अध्याय - 9
शासक से शासित तक – सरकार के प्रकार
राज्य के आंतरिक प्रशासन में एक शासक का दायित्व तीन स्तरों पर होता है- रक्षा (बाह्य आक्रमणों से राज्य की सुरक्षा करना), पालन (राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखना एवं सुचारु रूप से शासन संचालित करना) और योगक्षेम (जनता के हितों की रक्षा करना)।
– कौटिल्य (अर्थशास्त्र)

महत्वपूर्ण प्रश्न ?
- सरकार के विभिन्न प्रकार कौन-कौन से हैं?
- सरकार अपनी शक्ति कहाँ से प्राप्त करती है?
- एक देश की सरकार जनता से किस प्रकार संवाद स्थापित करती है?
- लोकतंत्र का क्या महत्व है? पावन स्थल और तीर्थ स्थल का अंतर्संबंध किस प्रकार मानव जीवन और संस्कृति से जुड़ जाता है?
सरकार क्या है?
इसके क्या कार्य हैं?
कक्षा 6 में हमने जाना कि सरकार क्या होती है और इसकी कुछ भूमिकाओं का भी अध्ययन किया।
सरकार हमारे जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, जो निम्नलिखित हैं -
- समाज में कानून व्यवस्था बनाए रखना;
- लोगों के लिए शांति, स्थायित्व एवं सुरक्षा सुनिश्चित करना;
- अन्य देशों के साथ संबंधों का संचालन करना;
- राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना;
- आवश्यक वस्तुओं एवं सेवाओं (जैसे- शिक्षा, स्वास्थ्य एवं आधारभूत संरचना) की आपूर्ति करना;
- अर्थव्यवस्था और आर्थिक गतिविधियों का प्रबंधन करना;
- लोगों के कल्याण एवं उनके जीवन को उन्नत बनाने के लिए कार्य करना।
आइए पता लगाएँ
- क्या आपको अपनी कक्षा 6 की पाठ्यपुस्तक का यह चित्र याद है?
- सरकार के बहुत से अन्य कार्य भी हैं। उन्हें सूचीबद्ध कीजिए।

कक्षा 6 में हमने सीखा कि भारत में लोकतांत्रिक सरकार है। भारत की तरह अनेक अन्य देशों में भी लोकतांत्रिक सरकारें हैं, जबकि कुछ देशों में अन्य प्रकार की सरकारें हैं। सभी लोकतांत्रिक सरकारें भी एक जैसी नहीं होती हैं। इस अध्याय में हम सरकारों के विभिन्न प्रकारों का अध्ययन करेंगे, उनके बीच के अंतर को जानेंगे और समझेंगे कि वे किस प्रकार कार्य करती हैं।
लोकतंत्र क्या है?
जैसा कि हमने कक्षा 6 में पढ़ा, लोकतंत्र को सबसे अच्छी तरह जनता के शासन के रूप में समझा जा सकता है। इसका अर्थ है कि लोकतंत्र में शक्ति और सत्ता का स्रोत देश की जनता होती है। आइए, इसे विद्यालय के एक उदाहरण से समझते हैं।
लोकतंत्र संबंधी विद्यालय का उदाहरण
विद्यालयों में कई प्रकार की गतिविधियाँ और कार्य होते हैं, जिन्हें सभी विद्यालय अनिवार्य रूप से करते हैं। विद्यालय प्रतिदिन अनेक कार्यों का प्रबंधन तो करते ही हैं, साथ ही विभिन्न गतिविधियों को सुव्यवस्थित रूप से संचालित भी करते हैं। उदाहरण के लिए, समय-सारणी बनाना तथा उसका अनुपालन सुनिश्चित करना, खेलकूद का आयोजन करना, मध्याह्न के समय भोजन परोसना (जिसे मध्याह्न भोजन योजना कहा जाता है), बर्तन धोना, प्रार्थना सभा हेतु वक्ताओं का चयन करना तथा 'बस्तारहित दिवसों' के लिए गतिविधियाँ निर्धारित करना। इस प्रकार विद्यालयों में किए जाने वाले कार्यों की सूची बहुत लंबी है।इन कार्यों को करने के लिए प्रधानाध्यापिका को विद्यालय में एक विद्यार्थी समिति के गठन की आवश्यकता प्रतीत होती है, जिससे विद्यार्थी इन कार्यों के संचालन के लिए उपयोगी नियमों के विकास का हिस्सा बन सकें और नियमों के क्रियान्वयन में सहायता कर उनका अनुपालन सुनिश्चित कर सकें। प्रधानाध्यापिका के समक्ष अब प्रश्न यह था कि समिति के सदस्य कौन होंगे?
प्रधानाध्यापिका ने प्रार्थना सभा में इस विषय पर चर्चा की। उन्होंने प्रस्ताव रखा कि अच्छा होगा यदि कुछ विद्यार्थी स्वयं से इन कार्यों का दायित्व लें, जिसके लिए एक विद्यार्थी समिति का गठन किया जाना चाहिए। यह सुनकर विद्यार्थी उत्साहित हो गए और आपस में चर्चा करने लगे -
नगमा - कक्षा 12 के विद्यार्थी वरिष्ठतम हैं, हम सभी कार्यों का ध्यान रखेंगे।
शोभा - लेकिन आपकी पढ़ाई तो कुछ ही महीनों में पूरी हो जाएगी, इसलिए कक्षा 11 के विद्यार्थियों को ये सभी दायित्व लेने चाहिए।

