अध्याय - 6
पुनर्गठन का काल
सतत जीवंत परंपरा और नवजीवन की एक अद्भुत शक्ति के कारण इस भूमि ने असंख्य परिवर्तनों के माध्यम से स्वयं को समायोजित किया है।
- जगदीश चंद्र बोस (1917)

महत्वपूर्ण प्रश्न ?
- मौर्योत्तर काल को कभी-कभी 'पुनर्गठन का काल' क्यों कहा जाता है?
- वह कौन-से मूल्य और सिद्धांत थे जिन्होंने इस काल के सम्राटों का मार्गदर्शन किया?
- विदेशी आक्रमणकारियों ने किस प्रकार भारतीय समाज में समाहित होकर सांस्कृतिक संगम में योगदान दिया?
भविषा और ध्रुव मौर्य साम्राज्य की अपनी यात्रा से लौटकर विश्राम कर चुके थे और अब एक नवीन साहसिक यात्रा के लिए उत्सुक थे। उन्होंने पुनः इतिहास काल-यंत्र का उपयोग करने का निश्चय किया और एक नवीन ऐतिहासिक कालखंड में पहुँच गए। वहाँ उन्होंने विविध कलाकृतियों का एक संग्रह देखा, जिनमें से प्रत्येक एक-दूसरे से बिलकुल भिन्न थीं (चित्र 6.1.1 देखें)। वे सोचने लगे कि ये कलाकृतियाँ किसी एक ही साम्राज्य की हैं या अनेक साम्राज्यों की? उनका अनुमान सही था। इस अध्याय में हम एक लंबे कालखंड की यात्रा करेंगे। तो चलिए आरंभ करते हैं...
अशोक के उत्तराधिकारियों के विषय में बहुत कम जानकारी मिलती है। सामान्यतः यह स्वीकार किया जाता है कि मौर्य साम्राज्य के अंतिम शासक की हत्या लगभग 185 सा.सं.पू. में उसके सेनापति पुष्यमित्र शुंग द्वारा की गई थी। यह घटना मौर्य साम्राज्य के विघटन का कारण बनी, जैसा कि पिछले अध्याय में बताया गया है। सम्राट अशोक के लगभग आधी शताब्दी पश्चात ही साम्राज्य का विघटन हो गया था। इस घटनाक्रम के उपरांत उपमहाद्वीप में अनेक नवीन राज्य उभरे, जो पहले मौर्य साम्राज्य की अधीनता में शासन कर रहे थे। उत्तर-पश्चिम का क्षेत्र दुर्बल हो गया जिससे भारतीय उपमहाद्वीप बाह्य आक्रमणों के लिए असुरक्षित हो गया।

आइए पता लगाएँ
एक पृष्ठ पर दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. के प्रारंभिक वर्ष से लेकर तीसरी शताब्दी सा.सं. के अंतिम वर्ष तक की अवधि को चिह्नित करते हुए एक समय-रेखा बनाइए। यह अवधि कुल कितने वर्षों को सम्मिलित करती है? जैसे-जैसे हम अध्याय में आगे बढ़ेंगे, समय-रेखा पर प्रमुख व्यक्तियों, राज्यों और घटनाओं को चिह्नित कीजिए।

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आइए पता लगाएँ
पिछले अध्याय में आपने मौर्य साम्राज्य का मानचित्र देखा (चित्र 5.13)। चित्र 6.2 मौर्योत्तर काल का मानचित्र है। आप उस क्षेत्र में कितने राजवंशों की गणना कर सकते हैं जो पूर्व में मौर्य शासन के अधीन थे?
अब नए राज्य क्षेत्रीय नियंत्रण के लिए स्पर्द्धा कर रहे थे। इसके लिए कभी-कभी शांतिपूर्ण उपाय, जैसे – पड़ोसी साम्राज्य के साथ वैवाहिक गठबंधन या युद्ध के लिए सेना का प्रयोग जैसे साधनों का प्रयोग किया जा रहा था। याद रखें कि जो क्षेत्र साम्राज्य की सीमा के पास थे। उन पर अधिकार करने के लिए खींचतान मची थी, क्योंकि इन क्षेत्रों पर नियंत्रन का अर्थ था साम्राज्य को बाह्य आक्रमण से बचाना।
इन सभी राजनैतिक गतिविधियों के समानांतर कला, शिल्प और साहित्य के क्षेत्र में विकास में तेजी आई और सांस्कृतिक आदान-प्रदान भी समृद्ध हुआ। इन सभी के बारे में हम आगे पढ़ेंगे।

