अध्याय - 3
भारत की जलवायु
काले वर्षतु पर्जन्यः। पृथिवी सस्यशालिनी।
देशोऽयं क्षोभरहितः। ब्राह्मणास्सन्तु निर्भयाः।।
वर्षा समय पर हो, पृथ्वी अन्न से समृद्ध हो।
यह देश अशांति रहित हो, विद्वान लोग भय रहित हों।
– सुभाषितानि

महत्वपूर्ण प्रश्न ?
- भारतीय जलवायु को कौन-कौन से तत्व विविध बनाते हैं?
- मानसून क्या है? यह कैसे बनता हैं?
- जलवायु का समाज, संस्कृति और आर्थिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ता है?
- जलवायु की समझ हमें प्राकृतिक आपदा के लिए तैयार रहने में किस प्रकार सहायता करती है?
- जलवायु परिवर्तन क्या है? इसके परिणाम क्या-क्या होते हैं?
मौसम, ऋतुएँ और जलवायु
'जलवायु' एक ऐसा शब्द है, जिसका प्रयोग लोग सामान्यतः दैनिक बातचीत में करते हैं। प्रायः इसका तात्पर्य मौसम से होता है, जलवायु से नहीं। दोनों में क्या अंतर है? मौसम वह है, जिसे हम प्रतिदिन या हर घंटे अनुभव करते है जैसे – वर्षा, तेज धूप या तेज हवा। यह समय-समय पर परिवर्तित होता रहता है। दूसरी ओर, जलवायु मौसम का वह प्रतिरूप है, जो किसी क्षेत्र या प्रदेश में लंबे समय तक कम से कम कई दशकों तक अनुभव किया जाता है। ये प्रतिरूप क्षेत्रानुसार अलग-अलग होते हैं।
इससे पहले कि हम विभिन्न प्रकार की जलवायु पर चर्चा करें, आइए संक्षेप में ऋतुओं के विषय में जान लें। पृथ्वी सूर्य का परिक्रमण करती है, जिससे ऋतुओं का निर्माण होता है। प्रत्येक ऋतु कुछ महीनों तक रहती है और प्रतिवर्ष पुनः आती है। जैसा कि हम जानते हैं, एक वर्ष में अनेक ऋतुएँ होती हैं, जैसे- बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद और शीत। ये ऋतुएँ क्रमश: एक चक्र के रूप में आती हैं। अब प्रश्न उठता है कि ऋतुओं का संबंध मौसम से है या जलवायु से? इसका उत्तर है, दोनों से।
मौसम ऋतुओं के अनुसार परिवर्तित होता है, जो गर्मी में शुष्क एवं गर्म और मानसून में आर्द्र और वर्षा वाला होता है। किसी भी क्षेत्र विशेष की ऋतुओं के प्रतिरूप का वहाँ की जलवायु से गहरा संबंध होता है। विश्व के अधिकतर क्षेत्रों में चार मुख्य ऋतुएँ होती हैं— बसंत, ग्रीष्म, शरद और शीत। यद्यपि इन चार ऋतुओं के साथ ही भारत में वर्षा ऋतु भी होती है, क्योंकि यहाँ वर्षा एक वर्ष में विशिष्ट समय में वर्षा ऋतु या 'मानसून' में ही होती है।

यदि हम अपने आस-पास की दुनिया का अवलोकन करें, तो हम पाएँगे कि मानव, पौधे और पशु जीवन ऋतुओं के साथ सामंजस्य में हैं। हम जो फसलें उगाते हैं, भोजन करते हैं, वस्त्र पहनते हैं, ये सभी मौसम के अनुसार बदलते रहते हैं। क्षेत्रानुसार, वसंत की शुरुआत में कुछ पेड़ और झाड़ियाँ खिलती हैं। कुछ स्थानों पर वृक्ष अपने पत्ते गिरा देते हैं या शरद ऋतु के आते ही अपना रंग बदल लेते हैं और कुछ पशुओं के शरीर पर ठंड के महीनों में घने बाल विकसित हो जाते हैं।
आइए पता लगाएँ
- आपकी प्रिय ऋतुएँ कौन-सी हैं? अपने कारणों सहित इस पर एक संक्षिप्त निबंध लिखिए।
- आपके क्षेत्र में ऋतुओं से जुड़ी विशेष घटनाओं का पता लगाने के लिए तीन या चार विद्यार्थियों के समूह में चर्चा कीजिए। इनसे संबंधित गीत, उत्सवों से संबंधित भोजन, विभिन्न ऋतुओं से संबंधित प्रचलित प्रथाएँ आदि को लिखिए और कक्षा के साथ साझा कीजिए।
- क्या आप जानते हैं कि आपके क्षेत्र में कौन-से वृक्ष शीत ऋतु के आगमन से पूर्व अपना रंग बदलते हैं? क्या ऐसे वृक्ष हैं, जो इस समय अपने पत्ते गिरा देते हैं? आपके विचार में ऐसा क्यों होता है? इन वृक्षों के स्थानीय नामों का पता लगाइए और उनके विषय में लिखिए।
सामान्यतया, जलवायु लंबे समय तक स्थिर बनी रहती है। हालाँकि वैज्ञानिक हाल के दशकों में विश्व की जलवायु में परिवर्तन का अंकन कर रहे हैं। अध्ययनों से ज्ञात होता है कि इनमें से कई परिवर्तन मानवीय क्रियाकलापों के परिणामस्वरूप हो रहे हैं।
आइए पुनरावलोकन करें –
- मौसम वह है जिसे हम दिन-प्रतिदिन अनुभव करते हैं, जैसे- तेज हवाएँ, वर्षा, गर्मी, सूखा, आदि।
