद्वत्।
अचलानि भानि तद्वत् समपश्चिमगानि लङ्कायाम् ॥
मैंने देखा है कि वर्ष के अलग-अलग महीनों में सूर्यास्त के समय पूर्व में दिखने वाले तारे और तारामंडल बदलते रहते हैं।
हाँ। शायद इसीलिए हमें कक्षा 6 में वर्ष के कुछ निश्चित काल में ही कुछ तारों और तारामंडलों को देखने के लिए कहा गया था। परंतु एक वर्ष की अवधि में रात्रि-आकाश के उसी भाग में भिन्न-भिन्न तारे क्यों दिखाई देते हैं?
12.2 पृथ्वी का परिक्रमण
कक्षा 6 में हमने सीखा है कि पृथ्वी अपने अक्ष के परितः घूर्णन करने के साथ-साथ सूर्य के चारों ओर परिक्रमण भी करती है। यह गति घूर्णन से भिन्न है। परिक्रमा किसी वस्तु की किसी अन्य वस्तु के चारों ओर एक बंद पथ पर गति होती है।
कोई पिंड किसी अन्य पिंड के परितः जिस पथ पर गमन करता है वह उसकी कक्षा कहलाती है। यदि ऊपर से देखा जाए (चित्र 12.8) तो सूर्य के परितः पृथ्वी की कक्षा लगभग वृत्ताकार है। (कक्षा 6 की विज्ञान की पाठ्य पुस्तक जिज्ञासा के अध्याय 'पृथ्वी से परे' में दिए गए सौर परिवार के चित्र में कक्षा दीर्घवृत्ताकार दिखाई गयी थी क्योंकि यह कक्षा का एक पार्श्व दृश्य था।) पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक परिक्रमा लगभग 365 दिन और 6 घंटे में पूरा करती है।12.2.1 पृथ्वी से देखने पर रात्रि-आकाश का परिवर्तित होता दृश्य
प्रत्येक संध्या को सूर्य पश्चिम दिशा में अस्त होता है और तारों से पूरित रात्रि-आकाश दृष्टिगोचर हो जाता है। हम जानते हैं कि ऐसा पृथ्वी के घूर्णन के कारण होता है। चूँकि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर सतत परिक्रमा करती रहती है, इसलिए जब हम भिन्न-भिन्न दिशाओं में देखते हैं तो पूरे वर्ष में सूर्यास्त के पश्चात रात्रि-आकाश में दिखाई देने वाले तारे भी परिवर्तित होते रहते हैं। यह परिवर्तन चित्र 12.8 में भी दर्शाया गया है।
रात्रि-आकाश में तारों के पैटर्नो (जिनके विषय में आपने कक्षा 6 में पढ़ा था) में होने वाले इस परिवर्तन को आप भी अंकित कर पाएँगे यदि एक माह के बाद रात्रि-आकाश का पुनः उसी समय पर अवलोकन करें जिस समय पर आज अवलोकन रहे हैं।
रोचक तथ्य
पश्चिम भारत की तापी घाटी में भील और पवारा स्वदेशी समुदाय हैं जो आकाश में कुछ तारों के पैटनों की उपस्थिति का मानसून की वर्षा के आगमन के संकेत के रूप में उपयोग करते रहे हैं।12.2.2 पृथ्वी पर ऋतुएँ

मैंने ध्यान दिया है कि प्रत्येक वर्ष में ऋतुएँ एक निश्चित चक्रीय क्रम में ही आती हैं। क्या यह किसी तरह सूर्य के चारों ओर पृथ्वी की परिक्रमा करने से संबंधित है?
मैंने यह भी देखा है कि ग्रीष्मकाल में। दिन शीतकाल के दिनों की तुलना में लंबे होते हैं।
पृथ्वी का घूर्णन अक्ष इसकी कक्षा के सापेक्ष अभिलंबवत नहीं है अपितु झुका हुआ है। पृथ्वी सूर्य के चारों ओर परिक्रमा करते समय इस झुकाव को बनाए रखती है (चित्र 12.9)। पृथ्वी के अक्ष के झुकाव और पृथ्वी के गोलाकार होने के कारण यहाँ भिन्न-भिन्न ऋतुएँ होती हैं। आइए, हम पता करें कि ऋतु-परिवर्तन कैसे होता है?