शुंगों का उत्कर्ष
पुष्यमित्र शुंग ने शुंग राजवंश की स्थापना की और उत्तर एवं मध्य भारत के कुछ भागों पर शासन किया। उन्होंने स्वयं को सबसे शक्तिशाली शासक के रूप में स्थापित करने के लिए अश्वमेध यज्ञ नामक वैदिक अनुष्ठान किया। यद्यपि उनका साम्राज्य पूर्ववर्ती मौर्य साम्राज्य की तुलना में छोटा था (उन दोनों के मानचित्र की तुलना कीजिए), फिर भी उन्होंने अपने साम्राज्य को बाहरी आक्रमणकारियों से सुरक्षित रखा तथा ग्रीकों के साथ कुछ सैनिक अभियानों के बाद मैत्रीपूर्ण संबंध रखे। परंतु तत्पश्चात शुंग साम्राज्य अधिक समय तक स्थायित्व नहीं पा सका और लगभग एक शताब्दी बाद ही इसका अस्तित्व समाप्त हो गया।
इस काल में वैदिक अनुष्ठानों और प्रथाओं का पुनरुत्थान हुआ, परंतु साथ ही अन्य दर्शनों और मतों का भी व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ।
इसे अनदेखा न करें

संस्कृत इस काल में दार्शनिक और साहित्यिक रचनाओं के लिए एक प्रमुख लोकप्रिय भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हुई। क्या आपको कक्षा 6 की 'शारीरिक शिक्षा और स्वास्थ्य' में योग सूत्रों के कुछ अंश याद हैं? ये योग सूत्र इस काल में महर्षि पतंजलि द्वारा संकलित किए गए थे।
शुंगों ने साहित्य, कला और वास्तुकला का संरक्षण किया। भरहुत स्तूप (मध्य प्रदेश), शुंगकालीन कला का एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता है। संभवतः इसका मूल निर्माण सम्राट अशोक के काल में हुआ था, किंतु शुंगों ने इसमें अत्यंत सुंदर वेदिकाएँ तथा महात्मा बुद्ध के जीवन की कथाओं को दर्शाते हुए उत्कीर्णित शिल्प जोड़े। ये बौद्ध कला के प्रारंभिक उदाहरणों में गिने जाते हैं।

चित्र 6.5.3 - गायकों और नर्तकों की मंडली; चित्र 6.5.4 - धर्म-चक्र को उठाए हुए हाथी
आइए पता लगाएँ
नीचे भरहुत स्तूप की एक पट्टिका का चित्र है। दाहिने तरफ की दोनों आकृतियों को ध्यानपूर्वक देखिए। वे क्या कर रही हैं? क्या आप उनके व्यवसाय का अनुमान लगा सकते हैं? उनके परिधानों पर ध्यान दीजिए। यह हमें उनके बारे में क्या बता रहे हैं? पट्टिका में आपको जो अन्य विवरण दिखे, उन्हें सूचीबद्ध कर कक्षा में उन पर चर्चा कीजिए।

आइए पता लगाएँ
चित्र 6.6 के कोलाज में चित्रों को ध्यान से देखिए। कपड़ों, आभूषणों और दैनिक उपयोग की अन्य वस्तुओं पर अपने विचार लिखिए।
सातवाहन
उपलब्ध सीमित साक्ष्यों से प्रतीत होता है कि शुंगों ने अपने पड़ोसी प्रदेशों से अनेक युद्ध किए। संभवतः इन में सातवाहन भी सम्मिलित थे, जिन्होंने दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. से दक्षिण में दक्कन के विस्तृत भूभाग पर शासन किया। शुंग साम्राज्य के दक्षिण में स्थित इस शक्तिशाली वंश को कभी-कभी 'आंध्र' के रूप में भी जाना जाता है। सातवाहन एक शक्तिशाली राजवंश था और उसका साम्राज्य मुख्यतः वर्तमान आँध्र प्रदेश, तेलंगाना तथा महाराष्ट्र के प्रदेशों में विस्तृत था। भिन्न-भिन्न समय पर इसकी राजधानी अनेक स्थानों पर रही जिसमें अमरावती और प्रतिष्ठान विशेष रूप से प्रसिद्ध (पैठन) थीं। ऐसा प्रतीत होता है कि सातवाहन साम्राज्य में व्यापार और वाणिज्य बहुत फला-फूला।
सातवाहन शासकों द्वारा जारी किए गए सिक्के भारत के विभिन्न क्षेत्रों, जैसे – गुजरात से लेकर आंध्र प्रदेश तक अर्थात पश्चिमी एवं पूर्वी समुद्री तटों से प्राप्त हुए हैं। वास्तव में, अनेक सिक्कों पर जहाज के चित्र अंकित हैं, जो यह दर्शाते हैं कि समुद्री व्यापार तत्कालीन आर्थिक जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग था। यहाँ दिए गए सिक्के पर दर्शाए गए जहाज की बनावट से पता चलता है कि जहाज निर्माण और नौपरिवहन की तकनीक अत्यधिक उन्नत थी। कृष्णा-गोदावरी नदी घाटियों में कृषि फल-फूल रही थी, जिसने राज्य को आर्थिक स्थिरता प्रदान की। सातवाहनों के पास सक्रिय व्यापार तंत्र था जो रोमन साम्राज्य तक विस्तृत था। इस व्यापारिक गतिविधि में मसालों, वस्त्रों, चंदन और विलासिता की वस्तुएँ, जैसे- स्वर्णाभूषित मोती, हाथी दाँत इत्यादि का व्यापार होता था जबकि काँच और सुगंधित मलहम जैसे उत्पादों का आयात किया जाता था। व्यापार पर लगने वाले कर एवं शुल्क राज्य की आय में वृद्धि करते थे।
सातवाहन काल में जन-जीवन
सातवाहन परंपरा के अनुसार, राजकुमारों के नाम प्रायः उनकी माताओं के नाम पर रखे जाते थे। उदाहरण के लिए, गौतमीपुत्र शातकर्णी का नाम उनकी माता गौतमी बलश्री के नाम पर रखा गया था। गौतमी बलश्री एक शक्तिशाली रानी थीं, जिन्होंने बौद्ध भिक्षुओं को भूमि दान दी और नासिक में एक महत्वपूर्ण शिलालेख उत्कीर्ण करवाया, जो राज्य में उनके प्रभाव को दर्शाता है।

