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भारतीय कथा वाचन
परंपरा की कहानी

एक समय की बात है, एक लड़की थी- कथांजली, जिसे कथा वाचन बहुत पसंद था।

img वह प्राचीन इतिहास से लेकर आधुनिक समय तक की सभी कहानियाँ जानती थी। वह स्वयं भी कहानियों की रचना करती थी। माना जाता है कि वह सहस्त्र वर्षों से जीवित है। उसने कई राजाओं और शासकों को देखा है, साधारण लोगों के बीच रही तथा दुनियाभर की यात्राएँ भी की। इसलिए, उसने जिन कहानियों को पढ़ा और जिया है, उसे सब स्मरण है। किंतु वह सदैव और भी रोचक कहानियों को ढूँढ़ती रहती है तथा इसके लिए जिज्ञासु भी रहती है।

आओ उसकी बात सुनते हैं

आप सीखेंगे
  • भारत में कथा वाचन के लोक रूप
  • आज के कलाकारों को आने वाली समस्याएँ
  • सुप्रसिद्ध पारंपरिक कथावाचक

imgनमस्ते ! यद्यपि मैंने दुनियाभर की यात्राएँ की हैं, किंतु मेरा सबसे पसंदीदा स्थान सदैव भारत ही रहा है। मैं चाहे कहीं भी रहूँ, मुझे पुनः यही लौटना पसंद है क्योंकि यह मेरे घर जैसा लगता है। यहाँ की कहानियाँ बहुत सुंदर हैं। यह सब प्रारंभ कैसे हुआ, क्या आप जानते हैं? कई वर्ष पूर्व, जब मैं भारत के विभिन्न स्थानों की यात्रा कर रही थी तो मुझे यह लगा कि लोगों को कहानियों के बारे में अधिक जानकारी नहीं थी। वे उस आनंद एवं उन मूल्यों से वंचित थे जो कहानियों से सीख सकते हैं। मुझे कोई रास्ता निकालना था, जिससे मैं उन्हें कहानियाँ सुना सकूँ। किंतु मैं अकेले सब कुछ नहीं कर सकती थी, इसलिए मैंने कथा वाचक को बनाया।

imgवे ऐसे लोग थे जो कथाओं को स्मरण कर सकते थे और उन्हें अत्यंत रोचकता से सुना सकते थे। यह आनंदमयी था। देशभर में बहुत से कथा वाचक थे, जो बच्चों से लेकर बूढ़ों तक सभी को कहानियाँ सुनाते थे।
यह विस्तार सहस्त्र वर्षों तक चलता रहा। लगभग दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व में मैंने देखा कि श्रोता कभी-कभी ऊब जाते थे या उनका ध्यान भटक जाता था। मैं कुछ ऐसा करना चाहती थी जिससे यह और रोचक बन सके। तब मैंने चित्र, संगीत, नृत्य और कठपुतलियों का प्रयोग करना आरंभ किया।
यह प्रक्रिया विभिन्न आयुवर्ग के व्यक्तियों के लिए कथावाचन का अनूठा प्रयोग बन गई। मैंने देश के विभिन्न भागों में जाकर दृश्य कला, संगीत और नृत्य द्वारा परंपराओं को ध्यान में रखकर कहानियाँ रची।
क्या आपको कुछ ऐसे रूपों के बारे में जानने की इच्छा है?

हरि कथा

img बारहवीं शताब्दी के समय, जब मैं भारत के दक्षिणी भाग की यात्रा कर रही थी तो मैंने कई सुंदर मंदिर देखे तथा ऐसे राजाओं से भेंट की जो कला और संस्कृति को प्रोत्साहन देते थे। किंतु मैंने यह भी देखा कि बहुत से लोग अब भी हमारी अद्भुत कहानियों से अनभिज्ञ थे।

मुझे स्मरण आए नारद मुनि, जो एक स्थान से दूसरे स्थान जाकर भगवान विष्णु की कथाओं को सुनाया करते थे। मैंने सोचा – यही उपाय यहाँ की कहानियों को वाचने के लिए भी उपयुक्त होगा। तब मैंने भागवतर समुदाय को प्रोत्साहित किया कि वे गीतों एवं नृत्यों के माध्यम से कथा वाचन करें। यह उपाय अत्यंत पसंद किया गया क्योंकि यह परस्पर संवादात्मक था। चूँकि ये कथाएँ भगवान हरि (विष्णु) की थीं, इसलिए इसे 'हरि कथा' के नाम से जाना जाने लगा।

