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अध्याय - 5

साम्राज्यों का उदय

जनविहीन देश नहीं हो सकता और देशविहीन राज्य नहीं होता।

– कौटिल्य (अर्थशास्त्र)

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चित्र 5.1 - बिहार की बराबर पहाड़ियों में स्थित शैलकृत गुफा

महत्वपूर्ण प्रश्न ?

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  1. साम्राज्य क्या होता है?
  2. साम्राज्यों का उदय कैसे हुआ और उन्होंने भारतीय सभ्यता को कैसे आकार दिया?
  3. राज्य से साम्राज्य बनने में कौन-कौन से तत्व सहायक हुए?
  4. छठी शताब्दी सा.सं.पू. से दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. तक का जीवन कैसा था?
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  • भविषा और ध्रुव अत्यंत आनंदित थे। उन्होंने अभी-अभी अपने नवीन यंत्र 'इतिहास' को सक्रिय किया था, जो उन्हें अतीत में ले जाने वाला एक काल-यंत्र था। अपने इतिहास के अध्याय से संकेत ग्रहण कर उन्होंने अपनी प्रथम यात्रा के लिए पाटलिपुत्र भ्रमण का निश्चय किया। वे जानते थे कि यह नगर वहीं स्थित था जहाँ आधुनिक पटना है।
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महानगर की सीमा पर उतरते ही कुछ विस्मय से उन्होंने एक बालिका को एक घुड़सवार से वार्तालाप करते देखा, जो विचित्र वस्त्रों में था। घुड़सवार के चले जाने के बाद बालिका इनकी ओर मुड़ी और इन्होंने उसका नाम पूछा।

"मेरा नाम इरा है, मैं कान्हादास की पुत्री हूँ, जो एक लोहार हैं। पाटलिपुत्र में आपका स्वागत है।"

"आपसे मिलकर प्रसन्नता हुई। इरा, हमारे नाम भविषा और ध्रुव हैं।"

“धीरे बोलो! क्या तुम उन सैनिकों को देख रहे हो, जो आगे बढ़ रहे हैं? वे पड़ोसी राज्य के विरुद्ध युद्ध लड़ने जा रहे हैं, जो हमें निरंतर संकट में डालता है। हमारे राजा जब तक संभव हो, युद्ध से बचते हैं, परंतु आवश्यकता होने पर अपनी प्रजा की रक्षा भी करते हैं। जिन तलवारों को ये सैनिक ले जा रहे हैं, उनमें से कई तलवारों को गढ़ने में मेरे पिता ने सहायता की है और मेरे काका उन सैनिकों में से एक हैं। मैं तो उन्हें विदा करने आई थी... मुझे नहीं ज्ञात कि वे कब लौटेंगे?"

(वे तीनों उस सेतु की ओर देखते हैं, जिसमें से होकर सैनिकों का एक विशाल समूह नगर से बाहर जा रहा है। कुछ सैनिक अश्वों पर सवार हैं और सेना के प्रमुख हाथियों पर विराजमान हैं। इसके पश्चात, तीनों बच्चे उसी सेतु से नगर में प्रवेश करते हैं।)

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चित्र 5.3

"यह किस प्रकार का सेतु है"? भविषा ने पूछा, "क्या इसके नीचे नदी है?"

"यह सेतु हमारी सुरक्षा करता है", इरा ने समझाया। "जब भी नगर पर आक्रमण का संकट होता है, तब इसे ऊपर उठा लिया जाता है। यह नदी नहीं है, बल्कि एक गहरी खाई है। जब यह चलसेतु (ड्रॉब्रिज) उठा लिया जाता है, तब दुर्ग तक पहुँचना अत्यंत कठिन हो जाता है। क्या तुम दूर स्थित पर्वतों और वनों को देख रहे हो? ये हमें इमारती लकड़ियाँ औषधियाँ और बहुमूल्य संसाधन प्रदान करते हैं। सेना के लिए हाथी भी वहीं से पकड़े जाते हैं और प्रशिक्षित किए जाते हैं।"

"उस पर्वत में वह खुला हुआ भाग क्या है?" ध्रुव ने पूछा।

"वह एक गुफा है। हमारे राजा उसे भिक्षुओं के लिए बनवा रहे हैं। मुझे आशा है कि जब इसका निर्माण कार्य पूर्ण हो जाएगा, हम वहाँ जा सकेंगे!"

(वे पाटलिपुत्र में घूमते हुए उसकी भव्यता निहारते हैं- ऊँची काष्ठ-प्राचीरें, जिन पर प्रहरी मीनारें, भव्य राजमहल, भवन और जीवंत सड़कें हैं। इरा एक चहल-पहल वाले बाजार की ओर संकेत करती है जहाँ दूर देशों से व्यापारी आए हुए हैं।)

"प्रस्थान से पूर्व आपको हमारे मुख्य बाजार का भ्रमण अवश्य करना चाहिए! हमारे महाराज समस्त दिशाओं से आने वाले यात्रियों का स्वागत करते हैं। अतः यहाँ आपको चीन के रेशमी वस्त्र, दक्षिण भारत से आए मसाले एवं बहुमूल्य रत्न तथा विभिन्न क्षेत्रों के उत्तम वस्त्र, सब कुछ मिलेगा। पाटलिपुत्र में कोई वस्तु दुर्लभ नहीं है।"

"वे लोग वहाँ क्या कर रहे हैं"? ध्रुव ने पूछा।

"ओह, वे सड़कों पर कला दिखाने वाले नट (ऐक्रोबेट) हैं। ये लोग मानव-स्तंभबनाते हैं, गीत गाते हैं, नृत्य करते हैं या लघु नाटक प्रस्तुत करते हैं ताकि जनसामान्य का मनोरंजन हो सके। कभी-कभी ये हमारे राजा के समक्ष भी प्रदर्शन करते हैं।"

"तुम्हारे महाराज अत्यंत शक्तिशाली प्रतीत होते हैं!" भविषा ने कहा। "क्या वे केवल पाटलिपुत्र के आस-पास के क्षेत्र पर शासन करते हैं"?

"उससे भी कहीं अधिक!" इरा ने उत्तर दिया। "वे नगर से बाहर बहुत दूर तक, एक व्यापक क्षेत्र पर शासन करते हैं। असंख्य ग्राम, नगर और जनपद उनके अधीन हैं। मेरे काका ने मुझे बताया था कि घोड़े पर यात्रा करके राज्य की सीमा तक पहुँचने में लगभग दो माह का समय लग जाता है।"

"यह तो केवल एक राज्य से कहीं अधिक विशाल प्रतीत होता है... आप इसे क्या कहती हैं?"

"इसे साम्राज्य कहा जाता है" इरा ने गर्व से कहा।

साम्राज्य क्या होता है?

'एंपायर' (साम्राज्य) शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के 'इंपेरियम' शब्द से हुई है, जिसका अर्थ है सर्वोच्च सत्ता। साम्राज्य अनेक छोटे-छोटे राज्यों अथवा क्षेत्रों का एक संघ होता था। प्रायः इन छोटे-छोटे राज्यों को जीतकर, उन पर एक शक्तिशाली शासक या शासक-समूह शासन करता था। यद्यपि इन छोटे क्षेत्रों में अपने-अपने राजा होते थे, किंतु वे सभी सम्राट के अधीन होते थे। सम्राट अपनी राजधानी से, जो सामान्यतः आर्थिक तथा प्रशासनिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण होती थी, संपूर्ण साम्राज्य का शासन चलाता था।

प्राचीन संस्कृत ग्रंथों में सम्राट के लिए प्रयुक्त शब्द इस बात को स्पष्ट करते हैं, जैसे 'समराज' जिसका अर्थ है 'सर्वोच्च शासक', अधिराज या 'अधिपति' तथा राजाधिराज अर्थात 'राजाओं का राजा।'

