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अध्याय - 7

गुप्त काल - अथक सृजनशीलता का युग

न बल के द्वारा, न केवल कूटनीति से अधर्म का नाश किया जा सकता है; न ही चाटुकारिता से धर्म की स्थापना की जा सकती है। राज्य की वास्तविक शक्ति विद्या और बुद्धि में निहित होती है, न कि भोगवृत्ति में।

– कालिदास (रघुवंशम्) -

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चित्र 7.1 - अजंता की गुफाओं का परिदृश्य (इनका निर्माण द्वितीय शताब्दी सामान्य संवत पूर्व से लेकर प्रायः 480 सामान्य संवत के मध्य हुआ)

महत्वपूर्ण प्रश्न ?

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  1. गुप्त कौन थे? गुप्त काल को कभी-कभी भारतीय इतिहास में 'उत्कृष्ट युग' (क्लासिकल ऐज) क्यों कहा जाता है?
  2. इस समय भारतीय उपमहाद्वीप के अन्य भागों में क्या हो रहा था?
  3. इस काल के कुछ महान व्यक्ति कौन थे? आज भी उनके बारे में प्रचलित कथाएँ क्यों महत्वपूर्ण हैं?

ध्रुव और भविषा अभी-अभी पांड्य राज्य की यात्रा से लौटे थे। वहाँ उन्होंने भव्य बाजारों को देखा, नौका-विहार किया और कुछ रोमन व्यापारियों से भी मिले, जो मोतियाँ खरीद रहे थे। अब वे पुनः 'इतिहास' काल-यंत्र का उपयोग कर कुछ और शताब्दियों की यात्रा करना चाहते थे। "वह समय कैसा होगा?" उन्होंने सोचा। "क्या नगर पहले जैसे ही होंगे? लोग और समाज कैसे होंगे? क्या उनमें परिवर्तन हुआ होगा? शासन प्रणाली कैसी होगी? क्या कोई नवीन साहित्य या कला देखने को मिलेगी?" अभी वे इन प्रश्नों के उत्तर की प्रतीक्षा में ही थे कि तभी 'इतिहास' उन्हें एक नवीन युग की ओर ले चला...

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चित्र 7.2 - तीसरी से छठवीं शताब्दी सा.सं. तक की अवधि के साम्राज्य और राज्य

भविषा - इतने राज्य और साम्राज्य देखकर मेरा सिर घूम रहा है। मैं यह सब कैसे याद रख पाऊँगी?

ध्रुव- चिंता मत करो, भविषा! चलो, पहले यह समझते हैं कि उस समय क्या हो रहा था, फिर हमें याद हो जाएगा।

भविषा- क्या उस समय की कोई वस्तु हमें अपने घर के समीप भी देखने को मिल सकती है?

ध्रुव -चलो, अपने काल-यंत्र का प्रयोग करते हैं और पता लगाते हैं।

भविषा ने काल-यंत्र 'इतिहास' को सक्रिय किया और वे दोनों दिल्ली के महरौली पहुँच गए, जहाँ प्रसिद्ध लौह-स्तंभ खड़ा है।

पास ही वे एक टूर गाइड को सुनते हैं, जो इस लौह-स्तंभ की महत्ता बता रहा होता है।

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चित्र 7.3 - महरौली (दिल्ली) का लौह-स्तंभ-

टूर गाइड- यह लौह-स्तंभ 1600 वर्ष से भी अधिक प्राचीन है और आज भी बिना जंग लगे खड़ा है। यह प्राचीन भारत के उन्नत धातु विज्ञान का प्रमाण है।

भविषा - 1600 वर्ष प्राचीन और अब तक इसमें जंग नहीं लगा! चलो, इसे समीप से देखते हैं।

भविषा - देखो! क्या यही प्रसिद्ध 'लौह-स्तंभ' है?

ध्रुव - वाह! इस पर कुछ लिखा है पर मैं पढ़ नहीं पा रहा हूँ।

भविषा - इसे किसने बनवाया होगा और क्यों? चलो, सुनते हैं गाइड चाचा क्या बता रहे हैं।

टूर गाइड यह छह टन का स्तंभ, गुप्त साम्राज्य के शासक चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल में स्थापित किया गया था। संभवतः इसे पहले मध्यप्रदेश स्थित उदयगिरि की गुफा के सम्मुख स्थापित किया गया था और कुछ शताब्दियों के बाद दिल्ली लाया गया। यह स्तंभ भगवान विष्णु को समर्पित था और इस पर लिखे अभिलेख सम्राट की विजयगाथाओं का वर्णन करते हैं।

दोनों यह तो बहुत रोचक है! हम इस सम्राट और उसके साम्राज्य के विषय में और अधिक जानने को उत्सुक हैं।

आइए, गुप्त साम्राज्य के इतिहास की रोमांचक यात्रा का आरंभ करें!

