अध्याय - 10
भारत का संविधान - एक परिचय
- मैं यह कहना चाहूँगा कि यदि हम उस संविधान के अनुसार कार्य करें, जिसे हमने अपनाया है.... तो मुझे पूर्ण विश्वास है कि शीघ्र ही हम अपने देश को महान बना सकते हैं। यह एक ऐसा लक्ष्य है जिसे हम प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन इसके लिए सर्वोपरि अथक शारीरिक और मानसिक परिश्रम के साथ-साथ उत्कृष्ट नैतिक पुनर्जीवन की भी आवश्यकता होगी।
हमने एक लोकतांत्रिक संविधान तैयार किया है। लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं के सफल कार्यान्वयन के लिए आवश्यक है कि इन संस्थाओं में कार्य करने वाले दूसरे के विचारों का सम्मान करें तथा लचीलेपन और समन्वय के साथ कार्य करें।
- डॉ. राजेंद्र प्रसाद, भारत के प्रथम राष्ट्रपति

महत्वपूर्ण प्रश्न ?
- संविधान क्या है और इसकी आवश्यकता क्यों होती है?
- भारतीय संविधान का निर्माण किस प्रकार हुआ?
- हमारे स्वाधीनता संग्राम और सभ्यता की विरासत ने संविधान को कैसे प्रभावित किया?
- भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं? सत्तर वर्ष से भी पहले लिखा गया संविधान आज भी प्रासंगिक क्यों है?
यह भी जनवरी की एक ठंडी सुबह थी, जैसी हर गणतंत्र दिवस पर होती है। माँ की आवाज घर में गूंजी, “उठ जाओ! समय हो गया है, नहीं तो परेड छूट जाएगी!” पापा पहले ही जाग चुके थे। उन्होंने टेलीविजन पर दूरदर्शन लगाया और बोले, "कुमार, निहारिका, जल्दी आओ ! परेड शुरू हो गई है।" बच्चे अपने गर्म बिस्तरों से कूदकर भागे और दूरदर्शन के सामने उत्सुकता के साथ बैठ गए, ताकि गणतंत्र दिवस परेड का एक भी पल छूट न जाए।
कर्तव्य पथ पर तिरंगे के फहराने, शानदार मार्चिग बैंड्स और रंग-बिरंगे प्रदर्शनों को देखकर पूरे कमरे में गर्व और उत्साह की भावना फैल गई।
26 जनवरी भारत के लिए एक विशेष दिन है। इसी दिन वर्ष 1950 में हमारा संविधान लागू हुआ था। इस दिन का हमारे संविधान से गहरा संबंध है।
चित्र में दिखाई गई पुस्तक हमारा संविधान है। इसे सुरक्षित रखने के लिए इसे संसद में एक हीलियम से भरे काँच के डिब्बे में सावधानीपूर्वक संरक्षित किया गया है। परंतु वास्तव में संविधान है क्या और यह क्यों इतना महत्वपूर्ण है?

पुनरावलोकन करें
भारत का संविधान एक ऐसा प्रलेख है, जिसका पालन करने की प्रतिज्ञा हमारे देश के कई महत्वपूर्ण पदाधिकारी करते हैं। राष्ट्रपति शपथ लेते हैं कि वे इसे संरक्षित, सुरक्षित रखेंगे और इसकी रक्षा करेंगे। साथ ही प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद के सदस्य और न्यायाधीश यह संकल्प लेते हैं कि वे संविधान के प्रावधानों का पूर्ण रूप से पालन करेंगे।
संविधान क्या है?
