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इकाई- 1


योग

योग एक प्राचीन अभ्यास है, जो शरीर और मन को सामंजस्य प्रदान करने के लिए विकसित किया गया है। यह इकाई आपको योग के माध्यम से समग्र विकास की ओर उन्मुख करेगी, जिसमें शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक शांति प्राप्त करने के लिए योग के आठ अंगों को व्यवहार में लाने पर विशेष बल दिया जाएगा। हम यह भी जानेंगे कि नियमित योगाभ्यास से जागरूकता, अनुशासन पालन और नैतिक आचरण को कैसे विकसित किया जा सकता है, जो अंततः विद्यार्थियों को अधिक उत्तरदायी और संवेदनशील व्यक्ति बनने के लिए सक्षम बनाता है।

योग के बारे में

कक्षा 6 में हमने जाना कि 'योग' शब्द संस्कृत के 'युज' धातु से बना है, जिसका अर्थ है 'जोड़ना', 'एक होना' या 'एकाकार होना'। यह शरीर, मन और आत्मा का एक होना है। योग हमारे अंदर और हमारे चारों ओर की दुनिया में संतुलन, सामंजस्य और एकता लाता है।

योग हमारे सर्वांगीण विकास में सहायता करता है, जैसे- शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक विकास। नियमित रूप से योग का अभ्यास करने से शरीर सशक्त होता है, मन शांत होता है और भावनाएँ संतुलित होती हैं। यह आंतरिक सामंजस्य हमें अधिक अच्छा विद्यार्थी, सच्चा मित्र, परिवार का उत्तरदायी सदस्य और देश का उत्तरदायी नागरिक बनने में सहायता करता है। जीवन की चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करने, ध्यान केंद्रित करने और संतुलन बनाए रखने के लिए नियमित रूप योगाभ्यास करना आवश्यक है।

इस इकाई का प्रत्येक खंड आपके योग की समझ और अभ्यास को और समृद्ध करेगा। हम सर्वांगीण और समग्र विकास के लिए योग के परिचय से आरंभ करेंगे। इसके बाद यम, नियम और अपने दैनिक जीवन में पालन करना सीखेंगें। इसके साथ ही सूक्ष्म व्यायाम (जोड़ों के लिए व्यायाम), शीतलीकरण व्यायाम, सूर्य नमस्कार, आसन (स्थितियाँ), विश्रांति, विभिन्न मुद्राएँ, यौगिक क्रियाएँ, प्राणायाम (श्वास-प्रश्वास पर नियंत्रण), प्रत्याहार (इंद्रियों पर नियंत्रण), धारणा (एकाग्रता का प्रयास), ध्यान (एकाग्रता), क्रीड़ा योग (यौगिक खेल) के विषय में भी जानेंगे।

योग सत्र की संरचना

अपने योग सत्र का आरंभ अगले पृष्ठ पर दी गई प्रार्थना से कीजिए। इस प्रार्थना के माध्यम से हम विद्यार्थियों और शिक्षकों के बीच के संबंध को प्रगाढ़ करते हैं। वे आपस में मिलकर ईश्वरीय मार्गदर्शन, सुरक्षा और ज्ञान के लिए प्रार्थना करते हैं। साथ ही, प्रत्येक स्थान के प्राणीमात्र की शांति की कामना करते हैं।

योग सत्र आरंभ और समाप्त करने के लिए सामान्य सुझाव

•सुखासन में आराम से बैठिए, अपनी रीढ़, गर्दन और सिर को सीधा रखिए।

•अपनी आँखें बंद कीजिए, चेहरे की मांसपेशियों और अपनी श्वास पर ध्यान केंद्रित कीजिए।

•हाथों को चिन मुद्रा में रखिए। कुछ क्षण अपनी श्वासों का अवलोकन कीजिए, फिर गहरी और धीमी श्वास लीजिए। श्वास छोड़ते समय धीरे से 'ओम' का उच्चारण कीजिए।

•हाथों को नमस्कार मुद्रा में लाइए और अगले पृष्ठ पर दी गई प्रार्थना का उच्चारण कीजिए।

•ध्यान दीजिए कि 'ओम' के उच्चारण के बाद आपको कैसा अनुभव होता है।

•अपनी हथेलियों को आपस में धीरे-धीरे रगड़िए, उन्हें अपनी बंद आँखों पर रखिए और फिर हाथों की ऊष्मा के साथ धीरे-धीरे आँखें खोलिए।

प्रारंभिक प्रार्थना
ॐ सह नाववत्।

सह नौ भुनक्तु।

सह वीर्यं करवावहै।

तेजस्वि नावधीतमस्तु माँ विद्विषावहै।

ॐ शांतिः शांतिः शांतिः॥
Om Saha Nāvavatu.

Saha Nau Bhunaktu.

Saha Viryam Karavāvahai.
Tejasvi-Nāvadhitamastu Mã

Vidvisāvahai.

Om Śāntih Santih Santih.


प्रार्थना का अर्थ

हम दोनों (गुरु और शिष्य) सुरक्षित रहें। हम दोनों का पोषण हो। हम दोनों उत्साह, उमंग और ऊर्जा के साथ अभ्यास करें। हमारा अध्ययन फलदायी और ज्ञानवर्धक हो। हम एक-दूसरे से द्वेष मुक्त रहें।

प्रारंभिक प्रार्थना के बाद, यौगिक गतिविधियों की सत्र योजना का पालन कीजिए। इन गतिविधियों में यम, नियम, सूक्ष्म व्यायाम, शीतलीकरण व्याायाम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, विश्राम, धारणा, ध्यान और क्रीड़ा योग सम्मिलित हैं।

योग-सत्र का समापन दी गई प्रार्थना से कीजिए। यह प्रार्थना विद्यार्थियों के द्वारा किए गए योग अभ्यास को आत्मसात करने और दिन को सकारात्मक एवं आनंदमयी बनाने में सहायता करती है।

समापन प्रार्थना
ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः

सर्वे सन्तु निरामयाः।

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु

मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्।

ॐ शांतिः शांतिः शांतिः॥

Om Sarve Bhavantu Sukhinah

Sarve Santu Nirāmayāh.

Sarve Bhadrāni Paśyantu

Mā Kaśhcidduhkhabhagbhāvet.

Om Śāntih Santih Śāntih.

प्रार्थना का अर्थ
सब लोग सुखी हों। सब लोग निरोग हों। सभी का शुभ हो। कोई भी दुखी न हो। चारों ओर शांति रहे।


अध्याय 1
दैनिक जीवन में योग

इस अध्याय में हम यह जानेंगे कि किस प्रकार हम योग को अपने दैनिक जीवन में सम्मिलित करेंगे। अपने दैनिक जीवन में योग को सम्मिलित करने के लिए आवश्यक है कि हम कर्म योग का अभ्यास करें, जैसा कि श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में बताया है। भगवद्गीता में योग की परिभाषा दी गई है- 'योगः कर्मसु कौशलम् (2.50)' अर्थात 'योग कर्मों में कुशलता'। इसका अर्थ है कि हमें अपने कार्यों को शांति और एकाग्रता के साथ करना चाहिए जिससे सर्वोत्तम परिणाम प्राप्त कर सकें।

खो-खो के खिलाड़ियों के बारे में सोचिए। वे केवल दौड़ तीव्र नहीं रहे होते, अपितु खेल के सबसे तनावपूर्ण क्षणों में भी शांत और एकाग्रचित्त रहते हैं। हम सबके लिए यही एक शिक्षा है। चाहे हम पढ़ाई कर रहे हों, खेल रहे हों या कोई नई कला सीख रहे हों, केवल कड़ी मेहनत और तनाव लेना ही पर्याप्त नहीं है। मुख्य बात है शांत रहना, ध्यान केंद्रित करना और प्रक्रिया का आनंद लेना।

श्री अरबिंदो ने कहा है कि योग शारीरिक, प्राणिक, मानसिक, बौद्धिक (भावनात्मक) और आध्यात्मिक स्तरों पर सम्पूर्ण व्यक्तित्व विकास का माध्यम है। योग द्वारा साधक के जीवन के सभी पक्षों का विकास होता है।

एक बड़े वृक्ष की कल्पना कीजिए, उसके सशक्त स्वस्थ और सुदृढ़ होने के लिए आवश्यक है, उसकी सभी इकाइयाँ - जड़, तना, शाखा और पत्तियाँ आदि साथ-साथ विकसित हों। इसी प्रकार हमें अपने जीवन के सभी क्षेत्रों में बढ़ना चाहिए, जिससे संतुलित और सर्वांगीण विकास हो सके।

हम विभिन्न क्षेत्रों में कैसे विकसित हों और समग्र विकास के लक्ष्य को कैसे प्राप्त करें?

योग हमें हमारे शरीर, मन और आत्मा के बीच संबंध को समझने में सहायता करता है। इसी प्रकार तैत्तिरीय उपनिषद में वर्णित पंचकोश हमारे अस्तित्व के पाँच आवरणों (जैसे प्याज की परतें) के बारे में बताता है। ये पाँच आवरण हैं- शरीर, ऊर्जा, मन, ज्ञान और आनंद। विभिन्न योग तकनीकों की विधियाँ इन परतों को पोषित करने में सहायता करती हैं और हमारे संपूर्ण स्वास्थ्य को बढ़ाती हैं।



आइए, प्रत्येक कोश और उसके समग्र विकास में योगदान को समझें। पंचकोश चित्र हमें स्वयं को अच्छे से जानने में सहायता करता है। यह हमें हमारे आंतरिक और बाह्य संसार दोनों की समझ देता है, जिससे हम अधिक आत्म-जागरूक, समानुभूतिपूर्ण और उद्देश्यपूर्ण बन पाते हैं।

Screenshot 2026-01-08 154151 1. अन्नमय कोश (भौतिक शरीर का आवरण)

यह सबसे बाहरी परत है, जो हमारा भौतिक शरीर है- जिसे हम देख सकते हैं, छू सकते हैं और अनुभव कर सकते हैं। यह हमारे द्वारा खाए गए भोजन से निर्मित होता है। खेल-कूद करना, दौड़ना, पौष्टिक आहार करना, समय-समय पर उपवास करना, प्रकृति के साथ रहना और अच्छी नींद लेना- ये सभी हमें स्वस्थ बनाए रखने की पद्धतियाँ हैं। योगासन का अभ्यास हमारे शरीर को स्वस्थ, सुदृढ़ और संतुलित बनाने में सहायता करता है। जिस प्रकार एक पौधे को बढ़ने के लिए जल और सूर्य के प्रकाश की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार हमारे शरीर को स्वस्थ रहने के लिए आहार, व्यायाम और विश्राम की आवश्यकता होती है।

2. प्राणमय कोश (ऊर्जा का आवरण)

हमारे शरीर में कई परतें होती हैं, भौतिक शरीर के आवरण के बाद के आवरण को प्राणमय कोश कहते हैं। यह आवरण प्राण से संचालित होता है अर्थात जीवन ऊर्जा, जिसे हम श्वास-प्रश्वास के माध्यम से प्राप्त करते हैं। प्राण हमारे भीतर बहने वाली ऊर्जा की अदृश्य नदियों की भाँति है, जो हमारे फेफड़ों, हृदय और अन्य सभी अंगों को मिलकर कार्य करने में सहायता करता है। हम आहार प्राणायाम, मुद्रा और क्रिया जैसे विशेष अभ्यासों के माध्यम से अपने प्राण को सशक्त बना सकते हैं, जिससे हम अधिक स्वस्थ और ऊर्जावान अनुभव करते हैं।

3. मनोमय कोश (मन का आवरण)

यह आवरण हमारे विचारों, भावनाओं और धारणाओं से संबंधित है। यही वह स्थान है, जहाँ से हमारी इच्छाएँ और भावनाएँ उत्पन्न होती हैं। इसमें यह सम्मिलित है कि हम क्या सोचते हैं, क्या अनुभव करते हैं और परिस्थितियों पर कैसी प्रतिक्रिया देते हैं। ध्यान, मंत्र-जप, संगीत सुनना, गीत गाना, चित्रकला करना और त्राटक (किसी बिंदु पर एकाग्र होकर देखना) जैसी गतिविधियाँ इस आवरण को शुद्ध और परिष्कृत बनाती हैं। एक शांत मन हमें समस्याओं का समाधान करने, कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने और चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करने में सहायता करता है। जब हम प्रसन्न या दुखी होते हैं, तो यह हमारा मनोमय कोश ही है, जो उन भावनाओं को अनुभव करता है।

