संगीत
- संगीत रत्नाकर, शारंगदेव.
कुछ सामान्य संगीत शब्दावली
आधार श्रुति या आधार स्वर
वह आधार स्वर जिसके अनुसार संगीत बजाया या गाया जाता है।स्वर
संगीत में एक स्वर, भारतीय संगीत में सात स्वर हैं-सारेगमपधनि।राग
स्वरों का एक समूह जो एक साथ मिलकर निश्चित नियमों के अनुसार राग बनाता है।ताल
एक लय चक्र, जिसमें कई मात्राएँ सम्मिलित होती हैं।लय
गति या लय धीमी से तीव्र तक भिन्न हो सकती है।आरोह या आरोहण
किसी राग का बढ़ता हुआ क्रम।अवरोह या अवरोहण
राग का घटता हुआ क्रम।सरगम
स्वरों का एक क्रम।
शिक्षकों के लिए
संगीत की दुनिया सुर, लय और शब्द से भरी हुई है। इन तत्वों को गीतात्मक रचनाओं को व्यक्त करने के लिए बुना जाता है, जो प्रेम, भक्ति, देशभक्ति, शिष्टता, प्रकृति की प्रशंसा, दुःख आदि के असंख्य भावों को व्यक्त करते हैं। संगीत असीम है और सभी उम्र के लोगों के बीच लोकप्रिय है। विद्यालय में बच्चों की भीड़ और कोलाहल भरी सभा अचानक शांतिपूर्ण विधि से संगीत की अभिव्यक्ति के माधुर्य और सामंजस्य से गूंज उठती है। संगीत पाठ्यक्रम की आकांक्षा है कि आप और विद्यार्थी संगीत की यात्रा का पूरी तरह से आनंद लें, जिसमें अपार संभावनाओं को प्रकट करने की क्षमता है। शिक्षकों को विद्यार्थियों के बीच संगीत के प्रति आजीवन प्रेम पैदा करने का लक्ष्य रखना चाहिए, प्रशंसा को बढ़ावा देना चाहिए, जो कक्षा से परे बढ़ेगी। साथ ही, कक्षा 7 के पाठ्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों को इस लोकप्रिय और आकर्षक कला रूप से जुड़े कई पहलुओं को उजागर करने के लिए गहरी अंतर्दृष्टि प्राप्त करने में सक्षम बनाना है।यह खंड शिक्षार्थियों को संगीत बनाने के विभिन्न चरणों से अवगत कराने के लिए आरंभ किया गया है। संगीत में कई परतें होती हैं, जिसमें स्वर, सुर, गति, संगीत वाद्ययंत्रों के भागों, वाद्यवृंद और कई अन्य तत्वों में संयम के माध्यम से अभिव्यक्ति के विभिन्न रूप सम्मिलित होते हैं। गीतों की आलोचनात्मक समीक्षा किसी भी रचना को समझने में सहायक बनेगी।
विभिन्न अवसरों पर गायी गई सभी रचनाएँ महत्वपूर्ण होती हैं। संगीत समाज में कई तरह के संदेशों का प्रसार करने का एक संसाधन हो सकता है, जिसमें विभिन्न व्यवसायों और कौशलों का महत्व, सामाजिक सुधार, स्वास्थ्य संबंधी मुद्दे आदि सम्मिलित हैं। यह नृत्य और अंग संचालन, रंगमंच में पाश्र्व संगीत, फिल्म निर्माण आदि से संबंधित है। 'संगीत' का भाग शिक्षार्थियों को इन पहलुओं को जानने में सहायता करेगा।पारंपरिक, लोक और शास्त्रीय संगीत अभ्यास के कुछ बुनियादी कौशल के उदाहरण दिए गए हैं, जबकि शिक्षकों को पाठ्यक्रम और बुनियादी दिशानिर्देशों का पालन करते हुए, उन्हें अपने तरीके से विषयों को पेश करने की स्वतंत्रता है। साथ ही, विद्यार्थियों को उनके पास उपलब्ध स्रोतों से शोध करने और अधिक जानकारी प्राप्त करने दें।