यह परंपरा आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु में अत्यंत लोकप्रिय हुई। इन कथाओं को वाचने वाले को 'हरि कथा दास' कहा जाता था।

हरि कथा - गुरुराजुलु नायडू

img गुरुराजुलु नायडू एक बहुभाषीय और बहु प्रतिभाशाली कलाकार थे। इनका का जन्म 1931 में हुआ था।

हरि कथा के क्षेत्र में उनके योगदान के कारण उन्हें 'कर्नाटक हरि कथा पितामह' की उपाधि दी गई।

जहाँ वास्तविक हरि कथा की प्रस्तुतियाँ पूरी रात चलती थीं, उनकी शैली ने हरि कथा प्रदर्शन में क्रांतिकारी परिवर्तन ला दिया जिसकी अवधि 90 मिनट की थी, जिसे दर्शकों ने बहुत पसंद किया।

उनकी प्रसिद्ध हरि कथाओं में भक्त मार्कंडेय, भक्त सिरियाल, महिरावण, माया बाजार, नल्लथंगा देवी, गज-गौरी व्रत, श्रीकृष्ण गरुड़ी, लव-कुश और कई अन्य प्रमुख हैं।

उन्होंने फिल्मों में भी अभिनय किया है, जैसे- मूरुवारे वज्रगालु, हन्नेले चिगुरिदागा, मधु मालती और अन्य।

काँवड़ कथा

यह कथा सुनाने की एक परंपरा है जो 500 वर्षों से भी अधिक पुरानी है। जब मैंने देखा कि साधारण व्यक्ति रामायण, महाभारत, पुराणों और हमारी परंपरा की अन्य कहानियों को पढ़ने में असमर्थ हैं तो मैंने राजस्थान के भाट समुदाय, जो शिल्पकार होते हैं, से एक रोचक विधि अपनाने को कहा- चित्रों के माध्यम से कथा वाचन करना। चूँकि चित्रों को समझने के लिए भाषा की आवश्यकता नहीं होती, इसलिए हर कोई उन्हें समझ सकता था। इस तरह वे गाँव-गाँव में जाकर काँवड़ लेकर कथा वाचन करते थे। वे लोगों की स्थानीय भाषा में कथा वाचन के साथ गाने भी गाते थे।img

वे बच्चों के लिए पंचतंत्र और हितोपदेश की कहानियाँ भी सुनाते थे। आजकल वे कुछ आधुनिक कहानियाँ भी सुनाते हैं, जिनमें लड़कियों की शिक्षा, स्वच्छता जैसी सामाजिक रूप से प्रासंगिक एवं महत्वपूर्ण बातें होती हैं।

यह चित्रों वाला बक्सा या पेटी आम के पेड़ की लकड़ी से बनाया जाता है। कहानी की आवश्यकता के अनुसार इस बक्से या पेटी में 8 से 16 हिस्से होते हैं। अब तक का सबसे बड़ा कवर 25 फीट लंबा बनाया गया है।

ऐसे कितने कथा वाचक थे। जो देशभर में यात्राएँ करते हुए कहानियाँ सुनाते थे और उन्होंने इस कला को जीवित रखा। कुछ ने तो अलग-अलग देशों की यात्रा भी की, जहाँ उन्होंने हमारे देश की कहानियों और परंपराओं को प्रदर्शित किया। क्या इनमें से कुछ के बारे में जानना चाहेंगे?

काँवड़िया - खोजाराम जी

img खोजाराम जी, राजस्थान के जोधपुर के पास स्थित कुमार धणी गाँव से हैं। वे बचे हुए कुछ काँवड़ियों में से वो एक हैं और पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से काँवड़ कथा की परंपरा को निभा रहे हैं।

उनका कहना है कि- "पहले लोग ज्ञान-दान-भगवान में विश्वास करते थे। काँवड़ कथा सुनने के लिए सभी लोग एक पेड़ के नीचे इकट्ठा होते थे। काँवड़ मंदिर के रूप में उनके पास आता था और वे न केवल भगवान को देखते थे, अपितु उनकी कहानियों में निहित ज्ञान भी सुनते थे। अब वे साल में एक बार जजमान (श्रद्धालु) के घर जाते हैं। वह भी अन्य काँवड़ियों की तरह एक पुस्तक रखते हैं, जिसमें वे आस-पास के परिवारों में रहने वाले, मृत तथा नवजात लोगों का लेखा-जोखा भी रखते हैं।"

