अध्याय - 11
गुप्त काल - अथक सृजनशीलता का युग
मुद्रा का महत्व इसलिए है, क्योंकि यह वर्तमान और भविष्य को जोड़ने वाली कड़ी है।
- जॉन मेनार्ड कीन्स, बीसवीं शताब्दी के अर्थशास्त्री

महत्वपूर्ण प्रश्न ?
- मुद्रा प्रचलन से पहले विनिमय कैसे होता था?
- मुद्रा प्रचलन में क्यों आई?
- समय के साथ मुद्रा विभिन्न रूपों में कैसे परिवर्तित हुई?
पिछली कक्षा में आपने 'अतीत के चित्रपट' विषय में पढ़ा था कि लोग किस प्रकार की फसलें उगाते थे, जैसे – अनाज; या वे कारनेलियन के मनके जैसी वस्तुएँ कैसे बनाते थे। आपके विचार में, वे इन वस्तुओं का विनिमय अपनी आवश्यकता की वस्तुओं के लिए कैसे करते होंगे?
प्राचीन काल में, लोग अपनी वस्तुओं और सेवाओं का विनिमय अन्य वस्तुओं एवं सेवाओं के लिए करते थे। इस व्यवस्था को वस्तु विनिमय प्रणाली (बार्टर सिस्टम) कहते हैं। यह कैसे संचालित होती थी? मान लीजिए कि आपको एक पेंसिल की आवश्यकता है और आपके पास एक अतिरिक्त रबर है। इसी बीच पता चलता है कि आपका सहपाठी रबर लाना भूल गया है, किंतु उसके पास अतिरिक्त पेंसिल है। ऐसे में आप अपने अतिरिक्त रबर का विनिमय अपने सहपाठी की अतिरिक्त पेंसिल के साथ कर सकते हैं। क्या इससे आपकी और आपके सहपाठी की आवश्कता पूरी नहीं हो सकती? इस तरीके से वस्तु विनिमय प्रणाली संचालित होती है।
आज हम वस्तुओं को खरीदने और बेचने के लिए सिक्कों और नोटों का प्रयोग करते हैं। लोग इस तरह के लेन-देन के लिए अपने मोबाइल फोन और कंप्यूटर का भी प्रयोग करते हैं।
वस्तु विनिमय प्रणाली लेन-देन का सबसे प्रारंभिक रूप था। इसके विश्व में कई प्रमाण मिले हैं। उस समय लोग विनिमय के लिए कौड़ी, कवच, नमक, चायपत्ती, तंबाकू, कपड़ा, पशुधन (गाय, बकरी, घोड़े, भेड़), बीज आदि जैसी वस्तुओं का प्रयोग करते थे।



हमें मुद्रा की आवश्यकता क्यों है?
आइए पता लगाएँ

कल्पना कीजिए कि आप एक किसान हैं और जहाँ आप रहते हैं, वहाँ लोग वस्तु विनिमय प्रणाली का प्रयोग करते हैं। आपको यहाँ अनेक प्रकार की वस्तुओं की आवश्यकता है, जैसे- एक जोड़ी नए जूते, एक स्वेटर और अपनी दादी के लिए दवाइयाँ। परंतु आपके पास देने के लिए केवल एक बैल है।

इस बैल का विनिमय करके आप कैसे विभिन्न प्रकार की आवश्यक वस्तुओं को विभिन्न लोगों एवं स्थानों से प्राप्त करेंगे? इसमें आपको किस प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है? सबसे पहले आपको किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ना होगा जिसे बैल की आवश्यकता हो। बैल को केवल एक जोड़ी जूतों के लिए बदलना संभवतः उचित विनिमय नहीं होगा। आपको इसके लिए बहुत सारे विनिमयों या आदान-प्रदान की श्रृंखला से गुजरना पड़ेगा। उदाहरण के लिए, पहले किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ना होगा जो आपको बैल के बदले कई बोरे गेहूँ दे सके। फिर आपको वह सारा गेहूँ कई स्थानों पर ले जाना पड़ेगा।

