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अध्याय - 8

गुप्त काल - अथक सृजनशीलता का युग

भौगोलिक क्षेत्र कैसे पावन होते हैं? आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी, ग्रह, सभी प्रकार के जीव-जंतु, दिशाएँ, वृक्ष तथा पौधे, नदियाँ और समुद्र परमेश्वर के शरीर के अंग हैं।

- भागवत पुराण

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चित्र 8.1

महत्वपूर्ण प्रश्न ?

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  1. 'पावनता' क्या है?
  2. भूमि कैसे पावन हो जाती है?
  3. पावन स्थल और तीर्थ स्थल का अंतर्संबंध किस प्रकार मानव जीवन और संस्कृति से जुड़ जाता है?
  4. पावन भूगोल ने भारतीय उपमहाद्वीप के सांस्कृतिक एकीकरण में किस प्रकार की भूमिका निभाई है?

आइए पता लगाएँ

क्या आप इनमें से किसी चित्र से परिचित हैं? क्या आप अपने आस-पास इसी तरह के किसी स्थान का नाम बता सकते हैं ?

पावनता क्या है?

पावनता के अनेक अर्थ हो सकते हैं। इस अध्याय के सीमित संदर्भ में पावनता का तात्पर्य उन समस्त धार्मिक एवं आध्यात्मिक भावों से है, जो पावन और दिव्य हों तथा आदर एवं श्रद्धा के योग्य हों। किंतु इसका आधार क्या है? यह कोई विशेष स्थल या धार्मिक स्थान हो सकता है, जो ऐसे गंभीर भावों, उच्च विचार और संवेदनाओं को प्रकट करता है। जैसा कि हम इस अध्याय में देखेंगे, यह किसी विशेष प्रकार की यात्रा हो सकती है (सामान्यतः तीर्थयात्रा), जो किसी विशेष मार्ग से होकर गुजरती है।

इस प्रकार, पावनता केवल धर्म या आध्यात्मिकता से जुड़ी हुई नहीं है, अपितु भारत के संदर्भ में निश्चित भूभाग, विविध परंपराओं एवं अन्य विषयों से भी जुड़ी हुई है, जिसके विषय में हम आगे पढ़ेंगे।

आइए, सबसे पहले हम अपने पावन स्थलों पर ध्यान केंद्रित करें। आप आगे जानेंगे कि भारत में प्रायः सभी प्रकार के विचारों एवं धर्मों के अपने-अपने पावन स्थल हैं।

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चित्र 8.2

भारत से बाहर उद्भव होने वाले धर्मों, जैसे- इस्लाम, ईसाई, यहूदी तथा पारसी धर्म के अनुयायी इन चित्रों में दर्शाए गए स्थलों को श्रद्धेय मानते हैं। ये लोग इन स्थलों पर प्रार्थना या पूजा के लिए जाते हैं। अन्य पंथों के लोग भी इन स्थलों पर जाते हैं, जिनमें राजस्थान का अजमेर शरीफ़ तथा तमिलनाडु का वेलांकन्नी चर्च विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। विशेष अवसरों पर श्रद्धालु इन पावन स्थलों की तीर्थयात्रा करते हैं।

स्वाभाविक रूप से, जब हम भारत में उत्पन्न धर्मों की बात करते हैं, तो ऐसे अनेक पावन स्थलों के विषय में जानकारी मिलती है। बौद्ध धर्म के संदर्भ में वे स्थल पावन माने जाते हैं, जहाँ महात्मा बुद्ध गए थे या जहाँ उनके अवशेष रखे हुए हैं। ऐसे पावन स्थलों में साँची का (मध्य प्रदेश) का प्रसिद्ध स्तूप जहाँ पावन अवशेष संरक्षित हैं (आप इसे 'साम्राज्यों का उदय' नामक अध्याय में देख सकते हैं।) तथा बोधगया (बिहार) का महाबोधि स्तूप है, जहाँ बौद्ध परंपरा के अनुसार महात्मा बुद्ध ने निर्वाण प्राप्त किया था। ये स्थल तीर्थयात्रियों के लिए महत्वपूर्ण हैं। उदाहरणस्वरूप, बोधगया में प्रतिवर्ष चालीस लाख से अधिक यात्री आते हैं।