आइए विचार करें
आपके अनुसार राजा के नाम के आरंभ में उसकी माँ का नाम लिखने की परंपरा का क्या अर्थ है?
एक अन्य प्रमुख अभिलेख पुणे के निकट स्थित नानेघाट की गुफाओं में महाराष्ट्र से प्राप्त हुआ है (चित्र 6.9)। यह एक सातवाहन विधवा रानी पर केंद्रित है, जिन्होंने उल्लेखनीय रूप से अश्वमेध यज्ञ सहित अनेक वैदिक अनुष्ठान संपन्न किए। इस अभिलेख में हमें इंद्र, चंद्र और सूर्य जैसे वैदिक देवताओं का उल्लेख मिलता है। हमें रानी द्वारा दिए गए दान की भी सूची मिलती है जिनमें भूमि, गायें, घोड़े, हाथी, चाँदी के सिक्के एवं अन्य वस्तुएँ सम्मिलित थीं और जो पुरोहितों, अतिथियों, कर्मकारों, विद्वानों एवं भिक्षुओं को समर्पित की गई थीं। ।
ये अभिलेख 'ब्राह्मी लिपि' में लिखे गए हैं और इनमें कुछ अंक (संख्याओं के प्रतीक) भी मिलते हैं, जिनका स्वरूप आज के अंकों से मिलता-जुलता है, जैसा कि नीचे दर्शाया गया है। यह इस बात का एक साक्ष्य है कि आधुनिक अंकों की उत्पत्ति भारत में ही हुई

आइए विचार करें
उपर्युक्त अंकों की श्रृंखला में से कौन-से अंक कुछ-कुछ हमारे आधुनिक अंकों जैसे दिखते हैं? कौन-से नहीं?
सातवाहन वासुदेव (कृष्ण का ही एक नाम) के उपासक थे। यद्यपि उन्होंने अन्य दर्शन पद्धतियों का भी संरक्षण किया, जो उनके शासनकाल में समृद्ध हुईं। उदाहरण के लिए, सातवाहन नरेशों ने प्रायः वैदिक विद्वानों, जैन मुनियों तथा बौद्ध भिक्षुओं को कर-मुक्त कृषि भूमि प्रदान की, जिससे वे अपने अध्ययन और साधना में संलग्न रह सकें।

आइए विचार करें
पीतलखोरा से प्राप्त यक्ष की इस मूर्ति के हाथ पर एक लेख उत्कीर्ण है- 'कन्हणदासेन हीरामकारेना काट' जिसका अर्थ है 'कन्हणदास नामक स्वर्णकार द्वारा निर्मित'। क्या यह रोचक नहीं है कि एक सुनार भी पत्थर की मूर्ति बना सकता था? आपके विचार में इससे हमें उस समय के लोगों के व्यवसायों के बारे में क्या पता चलता है?
तीसरी शताब्दी सा.सं. मे सातवाहन साम्राज्य छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यो मे विखंडित हो गया। इसके विघटन के कई कारण रहे। इनमें सबसे प्रमुख था, केंद्रीय शासन की दुर्बलता और धीरे-धीरे होता हुआ आर्थिक पतन। इससे क्षेत्रीय शक्तियों को अपनी सत्ता स्थापित करने या पुनः प्रतिष्ठित करने का अवसर मिला और नए-नए राज्यों का उदय हुआ।
चेदियों का आगमन
अब हम थोड़ा पीछे लौटते हैं। क्या आपको पिछले अध्याय में वर्णित कलिंग युद्ध का स्मरण है? मौर्य साम्राज्य के पतन के उपरांत चेदि वंश के अधीन कलिंग एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरा।
खारवेल इस वंश के एक प्रमुख राजा थे। वे जैन दर्शन के अनुयायी थे और उन्हें कभी-कभी 'भिक्षु-राजा' कहा जाता था। यद्यपि वे सभी मतों के प्रति सम्मान-भाव रखते थे। भुवनेश्वर के समीप स्थित उदयगिरि-खंडगिरि गुफाएँ - जो संभवतः जैन मुनियों के लिए बनाई गई थीं- सुसज्जित चित्रपटों, प्रतिमाओं तथा पत्थरों को काटकर बनाए गए बड़े कक्षों से युक्त हैं और शिल्पकारों की अद्भुत कुशलता को प्रदर्शित करती हैं। ये गुफाएँ अपनी रचना और कलात्मकता के कारण शैलकृत स्थापत्य शैली का एक उत्कृष्ट उदाहरण बनती हैं, जिसकी विस्तृत चर्चा हम अगली कक्षाओं में करेंगे।

