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अध्याय -1

भारत की भौगोलिक विविधता

यह देश (भारत) अपने भूगोल के कारण ही अन्य देशों से सर्वथा भिन्न प्रतीत होता है और यही इसके राष्ट्रीय चरित्र निर्माण में विशिष्ट योगदान देता है।

- श्री अरविंद

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चित्र 1.1 - कर्नाटक में स्थित जोग जलप्रपात। पठार और जलप्रपात पर ध्यान दीजिए। जलप्रपात की शक्ति को विशेष टरबाइनों के माध्यम से जलविद्युत में बदला जाता है।

महत्वपूर्ण प्रश्न ?

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  1. भारत की कुछ प्रमुख भौगोलिक विशेषताएँ क्या हैं?
  2. भारत की भौगोलिक विविधताएँ हमारे जीवन को किस प्रकार प्रभावित करती हैं?

1984 में अंतरिक्ष में जाने वाले प्रथम भारतीय अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा ने तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी से बात की थी। जब इंदिरा गांधी ने उनसे यह प्रश्न किया कि "अंतरिक्ष से भारत कैसा दिखता है?" तब उन्होंने उत्तर दिया था, "सारे जहाँ से अच्छा" (यह 20वीं शताब्दी के आरंभ की एक प्रसिद्ध कविता की प्रारंभिक पंक्ति है।)

आइए पता लगाएँ

इस पुस्तक के अंत में दिए गए भारत के मानचित्र का अवलोकन कीजिए। आपको इसमें क्या-क्या दिखाई दे रहा है? क्या आपको पिछली कक्षा में पढ़ाई गई विभिन्न प्रकार की भू-आकृतियाँ - पर्वत, पठार और मैदान स्मरण हैं? आप मानचित्र पर कौन-कौन सी भू-आकृतियों को पहचान सकते हैं? मानचित्र पर अलग-अलग रंगों का क्या तात्पर्य है? (संकेत – मानचित्र पर अंकित संकेत सूची प्रत्येक क्षेत्र की ऊँचाई को दर्शाती है।)

इस अध्याय को पढ़ते समय, बीच-बीच में भौतिक मानचित्र को देखते रहिए।

क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत विश्व का सातवाँ बड़ा देश है और एशिया महाद्वीप का भाग है। अपने पड़ोसी देशों - पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका और म्यांमार के साथ मिलकर यह एक बड़े भूभाग का निर्माण करता है, जिसे भारतीय उपमहाद्वीप के नाम से भी जाना जाता है। सामान्यतः हम भारत को पाँच प्रमुख भागों में विभाजित करते हैं- महान पर्वतीय क्षेत्र, गंगा और सिंधु का मैदान, मरुस्थलीय भूभाग, दक्षिणी प्रायद्वीपीय और द्वीपसमूह। इस अध्याय में हम इन भूभागों के विषय में संक्षिप्त चर्चा करेंगे तथा इनकी प्रमुख विशेषताओं पर एक विहंगम दृष्टि डालेंगे। साथ ही यह भी देखेंगे कि इन भू-आकृतियों की कुछ विशेषताएँ समीप से देखने पर कैसी प्रतीत होती हैं। अभी इन सभी बिंदुओं का विस्तारपूर्वक वर्णन कठिन है, क्योंकि भारत एक विशाल तथा अत्यंत विविधतापूर्ण देश है (इसका अनुभव शीघ्र ही आपको भी होगा)।

हिमालय पर्वत श्रृंखला उत्तर दिशा में एक प्राकृतिक प्राचीर के रूप में खड़ी है, जबकि थार मरुस्थल और अरब सागर भारत की पश्चिमी सीमा बनाते हैं। दक्षिण में हिंद महासागर और पूर्व में बंगाल की खाड़ी एक प्राकृतिक सीमा के रूप में उपस्थित हैं। ये भौगोलिक विशेषताएँ भारत और महाद्वीप के अन्य भागों के मध्य विभाजक की भूमिका निभाने के साथ-साथ भारत की जलवायु, संस्कृति और इतिहास को आकार देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

आइए पता लगाएँ

  • क्या आपको अक्षांश और देशांतर रेखाओं पर अपना पाठ याद है? मानचित्र को देखिए। क्या आप बता सकते हैं कि भारत लगभग किन अक्षांशों और देशांतर रेखाओं के मध्य स्थित है?
  • भारत के भौतिक मानचित्र पर उपर्युक्त विशेषताओं की पहचान कीजिए।

आइए, अब हम भारत के उत्तर में स्थित हिमालय से लेकर दक्षिण में हिंद महासागर के द्वीपों तक और फिर पूर्व की ओर एक साथ यात्रा करें। मानचित्र पर विभिन्न रंग हमें पहले से ही भौगोलिक विविधता का आभास कराते हैं। मानचित्र की संकेत-सूची से स्वयं को परिचित कीजिए और देखिए कि किस प्रकार विभिन्न रंग पृथ्वी की अलग-अलग ऊँचाई को दर्शाते हैं।

हिमालय पर्वत श्रृंखला

मानचित्र पर हिमालय पर्वत श्रृंखला की लंबाई को देखिए। यह एक विशाल प्राकृतिक प्राचीर के समान प्रतीत होती है। क्या आप मानचित्र की संकेत-सूची के माध्यम से हिमालय के विभिन्न स्थानों की ऊँचाई का अनुमान लगा सकते हैं?