सबसे पहले आपको किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ना होगा जो जूतों के बदले गेहूँ का कुछ भाग लेने को तैयार हो, फिर दूसरा व्यक्ति स्वेटर के लिए तथा अन्य कोई और दवाइयों के लिए। हर लेन-देन में यह तय करना कठिन होगा कि जूते या स्वेटर के बदले गेहूँ की कितनी मात्रा उचित रहेगी। दोनों पक्षों को तैयार करने के लिए लंबी बातचीत करनी पड़ेगी।


आपको बचे हुए गेहूँ के बोरे उठाकर किसी ऐसे स्थान पर रखने पड़ेंगे, जहाँ उसका सुरक्षित भंडारण किया जा सके। अगली बार जब आपको कुछ खरीदना होगा, तो आपको फिर से गेहूँ के बोरे को ले जाना पड़ेगा।
आइए विचार करें
ऊपर दी गई स्थिति में आपको किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
कल्पना कीजिए कि किसान की कहानी में, वह कोई ऐसा व्यक्ति ढूंढ़ लेता है जो उसके बैल के बदले उसे एक जोड़ी नए जूते, एक स्वेटर और दवाइयाँ देने को तैयार हो। क्या आप सोचते हैं कि ऐसी स्थिति आसानी से बन सकती है?
ठीक किसान की तरह, वस्तु विनिमय प्रणाली पर निर्भर व्यक्तियों को अपने दैनिक जीवन में विनिमय करने में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता होगा। उन्हें ऐसा व्यक्ति ढूँढ़ना पड़ता होगा जो ठीक वही वस्तु चाहता है, जिसे वे देना चाहते हैं और बदले में वह व्यक्ति ठीक वही वस्तु दे सके जिसकी उन्हें आवश्यकता है। इस स्थिति को आवश्यकताओं का द्विसंयोग (डबल कोइंसिडेंस ऑफ वॉन्ट्स) कहा जाता है।
अगर मान लें कि दो व्यक्ति एक-दूसरे की वस्तुएँ चाहते हों और विनिमय के लिए तैयार भी हों, तो भी अन्य समस्याएँ आ सकती हैं। उदाहरण के लिए, यह तय करना कि कितने अनुपात में दोनों वस्तुओं का विनिमय किया जाए? ऐसे मामलों में, एक वस्तु के मूल्य की तुलना दूसरी वस्तु के मूल्य से करना कठिन हो जाता है। अगर किसी एक व्यक्ति को लगता है कि यह विनिमय उसके लिए लाभकारी नहीं है, तो वह विनिमय में रुचि नहीं रखेगा। इसका कारण यह है कि वहाँ मूल्य का कोई सामान्य मानक माप उपलब्ध नहीं है।
आइए विचार करें
ऊपर दी गई स्थिति में आपको किन-किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा?
आप बैल का कुछ हिस्सा स्वेटर के लिए विनिमय नहीं कर सकते- यह विभाज्यता (डिवीजिबिलिटी) की समस्या है। बैल को सभी स्थानों पर ले जाना कठिन है- यह सुवाह्यता (पोर्टेबिलिटी) की समस्या है। आप गेहूँ के बदले बैल का विनिमय करके कुछ हद तक इस समस्या का समाधान कर सकते हैं, किंतु गेहूँ को अधिक समय तक संगृहीत नहीं किया जा सकता, क्योंकि गेहूँ या तो सड़ सकता है या चूहे इसे खा सकते हैं। इस तरह टिकाऊपन (ड्यूरेबिलिटी) की समस्या उत्पन्न होती है।
आइए विचार करें
ऐसे कुछ उपाय सुझाइए जिससे मुद्रा के प्रयोग द्वारा किसान की स्थिति को सरल बनाया जा सके?
इसे अनदेखा न करें