चित्र 6.13.2- हाथीगुंफा अभिलेख; चित्र 6.13.3 - रामायण के एक दृश्य को दर्शाती उत्कीर्ण पट्टिका
उदयगिरि की एक प्रमुख गुफा में हाथीगुंफा अभिलेख उत्कीर्ण है, जो ब्राह्मी लिपि में लिखा गया है। यह अभिलेख राजा खारवेल के विजयी सैन्य अभियानों से लेकर जनकल्याण हेतु किए गए पुण्य कार्यों तक की प्रतिवर्ष की उपलब्धियों का वर्णन करता है। खारवेल ने सौ प्रदेशों से 'मुनियों एवं ऋषियों की परिषद' की स्थापना का गौरवपूर्ण उल्लेख किया है तथा स्वयं को 'असामान्य सद्गुणों से युक्त, सर्वमतों का सम्मानकर्ता और समस्त देवालयों का पनरुद्धारक' घोषित किया है। एक बार पनः हम पाते हैं कि एक नरेश सभी दर्शनों एवं मतों को संरक्षण प्रदान करने में गौरव का अनुभव करता था। यह वही आधारभूत तत्व है जिसे हम 'भारतीय सांस्कृतिक दृष्टि' कह सकते हैं।
आइए विचार करें
लगभग दो सहस्राब्दी पूर्व के इन शैलकृत कक्षों की समरूपता पर ध्यान दीजिए। शिल्पकारों को केवल छेनी और हथौड़ी से यह अद्भुत दक्षता कैसे प्राप्त हुई होगी? कल्पना कीजिए कि आप उस युग में एक शिल्पी हैं और अपने कौशल से पत्थर को कला में रूपांतरित कर रहे हैं। आप किन उपकरणों का प्रयोग करेंगे?
दक्षिण में साम्राज्य और जन-जीवन
भारत भूमि के दक्षिणी भाग में दूसरी या तीसरी शताब्दी सा.सं.पू. से लेकर तीसरी शताब्दी सा.सं. तक का कालखंड तीन महान शक्तिशाली राजवंशों के उत्कर्ष का साक्षी रहा-चेर, चोल, एवं पांड्य। ये वंश आपसी प्रतिद्वंद्विता के साथ-साथ व्यापार एवं संस्कृति की उन्नति में भी योगदान देते रहे। हमें स्मरण है कि सम्राट अशोक का साम्राज्य सुदूर दक्षिण तक नहीं पहुँचा था (जिसका उल्लेख उन्होंने अपने शिलालेखों में किया है)। इससे यह स्पष्ट होता है कि ये राज्य मौर्य साम्राज्य के चरमोत्कर्ष के समय भी स्वतंत्र रहे। यद्यपि खारवेल ने यह दावा किया था कि उन्होंने दक्षिण भारतीय राजाओं के एक महासंघ को पराजित किया, जो उनकी सीमाओं के लिए संकट थे। परंत इस यद्ध का स्थान ज्ञात नहीं है और यह भी स्पष्ट नहीं है कि उन्होंने दक्षिण क्षेत्र पर आक्रमण किया था।
आइए विचार करें
चित्र 6.14 में दिए गए मानचित्र में आप विभिन्न राज्यों के नामों के साथ कुछ विशिष्ट चिह्न भी देख सकते हैं। ये चिह्न क्या दर्शाते हैं? विचार कीजिए कि ये प्रत्येक राज्य की विशिष्ट पहचान को किस प्रकार दर्शाते हैं?
उस काल में अनेक महान कवियों का प्रादुर्भाव हुआ, जिनकी रचनाएँ 'संगम साहित्य' में सं शब्द संस्कृत के 'संघ' से उत्पन्न है, जिसका अर्थ होता है 'समिति' या 'एकत्र होना'। इस संदर्भ में, यहाँ इसका तात्पर्य कवियों की सभाओं से है। संगम साहित्य दक्षिण भारत का प्राचीनतम साहित्य है, जिसमें विभिन्न काव्य-संग्रहों का समावेश है। ये रचनाएँ तत्कालीन युग की समाज-व्यवस्था और संस्कृति के अध्ययन में इतिहासकारों के लिए महत्वपूर्ण साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं। मुख्यतः संगम काव्य में अत्यंत कुशल एवं सरल भाषा-शैली में व्यक्तिगत भावनाएँ (जैसे- प्रेम) तथा सामाजिक मूल्य (जैसे- वीरता और उदारता) अभिव्यक्त किए गए हैं।

