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अध्याय-10

मीरा के पद

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(1)

बसो मेरे नैनन में नंदलाल ।

मोहनि मूरति साँवरि सूरति, नैना बने विशाल ॥

अधर सुधा रस मुरली राजति, उर वैजंती माल ॥

क्षुद्र घंटिका कटितट सोभित, नूपुर शब्द रसाल ॥

मीरा के प्रभु संतन सुखदाई, भक्त वछल गोपाल ॥

(2)

बरसे बदरिया सावन की, सावन की मन भावन की।

उमड़ घुमड़ चहुँ दिश से आया, दामिन दम कै झर लावन की।

नन्हीं नन्हीं बूँदन मेहा बरसे, शीतल पवन सोहावन की ॥

मीरा के प्रभु गिरधरनागर, आनंद मंगल गावन की ।।

- मीरा



कवयित्री से परिचय

Screenshot 2025-06-30 112519 आपने जो रचना अभी पढ़ी है, उसे आज से लगभग 500 वर्ष पहले रचा गया था। इसे हिंदी की महान कवयित्री, कृष्ण भक्त और संत मीरा ने रचा था। यह माना जाता है कि मीरा बचपन से ही कृष्ण की भक्ति में मगन रहती थीं। एक राजकुमारी होते हुए भी उन्होंने संतों का जीवन चुना और महलों को त्यागकर तीर्थों की यात्राएँ करने लगीं। उन्होंने मंदिरों में भजन गाना और सत्संग करना प्रारंभ कर दिया। उनके गाए हुए भजन लोग आज भी श्रद्धा और प्रेम से गाते, पढ़ते और सुनते-सुनाते हैं।


पाठ से

आइए, अब हम इस कविता पर विस्तार से चर्चा करें। आगे दी गई गतिविधियाँ इस कार्य में आपकी सहायता करेंगी।

मेरी समझ से

(क) नीचे दिए गए प्रश्नों का सटीक उत्तर कौन-सा है? उसके सामने तारा (*) बनाइए। कुछ प्रश्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।

(1) "बसो मेरे नैनन में नंदलाल" पद में मीरा किनसे विनती कर रही हैं?

  • संतों से
  • भक्तों से
  • वैजंती से
  • श्रीकृष्ण से
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(2) "बसो मेरे नैनन में नंदलाल" पद का मुख्य विषय क्या है?

  • प्रेम और भक्ति
  • प्रकृति की सुंदरता
  • युद्ध और शांति
  • ज्ञान और शिक्षा
  • मीरा के पद

(3) "बरसे बदरिया सावन की" पद में कौन-सी ऋतु का वर्णन किया गया है?

  • सर्दी
  • गरमी
  • वर्षा
  • वसंत

(4) "बरसे बदरिया सावन की" पद को पढ़कर ऐसा लगता है, जैसे मीरा-

  • प्रसन्न हैं।
  • दुखी हैं।
  • उदास हैं।
  • चिंतित हैं।

(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुने?

मिलकर करें मिलान

पाठ में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। अपने समूह में इन पर चर्चा कीजिए और इन्हें इनके सही अर्थों या संदर्भों से मिलाइए। इसके लिए आप शब्दकोश, इंटरनेट या अपने शिक्षकों की सहायता ले सकते हैं।

शब्द अर्थ/संदर्भ
1. नंदलाल 1. पर्वत को धारण करने वाले, श्रीकृष्ण
2. वैजंती माल 2.श्रावण का महीना, आषाढ़ के बाद का और भाद्रपद के पहले का महीना
3. सावन 3.वैजयंती पौधे के बीजों से बनने वाली माला
4. गिरधर 4. नंद के पुत्र, श्रीकृष्ण

पंक्तियों पर चर्चा

पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं। इन्हें पढ़कर आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपने समूह में साझा कीजिए और लिखिए।

(क) “नन्हीं नन्हीं बूँदन मेहा बरसे, शीतल पवन सोहावन की।।"

(ख) "मीरा के प्रभु संतन सुखदाई, भक्त वछल गोपाल।।"

सोच-विचार के लिए

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पाठ को एक बार फिर से पढ़िए, पता लगाइए और लिखिए-

(क) पहले पद में श्रीकृष्ण के बारे में क्या-क्या बताया गया है?