जून माह में पृथ्वी का उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर झुका होता है जबकि दक्षिणी गोलार्ध सूर्य से परे की ओर होता है (चित्र 12.9)। जैसा चित्र 12.10 (क) में देखा जा सकता है कि पृथ्वी की सतह के गोलाकार होने के कारण उत्तरी गोलार्ध में सूर्य की किरणों की निश्चित मात्रा दक्षिणी गोलार्ध की तुलना में एक छोटे क्षेत्र में फैलती हैं। इसलिए इस क्षेत्र में गरमी अधिक होती है।
इसके अतिरिक्त उत्तरी गोलार्ध जून माह में 12 घंटे से अधिक समय तक सूर्य का प्रकाश प्राप्त करता है [चित्र 12.11 (क)]। अतः उत्तरी गोलार्ध द्वारा तीव्र सूर्य का प्रकाश अधिक लंबे समय तक प्राप्त करने के कारण ग्रीष्म ऋतु होती है। दिसंबर माह में उत्तरी गोलार्ध में स्थिति विपरीत होती है। यहाँ सूर्य का प्रकाश कम समय के लिए प्राप्त होता है और इसलिए यहाँ शीत ऋतु होती है (चित्र 12.10 ख और 12.11 ख)।
दक्षिणी गोलार्ध में ऋतुओं और दिनों की अवधि उत्तरी गोलार्ध की तुलना में विपरीत होती है। यहाँ जून माह में शीतकाल और दिसंबर माह में ग्रीष्मकाल होता है (चित्र 12.10 और चित्र 12.11)
- जब उत्तरी गोलार्ध सूर्य की ओर झुकता है तो वह सूर्य के समीप होता है।
- पृथ्वी की कक्षा अंडाकार होने के कारण सूर्य उसके केंद्र से थोड़ा हटकर होता है अतः पृथ्वी वर्षभर में सूर्य से भिन्न-भिन्न दूरियों पर होती है।
रोचक तथ्य
उत्तरी ध्रुव पर विषुव दिवस 21 मार्च को सूर्य पूर्व दिशा में उदित होता है और सतत छः माह तक आकाश में बना रहता है। 22 सितंबर को सूर्य अस्त हो जाता है। दक्षिणी ध्रुव पर इसके विपरीत व्यवहार परिलक्षित होता है। इस प्रकार ध्रुवीय प्रदेशों पर सतत छह माह तक सूर्य चमकता है और उसके बाद आगामी छः महीनों तक वहाँ अंधकार छाया रहता है।विषुवत रेखा पर सदैव 12 घंटे सूर्य का प्रकाश रहता है और 12 घंटे अंधकार। विभिन्न महीनों में विषुवत रेखा पर पड़ने वाली सूर्य की किरणों की तीव्रता में बहुत कम अंतर होता है। अतः भारत के दक्षिणी राज्य जो विषुवत रेखा के निकट हैं, वहाँ ऋतु-परिवर्तन के प्रभाव बहुत स्पष्ट नहीं होते। अन्य प्रभाव जैसे स्थानिक भूगोलीय अभिलक्षण, समुद्रों या सागरों से निकटता भी इन दोनों गोलार्थों में देखे गए व्यापक पैटनों को प्रभावित करते हैं जैसा कि आपने सामाजिक विज्ञान में पढ़ा है।
12.3 ग्रहण
दिन और रात का चक्र, ऋतुएँ, पृथ्वी पर जीवन.... बहुत कुछ सूर्य पर निर्भर है। क्या पृथ्वी और सूर्य के बीच परिक्रमा करने वाले दो ग्रहों द्वारा सूर्य से आने वाला प्रकाश अवरुद्ध किया जा सकता है?