इसे अनदेखा न करें

यदि किसी साइकिल को मात्र एक वर्ष के लिए बाहर छोड़ दिया जाए, तो उसमें जंग लग जाएगा। परंतु यह स्तंभ शताब्दियों से खुले आकाश के नीचे खड़े रहने के उपरांत भी वैसा ही है। वैज्ञानिकों ने इसके रहस्य को जानने का प्रयास किया है और उनका मानना है कि ऐसा स्तंभ के ऊपर एक विशिष्ट रासायनिक पतली परत के कारण है, जो एक विशेष प्रकार के लौह और वायुमंडल में उपस्थित ऑक्सीजन की प्रतिक्रिया से बनी है। यह परत लोहे को क्षरण से बचाती है।

एक नई शक्ति का उदय

तीसरी शताब्दी सा.सं. तक उपमहाद्वीप के उत्तर और उत्तर-पश्चिम में फैला कुषाण साम्राज्य दुर्बल होने लगा। इसके पश्चात नए राज्यों का उदय हुआ। इससे एक नवीन काल की भूमिका बनी और गुप्त वंश का प्रादुर्भाव हुआ।

गुप्तों की उत्पत्ति को लेकर विभिन्न मत हैं, परंतु यह व्यापक रूप से माना जाता है कि उनका उद्भव वर्तमान उत्तर प्रदेश के समीपवर्ती क्षेत्र में शासक के रूप में हुआ। समय के साथ वे प्रभुत्वशाली हुए और एक शक्तिशाली साम्राज्य की स्थापना की। भारतीय इतिहास में गुप्तकाल को अत्यंत विलक्षण माना जाता है, जिसमें अनेक क्षेत्रों में प्रगति हुई। विशेष रूप से चंद्रगुप्त द्वितीय के समय में कला, वास्तुकला, साहित्य और विज्ञान के क्षेत्र में अभूतपूर्व उन्नति हुई, जिसकी छाप आज भी विद्यमान है।

दिल्ली के लौह स्तंभ पर उत्कीर्ण अभिलेख 'चंद्र' नामक राजा का उल्लेख करता है, जिसे इतिहासकारों ने चंद्रगुप्त द्वितीय माना है (ध्यान रहे कि यह चंद्रगुप्त मौर्य नहीं हैं, जो मौर्य वंश से थे)। चंद्रगुप्त द्वितीय को 'विक्रमादित्य' के नाम से भी जाना जाता है। वे गुप्त वंश के प्रसिद्ध शासकों में से एक थे। वे भगवान विष्णु के उपासक थे और उनके वाहन गरुड़ की आकृति विक्रमदित्य के अनेक अभिलेखों पर मिलती है।

इसे अनदेखा न करें

क्या आपने चंद्रगुप्त द्वितीय के नाम में 'द्वितीय (II)' देखा? इतिहासकारों ने यह संख्या इसलिए जोड़ी क्योंकि उनसे पूर्व एक अन्य 'चंद्रगुप्त' भी थे अर्थात उनके पितामह। भारतीय परिवारों में यह परंपरा आज भी कहीं-कहीं देखी जाती है कि पहले पुत्र का नाम उसके पितामह के नाम पर रखा जाता है। चंद्रगुप्त प्रथम गुप्त साम्राज्य के प्रारंभिक विस्तार की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण थे। वे अपने सिक्कों और रणनीतिक गठबंधनों के लिए प्रसिद्ध थे, जिनके माध्यम से उन्होंने शक्ति का केंद्रीकरण किया और सुदृढ़ साम्राज्य की नींव रखी।

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चित्र 7.4 - स्वर्ण मुद्रा, जिसमें सम्राट चंद्रगुप्त प्रथम अपनी रानी कुमारदेवी के साथ अंकित हैं। सिक्के के पृष्ठ भाग में आसन पर विराजित देवी हैं, जिन्हें लक्ष्मी के रूप में पहचाना गया है।

योद्धा शासक

प्रयागराज में स्थित स्तंभ अभिलेख जिसे 'प्रयाग प्रशस्ति' भी कहा जाता है, चंद्रगुप्त द्वितीय के पिता समुद्रगुप्त की उपलब्धियों की प्रशंसा में है। इस अभिलेख के लेखक राजकवि हरिषेण के अनुसार राजा की महत्वाकांक्षा 'धरणी-बंध' होना या 'संपूर्ण पृथ्वी को एक करना' था। इस उद्देश्य से उन्होंने अनेक युद्ध लड़े, कई राजाओं को पराजित कर उनके राज्यों पर अधिकार किया तथा अपने साम्राज्य का विस्तार किया। कुछ पराजित राजाओं द्वारा सम्राट की अधीनता स्वीकार करने और भेंट देने पर उन्हें पुनर्स्थापित कर दिया गया। कई अन्य राजाओं ने उनकी शक्ति से भयभीत होकर बिना युद्ध के ही समर्पण कर दिया।

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चित्र 7.5 - हरिषेण द्वारा लिखित एक अभिलेख -

हरिषेण ने यह भी लिखा है कि सम्राट समुद्रगुप्त ने कला, ज्ञान और व्यापार को प्रोत्साहन दिया जिससे उनका राज्य समृद्ध और सफल बना। समुद्रगुप्त ने एक सिक्के पर स्वयं को वीणा बजाते हुए (चित्र 7.6) दर्शाया है।

आइए विचार करें

आपके विचार से राजाओं ने अपनी उपलब्धियों को अभिलेखों के माध्यम से क्यों प्रस्तुत किया होगा?

