रंगमंच
तो यह अभिनेता के शरीर एवं मन में समान परिवर्तन उत्पन्न करता है।
तमिल महाकाव्य शिल्पपादिकारम् — इलंगो अडिगल द्वारा
(संगम साहित्य)
आदरणीय रंगमंच शिक्षक,
हम बच्चों में रंगमंच के भाव को विकसित करने के लिए साथ मिलकर काम कर रहे हैं- एक ओर जहाँ रचनात्मकता, उत्साह एवं आनंद के साथ तो वहीं दूसरी तरफ परिश्रम, दृढ़ता और अनुशासन के साथ। यह टिप्पणी इस पाठ्यपुस्तक के दृष्टिकोण को आपके साथ साझा करने के उद्देश्य से लिखी गई है।
कक्षा 7 के लिए रंगमंच अनुभाग को इस प्रकार लिखा गया है कि यह कक्षा 6 के बच्चों को उनकी समझ के अगले स्तर पर ले जाए। इसमें कई ऐसी गतिविधियों को सम्मिलित किया गया है, जो प्रस्तुत की गई अवधारणाओं के सैद्धांतिक ज्ञान के साथ संयोजित हैं। एक ओर उन्हें पाठ्यपुस्तक में मौलिक ज्ञान और ऐतिहासिक समझ प्राप्त होती है, वहीं इसमें दी गई गतिविधियाँ इस समझ को पुष्ट करती हैं एवं उनके आत्मविश्वास तथा कौशल को बढ़ाती हैं। रंगमंच की कक्षाएँ प्रभावी और आनंददायक बनें यह सुनिश्चित करने के लिए यहाँ कुछ आवश्यकताएँ दी गई हैं-खुला स्थान
बच्चे अपनी गतिविधियों के लिए स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकें, इसलिए ऐसे खुले स्थान का होना आवश्यक है, जहाँ बच्चे बिना किसी बाधा के संभावनाओं का अन्वेषण कर सकें एवं विभिन्न गतिविधियों का अभ्यास कर सकें। ऐसा खुला स्थान होना मूलभूत आवश्यकता है। इस संदर्भ में और अधिक स्पष्टता के लिए समय आवंटन एवं मूल्यांकन संबंधी अनुभाग को पढ़ें। रंगमंच के लिए मूल्यांकन विभिन्न स्तरों पर नियोजित किया गया है। जैसा कि नीचे उल्लेख किया गया है।वास्तविक दुनिया के कौशल से जोड़ें
पुस्तक की सामग्री का उद्देश्य सीखने को उनके दैनिक जीवन के लिए प्रासंगिक बनाना है। रंगमंच भावों के माध्यम से समानुभूति तथा स्वीकृति का निर्माण करने से लेकर, मंच के पीछे की गतिविधियों के माध्यम से अनुशासन, योजना और प्रबंधन कौशल को बढ़ाने तक, प्रत्येक के जीवन में एक भूमिका निभा सकता है। एक शिक्षक के रूप में, यदि कक्षा की चर्चाओं में ऐसे संदर्भ लाए जाते हैं तो पाठ बहुत अधिक फलदायी होंगे।आकलन
विद्यालय में रंगमंच एक मुख्य विषय के रूप में पढ़ने की पूरी प्रक्रिया में यह एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यद्यपि प्रत्येक विषय की तरह यहाँ भी अंक या दक्षता स्तर का होना महत्वपूर्ण है, लेकिन रंगमंच के भाव को बनाए रखना और इसे केवल एक प्रश्न पत्र वाली कागज-कलम जैसी परीक्षा तक सीमित करने से बचाना भी आवश्यक है। अंतिम परिणाम या प्रस्तुति ही एकमात्र मापदंड नहीं है। रंगमंच विषय में विद्यार्थियों के प्रयासों, विचारों एवं प्रक्रियाओं के साथ-साथ -- ज्ञान का अनुप्रयोग
- प्रयास और भागीदारी
- रचनात्मकता एवं प्रस्तुति
- समूह कार्य तथा सहभागिता
रचनात्मक आकलन
यह कक्षा में अध्यायों और गतिविधियों को पूरा करने के बाद किया जाता है। इसे दो चरणों में किया जाता है-- आइए, घेरा बनाएँ- यह प्रक्रिया प्रत्येक कक्षा और प्रत्येक गतिविधि के बाद अपनाई जाती है। शिक्षक विद्यार्थियों के साथ एक अनौपचारिक वातावरण में बैठते हैं (जिससे बच्चों से खुली और सच्ची प्रतिक्रियाएँ मिल सकें) और उनसे पूछते हैं कि उन्होंने क्या किया? विद्यार्थी अपने विचार एवं अनुभव साझा करते हैं, जिनके आधार पर शिक्षक प्रत्येक बच्चे के बारे में सूचनाएँ लिखते हैं। कुछ प्रश्न पाठ्यपुस्तक में दिए गए हैं। शिक्षक कक्षा की प्रतिक्रिया के आधार पर और अधिक प्रश्नों का अन्वेषण कर सकते हैं।