- ऋतुएँ प्रतिवर्ष आती हैं और प्रत्येक ऋतु में किसी स्थान का मौसम भिन्न होता है।
- जलवायु किसी विशेष क्षेत्र में दीर्घकालिक मौसमी प्रतिरूप है। विश्व में विविध प्रकार की जलवायु पाई जाती हैं। अब हम भारत में पाई जाने वाली जलवायु के प्रमुख प्रकारों के बारे में जानेंगे।
भारत में जलवायु के प्रकार
जैसा कि हम जानते हैं, भारत विविधताओं का देश है। यह बात इसकी जलवायु के बारे में भी उतनी ही सत्य है -
- उत्तर में हिमालय पर्वतों में अल्पाइन जलवायु मिलती है, जहाँ शीत ऋतु अत्यधिक ठंडी और बर्फीली होती है तथा ग्रीष्म ऋतु शीतल होती है (अल्पाइन शब्द 'आल्प्स' से आया है, जो यूरोप की एक पर्वत श्रृंखला है)। संभवतः यहीं पर आपको भारत में सबसे अधिक मोटे कपड़े पहने लोग देखने को मिलेंगे।
- हिमालय के निचले क्षेत्रों और भारत के अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में जलवायु प्रायः समशीतोष्ण (टेंपरेट) कही जाती है, क्योंकि सर्दियाँ कम ठंडी होती हैं और गर्मियाँ बहुत अधिक गर्म नहीं होती हैं। यहीं पर हमें कई 'पर्वतीय पर्यटन स्थल' मिलते हैं जहाँ मैदानी क्षेत्रों की गर्मी से राहत पाने के लिए प्रायः लोग आते हैं।
- उत्तरी मैदानों में जलवायु उपोष्ण कटिबंधीय (सब-ट्रॉपिकल) है, जहाँ ग्रीष्मकाल अत्यधिक गर्म और शीत ऋतु ठंडी होती हैं। यहीं पर भारत का अधिकांश गेहूँ उगाया जाता है।
- पश्चिम में थार मरूस्थल की जलवायु शुष्क होती है, जहाँ दिन अत्यधिक गर्म, रातें ठंडी और वर्षा बहुत कम होती है। वहाँ के लोगों ने जल संग्रह करने और बचाने के लिए अनोखे उपाय विकसित किए हैं।
- पश्चिमी तटीय पट्टी में मानसून के महीनों में भारी वर्षा होती है, जिससे उष्णकटिबंधीय आर्द्र जलवायु बनती है, जो चावल और मसालों की खेती के अनुकूल है।
- मध्य दक्कन पठार की जलवायु अर्ध-शुष्क है, जिसमें ग्रीष्मकाल गर्म, सर्दियाँ हल्की ठंडी और वर्षा ऋतु में सामान्य वर्षा होती है।
- पूर्वी भारत और दक्षिणी प्रायद्वीप में हल्की सर्दी और मानसूनी हवाओं द्वारा नियंत्रित अलग-अलग आर्द्र और शुष्क अवधियों के साथ उष्णकटिबंधीय (ट्रॉपिकल) जलवायु का अनुभव होता है। आप इनके विषय में आगे पढेंगे।

नोट - आप उष्णकटिबंधीय और उपोष्णकटिबंधीय शब्दों का अर्थ आगे समझेंगे, जो उष्णकटिबंधीय कहे जाने वाली दो विशेष समांतर अक्षांश रेखाओं से संबंधित हैं।
जलवायु निर्धारित करने वाले कारक
विभिन्न प्रकार की जलवायु का निर्माण किन कारणों से होता है? अनेक कारक इसके लिए उत्तरदायी होते हैं। वैश्विक स्तर पर कुछ सामान्य कारक हैं जबकि कुछ कारक क्षेत्रीय या स्थानीय होते हैं। आइए कुछ मुख्य कारकों को समझे -
क) अक्षांश
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भूमध्य रेखा के पास स्थित स्थान जो निम्न अक्षांशों पर हैं, वे गर्म रहते हैं, जबकि ध्रुवों (उच्च अक्षांशों) के पास स्थित स्थान ठंडे होते हैं। ऐसा उस कोण के कारण होता है जिस पर सूर्य की किरणें किसी क्षेत्र विशेष पर पड़ती हैं। भूमध्य रेखा पर किरणें लगभग लंबवत होती हैं, जिससे उनकी संपूर्ण ऊर्जा पृथ्वी की सतह के एक छोटे-से क्षेत्र पर केंद्रित होती है। ध्रुवीय क्षेत्रों में किरणें झुकी हुई या तिरछी होती हैं और ऊर्जा एक बड़ी सतह पर वितरित होती है। इसके अतिरिक्त उन्हें पृथ्वी के वायुमंडल के बहुत बड़े भाग से लंबी दूरी पार करके गुजरना पड़ता है, जैसा कि चित्र 3.4 में दिखाया गया है, जिससे उनकी ऊर्जा और भी अधिक नष्ट हो जाती है। परिणामस्वरूप, ध्रुवीय क्षेत्रों को विषुवत रेखीय क्षेत्रों की तुलना में कम ताप मिलता है। हम इसे भारत में भी देख सकते हैं- कन्याकुमारी और निकोबार द्वीपसमूह भूमध्य रेखा के निकट होने के कारण लगभग पूरे वर्ष गर्म रहते हैं, जबकि उत्तर में स्थित श्रीनगर जैसे स्थान बहुत ठंडे होते हैं।
ख) ऊँचाई (एल्टीट्यूड)