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चित्र 7.6 - सिक्के पर वीणा वादन करते हुए समुद्रगुप्त, जिसके पृष्ठ भाग पर देवी लक्ष्मी हैं।

पुनरावलोकन करें

महत्वाकांक्षी राजा कभी-कभी शक्तिशाली साम्राज्य स्थापित करने और अपनी विरासत के लिए 'अश्वमेध यज्ञ' का आयोजन करते थे। ऐसे आयोजनों की स्मृति में विशेष सिक्के बनवाए जाते थे (चित्र 7.7)।Screenshot 2026-03-19 103015
चित्र 7.7 - इस सिक्के -पर एक ओर यज्ञीय अश्व तथा सिक्के के पृष्ठ भाग पर रानी को चॅवर सहित दर्शाया गया है।

कुछ साहित्यिक स्रोत शासकों, राज्यों और लोगों के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करते हैं। उदाहरण के लिए, विष्णु पुराण में साम्राज्य के प्रमुख क्षेत्रों का उल्लेख मिलता है - "गुप्त वंश अनुगंगा (मध्य-गंगा घाटी), प्रयाग (वर्तमान प्रयागराज), साकेत (अयोध्या) एवं मगध (वर्तमान बिहार) और आस-पास के समस्त क्षेत्रों पर शासन करेगा।" लेकिन अपने उत्कर्ष पर गुप्त साम्राज्य ने वर्तमान उत्तर और पश्चिम भारत के साथ-साथ मध्य और पूर्वी भारत के कुछ भागों पर भी शासन किया।

आइए पता लगाएँ

कक्षा 6 के अध्याय 'इतिहास की समय-रेखा एवं उसके स्रोत' में हमने अनेक स्रोत सूचीबद्ध किए हैं, जो हमें अतीत को समझने में सहायता करते हैं। इस अध्याय में अब तक हमने जिन स्रोतों का उल्लेख किया है, उनकी एक सूची बनाइए और प्रत्येक स्रोत से प्राप्त जानकारी को लिखिए।

कल्पना कीजिए कि एक विशाल सेना जिसमें सैनिक, हाथी, घोड़े, महाराज और अन्य सहायक कर्मचारी हैं, उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाने व उनके भोजन की आपूर्ति का कार्य कितना विशाल रहा होगा। स्पष्ट रूप से अधीनस्थ राजाओं को इनकी व्यवस्था करने के लिए कहा जाता होगा।

आइए पता लगाएँ

भारत का राजनीतिक मानचित्र लेकर उन वर्तमान राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की पहचान कीजिए, जहाँ गुप्त शासकों ने शासन किया था (चित्र 7.8)। इन राज्यों को मानचित्र पर चिह्नित कीजिए और यह गणना कीजिए कि आपको कुल कितने राज्यों के बारे में पता चला। इसके पश्चात अपने मित्रों के साथ अपने-अपने खोजे गए राज्यों की संख्या की तुलना कीजिए।
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चित्र 7.8 - गुप्त साम्राज्य का विस्तार। ध्यान दीजिए कि वाकाटक गुप्त शासकों के सहयोगी थे। गुप्त शासकों ने पूर्वी-तट के कुछ भागों पर विजय प्राप्त की थी। इसमें पल्लवों के राज्य सम्मिलित थे, जिन्हें उन्होंने कुछ समय के लिए अपने अधीन कर लिया था।

गुप्त युग में भारतीय समाज के विषय में एक यात्री का वर्णन

चीनी यात्री फा-शिएन ने 5वीं शताब्दी सा.सं. के आरंभ में भारत की यात्रा की थी। वह पवित्र बौद्ध धर्मस्थलों और ग्रंथों की पांडुलिपियाँ एकत्र करने के लिए इस लंबी और कठिन तीर्थयात्रा पर निकले थे। वह उन्हें वापस चीन ले जाना चाहते थे। फा-शिएन ने संपूर्ण भारत में व्यापक रूप से यात्रा की और यहाँ की संस्कृति, शासन-व्यवस्था और समाज को देखा और अपने अनुभवों तथा लेखों को अपने देश के लोगों और हमारे लिए भी लिपिबद्ध किया। उनका यात्रा-वृत्तांत आज भी उपलब्ध है।

यहाँ उनके यात्रा वृत्तांत का एक अंश दिया गया है, जिसमें गुप्त युग के बारे में उनकी टिप्पणी है -

"लोग अत्यधिक संख्या में हैं और प्रसन्न हैं [...] उन्हें पंजीकृत कराने या अधिकारियों के पास जाने की आवश्यकता नहीं होती [...] जो लोग राजकीय भूमि पर खेती करते हैं, वे अपने अनाज का एक भाग कर के रूप में देते हैं। [...] राजा के अंगरक्षकों और सेवकों को वेतन मिलता है [...] साम्राज्य के मध्य में नगर (अर्थात गंगा के मैदानों में) सबसे बड़े हैं और निवासी धनी, समृद्ध, दयालु और धर्मनिष्ठ हैं। वैश्य परिवारों (यानी व्यापारी या व्यवसायी) के मुखिया दान और औषधि के लिए भवन बनवाते हैं। [...] निर्धनों, अनाथों और रोगियों की देखभाल की जाती है [...] वैद्य उपचार करते हैं और निर्धन को भोजन व औषधि मिलती है। [...] नगर में अनेक धनवान वरिष्ठ वैश्य और विदेशी व्यापारी रहते हैं, जिनके घर सुंदर हैं [...] गलियों को अच्छी तरह से व्यवस्थित रखा गया है।"

- बौद्ध राज्यों का एक प्रलेख (399-414 सा.सं.)
(जे. लेग द्वारा अनुवादित)