भारतीय इतिहास साम्राज्यों से परिपूर्ण रहा है। वे अस्तित्व में आए, विस्तृत हुए, कुछ समय तक बने रहे, फिर उनका पतन हुआ और अंततः वे लुप्त हो गए। वस्तुतः अंतिम साम्राज्य, जिसने इस उपमहाद्वीप पर शासन किया, वह एक शताब्दी पूर्व तक अस्तित्व में था। परंतु यह समय उस पर चर्चा करने का नहीं है। हम अतीत से आरंभ करते हैं जिससे यह समझ सकें कि प्राचीन काल में साम्राज्य किस प्रकार कार्य करते थे और उन्होंने भारत की राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक उन्नति को कितनी गहराई से प्रभावित किया।

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आइए पता लगाएँ

  1. साम्राज्य विस्तृत भूभागों में फैले हुए होते थे, जिनमें अनेक प्रकार की भाषाएँ, परंपराएँ और संस्कृतियों वाले जन रहते थे। आपके विचार में सभी लोग सौहार्दपूर्वक रहें, यह सम्राटों ने कैसे सुनिश्चित किया होगा? समूह में विचार-विमर्श करें एवं कक्षा में अपने विचार प्रस्तुत कीजिए।
  2. एक विशाल साम्राज्य का संचालन करना अनेक प्रकार की कठिनाइयों से भरा होता है, फिर भी कोई राजा अपना राज्य बढ़ाकर सम्राट क्यों बनना चाहता होगा? नीचे कुछ संभावित उत्तर दिए गए हैं, आप चाहें तो इसमें और भी उत्तर जोड़ सकते हैं।
    • 'संपूर्ण विश्व पर शासन' करने की महत्वाकांक्षा अर्थात् एक बड़े प्रदेश को नियंत्रण में रखना एक ऐसा रूपक है, जिससे संकेत मिलता है कि वह विशाल क्षेत्र पर अधिकार करना चाहता था तथा यह सुनिश्चित करना चाहता था कि भावी पीढ़ियाँ उन्हें याद रखेंगी।
    • एक विशाल भू-प्रदेश को अपने अधीन कर, वहाँ के संसाधनों का प्रयोग कर अपनी आर्थिक एवं सैन्य शक्ति बढ़ाने की इच्छा।
    • स्वयं एवं अपने साम्राज्य के लिए महान संपदा प्राप्त करने की उत्कंठा।

सामान्यतः सम्राट स्थानीय राजाओं या प्रमुखों को अपने प्रति निष्ठा तथा भेंट के बदले अपने क्षेत्रों का प्रशासन करने की अनुमति देते थे।

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चित्र 5.4.1 - प्रशिक्षित सेनाएँ पड़ोसी राज्यों को जीतने, उन पर नियंत्रण स्थापित करने तथा साम्राज्य की सीमाओं की सुरक्षा करने हेतु भेजी जाती थीं।
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चित्र 5.4.2 - सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थलों, जैसे साम्राज्य की सीमाओं पर दुर्गयुक्त नगर (बस्तियाँ) निर्मित किए जाते थे।
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चित्र 5.4.3 - साम्राज्य विस्तार हेतु कोई राज्य सर्वप्रथम अपने सीमावर्ती क्षेत्रों पर आक्रमण कर उन्हें विजित करने का प्रयास करता था।
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चित्र 5.4.4 - शासक नदियों तथा व्यापारिक मार्गों पर नियंत्रण करने का प्रयास करते थे, क्योंकि इससे उन्हें मूल्यवान संसाधनों पर अधिकार के साथ-साथ व्यापार से कर-राजस्व भी प्राप्त होता था।
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चित्र 5.4.5 - जब अनेक लघु राज्यों में प्रभुत्व के लिए संघर्ष होता था, तब जिस राज्य के पास प्रबल सैन्य बल तथा अधिशेष संसाधन होते थे, वह अंततः सार्वभौम अधिपति बनता था।

आइए पता लगाएँ

आपके विचार से शासकों ने अपने साम्राज्य विस्तार के लिए युद्ध के अतिरिक्त दूसरे और कौन-कौन से उपाय अपनाए होंगे? अपने विचार लिखिए और अपनी कक्षा में साझा कीजिए।

व्यापार, व्यापारिक मार्ग तथा श्रेणियाँ (गिल्ड्स)

दूरस्थ क्षेत्रों में सैन्य अभियान संचालित करना जितना सरल प्रतीत होता है, वास्तव में उतना सरल नहीं होता। एक सेना का संचालन अत्यंत व्ययसाध्य होता है। सैनिकों को भोजन, वस्त्र, शस्त्र तथा वेतन देने की आवश्यकता होती है, हाथियों तथा घोड़ों का पालन-पोषण करना पड़ता है, सड़कों तथा नौकाओं का निर्माण करना पड़ता है इत्यादि। इन सभी कार्यों को संपन्न करने हेतु पर्याप्त आर्थिक सामर्थ्य, श्रमिकों पर नियंत्रण तथा संसाधनों तक पहुँच आवश्यक होती है।

अब हम यह बात समझ सकते हैं कि आर्थिक गतिविधियाँ विशेषकर उत्पादन तथा व्यापार किसी साम्राज्य को बनाए रखने के लिए एवं प्रजा की समृद्धि और जीवन की गुणवत्ता के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। यह प्रत्येक सुशासक के चिंतन का विषय होना चाहिए। अतः संपूर्ण साम्राज्य में तथा इसके बाहर भी व्यापारिक मार्गों की स्थापना एवं नियंत्रण अत्यधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। इससे व्यापार की जाने वाली वस्तुओं की मात्रा तथा विविधता में वृद्धि होती है, जिससे उत्पादकों की आय तथा शासकों के राजस्व में वृद्धि होती है।

प्राचीन भारत के संदर्भ में विचार करें, तो उस काल में व्यापार की प्रमुख वस्तुएँ क्या रही होंगी? साहित्यिक ग्रंथों एवं पुरातात्विक उत्खननों के आधार पर यह ज्ञात होता है कि वस्त्र, सुगंधित पदार्थ, कृषि उत्पाद, रत्न, हस्तशिल्प की वस्तुएँ एवं विविध पशु प्रमुख व्यापारिक वस्तुएँ थीं। यह व्यापार केवल भारत तक सीमित नहीं था। अनेक भारतीय वस्तएँ स्थल-मार्ग एवं जलमार्ग से दरस्थ देशों तक जाती थीं।

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चित्र 5.5 - लगभग 500 सा.सं.पू. के पश्चात कुछ महत्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग तथा उन पर अंकित महत्वपूर्ण नगर। उत्तरापथ व दक्षिणापथ पर विशेष ध्यान दें।

अधिकांश स्थितियों में व्यापारी पृथक रहकर अपना व्यापार नहीं करते थे। उन्होंने शीघ्र ही यह अनुभव किया कि सामूहिक रूप से कार्य करना अधिक लाभकारी होता है और इसी से श्रेणियों (गिल्ड्स) का विकास हुआ। श्रेणियाँ व्यापारियों, शिल्पकारों, साहूकारों तथा कृषकों के प्रभावशाली संगठन होते थे। उपलब्ध प्रमाणों के अनुसार प्रत्येक श्रेणी में एक प्रमुख (जो सामान्यतः निर्वाचित होता था) तथा कुछ कार्यकारी अधिकारी होते थे, जिनमें सभी प्रकार के नैतिक गुण अपेक्षित थे। दो कारणों से व्यापारी श्रेणियाँ एक विशिष्ट संस्था के रूप में मानी जाती थीं। प्रथम, वे ऐसे लोगों को एकत्र करती थीं, जो परस्पर प्रतिद्वंद्वी नहीं अपितु सहकर्मी बन जाते थे। उन्होंने यह समझ लिया था कि संसाधनों, बाजार की सूचनाओं, माँग-आपूर्ति की स्थिति, श्रमिक व्यवस्था आदि का परस्पर साझाकरण सभी के लिए लाभकारी होता है। द्वितीय, जैसा कि एक प्राचीन ग्रंथ में कहा गया है, "कृषक, व्यापारी, पशुपालक, साहूकार एवं शिल्पकार सभी अपने-अपने वर्ग हेतु नियम बनाने में स्वतंत्र होते थे।” दूसरे शब्दों में, श्रेणियों को अपने आंतरिक नियमों का निर्माण करने की स्वतंत्रता प्राप्त थी और राजा इसमें हस्तक्षेप नहीं करता था (और वह ऐसा करता भी क्यों, जब व्यापार फल-फूल रहा हो)।