4. विज्ञानमय कोश (ज्ञान या बुद्धि का आवरण)

यह आवरण हमें सही और गलत, शुभ और अशुभ में भेद करना सिखाता है। यह निर्णय लेने, ज्ञान, बुद्धि और समझ के लिए उत्तरदायी है। इस कोश से प्राप्त ज्ञान और विवेक हमें सही निर्णय लेने में सहायता करता है। इससे हम अच्छे विद्यार्थी, मित्र, परिवार के सदस्य और राष्ट्र के उत्तरदायी नागरिक बनते हैं। यह हमें अपनी शक्ति और दुर्बलता को समझने तथा जीवन का उद्देश्य खोजने में भी सहायता करता है। जब हम विद्यालय में कुछ नया सीखते हैं या सही और गलत का अंतर समझते हैं, तब हमारा विज्ञानमय कोश सक्रिय होता है। इसे जीवन का पथ-प्रदर्शक भी कहा जा सकता है।

5. आनंदमय कोश (आनंद का आवरण)

यह आंतरिक आवरण शुद्ध आनंद या परम सुख का स्रोत है। सोचिए, जब आप प्रकृति की गोद में शांति से बैठते हैं, अपनी रुचि का अनुसरण करते हैं, गीत गाते या सुनते हैं, पालतू पशु के साथ खेलते हैं, दूसरों की सहायता करते हैं या समाज के लिए कुछ योगदान करते हैं तो जिस शांति और संतोष की अनुभूति होती है, वह आनंदमय कोश से आती है।

पाँचों कोशों को समझने से हमें यह पता चलता है कि हम कितनी गहराई से एक-दूसरे और प्रकृति से जुड़े हुए हैं। योग एक ऐसा साधन है, जो इन सभी आवरणों (कोशों) को पोषित और संतुलित करता है। प्रतिदिन योग का अभ्यास करने से हम विद्यालय में अपना ध्यान केंद्रित कर सकते हैं, खेलों में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकते हैं, अपनी रुचियों का आनंद ले सकते हैं, संगीत या कला सीखने में प्रगति कर सकते हैं और इस प्रकार अपने जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी पूर्ण क्षमता तक पहुँच सकते हैं।

सर्वांगीण और समग्र विकास प्राप्त करने के लिए हमें अभ्यास की एक व्यवस्थित पद्धति का पालन करना चाहिए। महर्षि पतंजलि ने इस प्रक्रिया को अष्टांग योग का नाम दिया है।

यम सामाजिक अनुशासन और नैतिकता
नियम व्यक्तिगत अनुशासन
आसन शारीरिक मुद्राएँ या स्थितियाँ
प्राणायाम श्वास-प्रश्वास पर नियंत्रण
प्रत्याहार इंद्रियों पर नियंत्रण
धारणा मन पर नियंत्रण
ध्यान एकाग्रता
समाधि आनंद और शांति की अवस्था

गतिविधि

पंचकोश को सुदृढ़ बनाने के लिए दैनिक योग योजना

अपनी दैनिक योग योजना बनाइए-

1.अन्नमय कोश - एक योगासन लिखिए, उसका आप प्रतिदिन अभ्यास कीजिए।

................

2.प्राणमय कोश - एक प्राणायाम चुनिए, उसका आप प्रतिदिन अभ्यास कीजिए।

..................

3.मनोमय कोश- जाप, मंत्र उच्चारण या त्राटक जैसी सरल ध्यान क्रियाओं की सूची बनाइए, जिसका अभ्यास आप शांत और एकाग्र रहने के लिए करना चाहते हैं।

..................

4.विज्ञानमय कोश-

(क)भविष्य में स्वयं की कल्पना कीजिए। आप किस तरह के व्यक्ति बनना चाहते हैं और कौन-से कौशल, नैतिक मूल्य और गुण आपको वहाँ पहुँचाने में सहायक हैं?

(ख)इस प्रकार का व्यक्ति बनने के लिए आप आज कौन-से छोटे-छोटे अभ्यास करते हैं?

5.आनंदमय कोश- आपको आनंद कब मिलता है? पक्षियों की ध्वनि सुनने से, मित्रों के साथ समय बिताने से, अपने प्रियजनों की सहायता करने से, पालतू जानवरों के साथ खेलने से और अपनी वस्तुओं को साझा करने से आदि। उन गतिविधियों का एक संग्रह तैयार कीजिए, जो आपको आनंद देती हैं।


शिक्षकों के लिए सुझाव

•विद्यार्थियों को समझाएँ कि योगासन, प्राणायाम और ध्यान के माध्यम से पंचकोश को कैसे पोषित और संतुलित कर सकते हैं।

यम और नियम

यम और नियम संपूर्ण जीवन के लिए एक संतुलित बनाने और स्वर्णिम नियम हैं, जैसे हम विद्यालय में नियमों का पालन करते हैं, वैसे ही ये सुझावात्मक दिशा-निर्देश व्यक्तिगत विकास और सौहार्दपूर्ण संबंधों को बढ़ावा देते हैं। यम उन नैतिक सिद्धांतों की ओर संकेत करता है, जो दूसरों के साथ हमारे व्यवहार का मार्गदर्शन करते हैं और हमें अधिक दयालु, संवेदनशील ईमानदार और उत्तरदायी मनुष्य बनाते हैं।


योग - 4
योग - 5
पाँच यम

1. अहिंसा - सभी जीवों के प्रति दयालु और संवेदनशील होना।

2. सत्य- सदैव सच बोलना और ईमानदार रहना।

3. अस्तेय - दूसरों की वस्तुएँ चोरी न करना।

4. ब्रह्मचर्य आत्म-संयम रखना।

5. अपरिग्रह- लालच न करना, आवश्वकता से अधिक दान स्वीकार न करना और संग्रह न करना।

नियम

नियम व्यक्तिगत आदतें हैं, जो हमें अपना ध्यान रखने में सहायता करती हैं और हमें श्रेष्ठ मनुष्य बनाती हैं। नियमों का पालन करके हम अपनी दुर्बलताओं पर विजय प्राप्त कर सकते हैं।

पाँच नियम

1. शौच - स्वच्छता

2. संतोष - जो हमारे पास है, उसमें प्रसन्न और संतुष्ट रहना।

3. तप- आत्म-अनुशासन और लक्ष्य प्राप्ति का दृढ़-संकल्प।

4. स्वाध्याय- स्व का अध्ययन।

5. ईश्वर प्रणिधान - ईश्वर के प्रति समर्पण।

आइए, इस कक्षा में, ईश्वर प्रणिधान के बारे में जानें। नियमों में से एक, यह हमारे अंदर की दिव्यता को पहचानने और उसके प्रति समर्पण करने के विषय में है।

ईश्वर प्रणिधान का संबंध हमारे शरीर को एक मंदिर के रूप में देखने और अपने भीतर की दिव्यता को अपना सब कुछ अर्पित करने से है। हमारी इंद्रियाँ, कर्म, श्वास और यहाँ तक कि हमारी प्रसन्नता भी इस समर्पण का अंग है। यह हमारे अंदर और हमारे आस-पास की पवित्रता को पहचानने और उसके प्रति कृतज्ञ होने से संबंधित है।

सभी में दिव्यता

हम सामान्यतः सोचते हैं कि पूजा स्थल और प्रार्थना कक्ष पवित्र हैं। लेकिन योग हमें सिखाता है कि सब कुछ पवित्र है। प्रणिधान का अर्थ है प्रत्येक वस्तु में दिव्यता को देखना - प्रकृति, मित्र, परिवार और यहाँ तक कि दैनिक कार्य में भी। नीचे दी गई कहानी हमें सभी में दिव्यता ढूँढ़ने का संदेश देती है।

याग - 6
योग - 7
एकत्व की यात्रा

गुरु नानक एक महान आध्यात्मिक गुरु थे। वे मानते थे कि ईश्वर सर्वत्र विद्यमान है। एक दिन वे एक पवित्र नगरी की तीर्थयात्रा पर थे। वे यात्रा से थककर विश्राम के लिए लेट गए। एक भक्त ने गुरु नानक को देखा और चिंतित हुआ।

उसने कहा, “आपके चरण हमारे पवित्र पूजा स्थल की ओर हैं। यह अनादर है।” गुरु नानक ने विनम्रतापूर्वक उस भक्त से कहा कि वह उनके चरण उस ओर कर दे, जहाँ कोई पवित्र स्थान न हो।

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भक्त ने नानक के चरणों को जिस भी दिशा में ले जाना चाहा, उन्हें उस ओर पूजा स्थल ही दिखाई दिया। तब भक्त ने गुरु नानक की दिव्यता को पहचाना और उनसे क्षमा-याचना की।

यह कहानी हमें दिखाती है कि गुरु नानक के लिए प्रत्येक स्थान दिव्य था। उनका मानना था कि ईश्वर सभी दिशाओं, स्थानों और सृष्टि में सभी जगह विद्यमान है।

गतिविधि

विभिन्न समुदायों की अलग-अलग मान्यताएँ और परंपराएँ होती हैं। कुछ उदाहरण दीजिए, कि लोग किस तरह अनुष्ठान करते हैं और उनके कार्यों के पीछे के कारण बताइए। उदाहरण के लिए, पृथ्वी को भोजन के लिए धन्यवाद देने के लिए फसल उत्सव मनाए जाते हैं। ऐसे उत्सव यह दर्शाते हैं कि पृथ्वी जीवित है और हमारे सम्मान की पात्र है।


शिक्षकों के लिए सुझाव

•विद्यार्थियों को प्रकृति की सैर करने के लिए प्रोत्साहित कीजिए। उन्हें अपने आस-पास की सुंदर वस्तुओं पर ध्यान देने दें और समझने दें कि सब कुछ एकसाथ मिलकर कैसे काम करता है। उदाहरण के लिए, एक पेड़ जिस पर पक्षी और छोटे जानवर हों।

•विद्यार्थी एक कृतज्ञता पत्रिका रख सकते हैं। उन्हें प्रत्येक दिन पाँच या उससे अधिक वस्तुओं की सूची बनाने दीजिए, जिनके लिए वे आभारी हैं।



अध्याय 2
योग साधना

नमस्ते युवा योग साधको,

आइए, योग साधना में थोड़े और गहरे उतरें।

पिछले अध्याय में हमने यम और नियम के बारे में सीखा।

शारीरिक मुद्राएँ (स्थितियाँ), प्राणायाम (श्वास-प्रश्वास पर नियंत्रण), प्रत्याहार (इंद्रियों पर नियंत्रण), धारणा (एकाग्रता का प्रयास) और ध्यान सीखें और उनका अभ्यास करें। हम श्वास प्रश्वास की अन्य क्रियाएँ, सूक्ष्म व्यायाम, शीतलीकरण और क्रीड़ा योग भी सीखेंगे और उनका अभ्यास करेंगे। अभ्यास में प्रगति के लिए विद्यालय में शिक्षक के मार्गदर्शन में इन अभ्यासों को सीखना और घर पर प्रतिदिन स्वयं अभ्यास करना महत्वपूर्ण है। इनका नियमित अभ्यास (साधना) हमें अधिक सशक्त, एकाग्र, लचीला और शांत बनाते हैं। इनके अभ्यास से हम अपनी एकाग्रता में वृद्धि कर सकते हैं तथा पढ़ाई, खेलकूद और अन्य महत्वपूर्ण कार्यों के दौरान शांत रह सकते हैं।

योग का उद्देश्य अच्छा अनुभव करना है। अभ्यास करते समय सदैव अपने शरीर की सुनिए तथा योग के सामान्य निर्देशों का पालन कीजिए।

योगाभ्यास के लिए सामान्य दिशा-निर्देश

1. सामान्य श्वास लें- गहरी श्वास लेते समय अपनी श्वास को रोककर रखने में बल प्रयोग न करें। अपनी नाक से सामान्य रूप से श्वास लीजिए।

2. जागरूक रहें- अभ्यास करते समय अपनी श्वास, मांसपेशियों के खिंचाव और विश्राम पर ध्यान दीजिए।

3. एकाग्रचित्त रहिए- अपने शिक्षक को ध्यान से देखिए और निर्देशों का पालन कीजिए। अपनी शारीरिक मुद्रा पर ध्यान दीजिए।

4. यदि अस्वस्थ हों तो आराम कीजिए- आपको अस्वस्थता का अनुभव हो (सर्दी-खांसी, सिर दर्द, पेट दर्द, आदि) तो आराम कीजिए और अपने शिक्षक से मार्गदर्शन लीजिए।