- मस्तिष्क को सक्रिय करने वाले अभ्यास (ब्रेन बूस्टर) - बच्चों के लिए व्यावहारिक गतिविधियाँ प्रदान की गई हैं जिससे वे अध्याय में सीखी गई बातों को प्रयोग में ला सकें। इन गतिविधियों के परिणाम का उपयोग बच्चों का मूल्यांकन करने और दिए गए रूब्रिक्स को भरने के लिए किया जा सकता है। प्रत्येक गतिविधि का परिणाम यह नहीं है कि अंतिम उत्पाद किऔर कौशल को अच्छी तरह विकसित किया गया है।
- रूब्रिक्स - प्रत्येक अध्याय के पूर्ण होने पर एक रूब्रिक दिया गया है जिसमें इच्छित सीखने के प्रतिफल सम्मिलित हैं, जिन्हें शिक्षक अंकित कर सकते हैं। बच्चों से यह भी कहा जाता है कि वे अपने प्रदर्शन की धारणा के आधार पर स्वयं को ग्रेड दें। यह आत्म-मूल्यांकन शिक्षक के लिए फीडबैक का आधार भी बन सकता है।
आइए, घेरा बनाएँ
- अधिक उदाहरण साझा करें, जैसे चित्रों या अन्य प्रसंग जहाँ आपने भावों को देखा हो।
- यदि आपको ऐसा मंदिर बनाने का कार्य दिया जाए तो आप इसकी तैयारी कैसे करेंगे?
- आप इसका अभ्यास करने में कितना समय लगाएंगे? क्या आप इसे अपने विद्यालय के कार्य में क्रियान्वित कर सकते हैं?
संकलनात्मक आकलन
यह एक गतिविधि-आधारित परीक्षा होगी जो वर्ष के अंत में आयोजित की जाएगी। इन गतिविधियों को वर्षभर सीखे गए पाठों के संयोजन के रूप में तैयार किया जाना चाहिए। मूल्यांकन व्यक्तिगत और समूह के स्तर पर किया जाएगा जिससे विभिन्न कौशलों एवं क्षमताओं का मूल्यांकन किया जा सके। खंड के अंत में गतिविधियों के विभिन्न उदाहरण दिए गए हैं।1
भावों को समझना
भाव हमारे जीवन में सदा से एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं। प्राचीन काल से ही हमने यह समझने का प्रयास किया है कि भाव क्या हैं, क्यों हैं और हमारे जीवन में इसका क्या स्थान है। जैसा कि भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में कहा गया है-
य एवमेतान् जानाति स गच्छेत्मा सिद्धिमुत्तामाम् ।। 125 ।।
- नाट्यशास्त्र, भरतमुनि (अध्याय 7)
नाटक के प्रदर्शन में रस, भाव, मनोविकार, विचार एवं मानसिक स्थिति का सृजन आवश्यक है। नाटक पूर्ण सफलता तब ही प्राप्त कर सकता है जब प्रयोगकर्ता इन सबका गहन ज्ञान रखता हो।
- भावों की तीव्रता के विभिन्न स्तर।
- लोकधर्मी और नाट्यधर्मी - यथार्थवादी और शैलीबद्ध।
- प्राचीन वास्तुकला में प्रस्तुतीकरण।
इसका अर्थ है कि भाव केवल दर्शकों से ही नहीं, अपितु आम जीवन में भी लोगों से जुड़ने का सबसे महत्वपूर्ण साधन हैं। इसलिए, जीवन में सही संबंध स्थापित करने एवं जीवन को सकारात्मक रूप में जीने के लिए यह समझना बहुत आवश्यक है कि भाव कैसे काम करते हैं? आइए, अब तक जो हमने सीखा है, उसका एक संक्षिप्त पुनरावलोकन करें।
गत वर्ष, हमने निम्नलिखित अवधारणाओं पर चर्चा की थी -
- भाव - व्यक्ति का आंतरिक दृष्टिकोण एवं मानसिक स्थिति।
- रस - वह अनुभूति जो किसी स्थिति में भाव के परिणामस्वरूप उत्पन्न होती है।
- एक ही स्थिति में दो या अधिक भावों का अनुभव।
- एक ही स्थिति में आपके भाव आपके मित्रों से भिन्न हो सकते हैं।
- नवरस - भावों पर भारतीय दृष्टिकोण।
- त्रासदी-हास्य - भावों पर ग्रीक दृष्टिकोण।
- हॉट सीट का खेल - कहानी कहने और भावनात्मक अभिव्यक्ति का संयोजन।
- मुखौटों का निर्माण - मुखौटों के माध्यम से भाव व्यक्त करना।
हमने जिन अवधारणाओं पर पहले चर्चा की है, उनके आधार पर अब हम भावों को गहराई से समझने तथा व्यक्त करने की ओर बढ़ेंगे। जैसा कि हमने पहले सीखा, भरत मुनि ने शोध और विश्लेषण के माध्यम से निष्कर्ष निकाला कि आठ प्रमुख भावनात्मक अनुभव होते हैं और इसमें बाद में नौवाँ जोड़ा गया, जिसे 'नवरस' कहा जाता है। अपनी थोड़ी-सी खोज एवं समझ के साथ, हम इस ज्ञान में और वृद्धि कर सकते हैं। क्या यह रोमांचक नहीं लगता?