हालाँकि, मुद्रा ने संपूर्ण विश्व में पारंपरिक वस्तु विनिमय प्रणाली को प्रतिस्थापित कर दिया है, परंतु आज भी कुछ स्थानों पर इस प्रणाली का प्रचलन है। उनमें से एक है- जोन बोल मेला (असमी भाषा में जोन का अर्थ चाँद और बोल का अर्थ आर्द्रभूमि होता है), जो असम के मोरीगांव जिले में एक तीन दिवसीय वार्षिक सामाजिक-सांस्कृतिक मेला है। रोचक बात यह है कि यह मेला अग्नि पूजा से प्रारंभ होता है, जिसमें सार्वभौमिक कल्याण हेतु प्रार्थना की जाती है।
15वीं शताब्दी के आरंभ में असम और मेघालय की तिवा, कारबी, खासी और जैंतिया जनजातियों के समुदायों के प्रमुख प्रतिवर्ष राजनीतिक मुद्दो पर चर्चा करने एवं मैत्रीपूर्ण संबंध बनाए रखने के लिए एकत्रित होते थे। इन जनजातियों के सदस्यों द्वारा इस आयोजन के समय एकत्रित होने के कारण इस आयोजन ने मेले का रूप ले लिया। यहाँ लोग अपने उत्पादों को लाकर एक-दूसरे के उत्पादों के साथ विनिमय करने लगे। यह आज भी एक महत्वपूर्ण सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यक्रम बना हुआ है। यहाँ पर वस्तु विनिमय प्रातःकाल ही शुरू हो जाता है, जिसमें स्थानीय उत्पाद जैसे – कंद-मूल, सब्जियाँ, फल, जड़ी-बूटियाँ और मसालों का लेन-देन होता है। मेले में हस्तनिर्मित वस्तुएँ और कलाकृतियाँ भी देखने को मिलती हैं, जो पहाड़ी क्षेत्रों के जंगलों से प्राप्त प्राकृतिक सामग्रियों से बनाई जाती हैं।

इन वस्तुओं का प्रायः देश के मैदानी क्षेत्रों से आए व्यक्तियों द्वारा निर्मित चावल के पिठा (राइस केक) और अन्य खाद्य वस्तुओं के बदले में आदान-प्रदान किया जाता है, जिन्हें पहाड़ी स्थानों पर उगाया नहीं जा सकता।

- पुस्तक विनिमय – ऐसे मनोरंजन क्लब की कल्पना कीजिए, जहाँ आप मित्रों के साथ अपनी पुरानी पुस्तकें बदल सकें! यह कहानियों का एक खजाना ढूँढ़ने जैसा है। आप अपनी पढ़ी हई पुस्तकों के बदले पुस्तकों के बड़े संग्रह में से नई पुस्तक चुन सकेंगे। उदाहरण के लिए, आप अपनी जंगल की रोमांचक कहानी की पुस्तक को किसी मित्र की रहस्यमयी कहानी की पुस्तक से बदल सकते हैं। यह बिना कोई मुद्रा व्यय किए नई पुस्तकें पढ़ने का एक रोचक तरीका है!
- पुराने कपड़ों के बदले नए बर्तन लेना इसका एक आम उदाहरण है। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। इस व्यवस्था में एक विक्रेता घर-घर जाता है और परिवार वालों को उनके पुराने उपयोग किए गए कपड़ों के बदले में नए बर्तन अथवा अन्य घरेलू सामान देता है। यह विनिमय दोनों पक्षों के लिए लाभदायक है - इस तरह परिवार से अनावश्यक वस्तुएँ चली जाती हैं और उसके बदले में विक्रेता को ऐसी वस्तुएँ मिल जाती हैं जिन्हें वह फिर से बेच सकता है, पुनः प्रयुक्त कर सकता है या फिर उसका पुनर्चक्रण कर सकता है।