सरल शब्दों में कहें तो संविधान वह प्रलेख है, जो किसी देश के मूल सिद्धांतों और कानूनों को स्पष्ट रूप से निर्धारित करता है। यह निम्नलिखित बातों को निर्धारित करता है -- सरकार के तीन अंगों - विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, भूमिकाएँ और उत्तरदायित्व;
- इन तीनों अंगों के मध्य संतुलन और नियंत्रण की व्यवस्था, जिससे निष्पक्षता; उत्तरदायित्व और जवाबदेही सुनिश्चित हो;
- नागरिकों के अधिकारों और कर्तव्यों का उल्लेख;
- राष्ट्र के दीर्घकालिक लक्ष्यों और आकांक्षाओं की रूपरेखा।
आइए पता लगाएँ
कल्पना कीजिए कि आपके विद्यालय की टीम कबड्डी के राज्य स्तरीय फाइनल मैच में पहुँच गई है। प्रतिद्वंद्वी टीम बहुत सशक्त है और पिछले दो वर्षों से लगातार विजेता रही है। इस बार वे तीसरी बार जीतकर हैट्रिक बनाना चाहते हैं। खेल आरंभ होता है और आपकी टीम की एक खिलाड़ी सामने वाली टीम के एक खिलाड़ी को आउट कर देती है, तभी विवाद हो जाता है। विरोधी टीम की खिलाड़ी कहती है कि वह आपकी टीम के खिलाड़ी द्वारा पकड़े जाने से पहले ही अपनी टीम के क्षेत्र में वापस पहुँच गई थी। रेफरी ने देखा कि वह खिलाड़ी वास्तव में आउट थी। स्थिति को सहजता से सुलझाने के लिए रेफरी एक छोटी-सी नियम-पुस्तिका निकालती हैं। दोनों टीमों के कप्तान रेफरी के साथ मिलकर नियमों को देखते हैं और सहमत होते हैं कि वह खिलाड़ी आउट थी। इस प्रकार आपकी टीम राज्य स्तरीय ट्रॉफी जीत जाती है।
अपने समूह में चर्चा कीजिए कि यदि रेफरी और टीम कप्तानों के पास ऐसी कोई नियम-पुस्तिका नहीं होती, तो क्या हो सकता था? सभी लोग उस नियम-पुस्तिका का पालन करें, यह सुनिश्चित करने के लिए क्या आवश्यक होता है? अगर टीम कप्तान उस नियम-पुस्तिका को मानने से ही मना कर देते, तो क्या होता?
किसी ऐसे खेल के बारे में सोचिए जिसे आप प्रायः खेलते हैं और उसमें पालन किए जाने वाले नियमों की सूची बनाइए। फिर प्रत्येक समूह अपनी-अपनी नियमों की सूची कक्षा के शेष विद्यार्थियों के सामने प्रस्तुत करेगा। सभी प्रस्तुतियों को ध्यान से सुनिए, नियमों पर चर्चा कीजिए और मिलकर उस खेल के लिए एक साझा नियम तय करने का प्रयास कीजिए। सभी की सहमति से नियम बनाने में आपको किन चुनौतियों का सामना करना पड़ता है?
किसी देश के लिए ऐसी 'नियम-पुस्तिका' क्या हो सकती है? उसे कैसे बनाया जाता होगा?
हमारा संविधान देश के लिए नियम-पुस्तिका की तरह ही है।
इसे अनदेखा न करें
जिस प्रकार आपकी पाठ्यपुस्तक में अनेक खंड और अध्याय होते हैं, उसी प्रकार भारत के संविधान में 25 भाग और 12 अनुसूचियाँ हैं। प्रत्येक भाग में कई खंड हैं। यह विश्व का सबसे बड़ा लिखित संविधान है। जब यह लागू हुआ था, तब इसमें 22 भाग और 8 अनुसूचियाँ थीं। इन्हें आपको कंठस्थ करने की आवश्यकता नहीं है। क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि 1950 के बाद ये संख्याएँ क्यों बढ़ी होंगी?