आरंभ करने के लिए, चलिए एक रस चयन करते हैं-
_________अब, उस रस के विभिन्न स्तरों को सूचीबद्ध करें (या उनका चित्र बनाएँ)।
1._________2._________
3._________
यहाँ प्रस्तुति हेतु एक उदाहरण दिया जा रहा है
यहाँ हम प्रत्येक भाव को विभिन्न स्तरों पर विभिन्न तीव्रता के साथ देख रहे हैं। इसे और अच्छे से समझने के लिए, चलिए एक खेल खेलते हैं, जो आपको प्रत्येक भाव के बारे में सोचने में सहायता करेगा और आपके साथ-साथ आपके मित्रों के लिए भी आनंददायी होगा।
'तीव्रता' किसी गुण अथवा स्थिति की मापनीय गुणवत्ता या स्तर को दर्शाती है।
कक्ष के प्रत्येक कोने को अलग रसों के साथ जोड़ा गया है और जो भी विद्यार्थी उस कोने में खड़ा होगा, उसे उस रस को अपने शब्दों, चेहरे के भाव तथा शारीरिक भाषा के माध्यम से अभिव्यक्त करना होगा। भिन्न-भिन्न स्थानों पर रसों की पहचान के लिए पोस्टर आदि लगाए गए हैं। यह गतिविधि सभी बच्चों के कक्ष के केंद्र में खड़े होकर आरंभ होती है। आरंभ में सभी बच्चे कमरे के केंद्र में खड़े होंगे। अच्छे से समझने के लिए एक ट्रायल राउंड खेलें।
अभ्यास चक्र (ट्रायल राउंड)
पोस्टर आदि कक्ष में निम्नलिखित तरीके से लगाए जाते हैं। बच्चे केंद्र में खड़े होंगे एवं आरंभ करने के लिए तैयार रहेंगे।
निर्देश
आप में से प्रत्येक बारी-बारी से अपनी पसंद के किसी एक रस के पास जाएँ, उस रस को अभिव्यक्त करने वाली एक या दो पंक्तियाँ कहें और उसे अभिनय के माध्यम से भी प्रदर्शित करें।उदाहरण
एक बच्चा वीर रस चुनता है। वह उस स्थान पर खड़ा होता है और अपने स्वर, चेहरे के भाव और विभिन्न शारीरिक क्रियाओं से इसे दर्शाता है। अगला बच्चा कोई अन्य रस चुनता है, उसके स्थान पर खड़ा होता है और अपने स्वर, चेहरे के भाव और क्रिया से उसे दर्शाता है। इसी प्रकार यह अभ्यास आगे बढ़ता है।
अब हम वास्तविक भाग पर आते हैं!