दैनिक जीवन में संगीत की अलग-अलग विधाओं का अनुभव करने के कई अवसर हैं। उत्साहपूर्ण भागीदारी से उन्हें कला के इस रूप से सच्चा प्यार करने और भारतीय संदर्भ में विविधता की खोज करने में सहायता मिलेगी। इस पुस्तक का उद्देश्य विद्यार्थियों को संगीत की सराहना करने के लिए प्रेरित करना है।- विद्यार्थियों को संगीत के प्रति जागरूक करने के लिए उन्हें लाइव (प्रदर्शन) संगीत प्रदर्शन दिखाने ले जाने पर विचार करें।
- किसी संगीतकार को अपने विद्यालय में आमंत्रित करें और उसके साथ बातचीत करें।
प्रत्येक अध्याय के अंत में रचनात्मक आकलन के लिए दिशानिर्देश दिए गए हैं, जिन्हें मुख्य रूप से कक्षा में अवलोकन के माध्यम से ध्यानपूर्वक और व्यस्त तरीके से आयोजित किया जाना चाहिए। संगीत क भाग के अंत में संकलनात्मक आकलन के लिए सुझाव दिए गए हैं। इस चरण के लिए आवश्यक योग्यताएँ नीचे दी गई हैं। आकलन का उद्देश्य विशेष रूप से यह देखना है कि क्या विद्यार्थी बताई गई योग्यताओं तक पहुँचने में सक्षम हैं अथवा क्या अधिक सहायता की आवश्यकता है। बच्चों को आगे विकसित होने में सहायता करने के लिए गुणात्मक प्रतिक्रिया दें।
सी.जी.-1 विभिन्न कला रूपों के माध्यम से स्वयं का अवलोकन और अभिव्यक्त करने के लिए स्पष्टता को विकसित करता है।
सी.-1.1 विभिन्न प्रकार की सांगीतिक गतिविधियों के माध्यम से अपने व्यक्तिगत और दैनिक जीवन के अनुभवों को आत्मविश्वास के साथ व्यक्त करता है।
सी.-1.2 संगीत परंपराओं को सहयोगात्मक रूप से विकसित करने की प्रक्रिया में लचीलापन प्रदर्शित करता है।
सी.जी.-2 कला के माध्यम से वैकल्पिक अवधारणाओं का पता लगाने के लिए अपनी कल्पना और रचनात्मकता का प्रयोग करता है।
सी.-2.1 ऐसे गीत और संगीत रचनाएँ बनाना और प्रस्तुत करना, जो उनके आस-पास देखी जाने वाली रूढ़ियों (जैसे- जेंडर भूमिकाएँ) को चुनौती देती हों।
सी.-2.2 संगीत के तत्वों (गीत, राग, लय, मात्रा, गति और पैटर्न) को व्यक्तिगत अनुभवों, भावों एवं कल्पनाओं से जोड़ना।
सी.जी.-3 कलात्मक तत्वों, प्रक्रियाओं और तकनीकों को समझना है और उनका प्रयोग करना।
सी.-3.1 मंच शिष्टाचार एवं संगीत वाद्ययंत्रों की देखभाल का प्रदर्शन करना और संगीत में संसाधनों एवं तकनीकों का उपयोग करते समय सूचित विकल्प बनाना।
सी.-3.2 योजना चरण से लेकर अंतिम प्रदर्शन तक संगीत अभिव्यक्ति के विचारों और तरीकों को परिष्कृत करता है और पूरी प्रक्रिया की समीक्षा करता है।
सी.जी.-4 क्षेत्रीय कलाओं और सांस्कृतिक परंपराओं में सौंदर्य संबंधी संवेदनशीलता की एक श्रृंखला से स्वयं को परिचित कराता है।
सी.-4.1 संगीत के विभिन्न स्थानीय और क्षेत्रीय रूपों से परिचित होना दर्शाता है।
सी.-4.2 अपने क्षेत्र और पूरे भारत में कुछ स्थानीय संगीतकारों और कलाकारों के जीवन और कार्य का वर्णन करता है।
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संगीत बनाना
आइए, हम सब मिलकर कोई लोकप्रिय गीत गाना प्रारंभ करें। यहाँ कुछ सुझाव दिए गए हैं-- बरसो रे मेघा मेघा
- भारत हमको जान से प्यारा है
- आ चलके तुझे मैं लेके चलूँ
- जिंदगी एक सफर है सुहाना
- ओ पालन हारे निर्गुण और न्यारे
- गायन
- संगीत वाद्ययंत्र
- मेलोडी
- संगति
- गीत के शब्द
- वे कौन-सी परतें हैं जिन्हें आप सुन सकते हैं?