गुरप्रीत - यदि केवल एक ही कक्षा के विद्यार्थी सभी दायित्व सँभालेंगे, तो वे अन्य कक्षाओं के समक्ष आने वाली समस्याओं को कैसे जानेंगे?
ऐसी रोचक स्थिति में विद्यार्थी अंततः तीन विकल्पों पर पहुँचे -
- विद्यालय में सभी समिति का हिस्सा बन सकते हैं और दायित्व निभा सकते हैं।
- प्रधानाध्यापिका स्वयं विद्यार्थियों का चयन समिति के लिए कर सकती हैं।
- विद्यार्थी मतदान के आधार पर अपने प्रतिनिधि का चयन कर सकते हैं, जिससे निर्वाचित प्रतिनिधि ही समिति के सदस्य बनेंगे।
आइए पता लगाएँ
तीनों तरीकों में से आप सबसे अधिक प्रभावी किसे मानते हैं और क्यों?
पहला तरीका आकर्षक प्रतीत हो सकता है, किंतु यदि विद्यालय का प्रत्येक विद्यार्थी समिति का सदस्य होगा, तो किसी निर्णय तक पहुँच पाना कठिन होगा और लिए गए निर्णयों का प्रभावी अनुपालन सुनिश्चित करना भी कठिन होगा। दूसरे तरीके में, क्योंकि प्रधानाध्यापिका स्वयं समिति के लिए विद्यार्थियों का चयन कर रही हैं, इसलिए अधिकांश विद्यार्थियों को दायित्व नहीं मिल सकेगा। साथ ही उनके पास यह सुनिश्चित करने का भी कोई तरीका नहीं होगा कि उनकी बात सुनी जा सके, उन्हें क्या चाहिए और उनकी क्या आवश्यकताएँ हैं। हालाँकि, तीसरे तरीके में प्रत्येक कक्षा से विद्यार्थी अपने बीच में से किसी ऐसे विद्यार्थी को अपना प्रतिनिधि चुन सकते हैं, जिस पर उन्हें विश्वास हो कि वह प्रभावशाली रूप से उनकी कक्षा की आवश्यकताओं का पक्ष रख सकेगा। यह प्रतिनिधि समिति में कार्य करेगा, अर्थात विद्यार्थी समिति में प्रत्येक कक्षा से प्रतिनिधि सम्मिलित होंगे। प्रतिनिधियों के चयन और समिति के गठन की यह प्रक्रिया ही लोकतांत्रिक प्रक्रिया है।
आइए विचार करें
विद्यालय का उदाहरण हमें प्रतिनिधित्व की अवधारणा और इसकी कार्यप्रणाली को समझने में सहायता करता है। यद्यपि विद्यार्थियों की समिति, संसदीय और विधायी समितियों से भिन्न होती है, जैसे कि विद्यालय के कक्षा प्रतिनिधि संसद अथवा विधान सभा के सदस्यों से काफी भिन्न होते हैं। ये भिन्नताएँ क्या हैं? कक्षा में अपने शिक्षक के साथ चर्चा कीजिए और इन भिन्नताओं की एक सूची बनाइए।
सरकार के कार्य
आरंभ में हमने चर्चा की थी कि सरकार हमारे जीवन में अनेक दायित्वों का निर्वहन करती है। उसी प्रकार विद्यालय में विद्यार्थी समिति के भी विभिन्न दायित्व होते हैं। जिस प्रकार सरकार आवश्यक नियम बनाती है, उनका क्रियान्वयन करती है और यह सुनिश्चित करती है कि सभी लोग इन नियमों का पालन करें, उसी प्रकार विद्यार्थी समिति आवश्यक नियम बनाती है, उन्हें लागू करती है और यह सुनिश्चित करती है कि सभी विद्यार्थी इन नियमों का पालन करें। सरकार के यह तीनों ही दायित्व महत्वपूर्ण हैं।
कानूनों का निर्माण करना विधायी कार्य कहलाता है। किसी देश के संचालन हेतु ये कानून एक सशक्त आधार प्रदान करते हैं। इन नियमों का कार्यान्वयन करना और इनके अनुसार देश का प्रशासन कार्यपालिका संबंधी कार्य कहलाता है। वहीं कानूनों की व्याख्या करना और विवादों का निपटारा करना न्यायिक कार्य कहलाता है।
लोकतंत्र को 'जनता के शासन' के रूप में जाना जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि जैसे विद्यालय में प्रतिनिधि चुनने की तीसरी विधि अपनाई जाती है, उसी प्रकार लोकतंत्र में भी जनता स्वयं पर शासन करने के लिए अपने प्रतिनिधियों को चुनती है। हालाँकि, सभी देश अपने प्रतिनिधियों के चुनाव हेतु एक जैसी प्रणाली का प्रयोग नहीं करते। इस विषय को हम आगे अधिक विस्तार से समझेंगे।
क्या आप जानते हैं?