(ख) दूसरे पद में सावन के बारे में क्या-क्या बताया गया है?

कविता की रचना

"मीरा के प्रभु संतन सुखदाई"

"मीरा के प्रभु गिरधरनागर"

इन दोनों पंक्तियों पर ध्यान दीजिए। इन पंक्तियों में मीरा ने अपने नाम का उल्लेख किया है। मीरा के समय के अनेक कवि अपनी रचना के अंत में अपने नाम को सम्मिलित कर दिया करते थे। आज भी कुछ कवि अपना नाम कविता में जोड़ देते हैं।

आप ध्यान देंगे तो इस कविता में आपको ऐसी अनेक विशेषताएँ दिखाई देंगी। (जैसे कविता में छोटी-छोटी पंक्तियाँ हैं। श्रीकृष्ण के लिए अलग-अलग नामों का प्रयोग किया गया है आदि।)

(क) इस पाठ को एक बार फिर से पढ़िए और अपने-अपने समूह में मिलकर इस पाठ की विशेषताओं की सूची बनाइए।

(ख) अपने समूह की सूची को कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए।

अनुमान और कल्पना से

अपने समूह में मिलकर चर्चा कीजिए-

(क) मान लीजिए कि बादलों ने मीरा को श्रीकृष्ण के आने का संदेश सुनाया है। आपको क्या लगता है कि उन्होंने क्या कहा होगा? कैसे कहा होगा?

(ख) यदि आपको मीरा से बातचीत करने का अवसर मिल जाए तो आप उनसे क्या-क्या कहेंगे और क्या-क्या पूछेंगे?

शब्दों के रूप

अगले पृष्ठ पर शब्दों से जुड़ी कुछ गतिविधियाँ दी गई हैं। इन्हें करने के लिए आप शब्दकोश, अपने शिक्षकों और साथियों की सहायता भी ले सकते हैं।

(क) "मोहनि मूरति साँवरि सूरति, नैना बने विशाल ।"

इस पंक्ति में 'साँवरि' शब्द आया है। इसके स्थान पर अधिकतर 'साँवली' शब्द का प्रयोग किया जाता है। इस पद में ऐसे कुछ और शब्द हैं, जिन्हें आप कुछ अलग रूप में लिखते और बोलते होंगे। नीचे ऐसे ही कुछ अन्य शब्द दिए गए हैं। इन्हें आप जिस रूप में बोलते-लिखते हैं, उस तरह से लिखिए।

  • नैनन ————————
  • सोभित ————————
  • भक्त वछल ————————
  • बदरिया ————————
  • मेरो मनवा ————————
  • आवन ————————
  • दिश ————————
  • मेहा ————————

शब्द से जुड़े शब्द

नीचे दिए गए स्थानों में श्रीकृष्ण से जुड़े शब्द पाठ में से चुनकर लिखिए- मुरली श्रीकृष्ण malhar

पंक्ति से पंक्ति

नीचे स्तंभ 1 और स्तंभ 2 में कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं। मिलती-जुलती पंक्तियों को रेखा खींचकर मिलाइए-
स्तंभ 1 स्तंभ 2
1. अधर सुधा रस मुरली राजति, उर वैजंती माल 1. चारों दिशाओं से बादल उमड़-घुमड़ कर बरस रहे हैं, बिजली चमक रही है, वर्षा की झड़ी लग गई है।
2. क्षुद्र घंटिका कटितट सोभित, नूपुर शब्द रसाल 2. होंठों पर सुरीली धुनों से भरी हुई बाँसुरी और सीने पर वैजयंती माला सजी हुई है।
3. मीरा के प्रभु संतन सुखदाई, भक्त वछल गोपाल 3. सावन के महीने में मेरे मन में बहुत-सी उमंगें उठ रही हैं, क्योंकि मैंने श्रीकृष्ण के आने की चर्चा सुनी है।
4. सावन में उमग्यो मेरो मनवा, भनक सुनी हरि आवन की 4. हे मीरा के प्रभु! तुम संतों को सुख देने वाले हो और अपने भक्तों से स्नेह करने वाले हो।
5. उमड़ घुमड़ चहुँ दिश से आया, दामिन दमकै झर लावन की 5. कमर पर छोटी-छोटी घंटियाँ सजी हुई हैं और पैरों में बँधे हुए नूपुर मीठी आवाज में बोल रहे हैं।

कविता का सौंदर्य

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"बरसे बदरिया सावन की।"

इस पंक्ति में रेखांकित शब्दों पर ध्यान दीजिए। क्या आपको कोई विशेष बात दिखाई दी?