श्रेणियाँ भारत के विशाल भूभाग पर विस्तृत थीं और अनेक शताब्दियों तक विद्यमान रहीं। जब वे औपचारिक रूप से समाप्त हो गईं, तब भी वे भारतीय व्यापार और वाणिज्यिक गतिविधियों को प्रभावित करती रहीं और यह प्रभाव आज भी भारत के व्यापार और व्यवसाय में देखा जा सकता है। यह संस्था भारतीय समाज के स्व-संगठित होने की अद्भुत क्षमता का उत्कृष्ट उदाहरण है। प्राचीन ग्रामीण इकाई, जिसमें विविध समितियाँ एवं परिषदें होती थीं, इस व्यवस्था का अन्य उदाहरण है। वस्तुतः कोई भी प्रबुद्ध शासक तभी श्रेष्ठ कहलाता था, जब वह स्थानीय संस्थाओं को स्वायत्त रूप से कार्य करने दे और यदि ये संस्थाएँ संतोषजनक रूप से कार्य कर रही हों, तो उसमें हस्तक्षेप न करें।

आइए पता लगाएँ

  • व्यापारिक मार्गों के मानचित्र का अवलोकन करें। उन भौगोलिक विशेषताओं की पहचान करें, जिन्होंने व्यापारियों को उपमहाद्वीप में यात्रा करने में सहायता की।
  • उन सड़कों पर तत्कालीन समय में परिवहन के कौन-कौन से साधन उपलब्ध रहे होंगे? अनुमान लगाएँ।

मगध का उदय

छठी से चौथी शताब्दी सा.सं.पू. का काल उत्तर भारत में परिवर्तन का समय था। इससे पूर्व हम महाजनपदों, उत्तर तथा मध्य भारत के बड़े गणराज्यों और उनकी सभा-व्यवस्थाओं का संक्षेप में अध्ययन कर चुके हैं। इन्हीं में से एक था मगध (आधुनिक दक्षिण बिहार और उसके आस-पास का क्षेत्र), जो एक महत्वपूर्ण राज्य के रूप में उभरा और कई राज्यों का विलय कर भारत के प्रथम साम्राज्य की नींव का आधार बना। प्रारंभिक शक्तिशाली राजाओं में अजातशत्रु का नाम उल्लेखनीय है, जिसने मगध को शक्ति के केंद्र के रूप में स्थापित करने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इसे अनदेखा न करें

विश्व के दो महान धार्मिक व्यक्तित्व सिद्धार्थ गौतम जो आगे चलकर 'बुद्ध' तथा वर्धमान जो 'महावीर' के नाम से प्रसिद्ध हुए, दोनों ही मगध सम्राट अजातशत्रु के समकालीन थे। इनकी शिक्षाओं को पुनः पढ़ने हेतु कक्षा 6 की पाठ्यपुस्तक के 'भारत की सांस्कृतिक जड़ें' अध्याय का पुनरावलोकन करें।

मगध साम्राज्य संसाधनों से समृद्ध गंगा के उपजाऊ मैदानों में स्थित था, जहाँ उपजाऊ भूमि, प्रचुर मात्रा में इमारती लकड़ी प्रदान करने वाले वन तथा हाथी जैसे महत्वपूर्ण पशु थे। यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि लौह धातु का उपयोग कृषि एवं युद्ध कलाओं सहित अन्य तकनीकी परिवर्तनों का प्रमुख कारण बना। निकट के पर्वतीय क्षेत्रों से प्राप्त लौह अयस्क एवं अन्य खनिज संसाधन मगध साम्राज्य के विस्तार में अत्यंत सहायक सिद्ध हुए। लोहे के हल द्वारा भूमि की जुताई से कृषि उत्पादन में तीव्र वृद्धि हुई और हल्के व तेज धार वाले लोहे के शस्त्रों ने सेना की युद्ध क्षमता को अधिक सशक्त बनाया।Screenshot 2026-03-18 115305
चित्र 5.6 - उत्तर भारत के नगर कुशीनारा (आधुनिक कुशीनगर) की घेराबंदी करते तथा युद्ध करते हुए पैदल, घुड़सवार और हाथियों पर सैनिकों को दर्शाती साँची के स्तूप की विस्तृत पट्टिका। इसका उद्देश्य बुद्ध के अवशेषों को पुनः प्राप्त करना था। पट्टिका के बाएँ भाग में एक हाथी पर इन्हें ले जाते हुए दिखाया गया है।

आइए पता लगाएँ

  • उपर्युक्त शिल्प-पट्टिका का सूक्ष्म अवलोकन करें। आप इनमें कितने प्रकार के शस्त्रों की पहचान कर सकते हैं? आपको लोहे के कौन-कौन से उपयोग दिखाई देते हैं?
  • शिल्प-पट्टिका के बाएँ भाग में कलश के ऊपर एक छत्र रखा हुआ है, जिसमें बुद्ध के अवशेष रखे हैं। आपके विचार में ऐसा क्यों किया गया होगा?

अधिशेष (सरप्लस) अन्न उत्पादन ने अधिक लोगों को कला एवं शिल्प की ओर उन्मुख होने का अवसर प्रदान किया, जिनकी माँग साम्राज्य के भीतर और बाहर दोनों ही जगह थी। गंगा तथा सोन नदियों से व्यापार को भौगोलिक लाभ मिलता था, क्योंकि इनका उपयोग यातायात के लिए किया जा सकता था। फलते-फूलते व्यापार ने राज्य की आय में वृद्धि की तथा मगध के उत्थान में योगदान दिया।

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चित्र 5.7 - महापद्मनंद का चाँदी का एक आहत सिक्का

5वीं शताब्दी सा.सं.पू के लगभग महापद्मनंद मगध में प्रमुखता से उभरे और उन्होंने नंद वंश की स्थापना की। उन्होंने छोटे-छोटे राज्यों को सफलतापूर्वक संगठित किया तथा अपने साम्राज्य का विस्तार उत्तरी तथा पूर्वी भारत में किया। जैसे-जैसे उनकी अर्थव्यवस्था समृद्ध हुई, उन्होंने अपनी आर्थिक शक्ति के प्रदर्शन हेतु सिक्कों का प्रचलन आरंभ किया। ग्रीक विवरणों से यह भी ज्ञात होता है कि नंद वंश के पास एक विशाल सेना थी।

नंद वंश के विभिन्न लेखों से ऐसा प्रतीत होता है कि इस वंश का अंतिम शासक धनानंद अत्यधिक धनवान होने के बावजूद, अत्यंत अलोकप्रिय हो गया था, क्योंकि वह अपनी प्रजा का उत्पीड़न व शोषण करता था। इससे नंद वंश की पराजय तथा विशालतम साम्राज्यों में से एक मौर्य साम्राज्य में इसके समाहित होने का मार्ग प्रशस्त हो गया।

इसे अनदेखा न करें

प्रसिद्ध संस्कृत व्याकरणाचार्य पाणिनि का समय भी लगभग 5 वीं शताब्दी सा.सं. पू. में ही माना जाता है, जब नंदों का राज्य था। उन्हें एक प्राचीन संस्कृत ग्रंथ अष्टाध्यायी की रचना के लिए जाना जाता है, जिसमें 3996 सूत्रों के माध्यम से संस्कृत व्याकरण के नियमों को संकलित किया गया है।

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चित्र 5.8 - पाणिनि की स्मृति में जारी -एक भारतीय डाक टिकट