19वीं शताब्दी के अंत में अमेरिका के राष्ट्रपति रहे अब्राहम लिंकन ने लोकतंत्र को 'जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए शासन' के रूप में परिभाषित किया, जो आज भी व्यापक रूप में प्रयुक्त होता है।
सरकारें किस प्रकार एक-दूसरे से भिन्न होती हैं?
किसी भी देश की सरकार समय के साथ विकसित होती है। प्रत्येक देश का अपना विशिष्ट इतिहास, संस्कृति और आकांक्षाएँ होती हैं, इसलिए अलग-अलग देशों की सरकारों में भिन्नता स्वाभाविक है। आइए, कुछ ऐसे पक्षों पर विचार करें जो एक सरकार को दूसरी सरकार से भिन्न बनाते हैं। इन विभिन्नताओं को हम आगे अध्याय में अलग-अलग प्रकार की शासन प्रणालियों का अध्ययन करते समय और अधिक स्पष्ट रूप से समझ पाएँगे।
सरकारों के बीच प्रमुख अंतर
- 'यह सरकार है'- यह तय करने का अधिकार किसे है?
विभिन्न प्रकार की शासन प्रणालियों के मध्य यह आधारभूत अंतर होता है। यह प्रश्न है कि 'यह हमारे देश की सरकार है' किसके द्वारा तय किया जाता है? अर्थात सरकार को उसका अधिकार और शक्ति प्रदान करने वाला कौन है? उदाहरणार्थ, भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में देश की जनता यह निर्णय करती है और सत्ता का स्रोत होती है, जबकि धर्मतंत्रीय व्यवस्था में सत्ता का स्रोत धार्मिक विश्वास और धार्मिक संस्था का मुखिया होता है। - सरकार का गठन किस प्रकार होता है?
लोकतंत्र में सरकार का गठन सामान्यतः किसी न किसी प्रकार के निर्वाचन के माध्यम से होता है, जबकि जिन राजतंत्रात्मक राज्यों में राजा या रानी होते हैं, वहाँ सामान्यतः राजपरिवार का ही कोई सदस्य शासन करता है और निर्णय लेता है कि किस प्रकार शासन किया जाए। सरकार बनाने के अन्य तरीके भी हो सकते हैं, यहाँ तक कि लोकतंत्रों में भी निर्वाचन की विभिन्न प्रणालियाँ अपनाई जा सकती हैं। - सरकार के विभिन्न अंग कौन-कौन से होते हैं और वे क्या कार्य करते हैं?
किसी भी सरकार के अनेक अंग होते हैं, जो विभिन्न प्रकार की शासन व्यवस्थाओं में भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। उदाहरणार्थ, सरकार के तीन प्रमुख कार्य - विधायी, कार्यकारी और न्यायिक एक ही संस्था या तीन अलग-अलग संस्थाओं द्वारा किए जा सकते हैं। देश में शासन चलाने की व्यवस्था को एक प्रलेख में लिखित रूप दिया जा सकता है, जिसमें देश के मूलभूत नियम होते हैं। इसे 'संविधान' कहा जाता है और यही व्यवस्था अधिकांश लोकतंत्रों में अपनाई जाती है या फिर यह व्यवस्था राजा या रानी द्वारा तय की जा सकती है, जैसा कि 'राजतंत्र' में होता है, जहाँ शासन राजा या रानी द्वारा किया जाता है। - सरकार किस उद्देश्य से कार्य कर रही है? वह कौन-से लक्ष्य प्राप्त करना चाहती है?
सरकारों का गठन कुछ मूल्यों और आदर्शों की प्राप्ति के लिए किया जाता है। कुछ सरकारें, जैसे – भारत सरकार समता और समस्त नागरिकों की समृद्धि के लिए कार्य करती है, जबकि कुछ अन्य प्रकार की सरकारों का उद्देश्य सीमित हो सकता है।
सरकार के विभिन्न स्वरूपों में इन चार प्रमुख पहलुओं के आधार पर भिन्नताएँ पाई जाती हैं, यद्यपि अन्य प्रकार की भिन्नताएँ भी संभव हैं। आइए, अब हम सरकारों के कुछ विभिन्न स्वरूपों का अध्ययन करते हैं।
विश्व में लोकतांत्रिक सरकारें
आधुनिक विश्व में लोकतंत्र शासन का सबसे लोकप्रिय स्वरूप बन गया है। अध्याय के इस भाग में हम यह समझेंगे कि लोकतांत्रिक सरकारें भी भिन्न प्रकार की हो सकती हैं। लेकिन इन विभिन्नताओं को जानने से पहले यह आवश्यक है कि हम लोकतंत्र के कुछ मूलभूत सिद्धांतों को समझें, जो प्रत्येक लोकतंत्र में अनिवार्य रूप से पाए जाते हैं।
लोकतंत्र के मूलभूत सिद्धांत
लोकतंत्र में समानता का अर्थ है कि प्रत्येक व्यक्ति को समान व्यवहार पाने का अधिकार प्राप्त है। इसका अर्थ यह भी है कि सभी व्यक्तियों को शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सुविधाएँ समान रूप से मिलनी चाहिए और सभी व्यक्ति कानून के समक्ष समान हैं।
-----------------------------
लोकतंत्र में स्वतंत्रता से तात्पर्य नागरिकों को स्वयं चयन करने और अपना मत अभिव्यक्त करने के अधिकार से है।

-----------------------------
प्रतिनिधि सहभागिता का अर्थ है कि प्रत्येक नागरिक को चुनाव के माध्यम से अपने प्रतिनिधियों को चुनने का अधिकार प्राप्त होता है। चुने गए प्रतिनिधि विधायिका का भाग बनते हैं और सरकार के विभिन्न निर्णयों में नागरिकों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

-----------------------------
सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार प्रत्येक नागरिक को (निर्धारित आयु से ऊपर) अपना प्रतिनिधि चुनने के लिए मतदान का अधिकार प्रदान करता है।
-----------------------------
नागरिकों के मौलिक अधिकार, जैसे- मतदान का अधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार और शोषण के विरुद्ध अधिकार, सभी को लोकतंत्र में प्रदान किया जाता है और संरक्षित किया जाता है।
-----------------------------
स्वतंत्र न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि प्रत्येक नागरिक के मौलिक अधिकारों की रक्षा हो और नागरिकों के साथ-साथ सरकार के सभी अंगों के द्वारा कानूनों का पालन हो।
लोकतंत्र के ये मौलिक सिद्धांत भी समय के साथ विकसित हुए हैं। उदाहरण के लिए, भारत ने 1950 में गणराज्य बनने के साथ ही सभी वयस्कों को चुनाव में मतदान का अधिकार (सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार) प्रदान कर दिया था, जबकि स्विट्जरलैंड में महिलाओं को यह अधिकार 1971 में मिला।
यह स्पष्ट है कि उपर्युक्त सिद्धांत एक आदर्श हैं। सभी लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ इन आदर्शों को पूर्णतः व्यवहार में नहीं उतार पातीं, फिर भी यह आवश्यक है कि सभी व्यक्ति इन आदर्शों को अपने मानस में स्थान दें तथा इन्हें लोकतांत्रिक जीवन की दिशा में प्रेरक बनाएँ।
लोकतांत्रिक सरकारों के विभिन्न स्वरूप
आइए, अब हम विश्व भर में प्रचलित लोकतांत्रिक सरकारों के विभिन्न रूपों को समझते हैं।
- प्रत्यक्ष लोकतंत्र
प्रत्यक्ष लोकतंत्र वह व्यवस्था है, जिसमें देश के सभी नागरिक शासन संबंधी सभी नियमों, नीतियों एवं कार्यों के लिए प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी होते हैं और वे सभी निर्णयों में स्वयं भाग लेते हैं। वर्तमान समय में स्विट्जरलैंड जैसे देश में इस प्रकार की लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाई जाती है। इस शासन प्रणाली की एक सीमा यह है कि इसे व्यवहार में लागू करना अधिक कठिन है, विशेष रूप से बड़े देशों में- जैसा हम अपने विद्यालय की कहानी में देख चुके हैं, यदि प्रत्येक विद्यार्थी समिति का भाग बनता है, तो निर्णय लेना और सभी कार्यों को सुचारु रूप से संपन्न करना कठिन हो जाएगा। - प्रतिनिधि सरकार
यह लोकतांत्रिक सरकार का वह स्वरूप है, जिसमें नागरिक सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के माध्यम से अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं, जैसा कि भारत में होता है। इस प्रकार की लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता सीधे शासन नहीं करती, किंतु सरकार सदैव जनता के प्रति उत्तरदायी रहती है।
चुनाव प्रतिनिधि लोकतंत्र का एक अभिन्न अंग होते हैं, जिसके माध्यम से जनता अपनी इच्छा के अनुसार सरकार में बदलाव कर सकती है। इसलिए, चुनाव नियमित और निश्चित अंतराल पर आयोजित किए जाते हैं। भारत में प्रत्येक पाँच साल में आम चुनाव होते हैं, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रत्येक चार साल में आम चुनाव होते हैं।
इसे अनदेखा न करें
जैसा कि हमने आरंभ में पढ़ा था, लोकतंत्र समय के साथ विकसित हुआ और इसकी विशेषताएँ भी परिवर्तित हुई हैं। आज भी इन लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के कार्य करने के तरीकों में कई भिन्नताएँ पाई जाती हैं। यह याद रखना आवश्यक है कि जब इन देशों ने लोकतंत्र अपनाया, तब उनके पास लोकतंत्र के वे सभी सिद्धांत नहीं थे, जिस रूप में हम आज उन्हें समझते हैं। उदाहरण के लिए, ब्रिटेन में प्रभावी सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार 1928 में लागू हुआ और संयुक्त राज्य अमेरिका में यह 1965 में लागू हो सका।
| देश | लोकतंत्र की स्थापना का वर्ष |
|---|---|
| संयुक्त राज्य अमेरिका | 1787 |
| स्विट्जरलैंड | 1848 |
| भारत | 1947 |
| जर्मनी | 1949 |
| केन्या | 1964 |
| नेपाल | 2008 |
आज अधिकांश लोकतंत्र, प्रतिनिधि लोकतंत्र की प्रणाली अपनाते हैं। किंतु प्रत्येक लोकतंत्र का कार्य करने का तरीका अलग-अलग हो सकता है। सामान्यतः प्रतिनिधि लोकतंत्र के दो प्रमुख स्वरूप होते हैं।
क. संसदीय लोकतंत्रइस प्रकार की सरकार में कार्यपालिका के सदस्य विधायिका का भी हिस्सा होते हैं, जैसे भारत में प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद संसद के सदस्य भी होते हैं।