सूर्य की तुलना में बुध एवं शुक्र ग्रह अत्यंत लघु आकार के दिखने के कारण ये सूर्य से आने वाले प्रकाश को हम तक पहुँचने से कभी भी पूर्णतः नहीं रोक पाते। तथापि आपको यह जानकार आश्चर्य होगा कि चंद्रमा ऐसा कर सकता है। याद कीजिए, कक्षा 6 में आपने पढ़ा था कि चंद्रमा पृथ्वी का प्राकृतिक उपग्रह है और यह पृथ्वी के चारों ओर वैसे ही घूमता है जैसे पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है।
12.3.1 सूर्य-ग्रहण
किसी निश्चित समय पर सूर्य और पृथ्वी के बीच चंद्रमा इस प्रकार आ जाता है कि यह सूर्य के प्रकाश को हम तक पहुँचने से रोक देता है। यह स्थिति सूर्य ग्रहण कहलाती है। संभवतः आप सोच रहे होंगे की चंद्रमा तो सूर्य से बहुत छोटा है फिर यह आकाश में चमकते सूर्य के प्रकाश को हम तक पहुँचने से कैसे अवरुद्ध कर देता है?
- अपने मित्र को अपने सामने लगभग 5 मीटर की दूरी पर खड़ा होने के लिए कहिए। उसके सिर को हम सूर्य मान लेते हैं।
- अब अपनी एक आँख बंद कीजिए और मित्र की ओर अपने हाथ का अँगूठा ऊपर कीजिए जैसा चित्र 12.12 में दर्शाया गया है। क्या आप अपने मित्र के पूरे सिर को अपने अँगूठे से ढक सकते हैं?
पृथ्वी से देखने पर आकाश में चंद्रमा और सूर्य दोनों के आभासी आमाप एक जैसे होते हैं। चंद्रमा का आमाप सूर्य से बहुत छोटा होते हुए भी ऐसा इसलिए होता है क्योंकि चंद्रमा सूर्य की अपेक्षा हमारे बहुत निकट है। इसलिए पृथ्वी से देखने पर चंद्रमा पूरे सूर्य को ढकता हुआ प्रतीत हो सकता है।
चित्र 12.13 में सूर्य-ग्रहण के समय सूर्य, चंद्रमा और पृथ्वी की स्थितियों की क्रम-व्यवस्था दर्शाई गई है। चंद्रमा की छाया पृथ्वी के एक छोटे भाग पर पड़ती है जैसा चित्र 12.13 में दिखाई देता है। इस क्षेत्र में पूरी तरह अँधेरा हो जाता है और यहाँ से सूर्य का कोई भी भाग दिखाई नहीं देता है। इस क्षेत्र में प्रेक्षक पूर्ण सूर्य-ग्रहण का अवलोकन करेंगे [चित्र 12.14 (क)]। वे क्षेत्र जहाँ चंद्रमा आंशिक रूप से सूर्य के कुछ क्षेत्रों से आने वाले प्रकाश को ही अवरुद्ध करता है उनमें प्रेक्षक आंशिक सूर्य ग्रहण का अवलोकन करते हैं [चित्र 12.13 एवं चित्र 12.14 (ख)]।
पूर्ण सूर्य-ग्रहण के समय पृथ्वी के दर्शाए गए क्षेत्र में कुछ मिनटों के लिए दिन में ही अँधेरा छा जाता है क्योंकि यहाँ सूर्य का प्रकाश नाममात्र भी नहीं पहुंचता। पृथ्वी के घूर्णन और चंद्रमा की अपनी कक्षा में गति के कारण चंद्रमा की छाया पृथ्वी की सतह पर स्थान का परिवर्तन करती है। अतः पूर्ण सूर्य-ग्रहण केवल कुछ मिनटों के लिए ही दिखाई पड़ता है। जैसे ही चंद्रमा सूर्य के सामने से हटने लगता है, हमें आंशिक सूर्य-ग्रहण दिखाई देता है और दिन का प्रकाश लौटने लगता है।
सूर्य-ग्रहण के अवलोकन की सुरक्षित विधि