आइए पता लगाएँ
मुद्रा के मूलभूत कार्य
कहा जाता है कि 'आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है'। जैसे-जैसे विनिमय की जाने वाली वस्तुओं के प्रकार और संख्या बढ़ने लगी और वस्तु विनिमय सुदूर क्षेत्रों तक होने लगा, यह स्पष्ट हो गया कि अब एक अलग प्रणाली की आवश्यकता है। एक सामान्य विनिमय माध्यम ही व्यापार को आसान बनाएगा और इसी कारण मुद्रा अस्तित्व में आई। जैसे-जैसे अधिक से अधिक व्यक्ति इसे वस्तुओं एवं सेवाओं के लेन-देन में प्रयोग करने लगे, यह भुगतान की एक स्वीकृत विधि बन गई।
जैसा कि हमने किसान की कहानी में देखा कि वह गेहूँ का संग्रहण अधिक समय तक नहीं कर सका, क्योंकि या तो गेहूँ सड़ जाते हैं या उसे चूहे खा जाते हैं। अगर किसान गेहूँ की जगह मुद्रा के माध्यम से विनिमय करता, तो वह मुद्रा को अधिक लंबे समय तक रख पाता और आगे भी उससे क्रय कर पाता। इस प्रकार मुद्रा मूल्य के संग्रहण (स्टोर ऑफ वैल्यू) का कार्य करता है, जिसे बाद में प्रयोग किया जा सकता है। है न ये कितना रोचक !

मुद्रा एक सामान्य अंकित मूल्य के रूप में भी कार्य करती है, जिसके द्वारा वस्तुओं और सेवाओं के मूल्य को मापा जाता है और उनके मूल्य की तुलना करना संभव होता है।
उदाहरण के लिए, आपके माता-पिता दुकानदार से विभिन्न प्रकार के उत्पादों को खरीदने के लिए मुद्रा का प्रयोग करते हैं। यह मुद्रा दुकानदार द्वारा उसके श्रमिकों को वेतन देने के लिए प्रयोग में लाई जाती है। श्रमिक इसी के माध्यम से अपनी प्रतिदिन की आवश्यक वस्तुएँ एवं अन्य वस्तुएँ खरीदते हैं और अपने बच्चों के विद्यालय की फीस भरते हैं।

आइए विचार करें
मान लीजिए कि आपको एक पुस्तक खरीदनी है। आपकी जेब में ₹50 हैं। आप अपने पड़ोस की पुस्तक की दुकान पर जाते हैं और वहाँ दुकानदार आपको पुस्तक की कीमत ₹100 बताता है। आपके पास आज पुस्तक खरीदने के क्या विकल्प हैं? क्या आप दुकानदार को शेष भुगतान बाद में करने की अनुमति देने का अनुरोध करेंगे?
अतः मुद्रा को भविष्य में भुगतान करने के एक माध्यम के रूप में स्वीकार किया गया है, जिससे यह स्थगित भुगतान का एक मानक बन गया है।
मुद्रा की यात्रा
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सिक्का-प्रणाली
जैसा कि आप समय-रेखा में देख सकते हैं, सिक्के मुद्रा के सबसे प्राचीन रूपों में एक है। उस समय में शासक सिक्के जारी करते थे, जो नागरिकों के द्वारा अपने-अपने राज्य में लेन-देन में प्रयोग में लाए जाते थे। इस प्रकार विभिन्न साम्राज्यों की अपनी सिक्का-प्रणाली होती होगी। सिक्के ढालना एवं सिक्के जारी करना पूर्णतया शासकों के द्वारा नियंत्रित था। समय के साथ शक्तिशाली शासकों के सिक्के उनके अपने राज्य के अलावा अन्य राज्यों में भी स्वीकृत होने लगे। इससे विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में व्यापार सुगम हुआ।
सिक्के महँगी धातुओं जैसे- सोना, चाँदी और ताँबा अथवा उनकी मिश्रधातु से बनाए जाते थे। उन्हें कार्षापण या पण कहा जाता था। उन पर चिह्न अंकित होता था, जिसे 'रुपा' कहा जाता था।
क्या यह शब्द वर्तमान भारत में मुद्रा के लिए प्रयोग किए जाने वाले शब्द से मिलता-जुलता है?