मंत्रिपरिषद विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है और तब तक कार्य करती है, जब तक उसे विधायिका का विश्वास प्राप्त रहता है। भारत में जब तक मंत्रिपरिषद को लोकसभा में विश्वास प्राप्त रहता है, वह तब तक कार्य करती है।
इस प्रकार की सरकार में जनता केवल विधायिका के सदस्यों का ही निर्वाचन करती है, न कि कार्यपालिका का। विधायिका के कुछ चयनित सदस्य ही मंत्री बनते हैं।
ख. अध्यक्षीय शासन प्रणालीइस प्रकार की शासन प्रणाली में न केवल न्यायपालिका, बल्कि कार्यपालिका भी विधायिका से स्वतंत्र कार्य करती है। राष्ट्राध्यक्ष का चुनाव जनता द्वारा किया जाता है। इसलिए राष्ट्राध्यक्ष को अपना पद बनाए रखने के लिए विधायिका के समर्थन की आवश्यकता नहीं होती।
लोकतांत्रिक सरकार के विभिन्न स्वरूपों की संरचनाएँ अलग-अलग होती हैं। आप अगले पृष्ठ की तालिका 9.1 से इन मूलभूत अंतरों को समझ सकते हैं। निम्न शब्दों से क्या तात्पर्य है?- कार्यपालिका – कार्यपालिका सरकार का वह अंग है, जो कानून को लागू करने -के लिए उत्तरदायी होता है। इसके चुनाव की प्रक्रिया विभिन्न देशों में अलग-अलग होती है।
- विधायिका – विधायिका सरकार का वह अंग है, जो कानून बनाने के लिए उत्तरदायी होता है। इसे अलग-अलग देशों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। भारत में इसे 'संसद' कहा जाता है, जबकि अमेरिका में 'कांग्रेस' कहा जाता है। अधिकांश लोकतंत्रों में इसमें दो सदन होते है- उच्च सदन और निम्न सदन ।
- उच्च सदन और निम्न सदन - अधिकांश देशों में निचले सदन के सदस्यों को प्रत्यक्ष मतदान के आधार पर चुना जाता है और यह सामान्यतः उच्च सदन से अधिक शक्तिशाली होता है, जिसे चुनाव या नामांकन द्वारा गठित किया जाता है। भारत में निम्न सदन लोकसभा और उच्च सदन राज्यसभा कहलाता है।
- शक्तियों का पृथक्करण- इसका अर्थ है कि सरकार के तीनों अंग - विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका स्वतंत्र रूप से कार्य करते हैं और एक-दूसरे के कार्यों में हस्तक्षेप नहीं करते।
| लोकतांत्रिक सरकार के विभिन्न स्वरूप | |||
|---|---|---|---|
| देश | कार्यपालिका | विधायिका | न्यायपालिका |
| भारत | प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद | निम्न सदन (लोक सभा) उच्च सदन (राज्य सभा) से अधिक शक्तिशाली है। | कार्यपालिका एवं विधायिका से स्वतंत्र (शक्तियों का पृथक्करण) |
| संयुक्त राज्य अमेरिका | राष्ट्राध्यक्ष | उच्च सदन (सीनेट) निम्न सदन (प्रतिनिधि सभा) से अधिक शक्तिशाली है। | कार्यपालिका एवं विधायिका से स्वतंत्र (शक्तियों का पृथक्करण) |
| दक्षिण कोरिया | राष्ट्राध्यक्ष | एकल सदन (राष्ट्रीय सभा) | कार्यपालिका एवं विधायिका से स्वतंत्र (शक्तियों का पृथक्करण) |
| ऑस्ट्रेलिया | प्रधानमंत्री और मंत्रिपरिषद | उच्च सदन (सीनेट) और निम्न सदन (प्रतिनिधि सभा) दोनों ही समान रूप से शक्तिशाली हैं। | कार्यपालिका एवं विधायिका से स्वतंत्र (शक्तियों का पृथक्करण) |
| क | |||
| ख | |||
आइए पता लगाएँ
- पिछले पृष्ठ पर दी गई तालिका 9.1 में देश 'क' और देश 'ख' के रूप में अपनी पसंद के दो अलग-अलग देशों का चयन कर रिक्त तालिका भरें।
- तालिका का विश्लेषण करें और इसके उदाहरणों में सभी समानताओं और भिन्नताओं पर आपस में चर्चा करें।
इस अभ्यास से आपने अवश्य ही यह समझा होगा कि लोकतांत्रिक सरकारों के विभिन्न स्वरूपों के गठन, संरचना और कार्य करने की विधियाँ अलग-अलग होती हैं। इसके साथ ही, सरकार के तीनों अंगों के मध्य संबंध भी भिन्न-भिन्न होते हैं। लेकिन, जैसा कि हमने आरंभ में पढ़ा, कुछ विशेषताएँ, जैसे- समानता, स्वतंत्रता और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार आदि सभी लोकतंत्रों में समान रूप से विद्यमान रहती हैं।
आइए पता लगाएँ
- ऊपर दिए गए उदाहरणों का अध्ययन करने के पश्चात लोकतांत्रिक सरकार के मुख्य सिद्धांतों को सूचीबद्ध करें। अपनी समझ के आधार पर नीचे दी गई गतिविधि कीजिए -
- आपको अपने विद्यालय में एक विद्यार्थी समिति का गठन करना है। इसके लिए एक योजना बनाइए और उसे लोकतांत्रिक तरीके से लागू कीजिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि -
- समिति के कार्य स्पष्ट रूप से परिभाषित हों।
- समिति के सदस्यों के चुनाव की प्रक्रिया लोकतांत्रिक हो।
इतिहास की एक झलक
प्रारंभिक गणराज्य
गणराज्य एक ऐसी शासन व्यवस्था है, जिसमें राज्य का प्रमुख निर्वाचित होता है और वह वंशानुगत राजा या रानी नहीं होता।
जैसा कि आपने 'नवारंभ - नगर और राज्य' अध्याय में पढ़ा होगा, भारत के प्राचीन महाजनपदों में कम-से-कम दो ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ यह व्यवस्था थी। वज्जि महाजनपद में विशेष रूप से लिच्छवी कुल, सामूहिक निर्णय प्रक्रिया अपनाता था और नेता जन्म के आधार पर नहीं बल्कि योग्यता के आधार पर चुने जाते थे। मुख्य पदों पर चुनाव के आधार पर नियुक्तियाँ की जाती थीं और विभिन्न कुलों के प्रतिनिधि नियमित रूप से बैठक करते थे जिससे कि जनकल्याण के लिए समस्याओं का समाधान निकाला जा सके। इसलिए, ऐसे राज्यों को प्रारंभिक गणराज्य कहा गया है।
वास्तव में, भारत में आम जनता की आवाज को सदियों से महत्व दिया गया है, भले ही सत्ता राजा या रानी के हाथों में रही हो। चोल काल (10वीं शताब्दी) के उत्तरमेरूर शिलालेखों में इसका उल्लेखनीय उदाहरण मिलता है। तमिलनाडु में स्थित ये शिलालेख ग्राम सभा (स्थानीय प्रशासनिक निकाय) के सदस्यों के चुनाव की प्रक्रिया के बारे में जानकारी देते हैं। इनमें सीलबंद मतपेटियों द्वारा चुनाव, सदस्यों की योग्यताएँ, उनके कर्तव्य और हटाए जाने की स्थितियाँ स्पष्ट की गई हैं। उदाहरणार्थ, यदि कोई सदस्य भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता था, तो उसे तत्काल पद से हटा दिया जाता।