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चित्र 1.2 - हिमालय पर्वत श्रृंखला का उपग्रह से लिया गया चित्र।
इस पर्वत श्रृंखला की कुल लंबाई लगभग 2500 कि.मी. है।

पुनरावलोकन करें

हिमालय पर्वत श्रृंखला आकाश को छूती हुई प्रतीत होती है। वास्तव में, इसकी कई चोटियाँ 8000 मीटर से भी अधिक ऊँची हैं और इन्हें सामूहिक रूप से 'आठ हजारी' कहा जाता है। यह पर्वत श्रृंखला एशिया के छह देशों- भारत, नेपाल, भूटान, चीन, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में फैली हुई है। क्या आप विश्व के सर्वाधिक ऊँचाई वाले पर्वत का नाम बता सकते हैं?

गर्मियों में पर्वतों पर जमी बर्फ पिघलती है और यही सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियों का प्रमुख जलस्रोत बनती है। ये नदियाँ और इनकी सहायक नदियाँ लोगों को पीने योग्य जल तथा कृषि एवं औद्योगिक उपयोग के लिए जल उपलब्ध कराती हैं और करोड़ों लोगों के जीवन को सुगम बनाती हैं। इसलिए कभी-कभी हिमालय पर्वत श्रृंखला को 'एशिया का जल शिखर' भी कहा जाता है। हिमालय अनेक संस्कृतियों और आस्थाओं का केंद्र भी है। इन पर्वतों को पावन माना जाता है। यहाँ अनेक मठों और मंदिरों का निर्माण हुआ है, जिसके कारण ये तीर्थ स्थल आज भी संपूर्ण विश्व से संतों, महात्माओं तथा अन्य आध्यात्मिक साधकों को ध्यान, अर्चना एवं साधना के लिए आकर्षित करते हैं।

इसे अनदेखा न करें

भागीरथी नदी, गंगा की एक प्रमुख सहायक नदी है, जो उत्तराखंड में गोमुख (गाय का मुँह) से निकलती है। यह गंगोत्री हिमनद का मुहाना है। यह हिमनद भारतीय हिमालय के सबसे बड़े हिमनदों में से एक है। इसे पवित्र माना जाता है और यह असंख्य तीर्थयात्रियों को आकर्षित करता है। गोमुख एक लोकप्रिय पहाड़ी यात्रा-पथ (ट्रेकिंग) भी है। अगली बार जब आप गंगा को देखें, तो याद रखें- इसकी यात्रा वहीं से आरंभ होती है।

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चित्र 1.3 - गोमुख

हिमालय का निर्माण कैसे हुआ

एक रोचक कथा

बहुत समय पहले, भारत 'गोंडवाना' नामक एक बहुत बड़े भूभाग का हिस्सा था, जहाँ उसका पड़ोसी अफ्रीका था! कालांतर में, यह भूभाग अलग हो गया और धीरे-धीरे उत्तर की ओर अग्रसर होने लगा। लगभग पाँच करोड़ वर्ष पूर्व, यह यूरेशिया नामक भूभाग तक पहुँच गया और उससे टकरा गया। जैसे ही भारतीय भूभाग ने यूरेशिया को धकेला, उनके बीच की भूमि अनिवलित (सिलवटदार) हो गई और ऊपर उठने लगी- ठीक वैसे ही जैसे कालीन को धकेलने पर उसमें सिलवटें पड़ जाती हैं। इसी प्रकार विशाल हिमालय पर्वतों का निर्माण हुआ।

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चित्र 1.4 - भारत की यूरेशिया की ओर यात्रा -

आश्चर्यजनक रूप से, भारत आज भी बहुत धीमी गति से, प्रतिवर्ष लगभग पाँच सेंटीमीटर एशिया की ओर बढ़ रहा है, जो आपके बालों के बढ़ने की दर से बहुत धीमी है। इसका मतलब है कि हिमालय प्रतिवर्ष धीरे-धीरे, लगभग पाँच मिलीमीटर की दर से ऊँचा हो रहा है और एक सहस्राब्दी में, इसकी ऊँचाई लगभग पाँच मीटर तक बढ़ जाती है।

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चित्र 1.5 – हिमालयी शैलों में मुड़ी हुई परतें -

इसे अनदेखा न करें

'हिमालय' शब्द संस्कृत के दो शब्दों हिम अर्थात 'बर्फ' और आलय अर्थात 'निवास' या 'गृह' से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है- 'बर्फ का घर'।

हिमालय को तीन मुख्य श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है -
  • हिमाद्री (वृहद हिमालय) पर्वत श्रृंखला सर्वाधिक ऊँची और सर्वाधिक विकट है, जहाँ माउंट एवरेस्ट और कंचनजंगा जैसे गगनचुंबी पर्वत शिखर स्थित हैं। यह क्षेत्र संपूर्ण वर्ष हिमाच्छादित रहता है। यहाँ जीवन अत्यंत कठिन है तथा यहाँ मानव बस्तियाँ अधिक नहीं हैं।
  • हिमाचल (लघु हिमालय) वृहद हिमालय के दक्षिण में स्थित है और इसकी जलवायु समशीतोष्ण है, जो समृद्ध जैव विविधता और मानव निवास के लिए उपयुक्त है। नैनीताल और मसूरी (उत्तराखंड), दार्जिलिंग (पश्चिम बंगाल), शिमला (हिमाचल प्रदेश) जैसे लोकप्रिय पर्वतीय पर्यटन स्थल इसी क्षेत्र में स्थित हैं।
  • शिवालिक पहाड़ियाँ (बाह्य हिमालय) हिमालय की सबसे निचली श्रृंखला बनाती हैं, जिसमें घुमावदार पहाड़ियाँ और घने जंगल सम्मिलित हैं। ये गिरिपाद वन्यजीवों से समृद्ध हैं, जो हिमालय और गंगा के मैदानों (जिसे उत्तरी मैदान भी कहा जाता है) के बीच एक संक्रमण क्षेत्र के रूप में कार्य करती हैं।