हमने पाठ में पर्वतीय पर्यटक स्थलों के विषय में पढ़ा है, जो अपनी ठंडी जलवायु के कारण लोकप्रिय पर्यटन केंद्र हैं। भारत में ऐसे कई स्थान हैं जिनमें मुन्नार, थेनी, उधगमंडलम (ऊटी), मदिकेरी, महाबलेश्वर, माउंट आबू, शिमला, नैनीताल, दार्जिलिंग, तवांग, शिलांग आदि प्रमुख हैं। हम जानते हैं कि ये स्थान मैदानों की तुलना में अधिक ऊँचाई पर स्थित हैं, लेकिन यह उनके ठंडे तापमान की व्याख्या कैसे करता है? आप इसका पूर्ण उत्तर बाद में अपनी विज्ञान की कक्षाओं में जानेंगे।
सरल रूप में कह सकते हैं कि जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ती है, साथ-साथ तापमान भी कम होता जाता है क्योंकि --

- ऊँचाई बढ़ने के साथ वायुमंडलीय दबाव और उसके परिणामस्वरूप वायु का घनत्व कम हो जाता है और जैसे-जैसे वायु का घनत्व कम होता जाता है, वायु ठंडी होती जाती है (जैसा कि हमने 'मौसम को समझना' वाले अध्याय में पढ़ा था)।
- सूर्य पृथ्वी की सतह को गर्म करता है। इसलिए सतह से जितनी अधिक दूरी होगी, हवा उतनी ही कम गर्म होगी। हिमालय इतना ऊँचा है कि इसके कई शिखरों पर तापमान जल के हिमांक से नीचे रहता हैं, जिससे वे हिम से ढँके रहते हैं।
आइए पता लगाएँ
उधगमंडलम (ऊटी) एवं कोयंबटूर लगभग समान अक्षांशों पर स्थित हैं। ऊटी में गर्मी का तापमान 10-25 डिग्री सेल्सियस जबकि कोयंबटूर में 25-38 डिग्री सेल्सियस होता है। इन दो स्थानों पर तापमान में यह अंतर क्यों है? इस बारे में आप क्या सोचते हैं?
ग) समुद्र से निकटता
तटीय क्षेत्रों में तापमान में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं होता, गर्मियाँ बहुत अधिक गर्म नहीं होतीं और सर्दियाँ बहुत अधिक ठंडी नहीं होतीं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि समुद्र तापमान को नियंत्रित करता है। यह चित्र इस घटना का विवरण प्रस्तुत करता है। आपकी विज्ञान की पाठ्यपुस्तक भी तटीय क्षेत्रों में भूमि और जल के गर्म होने एवं ठंडा होने पर चर्चा करते हुए इसे और विस्तार से समझाती है। परिणामस्वरूप यह क्षेत्र समशीतोष्ण रहता है। किंतु जैसे-जैसे आप तट से स्थल की ओर बढ़ते हैं, तापमान अधिक होता जाता है- ग्रीष्म काल में तापमान अधिक और सर्दियों में तापमान कम हो जाता है। उदाहरण के लिए, मुंबई और नागपुर एक समान अक्षांश पर स्थित हैं, लेकिन मुंबई, समुद्र के पास होने के कारण, ग्रीष्म काल में ठंडा रहता है (लगभग 32 डिग्री सेल्सियस) और यहाँ हल्की सर्दी (लगभग 18 डिग्री सेल्सियस) होती है। जबकि तट से दूर होने के कारण नागपुर में ग्रीष्म काल में तापमान लगभग 44 डिग्री सेल्सियस और शीत काल में लगभग 10 डिग्री सेल्सियस तक होता है। आप देख सकते हैं कि मुंबई में ताप परिसर (अधिकतम एवं न्यूनतम तापमान के बीच का अंतर) लगभग 14 डिग्री सेल्सियस होता है और जबकि नागपुर में यह अंतर 34 डिग्री सेल्सियस तक पहुँच जाता है।

घ) पवनें
पवन गर्म या ठंडी वायुराशियों को संचालित करती हैं। पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में प्रायः पवनें पश्चिम से चलती हैं। ये पवनें अरब के रेगिस्तान से चलकर अफगानिस्तान होते हुए, शुष्क और गर्म पवनें लेकर आती हैं जो ग्रीष्म काल में भयंकर ताप लहर (हीट वेव) का कारण बनती हैं। सर्दियों में, हिमालय से ठंडी पवनें हिमालय के गिरिपाद (फूट हिल्स) में नीचे की ओर प्रवेश कर जाती हैं, जिससे शीत लहरें पैदा होती हैं।

पवनें न केवल तापमान को प्रभावित करती हैं, बल्कि आर्द्रता और उसके परिणामस्वरूप होने वाले वर्षण को भी प्रभावित करती हैं। जैसा कि हमने देखा, मरुस्थलों से आने वाली हवाएँ शुष्क होती हैं, इसके विपरीत, समुद्र से आने वाली पवनें धरातल पर नमी लाती हैं, जिसके परिणामस्वरूप वर्षा हो सकती है। हम शीघ्र ही मानसूनी पवनों के बारे में भी जानेंगे।
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कक्षा 6 की विज्ञान की पाठ्यपुस्तक जिज्ञासा में आप जल-चक्र के बारे में पढ़ चुके हैं! “महासागर और पृथ्वी की सतह से पानी वाष्प के रूप में वायुमंडल में चला जाता है और वर्षा, ओले या हिम के रूप में वापस पृथ्वी पर लौटता है..."