अन्य प्रकार की सरकार
पूर्व में हमने देखा कि लोकतंत्र आज विश्व में सबसे लोकप्रिय शासन व्यवस्था है और इसके भी विभिन्न स्वरूप होते हैं। आइए, अब अन्य प्रकार की शासन व्यवस्थाओं पर प्रकाश डालते हैं और उनकी मूलभूत संरचनाओं को समझते हैं।
1. राजतंत्र
पावन भूभाग से अवगत होना
जैसा हमने 'अतीत के चित्रपट' अध्यायों में देखा कि महाजनपदों के शासक राजा हुआ करते थे जिन्हें सभा या समिति द्वारा मार्गदर्शन दिया जाता था। उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि वे इन संस्थाओं द्वारा दी गई सलाह और उनके निर्णयों को गंभीरता से लें। जैसे-जैसे भारत में साम्राज्यों का निर्माण और विस्तार होता गया, राजाओं को अपार शक्ति प्राप्त होती गई। फिर भी वे शासन चलाने के लिए मंत्रिपरिषद और अधिकारियों के एक व्यापक तंत्र पर निर्भर रहते थे। अनेक बार राजा धर्म संबंधी विषयों पर विद्वानों से परामर्श लेते थे। हालाँकि, ऐसे भी उदाहरण हैं जहाँ राजाओं ने अपनी शक्ति का प्रयोग जनता को अपने अधीन करने के लिए किया।
विश्व के कुछ भागों में राजाओं के पास पूर्ण सत्ता होती थी। वे स्वयं कानून बनाते थे, उन्हें लागू करते थे और दंड भी निर्धारित करते थे। कुछ मामलों में तो उन्होंने यह तक दावा किया कि उन्हें ईश्वर से दिव्य शक्ति प्राप्त है।

हालाँकि, भारत के कई क्षेत्रों में राजा की शक्ति न तो निरंकुश थी और न ही आलोचना से मुक्त। उनसे यह अपेक्षा की जाती थी कि वे राजधर्म की सीमाओं में रहकर निर्णय लें। इसका अर्थ था कि वे राजधर्म के अनुसार शासन करें और सभी लोगों के कल्याण को सर्वोपरि रखें। हालाँकि, इस आदर्श स्थिति को सभी राजा व्यवहार में नहीं लागू कर सके।
आइए विचार करें
यदि कोई राजा स्वयं को ईश्वरीय शक्तियों से युक्त मानने लगे, तो क्या हो सकता है? वह अपनी प्रजा पर किस प्रकार शासन करेगा?
इसे अनदेखा न करें