फड़ चित्रकला - राजस्थान

img पुराणों, राजाओं और उनके द्वारा लड़े गए युद्धों की कहानियाँ पाबूजी और देवनारायण जैसे स्थानीय देवताओं की स्तुति

थांगका चित्रकला - लद्दाख, सिक्किम, जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश

img बौद्ध ग्रंथों की कथाएँ, संतों के जीवन की घटनाएँ और स्थानीय लोक कथाएँ यद्यपि पहले ये परंपराएँ अधिक लोकप्रिय थीं, जो अब धीरे-धीरे दुर्लभ होती जा रही हैं। युवा पीढ़ी इन कलाओं को आगे बढ़ाने के लिए सीख नहीं रही है, जिस कारण बाधाएँ उत्पन्न हो रही हैं। आजकल सभी टीवी और स्मार्टफोन में व्यस्त हैं। ऐसे में कहानियाँ सुनने वाला कोई नहीं बचा है। यदि कथा वाचक ही नहीं बचेंगे तो कथाएँ भी इनके साथ ही चली जाएँगी। क्या आपको नहीं लगता की इन परंपराओं को जीवित रखना और उन्हें दुनियाभर में प्रसारित करना आवश्यक है?

क्या आपको अच्छा लगेगा अगर आपकी विद्यालय की पुस्तकें भी ऐसे ही रोचक तरीके से पढ़ाई जाएँ? चलिए प्रयास करते हैं। अपनी अंग्रेजी या सामाजिक विज्ञान की पुस्तक से कोई भी कहानी लें और उसे चित्रों के साथ सुनने का प्रयास करें। वास्तव में, इससे आपको पाठ याद रखने में मदद मिलेगी।

आइए, घेरा बनाएँ

  • अगर आपको नई कथा वाचन शैली का निर्माण करना हो तो आप उसमें कौन-कौन सी चीजें जोड़ेंगे? इसे और रोचक कैसे बनाएँगे?
  • अगर आप सरकार में होते तो इन लुप्त होती कला शैलियों को लुप्त होने से बचाने के लिए कौन-कौन से दो कदम उठाते ?
Children Sitting in Circle
बुद्धि के खेल

कथा वाचक बनिए।

ये पारंपरिक चित्रकला की कुछ तस्वीरें हैं।
  • इन्हें आपस में जोड़कर स्वयं की एक कहानी बनाएँ। इसे जितना संभव हो सके उतना अनोखा बनाएँ। आप चित्रों का क्रम बदल भी सकते हैं। इसका वर्णन करने का एक अनोखा तरीका सोचिए, जैसे - प्रत्येक पंक्ति को गाने की लय में बोलिए या कुछ नृत्य की मुद्राएँ जोड़ दीजिए या उस परिस्थिति के अनुसार कोई गीत गाइए।
  • आप अपनी कहानी लिखने के लिए तुकांत शब्दों का भी प्रयोग कर सकते हैं। इससे कहानी सुनाना मनोरंजक हो जाएगा।
  • इसे कक्षा के सामने प्रस्तुत कीजिए और एक-दूसरे से प्रतिक्रिया साझा कीजिए।
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मुख्य बातें – जीवन के लिए सीख

कहानी सुनाना - परंपराओं का खजाना

आप सोच रहे होंगे कि हमें इन कथा वाचन परंपराओं को बचाने की आवश्यकता क्यों है? ये मौखिक परंपराएँ हैं। कहानियाँ पीढ़ी दर पीढ़ी बोलचाल के माध्यम से आगे बढ़ती हैं। हमारे देश के सब लोग रामायण और महाभारत के बारे में इन मौखिक परंपराओं के कारण ही जानते हैं। भले ही कोई व्यक्ति पढ़ या लिख नहीं सकता, इन कहानियों के माध्यम से वह भी जीवन के मूल्य सीख सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये हमारी संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखती हैं। जहाँ पुस्तक या कंप्यूटर डेटा कुछ ही सेकंड में नष्ट हो सकते हैं, वहीं मौखिक परंपराओं की कहानियाँ कभी नष्ट नहीं हो सकती हैं। इसलिए आगे बढ़िए, किसी कथा वाचन शैली को सीखिए और इस परंपरा को आगे बढ़ाइए।
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