यवनों (ग्रीक) का आगमन

जब भारतीय उपमहाद्वीप के पूर्वी भाग में स्थित मगध में विविध घटनाएँ घटित हो रही थीं, उस समय उत्तर-पश्चिम क्षेत्र में क्या हो रहा था? यह भाग एक प्राचीन मार्ग के निकट स्थित था, जो भूमध्यसागरीय क्षेत्र को भारत से जोड़ता था और यहाँ अनेक लघु राज्य विद्यमान थे। ग्रीक वृत्तांतों के अनुसार, उन राज्यों में पौरव वंश प्रमुख था, जिसके शासक राजा पुरु (पोरस) थे।

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  • मैसीडोनिया के एक युवा और शक्तिशाली ग्रीक शासक एलेक्जेंडर ने ग्रीस पर पूर्व में हुए फारसी आक्रमणों का बदला लेने के लिए फारसी साम्राज्य के विरूद्ध अभियान चलाया (उस समय फारसशासित भारत के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र के कुछ भारतीय सैनिकों ने ग्रीक सेना के विरुद्ध लड़ाइयाँ लड़ीं)। एलेक्जेंडर ने फारसी साम्राज्य पर विजय प्राप्त की जिसके परिणामस्वरूप वहाँ ग्रीक संस्कृति का प्रभाव व्यापक रूप से फैला। उसका साम्राज्य अब तीन महाद्वीपों में विस्तृत हो गया था, जो विश्व इतिहास के सबसे बड़े साम्राज्यों में से एक था।

इसे अनदेखा न करें

फारसी और ग्रीक साम्राज्यों में प्रांतों के शासक क्षत्रप थे, जिन्हें सम्राट (जैसे – एलेक्जेंडर) ने सुदूर प्रदेशों का प्रबंधन करने के लिए पीछे छोड़ दिया था। मात्र अधिकारी होने के बावजूद इन क्षत्रपों के पास महत्वपूर्ण शक्ति और स्वतंत्रता थी। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि उनके लिए इतनी शक्ति का प्रयोग करना कैसे संभव था?


आइए विचार करें

आपके विचार में एलेक्जेंडर संपूर्ण विश्व पर राज क्यों करना चाहता था? इससे वह क्या प्राप्त करना चाहता था?


आइए पता लगाएँ

जब युद्ध के उपरांत एलेक्जेंडर ने राजा पुरु से पूछा कि उसके साथ कैसा व्यवहार किया जाए, तब पुरु ने उत्तर दिया- "एक राजा की तरह"। इस उत्तर से प्रभावित होकर एलेक्जेंडर ने उन्हें उनके ही राज्य का क्षत्रप नियुक्त कर दिया। अपने शिक्षकों की सहायता से राजा पुरु और एलेक्जेंडर के मध्य हुए युद्ध के विषय में और अधिक विवरण प्राप्त करें। अपने शोध के साथ-साथ अपनी कल्पनाशक्ति का उपयोग करते हुए इस युद्ध दृश्य का नाट्य मंचन करें।

  • फारस वापस आकर एलेक्जेंडर को विद्रोह तथा राजनीतिक उथल-पुथल का सामना करना पड़ा। बेबीलोन में बीमार पड़ने और मात्र 32 वर्ष की आयु में निधन के बाद, उसका विशाल साम्राज्य शीघ्र ही उसके सेनापतियों और क्षत्रपों के बीच विभाजित हो गया, जिन्होंने अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिए।
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  • दुनिया के अंतिम छोर तक पहुँचने के लिए उत्सुक एलेक्जेंडर ने आगे पूर्व की ओर बढ़ते हुए भारत में अपना अभियान प्रारंभ किया। पंजाब में राजा पोरस को पराजित किया और स्थानीय जनजातियों एवं शासकों के भीषण प्रतिरोध का सामना करते हुए कई नगरों में नरसंहार किया। ग्रीक अभिलेखों में उल्लेख है कि कुछ लड़ाइयों में महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध किया। एलेक्जेंडर स्वयं एक युद्ध में गंभीर रूप से घायल हो गया था। थके हुए और घर की याद में उसके सैनिकों ने लड़ने की इच्छा खो दी और भारत में गंगा नदी की ओर जाने से इनकार कर दिया। अतः एलेक्जेंडर और उसकी सेना का एक भाग फारस की ओर पीछे हट गया, लेकिन दक्षिण में तटीय मार्ग और ईरान के सघन रेगिस्तानी क्षेत्रों से की गई यात्राओं के परिणामस्वरूप प्यास, भूख और बीमारी के कारण उसके सैनिकों को भारी क्षति हुई।

एलेक्जेंडर का जिम्नोसोफिस्टों के साथ संवाद

एलेक्जेंडर ने भारतीय ऋषियों के एक समूह के बारे में सुना था, जिन्हें ग्रीक लोग 'जिम्नोसोफिस्ट' या 'नग्न दार्शनिक' (शायद इसलिए कि वे बहुत कम कपड़े पहनते थे) कहते थे और जो अपनी बुद्धिमत्ता के लिए प्रसिद्ध थे। एलेक्जेंडर ने पहेलियों के रूप में कठिन प्रश्नों के साथ उन्हें चुनौती दी तथा यह चेतावनी दी कि वह गलत उत्तर देने वालों को मृत्युदंड देगा। जिम्नोसोफिस्टों ने एलेक्जेंडर के प्रश्नों का शांति और बुद्धिमत्ता से उत्तर दिया। एलेक्जेंडर दार्शनिकों के उत्तर से प्रभावित हुआ और अंत में सभी दार्शनिकों को मुक्त कर दिया। सदियों से इस घटना के अनेक संस्करण प्रचलित हैं, जो इसे इतिहास की सबसे रोचक दार्शनिक घटनाओं में से एक बनाता है। एक विवरण के अनुसार एलेक्जेंडर ने पूछा, जबकि मृत्यु नहीं।" एलेक्जेंडर ने फिर प्रश्न किया "कोई व्यक्ति सबसे अधिक प्रिय कैसे हो सकता है?" उत्तर आया, "यदि वह सबसे अधिक शक्तिशाली है और फिर भी भय उत्पन्न नहीं करता है।" संभवतः यह शक्तिशाली शासक के लिए एक संकेत था।Screenshot 2026-03-18 115408
चित्र 5.11 - एक ग्रीक सिक्का, जिसमें संभवतः घोड़े पर सवार एलेक्जेंडर को हाथी पर सवार पोरस पर "जीवन या मृत्यु में कौन अधिक शक्तिशाली है?" आक्रमण करते हुए दिखाया गया है।
एक ऋषि ने उत्तर दिया, "जीवन, क्योंकि वह लंबा है, इतिहासकार इस प्रकार के वैचारिक संवादों को ग्रीक और भारतीय दर्शन परंपराओं के मध्य एक महान बौद्धिक संगम के रूप में देखते हैं।

शक्तिशाली मौर्य साम्राज्य

उत्तर-पश्चिम की संक्षिप्त यात्रा के उपरांत, आइए हम पुनः मगध लौटें जहाँ हमने नंद साम्राज्य का अंत देखा था। जब एलेक्जेंडर अपनी सेना के साथ भारत से लौट गया, उसके कुछ वर्षों बाद लगभग 321 सा.सं.पू. में, एक नए वंश और साम्राज्य का उदय हुआ - मौर्य साम्राज्य, जिसकी स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने की थी। इस प्रतापी राजा ने शीघ्र ही नंद साम्राज्य के क्षेत्रों को अपने अधीन कर लिया और मगध साम्राज्य का निरंतर विस्तार किया।

कई विवरणों के अनुसार, चंद्रगुप्त ने यह कार्य एक कुशल व योग्य मार्गदर्शक कौटिल्य की सहायता से पूरा किया, जिन्होंने राजनीति, शासन और अर्थव्यवस्था के अपने ज्ञान का उपयोग करके एक ऐसा साम्राज्य स्थापित किया, जो भारतीय इतिहास के महानतम साम्राज्यों में से एक है।

