नृत्य और अंग संचालन
नृत्यशास्त्र के ज्ञान के परे, चित्रकला (या मूर्तिकला) के सिद्धांतों को समझ लेना अत्यंत जटिल है।
-विष्णुधर्मोत्तर पुराण
शिक्षकों के लिए
कृपया बच्चों को चलने और नृत्य करने के लिए पर्याप्त स्थान के साथ एक विशाल सभागार प्रदान करें, जो हवादार हो, साथ ही प्रकाश की उसमें उत्तम व्यवस्था हो। बच्चों को उनकी योग्यता के अनुसार सिद्धांतों को अपनाने के लिए प्रेरित करें। उन्हें समूह बनाने और समूह के रूप में कार्य करने में सहायता करें।
शैक्षणिक सिद्धांत
- शारीरिक गतिविधियों को ज्यामितीय आकृतियों के संदर्भ एवं समझाने में बच्चों की सहायता करें, जिससे वे सहज और चुनौतीपूर्ण मुद्राओं को करने का प्रयास कर सकें।
- कला और मूर्तिकला के परस्पर संबंध को समझना, विशेष रूप से शरीर और ज्यामितीय आकृतियों के संदर्भ में।
- पैरों की गति एवं ताल पर ध्यान रखते हुए नृत्य की कुछ मूल इकाइयों को समझना, तालों की गणितीय विविधताओं और उसके संयोजनों का अन्वेषण करना।
- नृत्य में उछलने और चक्कर लगाने का परिचय देना एवं बच्चों को विभिन्न प्रकार के उछलने का अभ्यास कराने में सहज बनाना। यह बच्चों के लिए शारीरिक रूप से लाभकारी होगा।
- भावों की अभिव्यक्ति - बच्चे सकारात्मक एवं नकारात्मक, दोनों दृष्टि से स्वयं अपने भावों को अभिव्यक्त कर सकें, इसके लिए उन्हें प्रोत्साहित करना, जिससे उनकी भावाभिव्यक्ति की क्षमता में विकास हो।
- हस्त मुद्राओं का उपयोग संचार-माध्यम के रूप में करना।
- भारतीय नृत्य-शैली, जिसमें शास्त्रीय और पारंपरिक रूप हैं, उसके बारे में जानना, जिससे भारत की सांस्कृतिक विविधता को समझा जा सके।
- जेंडर संवेदनशीलता के साथ यह सीखना और समझना कि पारंपरिक नृत्यों की भूमिका निभाने में जेंडर की कोई बाध्यता न रहे।
- समकालीन भारतीय नृत्य और लोकप्रिय संस्कृति में नृत्य के चलन का परिचय देना। गतियों के माध्यम से रचनात्मकता का अन्वेषण करना।
- प्रसिद्ध भारतीय नृत्य कलाकारों के बारे में जानकारी प्राप्त करना और उन पर शोध करना।
- नृत्य निर्माण में समूह कार्य और सहयोगात्मक प्रयास के महत्व को समझना।
- प्रकृति का महत्व समझते हुए नृत्य और अंग-संचालन की संपूर्ण सराहना करना।
पाठ्यक्रम के उद्देश्य और दक्षताएँ नीचे दी गई हैं-
सी.जी. 1- विभिन्न कला रूपों के माध्यम से स्वयं को खोजने और अभिव्यक्त करने के प्रति स्पष्टता विकसित करना।
सी.1.1 - नृत्य एवं अंग-संचालन गतिविधियों की विविधता के माध्यम से, अपने व्यक्तिगत और दैनिक जीवन के अनुभवों को आत्मविश्वास के साथ व्यक्त करना।
सी. 1.2 - नृत्य और अंग-संचालन के अभ्यासों को सहयोगात्मक रूप से विकसित करने की प्रक्रिया में लचीलापन प्रदर्शित करना।
सी.जी. 2 - कला के माध्यम से वैकल्पिक विचारों की खोज करने के लिए अपनी कल्पना और रचनात्मकता का उपयोग करना।
सी. 2.1 - नृत्य एवं अंग-संचालन के ऐसे अनुक्रमों का निर्माण और प्रदर्शन करना, जो उनके आस-पास देखी जाने वाली रूढ़िवादिता को चुनौती देते हैं (जैसे कि जेंडर भूमिकाएँ)।
सी. 2.2 - नृत्य एवं अंग-संचालन, मुद्राओं, भावों और भंगिमाओं के तत्वों को व्यक्तिगत अनुभवों के साथ भावों और कल्पनाओं से जोड़ना।
सी.जी. 3- कलात्मक तत्वों, प्रक्रियाओं और तकनीकों को समझना और प्रयोग करना।
सी. 3.1 - शिष्टाचारयुक्त मंच प्रदर्शन, मंच उपकरण, सहायक वस्तुओं और वस्त्रों की देखभाल का प्रदर्शन तथा नृत्य एवं अंग-संचालन तकनीकों का उपयोग करते समय विकल्प बनाना।