सिख धर्म में 'तख्त' अध्यात्म का आधिकारिक केंद्र है, उदाहरण के लिए - तख्त श्री पटना साहिब (पटना), अकाल तख्त (स्वर्ण मंदिर, अमृतसर, चित्र 8.3) तथा तख्त श्री केशगढ़ साहिब (आनंदपुर)। सिख श्रद्धालुओं की इच्छा रहती है कि जीवन में कम से कम एक बार इन पावन स्थलों की यात्रा करें क्योंकि ये स्थल सिख धर्म के महान गुरुओं से संबंधित हैं। अतः इन स्थलों का उनके जीवन में विशेष महत्व है। इन सबके अतिरिक्त सिख परंपरा में उन स्थलों को भी पावन माना जाता है, जहाँ अनेक गुरुओं ने यात्रा की, जैसे- गुरु नानक ने हरिद्वार, प्रयाग, मथुरा, वाराणसी, अयोध्या, पुरी के अतिरिक्त मुसलमानों के पावन स्थलों की भी यात्रा की थी।

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चित्र 8.3

"भारत अनादिकाल से तीर्थयात्राओं का देश रहा है। संपूर्ण देश में ये प्राचीन स्थल बर्फीले हिमालय पर्वतों, जैसे- बद्रीनाथ, केदारनाथ तथा अमरनाथ से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक स्थित हैं। ऐसा क्या है, जो हमारे लोगों को उत्तर से दक्षिण और दक्षिण से उत्तर के तीर्थ स्थलों की यात्रा के लिए आकर्षित करता है? यह एक देश और एक संस्कृति की भावना है।

- जवाहरलाल नेहरू, 1961"

तीर्थयात्राएँ

यहाँ इतिहासकार एवं विचारक धर्मपाल के लेख से एक उद्धरण प्रस्तुत है -

“मैं ग्वालियर से दिल्ली की यात्रा कर रहा था... जब मैं लोगों के समूह से मिला... वे लगभग बारह व्यक्ति थे, जिनमें तीन या चार महिलाएँ तथा सात या आठ पुरुष थे।... उन्होंने बताया कि वे लगभग तीन महीनों से, अन्य स्थलों के साथ-साथ रामेश्वरम तक की तीर्थयात्रा पर हैं। वे लखनऊ के उत्तर में स्थित दो गाँवों से आए थे। उनके पास मिट्टी के पात्रों के अतिरिक्त अनेक प्रकार की गठरियाँ थीं... उनके पास भोजन की सभी आवश्यक वस्तुएँ थीं, जैसे- आटा, घी, चीनी, आदि... मैंने उनसे पूछा, "क्या आप सभी इस समय दिल्ली जा रहे हैं?" "हाँ!" उन्होंने उत्तर दिया। "क्या आप दिल्ली में रुकेंगे?" "नहीं, हम केवल वहाँ ट्रेन बदलेंगे। हम हरिद्वार जा रहे हैं... हमारे पास समय नहीं है... हमें हरिद्वार पहुँचना है। उसके बाद हमें घर लौटना है।"

आइए पता लगाएँ

  • इस उद्धरण को पढ़िए। इस विषय में आपका क्या अभिमत है? उस मार्ग को दर्शाइए, जिससे होकर उन यात्रियों ने रामेश्वरम से हरिद्वार तक की यात्रा की होगी। आपके अनुसार, इन यात्रियों ने दिल्ली रूकने के स्थान पर सीधे हरिद्वार की यात्रा क्यों की?
  • प्राचीन काल में जब लोग तमिलनाडु के मदुरई से उत्तर प्रदेश के वाराणसी की यात्रा करते थे, तो उनका संपर्क किन-किन भाषाओं से होता होगा? उन स्थानों में वे लोगों से कैसे वार्तालाप करते होंगे? वे कहाँ ठहरते होंगे? वे किस प्रकार का भोजन करते होंगे?

जैन परंपरा में तीर्थ उन पावन स्थलों से संबद्ध हैं, जहाँ तीर्थंकरों ने मोक्ष प्राप्त किया था या जहाँ उनके जीवन से जुड़ी हुई कोई विशिष्ट घटनाएँ घटी थीं। वृक्ष, सरोवर, पहाड़ी और पर्वत - जहाँ भी तीर्थंकर गए या ध्यान किया, वे पावन माने जाने लगे। उदाहरण के रूप में माउंट आबू, गिरनार और सौराष्ट्र (गुजरात) की शत्रुंजय पहाड़ी इनमें सम्मिलित हैं।

2 केरल में स्थित अयप्पा देवता को समर्पित सबरीमाला मंदिर की तीर्थयात्रा इसका अन्य उदाहरण है। यहाँ प्रतिवर्ष लगभग एक करोड़ श्रद्धालु दर्शनार्थ आते हैं। पहाड़ी पर स्थित इस पावन स्थल पर पारंपरिक रूप से पहाड़ियों और जंगलों के बीच एक कठिन मार्ग से होकर पहुँचा जाता था। इस प्रकार की चुनौतीपूर्ण यात्रा प्रायः पूरे देश में अनेक पहाड़ियों या पर्वतों पर स्थित पावन स्थलों के लिए सामान्य बात है। प्राकृतिक संकेतों से युक्त मार्ग के साथ ऐसी यात्रा पावन मानी जाती है। यह आध्यात्मिक यात्रा की कठिनाइयों का भी प्रतीक है।