संविधान में दिए गए मूल नियम यह निर्धारित करते हैं कि देश में किस प्रकार की सरकार होगी, वह कैसे बनेगी और कैसे काम करेगी। इसमें वे कई मूल नियम सम्मिलित हैं, जिन पर हमने पिछले अध्याय में चर्चा की थी, जैसे कि विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का गठन कैसे होता है और वे कैसे कार्य करते हैं। संविधान यह भी बताता है कि कानून कैसे बनाए और लागू किए जाएँगे; कार्यपालिका का चुनाव कौन करेगा; न्यायपालिका का गठन कैसे होगा; और नागरिकों के क्या अधिकार और कर्तव्य होंगे।
विश्व के अनेक संविधानों की भाँति भारतीय संविधान भी देश के उन आदर्शों और मूल्यों को स्पष्ट रूप से दर्शाता है, जिनके प्रति वह प्रतिबद्ध है, जैसे- सभी के लिए समानता और न्याय, बंधुत्व, विविधता में एकता और स्वतंत्रता। वास्तव में, यही मूल्य और आदर्श प्रायः संविधान में लिखे गए कानूनों और सिद्धांतों की नींव बनते हैं।
अधिकांश संविधानों में सम्मिलित कुछ प्रमुख विशेषताएँ है -

भारतीय संविधान का निर्माण
मैं आपके प्रयासों में सफलता की कामना करता हूँ और ईश्वर से प्रार्थना करता हूँ कि आपकी कार्यवाही केवल विवेक, जन-कल्याण और सच्ची देशभक्ति से ही नहीं, बल्कि ज्ञान, सहिष्णुता, न्याय और सभी के प्रति निष्पक्षता से भी युक्त हो और सबसे बढ़कर, उसमें वह दृष्टि हो जो भारत को उसके प्राचीन गौरव की ओर ले जाए और उसे विश्व के महान राष्ट्रों की पंक्ति में सम्मान और समानता का स्थान दिला सके।"
- डॉ. सच्चिदानंद सिन्हा, संविधान सभा के अंतरिम अध्यक्ष,
संविधान निर्माण प्रक्रिया के आरंभ होने पर
जब भारत ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहा था, तब यह आवश्यक हो गया था कि हम यह योजना बनाना आरंभ करें कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हम अपना शासन कैसे चलाएँगे। भारत जैसे विशाल, सांस्कृतिक रूप से विविध और जटिल देश में कई महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर देने थे- हमें किस प्रकार की सरकार चाहिए? कौन-से नियम और सिद्धांत हमारा मार्गदर्शन करेंगे? मतदान का अधिकार किसे मिलना चाहिए? विवादों का समाधान कैसे किया जाएगा?
इन तथा कई अन्य महत्वपूर्ण प्रश्नों के उत्तर ढूँढ़ने के लिए वर्ष 1946 में एक संविधान सभा का गठन किया गया। प्रारंभ में इसमें 389 सदस्य थे, जो भारत के विभाजन के बाद घटकर 299 रह गए। इनमें 15 महिलाएँ भी सम्मिलित थीं। ये सदस्य भारत के विभिन्न क्षेत्रों, व्यवसायों और सामाजिक वर्गों का प्रतिनिधित्व करते थे।
हमारा संविधान कैसे बना?
भारतीय संविधान की रचना संविधान सभा द्वारा लगभग तीन वर्षों की अवधि में की गई। यह सभा 9 दिसंबर 1946 को गठित की गई थी और इसके सदस्य प्रांतीय विधायिकाओं द्वारा चुने गए थे, जो स्वयं जनता द्वारा निर्वाचित थे। डॉ. राजेंद्र प्रसाद संविधान सभा के अध्यक्ष थे। यह कार्य 26 नवंबर 1949 को पूरा हुआ और परिणामस्वरूप तैयार प्रलेख भारत के संविधान के रूप में 26 जनवरी 1950 को अंगीकृत किया गया। इसीलिए हम प्रतिवर्ष इस दिन को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाते हैं।
संविधान का प्रारंभिक मसौदा संविधान सभा की प्रारूप समिति द्वारा तैयार किया गया, जिसकी अध्यक्षता प्रसिद्ध समाज सुधारक और स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर ने की थी। (चित्र 10.3)

आइए पता लगाएँ
छोटे-छोटे समूहों में मिलकर यह पता लगाने का प्रयास कीजिए कि आपके क्षेत्र से कौन-कौन से व्यक्ति भारतीय संविधान निर्माण में सम्मिलित हुए थे। इसके लिए आप कौन-से स्रोतों का उपयोग कर सकते हैं? (संकेत- अपने विद्यालय या स्थानीय पुस्तकालय में उपलब्ध पुस्तकें ढूँढ़ें। आप अपने शिक्षक, माता-पिता और पड़ोस के वृद्धों से भी पूछ सकते हैं। साथ ही, (https://sansad.in/Is/about/
constituent-assembly) पर जाकर जानकारी प्राप्त करें।)
भारतीय संविधान को आकार देने और प्रभावित करने वाले कारक
भारतीय संविधान के निर्माण के समय इसे अनेक कारकों ने प्रभावित किया था। इनमें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अनुभव, विचार और आदर्श प्रमुख थे। साथ ही, भारत की सांस्कृतिक और साभ्यतिक विरासत की भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका रही। इसके अतिरिक्त, अन्य देशों के संविधानों से भी उपयोगी बातें ली गई थीं।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रभाव
भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के अनेक मुख्य आदर्शों और मूल्यों को संविधान में स्थान दिया गया। स्वतंत्र भारत के लिए संविधान नींव का पत्थर था। भारत के स्वतंत्रता संग्राम के कई प्रमुख नेता संविधान सभा के सदस्य थे, जिन्होंने अपने अनुभव और विचार संविधान में सम्मिलित किए।ये आदर्श और मूल्य हैं - सभी के लिए समानता और न्याय; बंधुत्व; भारत की सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण; और संविधान को इन आदर्शों की प्राप्ति के एक साधन और उपाय के रूप में देखना।
स्वतंत्रता संग्राम से प्राप्त अनुभव और शिक्षाओं ने अनेक 'कैसे' और 'क्या' संबंधी प्रश्नों का समाधान भी प्रस्तुत किया।


- हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि प्रत्येक वयस्क नागरिक को मतदान का अधिकार मिले?