आइए पता लगाएँ

क्या आप हिमालय के विभिन्न भागों में स्थित राज्यों के नाम ज्ञात कर सकते हैं? इस अभ्यास के लिए भौतिक और राजनीतिक दोनों मानचित्रों की सहायता लीजिए।

इसे अनदेखा न करें

पश्चिमी हिमालयी क्षेत्र में पारंपरिक गृह निर्माण की पद्धति को 'काठ-कुनी' अथवा 'धज्जी-देवरी' शैली के रूप में जाना जाता है। इसमें स्थानीय रूप से उपलब्ध पत्थर और लकड़ी के संयोजन का उपयोग किया जाता है, जो न केवल घर को गर्म रखता है, बल्कि हल्के भूकंप की स्थिति में क्षति से भी बचाता है।

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चित्र 1.6 - हिमाचल प्रदेश में काठ-कुनी घर -

इसे अनदेखा न करें

हिमाचल प्रदेश में स्थित 'ग्रेट हिमालयन राष्ट्रीय उद्यान' में वनस्पतियों और जीवों की अत्यधिक विविधता पाई जाती है। इस उद्यान को यूनेस्को द्वारा विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया है। उद्यान की जैव विविधता को सरकार के साथ-साथ उद्यान में रहने वाले ग्रामीण समुदायों द्वारा भी संरक्षित किया जा रहा है।

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चित्र 1.7. 1 - ग्रेट हिमालयन राष्ट्रीय उद्यान संरक्षण क्षेत्र 2. हिमालयी मोनल (नर पक्षी), 3. लद्दाख स्थित एक बौद्ध मठ, 4. हिमाचल प्रदेश में प्रवाहित होती ब्यास नदी 5. हिम तेंदुआ 6. हिमालय क्षेत्र के एक स्थानीय बाजार में प्रदर्शित कृषि उपज 7. बुरांश (रोडोडेंड्रोन)- इस पुष्प से एक विशेष प्रकार का शीतल पेय बनाया जाता है।

भारत का शीत मरुस्थल

'मरुस्थल' शब्द सुनते ही मन में उष्ण प्रदेश की छवि उभरती है। हालाँकि, मरुस्थल शीत भी होते हैं और भारत में भी एक ऐसा शीत मरुस्थल है। लद्दाख एक शीत मरुस्थल है जहाँ सर्दियों में तापमान 30 डिग्री सेल्सियस से नीचे चला जाता है। यहाँ बहुत कम वर्षा होती है और भूभाग ऊबड़-खाबड़ है, जिसमें चट्टानी क्षेत्र, गहरी घाटियाँ और पैंगोंग त्सो (त्सो का अर्थ है झील) जैसी झीलें सम्मिलित हैं।

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चित्र 1.8 - लद्दाख की चंद्रभूमि

यहाँ की भूमि चंद्रमा की सतह जैसी दिखाई देती है। इसलिए इसे 'चंद्रभूमि' कहा जाता है। भूगर्भशास्त्री इस भूभाग के निर्माण की व्याख्या इस तथ्य से करते हैं, जैसा हमने पहले पढ़ा, कि जब भारतीय भूभाग यूरेशिया से टकराया तो पहाड़ 'मुड़' गए थे। यह मुड़ा हुआ भाग कभी एक महासागर का हिस्सा था और इसलिए इस क्षेत्र की चट्टानें मुख्य रूप से रेत और चिकनी मिट्टी से बनी हुई हैं। समय के साथ पवन और वर्षा ने पहाड़ों का अपरदन कर इसे जिस आकार में बदल दिया है, उसे आप चित्र में देख सकते हैं।

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चित्र 1.9 – हिमालयी लोगों के जीवन में याक बहुत महत्वपूर्ण है। उन्हें दूध, मांस, ऊन और गोबर के लिए पाला जाता है और परिवहन के लिए भी उपयोग में लाया जाता है।
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चित्र 1.10 - लद्दाख में पैगोंग त्सो झील। खारे पानी के कारण यह अन्य झीलों से भिन्न है। इसके जल में खारापन आस-पास के पहाड़ी क्षेत्रों से घुले खनिजों के कारण है।

कठिन परिस्थितियों के होते हुए भी लद्दाख हिम तेंदुए, आइबेक्स और तिब्बती मृग जैसे अद्वितीय वन्यजीवों का घर है। लद्दाखी लोग सादा जीवन जीते हैं। यह क्षेत्र अपने प्राचीन बौद्ध मठों तथा लोसर और हेमिस महोत्सव जैसे रंग-बिरंगे त्योहारों के लिए प्रसिद्ध है।

गंगा के मैदान

जैसे ही हम हिमालय से दक्षिण की ओर बढ़ते हैं, गंगा के विशाल और उपजाऊ मैदानों में पहुँचते हैं। ये मैदान भारत के इतिहास और सभ्यता का एक महत्वपूर्ण भाग रहे हैं। इन मैदानों को हिमालय से निकलने वाली विशाल नदियाँ पोषित करती हैं जो इस क्षेत्र के लिए जल के रूप में एक महत्वपूर्ण जीवन रेखा हैं। सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी प्रणालियाँ अपनी सहायक नदियों के व्यापक जाल से इस क्षेत्र की मिट्टी को खनिजों से समृद्ध करती हैं, जिससे यह क्षेत्र अत्यधिक उपजाऊ और कृषि के लिए आदर्श बन जाता है। नदियाँ अपने साथ अनेक खनिज लाती हैं जो मिट्टी को उपजाऊ करते हैं और जिससे प्रचुर मात्रा में कृषि संभव होती है। नदियाँ जल-विद्युत उत्पादन का भी एक स्रोत हैं। भारत की जनसंख्या का एक बड़ा भाग इन मैदानी क्षेत्रों में रहता है।