ङ) स्थलाकृति (टोपोग्राफी)
किसी क्षेत्र की स्थलाकृति भी वहाँ की जलवायु को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उदाहरण के लिए, हिमालय और कराकोरम पर्वतमालाएँ भारतीय उपमहाद्वीप को मध्य एशिया के ठंडे रेगिस्तानों की पवनों से बचाती हैं। दूसरी ओर, थार मरुस्थल की लगभग समतल स्थलाकृति के कारण गर्म और शुष्क हवाओं से बचाव के लिए कोई अवरोध नहीं है। अगले भाग में हम भारत के दक्षिण-पश्चिमी मानसून में पश्चिम घाट की भूमिका को समझेंगे।
अब यह सब एक साथ देखें...
किसी भी क्षेत्र की जलवायु उपर्युक्त सभी कारकों द्वारा सामूहिक रूप से निर्धारित होती है। जलवायु में तीन दशक या उससे अधिक समय में किसी क्षेत्र में तापमान, वर्षण (वर्षा या हिमपात, कोहरा या धुंध की घटना) और पवन की दशा के प्रतिरूप का वर्णन सम्मिलित होता है।
सूक्ष्म जलवायु से तात्पर्य एक छोटे से क्षेत्र में स्थानीयकृत जलवायु से है जो आस-पास के क्षेत्र की जलवायु से अलग होती है। इसमें एक छोटे भौगोलिक क्षेत्र में तापमान, आर्द्रता, वर्षा आदि का एक अनूठा प्रतिरूप होता है।

उदाहरण के लिए, संकीर्ण घाटियों और कुछ जंगलों की अपनी सूक्ष्म जलवायु होती है। इसी प्रकार 'नगरीय ऊष्मा द्वीप' में भी ऐसा ही होता है। ऐसे शहर, जिनमें बड़ी संख्या में इमारतें और अन्य कंक्रीट संरचनाएँ होती हैं और वनस्पति बहुत कम होती है, ये सभी वहाँ से ऊष्मा को बाहर जाने से रोकते हैं। ऐसे स्थान प्रायः आस-पास के क्षेत्र की तुलना में बहुत गर्म हो जाते हैं।
सूक्ष्म जलवायु स्थानीय वनस्पतियों और जीव-जंतुओं, उगाई जाने वाली फसलों तथा मानव स्वास्थ्य और कल्याण पर प्रभाव डाल सकती है।
इसका तात्पर्य यह नहीं है कि वायुमंडलीय दाब नीचे के मैदानों में अथवा तटों पर हमेशा अधिक होता है। यह कभी-कभी नाटकीय रूप से गिर जाता है और इसे मौसम-विज्ञानी गर्त (डीप्रेशन) अथवा निम्न दबाव तंत्र (लो प्रेशर सिस्टम) कहते हैं, जो कभी-कभी तूफान अथवा चक्रवात का रूप भी ले सकता हैं।
मानसून
मानसून भारत में जीवन का केंद्र है। मानसून के महीनों के दौरान नदियाँ जल से भर जाती हैं, मिट्टी में नमी आ जाती है, फसलें उगती हैं और जीवन फलता-फूलता है। शाब्दिक रूप से, 'मानसून' शब्द अरबी भाषा के शब्द 'मौसिम' से आया है, जिसका अर्थ है ऋतु - यह शब्द हिंद महासागर, ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका और दक्षिण एशिया सहित आस-पास के क्षेत्रों में मौसमी पवनों के संदर्भ में प्रयुक्त होता है।
मानसून का एक वार्षिक प्रतिरूप होता है। मानसून की क्रिया-विधि जटिल होती है, परंतु यह इस साधारण तथ्य पर आधारित है कि भूमि समुद्र की तुलना में शीघ्रता से गर्म या ठंडी होती है। मानसून तापमान, वायुदाब और पवन की गति के बीच मूलभूत संबंधों को सामने लाता है।
सरल शब्दों में कहें तो जैसे ही ग्रीष्म ऋतु आरंभ होती है, एशियाई भूभाग गर्म हो जाता है जिससे उस पर एक शक्तिशाली निम्न-दबाव क्षेत्र बन जाता है। चूँकि पवन हमेशा उच्च दाब से निम्न दाब की ओर बहती है, इसलिए पवनें ठंडे, उच्च दाब वाले महासागर से गर्म भूभाग की ओर चलती हैं। ये समुद्री पवनें नमी लेकर आती हैं, जो गर्म भूभाग पर संघनित होती हैं और फिर भारी मानसूनी वर्षा होती है। इसलिए मानसून का अर्थ सामान्यतया पवनों की अपेक्षा मौसमी वर्षा से होता है।
सर्दियों में यह प्रतिरूप विपरीत हो जाता है, जब स्थलभाग समुद्र की तुलना में शीघ्रता से ठंडा होता है। अब स्थलभाग पर उच्च दबाव क्षेत्र विकसित होता है जबकि समुद्र अपेक्षाकृत कम दबाव के कारण गर्म रहता है। इससे पवनें विपरीत दिशा में चलती हैं अर्थात भूमि से समुद्र की ओर, जिससे एशिया के अधिकांश भाग में शुष्क परिस्थितियाँ बन जाती हैं।