- क्या आपने देखा है कि संगीत की विभिन्न शैलियों में विभिन्न प्रकार की ध्वनियाँ और वाद्य होते हैं?
- किसी फिल्मी गीत में आप कौन-सी परतें सुनते हैं?
- एक भक्ति गीत में आप कौन-सी परतें सुनते हैं?
रिलीज का साल ____________
विषय ____________
फॉर्म/शैली ____________
कलाकार ____________
संगीतकार ____________
गीतकार ____________
संगीत के तत्व -स्वर, ध्वनि, वाद्ययंत्र और गति
- क्या यह गीत पुरुष स्वर में गाया गया है या महिला स्वर में या फिर यह युगल गीत है?
- आप कौन-से वाद्ययंत्र सुन सकते हैं?
- इस गीत की गति क्या है? क्या यह तेज है या धीमी? क्या गीत के दौरान इसमें परिवर्तन होता है?
- क्या यह अधिकतर ऊँची, मध्यम या नीची ध्वनि में होता है? क्या गीत के दौरान इसमें परिवर्तन होता है?
मनःस्थिति, भाव (रस) एवं विषय
- गीत का मनोभाव क्या है?
- आपको इस गीत में क्या पसंद आया? क्या आप गीत का मनोभाव बदलना चाहेंगे? कैसे?
- क्या आयोजन भारी है (बहुत सारे वाद्ययंत्रों और ताल के साथ) या हल्का?
- आप एक ही समय में कितनी परतें और कितनी अलग-अलग पंक्तियाँ सुन सकते हैं?
- वह गीत गाएँ जिसमें आप सहज हों।
- यदि आपके पास कराओके ट्रैक है तो आप उसका उपयोग कर सकते हैं।
- अपना गायन रिकॉर्ड करिए और सुनिए। देखिए कि आप सुर और लय में कहाँ हैं और कहाँ नहीं।
- अपने संस्करण की तुलना मूल ऑडियो से कीजिए और सुधार के क्षेत्रों पर ध्यान दीजिए।
- किसी अन्य व्यक्ति (जैसे-सहपाठी, मित्र, शिक्षक या परिवार के सदस्य) को गीत सुनाएँ एवं उससे प्रतिक्रिया प्राप्त करें।
साथ मिलकर संगीत बनाना
हार्मनी और कैनन
जब आप कई ध्वनियों को एक साथ गाते हुए सुनते हैं, जो विभिन्न सुरों का एक सुखद मिश्रण बनाती हैं तो इसे गायन में हार्मनी कहा जाता है। गायन या वादन में हार्मनी जैसी विशेषता प्रचलित है। हार्मनी के गायन की विधि को समझने के लिए कैनन की पद्धति सहायक है। कैनन वह होता है जिसमें गायकों के विभिन्न समूह एक ही धुन गाते हैं, परंतु भिन्न-भिन्न समय पर आरंभ करते हैं। कैनन के रूप में लिखे गए गाने इस प्रकार से लिखे जाते हैं कि एक ही समय में आप जो अलग-अलग सुर सुनते हैं, वे एक साथ अच्छे लगते हैं। आप कोई भी देशभक्ति गीत, लोक गीत चुन सकते हैं, उदाहरण के लिए-- कुट्टनादन पुंजयिले कोचू पेने कुयिलाले (आपने कक्षा 6 में सीखा था)
- हम होंगे कामयाब (अपने कक्षा तीसरी में सीखा था)
समूह 1- हम होंगे कामयाब (2)
समूह 2- हम होंगे कामयाब एक दिन
समूह 1- हम होंगे कामयाब एक दिन
समूह 2- हम होंगे कामयाब (2)
समूह 1 पहली पंक्ति गाता है और दूसरी पंक्ति तक निरंतर रखता है।समूह 1 जब तीसरी पंक्ति गाना आरंभ करता है तो समूह 2 पहली पंक्ति गाना प्रारंभ करता है। गीत को कई बार दोहराएँ जिससे सभी सुरों को सुन सकें।
यदि यह सरल लगता है तो चार समूह बनाने का प्रयास करें। समूह 1 पहली पंक्ति से आरंभ करता है और जब वे दूसरी पंक्ति गाते हैं तो समूह 2 पहली पंक्ति से प्रांरभ करता है और इसी तरह आगे बढ़ता है। जब सभी एक साथ गाते हैं तो कैसा लगता है?