आसनों के अभ्यास के लिए दिशा-निर्देश

1.सूक्ष्म व्यायाम और शीतलीकरण व्यायाम कीजिए- सूक्ष्म व्यायाम और शीतलीकरण व्यायाम जैसे अभ्यासों से आरंभ कीजिए।

2.खाली पेट अभ्यास कीजिए- सबसे अच्छा समय सुबह खाली पेट होता है। भोजन के 2-3 घंटे के बाद अभ्यास कीजिए।

3.श्वसन- गहरी और धीमी गति से अपने नाक से स्वाभाविक रूप से श्वास लीजिए।

4.योगाभ्यास के अनुकूल वस्त्र पहनिए- ढीले, आरामदायक वस्त्र चुनिए और जूते-मोजे के बिना अभ्यास कीजिए।

5.बल प्रयोग से बचिए- अपने शरीर की क्षमता के प्रति जागरूक रहें। यदि किसी आसन के अभ्यास में कष्ट होने पर धीरे से पूर्व स्थिति में आ जाइए। पूर्ण स्थिति के लिए स्वयं से थोड़ा प्रयास कीजिए, बाह्य बल का प्रयोग न कीजिए।

6.शरीर की सही स्थिति - शरीर की सही स्थिति महत्वपूर्ण है। अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए अपने आसन पर ध्यान दीजिए।

7.शांत और एकाग्र रहिए- अभ्यास के समय बात करने से बचें। प्रत्येक आसन और अपने शरीर की स्थिति पर ध्यान केंद्रित कीजिए।

8. शीतलीकरण आसन में विश्राम कीजिए- आसनों के पश्चात शरीर को आराम देने के लिए शवासन या किसी अन्य विश्रामात्मक आसन में आराम कीजिए।

9. नियमित अभ्यास कीजिए- नियमित अभ्यास कभी-कभी के अभ्यास करने से श्रेष्ठ है। प्रतिदिन थोड़ा अभ्यास करने का प्रयास कीजिए।

प्राणायाम के अभ्यास के लिए दिशा-निर्देश

1. स्वाभाविक रूप से श्वास लीजिए- हमेशा अपनी नाक से श्वास लीजिए। प्राणायाम में श्वास-प्रश्वास स्वाभाविक और सहज होना चाहिए। यदि आपको चक्कर आ रहे हों, तो रुकिए और शिक्षक को सूचित कीजिए।

2. आराम से बैठिए - अपनी पीठ सीधी और हाथों को घुटनों पर रखकर बैठिए।

3. अभ्यास के समय को धीरे-धीरे बढ़ाइए- अभ्यास के समय को कुछ मिनटों से शुरू कीजिए और धीरे-धीरे बढ़ाइए।

योग - 9 4. अस्वस्थ अनुभव करने पर शिक्षक से परामर्श लीजिए-

यदि आपको अस्थमा जैसी श्वसन संबंधी समस्याएँ हैं या आप अस्वस्थ अनुभव कर रहे हैं तो प्राणायाम का अभ्यास करने से पहले शिक्षक से परामर्श लीजिए।

याद रखिए, योगाभ्यास क्रमिक प्रगति से संबंधित है। अभ्यास करते रहिए और देखिए कि यह आपको कैसे बदलता है।

सूक्ष्म व्यायाम

सूक्ष्म व्यायाम सरल व्यायामों की एक श्रृंखला है, जो जोड़ों को ढीला करने, तनाव मुक्त करने और लचीलेपन व शक्ति में सुधार करने के लिए तैयार की गई है। 'सूक्ष्म व्यायाम' शब्द संस्कृत से आया है, जहाँ 'सूक्ष्म' का अर्थ है लघु या छोटा और 'व्यायाम' का अर्थ है शारीरिक गतिविधि। ये व्यायाम सरल होने के कारण योग के नए अभ्यासियों के लिए भी सरल हैं और योगभ्यास का आरंभ करने वाले नए लोगों के लिए सुलभ हैं। इन्हें बैठकर या खड़े होकर किया जा सकता है।

प्रत्येक गति को श्वास के साथ मिलाकर किया जाना चाहिए, जिससे पूरे शरीर में प्राण ऊर्जा का प्रवाह बढ़े। यह जोड़ों में ऊर्जा के अवरोधों को दूर करने में सहायता करता है और समन्वय, आत्म-जागरूकता और आरोग्य में सुधार करता है। अभ्यासों का यह समूह गहन विश्राम को बढ़ावा देता है और शरीर और मन को योगासन के अभ्यास के लिए तत्पर करता है।

आइए, इस कक्षा में अँगुलियों, कलाइयों, कोहनियों, कंधों और गर्दन के लिए सूक्ष्म व्यायाम सीखते हैं।

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अभ्यास 1- अँगुलियाँ को सशक्त करने के लिए सूक्ष्म व्यायाम - (अँगुली शक्ति विकासक)

अभ्यास 2- कलाई को सशक्त करना (मणिबंध शक्ति विकासक)

अभ्यास 3- कलाई के जोड़ को दक्षिणावर्त और वामावर्त घुमाना (मणिबंध चक्र)

अभ्यास 4– कोहनियों को सशक्त करना (कोहनी शक्ति विकासक)

अभ्यास 5- कंधे के जोड़ को सशक्त करना (स्कंध चक्र)

उपरोक्त अभ्यासों को चरणबद्ध विधियों से करने के लिए सामान्य दिशा-निर्देश नीचे दिए गए निर्देश सभी सूक्ष्म व्यायाम अभ्यासों के चरणों की रूपरेखा प्रस्तुत करते हैं। अन्य सभी अभ्यासों के लिए भी इन्हीं चरणों का पालन किया जाना चाहिए।



1. अँगुलियाँ को सशक्त करने के लिए सूक्ष्म व्यायाम - (अँगुली शक्ति विकासक)

स्थिति - वज्रासन या सुखासन

चरण 1- दोनों हाथों को शरीर के सामने की ओर कंधे के स्तर तक उठाएँगे।

चरण 2- श्वास लेते हुए दोनों हाथों की अँगुलियों को फैलाएँगे।

चरण 3- श्वास छोड़ते हुए अपनी अँगुलियों को दबाएँ और अँगूठे को अंदर की ओर रखते हुए मुट्ठी बनाइए। इस प्रकार एक चक्र पूरा होता है (अभ्यास को 10 बार दोहराएँ)।

चरण 4-अभ्यास की समाप्ति पर हाथों को अपनी जंघाओं पर रखिए और वज्रासन में आराम कीजिए।

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शिक्षकों के लिए सुझाव

•विद्यार्थियों को जागरूकता और सही लय के साथ अभ्यास करने के लिए प्रोत्साहित कीजिए।

•जब विद्यार्थी इन अभ्यासों में निपुण हो जाए तो अन्य प्रकार के अभ्यासों को करवाया जा सकता है।

•अन्य सूक्ष्म व्यायाम के लिए कक्षा 4 व कक्षा 6 की पुस्तक देखिए।



योग - 10

शीतलीकरण व्यायाम

शीतलीकरण व्यायाम, शरीर की मांसपेशियों को ढीला करने वाले व्यायामों के एक समूह को कहते हैं, जो लचीलेपन, सहनशक्ति और शक्ति में वृद्धि के माध्यम से शरीर को गहन योग अभ्यासों के लिए एक ठोस आधार प्रदान करते हैं। ये व्यायाम शरीर के विभिन्न मांसपेशी समूहों को बार-बार खींचकर और शिथिल करके रीढ़ की हड्डी में लचीलापन विकसित करने के लिए बनाए गए हैं। ये जोड़ों की गतिशीलता और रक्त संचार को भी बढ़ाते हैं। शीतलीकरण व्यायाम का अभ्यास प्राय: योग सत्र के आरंभ में किया जाता है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि रीढ़ की हड्डी और बड़ी मांसपेशियाँ आसनों के लिए अच्छी तरह से तैयार हो गए हैं।

आइए, इस कक्षा में निम्नलिखित शीतलीकरण अभ्यास सीखें -

1.आगे, पीछे और बगल की ओर झुकना - रीढ़ की हड्डी के क्षेत्र की गतिशीलता बढ़ती है और लचीलेपन में सुधार होता है।

2.रीढ़ की हड्डी को मोड़ना - रीढ़ की हड्डी को खिंचाव और आराम देने के लिए सहजता से मोड़िए।

अभ्यास 1
आगे-पीछे झुकना
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शीतलीकरण के अभ्यास के लिए सामान्य दिशा-निर्देश

आगे दिए गए निर्देशों में सभी शीतलीकरण व्यायाम अभ्यासों के चरणों की रूपरेखा प्रस्तुत की गई है। अन्य सभी अभ्यासों के लिए भी इन्हीं चरणों का पालन करना चाहिए।

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स्थिति में आइए

चरण 1- अपने पैरों में परस्पर थोड़ा सा अंतर रखिए। श्वास लेते हुए पीछे की ओर झुकिए।

चरण 2- श्वास छोड़ते हुए आगे की ओर झुकिए और अपने हाथों को घुमाइए। इस अभ्यास को 10 बार दोहराइए। ध्यान रहे कि आपके घुटने न मुड़ें। ताड़ासन में विश्राम कीजिए।



शिक्षकों के लिए सुझाव

•विद्यार्थियों को जागरूकता और सही श्वास-पद्धति के साथ अभ्यास करने के लिए प्रोत्साहित कीजिए।

•एक बार जब विद्यार्थी इन अभ्यासों में निपुण हो जाए तो अन्य प्रकार के अभ्यासों को करवाया जा सकता है।



सूर्य नमस्कार

आइए, इस कक्षा में यह सीखें कि सूर्य नमस्कार के अभ्यास द्वारा अपने शरीर और मन को कैसे स्वस्थ, शक्तिशाली और ऊर्जावान बनाएँ।

पृथ्वी पर जीवन के लिए सूर्य का होना महत्वपूर्ण है। यह हमें प्रकाश और ऊष्मा प्रदान करता है, जो पौधों के विकास और हमारे जीवन के लिए आवश्यक है। यह विटामिन डी का भी एक प्रमुख स्रोत है, जो हमारे शरीर को शक्तिशाली और स्वस्थ रखने में सहायता करता है। कई संस्कृतियों में सूर्य को शक्ति और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। हम सूर्य की जीवनदायिनी ऊर्जा की सराहना और उसकी शक्ति का सम्मान करके उसके प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं।

सूर्य नमस्कार, योगासनों की एक श्रृंखला है, जिसे क्रमबद्ध रूप से किया जाता है। यह सूर्य का अभिवादन करने और दिन का आरंभ सकारात्मकता के साथ करने का एक सर्वोत्तम विधि है। सूर्य नमस्कार में आसन, प्राणायाम और मंत्रों का समावेश होता है। यह शरीर और मन दोनों के लिए एक संपूर्ण अभ्यास है। यह कठिन योग अभ्यासों के लिए एक पूर्व तैयारी है, यह साधकों के सर्वांगीण विकास के लिए पूर्ण अभ्यास की तरह से कार्य करता है।

सूर्य नमस्कार के लाभ

1. मांसपेशियों को सशक्त करता है, लचीलेपन में वृद्धि करता है और हृदय के स्वास्थ्य को अधिक सुदृढ़ बनाता है।

2.पाचन और अन्य रासायनिक प्रक्रियाओं में सुधार करता है।

3.विभिन्न मांसपेशी समूहों को सक्रिय करता है तथा हाथों, पैरों और पीठ को शक्ति प्रदान करता है।

4.इसका अभ्यास धैर्य और सहनशक्ति को बढ़ाता है, साथ ही धावकों के लिए भी लाभदायक है।

5.अन्तः स्रावी ग्रंथियों के रस को प्रभावित करके बचपन से किशोरावस्था तक के परिवर्तन में सहायता करता है।

6. इसे श्वासों पर सजगता के साथ करने से तनाव व चिंता कम होती है। इसके साथ ही मानसिक स्पष्टता और एकाग्रता में वृद्धि होती है।

7. मनोदशा को सकारात्मक बनाता है और अवसाद की भावनाओं को कम करता है।

8. मन को शांत रखने में सहायता प्रदान करता है, आत्म-सम्मान और शैक्षणिक उपलब्धियों को बढ़ाता है।

सावधानियाँ

•गंभीर या दीर्घकालिक शारीरिक अस्वस्थता की स्थिति, हृदय संबंधी समस्या या शारीरिक और मानसिक थकान ग्रस्त विद्यार्थियों को इसके अभ्यास से बचना चाहिए।