कौटिल्य की कहानी

बौद्ध ग्रंथों के अनुसार, कौटिल्य जिन्हें कभी-कभी चाणक्य या विष्णुगुप्त भी कहा जाता है, विश्वविख्यात तक्षशिला (वर्तमान तक्षिला) विश्वविद्यालय के आचार्य थे। उनकी प्रसिद्ध कथा की शुरुआत अत्यंत अलोकप्रिय शासक धनानंद के दरबार से होती है।

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मानचित्र 5.12 - नंद साम्राज्य
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मानचित्र 5.13 - मौर्य साम्राज्य -

कौटिल्य ने धनानंद को परामर्श दिया कि वह अपने शासन के तौर-तरीके बदल ले, अन्यथा अपने साम्राज्य का पतन देखने को तैयार हो जाए। परंतु क्रोधित धनानंद ने कौटिल्य का अपमान किया और उन्हें अपने दरबार से बाहर निकाल दिया। तब कौटिल्य ने नंद शासन का अंत करने की शपथ ली।

चंद्रगुप्त मौर्य का उदय

चंद्रगुप्त मौर्य की उत्पत्ति और साहसिक कार्यों के विषय में कई कहानियाँ विख्यात हैं, लेकिन उनका सामान्य परिचय यह है कि उन्होंने नंद वंश का अंत किया, मगध पर अपने शासन की नींव रखी और पाटिलपुत्र को अपनी राजधानी बनाया। क्या आपको स्मरण है कि मगध को अपनी भौगोलिक स्थिति, सुदृढ़ आर्थिक प्रणाली और समृद्ध व्यापार के कारण कई लाभ थे? इन सबके साथ ही कुशल रणनीतिकार कौटिल्य की सलाह ने चंद्रगुप्त मौर्य को धीरे-धीरे अपने साम्राज्य का विस्तार करने में सहायता की। चंद्रगुप्त मौर्य ने उत्तर-पश्चिम में एलेक्जेंडर द्वारा नियुक्त ग्रीक क्षत्रपों को हराया और इस क्षेत्र को एक ऐसे साम्राज्य के रूप में एकीकृत किया, जो उत्तर के मैदानी भाग से लेकर दक्षिण के पठार तक फैला हुआ था।

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चित्र 5.14 - चंद्रगुप्त मौर्य के दरबार में मेगस्थनीज (असित कुमार हलधर द्वारा 20वीं सदी का एक चित्रांकन)

चंद्रगुप्त मौर्य ने ग्रीकों को पराजित करने के बाद भी उनके साथ राजनयिक संबंध बनाए रखे और अपने दरबार में एक ग्रीक इतिहासकार और राजनयिक मेगस्थनीज का स्वागत किया, जिसने अपनी पुस्तक इंडिका में भारत की अपनी यात्राओं के बारे में लिखा। यह अपनी तरह का पहला लिखित विवरण था, जो दुर्भाग्यवश आज पूर्णरूप में उपलब्ध नहीं है। इसके कुछ अंश बाद के ग्रीक विद्वानों द्वारा उद्धृत किए गए हैं।

कौटिल्य की राज्य संबंधित अवधारणा

कौटिल्य के पास एक स्पष्ट दृष्टिकोण था कि एक राज्य की स्थापना, प्रबंधन और सुदृढ़ीकरण कैसे किया जाना चाहिए? अपनी प्रसिद्ध रचना अर्थशास्त्र (जिसका शाब्दिक अर्थ है शासन और अर्थशास्त्र का विज्ञान) में उन्होंने रक्षा, अर्थशास्त्र, प्रशासन, न्याय, नगर-नियोजन, कृषि व्यवस्था तथा लोक-कल्याण जैसे कई विषयों मेंScreenshot 2026-03-18 115446 दिशा-निर्देशों का वर्णन किया है। उनकी प्रमुख राजनीतिक अवधारणाओं में एक 'सप्तांग' सिद्धांत (चित्र 5.15 देखें) है, जिसके अनुसार राज्य सात भागों से निर्मित होता है।

कौटिल्य के अनुसार, सप्तांग को एक साथ मिलकर एक व्यवस्थित, सुसंरक्षित और समृद्ध राज्य की स्थापना करनी चाहिए, ताकि राज्य के समक्ष जैसी भी परिस्थितियाँ आएँ, उसे युद्ध और शांति के लिए गठबंधन के माध्यम से बनाए रखा जा सके। उन्होंने समाज में कानून और व्यवस्था के महत्व पर बल दिया, जिसके लिए एक सशक्त प्रशासन की आवश्यकता है। उन्होंने भ्रष्टाचार से निपटने के लिए अनेक कानूनों का भी विवरण दिया और लोगों की भलाई के विरुद्ध जाने वाले किसी भी कार्य के लिए दंड-विधान भी निर्दिष्ट किया।

आइए विचार करें

  • कौटिल्य कहते हैं, "एक राजा को अपनी प्रजा के कल्याण को बढ़ावा देकर अपनी शक्ति मे वृद्धि करनी चाहिए, क्योंकि शक्ति ग्राम-क्षेत्र से आती है, जो समस्त आर्थिक गतिविधियों का स्रोत है। (राजा को) ग्रामीण क्षेत्र में उन लोगों पर विशेष अनुग्रह करना चाहिए, जो लोगों को लाभ पहुँचाने वाले कार्य करते हैं, जैसे- तटबंध या सड़क-पुल बनाना, गाँवों का सौंदर्गीकरण करना अथवा उनकी रक्षा करने में सहायता प्रदान करना।"
  • आपके अनुसार ग्रामीण क्षेत्र का विशेष ध्यान रखना क्यों महत्वपूर्ण था? (संकेत – इस अध्याय के आरंभ में आपने जो पढ़ा है, उस पर पुनः विचार कीजिए।)

कौटिल्य के शासन का मूल दर्शन भारतीय मूल्यों के अनुरूप है- "अपनी प्रजा की प्रसन्नता में राजा की प्रसन्नता निहित है, प्रजा की भलाई में उसकी भलाई है। राजा को केवल वही अच्छा नहीं मानना चाहिए जो उसे प्रसन्न करे, बल्कि जो उसकी प्रजा को अच्छा लगे, उसे अपने लिए भी वही लाभदायक मानना चाहिए।" दूसरे शब्दों में, राजा चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसे सदैव प्रजा के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए।

आइए पता लगाएँ

अपनी कक्षा में एक सामूहिक चर्चा आयोजित करें और कौटिल्य के साम्राज्य के प्रति विचारों की विशेषताओं की तुलना आधुनिक राष्ट्र से करें।

शांति का चयन करने वाला राजा

मौर्य वंश के एक और राजा अशोक (268-232 सा.सं.पू.) थे। चंद्रगुप्त के पौत्र अशोक को प्रशासनिक और धार्मिक दृष्टि से अनेक महत्वपूर्ण उपलब्धियों का श्रेय दिया जाता है।

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चित्र 5.16 - नेपाल में रामग्राम स्तूप का भ्रमण करते हुए अशोक का साँची स्तूप की एक पट्टिका से लिया गया दृश्य

अपने शासन के आरंभिक काल में अशोक अत्यंत महत्वाकांक्षी थे। उन्हें विरासत में एक विशाल साम्राज्य प्राप्त हुआ था, जिसे उन्होंने भारतीय उपमहाद्वीप के दक्षिणी भाग को छोड़कर संपूर्ण भूभाग में विस्तृत किया। इसमें वर्तमान बांग्लादेश, पाकिस्तान तथा अफगानिस्तान के कुछ भाग भी सम्मिलित थे। हालाँकि, राज्य विस्तार की प्रक्रिया में घटित एक युद्ध ने अशोक के जीवन की दिशा ही बदल दी। उनके एक शिलालेख के अनुसार, उन्होंने एक बार कलिंग (आधुनिक ओडिशा) पर आक्रमण किया तथा भयंकर युद्ध लड़ा। युद्ध क्षेत्र में भारी विनाश और मृत्यु को देखकर अशोक ने हिंसा का परित्याग कर यथासंभव शांति और अहिंसा के मार्ग को अपनाने का निर्णय लिया, जो महात्मा बुद्ध की शिक्षा के अनुरूप था।

आइए विचार करें

अशोक ने अपने शिलालेखों में कलिंग युद्ध का उल्लेख किया है। वे चाहते तो इसका उल्लेख न करके भविष्य की पीढ़ियों के समक्ष स्वयं को एक शांतिपूर्ण, परोपकारी राजा के रूप में प्रस्तुत कर सकते थे। आपके विचार में उन्होंने इस विनाशकारी युद्ध का उल्लेख अपने शिलालेखों में क्यों किया?