चूँकि हम सभी विभिन्न रसों से परिचित हैं तो चलिए अब प्रत्येक रस के विशिष्ट स्तरों पर काम करना आरंभ करते हैं। पृष्ठ 6 पर दिए गए उदाहरण की तरह, जहाँ क्रोध को तीन स्तरों में दिखाया गया है, एक अन्य रस चुनें और कक्षा में इसके विभिन्न स्तरों पर चर्चा करें। इसके अनुसार पोस्टर (प्लैकार्ड) आदि बनाएँ। यदि आप एक चौथा स्तर पहचान सकते हैं तो उसे भी जोड़ सकते हैं। यहाँ एक और उदाहरण दिया गया है-रस हास्य
स्तर
- त्वरित संतोष (आपको अपनी पसंदीदा आइसक्रीम खाने को मिलती है)।
- व्यक्तिगत उपलब्धि (आपने एक कठिन प्रतियोगिता में पुरस्कार जीता)।
- सहायता और जुड़ाव (आपने अपने बीमार मित्र को नोट्स देकर उसकी सहायता की)।
- भलाई (आपने पास के अनाथालय में किताबें और कपड़े दान किए)।
विकसित स्तर
अब जब आप सभी रसों के नाम और उनकी विभिन्न तीव्रताओं को समझ चुके हैं। आइए, इसे कहानी के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करें। अब कोनों पर केवल स्तरों के नाम होंगे। ये स्तर किसी भी रस के हो सकते हैं, जो कहानी की स्थिति पर निर्भर करेगा।उदाहरण - एक बार की बात है, भारत के एक विशाल प्रदेश पर एक रानी का शासन था। उसने कई युद्ध लड़े और अपने लोगों की वीरता से रक्षा की (वीर रस, स्तर 3 को पुकारा जाता है, बाकी बच्चे स्तर 3 पर जाते हैं और उसे व्यक्त करते हैं)। एक दिन, दो बच्चे उनके पास आए और कहा कि वे उसे आसानी से हरा सकते हैं (अद्भुत रस, स्तर 2 को पुकारा जाता है, बच्चे स्तर 2 पर जाते हैं और उसे व्यक्त करते हैं)। वह हँसती है और चुनौती स्वीकार करती है (हास्य रस, स्तर 1) और इस तरह कहानी आगे बढ़ती है।
प्रत्येक बारी-बारी से कहानियाँ सुना सकता है। उन्हें या तो तैयारी के लिए समय दिया जा सकता है या उन्हें तुरंत कहानी सुनाने के लिए कहा जा सकता है। वे पंचतंत्र या पुराणों की प्रसिद्ध कहानियाँ भी सुना सकते हैं।आइए, घेरा बनाएँ
- . आपने भरत मुनि द्वारा निष्पादित रसों की सूची में और कितने नए रस जोड़े?
- क्या आपको लगता है कि किसी रस की तीव्रता के तीन या चार से अधिक स्तर हो सकते हैं?
- ऐसे कौन-से रस हैं जिनके अधिक स्तर हो सकते हैं?
- जब आप किसी रस और उसकी तीव्रता को व्यक्त करते हैं तो क्या आप वास्तव में उसे अनुभव करते हैं? या यह केवल बाहरी प्रदर्शन होता है?

अभिव्यक्ति की शैलियों का अन्वेषण
जब आपने 'भाव भरे कोने' का खेल खेला तो क्या आपने देखा कि आप में से प्रत्येक ने भाव को व्यक्त करने का एक अलग तरीका अपनाया था? स्थिति और भाव समान था, फिर भी ऐसा क्यों है कि कुछ लोग डर के समय अपनी आँखें बंद कर लेते हैं, जबकि कुछ अन्य लोग आँखें चौड़ी कर लेते हैं?
ऐसे कुछ अन्य उदाहरण सूचीबद्ध करें, जहाँ आपको लगता है कि एक ही भाव को भिन्न-भिन्न प्रकार से व्यक्त किया गया था। तालिका में इसे लिखें। यदि आपको भावों या शैलियों के बारे में और अधिक लिखने की आवश्यकता हो तो और पंक्तियाँ जोड़ सकते हैं, लेकिन इस अभ्यास को करने से पहले, यह महत्वपूर्ण है कि आप दूसरों को ध्यानपूर्वक देखें। ये अभिव्यक्ति की शैलियाँ क्या हैं? क्या अभिनय और प्रस्तुति को आप शैलियों के अंतर्गत क्रियाओं (शारीरिक भाषा) और ध्वनियों को भी सम्मिलित कर सकते हैं।
ये अभिव्यक्ति की शैलियाँ क्या हैं? क्या अभिनय और प्रस्तुति को भी विभिन्न शैलियों में वर्गीकृत किया गया है? यह किस आधार पर होता है? अपने सभी प्रश्नों के उत्तर जानने के लिए आगे पढ़ें।अभिनय की शैलियाँ