चरण 1- प्रणामासन

आरंभिक प्रार्थना

नमस्कार मुद्रा बनाते हुए प्रार्थना कीजिए।

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हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्।

तत्त्वं पूषन्नपावृणु सत्यधर्माय दृष्टये॥




Hiranmayena Pātreņa Satyasyāpihitam Mukham

Tat Tvam Pūşannapāvṛņu Satyadharmāya Drştaye



प्रार्थना का अर्थ

'हे सूर्यदेव (पूषन), कृपया सत्य को अवरुद्ध करने वाले चमकीले सुनहरे आवरण को हटाइए, जिससे मैं सत्य का खोजी बन सकूँ, सत्य को देख सकूँ।' यह प्रार्थना ईशा उपनिषद से ली गई है।



चरण 2- हस्त उत्तानासन

•श्वास लेते हुए दोनों हाथों को सिर के ऊपर उठाएँ और कमर को जितना संभव हो सके, पीछे की ओर झुकाइए।

•दोनों हाथों के ऊपरी भाग को कानों के पास रहें।

•नाभि से सिर तक खिंचाव अनुभव कीजिए, साथ ही पीठ के ऊपरी भाग में भी दबाव अनुभव कीजिए।

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चरण 3- पाद हस्तासन

•श्वास छोड़ते हुए धीरे-धीरे आगे की ओर झुकिए और हाथों को पैरों के पास रखिए।

•पेट को जंघाओं से स्पर्श कराते हुए, माथे को घुटनों से स्पर्श कराइए।

•अभ्यास के आरंभ में आगे की ओर झुकना और माथे को घुटने से स्पर्श कराना कठिन हो सकता है, लेकिन निरंतर अभ्यास से यह सरल हो जाता है।

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चरण 4- अश्व संचालनासन

•श्वास लेते हुए घुटनों को थोड़ा मोड़िए और दाएँ पैर को पीछे की ओर खींचिए।

•अपने दाएँ घुटने और पंजों को भूमि पर रखिए।

•बाएँ पैर को मोड़िए और छाती को उस पर टिकाइए।

•बाएँ पैर को इस तरह रखिए कि पंजे से घुटने तक का क्षेत्र भूमि से लंबवत (90°) हो।

•रीढ़ की हड्डी को नीचे कीजिए, छाती और वक्षीय क्षेत्र को मोड़िए और ऊपर देखिए।

•बाएँ पैर और हथेलियाँ एक सीधी रेखा में होनी चाहिए।

Screenshot 2026-01-09 102034 चरण 5- दंडासन

• श्वास छोड़ते हुए बाएँ पैर को पीछे ले जाइए और पूरे शरीर को एक सीधी रेखा की स्थिति में लाइए। अपनी भुजाओं को भूमि के लंबवत रखिए।

• अंतिम स्थिति में शरीर एक तिरछे दंड की तरह दिखाई देता है।

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•चरण 6- अष्टांग नमस्कार

• श्‍वास लेते और छोड़ते हु ए माथे, छाती, हथेलियों और घटुनों को भमिू पर इस प्रकार रखिए कि शरीर के आठ अं ग (माथा, छाती, दो हथेलियाँ, दो घटुने और दो पैर के अँगू ठे) भमिू को छुएँ।

• पेट को भूमि से ऊपर रखें।

• कूल्हों को थोड़ा ऊपर उठाइए। श्वास को रोककर रखिए और यथासंभव लंबे समय तक, सहजता और आराम से इस स्थिति में रहिए।

• आरंभ में यह कठिनाई का अनुभव हो सकता है, अभ्यास से यह सहज हो जाएगा।

• नए अभ्यासी को यह आसन थोड़ा कठिन लग सकता है, लेकिन नियमित अभ्यास से इस आसन में सहजता आ जाएगी।

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चरण 7- भुजंगासन

• श्वास लेते हुए धीरे-धीरे शरीर को ऊपर और सिर को छत की ओर उठाइए।

• रीढ़ की हड्डी को मोड़िए।

• जाँघों और पैरों को भूमि पर रखिए और बाजुओं से धड़ को सहारा दीजिए।

Screenshot 2026-01-09 103440 चरण 8- पर्वतासन

• श्वास छोड़ते हुए कमर को ऊपर उठाइए।

• हथेलियों और पैरों को भूमि पर रखते हुए सिर को भूमि की ओर ले जाइए।

• शरीर का पूरा भार हथेलियों और पैरों के बीच समान रूप से वितरित होना चाहिए।

• निरंतर अभ्यास से आप सिर से भूमि को छू पाएँगे।

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चरण 9- अश्व संचालनासन

• श्वास भरते हुए दाएँ पैर को हथेलियों के बीच लाइए।

• अपने बाएँ घुटने और पंजों को भूमि पर रखिए।

• दाएँ पैर को मोड़िए और छाती को उस पर टिकाइए।

• अपने बाएँ घुटने और पंजों को भूमि पर रखिए।

• दाएँ पैर को इस तरह रखिए कि पैर के अँगूठे से घुटने तक का क्षेत्र भूमि के लंबवत (90°) हो।

• रीढ़ को नीचे कीजिए, छाती और वक्षीय क्षेत्र को मोड़िए और ऊपर देखिए।

• बाएँ पैर और हथेलियाँ एक सीधी रेखा में होनी चाहिए।

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चरण 10- पादहस्तासन

• श्वास छोड़ते हुए धीरे-धीरे आगे की ओर झुकिए और हाथों को पैरों के पास रखिए।

• माथे को घुटनों से और पेट को जाँघों पर टिकाइए।

• आरंभ में आगे की ओर झुकना और माथे से घुटनों को छूना कठिन हो सकता है, लेकिन लगातार अभ्यास से यह सहज हो जाता है।

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चरण 11- हस्तोत्तान आसन

• श्वास लेते हुए दोनों हाथों को सिर के ऊपर उठाइए और कमर को जितना संभव हो सके, पीछे की ओर झुकाइए।

• दोनों हाथों के ऊपरी भाग को कानों से स्पर्श कराइए।

• नाभि से सिर तक खिंचाव अनुभव कीजिए, साथ ही पीठ पर भी दवाब अनुभव कीजिए।

• चेहरे पर मुस्कान रखें।

Screenshot 2026-01-09 110736 चरण 12- प्रणामासन
धीरे-धीरे चरण 1 पर जाइए। Screenshot 2026-01-09 110806

शिक्षकों के लिए सुझाव • सुनिश्चित कीजिए कि विद्यार्थी इस अभ्यास को सहजता से और बिना किसी झटके के करें।

अध्याय 3
आसन

आसन अष्टांग योग का तीसरा अंग है। आसन शब्द का अर्थ है आरामदायक स्थिति। योग में आसन विशिष्ट शारीरिक स्थितियाँ हैं जो शक्ति, लचीलापन और संतुलन में सुधार के लिए बनाई की गई हैं। आसन केवल व्यायाम नहीं हैं, अपितु एक समग्र जीवनशैली का अंग हैं। नियमित रूप से योग स्थितियों का अभ्यास करने से आपके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।

योग के अनुसार दुनिया में जितने जीव हैं उतनी ही योग की स्थितियाँ हैं। ये स्थितियाँ प्रायः साँप, पक्षी और मछली जैसे प्राणियों और वृक्षों से प्रेरित हैं या उनसे मिलती-जुलती होती हैं।

हठ योग, योग का एक लोकप्रिय मार्ग है। इसमें शारीरिक स्थितियों का वर्णन विशेष रूप से मिलता है। इसमें 32 विशेष स्थितियों पर प्रकाश डाला गया है जो संतुलन के सुधार और आपके शरीर की ऊर्जा के सुचारु प्रवाह में सहायक एवं आपको स्वस्थ रखने में सहायक मानी जाती हैं।

इस कक्षा में हम निम्नलिखित आसन सीखेंगे-

• खड़े होकर- उत्कटासन
•बैठकर- गोमुखासन
• पेट के बल- सरल धनुरासन
•पीठ के बल- सर्वांगासन और मत्स्यासन

प्रत्येक आसन को शिक्षक के मार्गदर्शन में और दिए गए चरणों के अनुसार कीजिए।

योग - 13
उत्कटासन

क्या आप काल्पनिक कुर्सी पर बैठना चाहते हैं? तो आइए, उत्कटासन के बारे में जानते हैं। उत्कटासन का अर्थ है पैरों को अतिरिक्त बल देने वाला आसन। यह आसन संतुलन प्रदान करने वाले आसन समूह से संबंधित है और जंघाओं की मांसपेशियों को शक्ति प्रदान करता है।

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स्थिति में आइए

चरण 1- श्वास लेते हुए, दोनों हाथों को इस प्रकार ऊपर उठाइए कि वे कानों को छुएँ। दोनों हाथों को एक-दूसरे के समानांतर रखिए।

चरण 2- श्वास छोड़ते हुए घुटनों को मोड़िए और कूल्हों को तब तक नीचे कीजिए, जब तक शरीर कुर्सी के आकार का न हो जाए। सामान्य श्वास लेते हुए 10 तक गिनने तक इसी स्थिति में रहिए।

चरण 3- श्वास लेते हुए घुटनों को सीधा कीजिए और वापस खड़े हो जाइए।

चरण 4- श्वास छोड़ते हुए हाथों को पार्श्व में ले आइए। विश्रांति


लाभ

• उत्कटासन टखनों, जाँघों, पिंडलियों की मांसपेशियों और रीढ़ को सशक्त और स्थिर करता है।

• यह कंधों और छाती को भी खिंचाव प्रदान करता है, जिससे श्वसन क्रिया सहज हो जाती है।

• यह आसन एकाग्रता में सुधार करता है।

सावधानियाँ - घुटने के दर्द, टखने में मोच एवं स्नायु की चोट वाले विद्यार्थियों को इस आसन से बचना चाहिए।

शिक्षकों के लिए सुझाव विद्यार्थियों को उत्कटासन में विविधता लाकर अभ्यास करने के लिए प्रोत्साहित कीजिए।

योग - 14

गोमुखासन

यह आसन गाय के मुख जैसा दिखता है। आइए, सीखें कि इस आसन को चरणबद्ध ढंग से कैसे करते हैं।

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स्थिति में आइए

चरण 1- श्वास लेते हुए बाएँ पैर को मोड़िए और बाएँ एड़ी को दाएँ कूल्हे के पास रखिए। फिर से श्वास लेते हुए दाएँ पैर को मोड़िए और दाएँ एड़ी को बाएँ कूल्हे के पास रखिए, दोनों घुटने एक सीध में हों और दायाँ घुटना ऊपर हो।

चरण 2- दोनों हाथों को बगल की ओर उठाइए और दाएँ हाथ को सिर के ऊपर ले जाकर कोहनी मोड़िए। साथ ही, बाएँ हाथ को पीठ के पीछे लाइए और दोनों हाथों की अँगुलियों को आपस में फँसा लीजिए। रीढ़ की हड्डी सीधी रखिए, सिर थोड़ा पीछे और आँखें बंद रखिए। इस स्थिति में सामान्य श्वास के साथ 10 गिनने तक रहिए।

चरण 3- श्वास लें और छोड़ें, हाथों को धीरे से छोड़ दीजिए।

चरण 4- श्वास छोड़िए और दाएँ पैर को छोड़ दीजिए, फिर श्वास छोड़ते हुए दूसरे पैर को छोड़ दीजिए और आराम कीजिए।

विश्रांति - इसी आसन को दाएँ ओर से दोहराएँ।



लाभ

• गोमुखासन शरीर की स्थिति में सुधार करता है और कंधों, गर्दन और पैरों की अकड़न को दूर करता है।

• यह टखनों, नितंबों, जंघाओं, कंधों, पीठ और छाती की मांसपेशियों को भी बलिष्ट करता है।

• यह श्वसन क्रिया को सुधारने में सहायता करता है।

• यह चिंता, तनाव और थकान को कम करने में सहायक है।

सावधानियाँ - जो घुटने व टखने की गंभीर समस्याओं से ग्रसित हैं, वे इन आसनों से बचें।


शिक्षकों के लिए सुझाव

• सुनिश्चित कीजिए कि विद्यार्थी आसन करने से पहले कंधे के जोड़ों से संबंधित सूक्ष्म व्यायाम करें, जिससे शरीर के लचीलेपन में सुधार हो सके।

• यदि विद्यार्थी कमर के पीछे हाथों को पकड़ने में असमर्थ हों तो वे हाथों को पकड़ने के लिए तौलिए या रुमाल का प्रयोग कर सकते हैं।