महाभारत के शांतिपर्व में जब कुरुवंशीय वृद्ध और ज्ञानी भीष्म बाणों की शय्या पर मृत्यु की प्रतीक्षा कर रहे थे, तब वे बड़े विस्तार से पांडवों में सबसे बड़े युधिष्ठिर को सुशासन, न्याय और राजा के नैतिक दायित्वों के विषय में उपदेश देते हैं। एक राजा केवल शासक ही नहीं होता। उसकी सबसे बड़ी प्राथमिकता अपनी प्रजा का कल्याण होता है। उसे निष्पक्ष रूप से कानूनों को लागू करना चाहिए जिससे न्याय और समानता सुनिश्चित हो सके। उसे सत्ता से आसक्त नहीं होना चाहिए क्योंकि इससे अहंकार और भ्रष्टाचार जन्म लेते हैं। राजा को उचित और विवेकपूर्ण निर्णय लेने के लिए विद्वान सलाहकारों की सलाह अवश्य लेनी चाहिए। उसे यह समझना चाहिए कि उसकी सत्ता अस्थायी है और वह धर्म के बंधन से बंधी हुई है।
राजा चंद्रापीड अपनी इष्ट देवी के लिए एक मंदिर बनवाना चाहते थे, लेकिन एक हठी मोची की झोंपड़ी उस स्थान पर स्थित थी जहाँ मंदिर बनना था। जब शिल्पकारों ने राजा से शिकायत की कि मोची उन्हें भूमि का नाप तक नहीं लेने दे रहा है, तो राजा ने शिल्पकारों को ही दोषी ठहराया कि उन्होंने पहले मोची से अनुमति क्यों नहीं ली। राजा ने स्वयं मोची को दरबार में बुलाया। मोची ने बताया कि उसकी झोंपड़ी उसके लिए माँ के समान है और राजा के लिए जितना मूल्यवान राजमहल है, उतना ही यह झोंपड़ी उसके लिए मूल्यवान है। उसने कहा "किसी का घर बलपूर्वक छीन लिए जाने पर उन्हें जिस पीड़ा का अनुभव होता है, उसे केवल वही समझ सकता है जो या तो देवता होकर अपने दिव्य रथ से गिर पड़ा हो या वह राजा हो जिसने अपना राज्य खो दिया हो।” फिर भी मोची ने कहा कि यदि राजा स्वयं आएँ और सम्मानपूर्वक उससे अनुमति माँगें तो वह अपनी झोंपड़ी छोड़ने को तैयार है। राजा स्वयं उसके पास गए, विनम्रतापूर्वक अनुरोध किया और उसे बदले में उचित धनराशि प्रदान की। इस प्रसंग का निष्कर्ष था- 'जो लोग सुख की कामना करते हैं, उन्हें झूठे अहंकार को त्याग देना चाहिए।' मोची ने राजा की धर्मनिष्ठा की प्रशंसा की जिसने एक साधारण व्यक्ति के साथ भी न्यायपूर्ण और सम्मानजनक व्यवहार किया।
कश्मीरी विद्वान कल्हण द्वारा
रचित राजतरंगिणी से (12वीं शताब्दी सामान्य संवत)
वर्तमान राजतंत्र
राजतंत्र वह शासन प्रणाली है जिसमें राजा द्वारा शासन किया जाता है। राजा या रानी को सम्राट/साम्राज्ञी भी कहा जाता है, जो संप्रभु शक्ति का प्रयोग करते हैं। राजतंत्र प्रणाली सामान्यतः वंशानुगत होती है, जिसमें राजा का ज्येष्ठ पुत्र ही भावी राजा होता है।
वर्तमान में हम दो प्रकार के राजतंत्र देखते हैं -
क. निरंकुश राजतंत्र
निरंकुश राजतंत्र वह शासन व्यवस्था है, जिसमें राजा को कानून बनाने, उन्हें लागू कराने और उनके उल्लंघन की स्थिति में न्यायिक निर्णय देने का पूर्ण अधिकार होता है। सऊदी अरब एक उदाहरण है, जहाँ राजा के पास संपूर्ण सत्ता होती है और वह इस्लामी कानून के अनुसार शासन करता है। हालाँकि, वह एक सलाहकार परिषद नियुक्त करता है, परंतु उस परिषद की सलाह मानने के लिए वह बाध्य नहीं है।
ख. संवैधानिक राजतंत्र
आइए, एक अलग प्रकार के राजतंत्र का उदाहरण देखते हैं। यूनाइटेड किंगडम या ब्रिटेन भी एक राजतंत्र है। यहाँ राष्ट्राध्यक्ष राजा या रानी होते हैं, परंतु उनके पास केवल औपचारिक शक्ति होती है। कार्यपालिका की वास्तविक शक्ति प्रधानमंत्री के पास होती है। कानून निर्माण की शक्ति संसद के पास होती है और कार्यपालिका की शक्ति मंत्रिपरिषद के माध्यम से प्रधानमंत्री द्वारा प्रयोग की जाती है।इसका अर्थ है कि सभी कानून जनता द्वारा संसद में अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से निर्मित किए जाते हैं और कार्यकारी शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद द्वारा प्रधानमंत्री के नेतृत्व में किया जाता है। इसलिए, भले ही ब्रिटेन में राजतंत्र के प्रतीक के रूप में आज भी राजा होता है, किंतु वास्तव में ब्रिटेन एक संसदीय लोकतंत्र है। इस प्रकार के लोकतंत्र को संवैधानिक राजतंत्र कहा जाता है।

2. धर्मतंत्र
धर्मतंत्र, वह शासन प्रणाली है जिसमें देश का शासन धार्मिक नियमों और धार्मिक नेताओं के निर्देशों के अनुसार होता है।ईरान, जिसका आधिकारिक नाम 'इस्लामिक ईरान गणराज्य' है, एक विशिष्ट लोकतांत्रिक व्यवस्था का प्रमुख उदाहरण है, जिसमें धर्मतंत्र और लोकतांत्रिक शासन दोनों ही प्रणालियों का समन्वयन हैं। वहाँ का संविधान इस्लाम के मूलभूत नियमों पर आधारित है, जो देश का आधिकारिक धर्म है। वहाँ का सर्वोच्च नेता विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका, तीनों पर सर्वोच्च अधिकार रखता है। इस पद पर नियुक्ति इस्लामी धर्मगुरुओं के एक समूह द्वारा की जाती है और उसका कार्यकाल जीवनपर्यंत होता है। साथ ही, एक निर्वाचित राष्ट्रपति और संसद भी होती है जो दैनिक प्रशासनिक कार्यों का संचालन करते हैं। इस गणराज्य का उद्देश्य इस्लामी नियमों पर आधारित समाज की स्थापना करना है।
वर्तमान समय में अफगानिस्तान और वेटिकन सिटी भी धर्मतंत्र के उदाहरण हैं।3. अधिनायकतंत्र
अधिनायकतंत्र एक ऐसी शासन पद्धति है जिसमें एक व्यक्ति या छोटा समूह संपूर्ण सत्ता पर नियंत्रण रखता है। इस प्रकार के शासन में संविधान या कानून के द्वारा शासक के ऊपर कोई नियंत्रण नहीं होता है। 20वीं शताब्दी में ऐसे कई तानाशाहों के उदाहरण देखने को मिले जिन्होंने लोगों के लिए अत्यंत कठिन परिस्थितियाँ उत्पन्न कीं। यहाँ हम उनमें से दो का उदाहरण देखेंगे।- 1933 में जब एडोल्फ हिटलर को जर्मनी का चांसलर नियुक्त किया गया, उसके तुरंत बाद ही उसने ऐसे कानून बनाए जिन्होंने उसे निरंकुश शक्ति प्रदान की और विपक्ष को समाप्त कर दिया। वह अब एक तानाशाह बन चुका था। अपनी नस्लीय श्रेष्ठता पर विश्वास करते हुए उसने माना कि जर्मनी को दुनिया पर शासन करना चाहिए और 'हीन नस्लों' पर अपनी श्रेष्ठता स्थापित करनी चाहिए। वह कम से कम 60 लाख यहूदियों की हत्या के लिए उत्तरदायी था, जिसे 'होलोकॉस्ट' के नाम से जाना जाता है। इसके साथ ही हजारों रोमा और अन्य समूहों के लोगों की भी हत्या की गई। वास्तव में वह द्वितीय विश्व युद्ध (1939-1945) का प्रमुख कारण बना, जिससे कई देशों में जीवन और संपत्ति की भारी हानि हुई।
- ईदी अमीन युगांडा में एक सैन्य तानाशाह था। वह हजारों लोगों की नृशंस हत्या करने के लिए उत्तरदायी था। अनेक भारतीय जिनके पूर्वज कुछ पीढ़ियों पहले युगांडा आए थे, उन्हें देश छोड़ने के लिए बाध्य किया गया था।