इसे अनदेखा न करें
- क्या यह रोचक नहीं है कि 'पण' शब्द के लिए आज भी तमिल, तेलुगु और मलयालम भाषा में 'पणं' और कन्नड़ में 'हण' का प्रयोग किया जाता है।
- चाँदी और ताँबे की मिश्रधातु से सिक्के ढाले जाते थे। वर्तमान में हम जिन सिक्कों का प्रयोग करते हैं, वे भी अधिकतर लोहे की मिश्रधातु से बने होते हैं। इनमें अन्य पदार्थ जैसे – क्रोमियम, सिलिकॉन और कार्बन का सटीक अनुपात होता है। आपको मिश्रधातु के बारे में अधिक जानकारी विज्ञान विषय के अध्यायों में मिलेगी।
प्राचीन समय में सिक्के के दो पहलुओं- सिक्के के 'शीर्ष' (ऑबवर्स या मुख्यचित्र) और 'पृष्ठ' (रिवर्स या पट्ट), पर विभिन्न प्रकार के चिह्न और आकृतियाँ उकेरी जाती थीं। इनमें प्राकृतिक आकृतियाँ, जैसे- जानवर, वृक्ष, पहाड़ और उस समय के राजा-रानी और देवी-देवताओं की छवियाँ सम्मिलित होती थीं।
उदाहरण के लिए, चालुक्य राजवंश के सिक्कों में एक तरफ वराह की प्रतिमा (विष्णु अवतार) और दूसरी तरफ सजाया गया त्रिस्तरीय छत्र अंकित होता था।

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इसे अनदेखा न करें
1 आना, रुपये के 1/16 वें भाग के बराबर होता था। 1947 में 1 आने से एक दर्जन केले खरीदे जा सकते थे।

वर्तमान में हम देखते हैं कि विभिन्न अंकित मूल्यों के लिए अलग-अलग आकार के सिक्के हैं और प्रत्येक सिक्के पर हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं का प्रयोग किया गया है। देश के महत्वपूर्ण आयोजनों के उपलक्ष्य में विशेष स्मृति-चिह्न के रूप में सिक्के भी ढाले जाते हैं।
इसे अनदेखा न करें
भारत सरकार ने वर्ष 2010 में 'र' चिह्न को स्वीकृति दी। यह भारतीय प्रौद्यौगिकी संस्थान, बॉम्बे (मुंबई) के उदय कुमार द्वारा डिजाइन किया गया था। यह चिह्न देवनागरी लिपि के 'र' और रोमन अक्षर 'R' का मिश्रण है, जिसमें ऊपर की ओर दो समानांतर क्षैतिज रेखाएं राष्ट्रीय ध्वज का प्रतिनिधित्व करती हैं और 'बराबर' चिह्न का भी प्रतिनिधित्व करती हैं।

आइए पता लगाएँ
आप अपने आप को पाँच-पाँच विद्यार्थियों के समूहों में संगठित करें। एक सामूहिक परियोजना आरंभ करें जिसमें परिवार के सदस्यों, पड़ोसियों, दुकानदारों आदि से पुराने सिक्के एकत्रित करें। उनकी विभिन्न विशेषताओं को लिखें- वे किस धातु से बने हैं, सिक्कों पर अंकित वर्ष क्या है, सिक्कों के शीर्ष और पृष्ठ भाग पर आप क्या देखते हैं। अपने अवलोकनों से आप क्या अनुमान लगा सकते हैं? आपको कैसे पता चलेगा कि आपके अनुमान सही हैं?
जैसा कि ऊपर चर्चा की गई है, वस्तु विनिमय प्रणाली में गैर-धातु मुद्रा का प्रयोग होता था। सिक्का प्रणाली में धातु मुद्रा के प्रयोग ने कालांतर में मुद्रा के अन्य रूपों के विकास का मार्ग प्रशस्त किया !
कागजी मद्रा
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आपके विचार में क्या हुआ होगा जब सिक्कों का प्रयोग हर प्रकार के लेन-देन के लिए शुरू हुआ होगा, चाहे वह सब्जियाँ हों या जमीन खरीदना हो? ऐसी क्या समस्याएँ उत्पन्न हुई होंगी?
आप कल्पना कर सकते हैं कि बड़ी मात्रा में सिक्के ले जाना कठिन होता होगा। सिक्कों को संगृहित करना भी एक समस्या बन गई होगी। कागजी मुद्रा के प्रयोग में आने से अन्य उपयुक्त विकल्पों की खोज समाप्त हो गई। कागजी मुद्रा या करेंसी पहली बार चीन में प्रयोग की गई और भारत में इसे 18वीं शताब्दी के अंत में प्रयोग में लाया गया।