अभिनय को शताब्दियों से संसार भर के विशेषज्ञों एवं कलाकारों ने अन्वेषित और विकसित किया है। प्रदर्शन की शैली सामान्यतः उनकी स्थानीय संस्कृति पर निर्भर करती है। लेकिन कुछ शैलियाँ ऐसी भी हैं जिन्हें इससे आगे बढ़कर सार्वभौमिक रूप से स्वीकार किया गया है और ये आज भी प्रचलित हैं। कुछ प्राचीन संस्कृतियाँ, जिन्होंने अपनी विशिष्ट शैलियाँ निर्मित की, दायी ओर उल्लिखित हैं।दिए गए चित्रों में, क्या आप प्रस्तुति की शैलियों में विविधता देख रहे हैं? प्रत्येक एक-दूसरे से पूरी तरह भिन्न दिखाई देता है। आप परिधान, उपकरण, संगीत, संवाद और यहाँ तक कि कहानियों के प्रकार में भी विविधता देखते हैं। इतनी विविधता होते हुए भी, हम ऐसी शैलियाँ कैसे ढूँढ़ें जो हर जगह, चाहे कहीं भी प्रदर्शन हो, समान रूप से लागू हो सकें? यह उन शैलियों को विकसित करके संभव होता है जो अधिक स्वाभाविक और वास्तविक जीवन के निकट होती हैं। ब्रेख्त शैली एवं पद्धतिबद्ध अभिनय इसके कुछ उदाहरण हैं।
अब इन चित्रों को देखिए और संबंधित देश या संस्कृति की पहचान करने का प्रयास कीजिए। यह कठिन है, है ना? यह संसार के किसी भी हिस्से का हो सकता है, लेकिन अधिकतर वर्तमान समय के संदर्भ में है। इसलिए, ये शैलियाँ पूर्व की संस्कृति-आधारित शैलियों की तुलना में बहुत भिन्न हैं। ये शैलियाँ अभिनय और निर्देशन की उन तकनीकों पर आधारित हैं जिन्हें किसी भी आलेख या कहानी पर लागू किया जा सकता है। आप इन शैलियों के बारे में विस्तार से आने वाली कक्षाओं में सीखेंगे।
जैसा कि हमने देखा, अभिनय की दो प्रमुख शैलियाँ हैं-
- विस्तृत वेशभूषा, रूप-सज्जा और संगीत के साथ नाटकीय अभिनय, अतिरंजित हाव-भाव और ऊँची आवाजें।
- साधारण वेशभूषा और रूप-सज्जा, जो दैनिक जीवन के निकट हो, न्यूनतम संगीत एवं अभिनेता सामान्य लोगों की तरह व्यवहार करते हैं।
क्या इन शैलियों के लिए हमारे पास नाम हैं? इन्हें नाम किसने दिए?
जैसा कि हमने कक्षा 6 में पढ़ा, 2500 से अधिक वर्ष पहले, भारत के एक महान ऋषि भरतमुनि ने प्रदर्शन कलाओं का अध्ययन, शोध एवं विश्लेषण किया और इन सभी तत्वों को परिभाषित किया। यद्यपि इसे 2500 साल पहले लिखा गया था, फिर भी आज हम इसका उपयोग करते हैं,भरतमुनि के नाट्यशास्त्र में विवरण और विशेषज्ञता का स्तर आश्चर्यजनक है।
भरतमुनि द्वारा परिभाषित दो शैलियाँ हैं- नाट्यधर्मी और लोकधर्मी।
नाट्यधर्मी- बड़े, अतिरंजित हाव-भाव, बहुत अधिक अभिव्यक्तियाँ, ऊँची आवाज, विस्तृत और चमकीली वेशभूषा तथा रूप सज्जा, ढेर सारे आभूषण और सजावट।
लोकधर्मी- वास्तविक जीवन जैसा प्रदर्शन। क्रियाएँ, भाव-भंगिमाएँ, वेशभूषा सभी कुछ स्वाभाविक होता है और वास्तविकता से मेल खाती हैं। ऐसा लगता है जैसे मंच पर परिस्थिति स्वाभाविक रूप से घट रही है और अभिनय नहीं किया जा रहा है।
यहाँ नाट्यशास्त्र से उद्धृत मूल श्लोक प्रस्तुत है, जहाँ लोकधर्मी और नाट्यधर्मी अभिनय के बारे में चर्चा की गई है।
भारती सात्त्वती चैव कैशिक्यारभटी तथा ॥ 24 ॥
- नाट्यशास्त्र, भरत मुनि (अध्याय 6)
आधार रूप
एक मेज पर मुड़ी हुए पर्ची रखें। प्रत्येक बच्चा एक पर्ची उठाकर उस पर लिखी क्रिया को पढ़ता है। बच्चे को यह चुनने का अधिकार है कि वह यह कार्य यथार्थवादी शैली में करना चाहता है या शैलीबद्ध तरीके से। सभी बच्चों को यथार्थवादी और शैलीगत अभिनय या दोनों को अभ्यास करने का अवसर मिलता है। प्रगति इस तय क्रियाकलाप के साथ-साथ पर्ची का एक और बंडल रखा गया है। यहाँ 'यथार्थवादी' या 'शैलीबद्ध' अथवा 'दोनों' के निर्देश पर्ची पर लिखे हुए हैं। बच्चे दोनों बंडलों में से एक-एक पर्ची उठाते हैं तथा उस पर जो लिखा होता है उसका पालन करते हैं। बच्चे प्रत्येक बार इस अभ्यास प्रक्रिया को अलग-अलग समन्वय के साथ अनेक बार करते हैं।आइए, घेरा बनाएँ
- आपने दोनों अभिनय शैलियों में क्या प्रमुख अंतर अनुभव किया?