भारत की बात करें तो मानसून की वर्षा सामान्यतया जून की शुरुआत में भारत के दक्षिणी सिरे से प्रवेश करती हैं और कुछ सप्ताह में उत्तर की ओर बढ़ती है। जुलाई के मध्य तक यह संपूर्ण उपमहाद्वीप पर फैल जाती है। हालाँकि, यह सरलता से आगे नहीं बढ़ती है। पश्चिमी घाट (स्थलाकृति के हमारे संक्षिप्त सर्वेक्षण को याद रखें) एक प्राकृतिक अवरोध के रूप में कार्य करता है। फलस्वरूप उनके पश्चिमी ढलानों पर बहुत अधिक वर्षा होती है जबकि पूर्वी ढलान में दक्कन पठार पर कम और प्रायः अंतरालों के साथ वर्षा होती है। इसे सामान्यतया ग्रीष्मकालीन या दक्षिण-पश्चिम मानसून कहा जाता है। यह 'दक्षिण-पश्चिम' पवनों की दिशा को दर्शाता है।
शीत ऋतु के आगमन पर पवनों की दिशा में परिवर्तन हो जाता है। इस समय हवाएँ भूभाग से समुद्र की ओर प्रवाहित होती है। शुष्क हवाएँ दक्षिण भारत में ठंड प्रारंभ कर देती हैं लेकिन इनका एक भाग बंगाल की खाड़ी से गुजरते हुए कुछ नमी ग्रहण कर दक्षिण-पूर्व भारत के कुछ भागों में वर्षा करने में सक्षम होता है। इसे शीत या उत्तर-पूर्व मानसून कहा जाता है।
इसे अनदेखा न करें
- मेघालय स्थित मौसिनराम विश्व की सर्वाधिक, लगभग 11000 मि.मी. (11 मीटर) औसत वार्षिक वर्षा प्राप्त करता है।

चित्र 3.10 - मानसून ने कर्नाटक और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में अनेक रागों को प्रेरित किया है। 'मेघमल्हार' और 'अमृतवर्षिणी' उनमें से कुछ प्रमुख हैं।
आइए पता लगाएँ
भारत में मानसूनी वर्षा का पूर्वानुमान सदैव से ही जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष रहा है। हमारे पूर्वजों ने अपने आस-पास की प्रकृति के संकेतों को ध्यान से देखा और अपने अनुभवों से स्थानीय पारंपरिक ज्ञान विकसित किया। यह पारंपरिक ज्ञान एक महत्वपूर्ण विरासत है, जिसे हमें संरक्षित करना चाहिए। उदाहरण के लिए, कोंकण तट पर मछुआरे मानसून के आगमन की भविष्यवाणी करते हैं, जब जल के नीचे रहने वाली मछलियाँ सतह पर दिखाई देने लगती हैं। दक्षिण भारत के कुछ भागों में यह माना जाता है कि मानसून गोल्डन शॉवर ट्री या अमलतास (कैसिया फिस्टुला) के खिलने के 50 दिनों के भीतर आ जाता है। कुछ समुदायों का यह भी मानना है कि जब कौए अपने घोंसले पेड़ की चोटी पर बनाते हैं तो यह कम वर्षा का संकेत देता है, जबकि अगर घोंसले नीचे हैं तो भारी वर्षा होने की संभावना होती है। अपने क्षेत्र में वर्षा, कोहरे, हिम या सहिमवृष्टि के बारे में ऐसे स्थानीय ज्ञान की एक सूची बनाइए।
जलवायु और हमारा जीवन
हमारे जीवन का जलवायु से गहन संबंध है और हम इस पर निर्भर हैं। उदाहरण के लिए, जलवायु का प्रभाव स्थानीय संस्कृतियों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। भारत में ऋतुओं और कृषि गतिविधियों से संबंधित अनेक त्योहार मनाए जाते हैं।
आइए पता लगाएँ
अपने दादाजी-दादीजी या पड़ोस के वृद्धजनों से संपर्क कीजिए। उनसे उनके बचपन और युवावस्था में मनाए जाने वाले पारंपरिक त्योहारों और नृत्यों के बारे में पूछिए, जो उन्हें याद हैं, विशेषकर जो कृषि और वर्षा से संबंधित थे। वे किन रीति-रिवाजों में भाग लेते थे? फिर अपने साथियों के साथ एक सांस्कृतिक उत्सव का आयोजन कीजिए। आप अपने वयोवृद्धों द्वारा साझा किए गए कुछ नृत्यों, गीतों और गतिविधियों को वहाँ प्रदर्शित कर सकते हैं - चाहे वह फसल की रस्म हो या वर्षा के देवताओं की प्रार्थना के बारे में एक सरल कहानी या कोई नृत्य हो। अपने सहपाठियों के लिए इन परंपराओं को जीवंत करने का प्रयास कीजिए।
जलवायु का प्रत्यक्ष प्रभाव अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। प्रायः आपने यह सुना होगा कि 'मानसून फेलियर' हो गया, जिसका अर्थ है- मानसून के मौसम में वर्षा का कम होना। ऐसे समय में कृषि प्रभावित होती है, लोगों (सामान्यतः महिलाओं) को जल की तलाश में लंबी दूरी तय करनी पड़ती है और कृषि श्रमिकों के नगरों की ओर
जलवायु का प्रत्यक्ष प्रभाव अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। प्रायः आपने यह सुना होगा कि 'मानसून फेलियर' हो गया, जिसका अर्थ है- मानसून के मौसम में वर्षा का कम होना। ऐसे समय में कृषि प्रभावित होती है, लोगों (सामान्यतः महिलाओं) को जल की तलाश में लंबी दूरी तय करनी पड़ती है और कृषि श्रमिकों के नगरों की ओर