आइए पता लगाएँ

ऊपर दिए गए फा-शिएन के यात्रा-विवरण को पढ़िए और उनके द्वारा वर्णित समाज की मुख्य विशेषताओं की पहचान कीजिए। अपने विचारों को लिखिए और सहपाठी मित्रों के साथ अपने लेख की तुलना कीजिए। आपको यह देखकर आश्चर्य हो सकता है कि अन्य लोग एक ही अंश की कितनी भिन्न व्याख्या कर सकते हैं।

फा-शिएन जैसे ऐतिहासिक विवरणों से लिए गए अंश मूल्यवान स्रोत हैं। हालाँकि, यह मात्र एक विशेष समय और समाज के सीमित वर्ग के प्रति ही लेखक के दृष्टिकोण को दर्शाते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अपने यात्रा-वृत्तांत में फा-शिएन ने चांडालों के साथ हुए कठोर व्यवहार का भी वर्णन किया है, जिन्हें बहिष्कृत माना जाता था और जो नगर की सीमा से बाहर रहते थे।

जिस प्रकार आपने फा-शिएन के यात्रा-वृत्तांत के अंश को अपने मित्रों से अलग ढंग से समझा होगा, उसी तरह इतिहासकारों का समूह एक ही स्रोत की जाँच करते समय अलग-अलग तरह की व्याख्याएँ कर सकता है। अपनी समझ को पुष्ट करने के लिए इतिहासकार फिर अन्य स्रोतों को देखते हैं। इससे यह ज्ञात होता है कि कोई भी निष्कर्ष निकालने से पहले अनेक स्रोतों, दृष्टिकोणों और व्याख्याओं का विश्लेषण करना आवश्यक होता है।

गुप्त साम्राज्य की झलकियाँ

शासन एवं प्रशासन

आइए, चित्र 7.8 में दिए गए मानचित्र को देखें। आप एक ही समय में अनेक राज्यों को एक साथ अस्तित्व में देखेंगे। उनमें से कुछ राज्य अपने नियंत्रण को बढ़ाने की महत्वाकांक्षा में एक-दूसरे के साथ युद्धरत भी रहे होंगे। याद कीजिए कि कौटिल्य के राज्य के शासन संबंधी विचारों के बारे में आपने पहले क्या पढ़ा था। उन्होंने शासकों को गठबंधन (मित्र) बनाने की सलाह दी थी, जो सप्तांग के घटकों में से एक था।

नए राजा... नई उपाधियाँ

अभिलेखों और सिक्कों से गुप्त शासकों की उपाधियों, जैसे- 'महाराजाधिराज', 'सम्राट' और 'चक्रवर्ती' के बारे में बहुमूल्य जानकारी मिलती है। ये उपाधियाँ उनके सर्वोच्च अधिकार के दावे को दर्शाती हैं और पहले के शासकों से उनकी श्रेष्ठता को रेखांकित करती हैं, जो 'राजन' और 'महाराज' जैसी सरल उपाधियों का प्रयोग करते थे।

गुप्त शासकों ने अपने विशाल साम्राज्य का विस्तार और सुदृढ़ीकरण करने के लिए युद्ध, कूटनीति और गठबंधन सहित विभिन्न रणनीतियों का प्रयोग किया। गठबंधन के अंतर्गत वैवाहिक संबंध सम्मिलित थे। इसका एक जाना-माना उदाहरण प्रभावती गुप्त का है, जो चंद्रगुप्त द्वितीय की पुत्री थीं। उनका विवाह गुप्त साम्राज्य के दक्षिण में स्थित पड़ोसी वाकाटक राज्य के राजकुमार से हुआ था। दुर्भाग्यवश उस राजकुमार की अकस्मात मुत्यु हो गई। फलस्वरूप प्रभावती गुप्त उस राज्य की प्रतिशासिका बन गईं। उनके शासनकाल के दौरान गुप्त और वाकाटकों के बीच संबंध सुदृढ़ बने रहे, इसके लिए उन्होंने यथासंभव प्रयास किए। उनके एक अभिलेख में उन्हें 'दो राजाओं की माँ' के रूप में वर्णित किया गया है। यह उनके दो पुत्रों की ओर संकेत करता है, जो बाद में वाकाटक राज्य के सिंहासन पर आसीन हुए। अपने पिता की तरह विष्णु भक्त होने के कारण प्रभावती गुप्त को भगवान विष्णु और उनके अवतारों को समर्पित सात मंदिरों के निर्माण का श्रेय दिया जाता है। इनमें से कुछ मंदिर वर्तमान महाराष्ट्र के रामगिरी (रामटेक पहाड़ी) में हैं।

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चित्र 7.9 - भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार को समर्पित केवल नरसिंह मंदिर। कुछ इतिहासकारों के अनुसार यह मंदिर प्रभावती गुप्त की पुत्री द्वारा अपनी माँ की स्मृति में बनवाया गया था।

आइए पता लगाएँ

अपने दरबार में बैठी हुई प्रभावती गुप्त पर - बनी चित्रकारी को देखिए (चित्र 7.10)1 उनके वस्त्र, मुद्रा, आस-पास के लोगों और दरबार की व्यवस्था पर ध्यान दीजिए। ये सभी आपको उनके जीवन, भूमिका और समय के बारे में क्या बताते हैं? अपने अवलोकनों पर समूहों में चर्चा कीजिए और अपने विचारों को कक्षा के साथ साझा कीजिए।

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चित्र 7.10 - दरबार में बैठी प्रभावती गुप्त का एक पुनर्कल्पित चित्र