- हम यह कैसे सुनिश्चित करें कि कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका की शक्तियाँ अलग-अलग रखी जाएँ?
- हम प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक अधिकारों के सम्मान की गारंटी कैसे करें?
- यदि हमें संविधान में संशोधन करना हो, तो क्या प्रक्रिया होनी चाहिए?
- केंद्र और राज्य सरकारों के बीच क्या संबंध होना चाहिए? आदि।
हम इस अध्याय में आगे देखेंगे कि संविधान में इन्हें किस प्रकार व्यवस्थित किया गया है।
भारतीय सभ्यता की विरासत और इतिहास
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भारत के एक राष्ट्र होने की यह भावना हमारे सविधान में अतर्निहित है।
कुछ मौलिक सिद्धांत हमारी संस्कृति में गूढ़ रूप से समाहित हैं, जैसे – मत वैभिन्य की स्वीकृति, प्रकृति को पवित्र मानना, ज्ञान और शिक्षा की निरंतर खोज, महिलाओं के प्रति सम्मान तथा 'वसुधैव कुटुम्बकम्' (संपूर्ण विश्व एक परिवार है) और 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' (सभी सुखी हों) जैसे आदर्श। ये सभी सिद्धांत हमारे संविधान में भी विद्यमान हैं, यद्यपि कहीं-कहीं ये थोड़े भिन्न ढंग से व्यक्त किए गए हैं।
पुनरावलोकन करें
इसलिए यह स्वाभाविक था कि संविधान निर्माता हमारी सभ्यता से प्राप्त इन विचारों को हमारे संविधान में समाहित करते। उदाहरणार्थ, मौलिक कर्तव्य इसी का एक महत्वपूर्ण अंग है।
विश्व से मिला ज्ञान
भारतीय परंपरा के अनुरूप "आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” (अर्थात सभी दिशाओं से शुभ विचार मेरे पास आएँ) संविधान निर्माताओं ने फ्रांस, अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, आयरलैंड, ऑस्ट्रेलिया और अन्य लोकतांत्रिक देशों के संविधान का अध्ययन किया, उन्होंने यह देखा कि कौन-से विचार भारतीय संदर्भ में उपयोगी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, 'स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व' के उदाहरण फ्रांस के संविधान से लिए गए, जो फ्रांसीसी क्रांति (1789) से उत्पन्न हुए थे। राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांत, जिनके बारे में हम आगे पढ़ेंगे, आयरलैंड के संविधान से प्रेरित थे। स्वतंत्र न्यायपालिका की अवधारणा अमेरिका के संविधान से प्रेरित थी।

भारत के संविधान में कुछ चित्रण








भारतीय संविधान की मुख्य विशेषताएँ
संविधान की मुख्य विशेषताओं से परिचित होने से पहले, आइए कक्षा 6 में पढ़ी गई कुछ अवधारणाओं का पुनरावलोकन करते हैं।
पुनरावलोकन करें
- सरकार के तीन अंग होते हैं- विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका और इनकी प्रभावी कार्यप्रणाली के लिए 'शक्तियों का पृथक्करण' अत्यंत आवश्यक है।