बुद्ध की शिक्षाओं को अपनाने के उपरांत अशोक ने बुद्ध के संदेश को दूर-दूर तक प्रसारित करने के लिए श्रीलंका, थाईलैंड, मध्य एशिया और उससे भी आगे तक अपने दूत भेजे।

अशोक ने अपने साम्राज्य के कई स्थानों पर चट्टानों या स्तंभों पर शिलालेख उत्कीर्ण करवाए थे। इसलिए इतिहासकारों ने कभी-कभी अशोक को 'महान संचारक' भी कहा है। इन शिलालेखों में जनसामान्य के लिए संदेश थे और उन्हें धर्म का पालन करने के लिए प्रोत्साहित किया गया था। अधिकांश शिलालेख भारत के कई भागों में लोकप्रिय प्राकृत भाषा में उत्कीर्ण थे। ये शिलालेख ब्राह्मी लिपि में लिखे गए थे (ब्राह्मी भारत की सभी क्षेत्रीय लिपियों की जननी मानी जाती है)।

हमने ब्राह्मी लिपि में लिखी प्राकृत भाषा का उल्लेख किया है। इसका क्या अर्थ है? सरल शब्दों में, भाषा वह है जो हम बोलते हैं, जबकि लिपि वह है जिसमें हम एक भाषा को लिखते हैं। क्या आप हमारे दैनिक जीवन में इसके उदाहरण सोच सकते हैं?
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मानचित्र 5.17 - उपमहाद्वीप में अशोक के शिलालेखों में से कुछ प्रमुख शिलालेख

अपने शिलालेखों में अशोक ने स्वयं को 'देवानामपिय पियदसि' या देवानामप्रिय प्रियदर्शी कहा है। पहले शब्द का अर्थ है 'देवताओं के प्रिय' और दूसरे का अर्थ है, 'दूसरों के प्रति दयालुता से व्यवहार करने वाला'। वास्तव में, शिलालेखों की भाषा से यह स्पष्ट होता है कि वह स्वयं को एक परोपकारी और दयालु शासक के रूप में चित्रित करने में रुचि रखते थे। आइए, इससे संबंधित उदाहरण देखें।

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चित्र 5.18 - गुजरात के गिरनार में स्थित अशोक के शिलालेख के एक अंश का चित्र (बाईं ओर देखें)। दिल्ली में स्थित फिरोज शाह कोटला के टोपरा स्तंभ का विवरण (दाईं ओर देखें)।

हालाँकि, कुछ दक्षिणी राज्य मौर्य साम्राज्य का भाग नहीं थे, लेकिन अशोक ने उनके समग्र कल्याण का समर्थन किया। उन्होंने अपने साम्राज्य से बाहर भी मनुष्यों और पशुओं के लिए चिकित्सकीय सुविधाएँ उपलब्ध करवाने की बात कही। पशुओं के शिकार और उन पर क्रूरता पर प्रतिबंध लगाया और आवश्यक होने पर उनके लिए उपचार का आदेश दिया। इस प्रकार, यदि विचार किया जाए तो सम्राट अशोक प्रकृति और वन्यजीव संरक्षण के संदर्भ में इस प्रकार के प्रथम राजा थे। उन्होंने अपने साम्राज्य की मुख्य सड़कों के किनारे नियमित अंतराल पर विश्रामगृहों के निर्माण, कुएँ बनवाने और फलदार एवं छायादार वृक्षों को लगवाने के बारे में अपने अभिलेखों में उल्लेख किया है। उन्होंने सभी संप्रदायों (उनके समय में प्रचलित विभिन्न विचारधाराएँ) को एक-दूसरे की उचित शिक्षाओं को स्वीकार करने और उनका अध्ययन करने के लिए प्रोत्साहित किया।

हालाँकि, हमें अशोक के सभी अभिलेखों को शाब्दिक रूप से स्वीकारने की आवश्यकता नहीं है, तथापि यह स्पष्ट है कि कौटिल्य के शासन-दर्शन के अनुरूप उन्होंने अपनी प्रजा के कल्याण हेतु निरंतर प्रयास किया और उन तक अपने विचार पहुँचाने का प्रयास किया।

इसे अनदेखा न करें

आपने कक्षा 6 में धर्म (प्राकृत में 'धम्म') शब्द के बारे में पढ़ा है। इसका भाव सहजता से नहीं समझा जा सकता। सरल शब्दों में धर्म का अर्थ है- नैतिक नियम या परिवार, समुदाय या राष्ट्र के प्रति किसी व्यक्ति का 'नैतिक' अथवा 'धार्मिक' कर्तव्य। यद्यपि, गहन रूप से 'धर्म' का अर्थ है - ब्रह्मांड या 'ऋतम' के अनुसार जीवन-यापन की पद्धति। इसमें अपने कर्तव्य का सत्यनिष्ठा से निर्वहन, 'धर्म' के अनुसार नियमों का पालन करना एवं ब्रह्मांडीय व्यवस्था के साथ सामंजस्य स्थापित कर जीवन-यापन सम्मिलित है। इसलिए 'धर्म' का अर्थ कर्तव्य, नियमों का पालन, सत्य, व्यवस्था और नैतिकता आदि में निहित है।


आइए पता लगाएँ

अशोक ने अपने एक अभिलेख में अपने अधिकारियों के आचरण संबंधित विस्तृत निर्देश दिए हैं। उन्होंने यह सुनिश्चित करने की व्यवस्था की कि अधिकारी निष्पक्षता से कार्य करें। निम्नलिखित अनुवाद को पढ़िए और बताइए कि क्या ये उपाय साम्राज्य के प्रबंधन में सहायक सिद्ध हुए होंगे? यदि हाँ, तो कैसे?

'देवानामपिय' के आदेशानुसार- अधिकारियों और नगर न्यायाध्यक्षों को यह निर्देश दिया गया है- (...) तुम लोग अनेक सहस्र प्राणियों के ऊपर नियुक्त किए गए हो। तुम्हें मनुष्यों का स्नेह अर्जित करना चाहिए। सब मनुष्य मेरी संतान के समान हैं। जिस तरह मैं चाहता हूँ कि मेरी संतान इस लोक और परलोक दोनों में मंगल और सुख प्राप्त करे, उसी तरह मैं सब मनुष्यों के लिए कामना करता हूँ। (...) तुम्हें निष्पक्षता से न्याय करना चाहिए। (...) इन सबका मूल क्रोध का त्याग और धैर्य का पालन है। (...) यह लेख यहाँ इसलिए लिखवाया गया है कि नगर के न्याय शासक हमेशा सावधान रहें कि मनुष्यों को कभी अकारण कैद या यातना न दी जाए। (...) और इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु मैं प्रत्येक पाँचवें वर्ष एक नम्र और दयालु महामात्र भेजूंगा जो इसकी खोज करने के बाद ...., यह देखेगा कि मेरे आदेशों का पालन किया जाता है या नहीं।"