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चित्र 8.4 - महाराष्ट्र में आठ सौ वर्ष पुरानी पंढरपुर वारी' परंपरा। 'वारी' का तात्पर्य उस वार्षिक तीर्थयात्रा से है, जो नियमित रूप से होती है। तीर्थ यात्री विशाल समूह में इक्कीस दिनों तक पंढरपुर के प्रसिद्ध विठोबा मंदिर की यात्रा करते हैं।

अन्य पावन स्थल

हिंदू तथा अन्य लोक एवं जनजातीय मान्यताएँ पावन स्थलों की धारणा के संबंध में और आगे जाती हैं। जैसा कि हमने कक्षा 6 में पढ़ा है, इन मान्यताओं में लोग प्रकृति के तत्वों, जैसे – पर्वत, नदी, वृक्ष, पौधे एवं पशुओं और कभी-कभी पत्थरों को भी पावन मानते हैं। उदाहरण के लिए, हिंदू विश्वास परंपरा में अनगिनत स्थलों और प्रकृति के रूपों, जैसे – पर्वत, नदी, वन विशेष रूप से दिव्य माने जाते हैं और उनकी देवी-देवताओं के रूप में पूजा की जाती है। कई नदियाँ देवी के रूप में जानी जाती हैं, जबकि कुछ वृक्षों, पशुओं तथा पौधों को भी पावन माना जाता है।

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चित्र 8.5 - इस चित्र में भगवान - विष्णु वराह अवतार के रूप में एक दैत्य का संहार करते हैं तथा भूदेवी (पृथ्वी माता) की रक्षा करते हैं। उन्हें भगवान विष्णु की कोहनी पर बैठे हुए दर्शाया गया है (कर्नाटक के बेलुर मंदिर से)।

इन परंपराओं पर आधारित कुछ अन्य उदाहरण हैं -

  • डोंगरिया खोंड जनजाति के लिए झारखंड की नियमगिरि श्रृंखला में स्थित नियम डोंगर पहाड़ी पावन है। उनकी मान्यता है कि यह पहाड़ी सर्वोच्च देवता 'नियम राजा' का निवास स्थान है और वे उन्हें सब कुछ प्रदान करते हैं, जो उनके भरण-पोषण के लिए आवश्यक है। वृक्ष काटना यहाँ प्रतिबंधित है और ऐसा करना देवता के प्रति असम्मान माना जाता है।
  • वर्ष 2000 के आरंभ में सिक्किम सरकार ने अनेक पावन पर्वत, गुफा, झील, चट्टान एवं उष्ण जलस्रोतों को चिह्नित किया, जिससे उन्हें किसी भी हानि से बचाया जा सके।
  • तमिलनाडु की नीलगिरि श्रृंखला में स्थित टोडा नामक जनजातीय समुदाय अनेक पर्वत शिखरों को पावन मानता है और उन्हें अपने देवताओं से जोड़कर देखता है। उनके लिए पावनता की यह भावना कई पौधों (जो प्रायः उनके अनुष्ठानों का हिस्सा बन जाते हैं) शोला वन, आर्द्र भूमि और यहाँ तक कि विशिष्ट पत्थरों और विशेष वृक्षों तक फैली हुई है।

पावन भूभाग से अवगत होना

अगले पृष्ठ पर दिए गए मानचित्र (चित्र 8.6) में कुछ पावन स्थल चिह्नित किए गए हैं। यद्यपि ये पूरे देश में फैले हुए हैं, फिर भी यह आपस में घनिष्ठ रूप से जुड़े हैं। उदाहरण के लिए, कुछ हिंदू चार धामों की यात्रा करने की इच्छा रखते हैं तथा ये चार पावन स्थल सुनियोजित रूप से भारत के दक्षिण, उत्तर, पूर्व तथा पश्चिम में स्थापित हैं। यही आकांक्षा अत्यंत पावन माने जाने वाले द्वादश ज्योर्तिलिंगों के लिए भी होती है। 51 शक्ति पीठ भी संपूर्ण भारत में (वर्तमान बांग्लादेश तथा पाकिस्तान सहित) फैले हैं। इसी प्रकार कई अन्य अंतर्संबंधित क्षेत्र हैं।

द्वादश ज्योतिर्लिंग हिंदू धर्म के प्रमुख भगवान शिव से संबंधित पावन स्थल माने जाते हैं। प्रत्येक पावन स्थल के पृथक-पृथक नाम हैं तथा प्रत्येक की अपनी पौराणिक पृष्ठभूमि है।