पलायन की संभावना होती है। खाद्यान्न (बड़े पैमाने पर अनाज, सब्जियाँ और फल) महँगे हो जाते हैं जिससे मुद्रास्फीति बढ़ जाती है। औद्योगिक गतिविधि भी प्रायः पूर्वानुमानित मौसम और जल की उपलब्धता पर निर्भर करती है। विश्व भर में हम जलवायु और सामाजिक-आर्थिक स्थितियों के बीच ऐसे संबंधों को सरलता से पहचान सकते हैं। जब जलवायुजन्य आपदाएँ आती हैं, तो ये स्थितियाँ विशेष रूप से तनावपूर्ण हो जाती हैं।जलवायु और आपदाएँ
भारत में मौसम के विविध स्वरूप चरम स्थितियों, जैसे- चक्रवात, बाढ़, भूस्खलन और जलवायु संबंधी विकट आपदाओं को जन्म दे सकते हैं। ये घटनाएँ लोगों के जीवन को प्रभावित करती हैं, कृषि को बाधित करती हैं, आधारभूत ढाँचे को क्षति पहुँचाती हैं और स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित करती हैं।
क) चक्रवात
प्रतिवर्ष भारतीय तटरेखा, विशेष रूप से पूर्वी तट, कई चक्रवातों का सामना करता है। गत वर्षों में इनमें से कुछ अत्यधिक विनाशकारी रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप मानव और पशु जीवन की हानि हुई, संपत्ति और आधारभूत ढांचे को नुकसान पहुँचा, पेड़ उखड़ गए और मृदा अपरदन (मिट्टी का कटाव) हुआ। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग आने वाले चक्रवातों पर नजर रखता है और उनके बनने, विकास और प्रभावित होने वाले क्षेत्र आदि के बारे में पूर्व जानकारी प्रदान करता है।
इसे अनदेखा न करें
राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया बल (नेशनल डिजास्टर रिसपॉन्स फोर्स - एन.डी.आर.एफ.) को प्राकृतिक और मानव-निर्मित आपदाओं से निपटने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जाता है। एन.डी.आर.एफ. बटालियन भारत में 12 अलग-अलग स्थानों पर स्थित हैं। एन.डी.आर.एफ. ने चक्रवात, भूस्खलन और बाढ़ जैसी आपदाओं के दौरान बचाव एवं राहत कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

चक्रवात कैसे बनते हैं? हमने देखा कि कुछ विशेष परिस्थितियों में समुद्र के पास वायुमंडलीय दबाव आस-पास के क्षेत्रों की तुलना में कम हो जाता है, जिससे निम्न दबाव तंत्र बनता है। यह स्थिति आस-पास के क्षेत्रों से पवन को निम्न दबाव क्षेत्रों की ओर खींचती है और धीरे-धीरे यह निम्न दबाव का क्षेत्र समुद्र से स्थल की ओर बढ़ता जाता है।
यह पवन अपने साथ नमी और वर्षा लाती है। जब निम्न दबाव तंत्र तीव्र होता है और पवन की गति अधिक होती है, तो इसका परिणाम चक्रवात हो सकता है।
जैसे ही पवन नमी एकत्र करती हैं, वे बादल बनाती हैं और बाहर से अवदाब केंद्र की ओर घूमती हैं। यह केंद्र जो कि बादलरहित होता है, उसे 'चक्रवात की आँख' कहा जाता है।
आइए विचार करें
बादल क्या हैं? आप कह सकते हैं कि ये आकाश में सफेद गुच्छे हैं। लेकिन ये किससे बने हैं? इसका उत्तर सरल है- जल। लेकिन ये केवल जल नहीं हैं। बादल जल की बूँदें और हिम के टुकड़े या दोनों का मिश्रण होते हैं, जो वायुमंडल में लटके रहते हैं।
ख) बाढ़
सामान्य रूप से जब शुष्क भूमि पर जल का अति प्रवाह होने लगता है, तो बाढ़ आती है। ऐसा भारी वर्षा के कारण हो सकता है जिससे सतह पर अत्यधिक जल बहने लगता है, जिसे भूमि सोख नहीं पाती। नदियों और झीलों जैसे निकायों में जल का अत्यधिक संचय हो जाता है, जिससे जल बाहर बहने लगता है और किनारे टूट जाते हैं। प्रायः बाढ़ मानसून के दौरान आती है। असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, केरल और आंध्र प्रदेश जैसे राज्य बाढ़ के लिए विशेष रूप से संवेदनशील हैं।


आइए पता लगाएँ
क्या आपने कभी बाढ़ देखी है अथवा इसके विषय में पढ़ा है? भारत के भौतिक मानचित्र को देखिए। समूह में चर्चा कीजिए कि बताए गए राज्यों में बाढ़ क्यों आती है?