सिक्कों का प्रयोग सामान्यतः छोटे मूल्यों के लिए, जबकि कागजी मुद्रा का प्रयोग बड़े मूल्यों के लेन-देन हेतु किया जाता है।
आजकल जो मुद्रा आप अधिकतर देखते हैं, इस प्रकार की दिखती है -

आइए पता लगाएँ
₹50 और ₹100 के नोटों को देखिए। क्या आप नोटों के पृष्ठ भाग पर दर्शाई गई भारत की सांस्कृतिक विरासत से संबंधित आकृतियों को पहचान पा रहे हैं? इनके बारे में और अधिक जानकारी प्राप्त कीजिए।
- नोटों की सतह को छूकर महसूस कीजिए। क्या दृष्टिबाधित लोगों के लिए नोटों पर अंकित मूल्य को पहचानने हेतु कोई विशेष लक्षण हैं?

इस अध्याय में हमने पहले पढ़ा कि प्राचीन काल में सिक्के शासकों द्वारा जारी किए जाते थे। वर्तमान में भारत में हमारे पास एक केंद्रीय प्राधिकरण है, जिसे भारतीय रिजर्व बैंक कहा जाता है यह मुद्रा जारी करने को नियंत्रित करता है। भारतीय रिजर्व बैंक के अलावा किसी अन्य के लिए मुद्रा जारी करना वैधानिक नहीं है।
मुद्रा के नए रूप
समय के साथ-साथ तकनीकी प्रगति के कारण वर्तमान में मुद्रा के अन्य रूपों का प्रयोग होने लगा है। आइए, इनमें से कुछ को समझते हैं -
कृष्णप्पा एक ठेले पर मौसमी फल बेचते हैं। अपने ठेले पर रंग-बिरंगे फलों को साफ-सुथरे ढंग से सजाने के साथ-साथ वह एक छोटा-सा कार्ड रखते हैं, जिसमें क्यू.आर. कोड होता है। उनके ग्राहक अपने मोबाइल फोन से क्यू.आर. कोड को स्कैन करते हैं और क्रय के लिए डिजिटल भुगतान करते हैं। फिर यह भुगतान सीधे कृष्णप्पा के बैंक खाते में चला जाता है।
कृष्णप्पा के बैंक खाते में चला जाता है। मुद्रा के मूर्त रूपों, जैसे – सिक्कों और कागजी नोटों के अलावा, मुद्रा ने ऐसे अमूर्त रूप ले लिए हैं, जिन्हें हम न छू सकते हैं और न ही महसूस कर सकते हैं। इसे डिजिटल मुद्रा कहा जाता है, जो इलेक्ट्रॉनिक रूप में होती है। क्या आपने अपने आस-पास के अन्य व्यक्तियों को सिक्कों और नोटों का प्रयोग किए बिना भुगतान करते या भुगतान प्राप्त करते हुए देखा है? भुगतान के विभिन्न तरीकों जैसे- डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड,