गुप्त साम्राज्य में एक सुव्यवस्थित प्रशासनिक व्यवस्था थी। केंद्रीय स्तर पर सब कुछ नियंत्रित करने की जगह गुप्त राजाओं ने साम्राज्य को अनेक प्रांतों में विभाजित किया। इन प्रांतों में स्थानीय शासकों, पुरोहितों और मुखियाओं को भूमि दान में दी गई। इन भूमि अनुदानों को सटीक रूप से संरक्षित करने के लिए ताम्रपत्रों (तांबे की पट्टियों) पर लिपिबद्ध किया गया था। इन ताम्र पत्रों में से अनेक हाल के दिनों में पुरातत्वविदों द्वारा खोजे गए हैं। यह व्यवस्था गुप्त शासकों को उचित कर संग्रह करने, कुशलतापूर्वक शासन करने तथा स्थानीय मुखियाओं को अपने क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित करने में सहायक होती थी।

समृद्ध व्यापार

गुप्त शासकों के राजस्व का प्रारंभिक स्रोत भूमि कर था। अन्य स्रोतों में दंड-शुल्क, खदान, सिंचाई, व्यापार और शिल्प कर सम्मिलित थे। इस राजस्व का उपयोग प्रशासन, सेना को बनाएँ रखने, मंदिरों और आधारभूत ढाँचों के निर्माण तथा विद्वानों व कलाकारों को प्रोत्साहन देने के लिए किया जाता था।

हम एक बार पुनः देखते हैं कि एक सशक्त साम्राज्य को बनाएँ रखने के लिए एक जीवंत आंतरिक और बाह्य व्यापार को बढ़ावा देना आवश्यक होता है। गुप्त काल में भारत ने भूमध्यसागरीय क्षेत्र, दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन के साथ व्यापार किया। कपड़ा, मसाले, हाथीदाँत से बने आभूषण और रत्नों का निर्यात किया। हिंद महासागर व्यापार तंत्र ने भारतीय बंदरगाहों को दूर के बाजारों से जोड़ा। भूमध्यसागरीय बाजारों के मार्ग में एक महत्वपूर्ण पड़ाव सोकोट्रा द्वीप था, जो सामरिक रूप से अरब सागर में स्थित था। मिस्र, अरब, रोम और ग्रीस के व्यापारियों के अतिरिक्त पुरातात्विक साक्ष्य जैसे – मिट्टी के बर्तन, ब्राह्मी लिपि के अभिलेख और बौद्ध स्तूप वहाँ कई शताब्दियों से भारतीय व्यापारियों की उपस्थिति की पुष्टि करते हैं। यह लघु द्वीप हिंद महासागर में व्यापार के द्वारा सांस्कृतिक आदान-प्रदान को समृद्ध बनाएँ जाने का प्रमाण है।

नवीन विचारों और उपलब्धियों का युग

जैसा हमने देखा, गुप्त शासक विष्णु के परम भक्त थे। यह प्रायः उनके सिक्कों और अभिलेखों में परिलक्षित होता है। हालाँकि, उन्होंने अन्य परंपराओं और विचारधाराओं को भी संरक्षण दिया। उन्होंने प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय और कई अन्य बौद्ध विहारों सहित बौद्ध संस्थानों को संरक्षण दिया। उनका दृष्टिकोण उदार और समावेशी था। आगे की कक्षाओं में इन संस्थानों के बारे में हम विस्तार से अध्ययन करेंगे।

गुप्तकाल के अंतर्गत शांति और स्थिरता लंबे समय तक बनी रही, जिसने विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय उपलब्धियों को प्रोत्साहन दिया। यही कारण है कि कुछ इतिहासकारों ने इस अवधि को भारत का 'उत्कृष्ट युग' कहा। यही वह समय था जब पूर्ववर्ती युगों के ज्ञान को एकत्रित करके अनेक ग्रंथों में संकलित किया गया। इसी समय कालिदास की रचनाओं और अनेक प्रमुख पुराणों के साथ संस्कृत साहित्य का विकास हुआ। आर्यभट और वराहमिहिर ने गणित और खगोल विज्ञान में उल्लेखनीय योगदान दिया। चिकित्सा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण सिद्धांतों और पद्धतियों को संकलित और परिष्कृत किया गया। धातु-विज्ञान में भी प्रगति हुई, जैसा हमने जंग रोधी लौह-स्तंभ के उदाहरण में देखा है। इस स्थिरता ने अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ किया, जिससे राज्य ने विद्वानों, कलाकारों और वैज्ञानिकों को प्रोत्साहन दिया। फलस्वरूप, सांस्कृतिक और बौद्धिक विकास संभव हआ।

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चित्र 7.11 - नालंदा विश्वविद्यालय के अवशेष

चंद्रगुप्त द्वितीय स्वयं को अनेक विद्वानों, कवियों और कलाकारों के सानिध्य में रखते थे। ऐसी विविध प्रतिभाओं को संरक्षण प्रदान करके उन्होंने अपनी राजसभा को समृद्ध बनाया।

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चित्र 7.12 - चंद्रगुप्त द्वितीय युद्ध में प्रस्थान करते हुए (1920 के दशक के एक कलाकार की कल्पना पर आधारित)