अशोक की मृत्यु के बाद मौर्य साम्राज्य लगभग आधी शताब्दी तक चलता रहा। हालाँकि, उनके उत्तराधिकारी साम्राज्य को एकजुट रखने में असमर्थ रहे और कई छोटे राज्य टूट गए और स्वतंत्र हो गए। लगभग 185 सा.सं.पू. भारत ने अपनी यात्रा के दूसरे चरण की शुरुआत की। अगले अध्याय में, इस यात्रा में भविषा और ध्रुव पुनः हमारे साथ जुड़ेंगे।

मौर्य काल में जीवन

पाटलिपुत्र जैसे नगर, शासन और वाणिज्यिक गतिविधि के प्रमुख केंद्र थे। नगर के पास प्रासाद, सार्वजनिक भवन और सुनियोजित सड़कें थीं। एक सुव्यवस्थित कराधान प्रणाली और संगठित व्यापार के साथ, राजकोषीय तंत्र भी था जिसने साम्राज्य के विकास और समृद्धि को बढ़ावा दिया। साम्राज्य के प्रशासनिक अधिकारी, व्यापारी और कारीगर नगरीय जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे।

इसे अनदेखा न करें

सोहगौरा ताम्रपत्र अभिलेख, जो चौथी-तीसरी शताब्दी सा.सं.पू. का है, भारत के सबसे प्राचीन प्रशासनिक अभिलेखों में से एक है। उत्तर प्रदेश के सोहगौरा में खोजे गए इस अभिलेख पर प्राकृत भाषा में ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है। यह माना जाता है कि इसे चंद्रगुप्त मौर्य के शासनकाल में जारी किया गया था। इस अभिलेख में दुर्भिक्ष से राहत एवं बचाव हेतु एक अन्नागार की स्थापना का उल्लेख है। यह राज्य द्वारा खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और संकट के समय अपने लोगों को सहारा देने के प्रयासों पर प्रकाश डालता है।Screenshot 2026-03-18 120549

चित्र 5.19

मेगस्थनीज के विवरण से भी उस समय के समाज पर कुछ प्रकाश पड़ता है। जनसंख्या का एक बड़ा भाग कृषि में संलग्न था, जो मगध साम्राज्य के लिए राजस्व का एक महत्वपूर्ण स्रोत था। एक वर्ष में दो फसलें बोई जाती थीं क्योंकि गर्मी और सर्दी दोनों में वर्षा होती थी। इससे स्पष्ट होता है कि दुर्भिक्ष की संभावना कम थी और लोगों को पर्याप्त भोजन उपलब्ध था। किसी भी संभावित स्थिति के लिए अन्न भंडारों में पर्याप्त अन्न होता था। अगर आस-पास युद्ध छिड़ भी जाए, तो भी किसानों को इससे बचाया जाता था और कृषि कार्य को क्षति नहीं पहुँचाई जाती थी।

लोहार, कुम्हार, बढ़ई, जौहरी और अन्य कारीगर नगरों में रहते थे। नगर भली-भाँति योजनाबद्ध थे और सड़कों पर पहचान सूचक लगे होते थे। संदेशवाहकों के माध्यम से संचार होता था जो एक स्थान से दूसरे स्थान पर संदेश पहुँचाते थे। घर लकड़ी के बने होते थे और दो-मंजिल तक ऊँचे हो सकते थे। आग लगने की स्थिति में सड़कों पर नियमित अंतराल पर पानी के बर्तन रखे जाते थे।

बाद के विवरणों में उल्लेख है कि लोग सूती कपड़े पहनते थे, जो घुटनों से नीचे टखनों तक पहुँचते थे और ऊपरी वस्त्र को वे अपने कंधों पर डालते थे। कुछ लोग अलंकृत चमड़े के जूते पहनते थे और उन जूतों के तलवे मोटे होते थे ताकि वे लंबे दिखें।

आइए पता लगाएँ

एक इतिहासकार के रूप में अगले पृष्ठ पर प्रस्तुत कलाकृतियों को ध्यान से देखें। मौर्य युग के लोगों और जीवन के बारे में आप इनसे क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं?

चित्र 5.20 में दर्शाई गई प्रतिकृति मूर्तिकला की सुंदरता और उत्कृष्टता के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण संदेश देने वाला एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसका शीर्ष भाग अशोक द्वारा वाराणसी के पास स्थित सारनाथ में बनवाया गया था। सारनाथ वह स्थान है जहाँ महात्मा बुद्ध ने अपना पहला प्रवचन दिया था और यह 'धर्मचक्र प्रवर्तन' के नाम से विख्यात है। इस कलाकृति के चार सिंह राजकीय शक्ति के प्रतीक हैं। कलाकृति के नीचे की चक्राकृति (वलयाकार) में चार शक्तिशाली पशुओं (हाथी, बैल, घोड़ा और सिंह) को दर्शाया गया है। इसके साथ ही धर्मचक्र, जो महात्मा बुद्ध की शिक्षाओं का प्रतीक है, वह भी इस पर अंकित है।

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चित्र 5.20 - मौर्य अपने अत्यधिक पॉलिश किए गए चमकदार स्तंभों के लिए प्रसिद्ध थे, जैसा सारनाथ स्तंभ के शीर्ष में देखा जा सकता है।

मौर्यकालीन जीवन और लोगों के कुछ प्रमुख योगदान

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चित्र 5.21 - पकी हुई मिट्टी (टेराकोटा) से निर्मित नृत्य करती बालिका की कलाकृति (उसके शिरोवस्त्र, केश-विन्यास और आभूषण पर ध्यान दें)
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चित्र 5.22 - पकी मिट्टी से निर्मित देवी की मूर्ति
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चित्र 5.23 - देवी (यक्षी) चंवर धारण किए हुए
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चित्र 5.24 - सप्तमातृकाओं या सात मातृ देवियों की पकी मिट्टी की कलाकृतियाँ (एक सतत परंपरा)
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चित्र 5.25 - पकी मिट्टी की घोड़े के सिर की कलाकृति (लगाम की विस्तृत संरचना पर ध्यान दें)

कला और वास्तुकला

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चित्र 5.26 - भारत में पत्थर से बनी प्राचीन संरचनाओं में से एक साँची का महान स्तूप। यह भारतीय वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरणों में से एक है। इस बात पर ध्यान दें कि इसकी मूल संरचना ईंटों से बनी थी। बाद में इसमें पत्थर का उपयोग करके इसे विस्तृत किया गया। कहा जाता है कि अशोक ने ध्यान, आराधना और अध्ययन के लिए ऐसे कई स्तूप, चैत्य और विहार बनवाए थे।
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चित्र 5.27 - धौली (वर्तमान ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर के समीप) में चट्टान पर उकेरी गई एक पूर्णकाय हाथी की मूर्ति। यह महात्मा बुद्ध (बुद्धिमान, शक्तिशाली, धैर्यवान और शांत) को प्रतीक के रूप में दर्शाता है। इसके निकट ही एक चट्टान पर अशोक का एक शिलालेख भी उत्कीर्ण किया गया है।

यह चित्र आपमें से कइयों को परिचित लग सकता है। वास्तव में, इस स्तंभ के शीर्ष को भारत के राष्ट्रीय प्रतीक के रूप में चुना गया है। Screenshot 2026-03-18 120855

चित्र 5.28
इसमें संस्कृत का आदर्श वाक्य 'सत्यमेव जयते' अर्थात 'सत्य की ही विजय होती है' जोड़ा गया है (बाईं ओर राष्ट्रीय प्रतीक देखें)। इसके अतिरिक्त, हमारे राष्ट्रीय ध्वज के मध्य में एक धर्मचक्र भी अंकित है, जैसा कि आपने देखा होगा। यह आदर्श वाक्य मुंडक उपनिषद से लिया गया है। पूर्ण रूप से यह 'सत्यमेव जयते नानऋतम' के रूप में पढ़ा जाता है। इसका अर्थ है- 'सत्य की ही जीत होती है, असत्य की नहीं।'

आइए पता लगाएँ

नीचे दर्शाए गए सिक्कों के अलग-अलग चिह्नों पर ध्यान दीजिए। इन चिह्नों का अर्थ क्या हो सकता है, क्या आप अनुमान लगा सकते हैं?