- विधायिका कानून निर्माण करती है।
- प्रधानमंत्री की अगुवाई में कार्यपालिका इन कानूनों को लागू करती है।
- न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि बनाए गए सभी कानून संविधान के अनुरूप हों। यह भी निर्णय लेती है कि किसी कानून का उल्लंघन तो नहीं हुआ है और यदि उल्लंघन हुआ है, तो क्या दंड दिया जाना चाहिए।
- हमारे यहाँ सरकार की त्रि-स्तरीय व्यवस्था है- केंद्र, राज्य और स्थानीय (पंचायती राज व्यवस्था)।
- कुछ कार्य और दायित्व केंद्र सरकार के लिए आरक्षित हैं, जबकि अन्य कार्य राज्य सरकार को सौंपे गए हैं।
संविधान इन बिंदुओं को व्यापक रूप से निर्धारित करता है। यह सरकार के प्रत्येक अंग की भूमिका, कार्य, उत्तरदायित्व और जवाबदेही की व्यवस्था को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है। इसके अतिरिक्त, ऐसा निर्वाचन तंत्र भी निर्धारित किया गया है, जिससे देश के प्रत्येक पात्र नागरिक को मतदान का अवसर सुनिश्चित हो सके।
मौलिक कर्तव्यों और अधिकारों के कुछ उदाहरण हमें सूचना-चित्र (चित्र 10.14) में मिलते हैं। संविधान के अन्य मुख्य पहलू हैं- मौलिक कर्तव्य, मौलिक अधिकार तथा राज्य के नीति-निर्देशक तत्व । राज्य के नीति-निर्देशक तत्व हमारे संविधान निर्माताओं द्वारा भारत के सामाजिक और आर्थिक दृष्टिकोण का सार प्रस्तुत करते हैं। हम जो उदाहरण सूचना-चित्र में प्रस्तुत कर रहे हैं, वे उन सिद्धांतों का चित्रण करते हैं जिनका पालन शासन व्यवस्था से अपेक्षित था।
इसे अनदेखा न करें
राज्य के नीति-निर्देशक तत्व वे लक्ष्य हैं, जिन्हें सरकार को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। ये उस दिशा को दर्शाते हैं, जिसमें संविधान निर्माताओं ने देश को आगे बढ़ते देखना चाहा था, जिससे कि भारत को सभी नागरिकों के लिए उन्नत बनाया जा सके। उदाहरणार्थ, देश के प्रत्येक व्यक्ति को एक अच्छे जीवन-स्तर का अधिकार मिलना चाहिए। लेकिन यदि सरकार इन तत्वों का पालन करने का प्रयास नहीं करती, तो कोई व्यक्ति न्यायालय जाकर इसकी शिकायत नहीं कर सकता। नीति-निर्देशक तत्व कठोर नियमों की तुलना में दिशा-निर्देशों जैसे हैं। दूसरी ओर, मूल अधिकार वे प्रतिज्ञाएँ हैं, जिन्हें निभाना अनिवार्य है। यदि आपके साथ केवल आपकी पहचान के कारण कोई अनुचित व्यवहार करता है, तो आप न्यायालय की सहायता ले सकते हैं।
हमारे संविधान निर्माताओं ने यह व्यवस्था निश्चित उद्देश्य से बनाई थी। वे चाहते थे कि कुछ अधिकार (मूल अधिकार) ऐसे हों जिन्हें तुरंत प्राप्त किया जा सके और कुछ बड़े लक्ष्य (नीति-निर्देशक तत्व) ऐसे हों जिन्हें देश की प्रगति के साथ धीरे-धीरे प्राप्त किया जा सके।
सरकारें किस प्रकार एक-दूसरे से भिन्न होती हैं?