चित्र 9.11- ईदी अमीन का व्यंग्य-चित्र

इसे अनदेखा न करें
रोमा या रोमानी लोग मूल रूप से घुमंतू थे। उनके भाषाई और सांस्कृतिक लक्षणों के आधार पर विद्वानों ने यह माना है कि उनका मूल स्थान भारत है। वे सबसे पहले यूरोप के पूर्वी हिस्सों में बसे, लेकिन अब वे विश्व के कई देशों में प्रवास कर चुके हैं।

शेन की कहानी
शेन उत्तर कोरिया में रहता है, जहाँ उसके दैनिक जीवन से जुड़े हर छोटे-बड़े पहलुओं के लिए सरकार द्वारा नियम निर्धारित हैं। वह इस समय अनिवार्य सैन्य सेवा कर रहा है जिसमें उससे अपेक्षा की जाती है कि वह तब तक सेना में रहेगा जब तक सरकार चाहेगी। वहाँ इस बात के लिए भी नियम हैं कि उसे बाल कैसे कटवाने हैं और कैसे कपड़े पहनने हैं। वह इंटरनेट का प्रयोग नहीं कर सकता, इसलिए अपने देश के बाहर की दुनिया के बारे में नहीं जानता। सरकार उसके सभी क्रियाकलापों को बहुत नजदीकी से देखती है और उससे यह अपेक्षा भी रखती है कि यदि कोई भी नियमों का उल्लंघन करता है तो शेन उसकी जानकारी सरकार को देगा। एक दिन वह एक पर्यटक से मिला जिसने उससे पूछा, "यहाँ तुम सभी के बाल एक जैसे क्यों बने हैं?” शेन ने उत्तर दिया "हम सभी नए तरीकों से बाल बनाना चाहते हैं, लेकिन यह सरकार निर्धारित करती है, हमें किस प्रकार से बाल रखने चाहिए।"
आइए पता लगाएँ
- क्या शेन का देश एक लोकतांत्रिक देश कहा जा सकता है?
- आपके विचार में शेन का दैनिक जीवन कैसा होगा?
- क्या आप ऐसे देश में रहना चाहेंगे? बताइए क्यों?
4. अल्पतंत्र
'ओलिगार्की' ग्रीक मूल का शब्द है जहाँ 'ओलिगोस' का अर्थ है 'कुछ' और 'आर्को' का अर्थ है 'शासन करना'। इस प्रकार यह एक ऐसी शासन प्रणाली है, जिसमें कुछ शक्तिशाली लोग या परिवार शासन करते हैं और सारे महत्वपूर्ण निर्णय वही लेते हैं।
प्राचीन ग्रीस में कुछ स्थानों पर कुलीन परिवारों द्वारा शासन किया जाता था, जो ओलिगार्की के उदाहरण माने जाते हैं। कुछ राजनीतिक टिप्पणीकारों के अनुसार आधुनिक समय में कुछ लोकतंत्रों में यह देखा गया है कि कुछ शक्तिशाली राजनेता और बड़े व्यापारिक घराने शासन पर अत्यधिक प्रभाव रखते हैं।