चोल वंश
संगम साहित्य में तीन राजाओं का उल्लेख मिलता है- चोल, चेर और पांड्य। इनमें चोल एक शक्तिशाली राजवंश था, जिसने तीसरी शताब्दी सा.सं.पू. से तेरहवीं शताब्दी सा.सं. तक दक्षिण भारत के विविध भागों पर शासन किया। चोल नरेश करिकाल के विषय में कहा जाता है कि उन्होंने चेर और पांड्य की संयुक्त सेना को पराजित कर अपनी सर्वोच्चता स्थापित की थी।
सिलप्पदिकारम् - पायल की कथा
इस प्रसिद्ध महाकाव्य की रचना संगम-संग्रह के तुरंत बाद की गई थी। इसमें कण्णगी की कथा वर्णित है। वह अपने पति कोवलन के साथ समृद्ध चोल राजधानी पुहार (जिसे आज के कावेरीपट्टनम् से जोड़ा जाता है) में सुखपूर्वक रहती थी। परंतु कोवलन एक नर्तकी पर आसक्त हो गया और उसके पीछे अपनी संपूर्ण संपत्ति नष्ट कर बैठा। कालांतर में जब उसे अपनी भूल का भान हुआ तो वह कण्णगी के पास लौटा। कण्णगी ने उसे क्षमा कर दिया। नए सिरे से जीवन प्रारंभ करने हेतु वे दोनों पांड्य राज्य की राजधानी मदुरै पहुँचे।
'सिलप्पदिकारम्' की सरस एवं मार्मिक कविता न्याय के सिद्धांत तथा राजधर्म की महत्ता को उद्घटित करती है। यह महाकाव्य हमें उन समृद्ध व्यापारिक नगरों के माध्यम से तीन राजवंशों की यात्रा कराता है, साथ ही विविध दर्शनों की झलक भी प्रस्तुत करता है।
आइए पता लगाएँ
आइए विचार करें
राजा की मूर्ति देखिए। इस मूर्ति में राजा को कैसे दर्शाया गया है? उनकी देह-मुद्रा, वस्त्र और मुख-मुद्रा उनके सामर्थ्य एवं प्रतिष्ठा के विषय में क्या संकेत देते हैं?

राजा करिकाल ने जनहित के लिए अनेक परियोजनाएँ प्रारंभ की। उन परियोजनाओं में सबसे प्रसिद्ध है 'कल्लनई' या 'ग्रैंड एनीकट'। यह एक संश्लिष्ट जल-वितरण प्रणाली है। यह कावेरी नदी के श्रीरंगम द्वीप से नीचे की ओर भौगोलिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान पर है। इस के द्वारा कावेरी नदी के जल को केंद्रीय एवं दक्षिण कावेरी डेल्टा क्षेत्रों की ओर मोड़ा गया, जिससे अधिकाधिक भूमि कृषि योग्य बन सकी। इस कारण यह क्षेत्र 'दक्षिण का अन्न भंडार' कहलाया। समय के साथ कई बार इसका जीर्णोद्धार होता रहा और यह आज भी प्रयोग में है। यह प्रणाली तमिलनाडु के लाखों लोगों को सिंचाई के लिए जल उपलब्ध कराकर कृषि को सुदृढ़ करती है।
चेर राजवंश
चेरों को 'केरलपुत्र' भी कहा जाता था। उन्होंने तमिलनाडु और केरल के पश्चिमी भागों पर शासन किया। उनकी राजधानी 'वंजि' थी, जो वर्तमान तमिलनाडु का करूर नगर है। उन्होंने इस क्षेत्र की सांस्कृतिक और आर्थिक उन्नति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तमिल साहित्य के विकास को प्रोत्साहन दिया तथा संगम कवियों को आश्रय प्रदान किया।
चेर शासक रोमन साम्राज्य और पश्चिम एशिया के साथ अपने विस्तृत व्यापारिक संबंधों के लिए प्रसिद्ध थे। वे भारत से मसाले, लकड़ी, हाथीदाँत और मोती जैसी वस्तुओं का निर्यात करते थे, जिससे यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार का केंद्र बन गया।
आइए विचार करें
क्या आपने कभी सोचा है कि इतिहासकार कई शताब्दियों पहले सुदूर स्थित दो राज्यों के बीच व्यापारिक संबंधों का पता कैसे लगाते हैं? आइए, इस पर विचार-विमर्श करें कि यह जानकारी कैसे प्राप्त की जाती होगी।
चेर राजाओं ने अपने शासनकाल में अनेक सिक्के निर्गत किए। क्या आप यहाँ दिए गए किसी एक सिक्के पर चेर राजवंश का राजचिह्न देख पा रहे हैं?