योग - 15
धनुरासन

क्या आप जानते हैं कि 'धनुर' का अर्थ धनुष होता है? यह स्थिति धनुष के आकार जैसी होती है, जिसमें पीठ का झुकाव धनुष जैसा होता है। इसलिए इसे धनुरासन कहा जाता है। आइए, चरणबद्ध ढंग से सीखें कि इस आसन को कैसे किया जाता है।

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स्थिति - पेट के बल लेटने की स्थिति

चरण1- श्वास लेते हुए दोनों पैरों को घुटनों से मोड़िए और दोनों हाथों से टखनों को पकड़िए, बाँहें सीधी रखिए। एड़ियों को कूल्हे के पास लाइए।

चरण 2- श्वास लेते हुए सिर और छाती को भूमि से जितना हो सके ऊपर उठाइए, सिर को थोड़ा पीछे की ओर झुकाइए, जिससे स्थिति धनुष जैसी बने। अपनी आँखें बंद रखिए और चेहरा तनावमुक्त रखिए। इस स्थिति में सामान्य श्वास लेते हुए 10 बार तक गिनिए।

चरण 3-श्वास छोड़ते हुए धीरे-धीरे जाँघों और सिर को भूमि पर टिकाइए।

चरण4- हाथों और पैरों को छोड़ दीजिए, फिर दोनों हाथों को हथेलियों को नीचे की ओर रखते हुए सिर के ऊपर ले जाइए। माथे को भूमि पर टिकाइए।

विश्रांति

लाभ

• धनुरासन रीढ़ की हड्डी के लचीलेपन में सुधार करता है और छाती एवं पीठ की मांसपेशियों को सशक्त करता है।

• यह श्वसन को भी सहज बनाता है।

• यह पाचन प्रक्रिया को बढ़ाता है।

सावधानियाँ - यदि टखने, कलाई या रीढ़ की हड्डी से संबंधित कोई चोट हो तो इस आसन के अभ्यास करने से बचिए।



शिक्षकों के लिए सुझाव • इस आसन को करने के बाद आगे की ओर झुकने वाले आसन करने चाहिए, जैसे पर्वतासन।



योग - 16 सर्वांगासन

'सर्व' का अर्थ है सभी, अंग का अर्थ है शरीर के अंग और आसन का अर्थ है स्थिति। जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, सर्वांगासन शरीर के सभी अंगों के कार्यप्रणाली को प्रभावित करता है,

इसीलिए इसे सभी आसनों में महत्वपूर्ण आसन कहा जाता है।

आइए, सीखें कि इस आसन को चरणबद्ध ढंग से कैसे करें-

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स्थिति में आइए

चरण 1- श्वास लेते हुए घुटनों को मोड़े बिना दोनों पैरों को 45 deg के कोण पर उठाइए।

चरण 2- श्वास लेते रहें और दोनों पैरों के 90 deg के कोण पर उठाइए।

चरण 3- श्वास छोड़ते हुए दोनों पैरों को पीछे की ओर ले जाइए, जब तक कि वे भूमि के समानांतर न हो जाएँ। हाथों को आगे की ओर भूमि पर रखिए।

चरण 4- श्वास लेते हुए धीरे-धीरे शरीर को ऊपर की ओर उठाइए और सुनिश्चित कीजिए कि ठुड्डी छाती को स्पर्श कर रही हो। सर्वांगासन की अंतिम स्थिति 'L' अक्षर के आकार जैसी होनी चाहिए। सामान्य श्वास लेते और 10 तक गिनती करते हुए इस स्थिति में रहिए।

चरण 5- श्वास छोड़ते हुए धीरे-धीरे दोनों पैरों को पीछे की ओर लाइए, जब तक कि वे भूमि के समानांतर न हो जाएँ।

चरण 6- श्वास लेते हुए दोनों पैरों को 90 deg के कोण पर वापस ले आएँगे।

चरण 7- श्वास छोड़ते हुए दोनों पैरों को नीचे 45 deg के कोण पर ले आइए।

चरण 8- श्वास छोड़ते रहें और धीरे से दोनों पैरों को भूमि पर रखिए।

विश्रांति - श्वासन
योग - 17 लाभ

• सर्वांगासन गर्दन के लचीलेपन में सुधार करता है और मस्तिष्क, आँखों, कानों और नाक में रक्त संचार को बढ़ाता है।

• यह पैरों, भुजाओं, कंधों को सशक्त बनाता है और रीढ़ की हड्डी को लचीला बनाए रखता है।

• यह थायरॉइड और पैराथायरॉइड ग्रंथियों को उत्तेजित करता है।

• यह गर्दन के लचीलेपन में सुधार करता है और मस्तिष्क, आँखों, कानों और टॉन्सिल में रक्त संचार को बढ़ाता है।

• यह आसन एकाग्रता, ध्यान एवं सोच की स्पष्टता को बढ़ाता है और मनोदशा को अधिक अच्छा बनाता है।

सावधानियाँ - यदि आपको श्वसन संबंधी विकार, गर्दन में चोट, रीढ़ की हड्डी में चोट, गंभीर नेत्र विकार जैसे उच्च निकट दृष्टि दोष (मायोपिया), हृदय रोग या उच्च रक्तचाप हैं तो इस आसान के अभ्यास से बचें।

शिक्षकों के लिए सुझाव

• विद्यार्थियों को अपनी गर्दन को आराम से रखने और किसी भी झटकेदार गतिविधि से बचाने के लिए प्रोत्साहित कीजिए।

• यदि विद्यार्थियों को चक्कर आने या श्वास लेने में कठिनाई हो तो उन्हें इस आसन से बचना चाहिए।



मत्स्यासन

यह नाम संस्कृत शब्द मत्स्य से लिया गया है, जिसका अर्थ है मछली। क्या आप जानते हैं कि इस आसन का नाम मत्स्यासन कैसे पड़ा? इस आसन में पैरों को मोड़ने का तरीका मछली की पूँछ जैसा होता है। आइए, चरणबद्ध ढंग से सीखें कि इस आसन को कैसे करें।



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स्थिति

चरण 1- श्वास लेते व छोड़ते हुए दाएँ पैर को मोड़िए और उसे बाईं जंघा के ऊपर रखिए।

चरण 2- श्वास लेते व छोड़ते हुए बाएँ पैर को मोड़िए और दाईं जंघा के ऊपर रखिए।

चरण 3- श्वास को अंदर लेते हुए दोनों हथेलियों को गर्दन के बगल में रखिए। हथेलियों को भूमि पर रखिए और हाथों की अँगुलियाँ पैरों की ओर रहेंगी।

चरण 4- श्वास अंदर लेते हुए धीरे-धीरे सिर को ऊपर उठाइए और सिर के ऊपरी भाग को भूमि पर टिका दीजिए। हाथों से पैरों के पंजों को पकड़िए और शरीर को सेतु की आकृति में लें आइए। सामान्य रूप से श्वास लीजिए और 10 तक गिनती करते हुए इस आसन में स्थिर रहें। आँखें बंद व चेहरा तनावमुक्त रखिए।

चरण 5- श्वास लेते हुए दोनों हाथों को गर्दन के पीछे रखिए।

चरण 6- श्वास छोड़ते हुए धीरे-धीरे सिर को ऊपर उठाते हुए सिर को सीधा कर भूमि पर टिका दीजिए।

चरण 7- श्वास लेते व छोड़ते हुए बाएँ पैर को सामने की ओर सीधा कीजिए।

चरण 8- श्वास लेते व छोड़ते हुए दाएँ पैर को सामने की ओर सीधा कीजिए।

विश्रांति
लाभ

• मत्स्यासन थाइराइड ग्रंथि को उत्तेजित करता है और उनके कार्यों को सामान्य करता है।

• यह रीढ़ को लचीली और स्वस्थ रखने में सहायता करता है।

• यह गर्दन और कंधों के तनाव को दूर करता है।

यह घुटनों, पिंडलियों की मांसपेशियों और जाँघों को सशक्त बनाता है

• यह फेफड़ों की क्षमता में सुधार करता है और अस्थमा व ब्रोंकाइटिस के लिए बहुत उपयोगी है।।

योग - 18
योग - 19

सावधानियाँ - पेट एवं रीढ़ की हड्डी की सर्जरी, गर्दन की चोट, हर्निया एवं आँत में छाले आदि संबंधित समस्या वाले को यह आसन नहीं करना चाहिए।

शिक्षकों के लिए सुझाव

• इस आसन को सावधानी से करना चाहिए, क्योंकि इससे रीढ़ की हड्डी में चोट लग सकती है।

• यदि विद्यार्थियों को पद्मासन करना चुनौतीपूर्ण लगता है तो वे अपने पैरों को फैलाकर भी यह आसन कर सकते हैं।



विश्राम

अभ्यास सत्र के बाद शरीर की स्थिति व मन को स्फूर्त करने के लिए विश्राम आवश्यक है। विश्राम की तकनीक मांसपेशियों में जकड़न को दूर करती है। मेरुदंड को आराम मिलता है और मन को शांति की प्राप्ति होती है।

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इस अभ्यास के लिए शवासन में (पीठ के बल लेट जाइए। हाथों-पैरों को अलग-अलग रखिए और हथेलियाँ ऊपर की ओर हों। अब पूरे शरीर को आराम दीजिए।

विश्राम के चरणबद्ध अभ्यास के लिए खेल यात्रा कक्षा 6 की पाठ्यपुस्तक देखिए।

शिक्षकों के लिए सुझाव

• इस तकनीक का अधिकतम लाभ गतिशील गतिविधियों, जैसे- सूर्य नमस्कार, शीतलीकरण व्यायाम या आसनों का अभ्यास के बाद प्राप्त किया जा सकता है।

• प्राणायाम का अभ्यास विश्राम के बाद करना चाहिए।


श्वसन अभ्यास

क्या आप अपने शरीर को बिल्ली की तरह लचीला बनाना चाहते हैं?

प्राणायाम का अभ्यास करने से पहले श्वास लेने की प्रक्रिया को सामान्य करना आवश्यक है। श्वास को एक समान, निरंतर और लयबद्ध बनाने के लिए फेफड़ों का पूर्ण उपयोग आवश्यक है। योग का अभ्यास करते समय श्वसन का अभ्यास प्रक्रिया के प्रति जागरूकता विकसित करता है। इस कक्षा में हम 'मार्जरी आसन' और 'व्याघ्रासन' को श्वास लेने की तकनीक के साथ सीखेंगे। इन आसनों को 'मार्जरी आसन' व 'व्याघ्रासन' इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इनमें बिल्लियों और बाघों द्वारा की जाने वाली रीढ़ की हड्डी को प्रसारित करने की प्रक्रिया का अनुसरण किया जाता हैं।

आइए, अब शरीर को लचीला बनाने के लिए रीढ़ प्रसारक आसन करना सीखें-

श्वास के साथ मार्जरी आसन Screenshot 2026-01-09 113621

स्थिति - दंडासन

चरण 1-दोनों पैर मोड़कर वज्रासन की मुद्रा में बैठ जाइए।

चरण 2- आगे की ओर झुकिए और अपने हाथों को भूमि पर कंधों की सीध में रखें, अँगुलियाँ आगे की ओर रहेगी। यह सुनिश्चित कीजिए कि आपकी भुजाएँ, जंघाएँ और एड़ियाँ कंधों की चौड़ाई के समान हों और आपकी भुजाएँ और जंघाएँ भूमि से लंबवत हों।

चरण 3- श्वास लेते हुए अपना सिर ऊपर उठाइए और छत की ओर देखिए, साथ ही अपनी रीढ़ की हड्डी को इस तरह नीचे रखिए कि पीठ अवतल हो जाए।

चरण 4- श्वास छोड़ते हुए अपनी रीढ़ की हड्डी को ऊपर की ओर उठाइए और अपने सिर को नीचे की ओर झुकाते हुए अपनी ठुड्डी को छाती की ओर लाइए। यह श्वास लेने का एक चक्र है, इसे 5 चक्रों तक दोहराएँ।

चरण 5-अभ्यास को पूरा करने के बाद प्रारंभिक स्थिति में वापस आ जाइए।

चरण 6-धीरे-धीरे वज्रासन की स्थिति में वापस आ जाइए, फिर पैरों को सामने की ओर सीधा कीजिए।

विश्रांति - शिथिल दंडासन

लाभ

•श्वासों के अभ्यास के साथ मार्जरी आसन करने से गर्दन, कंधों और रीढ़ की हड्डी का लचीलापन बढ़ता है।