! सावधानी - सूर्य-ग्रहण के समय हो सकता है कि आपका मन सीधे इस घटना को देखने का करें और आपको आपका लगे कि सूर्य का प्रकाश इतना अधिक तीव्र नहीं होगा कि आपकी आँखों को हानि पहुँचा सके, तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं हैं। सूर्य-ग्रहण के दौरान भी सूर्य का प्रकाश इतना तीव्र होता है कि आँखों को क्षति पहुँचा सकता है और अंधेपन का भी कारण बन सकता है। अतः सूर्य-ग्रहण को सीधे देखने से बचना चाहिए। धूप का चश्मा, द्विनेत्री दूरबीन अथवा दूरदर्शी का उपयोग करके भी इस घटना को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखना चाहिए।
प्रायः कृत्रिम नभोमंडल, खगोलीय क्लब जैसे खगोलिकी संगठन सूर्य-ग्रहण के समय इसके अवलोकन हेतु विशेष सत्र आयोजित करते हैं। इस प्रकार के सत्रों में सहभागिता सूर्य-ग्रहण के अवलोकन की सबसे अच्छी
12.14-सूर्य-ग्रहण
! सावधानी- इस क्रियाकलाप को पूरी तरह शिक्षक के मार्गदर्शन में ही किया जाना चाहिए। इसके साथ यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि परावर्तित प्रकाश प्रत्यक्ष रूप से किसी की आँखों पर ना पड़े।
प्राचीनकाल से ही लोग सूर्य-ग्रहण एवं चंद्र-ग्रहण का अवलोकन और अभिलेखन करते आए हैं। जब इन ग्रहणों के कारण ज्ञात नहीं थे तब लोग इन घटनाओं के समय भयभीत हो जाते थे। आप कल्पना कर सकते हैं कि सूर्य जो कि पृथ्वी पर ऊष्मा और प्रकाश का प्रमुख स्रोत है, उसकी किरणों को यदि कोई अल्पकाल के लिए ही अवरुद्ध करे तो यह उन लोगों के लिए कितनी बड़ी चिंता का कारण रहा होगा। विश्व के विभिन्न भागों में सूर्य-ग्रहण के साथ अनेक अंधविश्वास जुड़ गए। उदाहरण के लिए, यह माना जाने लगा कि सूर्य-ग्रहण के दौरान भोजन करने, खाना पकाने, घर से बाहर जाने जैसी गतिविधियाँ नहीं की जानी चाहिए। किंतु अब जब हम यह जान गए हैं कि सूर्य ग्रहण क्यों होता है तो हमें इन घटनाओं से भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। बस हमें सूर्य को सीधे देखने से बचना चाहिए। अब वैज्ञानिक संपूर्ण विश्व में जहाँ से भी ग्रहण का अवलोकन किया जा सकता हो वहाँ उनके अध्ययन के लिए जाते हैं। ये ग्रहण उन्हें ऐसी परिघटनाओं के अध्ययन का अवसर प्रदान करते हैं जिनका अवलोकन अन्यथा नहीं किया जा सकता।
रोचक तथ्य
संस्कृत एवं अन्य अनेक भारतीय भाषाओं में जिस परिघटना को ग्रहण कहा जाता है, अंग्रेजी भाषा में उसे एक्लिप्स कहा जाता है। कई प्राचीन भारतीय खगोलशास्त्रीय ग्रंथों में ग्रहण की भविष्यवाणी के लिए गणनाएँ दी गई हैं। सबसे प्रसिद्ध और सबसे अधिक संदर्भित ग्रंथ सूर्य सिद्धांत है जो शास्त्रीय संस्कृत काव्य-परंपरा में छंदबद्ध श्लोकों के रूप में लिखा गया है।12.3.2 चंद्र-ग्रहण
चंद्रमा द्वारा पृथ्वी की परिक्रमा करते समय कभी-कभी ऐसी स्थिति बनती है कि पृथ्वी सूर्य की किरणों को चंद्रमा तक पहुँचने से रोक देती है। यह परिघटना चंद्र-ग्रहण कहलाती है। चंद्र-ग्रहण के दिन हम पृथ्वी की छाया चंद्रमा के पूरे पटल पर पड़ते हुए देखते हैं। चित्र 12.16 चंद्र-ग्रहण के समय सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा की स्थितियों की क्रम-व्यवस्था दर्शाता है।