इन अंतर्संबंधों का जाल संपूर्ण भारत की लंबाई-चौड़ाई में हर दिशा से होते हुए पावन भूभाग का निर्माण करता है। निष्कर्षतः संपूर्ण भारत स्वयं एक पावन स्थल बन जाता है।

51 शक्तिपीठों के विषय में एक कथा भी प्रचलित है। सती के रूप में माता आदि शक्ति एवं उनके पति भगवान शिव का अपमान सती के पिता द्वारा किया गया था। तब आदि शक्ति माता सती ने आत्मदाह कर लिया। इससे भगवान शिव अत्यंत कुपित हुए और वह माता सती के शव को लेकर यहाँ-वहाँ विचरण करने लगे। उन्होंने सती के शव का अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया। भगवान शिव का क्रोध सृष्टि एवं संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए अत्यंत घातक था। इसलिए, भगवान विष्णु ने अपने चक्र से माता सती के मृत शरीर को अनेक हिस्सों में विभाजित कर दिया। पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में माता सती के अंग जहाँ भी गिरे, वे सभी स्थल शक्तिपीठों के रूप में स्थापित हो गए। इस कहानी का आशय स्पष्ट है- संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप देवी माता का ही रूप है।

आइए पता लगाएँ

चार धामों की स्थिति का पता लगाइए। आपके अनुसार जब लोगों ने भारत के उत्तर-दक्षिण तथा पूर्व-पश्चिम की यात्रा की, तब उनके लिए इन धामों का क्या कोई विशेष महत्व था?

अपनी आस्थाओं से संबंधित प्रमुख पावन स्थलों की यात्रा करते हुए तीर्थयात्री नैसर्गिक रूप से भारत के संपूर्ण भूभाग से परिचित होते हैं। वे मार्ग में विभिन्न प्रकार की भाषाओं, रीति-रिवाजों, वस्त्रों तथा खाद्य पदार्थों के साथ-साथ इनकी समरूपता का भी अनुभव करते हैं।

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चित्र 8.6 - पारंपरिक तीर्थों के अंतर्संबंधों को दर्शाता हुआ एक मानचित्र

क्या आप ऊपर दिए गए मानचित्र में कुछ पारंपरिक तीर्थों की पहचान कर सकते हैं? आप पुस्तक के अंत में दिए गए राजनैतिक मानचित्र की भी सहायता ले सकते हैं।

लोग इतनी लंबी दूरी की यात्रा क्यों करते थे? धार्मिक उद्देश्य के अतिरिक्त, कुछ व्यापारी तथा व्यवसायी वस्तुओं के क्रय-विक्रय के लिए यात्रा करते थे। कुछ अन्य, चर्चा, विचार-विमर्श, अपने मत-विश्वास को लोकप्रिय बनाने तथा देश के विभिन्न भागों में रहने वाले प्रतिष्ठित शिक्षकों से सीखने या अध्ययन करने जाते थे। यद्यपि ये सभी पृथक-पृथक उद्देश्यों की पूर्ति हेतु यात्रा करते थे, फिर भी उनके मार्ग कहीं-न-कहीं एक-दूसरे से मिल जाते थे। परिचर्चाएँ एवं विचार-विमर्श; वस्तुओं, अनुभवों तथा कहानियों को समझना एवं साझा करना सभी को समृद्ध करता था। इस क्रम में नए विचार उत्पन्न होते थे तथा पुराने विचारों के साथ सामंजस्य स्थापित किया जाता था। यह जटिल प्रक्रिया भारतीय उपमहाद्वीप के सांस्कृतिक एकीकरण का प्रमुख कारण बनी।

पावन पारिस्थितिकी

तीर्थ स्थल सामान्यतः नदी या झील के किनारे, वनों या पहाड़ों पर स्थित होते हैं। जैसा कि हमने पहले पढ़ा, संपूर्ण प्राकृतिक परिदृश्य पावन स्थल के रूप में माना जाता है। इस अवधारणा ने ही हमें प्रकृति को सुरक्षित तथा संरक्षित रखने में सहायता की, क्योंकि हम प्रकृति से पृथक नहीं हैं। इस प्रकार, तीर्थ क्षेत्र भूभाग, संस्कृति और आध्यात्मिकता का परस्पर सम्मिश्रण होता है।

नदियाँ एवं संगम (नदियों का संगम)

भारत में वैदिक काल से नदियों की पूजा होती रही है। ऋग्वेद का 'नदी-स्तुति सूक्त' नदियों की प्रशंसा एवं स्तुतियों के प्रति समर्पित है, जो प्राचीन भारत के उत्तर-पश्चिम की उन्नीस प्रमुख नदियों का आह्वान करता है। आज भी अनेक धार्मिक रीति-रिवाजों में जल का आह्वान करते हुए कुछ प्रमुख नदियों की उपस्थिति का ध्यान किया जाता है -

"गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति।
नर्मदे सिंधु कावेरि जलेस्मिन् सन्निधिं कुरू।।
गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु
तथा कावेरी - आप सभी इस जल में सम्मिलित हों।"

ये नदियाँ भारतीय सभ्यता के लिए जीवनदायिनी रही हैं। उनके उद्‌गम स्रोत, सहायक नदियाँ तथा वे स्थान जहाँ से होकर वे बहती हैं, प्रायः पावन माने जाते हैं तथा अनेक तीर्थयात्री भी वहाँ की तीर्थयात्रा करते हैं। क्षेत्रीय भाषाओं में इन नदियों का नाम आदर के साथ लिया जाता है, जैसे- 'गंगा जी' या 'यमुना जी'।

इसे अनदेखा न करें

  • प्रयागराज में प्रत्येक छह वर्षों में कुंभ मेले का आयोजन होता है। प्रयाग तीन नदियों - गंगा, यमुना तथा अदृश्य सरस्वती के संगम पर स्थित है। कुछ वर्ष पूर्व यूनेस्को ने कुंभ मेले को 'अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर' के रूप में सूचीबद्ध किया है।
  • लगभग 66 करोड़ लोगों ने 2025 के कुंभ मेले में भाग लिया था। भारत की पूरी जनसंख्या का यह कितना अनुपात है?

कुंभ मेला

कुंभ मेला 'अमृत मंथन' के आख्यान से आरंभ होता है। पारंपरिक रूप से, एक-दूसरे के शत्रु देवता और असुर एक बार समुद्र-मंथन के लिए एकत्र हुए। उन्हें विश्वास था कि इस मंथन से प्राप्त अमृत उन्हें अमरत्व प्रदान करेगा। असुर अमृत प्राप्त न करें, इसके लिए श्री विष्णु ने अति सुंदरी मोहिनी का रूप धारण कर अमृत-कलश (कुंभ) को ले लिया। इसी क्रम में अमृत की कुछ बूँदें चार स्थानों- हरिद्वार, प्रयागराज, नासिक और उज्जैन में गिर गईं। तब से इन स्थानों पर कुंभ मेले का आयोजन होता आ रहा है और एक विशेष खगोलीय अवधि में वहाँ की नदियों में डुबकी लगााना अत्यंत मांगलिक माना जाता है।

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चित्र 8.7

आइए विचार करें

आपके विचार में किस प्रकार ये पावन स्थल लोगों के आर्थिक जीवन और गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। मानस मानचित्र (माइंड मैप) के माध्यम से इन संबंधों का पता लगाएँ। (संकेत-चित्र 8.7 और 8.8 में इस विषय में कुछ जानकारियाँ दी गई हैं।)

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चित्र 8.8

पर्वत और वन

प्रायः संपूर्ण विश्व की दंतकथाओं में पर्वतों का संबंध देवताओं तथा नायकों से रहा है। साथ ही, पर्वतों को उनकी ऊँचाई के कारण पृथ्वी से स्वर्ग तक के प्रतीकात्मक प्रवेश- द्वार के रूप में भी देखा जाता है। यही कारण है कि भारत के अनेक तीर्थ स्थल तथा मंदिर पहाड़ियों की चोटियों पर स्थित हैं। इन चोटियों तक पहुँचने की यात्रा प्रतीकात्मक दृष्टि से दिव्य शक्ति तक पहुँचने की यात्रा मानी जाती है। लोग पर्वतीय मार्गों से उन भूभागों और पावन स्थलों की कठिन यात्रा करते हैं, जो उनकी न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक शक्ति का भी परीक्षण करती है। वर्तमान समय में, ऐसे स्थलों तक सड़कों तथा परिवहन के अन्य साधनों के माध्यम से पहुँचना संभव है।

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चित्र 8.9

वृक्ष, वन तथा पावन निकुंज

भारत के अनेक भागों में हल्दी और कुमकुम से वृक्षों को अलंकृत किया जाता है। पीपल का वृक्ष - जिसे बोधि वृक्ष या संस्कृत में 'अश्वत्थ' भी कहते हैं- हिंदू, बौद्ध, सिख तथा जैन धर्मों के लिए अत्यंत पावन है। वस्तुतः लैटिन में उसका वानस्पतिक नाम 'फाइकस रिलिजियासा' है, जिसका शाब्दिक अर्थ है- 'पावन वट वृक्ष'।

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चित्र 8.10 - बोधगया के महाबोधि मंदिर में स्थित वृक्ष को मूल वृक्ष का वंशज बताया जाता है। बौद्ध परंपरा के अनुसार, इसी के नीचे महात्मा बुद्ध ने ज्ञान प्राप्त किया था। इसी कारण वृक्ष का नाम बोधि वृक्ष और स्थान का नाम बोधगया पड़ा।