सावधानियाँ-घुटने में चोट या दर्द, कंधों और कलाई में चोट या दर्द या गर्दन की चोट होने पर इसका अभ्यास करने से बचें।



आइए, अब व्याघ्रासन सीखें - श्वास के साथ व्याघ्रासन Screenshot 2026-01-09 123003

स्थिति - दंडासन की स्थिति में आइए

चरण 1-दोनों पैरों को मोड़कर वज्रासन में बैठ जाइए।

चरण 2- आगे की ओर झुकिए और हाथों को कंधों की सीध में भूमि पर सीधा रखिए, अँगुलियाँ आगे की ओर हों और सामने की ओर देखिए। बाहें, जांघे और एड़ियाँ लगभग कंधों की चौड़ाई जितनी दूरी पर होनी चाहिए। बाहें और जांघे भूमि के लंबवत हों।

चरण 3- श्वास लेते हुए सिर को ऊपर उठाइए और साथ ही दाएँ पैर को ऊपर की ओर खींचते हुए उठाइए और दाएँ घुटने को मोड़िए।

चरण 4- श्वास छोड़ते हुए घुटने को मोड़िए और पैर को नितंबों के नीचे से आगे की ओर लाइए। साथ ही पीठ को मोड़िए, सिर को नीचे झुकाइए और घुटने को नाक की ओर लाइए। यह श्वास लेने का एक चक्र है। इसे 3-5 चक्रों तक दोहराइए। यही अभ्यास बायीं ओर भी दोहराइए।

चरण 5-अभ्यास के बाद प्रारंभिक मुद्रा में आ जाइए।

चरण 6-धीरे-धीरे वज्रासन में आइए, अपने पैर को आगे की ओर फैलाइए । शिथिल दंडासन में विश्राम कीजिए।

विश्रांति - दंडासन

लाभ

• व्याघ्रासन श्वसन क्रिया से पैरों और नितंबों के जोड़ों की जकड़न को दूर करके उन्हें लचीला बनाते हैं।

• यह पेट की मांसपेशियों को सुदृढ़ बनाता है, पाचन को बढ़ाता है और रक्त परिसंचरण में सुधार करता है।

• यह नितंबों और जंघाओं को सुडौल बनाता है।

सावधानियाँ - घुटने में चोट या दर्द, कलाई व कंधों में चोट या दर्द होने पर इस अभ्यास से बचिए।

शिक्षकों के लिए सुझाव

•अभ्यास आरंभ करने से पहले यह सुनिश्चित कर लीजिए कि विद्यार्थी दोनों हथेलियों और घुटनों के बल आराम से खड़े हो सकें।

•अभ्यास पूरा करने के बाद विद्यार्थी कुछ समय के लिए शशांकासन या बालासन में विश्राम कर सकते हैं।

अध्याय 4
प्राणायाम

आइए, इस कक्षा में हम अष्टांग योग के चौथे पहलू प्राणायाम के माध्यम से श्वसन क्रिया के बारे में और जानते हैं।

प्राणायाम हमारी श्वास को नियंत्रित करने का अभ्यास है। योग में हमारी श्वास को एक शक्तिशाली साधन माना जाता है। प्राणायाम में हमारी जीवन शक्ति का विकास करने वाली श्वास पद्धतियाँ सम्मिलित हैं। प्राणायाम शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है- 'प्राण' का अर्थ है 'श्वास या वायु' और 'यम' का अर्थ है 'नियंत्रण या विस्तार'। अतः प्राणायाम योग का वह अंग है, जिसके द्वारा हम अपनी श्वास को नियंत्रित और निर्देशित करते हैं, जिससे हम स्वयं को अधिक सुखी और स्वस्थ बना सकें।

प्राणायाम विद्यार्थियों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है?

जिस प्रकार शारीरिक रूप से स्वस्थ रहने के लिए हमें पौष्टिक भोजन की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार शरीर को ऊर्जावान और मन को शांत रखने के लिए हमें प्राणायाम अभ्यास करने की आवश्यकता होती है। यह विद्यार्थियों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है, क्योंकि यह पढ़ाई के दौरान ध्यान केंद्रित करने, परीक्षा के दौरान शांत रहने और यहाँ तक कि खेल या दैनिक गतिविधियों के लिए अधिक ऊर्जावान अनुभव करने में सहायता करता है।

Screenshot 2026-01-09 123131 हर सुबह कुछ मिनट प्राणायाम का अभ्यास कीजिए। आप अपने आपको अधिक ऊर्जावान और तनावरहित अनुभव करेंगे।

आइए इस कक्षा में हम वही अभ्यास करें, जो हमने पिछली कक्षा में सीखे थे-

1. विभागीय प्राणायाम

विभागीय प्राणायाम के लिए एक प्रारंभिक श्वास अभ्यास है। यह गलत श्वास पैटर्न को ठीक करता है और फेफड़ों की जीवन क्षमता को बढ़ाता है।

2. नाड़ीशोधन प्राणायाम

नाड़ीशोधन प्राणायाम एक सरल और शक्तिशाली तकनीक है जो प्राण (जीवन शक्ति) के प्रवाह को संतुलित करती है और सूक्ष्म ऊर्जा के प्रवाह मार्गों को शुद्ध करती है।

3. भ्रामरी प्राणायाम

भ्रामरी प्राणायाम एक शांति प्रदान करने वाली तकनीक है, जिसका मन और तंत्रिका तंत्र पर सुखदायक प्रभाव पड़ता है।

(उपरोक्त अभ्यासों के लिए खेल यात्रा कक्षा 6 की पाठ्यपुस्तक देखिए)।

आइए, षण्मुखी मुद्रा अपनाकर भ्रामरी प्राणायाम को करना सीखें -

षण्मुखी का अर्थ है छह द्वार या मुख। षण्मुखी मुद्रा में बाहरी बोध के छह द्वारों, दो आँखें, दो कान, नाक और मुँह को बंद करके चेतना को भीतर की ओर पुनर्निर्देशित किया जाता है। यह अभ्यास प्रत्याहार की अवस्था को बढ़ावा देता है। दूसरे शब्दों में, यह दोनों हाथों की अँगुलियाँ से बोध के छह द्वारों को बंद कर देता है।

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• सुखासन में रीढ़ की हड्डी सीधी, चेहरे पर मुस्कान और आँखें बंद करके बैठिए।

• अब दोनों भुजाओं को कंधे के स्तर तक उठाइए और कोहनियों को मोड़कर अँगूठे से कानों को बंद कीजिए।

• चित्र में दिखाए अनुसार तर्जनी अँगुली को आँखों की पलकों पर, मध्यमा अँगुली को दोनों नासिका छिद्रों पर और अनामिका व कनिष्ठिका अँगुलियों को होठों के ऊपर रखिए।

• धीरे-धीरे गहरी श्वास लें और फेफड़ों को पूरी तरह से श्वास से भर लीजिए।

• श्वास छोड़ते हुए, मधुमक्खी की तरह एक स्थिर, धीमी ध्वनि में गुंजन कीजिए। (ओंकार जप से मकर ध्वनि)।

• ध्वनि के कंपन को अपने सिर और शरीर में गूंजते हुए अनुभव कीजिए। इस अभ्यास को पाँच बार दोहराइए।

षण्मुखी मुद्रा के लाभ

• षण्मुखी मुद्रा मन और तंत्रिका तंत्र को शांत करती है।

• यह आंतरिक और बाह्य जागरूकता को भी संतुलित करती है।

• यह एकाग्रता को भी बढ़ाती है और चिंता को नियंत्रित करने में सहायता करती है।

शिक्षकों के लिए सुझाव

• विद्यार्थियों से पूछिए कि क्या वे अभ्यास के समय प्रतिध्वनि का अनुभव कर सके।

• अभ्यास के बाद उनकी मन की स्थिति के बारे में पूछिए।

आइए, इस कक्षा में हम भस्त्रिका प्राणायाम के बारे में चरणबद्ध विधि से सीखते हैं।

भस्त्रिका प्राणायाम

भस्त्रिका एक विशेष श्वास व्यायाम है, जिसका नाम 'धौंकनी' से लिया गया है, क्योंकि यह धौंकनी की तरह श्वास लेने और छोड़ने जैसा है। आप इसे अपनी सुविधानुसार धीरे-धीरे या तीव्रता से कर सकते हैं।

भस्त्रिका के समय आप गहरी और पूरी श्वास लेते हैं, जिससे आपके शरीर को भरपूर ऑक्सीजन मिलती है। धौंकनी की तरह गहरी श्वास लेने और छोड़ने के लिए आप अपने छाती का उपयोग कीजिए।

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भस्त्रिका के दो भाग हैं- पहला भाग श्वास को शुद्ध करने वाला होता है और दूसरा भाग धीमा और शांत होता है, इसीलिए भस्त्रिका को कभी-कभी शुद्ध करने वाली श्वास और शांत श्वास अभ्यासों के बीच एक सेतु कहा जाता है।

भस्त्रिका प्राणायाम का चरणबद्ध अभ्यास

चरण 1- इसे सुखासन या वज्रासन की आरामदायक स्थिति में कीजिए। सिर और रीढ़ की हड्डी को सीधा रखिए, आँखें बंद करके पूरे शरीर को आराम दीजिए।

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चरण 2- दोनों नासिका छिद्रों से गहरी श्वास लीजिए और फेफड़ों को हवा से भरिए।

चरण 3- पूरी श्वास लेने के बाद, शीघ्रता से लगातार 5 बार श्वास छोड़िए। इससे भस्त्रिका का एक चक्र पूरा होता है।

चरण 4- इस अभ्यास को 3 चक्रों तक दोहराइए।


लाभ

• भस्त्रिका प्राणायाम फेंफड़ों को सशक्त बनाता है और रक्त संचार में सुधार करता है।

• यह शरीर और मन को शांति प्रदान करता है तथा एकाग्रता में सुधार करता है।

सावधानियाँ - साँस की समस्या, चक्कर, बुखार या कमजोरी हो तो विद्यार्थियों को इस अभ्यास से बचना चाहिए।


शिक्षकों के लिए सुझाव • सुनिश्चित कीजिए कि विद्यार्थी बिना किसी रुकावट के इस प्राणायाम का अभ्यास धीरे-धीरे करें।

योग - 21
मुद्राएँ

हस्त मुद्राओं का परिचय

आइए, हस्त मुद्राओं के बारे में जानें। क्या आपने कभी चित्रों में संतों या देवताओं के हाथों को विशेष स्थितियों में देखा हैं? इन्हें हस्त मुद्रा कहते हैं।

हस्त मुद्राएँ हमारे हाथों की वे स्थितियाँ हैं। जो हमारे शरीर, मन और ऊर्जा को जोड़ने में सहायता करती है। संस्कृत में 'मुद्रा' शब्द का अर्थ 'इशारा' या 'मुहर' होता है। ये विशेष हस्त संकेतों की तरह हैं, जो हमारी ऊर्जा को स्वतंत्र रूप से प्रवाहित करने में सहायता कर सकते हैं।

लोग लंबे समय से शारीरिक और मानसिक रूप से अधिक अच्छा अनुभव करने के लिए मुद्राओं का उपयोग करते आ रहे हैं।

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इस कक्षा में हम ज्ञान मुद्रा के बारे में जानेंगे। ज्ञान मुद्रा एक महत्वपूर्ण और सरल मुद्रा है, जो मन को शांत करती है।

ज्ञान मुद्रा का चरणबद्ध अभ्यास

1.सुखासन या वज्रासन जैसी आरामदायक स्थिति में या पीठ सीधी करके कुर्सी पर बैठिए।

2.अपनी हथेलियों को ऊपर की ओर रखते हुए अपने हाथों को जाँघों पर रखिए।

3. अब अँगूठे के अग्र भाग को तर्जनी अँगुली के अग्र भाग से धीरे से स्पर्श कीजिए, बलपूर्वक न दबाइए।

4. अन्य अँगुलियों को सीधा फैलाइए, हथेली ऊपर की ओर रहेगी।

5.अपना ध्यान अपनी श्वास पर केंद्रित रखिए।

6.प्रतिदिन 10 मिनट तक इसका अभ्यास कीजिए।

ज्ञान मुद्रा के लाभ

• ज्ञान मुद्रा मानसिक तनाव, क्रोध और तनाव को कम करती है।

• स्मरण शक्ति बढ़ाती है।

• यह मस्तिष्क और मांसपेशियों को ऊर्जा प्रदान करती है।

हमने पिछले अध्याय में भ्रामरी प्राणायाम के साथ षण्मुखी मुद्रा भी सीखी थी

शिक्षकों के लिए सुझाव

• विद्यार्थियों को इस मुद्रा का प्रतिदिन अभ्यास करने के लिए प्रोत्साहित कीजिए, विशेष रूप से पढ़ाई से पूर्व।

प्रत्याहार

प्रिय विद्यार्थियो !