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चित्र 1.11 - मैदानों में आधुनिक कृषि पद्धतियाँ ।
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चित्र 1.12 - दिल्ली का हवाई दृश्य, जिसमें ऊपर दाईं ओर यमुना नदी दिखाई दे रही है
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चित्र 1.13 - उत्तर प्रदेश में बहुफसलीय कृषि
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चित्र 1.14 - पश्चिम बंगाल में धान के खेतों में काम करती हुई ग्रामीण महिलाएँ

भारत के उत्तरी मैदानों की समतल भूमि में एक विस्तृत परिवहन तंत्र विकसित हुआ है। सड़क और रेलवे तंत्र लंबी दूरी तक लोगों और माल की आवाजाही को सुविधाजनक बनाते हैं। जैसा कि आप 'अतीत के चित्रपट' से संबंधित अध्याय में देखेंगे, गंगा, ब्रह्मपुत्र और अन्य नदियों का उपयोग यात्रा और व्यापार के लिए सहस्राब्दियों से किया जाता रहा है।

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चित्र 1.15 - गंगा के मैदानों में परिवहन के विविध साधन

इसे अनदेखा न करें

भारत में अधिकांश नदियों के नाम देवियों के नाम पर रखे गए हैं, जैसे- गंगा, यमुना, कावेरी, आदि। जबकि ब्रह्मपुत्र के नाम का अर्थ है 'ब्रह्या का पुत्र'। गर्मियों में सूखने की अपेक्षा इस नदी में जल की मात्रा बढ़ जाती है! क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि ऐसा क्यों होता है?

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चित्र 1.16 - गंगा के मैदान का उपग्रह द्वारा लिया गया चित्र
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चित्र 1.17 - मध्य प्रदेश के बांधवगढ़ राष्ट्रीय उद्यान में लकड़ी की डाली पर बैठा उत्तरी मैदानी ग्रे लंगूर
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चित्र 1.18 - बाघ, जो विलुप्ति के कगार पर थे, - बाघ परियोजना (प्रोजक्ट टाइगर) ने इनके पुनर्वास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
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चित्र 1.19 - एक वयस्क भारतीय घड़ियाल की लंबाई 2.5 से 4.5 मीटर होती है। यह सरीसृप विलुप्ति के कगार पर है। कानूनी रूप से इसका शिकार अथवा इसे क्षति पहुँचाना निषिद्ध घोषित किया गया है।
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चित्र 1.20 - मोर और मोरनी भारतीय मोर हमारा राष्ट्रीय पक्षी है।

विशाल भारतीय मरुस्थल या थार मरुस्थल

अगर हम भारत के मानचित्र पर पश्चिम की ओर बढ़ें, तो आपको एक पीलापन लिए क्षेत्र दिखाई देगा। यह क्षेत्र थार मरुस्थल है। आपको क्या दिखाई देता है? सुनहरी रेत के टीलों का एक विशाल विस्तार, ऊबड़-खाबड़ क्षेत्र और व्यापक खुला आसमान !

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चित्र 1.21 - थार मरुस्थल के रेत के टीलों में एक यात्री

आइए पता लगाएँ

रेत के टीले का आकार कैसा होता है? पर्वत चट्टानों से बने होते हैं और उनका आकार स्थिर होता है। आपको क्यों लगता है कि रेत के टीलों का आकार भी इनके समान होता है, जबकि वे केवल रेत से बने होते हैं?

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चित्र 1.22 - जैसलमेर 'स्वर्ण नगरी' जो भारत के थार मरुस्थल के मध्य स्थित है। जैसलमेर किला एक यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है।

रेत के टीले तब बनते हैं जब हवा की दिशा रेत को स्थानांतरित कर पहाड़ी जैसी आकृति प्रदान करती है। कभी-कभी ये टीले 150 मीटर तक ऊँचे हो जाते हैं।

थार मरुस्थल एक विशाल शुष्क क्षेत्र है। इसका अधिकांश भाग भारत में स्थित है, जो राजस्थान, गुजरात, पंजाब और हरियाणा राज्यों में फैला हुआ है। मरुस्थल कठोर परिस्थितियों के कारण एक प्राकृतिक अवरोध के रूप में कार्य करता है जो मानव और पशु आवागमन को बाधित करता है, क्योंकि यहाँ दिन के समय अत्यधिक तापमान, रातें अत्यधिक ठंडी और जल की उपलब्धता का अभाव होता है।

थार में रहने वाले लोगों ने अपनी जीवन-शैली को उस स्थान और वहाँ की परिस्थितियों के अनुरूप ढाल लिया है। उनका खान-पान, वेशभूषा और जीवन-शैली इन कठोर परिस्थितियों के अनुकूल है।

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चित्र 1.23 - पुष्कर मेले में ऊँट विक्रेता (थार मरुस्थल की सीमा पर)

इसे अनदेखा न करें

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चित्र 1.24 - घर से दूर जल स्रोतों से जल लाती हुई महिलाएँ (बाएँ)। एक ग्राम में वर्षा जल संचयन की संरचना (दाएँ)।

मरुस्थल में जल का अभाव होता है। महिलाओं को प्रायः अपने परिवार के लिए जल लाने हेतु प्रतिदिन लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इसलिए बर्तनों को स्वच्छ करने की पारंपरिक विधि यह है कि उन्हें रेत से तब तक रगड़ा जाए जब तक वे साफ न हो जाएँ। धोने के लिए जल की थोड़ी मात्रा का उपयोग किया जा सकता है। धोने के लिए उपयोग किए गए जल का पुनः उपयोग, किसी पौधे को सींचने जैसे कार्यों के लिए किया जा सकता है। इसलिए अगली बार जब भी आप नल खुला छोड़ें, तो थार रेगिस्तान के लोगों को याद अवश्य करें। राजस्थान अपने पारंपरिक जल-संरक्षण के उपायों, जिसमें टांका या कुंड सम्मिलित हैं, के लिए भी प्रसिद्ध है। ये विशेष जल-संग्रह विधियाँ वर्षा के जल को प्रायः पीने के उददेश्य से संचयित करती हैं।

अरावली की पहाड़ियाँ

आइए पता लगाएँ

आइए, मानचित्र पर वापस चलते हैं। थार मरुस्थल से पूर्व की ओर धीरे-धीरे अपने रास्ते को देखिए। क्या आपको अरावली की पहाड़ियाँ दिख रही हैं?