आइए पता लगाएँ
नीचे दिए गए उद्धरण को पढ़िए। आपके विचार से यह संविधान के किस अनुच्छेद का संदर्भ दे रहा है। आपके अनुसार उन्होंने ऐसा क्यों कहा कि महिलाओं की समानता भारत के लिए कोई नई अवधारणा नहीं है? कक्षा में इस पर चर्चा कीजिए।
महोदय, भारत की महिलाएँ जीवन के सभी क्षेत्रों में पुरुषों के साथ पूर्ण समानता के अपने वैध अधिकार को लेकर प्रसन्न हैं। मैं यह इसलिए कहती हूँ कि यह कोई नया सिद्धांत नहीं है जिसे विशेष रूप से इस संविधान के लिए प्रस्तावित किया गया है, बल्कि यह एक आदर्श है जिसे भारत ने लंबे समय से सँजोकर रखा है। यद्यपि कुछ समय तक सामाजिक परिस्थितियों ने दुर्भाग्यवश इसे व्यावहारिक रूप से विफल कर दिया था। यह संविधान उस आदर्श की पुष्टि करता है और यह प्रभावी आश्वासन देता है कि भारतीय गणराज्य में महिलाओं के अधिकारों का विधि के अनुसार पूर्ण सम्मान किया जाएगा।"
- बेगम ऐजाज रसूल, 22 नवंबर 1949,
संविधान सभा में बहस के दौरान
मौलिक अधिकार
- समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता)
- स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 21- जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा)
- शोषण के विरुद्ध अधिकार
- शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21-ए)
राज्य के नीति-निर्देशक तत्व
- अनुच्छेद 38 - सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक न्याय
- अनुच्छेद 41 - कल्याणकारी सरकार
- अनुच्छेद 44 – समान नागरिक संहिता -
- अनुच्छेद 47 - पोषण, जीवन स्तर और सार्वजनिक स्वास्थ्य का संवर्धन
- अनुच्छेद 48-ए - पर्यावरण और वन्यजीव संरक्षण
- अनुच्छेद 49 - राष्ट्रीय महत्व के स्मारकों, स्थलों और वस्तुओं का संरक्षण
मौलिक कर्तव्य
- संविधान, उसके आदर्शों और संस्थाओं, राष्ट्र-ध्वज और राष्ट्रगान का आदर करना।
- देश की रक्षा करना और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करना।
- हमारी साझा संस्कृति की समृद्ध विरासत का सम्मान करना और उसे सुरक्षित रखना।
- प्राकृतिक पर्यावरण, जिसमें वन, झीलें, नदियाँ और वन्य जीव सम्मिलित हैं, की रक्षा करना और जीवमात्र के प्रति दया भाव रखना।
- प्रत्येक क्षेत्र में व्यक्तिगत और सामूहिक उत्कृष्टता की ओर प्रयत्न करना, जिससे राष्ट्र निरंतर ऊँचाई की ओर बढ़े।
- यदि माता-पिता या अभिभावक हैं, तो 6 से 14 वर्ष की आयु के अपने बच्चे या आश्रित को शिक्षा प्रदान करने का प्रयास करना।
संविधान एक जीवंत प्रलेख है
हमारे संविधान निर्माताओं ने यह समझा था कि समय के साथ और भी नए कानूनों की आवश्यकता उत्पन्न होगी। उदाहरणार्थ, भाग 4-ए 'मूल कर्तव्य' वर्ष 1976 में जोड़े गए थे। हालाँकि, हमें याद रखना चाहिए कि संविधान में कोई भी परिवर्तन, जिसे 'संशोधन' कहा जाता है, संसद में गहन चर्चा और विचार-विमर्श के बाद ही स्वीकार किया जाता है। कुछ मामलों में राज्यों की विधान सभाओं में भी चर्चा होती है। अनेक बार आम जनता से भी राय ली जाती है। कुछ संशोधन जन आंदोलनों के माध्यम से भी प्रारंभ हो सकते हैं।
आइए पता लगाएँ
- एक समय था जब नागरिकों को अपने घरों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने की अनुमति नहीं थी। यह स्थिति 2004 में बदली, जब एक नागरिक ने इसे देश के प्रति अपने गर्व को व्यक्त करने का अधिकार मानते हुए न्यायालय में चुनौती दी। माननीय उच्चतम न्यायालय ने इस पर सहमति जताई और कहा कि तिरंगा फहराना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भाग है। आज हम गर्व के साथ तिरंगा फहरा सकते हैं, बशर्ते उसका अपमान न हो।
- हमने कक्षा 6 में पंचायती राज व्यवस्था का अध्ययन किया था। यह संविधान का मूल भाग नहीं था। इसे 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 के द्वारा जोड़ा गया था।
- क्या आप पता कर सकते हैं कि पिछले दस वर्षों में संविधान में कौन-कौन से संशोधन किए गए हैं?