कक्षा 6 में हमने भारत के दो महाकाव्यों- रामायण और महाभारत के बारे में पढ़ा है। इनमें तीर्थयात्राओं, यात्रा के दौरान देखे गए स्थानों, पावन नदियों, वनों और पर्वतों का स्पष्ट वर्णन है। भारत के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में कई ग्रामीण एवं जनजातीय परंपराओं का मानना है कि इन ग्रंथों के नायक उनके क्षेत्रों में आए थे। वहाँ के पावन स्थल इस बात का संकेत भी प्रस्तुत करते हैं। ऐसे आख्यानों द्वारा विभिन्न जनसमुदाय इन महाकाव्यों को अपना मानते हैं।

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चित्र 8.11 - छत्तीसगढ़ के बस्तर में एक पावन स्थल, जहाँ भगवान राम के उस क्षेत्र में आने का उत्सव मनाया जा रहा है।
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चित्र 8.12 - मोहनजोदड़ो की एक मुहर (सील)

मोहनजोदड़ो की इस मुहर का अवलोकन कीजिए। क्या आप इसके ऊपरी भाग में अंकित पत्तियों को पहचान सकते हैं? इससे यह ज्ञात होता है कि पीपल का वृक्ष कितनी शताब्दियों से भारत के सांस्कृतिक भूगोल का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।


आइए विचार करें

पीपल के वृक्ष के अनेक भागों का औषधीय उपयोग होता है। इसकी पत्तियों का प्रयोग त्वचा रोगों में तथा छाल का प्रयोग उदर रोगों के निवारण में उपयोगी होता है। यह वृक्ष प्रायः वर्ष भर हरा-भरा रहता है, अतः यह अनेक प्रकार के पक्षियों एवं पशुओं को भोजन एवं आश्रय प्रदान करता है।

कालांतर में भारत के कई ग्रामीण एवं जनजातीय समुदायों ने हानिकारक गतिविधियों, जैसे - आखेट, वृक्षों की कटाई या खनिजों के दोहन आदि से वनों की रक्षा एवं उनका संरक्षण करने का निश्चय किया। उन्होंने वनों को देवताओं का निवास स्थान माना। उदाहरण के लिए मेघालय में रिंके या बासा। ऐसे विशिष्ट वनों को अंग्रेजी भाषा में ग्रोव्स (पावन निकुंज) कहते हैं (क्षेत्रीय भाषाओं के नामों को अगले पृष्ठ पर दी गई तालिका में देखें)। अपने पावन महत्व के कारण ये वनस्पतियों एवं जीवों की विशाल जैव-विविधता को आश्रय प्रदान करते हैं। कई पावन निकुंजों में छोटे-छोटे जलाशय होते हैं जो जल संरक्षण में भी सहायक होते हैं।

भारत में हजारों की संख्या में पावन निकुंज हैं। यह एक विडंबना है कि इनकी संख्या तेजी से घटती जा रही है, क्योंकि लोगों ने अनेक प्रकार के कृषि कार्यों एवं उद्योगों के लिए उनका अतिक्रमण करना आरंभ कर दिया है। फिर भी भारत के अनेक क्षेत्रों में पावन निकुंजों के संरक्षण का कार्य आज भी चल रहा है।

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चित्र 8.13 - कलकई मंदिर, मुलशी, महाराष्ट्र
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चित्र 8.14 - मावफ्लांग, शिलांग
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चित्र 8.15 - भीलों का पावन निकुंज
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चित्र 8.16 - उदयनकुदुकादु कारुमबारियमकोंडन, तमिलनाडु

नीचे दी गई तालिका में भारत की क्षेत्रीय भाषाओं में पावन निकुंजों के लिए प्रयुक्त नाम दिए गए हैं। क्या आप इसमें कुछ नए नाम जोड़ सकते हैं?

मलयालम कावु
तमिल कोविलकादु
कन्नड़ देवरे कादु
मराठी देवराई
खासी (मेघालय) खलाव केनतांग
हिंदी (हिमाचल प्रदेश) देव वन
झारखंड सरना
छत्तीसगढ़ देवगुड़ी
राजस्थान ओरण

तमिलनाडु में स्थानीय गाथाएँ पावन निकुंज के देवता, प्रकृति और मानव के मध्य संबंधों को प्रमुखता से प्रदर्शित करती हैं। तंजावुर जनपद में इसी प्रकार की एक गाथा यह बताती है कि निकुंज के देवता फल-चमगादड़ (फ्रूट बैट) की रक्षा करते हैं, जिन्हें पावन माना जाता है। इन्हें देखना भी मांगलिक माना जाता है। इसके अतिरिक्त, पुष्पों के परागीकरण तथा बीजों को बिखेरने में चमगादड़ की भूमिका महत्वपूर्ण है। इस प्रकार, पावन निकुंज के देवता पारिस्थितिकीय पद्धति एवं मानव के पारस्परिक संबंध को विकसित करते हैं।