अरावली पर्वत श्रृंखला विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो लगभग 2.5 अरब वर्ष पुरानी है! इस पर्वतमाला में अनेक चोटियाँ और पहाड़ियाँ हैं। हालाँकि, इसकी सबसे ऊँची चोटी माउंट आबू की ऊँचाई 1722 मीटर है, लेकिन इसकी अधिकांश पहाड़ियाँ 300 से 900 मीटर तक ऊँची हैं। क्या यह रोचक नहीं है कि अरावली में स्थित माउंट आबू से थार मरुस्थल में स्थित जोधपुर की लगभग साढ़े चार घंटे की गाड़ी से यात्रा आपको एक पूर्ण रूप से भिन्न भौगोलिक परिदृश्य में ले जाती है?

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चित्र 1.25 - अरावली का एक भाग। इस श्रृंखला से आगे थार मरुस्थल आरंभ होता है (बाएँ)। अंतरिक्ष से दिखने वाला अरावली का एक भाग (दाँए)।

आइए पता लगाएँ

पाठ्यपुस्तक में दिए गए राजनीतिक मानचित्र को देखिए और उन राज्यों की पहचान कीजिए, जिनमें अरावली पर्वत श्रृंखला फैली हुई है। क्या आप इसमें दिल्ली, राजस्थान, हरियाणा और गुजरात को देख सकते हैं?

अरावली पर्वत श्रृंखला उत्तर-पश्चिम भारत के भूभाग और जलवायु को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह एक प्राकृतिक प्राचीर के रूप में मरुस्थल का पूर्व की ओर विस्तार होने से रोकती है। आप इस विषय में आगे विस्तार से पढ़ेंगे।

संगमरमर, ग्रेनाइट, जस्ता और ताँबा जैसे खनिजों से भरपूर होने के कारण अरावली की पहाड़ियों ने सदियों से खनन और निर्माण क्रियाकलापों को आकर्षित किया है। जावर में स्थित प्राचीन खदानों से प्राप्त प्रमाणों से पता चलता है कि आठवीं शताब्दी पूर्व जस्ता निकालने के कौशल में महारत हासिल करने में भारतीय विश्व में अग्रणी थे। चितौड़गढ़, कुंभलगढ़ और रणथंभौर जैसे ऐतिहासिक किले भी यहाँ स्थित हैं।

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चित्र 1.26 - अरावली से घिरा हुआ कुंभलगढ़ किला। पहाड़ियों में स्थित यह स्थान शत्रुओं को रोकने में अत्यंत सहायक सिद्ध हुआ।

प्रायद्वीपीय पठार

पुनरावलोकन करें

पठार वह स्थल रूप है, जो अपने चारों ओर की भूमि से ऊँचा होता है तथा इसकी सतह प्रायः समतल होती है। इसके कुछ किनारे प्रायः खड़ी ढाल वाले होते हैं।

भारत में अनेक पठार हैं, जिनमें सबसे महत्वपूर्ण पठार देश के मध्य और दक्षिण में स्थित त्रिकोणीय प्रायद्वीपीय क्षेत्र है।

यह एक बहुत पुरानी भूमि संरचना भी है। यह क्षेत्र प्रायद्वीप कहलाता है, क्योंकि यह तीन ओर से - अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और हिंद महासागर द्वारा जल से घिरा है। इसे प्रायद्वीपीय पठार कहा जाता हैं।

यह पठार दो पर्वत श्रृंखलाओं- पश्चिमी घाट और पूर्वी घाट से घिरा हुआ है। पश्चिमी घाट अधिक ऊँचे हैं और प्राचीर की भाँति पश्चिमी तट के साथ फैले हुए हैं। यहाँ कई सुंदर झरने हैं, जो मानसून के मौसम में इसकी खड़ी ढालों पर बहते हैं।

इसे अनदेखा न करें

पश्चिमी घाट को यूनेस्को ने विश्व धरोहर स्थल घोषित किया है। यहाँ अनेक नदियाँ प्रवाहित होती हैं तथा यह क्षेत्र जैव विविधता से परिपूर्ण है। पश्चिमी घाट के उत्तरी भाग को सह्याद्रि पहाड़ियों के नाम से भी जाना जाता है।

पूर्वी घाट अपेक्षाकृत निम्न और छोटे-छोटे पवर्तखंडों में विभाजित हैं, जो पूर्वी तट के साथ फैले हुए हैं। इन दोनों पर्वत श्रृंखलाओं के बीच उच्च समतल भूमि का एक विशाल क्षेत्र दक्कन का पठार है।

गोदावरी, कृष्णा और कावेरी जैसी नदियाँ इस पठार में पश्चिम से पूर्व की ओर प्रवाहित होती हैं। ये नदियाँ कृषि कार्यों के लिए महत्वपूर्ण हैं और लाखों लोगों को जल प्रदान करती हैं।

आइए पता लगाएँ

पुस्तक के अंत में दिए गए भारत के भौतिक मानचित्र को देखिए और नदियों के प्रवाह की दिशा पर ध्यान दीजिए।

यह पठार खनिजों, वनों तथा उपजाऊ भूमि से समृद्ध है, जो इसे भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बनाता है। इस पठार का हल्का ढाल पश्चिम से पूर्व