(चित्र में दूरियाँ और आमाप सही अनुपात के अनुसार नहीं हैं)
जब चंद्रमा पूर्णतया पृथ्वी की छाया में होता है तो इस परिघटना को पूर्ण चंद्र-ग्रहण कहा जाता है। चंद्रमा का चमकदार पटल गहरे लाल रंग का दिखाई देने लगता है और जब तक चंद्रमा पृथ्वी की छाया से बाहर नहीं निकल जाता, यह ऐसा ही बना रहता है। जब चंद्रमा का कुछ भाग पृथ्वी की छाया में होता है और शेष दिखाई देने लगता है तो इसे आंशिक चंद्र-ग्रहण कहते हैं। सूर्य-ग्रहण के विपरीत चंद्रमा को पूर्ण चंद्र-ग्रहण के समय भी हम बिना किसी प्रकाशिक उपकरण के सुरक्षित ढंग से देख सकते हैं।
रोचक तथ्य
कोडाईकनाल सौर वेधशाला दक्षिण भारत की सुंदर पालनी पर्वत श्रृंखला में अवस्थित है। इसकी स्थापना सामान्य संवत् 1899 में की गई थी और 100 वर्ष से अधिक समय से यह सूर्य संबंधी जानकारी के आँकड़े प्रदान कर रही है। इसका संचालन बेंगलुरु के भारतीय खगोलिकी संस्थान द्वारा (आई.आई.ए.) किया जाता है।वैज्ञानिक से परिचय
एम. के. वेणु बप्पू आधुनिक भारतीय खगोलिकी के जनक के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने भारत में अनेक यंत्रों और दूरदर्शकों, जैसे- नैनीताल (उत्तराखंड) के निकट मनोरा शिखर पर तथा केवलुर (तमिल नाडु) में दूरदर्शकों की स्थापना के प्रयासों का नेतृत्व किया। केवलुर की वेधशाला का नाम उनके नाम पर रखा गया है। इन्होंने मुख्यतः तारों पर कार्य किया और एक धूमकेतु की भी खोज की। इन्होंने सूर्य ग्रहण का अध्ययन करने के लिए विश्व के विभिन्न भागों की यात्रा भी की।संक्षेप में
- पृथ्वी अपनी धुरी पर एक चक्र लगभग 24 घंटे में पूर्ण करती है।
- पश्चिम से पूर्व की ओर पृथ्वी के घूर्णन के कारण दिन और रात होते हैं तथा सूर्य, चंद्रमा और तारे गति करते हुए प्रतीत होते हैं।
- पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है और एक परिक्रमण पूरा करने में यह लगभग एक वर्ष का समय लेती है।
- पृथ्वी का घूर्णन अक्ष इसकी कक्षा के सापेक्ष अभिलंबवत नहीं है अपितु झुका हुआ है।
- ऋतु-परिवर्तन पृथ्वी के घूर्णन अक्ष के झुकाव तथा इसकी गोल आकृति के कारण होते हैं।
- सूर्य-ग्रहण तब होता है जब चंद्रमा अपनी कक्षा में घूमता हुआ सूर्य और पृथ्वी के बीच में आ जाता है और सूर्य के प्रकाश को पृथ्वी पर पहुँचने से रोक देता है।
- चंद्र-ग्रहण तब होता है जब सूर्य और चंद्रमा के बीच पृथ्वी आ जाती है और सूर्य के प्रकाश को चंद्रमा पर पहुँचने से रोक देती है।
आइए, और अधिक सीखें
- चित्र 12.17 में पृथ्वी के एक घूर्णन के दौरान उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव पर सूर्य का प्रकाश कितने-कितने घंटे रहता है?
- रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए -
- तारे.. दिशा में उदित होते हैं और... दिशा में अस्त होते हैं। दक्षिणी ध्रुव
- दिन और रात पृथ्वी के.. के कारण होते हैं।
चित्र 12.17 - जब चंद्रमा हमारी दृष्टि के सामने सूर्य को पूरी तरह ढक कर लेता है तो यह.. . सूर्य-ग्रहण कहलाती है।
- बताइए, निम्नलिखित कथन सत्य है अथवा असत्य -
- जब सूर्य पृथ्वी और चंद्रमा के बीच आता है तो सूर्य-ग्रहण होता है। [ ]
- गुजरात में सूर्योदय झारखंड से पहले होता है। [ ]
- चेन्नई में सबसे लंबा दिन ग्रीष्म अयनांत में होता है। [ ]
- हमें सूर्य-ग्रहण सीधा अपनी खुली आँखों से देखना चाहिए। [ ]
- ऋतु-परिवर्तन पृथ्वी के घूर्णन अक्ष के झुकाव तथा इसकी गोल आकृति के कारण होता है। [ ]
- सूर्य के परितः पृथ्वी के परिक्रमण के कारण दिन और रात होते हैं। [ ]
- पद्मश्री ने कल रात 8:00 बजे ओरायन तारामंडल को लगभग अपने सिर के ऊपर देखा था। वह आज ओरायन तारामंडल को अपने सिर के ऊपर किस समय देखेगी?
- नंदिनी ने 21 जून को मध्य रात्रि में एक तारा-समूह को उदित होते हुए देखा अगले वर्ष मध्यरात्रि में वह तारों के इस समूह को कब उदित होते हुए देखेगी?
- अभय के ध्यान में यह बात आई कि जब भारत में दिन होता है तो अमेरिका में रहने वाले उसके चाचा जी उस समय सो रहे होते हैं क्योंकि वहाँ उस समय रात होती है। इस अंतर का क्या कारण है?
- चार मित्रों ने सूर्य-ग्रहण के अवलोकन हेतु निम्नलिखित चार ढंग अपनाए। इनमें से किसने असावधानी बरती?
- रवि किशन ने सूर्य-ग्रहण देखने वाले नजर के चश्मे का उपयोग किया।
- ज्योति ने सूर्य का प्रतिबिंब पर्दे पर बनाने के लिए दर्पण का उपयोग किया।
- आदित्य ने सीधे अपनी खाली आँखों से सूर्य का अवलोकन किया।
- अरूणा ने कृत्रिम नभोमंडल द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में भाग लिया।
- चित्र 12.18 के वृत्तों में सूर्य, चंद्रमा तथा पृथ्वी में से चुनकर उपयुक्त शब्द लिखिए।
चित्र 12.18 - चंद्रमा सूर्य की तुलना में बहुत छोटा है फिर भी पूर्ण सूर्य-ग्रहण के समय यह हमारी दृष्टि से सूर्य को पूरी तरह से ओझल कर देता है। ऐसा क्यों संभव होता है?
- ऑस्ट्रेलिया में भारतीय क्रिकेट टीम के मैच प्रायः दिसंबर में होते हैं। अपनी इस यात्रा के लिए उन्हें सरदी के कपड़े ले जाने चाहिए या गरमी के।
- जब चंद्र-ग्रहण होता है तो इसे पृथ्वी के एक बड़े भाग से देखा जा सकता है किंतु पूर्ण सूर्य-ग्रहण केवल पृथ्वी के एक छोटे भाग से ही देखा जा सकता है। आपके विचार में ऐसा क्यों होता
- व्याख्या कीजिए कि यदि पृथ्वी का घूर्णन अक्ष इसके परिक्रमण तल के सापेक्ष झुका हुआ ना होता तो ऋतुओं पर इसका क्या प्रभाव होता?