विषय – क्या आपने प्रत्याहार के बारे में सुना है?

प्रत्याहार हमें ध्यान केंद्रित करने में सहायता करता है। यह हमारी एकाग्रता को विकसित करने और हमारे मन को शांत रखने का एक अच्छा उपाय है।

प्रत्याहार अष्टांग योग का पाँचवाँ चरण है, जो हमें गहन और सुदृढ़ एकाग्रता सिखाता है। आइए, इस कक्षा में नीचे दी गई गतिविधि करके ध्यान भटकने से कैसे बचें, यह सीखते हैं।

घंटी की ध्वनि पर कान लगाकर ध्यान केंद्रित करने की गतिविधि

• आइए, मंदिर की घंटी की ध्वनि सुनिए। ध्यान से सुनिए, क्योंकि यह एक तीव्र ध्वनि से आरंभ होती है और फिर बजती रहती है। ध्यान दीजिए कि घंटी की ध्वनि कैसे बदलती है- यह पहले तीव्र होती है और फिर धीरे-धीरे धीमी होती जाती है जब तक कि यह अंततः लुप्त न हो जाए। अपने भीतर इस ध्वनि के कंपन का अनुभव करने का प्रयत्न कीजिए।

योग - 22 धारणा, ध्यान और समाधि

धारणा का अर्थ है एकाग्रता का प्रयास। इसमें मन का अध्ययन करना और केंद्रित रखना सम्मिलित है।

धारणा, मन को एकाग्र करना सिखाती है। यह आपके मन को केवल एक ही वस्तु पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रशिक्षित करती है, जैसे किसी आवर्धक कांच के द्वारा सूर्य के प्रकाश को केंद्रित करना।

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जब आपका मन एकाग्र होता है तो यह आपको बेहतर अध्ययन करने, कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने और अपने विचारों को नियंत्रित करने में सहायता करता है। आप अपनी श्वास या किसी शब्द पर ध्यान केंद्रित करके और अपने मन को भटकने से रोकने का प्रयास करके धारणा का अभ्यास कर सकते हैं। यह कौशल ध्यान के साथ आपको आंतरिक शांति प्राप्त करने में सहायता करता है और योग का एक महत्वपूर्ण अंग है।

पिछली कक्षा में हमने जत्रु त्राटक के बारे में सीखा जो हमारी एकाग्रता में सुधार करता है। आइए इस कक्षा में अभ्यास जारी रखें।

आइए, एक ही बिंदु पर ध्यान केंद्रित करके धारणा का अभ्यास कीजिए। जत्रु त्राटक एक यौगिक दृष्टि है जो एकाग्रता या ध्यान केंद्रित करने में सहायता करती है। यह एक ऐसा अभ्यास है, जिसमें दृष्टि किसी वस्तु या लक्ष्य पर स्थिर की जाती है। आरंभ करने से पहले अपनी आँखों को ठंडे पानी से साफ करना अच्छा रहेगा।



हथेलियों से आँखों की सफाई
अपने हाथों को साबुन से अच्छी तरह धोइए। अपनी दाहिनी हथेली को कप-नुमा बनाइए और उसमें साफ जल भरिए। अब अपनी दाहिनी आँख को इस जल में डुबोइए। कई बार पलकें झपकाइए, यही प्रक्रिया बाईं आँख से भी दोहराइए।


जत्रु-त्राटक Screenshot 2026-01-09 123847

चरण 1-वज्रासन और सुखासन की आरामदायक स्थिति में बैठिए। अपनी आँखें खुली रखिए और हाथों को घुटनों पर रखिए।

चरण 2-अब दोनों हाथों को सामने की ओर फैलाइए, उनकी मुट्ठियाँ बनाइए तथा अँगूठे ऊपर की ओर उठाइए।

चरण 3-दोनों हाथों को भूमि के समानांतर दोनों कंधों की ओर ले जाइए और अँगूठे के अग्रभाग पर दृष्टि स्थिर रखिए। दृष्टि की पहुँच तक हाथों को जितना हो सके, पार्श्व की ओर लेकर जाइए।

चरण 4-कुछ देर इसी स्थिति में रहिए। अँगूठे के अग्रभाग पर दृष्टि रखते हुए धीरे-धीरे हाथों को मूल स्थिति में वापस ले आइए। सिर को न हिलाइए, केवल नेत्रगोलक को बगल की ओर घुमाइए। इस अभ्यास को 3-5 बार दोहराइए।

चरण 5- अभ्यास के बाद हथेलियों को वापस ले जाइए और वज्रासन या सुखासन में आराम कीजिए।



सरल हस्तचालन प्रक्रिया

• दोनों हथेलियों को तब तक रगड़ें, जब तक वे गर्म न हो जाएँ।

• अपनी हथेलियों से कटोरी का आकार बनाकर उन्हें धीरे से आँखों पर रखिए। आँखों की पुतलियों पर दबाव मत डालिए।

• अपनी आँखों को बंद रखिए।

• अपनी हथेलियों को 10-15 सेकेंड तक आँखों पर रखिए, फिर उन्हें धीरे से उठा लीजिए।

Screenshot 2026-01-09 124414 लाभ

• जत्रु-त्राटक में तिरछा देखने से आँखों के आसपास की मांसपेशियों को आराम मिलता है।

• यह भेंगापन को भी रोकता है और ठीक करता है।

• इससे दृष्टि और एकाग्रता में सुधार होता है।

सावधानियाँ - गंभीर सिरदर्द वाले विद्यार्थियों को इस अभ्यास से बचना चाहिए।


शिक्षकों के लिए सुझाव

• यह सुनिश्चित कीजिए कि विद्यार्थी अपना चश्मा और कलाई घड़ी उतार दें।

• इस अभ्यास के समय सिर, गर्दन व रीढ़ की हड्डी सीधी रखने के लिए प्रोत्साहित करें।

•हमेशा कुछ पलकें झपकाकर अपनी आँखें खोलिए।

•सुनिश्चित कीजिए कि प्रत्येक अभ्यास के बाद हस्तचालन करें।

• जत्रु-त्राटक के ऊपर-नीचे तथा दाएँ-बाएँ गति के लिए खेल यात्रा कक्षा 6 की पाठ्यपुस्तक देखिए।

ध्यान

ध्यान का अर्थ है एकाग्रता। जब हम किसी एक वस्तु पर पूरी तरह ध्यान केंद्रित करते हैं तो हमारा मन शांत होने लगता है। यही शांति और स्थिरता ध्यान है।

ध्यान हमें आंतरिक शांति का अनुभव कराता है, तब भी जब हमारे आस-पास शोरगुल या अस्त-व्यस्तता हो। कल्पना कीजिए कि आप अपने मन को लेजर बीम की तरह एक वस्तु पर केंद्रित करने के लिए प्रशिक्षित कर रहे हैं, यही धारणा है।

धारणा और ध्यान दोनों ही आपको विद्यालय में बेहतर ध्यान केंद्रित करने, परीक्षाओं के दौरान शांत रहने और अपने दैनिक जीवन में अधिक शांति अनुभव करने में सहायता कर सकते हैं।

गतिविधि

आइए, अब चरणबद्ध ढंग से सरल ध्यान तकनीक सीखते हैं।

• रीढ़ सीधी और आँखें बंद करके सुखासन या वज्रासन जैसी आरामदायक स्थिति में बैठिए।

• अब धीरे-धीरे अपनी चेतना को अपनी श्वासों पर केंद्रित कीजिए। श्वास लेते और छोड़ते समय कुछ सेकंड के लिए अपनी श्वासों का अवलोकन कीजिए।

• अगर आपके मन में विचार आते हैं तो चिंता न कीजिए। बस धीरे से अपना ध्यान वापस अपनी श्वासों पर ले आइए।

• कुछ मिनटों तक इसका अभ्यास कीजिए। 'ध्यान' करते समय आप अपनी श्वासों पर ध्यान केंद्रित कीजिए और अपने मन को शांत और स्थिर होने दीजिए।

पंचकोश ध्यान

जिस प्रकार एक घर में बैठक कक्ष, रसोई और शयनकक्ष जैसे अलग-अलग कमरे होते हैं, उसी प्रकार हमारे शरीर में भी अलग-अलग आवरण होते हैं। हमने अध्याय 1 में इन आवरणों के बारे में सीखा था।

आइए, इस कक्षा में ध्यान के माध्यम से अपने भीतर की इन आवरणों को जानने के लिए एक आंतरिक यात्रा पर चलें। यह आंतरिक यात्रा हमें स्वयं को अधिक अच्छी तरह से समझने और अधिक शांतिपूर्ण एवं प्रसन्न अनुभव करने में सहायता करेगी।

पंचकोश ध्यान का चरणबद्ध अभ्यास

1. सुखासन में आराम से बैठिए तथा सिर, गर्दन और रीढ़ को एक सीधी रेखा में रखिए। शरीर को शिथिल रखिए।

2. अब धीरे से अपनी आँखें बंद कीजिए, अपने आस-पास के वातावरण और ध्वनियों के प्रति सजग रहें। धीरे-धीरे अपने शरीर का अवलोकन आरंभ कीजिए। अपने सिर, कंधों, छाती, कमर, पीठ, पेट, बाहों और पैरों के प्रति सजग रहें, किसी भी संवेदना या तनाव के क्षेत्र पर ध्यान दीजिए बिना किसी प्रतिक्रिया के इन संवेदनाओं पर ध्यान दीजिए। यह आपका अन्नमय कोश व भौतिक शरीर है। कुछ सेकंड के लिए इसका अवलोकन कीजिए और भौतिक शरीर को शिथिल कीजिए।

3. अब अपना ध्यान अपनी श्वास पर केंद्रित कीजिए। अपनी सजगता को अपने नासिका छिद्रों के बीच लाइए और श्वास लेते और छोड़ते समय नासिका छिद्रों में प्रवेश करने वाली वायु का अवलोकन कीजिए। देखिए कि आपकी श्वास धीमी हो जाती है और अधिक निरंतर और लयबद्ध हो जाती है। अपने फेफड़ों के फैलने और सिकुड़ने के दौरान श्वास के प्रति सजग रहिए। यह आपका प्राणमय कोश है। कुछ पलों के लिए अवलोकन कीजिए और शरीर के हल्केपन का आनंद लीजिए।

4. अब अपने मन में उठने वाले विचारों का अवलोकन कीजिए। ध्यान दीजिए कि वे आकाश में बादलों की तरह कैसे आते-जाते हैं। बस उन्हें स्वीकार कीजिए और धीरे से अपना ध्यान अपनी श्वास पर वापस लाइए। अब अपनी जागरूकता को स्थानांतरित कीजिए और अपने शरीर में संवेदना के प्रति जागरूक रहिए। हो सकता है कि आप लंबे समय तक एक ही स्थिति में बैठे रहने में अस्थिर अनुभव करने लगें और अपने पैरों को हिलाना चाहें या आपको अपनी त्वचा, नाक आदि पर किसी प्रकार की खुजली का अनुभव हो। यह आपके मन से आने वाली एक प्रतिवर्ती मानसिक बातचीत है। यह आपका मनोमय कोश है।

5. इस पर प्रतिक्रिया न करने का प्रयास कीजिए, अपितु अपनी श्वासों का अवलोकन करते रहिए। अपने आंतरिक ज्ञान से जुड़ें और स्वयं से पूछें, 'मुझे क्या खुशी देता है'। धीरे से उठने वाले आंतरिक मार्गदर्शन को सुनिए। यह आपका विज्ञानमय कोश है।

6. अब अपनी जागरूकता को और अधिक भीतर की ओर लेकर जाएँ। अब अपनी जागरूकता को अपने हृदय पर केंद्रित कीजिए, पूरी तरह से तनावमुक्त हो जाइए, लय में श्वास लेते रहें। अब स्वयं को पूर्ण शांति की स्थिति में स्थापित होने दीजिए अपने भीतर अपार आनंद और कृतज्ञता की भावना का आनंद लीजिए। यह पूर्ण शांति, मौन और आनंद का स्थान है। कोई भय या इच्छा नहीं है। यह आपका आनंदमय कोश है। अब, बस अपनी स्वयं की जागरूकता के प्रति सजग रहिए।