आइए, इस अवधि के कुछ उल्लेखनीय व्यक्तियों पर एक दृष्टि डालें।

आर्यभट – ये लगभग 500 सा.सं. में तत्कालीन प्रसिद्ध शिक्षा केंद्र कुसुमपुरा (आधुनिक पटना के पास) में रहते थे। आर्यभट ने गणित और खगोल विज्ञान पर एक संक्षिप्त ग्रंथ आर्यभटीय की रचना की। उन्होंने सूर्य, चंद्रमा और ग्रहों की गति की गणना हेतु सूत्र लिखे और प्रस्तावित किया कि पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है, जिससे दिन और रात होते हैं। उन्होंने एक वर्ष की अवधि 365 दिन, 6 घंटे, 12 मिनट और 30 सेकंड के समतुल्य बताई, जो आधुनिक मान (365 दिन, 5 घंटे, 48 मिनट और 45 सेकंड) के अत्यंत निकट है। आर्यभट ने पृथ्वी के आकार का उचित अनुमान और सूर्य व चंद्रग्रहण की एक सटीक व्याख्या भी की। उनका कार्य भारत और विश्व में वैज्ञानिक प्रगति की आधारशिला बना। गणित के क्षेत्र में आर्यभट ने गणना और समीकरण समाधान की अनेक विधियों का वर्णन किया। इनमें से कुछ के बारे में आप विद्यालय में सीखते हैं जबकि उन्हें सर्वप्रथम 1500 वर्ष पूर्व आर्यभट ने प्रतिपादित किया था।

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चित्र 7.13

वराहमिहिर – ये इसी काल के एक अन्य गणितज्ञ, खगोलशास्त्री और ज्योतिषी थे। वे उज्जयिनी में रहते थे, जो शिक्षा और ज्ञान की परंपरा के लिए विख्यात था। उनके वृहत्संहिता नामक ग्रंथ में खगोल विज्ञान और ज्योतिष से लेकर मौसम के पूर्वानुमान, वास्तुकला, नगरनियोजन और कृषि जैसे विषयों की विस्तृत जानकारी मिलती है। विश्व को तर्कसंगत दृष्टिकोण से देखने और उपलब्ध ज्ञान के साथ उसे जोड़कर नवीन सिद्धांत प्रस्तुत करने की उनकी क्षमता ने उन्हें अपने समय के विज्ञान के क्षेत्र में अग्रणी बनाया।

आइए पता लगाएँ

आइए, भविषा और ध्रुव के साथ काल-यंत्र में बैठकर गुप्त काल की यात्रा करते हैं। यदि आपको आर्यभट और वराहमिहिर से मिलने का अवसर मिले तो आप उनसे क्या पूछेंगे? कक्षा को दो समूहों में बाँटकर उनके साथ साक्षात्कार के लिए कुछ प्रश्न तैयार कीजिए।

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चित्र 7.14 - मेघदूतम् में यक्ष का मेघ को संदेश देते हुए एक दृश्य

कालिदास – महाकवि कालिदास के जीवन के विषय में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। किंवदंतियों के अनुसार, एक बार लोगों के उपहास के कारण उन्होंने गहन साधना की और अपने जीवन को एक नई दिशा दी। वे संस्कृत साहित्य और आलंकारिक काव्य के लिए प्रसिद्ध हुए। उनकी प्रसिद्ध रचनाओं में से एक मेघदूतम् है। यह काव्य एक यक्ष के बारे में है, जो अपने स्वामी द्वारा अपने घर से निर्वासित होने के उपरांत एक उड़ते मेघ के माध्यम से अपनी प्रेयसी को संदेश भेजता है। प्रेम के उच्छवास के अतिरिक्त यह काव्य भारत के भूदृश्य और ऋतुओं का विस्तृत वर्णन प्रस्तुत करता है।

इसे अनदेखा न करें

क्या आप जानते हैं कि आयुर्वेद को गुप्त काल में संहिताबद्ध किया गया था? चिकित्सा की भारतीय पारंपरिक प्रणाली की जड़ें कई शताब्दियों पुरानी हैं। चरक संहिता और सुश्रुत संहिता जैसे ग्रंथ गुप्त काल में संकलित और पूर्ण किए गए, जो आयुर्वेद के आधारभूत ग्रंथ हैं। ये ग्रंथ रोगों के वर्गीकरण और उनके निदान, उपचार एवं अच्छे स्वास्थ्य को बनाए रखने में आहार के महत्व और शल्य चिकित्सा तकनीक जैसे अनेक विषयों पर जानकारी प्रदान करते हैं। यह अपने समय की दृष्टि से बहुत उन्नत थे, जिनका आज भी उपयोग होता है। आयुर्वेद मन, शरीर और प्रकृति के बीच गहरे संबंध को महत्व देकर समग्र उपचार पर बल देता है।

सौंदर्य की खोज

गुप्त शासकों ने एक ऐसा अनुकूल वातावरण प्रदान किया जिसमें रचनात्मकता और शिल्प-कौशल का अभूतपूर्व विकास हुआ। अनेक प्रसिद्ध ऐतिहासिक कलाकृतियाँ इसी अवधि में निर्मित की गईं। इसी समय कला के अनेक प्रमुख केंद्र उभरे, जिनमें उत्कृष्ट बुद्ध मूर्तियों के लिए विख्यात सारनाथ (वर्तमान वाराणसी के निकट) और विस्मयकारी अजंता गुफाएँ (वर्तमान महाराष्ट्र में) सम्मिलित हैं। मध्य प्रदेश के उदयगिरि में चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाएँ और देवी-देवताओं की प्रतिमाएँ भी इसी काल की उत्कृष्ट कला के कुछ अन्य उदाहरण हैं। इसे कभी-कभी 'गुप्तकालीन कला' भी कहा जाता है। इसने सौंदर्यबोध के उच्च मानक स्थापित किए। जिसका एक स्थायी प्रभाव पड़ा (चित्र 7.15 से 7.18 देखिए)।