अन्वेषणात्मक परियोजनाएँ
- क्रियाकलाप 12.2 को दोहराइए किंतु टॉर्च के स्थान पर विद्युत लैंप ले लीजिए। इसके पश्चात ग्लोब को इसका झुकाव बनाए रखते हुए लैंप के परितः खींचे गए एक वृत्त पर विभिन्न स्थितियों में रखिए।
- विभिन्न स्थितियों में ग्लोब के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्थों का कितना-कितना भाग प्रकाशित होता है? यह अवलोकन अभिलेखित कीजिए।
- ग्लोब को घुमाइए और इसके विभिन्न भागों पर दिन और रात की अवधि अभिलेखित कीजिए।
- वृत्त पर ग्लोब की विभिन्न स्थितियों के लिए चरण (ख) को दोहराइए।
- पृथ्वी सूर्य के चारों ओर एक अंडाकार पथ पर गमन करती है। एक ही केंद्र को लेकर दो वृत बनाइए जिनमें से एक की त्रिज्या 14.7 सेंटीमीटर हो और दूसरे की त्रिज्या 15.2 सेंटीमीटर हो। यदि 1 सेंटीमीटर एक करोड़ किलोमीटर दूरी के संगत हो तो ये दो वृत्त सूर्य से पृथ्वी की निकटतम और अधिकतम दूरी निरूपित करते हैं, यदि केंद्र के स्थान पर सूर्य हो तो पृथ्वी की कक्षा की आकृति दर्शाइए। ध्यान दीजिए कि अधिकतम और न्यूनतम दूरियों का यह अंतर कितना न्यून है?
- मान लीजिए कि पृथ्वी का घूर्णन अक्ष का झुकाव बढ़ जाता है तो क्या इससे ऋतुएँ अधिक भीषण होने लगेंगी? क्या यूरेनस के घूर्णन अक्ष का झुकाव पृथ्वी से अधिक है और वहाँ की ऋतुओं के विषय में पता लगाइए। इस विषय पर किसी समाचार-पत्र अथवा अपने विद्यालय की पत्रिका के लिए एक रोचक लेख लिखिए।
यह अभी भी अंत नहीं है, मेरे मित्र !
एक बार फिर हम पुस्तक क के अंतिम पृष्ठ पर पहुँच चुके हैं और जैसा कि हमने पहले भी कहा था कि यह निश्चित रूप से हमारी 'जिज्ञासा' का अंत नहीं है। हमें आशा है कि आपने इस पुस्तक के अध्यायों की यात्रा करते हुए सभी क्रियाकलापों और प्रयोगों का आनंद लिया होगा। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि आपने अनेक प्रश्न पूछे होंगे। अब समय आ गया है कि हम आपसे एक प्रश्न पूछें।
क्या आपने इस विज्ञान की पुस्तक के आवरण पृष्ठों को ध्यान से देखा? पहली बार देखने पर आपको ये किसी खेल के मैदान जैसे अथवा दौड़-पथ के सामान्य दृश्य जैसा दिखाई दे रहे होंगे परंतु ध्यानपूर्वक देखने पर आपको इन चित्रों में इस पुस्तक के विभिन्न अध्यायों से जुड़े छोटे-छोटे संकेत दिखाई देंगे और ध्यान से देखें तो संभव है आपको कुछ ऐसे संकेत दिखाई देंगे जो गति एवं प्रकाश तथा पादपों और जंतुओं के विषय में हमारे द्वारा किए गए विचार-विमर्श से संबंधित हैं। अपने आप को चुनौती दीजिए और अध्यायों के साथ जितने अधिक से अधिक वैज्ञानिक तथ्यों से संबंध खोज सकते हैं, खोजें (हमें लगता है कि ये 25 या उससे भी अधिक हो सकते हैं) और हो सकता है कि आप ऐसे संबंध भी खोज लें जिनके विषय में लेखकों और चित्रकारों ने भी विचार न किया हो। विज्ञान में इसी प्रकार अनेक खोज हुई हैं- किसी के द्वारा अपने आस-पास किसी नई और असामान्य घटना को ध्यानपूर्वक देखने मात्र से !
यह पाठ्यपुस्तक एक छोटी-सी मार्गदर्शिका है जो विज्ञान के विभिन्न पथों को ढूँढने में मानचित्र की तरह हमें मार्ग दिखाती है। प्रश्न पूछना कभी बंद मत कीजिए और याद रखिए कि आपकी जिज्ञासा ही वह चिंगारी है जो कि अन्वेषण की लौ को प्रज्वलित करेगी और आपको अकल्पनीय ऊँचाइयों तक ले जाएगी और हम अगले वर्ष पुनः विज्ञान की और रोमांचक यात्राओं के लिए आपके साथ होंगे।