7.अपनी जागरूकता को अपनी श्वासों पर लौटाइए, अपने आस-पास के वातावरण के प्रति सजग रहिए। ध्यान दें कि आपकी श्वास धीमी और निरंतर है। उठने से पहले थोड़ा आराम कीजिए और इस अनुभव को आत्मसात कीजिए।

8.अब अपनी हथेलियों को धीरे-धीरे रगड़िए, इन्हें अपनी आँखों पर रखिए और अपनी हथेलियों में आँखें खोलिए।

लाभ

• पंचकोश ध्यान से मन शांत और तनावमुक्त होता है।

• इससे एकाग्रता और आत्म जागरूकता में सुधार होता है।

• यह आनंद और शांति लाता है।

शिक्षकों के लिए सुझाव

• विद्यार्थियों को ध्यान से संबंधित अपने अनुभव साझा करने के लिए प्रोत्साहित कीजिए।

• अभ्यास के समय विद्यार्थियों को श्वास पर ध्यान केंद्रित करने, अपने विचारों और भावनाओं का अवलोकन करने दीजिए।

समाधि

समाधि चेतना की अंतिम अवस्था है। यह एक उच्च और श्रेष्ठ विचार है। आप स्वयं के प्रति जागरूक होते हैं और अपने सच्चे स्वभाव, आनंद और वास्तविक स्वरूप से जुड़ते हैं। यही हमारे जीवन का अंतिम लक्ष्य है।

क्रीड़ा योग

योग व्यक्ति के सर्वांगीण विकास की एक प्रक्रिया है। इस प्रक्रिया में क्रीड़ा योग एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। क्रीड़ा योग का अर्थ है खेलों के माध्यम से योग। यह विभिन्न प्रकार की खेल गतिविधियों के माध्यम से योग का अभ्यास करने की एक सक्रिय पद्धति है। क्रीड़ा योग में योग की गतिविधियों को खेलों के साथ जोड़ा जाता है, जिससे आप अपने मित्रों के साथ हर्षोल्लास करते हुए लचीलापन, शक्ति और ध्यान को विकसित कर सकें।

ये खेल खेलने और सीखने में सरल हैं और सभी की भागीदारी को सुनिश्चित करते हैं। ये खेल न केवल हमें हमारी जागरूकता की स्थिति की जानकारी देते हैं, अपितु इसे विकसित करने में सहयोग करते हैं।

यहाँ पर कुछ खेल दिए गए हैं, जिन्हें आप अपनी कक्षा के मित्रों या परिवार के सदस्यों के साथ खेल सकते हैं।

दर्पण योग

दर्पण योग एक आंतरिक खेल है, जो सामान्यतः समूहों में खेला जाता है। यह खेल विरोधी या खिलाड़ियों की गतिविधियों की नकल करके ध्यान और सचेतना को विकसित करता है। यह खेल एकाग्रता, शरीर की जागरूकता और समन्वय में भी सुधार करता है।

खेलने की विधि

1. कक्षा को दो समूहों में विभाजित कीजिए।

2. विद्यार्थियों के युग्म बनाकर आमने-सामने बैठने को कहिए।

3. एक विद्यार्थी नेतृत्व करता है और धीरे-धीरे कोई योग मुद्रा या गतिविधि करता है, जबकि दूसरा विद्यार्थी उनकी गतिविधियों को दोहराने का प्रयत्न करता है।

4. प्रत्येक विद्यार्थी, एक मिनट के लिए उसी स्थिति में रहता है। फिर दूसरा विद्यार्थी भी एक मिनट तक उसी स्थिति में रहता है।

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शिक्षकों के लिए सुझाव

• खेल अधिकतम 5 मिनट तक खेला जाएगा।

• खेल को रुचिपूर्ण बनाने के लिए विविधाओं को प्रोत्साहित किया जाए।

• सुनिश्चित कीजिए कि सभी विद्यार्थी खेल में भाग लें।



इस खेल से सीखिए

• सक्रिय जुड़ाव और ध्यान केंद्रित करने में वृद्धि करता है।

• शारीरिक और मानसिक स्थिरता में वृद्धि होती है।

• शरीर के प्रति जागरूकता में वृद्धि होती है।

• संचार कौशल में सुधार होता है।

• विश्वास और सहयोग को बल मिलता है।

• धैर्य और सहनक्षमता में वृद्धि होती है।

योग इकाई के लिए आकलन

1.दैनिक जीवन में योग

निम्नलिखित का मिलान कीजिए

1. अन्नमय कोश (क) मन का आवरण
2. प्राणमय कोश (ख) बुद्धि का आवरण
3. मनोमय कोश (ग) भौतिक आवरण
4. विज्ञानमय कोश (घ) आनंदमय आवरण
5. आंनदमय कोश (आनंद का आवरण) (ङ) ऊर्जा आवरण


निम्नलिखित का उत्तर दीजिए
क्र.सं. पहेलियाँ उन अभ्यासों की सूची बनाइए, जिन्हें आप प्रत्येक कोश के लिए करने में सक्षम थे।
1. अन्नमय कोश
2. प्राणमय कोश
3. मनोमय कोश
4. विज्ञानमय कोश
5. आंनदमय कोश


शिक्षक आकलन
मानदंड उत्कृष्ट चार बिंदु अच्छा (तीन बिंदु) औसत (दो बिंदु) सुधार की आवश्यकता (एक बिंदु) अर्जित अंक शिक्षक टिप्पणी
कोश और उनके कार्यों की समझ रखना गहरी समझ प्रदर्शित करता/करती है और विस्तृत सटीक उत्तर प्रदान करता/करती है। सटीक उत्तर और उदाहरण के साथ अच्छी समझ दर्शाता/दर्शाती है। अशुद्धियों या विवरण की कमी के साथ एक मूलभूत समझ दर्शाता/दर्शाती है। अवधारणाओं को समझने में संघर्ष करता/करती है।
अभ्यासों और व्यक्तिगत अंतर्दृष्टि को जोड़ना स्पष्ट रूप से अभ्यासों को कोश से जोड़ता/जोड़ती है। कुछ अभ्यासों को कोश से जोड़ता/जोड़ती है। कुछ संबंध बनाता/बनाती है। अभ्यासों को जोड़ने के लिए संघर्ष करता/करती है।


2. योग साधना

योग पहेलियाँ
क्रम सं. पहेलियाँ उत्तर
1. इस आसन में आप जंघाओं की शक्ति के साथ अदृश्य कुर्सी पर बैठने का अभिनय करते हैं। इससे आपको लाभ प्राप्त होता है। इस आसन का नाम कुर्सी के नाम पर रखा गया है, लेकिन आस-पास कुर्सी दिखाई नहीं देती है। इस आसन का नाम बताइए।
2. मैं एक वृक्ष की तरह ऊँचा खड़ा हूँ। मेरी भुजाएँ ऊपर की ओर रहेंगी, मेरे पैर दृढ़ और सशक्त है। मैं एक आसन हूँ, क्या आप मेरा नाम बता सकते हैं?
3. मैं एक ऐसा आसन हूँ, जो आपको एक बहादुर योद्धा की तरह पूरे दिन सशक्त बनाता है। घुटनों के बल बैठकर पैर फैलाकर मेरा नाम गर्व से बोला जाता है।
4. मेरे दो सिर हैं, पर चेहरा केवल एक। मैं आपके कंधों को शक्ति और सुंदरता देता हूँ। मेरा नाम गाय के सिर से आया है; यह सच है, लेकिन मैं आपको खिंचाव और एकदम नया अनुभव कराता हूँ।
5. मैं आपकी पीठ को धनुष की तरह खिंचाव देता हूँ, तुम बिना किसी दरार के झुक जाते हो। आपके हाथ व पैरों को बलपूर्वक से थामे रहता हूँ, सावधान, आप शीघ्र फिसल सकते हो! मैं क्या हूँ?
6. मैं अपने कंधों पर खड़ा हूँ और सिर भूमि पर टिका हुआ है, चारों ओर शक्ति और संतुलन बना रहता है। संस्कृत के मेरे नाम का अर्थ है सभी अंग। मैं क्या हूँ, युवा मित्र?
7. मैं एक ऐसा आसन हूँ, जो आपको मछली की तरह शांत और मुक्त बनाता हूँ। मेरा नाम मछली के लिए संस्कृत शब्द से आया है, क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि मैं कौन-सा आसन हूँ?
1. उत्कटासन 2. वक्रासन 3. वीरासन 4. गोमुखासन 5. सरल धनुरासन 6. सर्वांगासन 7. मत्स्यासन

मानदंड उत्कृष्ट अच्छा औसत सुधार की आवश्यकता अर्जित अंक शिक्षक टिप्पणी
आसनों को सही से पहचाना सभी आसनों को सही ढंग से पहचानता/पहचानती है। 5-6 आसनों को सही से पहचानता/पहचानती है। 3-4 आसनों को सही से पहचानता/पहचानती है। 2 आसनों को सही से पहचानता/पहचानती है।
आसन के विवरण को समझना सभी पहेली सुरागों का स्पष्ट प्रदर्शित करता करती है और उन्हें सटीकता से अभ्यास से जोड़ता/जोड़ती है। अधिकांश पहेली सुरागों की अच्छी समझ प्रदर्शित करता/करती है और सटीक ढंग से जोड़ता /जोड़ती है। आसन की मूलभूत समझ रखता/रखती है लेकिन पहेली सुराग के साथ सही से जोड़ने में संघर्ष करता/करती है। पहेली सुराग की सीमित समझ को प्रदर्शित करता/करती है।
भागीदारी या संलग्नता पहेलियों को सुलझाने में दृढ़ संलग्नता और उत्साह दर्शाता/दर्शाती है। । सक्रिय संलग्नता और सहभागिता दर्शाता/दर्शाती है। मूलभूत समझ के साथ निष्क्रिय सहभागिता दर्शाता /दर्शाती है। असीमित संलग्नता और न्यूनतम सहभागिता दर्शाता/दर्शाती है


प्राणायाम पहेलियाँ
क्रम सं. पहेलियाँ उत्तर
1. मैं श्वास को शांत करने के लिए जानी जाने वाला श्वास अभ्यास हूँ। मैं वायुमार्गों को साफ करता हूँ, चिंताओं को पीछे छोड़ता हूँ। मैं प्रत्येक श्वास अंदर और बाहर लेने के साथ ऊर्जा को संतुलित करता हूँ। मैं क्या हूँ?
2. मैं एक श्वास अभ्यास हूँ, जो अपनी भिनभिनाती ध्वनि के लिए जाना जाता हूँ। मैं मन को शांत करने और मानसिक शांति लाने में सहायता करता हूँ। मेरा नाम एक भिनभिनाती मधुमक्खी से किया गया है। क्या आप बता सकते हैं मैं क्या हूँ?

1.नाड़ी शोधन प्राणायाम
2.भ्रामरी प्राणायाम

प्राणायाम का आकलन
मानदंड उत्कृष्ट अच्छा औसत सुधार की आवश्यकता अर्जित अंक शिक्षक टिप्पणी
प्राणायाम को सही से पहचानना दोनों प्राणायाम अभ्सायों को सही ढंग से पहचानता /पहचानती है। एक प्राणायाम को सही से पहचानता/पहचानती है। उत्तर देने का प्रयास किया गया लेकिन दोनों उत्तर गलत हैं। उत्तर देने का प्रयास नहीं करता/करती है।
प्राणायाम के विवरण को समझना सभी पहेली सुरागों की स्पष्ट समझ का प्रदर्शन करता/करती है और उन्हें अभ्यासों से जोड़ता/जोड़ती है। अधिकांश पहेली सुरागों की अच्छी समझ प्रदर्शित करता/करती है और सटीक संबंध जोड़ता /जोड़ती है। मूलभूत समझ रखता/रखती है, लेकिन पहेली सुराग को सटीकता से जोड़ने में संघर्ष करता/करती है। पहेली सुरागों की सीमित समझ को प्रदर्शित करता/करती है।
संलग्नता और सहभागिता पहेलियों को सुलझाने में दृढ़ संलग्नता और उत्साह दर्शाता / दर्शाती है। । सक्रिय संलग्नता और सहभागिता दर्शाता/दर्शाती है मूलभूत समझ के साथ निष्क्रिय सहभागिता दर्शाता/दर्शाती है सीमित संलग्नता और न्यूनतम सहभागिता दर्शाता/दर्शाती है