आइए पता लगाएँ
- पिछले पृष्ठ पर दिए गए चित्र 9.13 को ध्यान से देखिए। यह चित्र 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में अमेरिका की एक निर्वाचित संस्था को दर्शाता है। चित्र में दिखाए गए सभी लोग निर्वाचित प्रतिनिधि हैं। आप क्या देख रहे हैं? चित्र के ऊपर बाईं ओर क्या दिख रहा है? आपके अनुसार इस निर्वाचित संस्था में निर्णय कौन ले रहा है?
- लोकतंत्र क्या अल्पतंत्र में बदल सकता है? लोकतंत्र को सशक्त रखने के लिए लोग क्या कर सकते हैं?
लोकतंत्र क्यों महत्वपूर्ण है?
विभिन्न प्रकार की सरकारें हमें बताती हैं कि लोकतंत्र ही देशों में शासन व्यवस्था का एकमात्र तरीका नहीं है। किंतु अधिकतर देशों में लोकतंत्र को अन्य प्रकार की शासन व्यवस्था की तुलना में अधिक उपयुक्त माना जाता है। आइए, इसे और बेहतर ढंग से समझने के लिए तुलना करें।शासन प्रणलियों के विभिन्न स्वरूपों में निम्नलिखित विशेषताओं पर विचार करें और रिक्त खानों को 'हाँ' या 'नहीं' से भरें-
| विशेषताएँ | लोकतंत्र | अधिनायकतंत्र | निरंकुश राजतंत्र | अल्पतंत्र |
|---|---|---|---|---|
| सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार | हाँ | नहीं | नहीं | नहीं |
| नागरिकों के मध्य समानता | ||||
| अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता | ||||
| शक्तियों का पृथक्करण | ||||
| सभी नागरिकों का कल्याण तथा समृद्धि |
आइए पता लगाएँ
- आपने सरकार के विभिन्न स्वरूपों की मूलभूत विशेषताएँ सीखी हैं। अब अपनी कक्षा में निम्नलिखित विषयों पर एक लघु भूमिका निर्वहन (रोल प्ले) नाटिका प्रस्तुत करें -
- लोकतंत्र
- राजतंत्र
- अधिनायकतंत्र
- इसके पश्चात विचार करें कि कौन-सी शासन व्यवस्था आपको सबसे उपयुक्त लगी?
आपने पूर्व में अलग-अलग शासन व्यवस्थाओं के बारे में पढ़ा है और यह भी समझा है कि एक देश की शासन व्यवस्था उसके नागरिकों के जीवन को किस प्रकार प्रभावित करती है। पिछली तालिका में हमने देखा कि नागरिकों की पसंद और अधिकारों का प्रतिनिधित्व विभिन्न शासन व्यवस्थाओं में अलग-अलग होता है।
वास्तविक लोकतंत्र में लोग अपना दैनिक जीवन अपने ढंग से जी सकते हैं। वे क्या बोलना चाहते हैं, क्या पहनना चाहते हैं, किस विश्वास को मानना चाहते हैं और अपनी अभिव्यक्ति कैसे करना चाहते हैं, यह सब निर्धारित करने की स्वतंत्रता उन्हें होती है, जब तक कि यह अन्य किसी के अधिकार को क्षति न पहुँचाए।
लोकतांत्रिक सरकार में लोग अपनी सरकार का चुनाव करते हैं। सरकार का यह उत्तरदायित्व होता है कि वह अपने नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करे और उनकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति सुनिश्चित करे। यदि सरकार अपने दायित्वों का सही ढंग से निर्वहन नहीं करती है, तो लोग चुनावों के माध्यम से अपने प्रतिनिधियों को बदल सकते हैं। इससे सरकार की कार्यप्रणाली पर निरंतर निगरानी बनी रहती है। इस प्रकार, लोकतांत्रिक सरकार के मूल्य और आदर्श सभी नागरिकों की भलाई पर केंद्रित होने चाहिए।
हमारा देश भी एक लोकतंत्र है और आप हमारे दैनिक जीवन में लोकतंत्र की अनेक विशेषताओं को देख सकते हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं है कि आज विश्व के आधे से अधिक देशों ने लोकतंत्र या लोकतांत्रिक शासन अपनाया है।
हालाँकि, यह भी याद रखना आवश्यक है कि लोकतंत्र की भी अपनी चुनौतियाँ हैं। कई मुद्दे, जैसे – भ्रष्टाचार, आर्थिक विषमता, लोकतांत्रिक संस्थाओं पर कुछ लोगों का अत्यधिक नियंत्रण, न्यायपालिका की स्वतंत्रता का क्षरण, सूचना माध्यमों का दुरुपयोग आदि लोकतंत्र के आदर्शों को प्राप्त करने में बाधाएँ बन सकते हैं। हम एक व्यक्ति और समाज के रूप में सजग रहकर इन समस्यों और बाधाओं को कम करने के लिए क्या कर सकते हैं?
आगे बढ़ने से पहले...
- सरकार किसी भी देश के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। समूचे विश्व में विभिन्न प्रकार की सरकारें इन प्रश्नों के अलग-अलग उत्तर देती हैं- 'यह सरकार है' – इसे कौन निर्धारित करता है? सरकार के कौन-कौन से अंग होते हैं और वे क्या कार्य करते हैं? सरकार किसके लिए कार्य करती है? सरकार को किन मूल्यों और आदर्शों का पालन करना चाहिए?
- वर्तमान में सबसे लोकप्रिय शासन प्रणाली लोकतंत्र है। विश्व भर में लोकतांत्रिक सरकारों के विभिन्न स्वरूप विद्यमान हैं, जिनमें प्रत्यक्ष लोकतंत्र और प्रतिनिधि लोकतंत्र सम्मिलित हैं।
- प्रतिनिधि लोकतंत्र के भी दो प्रमुख प्रकार होते हैं- अध्यक्षीय प्रणाली और संसदीय प्रणाली। भारत में संसदीय लोकतंत्र है।
- अन्य प्रकार की शासन व्यवस्थाओं में राजतंत्र, धर्मतंत्र, अधिनायकतंत्र और अल्पतंत्र सम्मिलित हैं।
- लोकतंत्र महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके समक्ष गंभीर चुनौतियाँ भी हैं, जिनके लिए नागरिकों को सजग और सतर्क रहना आवश्यक है।
प्रश्न और क्रियाकलाप
- आपने अध्याय में किस-किस प्रकार की सरकारों के बारे में पढ़ा? उनके नाम लिखिए।
- भारत में किस प्रकार की सरकार है और उसे ऐसा क्यों कहा जाता है?
- आपने पढ़ा कि सभी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में स्वतंत्र न्यायपालिका होती है। न्यायपालिका का स्वतंत्र होना क्यों आवश्यक है? कोई तीन कारण बताइए।
- क्या आपको लगता है कि लोकतांत्रिक सरकार अन्य शासन प्रणालियों से बेहतर है? क्यों?
- नीचे कुछ देशों की शासन पद्धतियों से जुड़ी गतिविधियाँ दी गई हैं। क्या आप इनका मिलान संबंधित शासन प्रणाली से कर सकते हैं?
- नीचे कुछ देशों के नाम दिए गए हैं। पता लगाइए कि इनमें कौन-सी शासन व्यवस्था प्रचलित है-
- लोकतांत्रिक शासन प्रणाली में लोकतंत्र के आदर्शों और मूल्यों को प्राप्त करने में कौन-कौन सी बाधाएँ आ सकती हैं? उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है?
- लोकतंत्र, राजतंत्र और अधिनायकतंत्र से किस प्रकार भिन्न है? स्पष्ट कीजिए।
| क्र. सं. | देश में प्रचलित प्रथा | शासन प्रणाली |
|---|---|---|
| 1. | सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समान रूप से देखा जाता है। | अधिनायकतंत्र |
| 2. | सरकार प्रत्येक निर्णय के लिए धार्मिक नेताओं से परामर्श करती है। | राजतंत्र |
| 3. | शासक की मृत्यु के बाद उसका पुत्र राजा बनता है। | लोकतंत्र |
| 4. | शासक किसी प्रकार के संविधान का अनुपालन करने के लिए बाध्य नहीं है। वह सभी निर्णय अपनी इच्छा के अनुसार लेता है। | धर्मतंत्र |
| क्र. सं. | देश | शासन प्रणाली |
|---|---|---|
| 1. | भूटान | |
| 2. | नेपाल | |
| 3. | बांग्लादेश | |
| 4. | दक्षिण अफ्रीका | |
| 5. | ब्राजील |