दूसरी ओर, हिमालय क्षेत्र में बाढ़ तब आती है जब हिमनदीय झीलें सामान्य से अधिक मात्रा में जल निकास करने लगती हैं। हिमनदीय झीलें अपने जल को रोकने के लिए चट्टानों और हिम का एक अवरोध बनाती हैं जो प्राय: पिघलते हिमनदों से आता है। यदि हिमनद बहुत तेजी से पिघलते हैं (जैसा कि प्रायः होता है) या यदि बहुत अधिक वर्षा होती है तो दबाव के कारण जल अवरोध को तोड़ सकता है। इसे हिमनदीय विस्फोट (ग्लेशियल बर्स्ट) कहा जाता है। लोगों और संपत्ति के लिए यह विनाशकारी होता है।
इसे अनदेखा न करें
2013 में उत्तराखंड में कई दिनों तक लगातार भारी वर्षा के कारण अचानक हिमनदीय विस्फोट हो गया। इसके बाद कई भूस्खलन हुए। भारत के महत्वपूर्ण पवित्र स्थलों में से एक केदारनाथ मंदिर के आस-पास का क्षेत्र पूरी तरह से नष्ट हो गया। बाढ़ में कई गाँव बह गए। साथ ही कई सड़कें और पुल भी बह गए। कुल मिलाकर लगभग 6000 लोगों की मृत्यु हुई, जिनमें से अधिकतर तीर्थयात्री थे।
भारी वर्षा होने पर कई शहरों में बाढ़ आ जाती है। ऐसा जल निकासी व्यवस्था पर अत्यधिक बोझ या अनियोजित निर्माण के कारण हो सकता है। बहुधा यह जलमार्गों पर अतिक्रमण और जल प्रवाह के अवरुद्ध होने के कारण होता है। इसके अतिरिक्त शहरों में कंक्रीट या डामर की सतहें जल को भूमि द्वारा अवशोषित नहीं होने देती हैं।
ग) भूस्खलन
भूस्खलन शैल (रॉक), मिट्टी या मलबे का अचानक ढहना है, जो प्रायः भारी वर्षा, भूकंप या ज्वालामुखी सक्रियता के कारण होता है। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी और पर्वतीय क्षेत्रों के साथ-साथ पश्चिमी घाट और अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में भूस्खलन आम बात है। ये घटनाएँ प्रायः मानसून के दौरान होती हैं।
मानवीय गतिविधियों जैसे वनों की कटाई, स्वीकृत विधियों का पालन किए बिना आधारभूत ढाँचे का निर्माण तथा जल के प्राकृतिक प्रवाह को अवरुद्ध करने वाली अत्यधिक इमारतों के निर्माण के कारण इन क्षेत्रों में भूस्खलन की संभावना बढ़ गई है।
घ) दावानल (जंगल की आग)
दावानल एक अनियंत्रित आग है जो जंगलों में तीव्र गति से फैलती है। प्रायः वे शुष्क जलवायुजन्य परिस्थितियों, सूखा या तेज हवाओं के कारण फैलती है। मानवीय लापरवाही भी इसका एक और आम कारण है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे घने वन प्रदेशों या घास के मैदान वाले राज्यों के साथ ही पश्चिमी घाट जैसी पर्वत श्रृंखला में दावानल एक आम बात है। आग जंगल के बड़े क्षेत्रों को नष्ट करने के अलावा, वन्यजीवों, पारिस्थितिकी तंत्र को हानि पहुँचाती है, हवा की गुणवत्ता को खराब करती है और स्थानीय समुदायों को विस्थापित होने पर विवश करती है। इसलिए इसके परिणाम पर्यावरणीय और आर्थिक दोनों होते हैं।आइए पता लगाएँ
- चित्र 3.15 को देखिए। आपदा के प्रकार को पहचानिए और लोगों, पेड़-पौधों, जानवरों और आर्थिक जीवन पर पड़ने वाले इसके प्रभावों का वर्णन कीजिए।
- चार या पाँच के समूहों में ऊपर वर्णित प्रत्येक आपदा में प्राकृतिक और मानवीय कारणों की पहचान कीजिए। अपने निष्कर्षों की तुलना कीजिए।
- इन्हीं समूहों में उन उपायों पर भी चर्चा कीजिए जो उपर्युक्त आपदाओं से बचने में सहायता कर सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन
जलवायु परिवर्तन का तात्पर्य जलवायु में महत्वपूर्ण एवं दीर्घकालिक परिवर्तन है। यह संपूर्ण पृथ्वी पर या क्षेत्रीय स्तर पर हो सकता है और इसमें तापमान, वर्षा और मौसम की घटनाओं में परिवर्तन सम्मिलित हैं। पिछली सहस्राब्दियों में प्राकृतिक प्रक्रियाओं ने जलवायु परिवर्तन को प्रेरित किया, जिसे समझने के लिए हम पिछले लाखों वर्षों को देख सकते हैं। हालाँकि, 19वीं शताब्दी के बाद से जलवायु परिवर्तन मुख्यतः मानवीय गतिविधियों, विशेष रूप से जीवाश्म ईंधन के जलने, वनों की कटाई, पर्यावरण के लिए हानिकारक औद्योगिक उत्पादन एवं अत्यधिक या अनावश्यक खपत के प्रतिरूप द्वारा प्रेरित रहा है।