पांड्य वंश
तमिलनाडु तथा उसके आस-पास के क्षेत्रों पर पांड्य नरेशों का शासन कई शताब्दियों सा.सं.पू. से चला आ रहा था। इनकी राजधानी वर्तमान 'मदुरै' थी। विभिन्न पांड्य नरेशों ने राज्य का विस्तार किया। ग्रीक लेखक मेगस्थनीज ने अपनी रचना इंडिका में इस राज्य का उल्लेख एक समृद्ध एवं सुशासित राज्य के रूप में किया है, जो आंतरिक व्यापार के साथ-साथ ग्रीस एवं रोम जैसी दूरस्थ शक्तियों से व्यापार में संलग्न था। उदाहरणा के लिए, खारवेल ने उल्लेख किया है कि उन्हें पांड्य राज्य से सैकड़ों मोती प्राप्त हुए। पांड्य वंश भारतीय उपमहाद्वीप की एक महत्वपूर्ण नौसैनिक शक्ति भी था। उत्तरवर्ती पांड्य नरेशों ने कला, वास्तुकला और समग्र क्षेत्र की समृद्धि में विशेष योगदान दिया।आइए विचार करें
पांड्य राज्य मोतियों के लिए प्रसिद्ध था। आपके विचार में मोती उस समय व्यापार की दृष्टि से क्यों महत्वपूर्ण था?
पांड्य नरेशों ने अनेक अभिलेखों में यह उल्लेख किया कि वे प्रजा के कल्याण के प्रति अत्यंत सजग थे तथा उन्होंने समस्त दर्शन-परंपराओं और आस्थाओं को संरक्षण एवं प्रोत्साहन प्रदान किया।
इंडो-ग्रीक आक्रमण
दक्षिण भारत की अपनी संक्षिप्त यात्रा के उपरांत अब समय है, उत्तर भारत की ओर लौटने का जहाँ इस काल में एक बिल्कुल भिन्न प्रकार की घटना घटित होने जा रही थी। अब तक हमने कुछ देशी राजवंशों के विषय में अध्ययन किया, किंतु इसी समय में कुछ बाह्य आक्रमणकारियों का आगमन भी हुआ। इन्होंने उत्तर-पश्चिमी सीमा से प्रवेश कर उत्तर-पश्चिम, उत्तर एवं मध्य भारत के कुछ भूभागों पर अधिकार कर लिया।

मौर्य वंश के बाद, उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र (वर्तमान पाकिस्तान और अफगानिस्तान के समीपवर्ती क्षेत्र) इंडो-ग्रीक आक्रमण हेतु सुगम क्षेत्र बन गया। यद्यपि, जब वे विजेता के रूप में आए, तो वे समृद्ध स्थानीय संस्कृति से बहुत प्रभावित हुए। इस सांस्कृतिक संपर्क ने शासन, कला, भाषा और दैनिक जीवन में ग्रीक और भारतीय तत्वों के मिश्रण से क्षेत्र के सांस्कृतिक परिदृश्य को आकार दिया।
विदिशा (मध्य प्रदेश) के पास स्थित हेलियोडोरस स्तंभ ऐसे संबंधों का एक उल्लेखनीय उदाहरण है। इसका नाम एक इंडो-ग्रीक राजदूत पर पड़ा, जिसने अपने अभिलेखों में वासुदेव की स्तुति 'देवताओं के देवता' के रूप में की है। इस अभिलेख में यह भी अंकित है - 'तीन अमर उपदेश (पदचिह्न) आत्म-संयम, दान, चेतना हैं [...] जिनका आचरण स्वर्ग की प्राप्ति कराता है।'उत्तर भारत में उत्खनन के दौरान पुराविदों को अनेक इंडो-ग्रीक सिक्के प्राप्त हुए हैं, जिनसे हमें इन शासकों के बारे में अधिकांश जानकारी मिली है। ये सिक्के सोने, चाँदी, तांबे और गिलट धातु से बने थे, जिन पर प्रायः एक ओर राजा और दूसरी ओर ग्रीक देवता अंकित होते थे। हालाँकि, कुछ सिक्कों पर वासुदेव-कृष्ण और लक्ष्मी जैसे भारतीय देवी-देवता भी अंकित थे। इंडो-ग्रीक शासन इंडो-सीथियन या शकों के आक्रमणों के साथ समाप्त हो गया।
आइए पता लगाएँ
आपके विचार में कुछ इंडो-ग्रीक सिक्कों पर वासुदेव-कृष्ण या लक्ष्मी जैसे देवी-देवताओं के चित्र अंकित होने का क्या अर्थ रहा होगा?