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चित्र 1.27 - छत्तीसगढ़ के घने जंगल अनेक आदिवासी समुदायों के लिए आवास प्रदान करते हैं।

कुछ मामलों में उनके पावन स्थान संकट में हैं, जिससे संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो रही है।
राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार वाकृतिक संसाधनों की भौगोलिक स्थिति पर निर्भर करता है। मानव ज्ञान और कौशल के संयोजन से 'वूट्ज स्टील' जैसे विलक्षण उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं। जैसा कि हम जानते हैं, व्यापार ने भारत में बड़े साम्राज्यों के विकास को गति दी थी। की ओर है, इसलिए इस क्षेत्र की कुछ नदियाँ बंगाल की खाड़ी की ओर बहती हैं। पूर्व की ओर बहने वाली नदियाँ जैसे- गोदावरी, कृष्णा और महानदी का यहाँ से उद्गम होता है, जो कृषि, उद्योगों और पनबिजली के लिए जल उत्पादन करती हैं। यहाँ पश्चिम की ओर बहने वाली नदियाँ (नर्मदा, ताप्ती) भी हैं, जो अरब सागर में गिरती हैं।

पठार पर स्थित घने जंगल आदिवासी समुदायों की आवास स्थली हैं, जिनमें संथाल, गोंड, बैगा, भील, कोरकु आदि सम्मिलित हैं। इन जनजातियों की विशिष्ट भाषाएँ, परंपराएँ और जीवन-शैलियाँ हैं, जो प्रकृति से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई हैं।

आइए पता लगाएँ

आदिवासी समुदाय मुख्य रूप से झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, असम, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, तेलंगाना और गुजरात राज्यों में बड़े पैमाने पर फैले हुए हैं। इस पुस्तक के अंत में दिए गए राजनीतिक मानचित्र में इन राज्यों की स्थिति का पता लगाइए और इन्हें भौतिक मानचित्र से जोड़ने का प्रयास कीजिए।

भारत में पठारों पर अनेक सुंदर जलप्रपात हैं, क्योंकि यहाँ नदियाँ असमान और चट्टानी सतहों पर प्रवाहित होती हैं। ये जलप्रपात न केवल पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, अपितु जलविद्युत उत्पादन में सहायक होने के साथ-साथ सिंचाई के लिए भी जल उपलब्ध कराते हैं।

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चित्र 1.28 - पेरियाकानल, मुन्नार (केरल) के समीप स्थित पावरहाउस जलप्रपात
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चित्र 1.29 - पश्चिमी घाट में सिंह के समान पूँछ वाला वानर (मकाक)
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चित्र 1.30 - पश्चिमी घाट में किंग कोबरा
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चित्र 1.31 - पश्चिमी घाट में पाया जाने - वाला यह कीटभक्षी पौधा, जो कीट-पतंगो को खाता है। यह चिपचिपे जाल का प्रयोग कर छोटे-छोटे कीट-पतंगों को पकड़ता है और उन्हें खा लेता है।
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चित्र 1.32 - पठारी क्षेत्र की कोयले की खदानें। यह मुख्यतः ताप विद्युत उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण संसाधन हैं। कोयला एक जीवाश्म ईंधन है जिसका उपयोग वैश्विक तापमान में वृद्धि करता है।
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चित्र 1.33 - पश्चिमी तट पर स्थित भारत का वित्तीय केंद्र, मुंबई

भारत की अद्वितीय तटरेखाएँ

भारत की तटरेखाओं पर अनेक सुंदर तट (पुलिन), चट्टानी टीले और हरे-भरे जंगल पाए जाते हैं। कुछ तटों में सुनहरी रेत पाई जाती है, तो कुछ पर काली शैलें पाई जाती हैं। कई द्वीपों पर प्रवाल भित्तियाँ (कोरल रीफ) हैं, तो कई द्वीप घने जंगलों से ढँके हुए हैं। भारत के तट बहुत ही विस्मयकारी हैं। भारतीय तटरेखा 7500 कि.मी. से भी अधिक लंबी है।

आइए पता लगाएँ

  • अपने विद्यालय की मानचित्रावली (स्कूल एटलस) अथवा 'भित्ति-मानचित्र' को देखकर बंगाल की खाड़ी की ओर बहने वाली पाँच नदियों के नाम लिखिए। भारत के तटीय राज्यों का पता लगाइए और भारत के पश्चिमी तथा पूर्वी तटीय मैदानों के मध्य क्या-क्या अंतर हैं, इन पर चर्चा कीजिए।
  • क्या आप जानते हैं कि जब ये नदियाँ तटों के निकट अनेक धाराओं में विभाजित हो जाती हैं, तो इन्हें क्या कहा जाता है? कक्षा में अपने शिक्षक के साथ चर्चा करके पता लगाइए?

भारत का पश्चिमी तट

भारत का पश्चिमी तट गुजरात से लेकर केरल तक विस्तृत है, जो महाराष्ट्र, गोवा और कर्नाटक से होकर गुजरता है। यहाँ की अधिकांश नदियाँ पश्चिमी घाट से निकलकर तेजी से बहते हुए पश्चिमी तटों पर मुहानों (एस्चुरी) का निर्माण करती हैं। यह तटरेखा छोटी-छोटी नदियों और जलोढ़ निक्षेपों द्वारा जमा की गई जलोढ़ मिट्टी तथा अन्य भू-आकृतियों जैसे – सँकरी खाड़ियों (क्रीक्स), एस्चुरी आदि से बनी है। इस तट पर नर्मदा और ताप्ती नदियों के मुहाने सबसे बड़े हैं।

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चित्र 1.34 - पश्चिमी तट के एक भाग का हवाई दृश्य। पश्चिमी घाट की पहाड़ियाँ अरब सागर के कितने समीप हैं, ध्यान दीजिए।