जीवाश्म ईंधन के जलने से जलवायु क्यों प्रभावित होती है? पृथ्वी के प्राकृतिक कार्बन चक्र में कार्बन डाइऑक्साइड (C*O_{2}) और अन्य गैसें धीरे-धीरे वायुमंडल में उत्सर्जित होती हैं जो कि सूर्य से प्राप्त गर्मी को रोकती हैं। यह प्राकृतिक हरितगृह प्रभाव (ग्रीन हाउस प्रभाव) पृथ्वी को जीवन के लिए आवश्यकतानुसार गर्म रखता है। हालाँकि, मानवीय गतिविधियाँ जैसे – उद्योग, परिवहन और कृषि ने कुछ ही शताब्दियों में इन हरितगृह गैसों (ग्रीन हाउस गैसों) का भारी मात्रा में उत्सर्जन किया है। यह तीव्र वृद्धि अतिरिक्त गर्मी को रोकती है, जिससे तेजी से वैश्विक तापन (ग्लोबल वार्मिंग) होता है यह जलवायु प्रतिरूप को बाधित करता है, जिस पर हजारों वर्षों से पेड़-पौधों, जानवरों और मानव समाजों ने स्वयं को अनुकूलित किया है।भारत में अनेक क्षेत्रों में तापमान में वृद्धि स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। उदाहरण के लिए, 2025 के आरंभ में देश का औसत तापमान सामान्य से 1 से 3 डिग्री सेल्सियस अधिक था। जिसके परिणामस्वरूप सर्दी सामान्य से बहुत कम और हल्की थी। इसका असर न केवल कृषि उत्पादन पर, बल्कि अनेक लघु उद्योगों पर भी पड़ता है। यह मात्र एक उदाहरण है जो दिखाता है कि कैसे गर्म होती पृथ्वी हमारे लिए बढ़ती चुनौतियों को सामने लाती है।

जलवायु परिवर्तन और आपदा के कारणों के बीच के संबंधों को समझना हमें इन चुनौतियों के लिए बेहतर तरीके से तैयार होने में सहायता कर सकता है। यह समुदायों में अधिक पर्यावरण-अनुकूल आचरणों और लचीलेपन एवं अनुकूलन के निर्माण की आवश्यकता का भी समर्थन करता है। भारत सहित विश्व भर की सरकारें जलवायु परिवर्तन में न्यूनीकरण के उपायों को बढ़ावा देने का प्रयास करती हैं जैसे- हरितगृह गैसों के उत्सर्जन में कटौती, वृक्षारोपण, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ावा देना, ऊर्जा दक्षता में सुधार करना और सतत जीवन-शैली को बढ़ावा देना आदि। किंतु ये प्रयास प्रायः आर्थिक विकास और उपभोग की बढ़ती आकांक्षाओं से टकराते हैं।
आगे बढ़ने से पहले...
- भारत की विविधतापूर्ण जलवायु इसकी भौगोलिक स्थिति से प्रभावित होती है, जिसमें पहाड़, पठार और मरुस्थल सम्मिलित हैं।
- मौसम अल्पकालिक होता है। ऋतुएँ प्रतिवर्ष आती हैं तथा जलवायु दशकों तक दीर्घकालिक प्रतिरूप को प्रतिबिंबित करती है।
- अक्षांश, ऊँचाई, समुद्र से निकटता, पवन और स्थलाकृति जैसे कारक जलवायु को निर्धारित करते हैं।
- मानसून कृषि के लिए महत्वपूर्ण है। यह फसल चक्र और आजीविका को प्रभावित करता है।
- जलवायु सांस्कृतिक परंपराओं, त्योहारों, कृषि और आर्थिक क्रियाकलापों से जुड़ी होती है।
- जलवायु परिवर्तन मौसम अथवा तापमान को अति की ओर ले जाता है। यह प्राकृतिक और मानवीय जीवन के लिए गंभीर परिणाम ला सकता है।
प्रश्न और क्रियाकलाप
- जलवायु के कारकों का उनके प्रभावों के साथ निम्नलिखित सूची में मिलान कीजिए -
- नीचे दिए गए प्रश्नों का उत्तर दीजिए -
क) मौसम और जलवायु में क्या अंतर है?
ख) समुद्र के निकट स्थित स्थानों का तापमान समुद्र से दूर स्थित स्थानों की तुलना में कम क्यों होता है?
ग) भारतीय जलवायु को प्रभावित करने में मानसूनी पवन की क्या भूमिका है?
घ) चेन्नई पूरे वर्ष गर्म क्यों रहता है, जबकि लेह ठंडा रहता है? -
इस पुस्तक के अंत में दिए गए भारत के मानचित्र को देखिए। लेह, चेन्नई, दिल्ली, पणजी, इन शहरों की जलवायु को पहचानिए।
- क्या यह स्थान समुद्र के समीप हैं, पर्वत पर हैं या रेगिस्तान में हैं?
- ये कारक वहाँ की जलवायु को किस प्रकार प्रभावित करते हैं?
- भारत के मानचित्र पर गर्मी और सर्दी के मानसून चक्र को प्रदर्शित कीजिए। गर्मियों और सर्दियों में पवनें कहाँ चलती हैं, इसके प्रतीक लगाइए। मानसून के दौरान पवनों की दिशा दिखाइए।
- भारत में कृषि और मौसम से जुड़े त्योहारों (जैसे- बैसाखी, ओणम) को दिखाते हुए एक रंगीन पोस्टर बनाइए। इन त्योहारों की तस्वीरें या रेखाचित्र लगाइए।
- कल्पना कीजिए कि आप भारत में एक किसान हैं। बरसात के मौसम के लिए आप कैसे तैयारी करेंगे? इस बारे में डायरी में संक्षेप में लिखिए।
- किसी प्राकृतिक आपदा (जैसे- चक्रवात, बाढ़, भूस्खलन या दावानल) की पहचान कीजिए और एक छोटा निबंध लिखिए, जिसमें इसके कारण और प्रभाव सम्मिलित हों। ऐसे सुझाव दीजिए जो व्यक्ति, समुदाय और सरकार को इस आपदा के प्रभाव को कम करने में सहायक हो सकते हैं।