इसे अनदेखा न करें
शकों या इंडो-सीथियन ने भी उपमहाद्वीप के उत्तर पश्चिम भाग पर आक्रमण किया और दूसरी शताब्दी सा.सं.पू. से पाँचवी शताब्दी सा.सं. तक शासन किया। इनका उदय इंडो-ग्रीक के पतन के पश्चात हुआ और ये कुषाणों के आगमन तक सत्ता में रहे। इस अवधि के दौरान शक संवत पंचांग विकसित किया गया। यह ग्रेग्रोरियन कैलेंडर से 78 साल पीछे है (जनवरी से मार्च को छोड़कर, यह 79 साल पीछे होता है)। इसे 1957 में भारतीय राष्ट्रीय पंचांग के रूप में स्वीकार किया गया।

कुषाणों का उदय
कुषाण मूलतः मध्य एशिया के निवासी थे। संभवतः उन्होंने दूसरी शताब्दी सा.सं. में भारत में प्रवेश किया। अपने चरमोत्कर्ष के समय उनका साम्राज्य मध्य एशिया से लेकर उत्तर भारत के विशाल भूभाग तक विस्तृत था। उनके शासन में व्यापक सांस्कृतिक मेल-जोल देखने को मिलता है। इसका भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास पर गहरा प्रभाव पड़ा। जब कनिष्क अपने सैन्य अभियानों में व्यस्त नहीं रहते थे, तब वे कला और संस्कृति को प्रोत्साहित करते थे, जिससे नवीन कला शैलियों का विकास हुआ।
आइए पता लगाएँ
इन सिक्कों को ध्यान से देखिए। सम्राट के अतिरिक्त और कौन इस मुद्रा पर अंकित है?
5वीं शताब्दी सा.सं.पू के लगभग महापद्मनंद मगध में प्रमुखता से उभरे और उन्होंने नंद वंश की स्थापना की। उन्होंने छोटे-छोटे राज्यों को सफलतापूर्वक संगठित किया तथा अपने साम्राज्य का विस्तार उत्तरी तथा पूर्वी भारत में किया। जैसे-जैसे उनकी अर्थव्यवस्था समृद्ध हुई, उन्होंने अपनी आर्थिक शक्ति के प्रदर्शन हेतु सिक्कों का प्रचलन आरंभ किया। ग्रीक विवरणों से यह भी ज्ञात होता है कि नंद वंश के पास एक विशाल सेना थी।
चित्र 6.23 में प्रदर्शित प्रथम सिक्के में, कनिष्क को भाले के साथ 'राजाधिराज' की उपाधि धारण करते हुए दर्शाया गया है। सिक्के के दूसरे भाग में महात्मा बुद्ध की मूर्ति अंकित है, जिस पर ग्रीक लिपि में बुद्ध (BO△△O) लिखा है। द्वितीय सिक्के में एक ओर सम्राट का चित्र है और दूसरी ओर शिवजी को नंदी के साथ दर्शाया गया है। आइए, निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार करें -
- क्यों एक शक्तिशाली शासक ने अपने सिक्कों पर महात्मा बुद्ध और शिवजी को अंकित किया होगा? यह उसके मूल्यों और प्राथमिकताओं के बारे में क्या दर्शाता है?
- क्या आप आज के कुछ आधुनिक उदाहरण जानते हैं, जहाँ मुद्राओं पर प्रतीकात्मक चित्र अंकित किए जाते हैं?
कुषाणों ने रेशम मार्ग (सिल्क रूट, चित्र 6.25) के महत्वपूर्ण भागों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था। इस कारण उनके शासनकाल में व्यापार में वृद्धि हुई, जिसने भारत को एशिया के अन्य भागों और पश्चिमी देशों से जोड़ दिया।
इंडो-ग्रीक शासकों के द्वारा स्थापित परंपरा को जारी रखते हुए, गांधार और मथुरा कला शैली द्वारा दर्शाई गई कुषाण कला और वास्तुकला भारतीय और ग्रीक शैलियों के सम्मिश्रण के लिए प्रसिद्ध है। मूर्तियों में विविध देवताओं का चित्रण मिलता है, जो विभिन्न विचारधाराओं के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को दर्शाता है। इस युग में सूर्य जैसे देवताओं के चित्रण का उदय हुआ, जो मनुष्यों के समान दिखते थे। इससे धार्मिक कला के विकास में वृद्धि हुई, जिसने उपमहाद्वीप में बाद की मंदिर वास्तुकला के लिए आधार तैयार किया।
गांधार कला शैली मुख्यतः पंजाब के पश्चिमी भागों में विकसित हुई। इसमें ग्रीक-रोमन एवं भारतीय तत्वों का समायोजन दिखाई देता है। इन शिल्पों को प्रायः स्लेटी-काले शिस्ट पत्थर पर अत्यंत सूक्ष्म विवरणों के साथ तराशा गया है। विशेष रूप से बुद्ध प्रतिमाओं में इस शैली का अद्भुत सौंदर्य देखा जा सकता है, जिसमें उनका शरीर और उड़ते हुए वस्त्र वास्तविक प्रतीत होते हैं।

आइए विचार करें
क्या आप जानते हैं कि गांधार कहाँ है? क्या यह आपको महाकाव्य महाभारत के किसी पात्र की याद दिलाता है?