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चित्र 5.29.1 - मौर्यकालीन आहत (पंचमार्क) सिक्कों का एक संग्रह
चित्र 5.29.2- अशोक का एक आहत सिक्का

इसे अनदेखा न करें

स्तूप के केंद्र में स्थित बड़ी अर्धगोलाकार संरचना अंडाकार होती है। यह ब्रह्मांड का प्रतिनिधित्व करती है और प्रायः पवित्र अवशेषों को रखने के लिए निर्मित की जाती है। उपासक इसके चारों ओर परिक्रमा करते हैं जिसे 'प्रदक्षिणा' कहा जाता है।

साम्राज्यों की दुर्बलताएँ

आप आगे की कक्षाओं में विश्व के अन्य स्थानों पर अतीत के शक्तिशाली साम्राज्यों के बारे में पढ़ेंगे जैसे – रोमन, फारसी, ऑटोमन, स्पैनिश, रूसी, ब्रिटिश, इत्यादि। वे सभी बहुत पहले ही समाप्त हो चुके हैं, परंतु इतिहासकार इन साम्राज्यों के पतन के कारणों पर निरंतर चर्चा करते रहते हैं।

जैसा कि हमने देखा, इन कारणों में से एक साम्राज्य के कुछ क्षेत्रों का स्वतंत्र होने का प्रयास है। ऐसा तब होता है जब सम्राट को युद्ध या सूखे के समय अधिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। इसके फलस्वरूप स्थानीय शासकों पर कर की माँग बढ़ जाती है। इससे उनमें असंतोष की स्थिति उत्पन्न होती है। यदि एक शक्तिशाली सम्राट के बाद एक दुर्बल सम्राट आता है, तो स्थानीय राजा या प्रमुख इस अवसर का लाभ उठाने का प्रयास करते हैं और सम्राट को कर देना बंद कर देते हैं। साथ ही, एक साम्राज्य जितना वृहत होता है, उसे एक साथ संगठित रखना उतना ही कठिन होता है, जैसा कि एलेक्जेंडर के साथ हुआ था। सुदूर क्षेत्र प्रायः साम्राज्य से अलग होने वाले पहले क्षेत्र होते हैं। अंत में, प्राकृतिक आपदाओं (जैसे- लंबे समय तक सूखा या बाढ़) के कारण होने वाले आर्थिक संकट भी साम्राज्य के पतन का कारण बन सकते हैं।

अतः साम्राज्य अपने आप में एक विरोधाभास की तरह है। एक ओर, वे राजनीतिक एकता स्थापित कर सकते हैं जैसे कि मौर्य साम्राज्य ने लगभग संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप में किया था। वे छोटे-छोटे राज्यों के बीच में युद्ध को कम या समाप्त भी कर सकते हैं। वास्तव में, एक सुप्रबंधित साम्राज्य छोटे युद्धरत राज्यों की तुलना में अधिक समृद्धि ला सकता है। दूसरी ओर, साम्राज्य सामान्यतः निरंतर युद्ध के द्वारा स्थापित होते हैं और अपना अस्तित्व शक्ति और दंड के द्वारा बनाए रखते हैं, जिससे वे समय के साथ आंतरिक रूप से दुर्बल और अस्थिर हो जाते हैं।

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आगे बढ़ने से पहले...

  • साम्राज्य अनेक छोटे राज्यो या क्षेत्रों से मिलकर बना एक बड़ा क्षेत्र होता है। सम्राट अपने साम्राज्य का विस्तार मुख्यतः प्रसिद्धि प्राप्त करने, शक्ति अर्जित करने, सैन्य शक्ति तथा संसाधनों और आर्थिक जीवन को नियंत्रित करने के लिए करते थे।
  • भारत के प्रारंभिक साम्राज्य प्रचुर प्राकृतिक संसाधनों, सिंचाई और परिवहन के लिए नदियों की उपस्थिति तथा व्यापार के लिए विभिन्न प्रकार के उत्पादों से संपन्न क्षेत्रों में उदित हुए।
  • उत्तर-पश्चिम भारत में एलेक्जेंडर के अभियान का राजनीतिक प्रभाव सीमित था, लेकिन इसने भारतीय-ग्रीक सांस्कृतिक संपर्कों के द्वार खोल दिए।
  • मौर्यों ने एक विशाल साम्राज्य बनाया जिसकी विरासत शताब्दियों तक चली। उनकी विरासत में व्यापारिक मार्गों और आर्थिक प्रणालियों को सुदृढ़ करना, व्यापार के लिए सिक्कों का व्यापक उपयोग, उत्कृष्ट रूप से संरचित की गई नगरीय बस्तियाँ और प्रशासन की एक विस्तृत प्रणाली सम्मिलित है। उन्होंने कला और
  • वास्तुकला को भी प्रोत्साहन दिया। अशोक अपनी उपलब्धियों का प्रसार करने और एक दयालु सम्राट की छवि प्रस्तुत करने के लिए उत्सुक थे। उन्होंने अपनी प्रजा को धर्म का पालन करने के लिए प्रोत्साहित किया।

प्रश्न और क्रियाकलाप

  1. साम्राज्य की विशेषताएँ क्या हैं और यह राज्य से किस प्रकार भिन्न है? इसकी व्याख्या कीजिए।
  2. राज्यों से साम्राज्यों में परिवर्तन के लिए महत्वपूर्ण कारक क्या हैं?
  3. एलेक्जेंडर को विश्व इतिहास में एक महान शासक माना जाता है, आपके विचार से ऐसा क्यों है?
  4. प्रारंभिक भारतीय इतिहास में मौर्य वंश को महत्वपूर्ण माना जाता है। कारण बताएँ।
  5. कौटिल्य के कुछ प्रमुख विचार क्या थे? इनमें से कौन-से विचार आप आज भी आस-पास देख सकते हैं?
  6. अशोक और उसके साम्राज्य के बारे में असाधारण बातें क्या थीं? उनमें से कौन-सी बातें आज भी भारत को प्रभावित करती रही हैं और क्यों? अपने विचार लगभग 250 शब्दों में लिखिए।

    देवताओं के प्रिय राजा पियदसी कहते हैं- मेरे धम्माधिकारी सार्वजनिक लाभ के लिए अनेक विषयों में व्यस्त हैं। वे सभी संप्रदाओं के सदस्यों, तपस्वियों और गृहस्थों दोनों के बीच व्यस्त हैं। मैंने कुछ को बौद्ध संघ, ब्राह्मणों और आजीवकों ..... जैनियों..... और विभिन्न संप्रदायों के लिए नियुक्त किया है। अधिकारियों की अनेक श्रेणियाँ हैं और उनके कई प्रकार के कर्तव्य है। मेरे धम्माधिकारी इन और अन्य संप्रदायों के विषयों में व्यस्त हैं।

  7. अशोक के उपरोक्त शिलालेख को पढ़ने के उपरांत, क्या आपको लगता है कि वे अन्य धार्मिक विश्वासों और विचारधाराओं के प्रति सहिष्णु थे? अपने विचार कक्षा में साझा कीजिए।
  8. ब्राह्मी लिपि एक लेखन प्रणाली थी जिसका प्राचीन भारत में व्यापक रूप से उपयोग किया जाता था। इस लिपि के बारे में अधिक जानने का प्रयास कीजिए। जहाँ भी आवश्यक हो, अपने शिक्षक से सहायता लीजिए। एक लघु कार्य परियोजना बनाएँ और इस दौरान आपने ब्राह्मी लिपि के बारे में जो कुछ भी सीखा, उसे संलग्न कीजिए।
  9. मान लीजिए कि आपको तीसरी शताब्दी सा.सं.पू. में कौशांबी से कावेरीपट्टनम की यात्रा करनी है। आप यह यात्रा कैसे करेंगे? इस यात्रा के दौरान आप कहाँ-कहाँ ठहरेंगे और आपको इसमें कितना समय लगेगा?