मुद्रा के मूर्त रूपों, जैसे – सिक्कों और कागजी नोटों के अलावा, मुद्रा ने ऐसे अमूर्त रूप ले लिए हैं, जिन्हें हम न छू सकते हैं और न ही महसूस कर सकते हैं। इसे डिजिटल मुद्रा कहा जाता है, जो इलेक्ट्रॉनिक रूप में होती है। क्या आपने अपने आस-पास के अन्य व्यक्तियों को सिक्कों और नोटों का प्रयोग किए बिना भुगतान करते या भुगतान प्राप्त करते हुए देखा है? भुगतान के विभिन्न तरीकों जैसे- डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड,नेट बैंकिंग, यू.पी.आई. (यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस) का भी लेन-देन के लिए प्रयोग किया जाता है। यह प्रणाली मुद्रा को सीधे एक व्यक्ति के बैंक खाते से दूसरे के खाते में स्थानांतरित करती है। आप मौद्रिक लेन-देन के इन आधुनिक तरीकों के बारे में आगे और भी जानेंगे।
आगे बढ़ने से पहले...
- मुद्रा के अस्तित्व में आने से पहले वस्तु विनिमय प्रणाली प्रचलित थी। विनिमय को सुविधाजनक बनाने के लिए विभिन्न प्रकार की वस्तुओं का प्रयोग किया जाता था।
- वस्तु विनिमय प्रणाली की सीमाओं ने विनिमय के माध्यम के रूप में मुद्रा के विकास को प्रेरित किया।
- समय के साथ-साथ मुद्रा के अन्य रूप विकसित हुए, जैसे- कवच, सिक्के और कागजी मुद्रा। यह विकास निरंतर चल रहा है क्योंकि हम भुगतान करने और प्राप्त करने के नए और आसान तरीके सृजित कर रहे हैं, जिसमें चित्र में दिखाया गया क्यू.आर. कोड भी सम्मिलित है।
प्रश्न और क्रियाकलाप
- वस्तु विनिमय प्रणाली कैसे कार्य करती थी और इस प्रणाली में किस प्रकार की वस्तुओं का प्रयोग विनिमय हेतु किया जाता था?
- वस्तु विनिमय प्रणाली की क्या सीमाएँ थीं?
- प्राचीन भारतीय सिक्कों की मुख्य विशेषताएँ क्या थीं?
- समय के साथ मुद्रा विनिमय के माध्यम के रूप में कैसे परिवर्तित हुई?
- प्राचीन काल में कौन-से कदम उठाए गए होंगे जिससे भारतीय सिक्के विभिन्न देशों में विनिमय का माध्यम बन सकें?
- अर्थशास्त्र की निम्नलिखित पंक्तियाँ पढ़ें - '60 पणों का एक वर्ष का वेतन प्रतिदिन एक अधक अनाज से प्रतिस्थापित हो सकता था, जो चार बार के भोजन के लिए पर्याप्त था...' (एक अधक लगभग 3 किलोग्राम के बराबर होता है)। यह एक पण के मूल्य के विषय में क्या बताता है? पड़ोसी की सहायता न करने की दंड 100 पण था। इसकी तुलना वार्षिक वेतन से करें। इससे आप मानवीय मूल्यों के बारे में क्या निष्कर्ष निकाल सकते हैं, जो इसके माध्यम से प्रोत्साहित किए जा रहे थे?
- एक नाटक लिखिए और उसका मंचन कीजिए जिसमें यह दिखाया जाए कि लोग एक-दूसरे को कौड़ी, कवच (और ऐसी अन्य वस्तुओं) को विनिमय के माध्यम के रूप में प्रयोग करने के लिए कैसे तैयार कर सके होंगे?
- भारत में भारतीय रिजर्व बैंक (आर.बी.आई.) ही कागजी मुद्रा को छापने व वितरण करने का एकमात्र वैधानिक स्रोत है। नोटों की अवैध छपाई और उनके दुरुपयोग को रोकने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने कई सुरक्षा कदम उठाए हैं। पता लगाइए कि ऐसे कुछ उपाय कौन-से हैं और अपनी कक्षा में उनकी चर्चा कीजिए।
- अपने परिवार के कुछ सदस्यों और स्थानीय दुकानदारों का साक्षात्कार लीजिए और उनसे पूछिए कि वे भुगतान करने या प्राप्त करने में नकद या यू.पी.आई. में किसको वरीयता देंगे और क्यों?