मथुरा कला शैली, वर्तमान उत्तर प्रदेश के मथुरा क्षेत्र में विकसित हुई थी, जो एक विशिष्ट भारतीय कला शैली के रूप में जानी जाती है। गांधार शैली के विपरीत इस शैली में मूर्तियों के लिए मुख्य रूप से लाल बलुआ पत्थर का प्रयोग हुआ था। इसके साथ ही इस कला शैली में ग्रीको-रोमन प्रभाव भी बहुत कम दिखाई देता है। यह कला शैली विशेषतः भारतीय देवी-देवताओं की प्रतिमूर्तियों के लिए जानी जाती है, जिसमें कुबेर, लक्ष्मी, शिव, बुद्ध, यक्ष और यक्षिणियों की मूर्तियाँ सम्मिलित हैं। इन मूर्तियों में शरीर की आकृतियाँ प्रायः मृदुलाकार (गोल-मटोल) और चिकनी होती हैं।

आइए पता लगाएँ
अब आप मथुरा और गांधार कला शैलियों की मूल विशेषताओं से परिचित हो चुके हैं। अगले पृष्ठ पर चित्र 6.27 में दी गई कलाकृतियों को देखिए और पहचानिए। क्या आप बता सकते हैं कि चित्र में दी गई प्रत्येक कलाकृति किस कला शैली से संबंधित है? अपने विचार कारण सहित लिखिए और सहपाठियों के साथ चर्चा कीजिए।
यद्यपि इस काल के दौरान सत्ता के लिए राजनीतिक संघर्ष और प्रतिस्पर्धा थी, तथापि यह समय आदान-प्रदान के द्वारा एक मिश्र सांस्कृतिक धरोहर का भी था। यह विशेष रूप से कला और वास्तुशिल्प में दृष्टिगोचर होता है, जहाँ शैलियों ने एक-दूसरे को प्रभावित किया, परंतु उनमें भारतीय विषय विशेषतः हिंदू और बौद्ध परंपराएँ प्रमुख बनी रहीं। इसी समय संस्कृत साहित्य का भी उत्कर्ष हुआ तथा महाभारत एवं रामायण जैसे महाकाव्यों का संकलन हुआ (संदर्भ हेतु कक्षा 6 की पाठ्यपुस्तक का 'एकता में विविधता' अध्याय देखें)।
इतिहास के इस चित्रपट (टेपेस्ट्री ऑफ द पास्ट) को किसी एक राजा या राज्य की दृष्टि से देखने के स्थान पर एक सतत प्रक्रिया के रूप में समझना चाहिए, जो समय के साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान और समावेशन (एसीमिलेशन) के द्वारा विकसित होती है।
आगे बढ़ने से पहले...
- मौर्य साम्राज्य के विघटन के पश्चात भारतीय उपमहाद्वीप में कई छोटे-बड़े राज्यों का उदय हुआ।
- आंतरिक संघर्षों के साथ-साथ अनेक विदेशी आक्रमण भी हुए, जिसके फलस्वरुप राजनीतिक शक्तियों के पुनर्गठन की प्रक्रिया आरंभ हुई।
- इस काल में भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के बीच संवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के द्वारा कला, स्थापत्य और मुद्रण जैसी नई शैलियों का विकास हुआ। इन शैलियों में भारतीय विषय की प्रधानता दिखाई दी तथा संस्कृत साहित्य का चरमोत्कर्ष हुआ।
- यह काल आंतरिक और बाह्य व्यापारिक गतिविधियों में उल्लेखनीय विकास का समय भी रहा।
प्रश्न और क्रियाकलाप
- मौर्योत्तर काल को पुनर्गठन का काल क्यों कहा जाता है?
- संगम साहित्य पर 150 शब्दों में एक लेख लिखिए।
- इस अध्याय में उल्लिखित किन शासकों ने अपनी उपाधि में माता का नाम सम्मिलित किया। उन्होंने ऐसा क्यों किया?
- इस अध्याय में वर्णित किसी एक राज्य जो आपको रोचक लगता है, के विषय में 250 शब्दों का एक लेख लिखिए। आपने उस राज्य का चयन क्यों किया? अपना लेख कक्षा में प्रस्तुत कीजिए और यह जानने का प्रयास कीजिए कि आपके सहपाठियों ने कौन-से राज्यों का सर्वाधिक चयन किया है।
- कल्पना कीजिए कि आपको एक स्वतंत्र राज्य स्थापित करने का अवसर प्राप्त हुआ है। आप कौन-सा राजचिह्न चुनेंगे और क्यों? आप एक शासक के रूप में कौन-सी उपाधि धारण करेंगे? अपने राज्य के विषय में एक लेख लिखिए जिसमें राज्य के मूल्य, नियमावली एवं विशिष्टताएँ सम्मिलित हों।
- आपने मौर्योत्तर काल के वास्तु कलात्मक विकास के विषय में पढ़ा है। भारतीय उपमहाद्वीप के एक रेखांकित मानचित्र पर इस अध्याय में उल्लिखित कुछ स्थापत्य कलाओं के स्थान को चिह्नित कीजिए।