पश्चिमी तट पर अनेक महत्वपूर्ण पत्तन और नगर हैं। वे सहस्त्राब्दियों से भारत की आर्थिक गतिविधियों के केंद्र रहे हैं।

पूर्वी तट

पूर्वी तट, पूर्वी घाट और बंगाल की खाड़ी के मध्य स्थित है। यह गंगा के डेल्टा से कन्याकुमारी तक विस्तृत है। इसमें विस्तृत मैदान और नदियों के डेल्टा हैं, जिनमें महानदी, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी आदि प्रमुख हैं। यहाँ चिल्का झील (ओडिशा में) और पुलिकट झील (आंध्र प्रदेश में) जैसी महत्वपूर्ण लैगून पाई जाती हैं। लैगून एक प्राकृतिक अवरोधक द्वारा बड़े जलाशय से अलग हुई झील होती है।

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चित्र 1.35. - भारत के पूर्वी तट का उपग्रह दृश्य

जब नदियाँ अपने अवसादों को किसी बड़े जलाशय, जैसे – महासागर, झील अथवा अपने मुहाने पर जमा करती हैं, तब बनने वाली भू-आकृति डेल्टा कहलाती है। कालांतर में ये अवसाद एकत्र होकर त्रिभुजाकार अथवा पंखाकार क्षेत्र का निर्माण करते हैं। गोदावरी, कृष्णा, कावेरी और महानदी आदि जैसी नदियाँ उपजाऊ डेल्टा का निर्माण करती हैं, जिससे यह भूमि कृषि कार्यों के लिए अत्यंत उपयुक्त बन जाती है।

भारतीय द्वीपसमूह

हिंद महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में स्थित द्वीपों के समूह को भारतीय द्वीपसमूह कहते हैं, जो भारतीय भू-अधिकार का क्षेत्र हैं। भारत में दो प्रमुख द्वीपसमूह हैं- अरब सागर में लक्षद्वीप द्वीपसमूह और बंगाल की खाड़ी में अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह। इन द्वीपों में अनेक अद्वितीय वन्यजीव, सुंदर तट (पुलिन), प्रवाल भित्तियाँ और ज्वालामुखी पाए जाते हैं। कई प्राचीन जनजातियों ने हजारों वर्ष पूर्व इन द्वीपों को अपना आवास बनाया था।

लक्षद्वीप द्वीपसमूह

लक्षद्वीप द्वीपसमूह (द्वीपों का समूह) है, जो केरल के मालाबार तट के पास अरब सागर में स्थित है। यह मूँगे (कोरल) से बने 36 बड़े द्वीपों का समूह है। सभी द्वीपों पर मानव का निवास नहीं है। भारत का एक विस्तृत समुद्रीय जलक्षेत्र पर नियंत्रण है, जिससे उसे मछली पकड़ने, संसाधनों की खोज और पर्यावरण संरक्षण का भी अवसर मिलता है।

अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह

इस द्वीपसमूह में 500 से अधिक छोटे-बड़े ज्वालामुखी द्वारा निर्मित द्वीप सम्मिलित हैं, जिन्हें दो अलग-अलग समूहों में विभाजित किया जाता है- अंडमान द्वीपसमूह और निकोबार द्वीपसमूह। इनकी भौगोलिक स्थिति अत्यंत महत्वपूर्ण है।

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चित्र 1.36 - लक्षद्वीप द्वीपसमूह में प्रवाल भित्ति
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चित्र 1.37 - अंडमान द्वीपसमूह में प्रवाल भित्ति
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चित्र 1.38- अंडमान द्वीपसमूह के पास भारतीय नौसेना की एक तैरती हुई गोदी (एक छोटा पत्तन)

ये द्वीपसमूह भारत की निगरानी चौकियों की तरह हैं, जो समुद्र पर निगरानी रखते हैं। यहाँ विभिन्न प्रकार की वनस्पतियाँ और जीव-जंतु पाए जाते है। अंडमान द्वीपसमूह ऐतिहासिक रूप से भी महत्वपूर्ण है - हमारे अनेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को यहाँ सबसे कठोर परिस्थितियों में 'सेल्युलर जेल' नामक कारावास में रखा गया था। इसे उनके महान बलिदानों को याद दिलाने के लिए आज भी संरक्षित रखा गया है। यह बलिदान हमारे पूर्वजों ने हमको स्वतंत्र करवाने के लिए दिए थे। हम इसके बारे में उच्च कक्षाओं में और चर्चा करेंगे।

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चित्र 1.39- बैरन द्वीप पर स्थित भारत के एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी का हवाई दृश्य

इसे अनदेखा न करें

अंडमान और निकोबार द्वीपसमूहों मे बैरन द्वीप (चित्र 1.39) भारत का एकमात्र सक्रिय ज्वालामुखी है। यह कभी-कभी सक्रिय होता है जिससे आकाश में धुआँ और लावा फैल जाता है।

पश्चिम बंगाल और सुंदरवन में डेल्टा

जब हम द्वीपों से वापस हिमालय के पूर्वी भाग की ओर बंगाल की खाड़ी से यात्रा करते हैं, तो हमें रास्ते में सुंदरवन दिखाई पड़ते हैं। यह गंगा, बह्मपुत्र और उनकी सहायक नदियों (आपने पूर्व में इस अध्याय में पढ़ा है) के डेल्टा में स्थित है। इस डेल्टा में नदी, सागर और भूमि का अद्वितीय सम्मिश्रण है। इसका लगभग आधा भाग भारत में और शेष भाग बांग्लादेश में है। यह भी एक यूनेस्को धरोहर स्थल है। सुंदरवन रॉयल बंगाल टाइगर सहित अनेक जीव प्रजातियों का आवास है।