- कौन-सी विधि अधिक प्रभावी है? क्यों?
- ऐसे उदाहरण साझा करें जहाँ आपने शैलीबद्ध अभिनय देखा है, जैसे- फिल्में, टीवी आदि।

जब हम शैलीगत कला रूपों के प्रतिनिधित्व पर चर्चा करते हैं तो सबसे पहले जो बात मस्तिष्क में आती है, वह है प्राचीन भवनों की दीवारों पर नक्काशी वाले सुंदर चित्र एवं समृद्ध मूर्तियाँ, जिनमें मंदिर भी सम्मिलित हैं। क्या आप कुछ कलात्मक नक्काशी वाले भित्ति चित्रों को याद कर सकते हैं जिन्हें आप हाल ही में देख चुके हैं?
भवन का नाम_________
स्थान___________कलाकृतियों के बारे में एक अनोखी बात बताइए, जो आपको याद रही है।
_________________
ये हमें भावों की नई खोज के अगले स्तर पर ले जाते हैं।प्राचीन वास्तुकला
शब्दकोश के अनुसार, 'प्राचीन' शब्द उन सभी चीजों को संदर्भित करता है जो बहुत पुरानी हैं और वर्तमान में उपयोग में नहीं हैं। लेकिन भारतीय संस्कृति की विशिष्टता यह है कि इस तरह के बहुत सारे निर्माण काफी प्राचीन हैं, यद्यपि उनमें से कई अभी भी उपयोग में हैं। भारतीय वास्तुकला, अपनी लुभावनी मूर्तियों की छवि के साथ, मानवीय भावनाओं की एक कालातीत संग्रह के रूप में कार्य करती है, जो पत्थरों में 'नवरसों' के सार को दर्शाती है। देश के प्रत्येक हिस्से में भिन्न-भिन्न शैलियों की अनेक मूर्तियाँ मौजूद हैं जो राजवंश और उसके इतिहास का प्रतिनिधित्व करती हैं। कहने को प्रत्येक भवन, मंदिर एवं मूर्तियों की अपनी एक अनूठी कहानी है।भावों को दर्शाती हुई मूर्तियों में अनेक ऐसी कहानियाँ हैं जिनके भीतर और भी भाव छिपे हुए हैं। उनमें से कुछ यहाँ दी गई हैं-
शेर से लड़ते हुए एक युवा लड़के 'साला' की मूर्ति है। यह बहादुरी और साहस, वीर रस का आह्वान करती है।
यह मूर्ति चेन्नाकेशव मंदिर, बेलूर, कर्नाटक की है। इस स्थान पर शासन करने वाले होयसाला राजवंश ने अपने राज्य का नाम यहीं से लिया था। 'होय-साला', जिसका अर्थ है, "शेर को मार डालो, साला!" (1006-1346 ई.)।
द्वारपालक (प्रवेश द्वार का संरक्षक)। इससे जो भाव उत्पन्न होता है, वो डर है। क्या यह डरावना-सा नहीं लगता? 'भयानक रस' में बनी यह मूर्ति नकारात्मक शक्तियों को डराने के लिए बनाई गई है।
आप ऐसी और अनेक मूर्तियाँ तमिलनाडु के तंजावुर स्थित बृहदेश्वर मंदिर में देख सकते हैं। इसका निर्माण चोल राजवंश द्वारा सन (815-1280 ई.) में कराया गया था।
क्या आप जानते हैं?
मंदिर के पत्थरों को एक साथ जोड़े रखने के लिए सीमेंट या मिट्टी जैसे किसी भी बंधनकारी पदार्थ का उपयोग नहीं किया गया था। अधिकांश आधुनिक भवनों की तरह इसके तल के नीचे कोई पारंपरिक नींव भी नहीं है। फिर भी, यह मंदिर न केवल अपनी तरह का सबसे ऊँचा मंदिर है, बल्कि यह 1000 से अधिक वर्षों से भूकंप और तूफानों का सामना करने के उपरांत भी पूर्ण सामर्थ्य एवं स्थिरता से खड़ा रहा है।
यह एक अनूठी मूर्ति है जिसमें तीन भाव एक ही साथ समाहित हैं। यह महाराष्ट्र में एलीफेंटा की गुफाओं में स्थित 'त्रिमूर्ति' है। इसमें शिव के तीन मुख क्रमशः सृजन, पोषण एवं विनाश हैं, जिनमें से प्रत्येक भिन्न-भिन्न भावों और अर्थों को दर्शाता है। इसका निर्माण राष्ट्रकूट राजवंश (755-975 ई.) के काल में हुआ था।
जीवनभर का समर्पण !