तीर्थयात्रा से व्यापार तक

तीर्थयात्री अपनी यात्रा के क्रम में व्यापारियों तथा व्यवसायियों के संपर्क में आते हैं। यह मेल-मिलाप दोनों समूहों को लाभान्वित करता है। तीर्थयात्रियों को अनेक प्रकार की वस्तुओं की आवश्यकता होती है, जिन्हें व्यापारी उपलब्ध कराते हैं। परिणामस्वरूप, तीर्थयात्रा मार्ग तथा व्यापार मार्ग प्रायः एक-दूसरे से जुड़ जाते हैं। कुछ व्यापारी तीर्थयात्री के रूप में तीर्थ स्थलों की यात्रा करते हुए अपनी वस्तुओं को भी दूर-दूर तक के उपनगरों एवं नगरों में विक्रय के लिए ले जाते हैं। इस प्रकार वे दो कार्य एक साथ करते हैं।

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चित्र 8.17

प्राचीन भारत में व्यापारी किस प्रकार के मार्गों का उपयोग करते थे? 'साम्राज्यों का उदय' नामक अध्याय में दिए गए व्यापार मार्गों के मानचित्र (चित्र 5.5) का पुनरावलोकन कीजिए। उत्तरापथ एक प्रमुख यात्रा मार्ग था, जो उपमहाद्वीप के उत्तर-पश्चिमी और पूर्वी भागों को जोड़ता था। दक्षिणापथ कौशांबी तथा उज्जयिनी होते हुए प्रतिष्ठान (पैठन) तक जाता था। जैसा कि आप जानते हैं, इन मार्गों के द्वारा कुछ वस्तुओं का व्यापार होता था जिनमें बहुमूल्य रत्न, जैसे - सीप और मोती, सिक्के, स्वर्ण तथा हीरे के साथ-साथ कपास, मसाले और चंदन सम्मिलित थे।

आइए पता लगाएँ

पारदर्शी कागज की एक शीट लीजिए जिसका उपयोग अनुरेखण (ट्रेसिंग) के लिए किया जा सकता हो। 'साम्राज्यों उदय' का नामक अध्याय में दिए व्यापारिक मार्गों के मानचित्र का अनुरेखण कीजिए। इसे महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों के मानचित्र पर रखिए। आप इसके द्वारा क्या अवलोकन कर पा रहे हैं?

भारत से बाहर के पावन भूभाग

आइए, चित्र 7.8 में दिए गए मानचित्र को देखें। आप एक ही समय में अनेक राज्यों को एक साथ अस्तित्व में देखेंगे। उनमें से कुछ राज्य अपने नियंत्रण को बढ़ाने की महत्वाकांक्षा में एक-दूसरे के साथ युद्धरत भी रहे होंगे। याद कीजिए कि कौटिल्य के राज्य के शासन संबंधी विचारों के बारे में आपने पहले क्या पढ़ा था। उन्होंने शासकों को गठबंधन (मित्र) बनाने की सलाह दी थी, जो सप्तांग के घटकों में से एक था।

पावन स्थलों का पुनरुद्धार और संरक्षण

आइए विचार करें

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चित्र 8.18

उन स्थानों और प्राणियों के चित्रों को सावधानीपूर्वक देखिए, जिन्हें पावन माना जाता है। उत्तर में यमुना, पूर्व में महानदी तथा दक्षिण में कावेरी, ये सभी नदियाँ पावन मानी जाती हैं। फिर भी ये इतनी प्रदूषित कैसे हो गईं? क्या आपके आस-पास ऐसे पावन स्थल हैं, जो मानवीय गतिविधियों के कारण इसी तरह प्रदूषित एवं क्षीण हो गए हैं? हमारे पावन स्थलों की पावनता को बनाए रखना किसका दायित्व है? कक्षा में इस विषय पर चर्चा कीजिए।

पूर्वकाल के लोगों एवं पावन भूभाग के मध्य सौहार्दपूर्ण संबंध विद्यमान थे। इसने भारतीय सभ्यता को हजारों वर्ष बनाए रखा तथा ऐसे मूल्यों का निर्धारण किया जिन्हें संपूर्ण उपमहाद्वीप में मान्यता प्राप्त थी। परंतु आज इन्हीं संबंधों पर संकट है।

पावन भौगोलिक क्षेत्रों की उपस्थिति आज भी प्रासंगिक है, जबकि प्रकृति के साथ हमारा संबंध असंगत हो चला है। नदियों के अति दोहन ने उनके लुप्त होने की स्थिति उत्पन्न कर दी है। पावन पर्वतों को विकास चुनौती दे रहा है। लोगों ने अपने पर्यावरण, देवता और मूल्यों की रक्षा के लिए विरोध भी आरंभ कर दिया है। वर्तमान समय में, जबकि सतत विकास (सस्टेनेबल डेवलपमेंट) एक वैश्विक विषय बन गया है। ऐसे में पावन भौगोलिक क्षेत्र आधारित विश्व-दृष्टि इसमें महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है।

आगे बढ़ने से पहले...