संगीत - एक सामूहिक कार्य
संगीत एवं मंत्र उच्चारण कई सदियों से प्रचलित है। आइए, वैदिक युग में पदार्पण करके इसे समझें। यह युग भक्ति और संगीत से ओत-प्रोत था। क्षितिज पर जब सूर्य की पहली किरण का आभास होता था ऋत्विज जो चारों वेदों की ऋचाओं को गाते थे, यजमान और उनकी पत्नी यज्ञशाला में सम्मिलित होते थे। श्रौत यज्ञ क्रिया करते थे।इन ऋत्विजों के समूह में सामवेद में विशेष दक्षता प्राप्त चार ऋत्विजों का एक विशिष्ट उप-समूह होता था। इनके प्रमुख सामवेदी ऋत्विज को 'उद्गात' कहा जाता था और सभी मिलकर 'उद्गातृगण' कहलाते थे। ये ऋत्विज सामवेद के साथ-साथ भक्ति संगीत और पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाने में भी निपुण थे। वे सामवेद संहिता के मंत्रों को सुर में पिरोकर गाते थे, जो वैदिक अनुष्ठानों की नींव मानी जाती थी।
यज्ञशाला में पूर्व दिशा (जो उगते सूर्य की दिशा है और जिसे दिव्यता व नवीकरण का प्रतीक समझा जाता है) की ओर मुख करके सामवेदी ऋत्विज अपनी-अपनी विशेष भूमिकाओं में विभाजित होते थे। प्रत्येक भूमिका ने सामवेद के मंत्रों के गान 'सामगान' की जटिल रचना और सुरों से जुड़ी परंपरा को सुंदर और सुसंगठित बनाने में अपना योगदान दिया। 'सामगान' की रचना सामान्यतः पाँच भागों में बँटी होती थी, जिन्हें भक्ति कहा गया है -1. प्रस्ताव - गान की भूमिका, जिसका आरंभ प्रस्तोता द्वारा किया जाता था।
2. उद्गीथ - सामगान का मुख्य भाग, जिसे प्रमुख ऋत्विज उद्गाता द्वारा गया जाता था।
3 . प्रतिहार - यह भाग उद्गीथ की अंतिम पंक्ति से आगे प्रतिहार्ता गाता था।
4. उपद्रव - यह एक संगीतमय अंतराल होता था, जिसमें वाद्ययंत्र और लय प्रस्तुत की जाती थीं और इसे फिर उद्गाता ही गाता था।
5. निधन - समापन का भाग, जिसे सभी ऋत्विज मिलकर एक स्वर में गाते थे, जिससे एक गहरा और एकजुट अंत होता था।
इसके अतिरिक्त, चौथे सामवेदी ऋत्विज सुब्रह्मण्य की एक विशेष भूमिका होती थी। वे सुब्रह्मण्याह्वान का उच्चारण करते थे।
इसी तरह, यजमान-पत्नी की भी एक महत्वपूर्ण भूमिका होती थी। वे सामगान के दौरान शततंत्री वीणा बजाती थीं और सामगान के कुछ आवश्यक अंशों को भी गाती थीं।इसके अतिरिक्त, चौथे सामवेदी ऋत्विज सुब्रह्मण्य की एक विशेष भूमिका होती थी। वे सुब्रह्मण्याह्वान का उच्चारण करते थे। इसी तरह, यजमान-पत्नी की भी एक महत्वपूर्ण भूमिका होती थी। वे सामगान के दौरान शततंत्री वीणा बजाती थीं और सामगान के कुछ आवश्यक अंशों को भी गाती थीं।
आकलन
अध्याय 10 - नृत्य और मूर्तिकला
| सी.जी. | सी. | सीखने के प्रतिफल | अध्यापक | स्वयं |
|---|---|---|---|---|
| 1 | 1.2 | नृत्य में ऊपरी और निचले धड़ के उपयोग को समझना। | ||
| 1 | 1.2 | शरीर द्वारा निर्मित ज्यामितीय आकृतियों को समझना। | ||
| 1 | 1.2 | आत्मविश्वास से रस-भावों को व्यक्त करना। | ||
| 1 | 2.1 | मूर्तिकला से संबंधित । | ||
| 1 | 2.2 | मूर्तिकला में हस्त मुद्राओं को समझना। |