चित्र 1.40 - पश्चिम बंगाल के सुंदरवन डेल्टा में मैंग्रोव

नोट - मानचित्र में डेल्टा को चिह्नित कीजिए।

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चित्र 1.41 - सेवन सिस्टर्स जलप्रपात, मेघालय, शाद सुक मिनेसिम उत्सव जो खासी लोगों द्वारा प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने के रूप में मनाया जाता है, जीवित जड़ों से बना पुल, नोंग्रियाट गाँव के समीप, चेरापूंजी, मेघालय (बाएँ से दाएँ और ऊपर से नीचे)

पूर्वोत्तर की पहाड़ियाँ

मानचित्र को देखिए और अब हम पूर्वोत्तर की पहाड़ियों की तरफ बढ़ रहे हैं, जो हमारी यात्रा का अंतिम गंतव्य है। क्या आप मानचित्र पर दिखाई गई गारो, खासी और जयंतिया पहाड़ियों को देख सकते हैं? मेघालय पठार की ये पहाड़ियाँ अपनी हरियाली, भारी वर्षा और लुभावने जलप्रपातों के लिए जानी जाती हैं। यह विश्व के सर्वाधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में से एक है जो इसे जंगल, अद्वितीय वन्यजीवों और उपजाऊ भूमि से समृद्ध बनाता है।

इसे अनदेखा न करें

मेघालय के पूर्वी खासी पहाड़ियों में स्थित मावलिननॉन्ग गाँव 'एशिया के सबसे स्वच्छ गाँव' के रूप में प्रसिद्ध है। यह रमणीय गाँव अपनी स्वच्छता, बाँस के कूड़ेदान, पर्यावरणीय अनुकूल जीवनशैली के लिए प्रसिद्ध है। यह गाँव अपनी जीवित जड़ों से बने पुलों (लिविंग रूट्स पुल) के लिए भी जाना जाता है, जो कई वर्षों के दौरान पेड़ों की जड़ों को मिलाकर बनाए जाते हैं।

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चित्र 1.42 - पूर्वोत्तर की जनजातियों के शिल्प कौशल को प्रदर्शित करता जीवित जड़ों का एक पुल (लिविंग रूट्स पुल)

आगे बढ़ने से पहले...

  • भारत, जिस उपमहाद्वीप का अंग है, उसे अपना नाम प्रदान करता है।
  • इसमें विविध भौगोलिक विशेषताएँ हैं, जिनमें बर्फीले हिमालय से लेकर गर्म थार मरुस्थल सम्मिलित हैं। मैदानी क्षेत्रों को अनेक नदियों द्वारा सींचा जाता है। यहाँ एक प्रायद्वीपीय पठार भी है, जिसके पश्चिम में अरब सागर तथा पूर्व में बंगाल की खाड़ी स्थित है।
  • इन विविध भौगोलिक विशेषताओं ने मिट्टी, वनस्पतियों, जीव-जंतुओं, जीवन और आर्थिक अवसरों से संबंधित अनेक परिस्थितियों का सृजन किया है और एक समृद्ध संस्कृति का निर्माण किया है।
  • इन भौगोलिक विशेषताओं ने हमारी सभ्यता को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

प्रश्न और क्रियाकलाप

  1. . आपकी राय में भारत की दो महत्वपूर्ण भौगोलिक विशेषताएँ क्या हैं? आपके विचार में वे क्यों महत्वपूर्ण हैं?
  2. आपके विचार में यदि हिमालय नहीं होता तो भारत का स्वरूप कैसा होता? अपनी कल्पना को व्यक्त करने के लिए एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए अथवा चित्र द्वारा अभिव्यक्त कीजिए।।
  3. अध्याय में दी गई जानकारी के आधार पर बताइए कि भारत को 'लघु महाद्वीप' क्यों कहा जाता है?
  4. भारत की किसी प्रमुख नदी को मानचित्र में देखिए। इसका उद्गम कहाँ है और यह समुद्र में कहाँ मिलती है? इसकी यात्रा के दौरान लोग इस नदी का विभिन्न प्रकार से कैसे उपयोग करते हैं? अपनी कक्षा में इस पर चर्चा कीजिए।
  5. भारत के दक्षिणी भाग को प्रायद्वीपीय पठार क्यों कहा जाता है?
  6. इस अध्याय में वर्णित यूनेस्को द्वारा मान्यता प्राप्त कौन-से धरोहर स्थल आपको अधिक रूचिकर लगे? इसके रोचक तथ्यों का संक्षिप्त में वर्णन कीजिए।
  7. इस पुस्तक के अंत में दिए गए भारत के भौतिक और राजनीतिक मानचित्रों को देखिए। आप अभी जिस क्षेत्र में हैं, उसकी पहचान कीजिए। आप भारत की किस भौतिक विशेषता का उपयोग इस स्थान का वर्णन करने के लिए करेंगे?
  8. भारत में खाद्य संरक्षण के उपाय जगह-जगह पर भिन्न हैं, जो स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप होते हैं। 'कक्षा परियोजना' के अंतर्गत खाद्य संरक्षण के विभिन्न उपायों के बारे में जानकारी एकत्रित कीजिए। (संकेत – मौसमी (ऋतु विशेष में उपलब्ध) सब्जियों को सुखाकर उन्हें अन्य ऋतुओं में उपयोग हेतु सुरक्षित रखना।)
  9. इतने अलग-अलग भौतिक स्वरूपों (पर्वतीय, मरुस्थलीय, मैदानी, तटीय इत्यादि) के साथ भारत एक विशाल देश है। भारत की भौगोलिक स्थिति ने लोगों को एकजुट रहने में किस प्रकार सहायता की है। इसके बारे में आपका क्या विचार है?