आइए पता लगाएँ

चित्र 7.15.1 और 7.15.2 में दिखाई गई गुप्तकालीन मूर्तियों को ध्यानपूर्वक देखिए। इनकी विशेषताओं को देखकर क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि वहाँ किन देवताओं को दर्शाया गया है? दिए गए स्थान पर अपने विचार लिखिए और चर्चा में अपने विचार साझा कीजिए।
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गुप्त वंश का पतन

छठी शताब्दी सा.सं. तक गुप्त साम्राज्य में पतन के संकेत दिखने लगे थे क्योंकि बाद के शासकों को बाह्य आक्रमणों की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा था। मध्य एशिया की क्रूर हूण जनजाति ने बार-बार आक्रमण किए जिससे उत्तर भारत पर गुप्त राजाओं का नियंत्रण शिथिल हो गया। उसी समय, शक्तिशाली क्षेत्रीय शासकों के उदय ने आंतरिक संघर्षों को भी जन्म दिया। परंतु क्या यह वास्तव में अंत था या यह एक ऐसे युग का आरंभथा, जिसने भारतीय इतिहास को एक महत्वपूर्ण दिशा दी? इसका उत्तर हम इस पुस्तक के अगले भाग में पाएँगे।

इस बीच दक्षिण और पूर्वोत्तर में... आइए, चित्र 7.8 में दिए गए मानचित्र को पुनः देखें। जब उत्तर भारत में गुप्त शासन था, उसी समय दक्षिण में पल्लव एक शक्तिशाली राजवंश के रूप में उभरे। उन्होंने धीरे-धीरे आज के तमिलनाडु, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के कुछ भागों को अपने राज्य में मिला लिया। उनकी उत्पत्ति के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं है, लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि वे सातवाहनों के अधीन थे और सातवाहनों के पतन के पश्चात उन्हें बल मिला। इनके विषय में हम पिछले अध्याय में पढ़ चुके हैं।

पल्लव, कला और वास्तुकला के भी महान संरक्षक थे। उनमें से अधिकांश शिव भक्त थे और उन्हें भव्य मंदिरों और चट्टानों को काटकर बनाई गई गुफाओं के निर्माण का श्रेय दिया जाता है। इनमें से कुछ को हम उत्कृष्ट भारतीय वास्तुकला के अध्ययन के समय जानेंगे। पल्लवों की राजधानी, कांचीपुरम (वर्तमान तमिलनाडु) जो प्रायः 'एक हजार मंदिरों का नगर' के रूप में जानी जाती है, दक्षिण में शिक्षा के प्रमुख केंद्रों में से एक के रूप में विकसित हुई। सातवाहन काल के दौरान स्थापित 'घटिकाओं' (शिक्षा के केंद्र) ने शिक्षा और बौद्धिक विकास के लिए एक वातावरण का निर्माण किया।

पूर्वोत्तर क्षेत्र में वर्मन राजवंश द्वारा शासित कामरूप साम्राज्य, ब्रह्मपुत्र घाटी (व्यापक रूप से वर्तमान असम, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के उत्तरी भाग) तक विस्तृत था। असम की ब्रह्मपुत्र घाटी का एक प्राचीन नाम प्राग्ज्योतिष था, जिसका उल्लेख रामायण और महाभारत में मिलता है। महाभारत में, प्राग्ज्योतिष (आधुनिक असम) के शासक भगदत्र का उल्लेख महाभारत के महान युद्ध में कौरवों की ओर से लड़ने वाले योद्धा के रूप में किया गया है। बाद के कुछ शासकों ने उन्हें अपना पूर्वज बताया है। कामरूप साम्राज्य एक प्रमुख सांस्कृतिक और राजनीतिक केंद्र था। यहाँ मंदिर और मठ शिक्षा के केंद्रों के रूप में विकसित हुए।

गुप्तकालीन कला के विभिन्न आयाम

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चित्र 7.15.1 से 7.15.3 - तीसरे चित्र में गुप्तकाल की पकी मिट्टी (टेराकोटा) से बनी मूर्तियाँ (अहिछत्र, पश्चिमी उत्तर प्रदेश) भारत की पवित्र नदियों, गंगा और यमुना को दर्शाती हैं। उनके वाहन उन्हें अलग पहचान देते हैं- गंगा मकर (मगरमच्छ जैसा पौराणिक प्राणी) पर खड़ी हैं, जबकि यमुना कछुए पर खड़ी हैं। उनके सिर के ऊपर से पानी बह रहा है और घड़े का चित्रण नदियों के रूप को प्रकट करता है।
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चित्र 7.16 - दशावतार मंदिर (देवगढ़, उत्तर प्रदेश) में शेषनाग पर विष्णु
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चित्र 7.17 - इस अवधि में प्रसिद्ध अजंता गुफाएँ गुप्त और वाकाटक राजवंशों के सहयोग से बनाई गई थीं। बाएँ-एक विस्तृत गुफा जो एक मंदिर को दर्शाती है। इसके मध्य में एक स्तूप है इसमें से बैठे हुए बुद्ध उभर रहे हैं (लकड़ी की शहतीर की नकल पर आधारित धनुषाकार छत पर ध्यान दीजिए) दाएँ- बोधिसत्व पद्मपाणि का एक चित्र।
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चित्र 7.18.1 से 7.18.3 - उदयगिरि गुफाएँ और साँची के पास गुप्तकालीन मंदिर, दोनों ही मध्यप्रदेश में स्थित हैं। युद्ध में अर्जुन और कर्ण - महाभारत से एक मूर्तिकला का चित्रण।
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चित्र 7.19