  • भारत के सभी धर्मों के अपने-अपने पावन स्थल हैं, जिन्हें बिंदुओं के द्वारा स्थलाकृति पर प्रदर्शित किया गया है। बौद्ध, जैन और सिख धर्म में ऐसे पावन स्थल सामान्य रूप से किसी महान व्यक्ति से संबंधित होते हैं।
  • हिंदू धर्म में तीर्थ स्थलों का वृहत जाल है, जो संपूर्ण भारत को आपस में जोड़ता है। तीर्थयात्रा की परंपरा लोगों के जीवन में गहराई से जुड़ी हुई है। यह न केवल व्यक्तिगत एवं आध्यात्मिक विकास को पोषित करती है, अपितु व्यापार और अखिल भारतीय सांस्कृतिक एकीकरण के सामाजिक-आर्थिक उद्देश्य को भी समर्थन देती है।
  • हिंदुओं, जनजातियों एवं लोक-परंपराओं में भूमि को पावन माना जाता है।
  • उपेक्षा और देखभाल की कमी के कारण हमारे पावन स्थल प्रदूषित होते जा रहे हैं। हमारी राष्ट्रीय धरोहर की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। हमारा संविधान भी हमें इसकी याद दिलाता है।

प्रश्न और क्रियाकलाप

  1. प्रसिद्ध पर्यावरणविद डेविड सुजुकी के निम्नलिखित वाक्य पढ़ें -
  2. "हम जिस दृष्टि से विश्व को देखते हैं, उसी के अनुसार उसके साथ व्यवहार करते हैं। अगर पर्वत एक देवता है, न कि खनिज का ढेर; अगर नदियाँ पृथ्वी की शिराएँ हैं, न कि केवल सिंचाई का स्रोत; अगर वन पावन निकुंज है, न कि केवल इमारती लकड़ियों का ढेर; अगर अन्य प्रजातियाँ हमारे संबंधी हैं, न कि केवल साधनमात्र या अगर पृथ्वी हमारी माता है, न कि केवल संसाधन; तब हम इन सभी के साथ अत्यंत आदर के साथ व्यवहार करते हैं। अतः यह विश्व को एक अलग परिप्रेक्ष्य में देखने की चुनौती है।"

    इस पर छोटे समूह में चर्चा कीजिए। आप उक्त वाक्यों से क्या समझते हैं? इससे हमारे चारों ओर विद्यमान वायु, जल, भूमि, वृक्ष तथा पर्वत के प्रति हमारे व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ता है?

  3. आपने क्षेत्र के पावन स्थलों की सूची बनाइए। पता लगाइए कि ये स्थल पावन क्यों माने जाते हैं? क्या इनसे जुड़ी कोई कहानियाँ हैं? इस विषय में 150 शब्दों में एक संक्षिप्त लेख लिखिए। (संकेत - आप अपने परिवार एवं समुदाय के वरिष्ठ लोगों से चर्चा कर सकते हैं। अपने शिक्षक से भी विचार-विमर्श कीजिए। इस प्रकार की सूचनाओं का संग्रह करने के लिए लेख एवं पुस्तक पढ़िए)।
  4. आपके विचार में प्राकृतिक तत्व, जैसे नदी, पर्वत और वन आदि लोगों के लिए पावन क्यों माने जाते हैं? वे हमारे जीवन में किस प्रकार योगदान देते हैं?
  5. लोग तीर्थ या अन्य पावन स्थलों की यात्रा क्यों करते हैं?
  6. प्राचीन तीर्थयात्रा मार्गों ने उस समय किस प्रकार व्यापार को प्रोत्साहित किया? आपके अनुसार ये पावन स्थल उन क्षेत्रों के आर्थिक विकास में किस प्रकार सहायक बने?
  7. पावन स्थल किस प्रकार वहाँ के लोगों की संस्कृति और परंपरा को प्रभावित करते हैं?
  8. भारत के विविध प्रकार के पावन स्थलों में से अपनी रुचि के अनुसार किन्हीं दों का चयन कीजिए तथा उनका महत्व बताते हुए एक परियोजना बनाइए।
  9. तीर्थयात्राएँ किस प्रकार दोहरा महत्व रखती हैं?