सी. 3.2 - योजना बनाने से लेकर अंतिम प्रस्तुति तक नृत्य और अंग-संचालन में प्रयोग किए गए विचारों तथा अभिव्यक्तियों की पुनर्रचना करना एवं पूरी प्रक्रिया की समीक्षा करना।
सी.जी. 4 क्षेत्रीय कलाओं और सांस्कृतिक अभ्यासों में सौंदर्य अनुभूति के विभिन्न प्रकारों से स्वयं को परिचित करना।
सी. 4.1 - नृत्य एवं अंग-संचालन के विभिन्न स्थानीय एवं क्षेत्रीय रूपों से परिचित कराना और प्रदर्शित करना।
सी. 4.2 अपने क्षेत्र और पूरे भारत के कुछ स्थानीय नर्तकों और संचारित कलाकारों के जीवन एवं कार्य का वर्णन करना।
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नृत्य और मूर्तिकला
मूर्तिकला में नृत्यरत शरीर
विष्णुधर्मोत्तर पुराण विभिन्न कला रूपों के बीच अंतर्संबंध और अंतर्निर्भरता पर बल देता है।लगभग 400 से 600 ईसवी के बीच, गुप्त काल जिसे भारतीय कलाओं का स्वर्ण युग भी कहा जाता है, के अंत में प्रदर्शन कला की स्थानिक अवधारणाओं के महत्व को समझा गया है।
इस ग्रंथ में, राजा वज्ज्र और ऋषि मार्कंडेय के बीच चित्रकला और नाट्यकला पर एक चर्चित संवाद होता है। यह प्रदर्शन कला और दृश्य कला के बहुआयामी पारस्परिक संबंध को दर्शाता है।ऋषि मार्कंडेय कहते हैं-
"जो व्यक्ति चित्रकला (चित्र) के नियमों को नहीं जानता, वह मूर्तिकला (शिल्प) के नियमों को नहीं समझ सकता और नृत्यकला (नृत्य) की तकनीक को जाने बिना, चित्रकला (चित्र) के नियमों को समझना कठिन है।"ज्यामितीय आकारों की सूक्ष्मता, नृत्यकला और मूर्तिकला में संभवतः इसी अंतर्विषयक समझ के कारण विकसित हुई होगी।
नृत्य में ज्यामितीय आकृतियाँ
नृत्य और गणित का जुड़ाव प्रायः एक-दूसरे से देखा गया है, जहाँ संतुलित और दृष्टिगत रूप से आकर्षक गतिविधियों को बनाने में ज्यामितीय आकृतियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।जब आप नृत्य में मुद्राओं का अवलोकन करते हैं तो आप शरीर द्वारा बनाई गई विभिन्न ज्यामितीय आकृतियाँ और कोण को पहचान सकते हैं,
जैसे- त्रिभुज, वृत्त और रेखाएँ। नृत्य की गतिविधियों को आपने अपने विभिन्न शारीरिक अंगों के उपयोग के साथ देखा।
आप शरीर के ऊपरी भाग को मुड़ने या धड़ द्वारा बनाए गए आकारों की पहचान से परिचित हैं।
ऊपरी धड़ से शारीरिक भंगिमाएँ बनाना
भुजाएँ एवं कोण
आपने पहले अपने हाथो का उपयोग विभिन्न प्रकार से किया है, वृत्तों में घुमाया है, आधे वृत्त बनाए हैं, तिरछी रेखाएँ बनाई हैं। अब ध्यान दीजिए कि जब आप नृत्य में अपने हस्तों का उपयोग करते हैं तो वे कैसे विभिन्न ज्यामितीय कोण बनाते हैं।
अब, समय है आपके निचले धड़ पर ध्यान केंद्रित करने और इसकी गतिविधियों और भंगिमाओं के माध्यम से बनने वाली ज्यामितीय आकृतियों का पता लगाने का -
घुटने को मोड़कर निचले धड़ से शारीरिक भंगिमाएँ बनाना
जैसा कि पहले विचार-विमर्श किया गया है, क्या आप नृत्य-चित्रों में ऊपरी और निचले धड़ के संयोजन को देख सकते हैं? क्या आप चित्रों में दिखाई गई मुद्राओं को कर सकते हैं?
क्या आप विभिन्न कोणों की पहचान कर सकते हैं? आप मूर्तिकला के चित्रों में कौन-से कोण पहचान सकते हैं?
क्या आपको कुछ मुद्राएँ दूसरों की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण लगती है? आप एक ऐसी भंगिमा बनाने का प्रयास करें जो सरल हो और एक ऐसी जो चुनौतीपूर्ण हो?