सरकार भी नागरिकों को प्रस्तावित कानूनों या नियमों में बदलाव के संबंध में सुझाव देने के अवसर प्रदान करती है। अगला पृष्ठ इसी पर प्रकाश डालता है।
इसे अनदेखा न करें
भारतीय संविधान केवल एक कानूनी प्रलेख नहीं है, अपितु एक कलात्मक रचना भी है। प्रेम बिहारी नारायण रायजादा ने संविधान का मूल पाठ अपनी सुंदर हस्तलिपि में लिखा था। नंदलाल बोस एवं उनके सहयोगियों ने इसके प्रत्येक पृष्ठ को मोहनजोदड़ो से लेकर स्वतंत्रता आंदोलन तक के ऐतिहासिक दृश्य बनाकर सजाया था। (चित्र 10.6 से 10.13 देखें)

उद्देशिका को समझना - भारतीय संविधान के मार्गदर्शक मूल्य
संविधान के महत्वपूर्ण मूल्य नीतियों एवं निर्णयों हेतु दिशा-निर्देश प्रदान करते हैं, जिनका सरकार द्वारा पालन किया जाना अपेक्षित है। नागरिकों से भी अपेक्षा की जाती है कि वे अपनी क्षमता के अनुसार इन मूल्यों का पालन करें। ये मार्गदर्शक मूल्य पूरे संविधान में समाहित हैं, लेकिन उनका सार उद्देशिका में संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत है। इसलिए, अब हम उद्देशिका का अध्ययन करेंगे।
भारतीय संविधान की उद्देशिका
हम, भारत के लोग
यह संविधान भारत के लोगों ने स्वयं अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से बनाया और अपनाया है, जिसे न तो किसी राजा ने हमें दिया, न ही किसी बाहरी शक्ति ने।
संप्रभु
लोकतंत्र में सभी मामलों में सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति लोगों में निहित होती है। कोई भी बाहरी शक्ति भारत सरकार को निर्देश नहीं दे सकती।
समाजवादी
संपत्ति का उत्पादन समाज में होता है और उसका लाभ समाज के बीच साझा होना चाहिए। सरकार भूमि और उद्योग के स्वामित्व को नियंत्रित कर सकती है, जिससे सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को कम किया जा सके।
पंथनिरपेक्ष
नागरिकों को अपनी पसंद का धर्म अपनाने और पालन करने की पूर्ण स्वतंत्रता है। भारत का कोई राजकीय धर्म नहीं है। सरकार सभी धर्म-विश्वासों और आचारों के साथ समान व्यवहार करती है।
हम, भारत के लोग
यह संविधान भारत के लोगों ने स्वयं अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से बनाया और अपनाया है, जिसे न तो किसी राजा ने हमें दिया, न ही किसी बाहरी शक्ति ने।
लोकतांत्रिक
एक प्रकार की सरकार जिसमें लोगों के पास समान राजनीतिक अधिकार होते हैं। वे अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं और उन्हें जवाबदेह रखते हैं। सरकार कुछ मूलभूत नियमों के अनुसार चलाई जाती है।
बंधुता
हम सभी को एक परिवार के सदस्यों की तरह व्यवहार करना चाहिए। किसी को भी दूसरे नागरिक को नीचा नहीं दिखाना चाहिए।
समानता
कानून के समक्ष सभी समान हैं। सामाजिक असमानताओं को समाप्त किया जाना चाहिए। सभी को समान अवसर प्रदान करना सरकार का कर्तव्य है।स्वतंत्रता
नागरिकों के सोचने, अपने विचार व्यक्त करने और अपने विश्वासों के अनुसार कार्य करने पर कोई अनुचित रोक नहीं होनी चाहिए।
न्याय
नागरिकों के साथ जाति, धर्म और लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाएगा। सामाजिक असमानताओं को समाप्त किया जाना चाहिए। सरकार के सभी वर्गों, विशेष रूप से वंचित समूहों के कल्याण के लिए काम करना चाहिए।
गणराज्य
राष्ट्र का अध्यक्ष निर्वाचित होता है, न कि वंशानुगत ।
नोट - 'समाजवादी' और 'पंथनिरपेक्ष' शब्दों को 42वें संविधान संशोधन, 1976 द्वारा संविधान की उद्देशिका में जोड़ा गया है।

आइए पता लगाएँ
प्रस्तावना में उल्लिखित विशेषताओं की सूची नीचे दी गई है। इन्हें दिए गए चित्र में ध्यान से पढ़िए और अपने आस-पास के दैनिक जीवन में इन मूल्यों के पालन के उदाहरण लिखिए। दो उदाहरण दिए गए हैं, जिससे आपको अभ्यास पूर्ण करने में सहायता मिलेगी।
| प्रस्तावना की विशेषताएँ | हम इन्हें अपने दैनिक जीवन में कैसे देखते हैं |
|---|---|
| संप्रभु | |
| पंथनिरपेक्ष | किसी व्यक्ति को यदि अपने धर्म के रीति-रिवाजों का पालन करना है और वह दूसरे के जीवन में बाधा नहीं डालता, तो उसे इसके लिए राज्य से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। |
| गणतंत्र | |
| न्याय | राज्य नौकरियों और अवसरों में सभी नागरिकों को जाति, धर्म, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव किए बिना समान अवसर प्रदान करता है। |
| स्वतंत्रता | |
| समानता | |
| बंधुत्व |
आगे बढ़ने से पहले...