पल्लव और कामरूप दोनों का उल्लेख प्रयाग प्रशस्ति में मिलता है, जिसके बारे में हमने पहले पढ़ा है। दक्षिण भारत के अभियान के समय समुद्रगुप्त ने एक पल्लव शासक को पराजित किया, परंतु इस क्षेत्र को अधिकार में नहीं लिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने पल्लवों सहित स्थानीय राजाओं को अपने सिंहासन पर तब तक बने रहने दिया, जब तक वे समुद्रगुप्त की अधीनता स्वीकार करते हुए नियमित रूप से भेंट देते रहे। इससे विभिन्न राज्यों के साथ शांतिपूर्ण सहायक संबंध स्थापित करने में सहायता मिली। इसी प्रकार, पूर्वोत्तर में भी समुद्रगुप्त ने कामरूप के शासक को युद्ध में हराने के उपरांत उसका राज्य अपने सीधे नियंत्रण में नहीं लिया। इस प्रकार हम समुद्रगुप्त की यह नीति बार-बार पुनरावृत्त होते हुए देखते हैं।

गुप्तकाल उल्लेखनीय प्रगति का काल था। इसका प्रभाव गुप्त साम्राज्य की सीमाओं से कहीं आगे तक देखा गया। इसके परिणाम शताब्दियों तक कला, विज्ञान, साहित्य और शासन को प्रभावित करते रहे। गणित, खगोल विज्ञान, चिकित्सा और धातु विज्ञान सहित अन्य क्षेत्रों में हुई प्रगति ने भविष्य के वैज्ञानिक और तकनीकी विकास की नींव रखी। इस काल में बने भव्य मंदिर और संस्कृत साहित्य आज भी हमें प्रेरणा देते हैं। गुप्त शासकों ने एक स्थिर और समृद्ध समाज का निर्माण किया और उसने भविष्य के शासकों के लिए एक मानक स्थापित किया। उनकी विरासत आज भी भारतीय संस्कृति, परंपराओं और आदर्शों में जीवित है। यह गुप्त काल को भारतीय इतिहास के शीर्षतम बिंदुओं में से एक के रूप में स्थापित करता है।

आगे बढ़ने से पहले...

  • गुप्त शासकों ने युद्ध, भूमि अनुदान और वैवाहिक संबंधों के माध्यम से स्वयं को समर्थ बनाया और साम्राज्य में स्थिरता सुनिश्चित की।
  • इस काल में कला, साहित्य, विज्ञान और गणित के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति देखी गई।
  • गुप्त वंश के अतिरिक्त वाकाटक, पल्लव और वर्मन जैसे राजवंशों ने अपने-अपने क्षेत्रों में शासन किया। इन सभी राजवंशों ने मिलकर इस काल को सांस्कृतिक और बौद्धिक रूप से जीवंत बनाया।

प्रश्न और क्रियाकलाप

  1. कल्पना कीजिए कि आपको गुप्त साम्राज्य में रहने वाले किसी व्यक्ति से एक पत्र मिलता है। पत्र का आरंभ इस प्रकार होता है- "पाटलिपुत्र से अभिवादन। यहाँ का जीवन सुखमय और उत्साह से भरा है। कल ही मैंने देखा..." गुप्त साम्राज्य में जीवन का वर्णन करते हुए एक संक्षिप्त लेख (250-300) के साथ पत्र को पूरा कीजिए।
  2. किस गुप्तकालीन शासक को 'विक्रमादित्य' के नाम से भी जाना जाता है?
  3. "शांतिकाल सामाजिक एवं सांस्कृतिक जीवन, साहित्य तथा विज्ञान व प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विकास लाने में सहायक होते हैं।" गुप्त साम्राज्य के संदर्भ में इस कथन का परीक्षण कीजिए।
  4. किसी गुप्तकालीन शासक की राजसभा के एक दृश्य का नाटकीय रूपांतरण कीजिए, जिसमें राजा, मंत्री और विद्वानों जैसी भूमिकाएँ हों। इस प्रकार आप गुप्त युग को पुनर्जीवित कर सकते हैं।
  5. मिलान कीजिए-
  6. पल्लव कौन थे और उन्होंने कहाँ शासन किया?
  7. अपने शिक्षकों के साथ निकट के किसी ऐतिहासिक स्थल, संग्रहालय या विरासत भवन की यात्रा का आयोजन कीजिए। यात्रा के बाद अपने अनुभव का वर्णन करते हुए एक विस्तृत रिपोर्ट लिखिए। रिपोर्ट में इस स्थल के ऐतिहासिक महत्व, वास्तुकला, कलाकृतियों और यात्रा के दौरान आपके द्वारा सीखे गए किसी भी रोचक तथ्य के बारे में अपने महत्वपूर्ण अवलोकनों को सम्मिलित कीजिए। इस यात्रा ने इतिहास के बारे में आपकी समझ को कैसे विकसित किया?