बाएँ से दाएँ, ऊपर से नीचे -
- नृत्य करती हुई हिंदू देवी, होयसलेश्वर कर्नाटक के हलेबिडु में मंदिर
- महिला नर्तकी, सूर्य मंदिर कोणार्क, ओडिशा
- नृत्य करते शिव, केदारेश्वर मंदिर, हलेबिडु, कर्नाटक
- होयसलेश्वर में हिंदू मंदिर हलेबिडु, कर्नाटक
- कर्नाटक के हम्पी से नर्तकियाँ, कर्नाटक
- जैन मंदिर, हरिद्वार, उत्तराखंड
हस्त मुद्राएँ
आपने कृति, कक्षा 6 में असम्युता हस्त (एकल हस्त मुद्राएँ) और सम्युता हस्त (संयुक्त हस्त मुद्राएँ) मुद्राओं के बारे में सीखा होगा, उन हस्त मुद्राओं का स्मरण करें।असम्युता हस्त (एकल हस्त मुद्राएँ)
सम्युता हस्त (संयुक्त हस्त मुद्राएँ)
क्या आप नीचे दी गई मूर्तिकलाओं में हस्त मुद्राएँ देख सकते हैं? इन्हें स्वयं करके देखें और पता लगाएँ कि क्या आप इन्हें हस्त मुद्राओं की चित्रावलियों से मिला सकते हैं? यह समझना महत्वपूर्ण है कि ये हस्त मुद्राएँ नृत्यकला ग्रंथों से ली गई हैं, मूर्तिकला ग्रंथों में कुछ हस्त मुद्राओं के नाम अलग हैं।
अपने मित्रों के साथ इस पर विचार-विमर्श करें, देखी गई हस्त मुद्राओं को करने और कुछ नई मुद्राओं को बनाने का प्रयास करें।नवरस – नौ रसों की अनुभूति
भाव और अभिव्यक्ति भारतीय नृत्य का एक अभिन्न भाग है। ये मूल भाव एक भावनात्मक वातावरण उत्पन्न करता है, जिसका आनंद सभी हैं। यही रस है।शृङ्गारहास्यकरुणा रौद्रवीरभयानकाः ।
बीभत्साङ्कृतसंज्ञौ चेत्यष्टौ नाट्ये रसाः स्मृताः ॥ १७॥
-नाट्यशास्त्र
सौंदर्य (श्रृंगार), हँसी (हास्य), करुणा (दया), क्रोध (रौद्र), वीर, भय (भयानक), घृणा (वीभत्स) और आश्चर्य (अद्भुत) – ये नाट्यशास्त्र में वर्णित आठ रस हैं।क्या आपको याद है कि कृति कक्षा 6 में हमने इन नवरसों के नाम सीखे थे? क्या आपको उन्हें अभिव्यक्त करना याद है?
आइए, हम नवरसों और उनकी अभिव्यक्तियों को स्मरण करते हैं-
क्या गिलहरियों को एक-दूसरे के पीछे भागते देखकर आपको प्रसन्नता होती है और आपके चेहरे पर मुस्कान आ जाती है?- हास्य (हँसी या आनंद)।
जब कोई बगीचे के पेड़ों को काट देता है तो क्या आपको क्रोध आता है?- रौद्र (क्रोध)
आप साहसपूर्वक पेड़-पौधों के विनाश को रोकने के लिए विरोध में खड़े होते हैं- वीर (साहस)।
बगीचे में कुछ पौधें सड़ रहे हैं और दुर्भाग्यवश, वे एक तीव्र दुर्गंध छोड़ते हैं जो आपको घृणा दे सकती है।- वीभत्स (घृणा)।
आइए, हम सभी प्रकृति में शांति प्राप्त करें। - शांत (शांति)।
सामग्री
दो कटोरों में पर्ची लें।- कटोरा 1- नौ रसों की अवस्थाएँ (प्रसन्नता, उदासी, क्रोध, आश्चर्य, डर, उत्साह, शांत, भ्रमित, गर्व)।
- कटोरा 2- दैनिक गतिविधियाँ (जैसे- दाँत ब्रश करना, कपड़े पहनना, स्कूल जाना, दोपहर का भोजन करना, गृहकार्य करना, योग करना)।
निर्देश
- प्रत्येक बच्चा, कटोरा 1 और कटोरा 2 से एक-एक पर्ची उठाता है।
- बच्चा फिर उठाई पर्ची की दैनिक गतिविधि का अभिनय करता है, वह उसे उस भावनात्मक अवस्था के साथ निभाता है, जो दूसरी पर्ची से निकली है।
उदाहरण के लिए- यदि आपने कटोरा 1 से 'भ्रमित' भावनात्मक
अवस्था और कटोरा 2 से 'गृहकार्य' गतिविधि निकाली है तो उसे ऐसे प्रस्तुत करें जैसे आपको गृहकार्य करने की इच्छा तो हैं, लेकिन अभी नहीं करना चाहते (आप अपने सर को खुजा सकते है, कलम को छोड़ कर पुनः उठा सकते हैं, किताब को बंद कर पुनः खोल सकते हैं)।
आकलन
अध्याय 10 — नृत्य और मूर्तिकला
| सी.जी. | सी. | सीखने के प्रतिफल | शिक्षक | स्वयं |
|---|---|---|---|---|
| 1 | 1.1 | नृत्य में ऊपरी और निचले धड़ के उपयोग को समझना। | ||
| 1 | 1.2 | शरीर द्वारा निर्मित ज्यामितीय आकृतियों को समझना। | ||
| 1 | 1.2 | आत्मविश्वास से रस-भावों को व्यक्त करना। | ||
| 2 | 2.1 | मूर्तिकला से संबंधिता | ||
| 2 | 2.2 | मूर्तिकला में हस्त मुद्राओं को समझना। |