- भारतीय संविधान एक मार्गदर्शक नियम-पुस्तिका है, जो सभी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करता है। नागरिकों से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वे संविधान में निहित मूल कर्तव्यों का पालन करें।
- भारत की समृद्ध सभ्यता की विरासत, स्वतंत्रता संग्राम और अन्य देशों के संविधानों से ली गई अच्छी परंपराएँ भारतीय संविधान के निर्माण में सहायक रहीं।
- संविधान की मुख्य विशेषताएँ देश की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचना तथा उसकी संसदीय शासन प्रणाली को परिभाषित करती हैं।
- यह एक जीवंत प्रलेख है, जिसे देश की आवश्यकताओं के अनुसार समय-समय पर संशोधित किया जा सकता है।
प्रश्न और क्रियाकलाप
- 'संविधान सभा में भारत के विभिन्न क्षेत्रों और पृष्ठभूमियों के प्रतिनिधि सम्मिलित थे।' आपके अनुसार ऐसा होना क्यों महत्वपूर्ण था?
- नीचे दिए गए कथनों को ध्यान से पढ़िए और पहचानिए कि इनमें भारतीय संविधान की कौन-कौन सी प्रमुख विशेषताएँ या मूल्य दिखाई देते हैं -
- यह कहा जाता है कि 'भारत में सभी नागरिक कानून के समक्ष समान है।' क्या आपको लगता है कि यह एक सच्चाई है? यदि हाँ, तो क्यों? यदि नहीं, तो क्यों नहीं? तर्कों के साथ उत्तर दीजिए।
- आपने पढ़ा कि 'भारत एकमात्र ऐसा देश है, जिसने आरंभ से ही अपने नागरिकों को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार प्रदान किया।' क्या आप बता सकते हैं कि भारत ने ऐसा क्यों किया?
- स्वतंत्रता संग्राम ने भारतीय संविधान के निर्माण को कैसे प्रेरित किया? भारतीय सभ्यता की विरासत ने संविधान की किन प्रमुख विशेषताओं को किस प्रकार प्रेरित किया? स्पष्ट कीजिए।
- क्या आपको लगता है कि हम एक समाज के रूप में संविधान के सभी आदर्शों को प्राप्त कर चुके हैं? यदि नहीं, तो एक नागरिक के रूप में हम में से प्रत्येक क्या कर सकता है जिससे कि हमारा देश इन आदर्शों के और निकट पहुँच सके?
- अगले पृष्ठ पर दी गई शब्द-पहेली को भारतीय संविधान की महत्वपूर्ण अवधारणाओं का प्रयोग करते हुए हल कीजिए।

ऊपर से नीचे
2. वे अधिकार जो हर नागरिक को मिलते हैं, जैसे - स्वतंत्रता और समानता का अधिकार।
1. वह गैस जिसमें मूल संविधान की प्रति सुरक्षित रखी गई है।
4. लोगों का वह समूह जिसने भारतीय संविधान तैयार किया।
7. संविधान का आरंभिक कथन, जो वे मूल्य व आदर्श बताता है, जिनका वह संरक्षण करता है।
बाएँ से दाएँ
6. वह प्रकिया जो संविधान में परिवर्तन के लिए प्रयोग की जाती है।
5. सरकार का अंग, जो कानून बनाता है।
8. सरकार का अंग, जो कानून को क्रियान्वित करता है।
3. संविधान का वह भाग जो नागरिकों के कर्तव्य को दर्शाता है।
(क) शीना, रजत और हर्ष एक पंक्ति में खड़े हैं। वे आम चुनावों में अपना पहला वोट डालने के लिए उत्साहित हैं।
(ख) राधा, इमोन और हरप्रीत एक ही विद्यालय की एक ही कक्षा में पढ़ते हैं।
(ग) माता-पिता को अपने बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था करनी चाहिए।
(घ) गाँव के कुएँ का उपयोग सभी जाति, धर्म और लिंग के लोग कर सकते हैं।