यदि आप समय अवधि पर ध्यान दें तो पाएँगे कि ये सभी मूर्तियाँ, जो कलात्मक रूप से परिपूर्ण हैं, सैकड़ों वर्षों से संरक्षित हैं, जबकि आज के भवन होते तो ये संभवतः कुछ दशकों तक भी टिक नहीं पातीं। इनमें अंतर क्या है? इन मूर्तियों को बनाने में सम्मिलित प्रत्येक कलाकार ने ये मूर्तियाँ पूरे दिल से लगन और मेहनत कर बनाई, क्योंकि उनका विश्वास था कि यह पवित्र काम भगवान को समर्पित है। यहाँ तक कि एक छोटी-सी खरोंच या कोई गड़बड़ी भी बुरी मानी जाती थी, क्योंकि भगवान के काम में कुछ भी त्रुटिपूर्ण नहीं हो सकता था। समर्पण का स्तर इतना था कि इसे कभी भी केवल एक नौकरी तक सीमित नहीं माना जाता था जिसके लिए मजूदरी दी जाती थी, जैसा की वर्तमान में होता है। यहाँ एक रोचक कहानी है जो हमें कलाकारों के समर्पण भाव के बारे में बताती है। ऐसा माना जाता है कि यह सच है। शिल्प विशेषज्ञ जकानाचारी को होयसल के राजा नृप हया ने एक भव्य मंदिर बनाने का आदेश दिया था। काम के प्रति उनका समर्पण इतना था कि उन्होंने घर-बार छोड़ दिया और स्वयं को मूर्तियाँ बनाने में समर्पित कर दिया। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने एक-एक पत्थर को भगवान से प्राप्त आशीर्वाद के बाद चुना था। वह इतने वर्षों तक घर से दूर रहे कि उन्हें अपने परिवार के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी। एक दिन, एक युवा कलाकार उनके समूह में सम्मिलित हुआ और उसने तुरंत पत्थर की मूर्तियों में से एक मूर्ति में एक बड़ी त्रुटि देखी।
जकानाचारी की यह एक अनसुनी त्रुटि थी क्योंकि वह परिपूर्णता में विश्वास रखते थे। लेकिन एक परीक्षण किया गया और मूर्ति के नाभि वाले भाग में एक गड्ढा पाया गया, जहाँ पर एक मेंढक रह रहा था। यह एक महान कलाकार के काम पर बहुत बड़ा प्रश्न चिह्न था। जैसा वचन दिया गया था, उसके अनुसार कलाकार ने अपने हाथ काट लिए, क्योंकि जो काम उसे सौंपा गया था। उसने स्वयं को भगवान के काम के लिए अयोग्य समझा बाद में पता चला कि वह छोटा लड़का जो कोई और नहीं, बल्कि उस कलाकार का बेटा दंकणचारी था। यह सुनकर जकानाचारी को गर्व हुआ और उन्हें एक समर्पित विशेषज्ञ पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद मिला। बाद में उन्होंने मंदिर का काम पूरा करने का उत्तरदायित्व संभाला। ऐसा भी कहा जाता है कि भगवान ने उन्हें अपने हाथ वापस पाने का आशीर्वाद दिया। इस प्रकार पिता-पुत्र की जोड़ी ने कर्नाटक के बेलूर में मंदिर निर्माण का कार्य संपूर्ण किया। आज भी हम इन कार्यों को देखकर विस्मय में पड़ जाते हैं। क्या आपको लगता है कि आज भी किसी भवन की सूक्ष्मताएँ और कलात्मक अभिव्यक्तियाँ इससे मेल खाती हैं, जो उस समय पालन किया जाता था। यह अद्भुत परिणाम सहस्त्रों कलाकारों के समर्पण, प्रतिबद्धता और दृढ़ता से ही संभव हुआ था।
आइए, घेरा बनाएँ
- चित्रों, मूर्तियों या अन्य माध्यमों से उदाहरणों को साझा करें जहाँ आपने भावों का अनुभव किया हो।
- अगर आपको ऐसा मंदिर बनाने का प्रस्ताव दिया जाए तो आप इसकी तैयारी कैसे करेंगे?
- आप इसके लिए कितना समय अभ्यास में लगाएँगे? क्या आप इस अभ्यास को विद्यालय में अपने कार्य में भी प्रयोग कर सकते हैं?
मुख्य बातें – जीवन के लिए सबक
जीवन और रंगमंच
क्या आपने ध्यान दिया है कि भिन्न-भिन्न व्यक्ति विभिन्न प्रकार से अपने भावों की अभिव्यक्ति करते हैं? कुछ लोग जब घबराते हैं तो मुस्कुराते हैं जबकि कुछ लोग दुखी होने पर भी चुप हो जाते हैं। रंगमंच हमें इन सभी भावों और उनकी अभिव्यक्ति के प्रकारों को समझने में सहायता करता है। साथ ही यह परिवर्तित परिस्थितियों में एक-दूसरे के संबंध में भी बेहतर भावनात्मक समझ या सहानुभूति पैदा करने में सहायता करता है।- जब आप कक्षा 6 में 'भाव भरे कोने' या 'हॉट सीट' जैसे खेल खेलते हैं तो आप यह समझना शुरू करते हैं कि अपनी भावनाओं को अनुभव करने या व्यक्त करने का कोई एक निश्चित तरीका नहीं होता। प्रत्येक व्यक्ति अपनी भावनाओं को अलग तरह से अनुभव करता है और व्यक्त करता है। जब आप खेल के दौरान दूसरों को अपनी भावनाएँ साझा करते हुए देखते हैं तो आपको अनुभव होता है कि लोग एक ही परिस्थिति को भी अलग-अलग दृष्टि से देख सकते हैं। इसे समझने और स्वीकार करने की आपकी क्षमता आपको भावनात्मक रूप से समृद्ध बनाती है। रंगमंच की ये सभी गतिविधियाँ आपको यह समझने में सहायता करती हैं कि सभी भाव एकसमान हैं। आप जो कहानियाँ चुनते हैं, उनमें हास्य और सुख के साथ-साथ ईर्ष्या या क्रोध की स्थितियाँ प्रदत्त होती हैं। यह वास्तविक जीवन में भी सच है। जैसा कि प्राचीन शास्त्रों एवं मूर्तियों में दर्शाया गया है। यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि हम सभी भावों को स्वीकार करें और बिना किसी बाधा के स्वतंत्र रूप से व्यक्त करें। रंगमंच जैसी गतिविधियाँ आपसे केवल हास्यपूर्ण स्थितियों को दिखाने तथा दुखद स्थितियों को छोड़ने की अपेक्षा नहीं करती हैं, वैसे ही अपने जीवन में भी आपको सभी भावों को एकसमान रूप से अनुभव करने, साझा करने तथा व्यक्त करने में सक्षम होना चाहिए। रंगमंच की तरह, यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी भी स्थिति को अधिक बढ़ा-चढ़ाकर न करें।
आकलन
अध्याय 1 — भावों को समझना
दक्षताएँ
- सी.-1.1 — विभिन्न नाट्य गतिविधियों के माध्यम से अपने जीवन के व्यक्तित्व और दैनिक अनुभवों को आत्मविश्वास से व्यक्त करना है।
- सी.-1.2 — सामूहिक रूप से नाटक को विकसित करने की प्रक्रिया में लचीलापन प्रदर्शित करना है।
| सी.जी. | सी. | सीखने के प्रतिफल | शिक्षक | स्वयं |
|---|---|---|---|---|
| 1 | 1.1 | भावों की भिन्न-भिन्न तीव्रता में क्रिया, अभिव्यक्ति एवं संवाद को पहचानता और व्यक्त करता है। | ||
| 1 | 1.1 | विभिन्न मुद्रियों या स्वतंत्र कलाकृतियों की पहचान या स्मरण कर सकते हैं जो क्रिया और अभिव्यक्ति में भावों को प्रदर्शित करती हैं। | ||
| 1 | 1.1, 1.2 | अपने सहयोगियों द्वारा किसी स्थिति को किस प्रकार अनुभव किया जाता है, इस अंतर को समझने और अंगीकार करने में सहानुभूति को प्रदर्शित कर इस पर चर्चा भी करता है। | ||
| 1 | 1.2 | स्वतंत्र रूप से कहानियाँ बना सकते हैं, विभिन्न भावनात्मक स्तरों को समावेशित कर प्रभावी ढंग से अपनी कक्षा में सुना सकते हैं। | ||
| 1 | 1.2 | लोकोधर्मी (यथार्थवादी) और नाट्यधर्मी (शैलीगत), अभिनय (क्रिया और अभिव्यक्ति में) में भेद कर सकते हैं। |