इस पंक्ति में 'बरसे' और 'बदरिया' दोनों शब्द साथ-साथ आए हैं और दोनों 'ब' वर्ण से शुरू हो रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो इस पंक्ति में 'ब' वर्ण की आवृत्ति हो रही है। इस कारण यह पंक्ति और भी अधिक सुंदर बन गई है। पाठ में से इस प्रकार के अन्य उदाहरण ढूँढ़कर लिखिए।

रूप बदलकर

पाठ के किसी एक पद को एक अनुच्छेद के रूप में लिखिए। उदाहरण के लिए- 'सावन के बादल बरस रहे हैं..' या 'सावन की बदरिया बरसती है...' आदि।

मुहावरे

"बसो मेरे नैनन में नंदलाल।"

नैनों या आँखों में बस जाना एक मुहावरा है, जब हमें कोई व्यक्ति या वस्तु इतनी अधिक प्रिय लगने लगती है कि उसका ध्यान हर समय मन में बना रहने लगता है तब हम इस मुहावरे का प्रयोग करते हैं, जैसे उसकी छवि मेरी आँखों में बस गई है। ऐसा ही एक अन्य मुहावरा है- आँखों में घर करना।

नीचे आँखों से जुड़े कुछ और मुहावरे दिए गए हैं। अपने परिजनों, साथियों, शिक्षकों, पुस्तकालय और इंटरनेट की सहायता से इनके अर्थ समझिए और इनका वाक्यों में प्रयोग कीजिए। Screenshot 2025-06-30 113119

  1. 1. आँखों का तारा
  2. 2. आँखों पर पर्दा पड़ना
  3. 3.आँखों के आगे अँधेरा छाना
  4. 4. आँख दिखाना
  5. 5. आँख का काँटा
  6. 6. आँखें फेरना
  7. 7. आँख भर आना
  8. 8. आँखें चुराना
  9. 9. आँखों से उतारना
  10. 10. आँखों में खटकना

सबकी प्रस्तुति

पाठ के किसी एक पद को चुनकर अपने समूह के साथ मिलकर अलग-अलग तरीके से कक्षा के सामने प्रस्तुत कीजिए, उदाहरण के लिए-
  • गायन करना।
  • भाव-नृत्य प्रस्तुति करना।
  • कविता पाठ करना आदि

पाठ से आगे

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आपकी बात

(क) "बरसे बदरिया सावन की"

  1. 1. इस पद में सावन का सुंदर चित्रण किया गया है। जब आपके गाँव या नगर में सावन आता है तो मौसम में क्या परिवर्तन आते हैं? वर्णन कीजिए।

  2. 2. सावन की ऋतु में किस-किस प्रकार की ध्वनियाँ सुनाई देती हैं? इन ध्वनियों को सुनकर आपके मन में कौन-कौन सी भावनाएँ उठती हैं? आप कैसा अनुभव करते हैं? अपने अनुभवों के आधार पर बताइए। (उदाहरण के लिए बिजली के कड़कने या बूँदों के टपकने की ध्वनियाँ।)

  3. 3. वर्षा ऋतु में आपको कौन-कौन सी गतिविधियाँ करने या खेल खेलने में आनंद आता है?

  4. 4. सावन के महीने में हमारे देश में अनेक त्योहार मनाए जाते हैं। आपके घर, परिसर या गाँव में सावन में कौन-कौन से त्योहार मनाए जाते हैं? किसी एक के विषय में अपने अनुभव बताइए।

(ख) "बसो मेरे नैनन में नंदलाल"

    इस पद में मीरा श्रीकृष्ण को संतों को सुख देने वाला' और 'भक्तों का पालन करने वाला' कहती हैं।
  1. 1. क्या आपके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति है जो सदैव आपकी सहायता करता है और आपको आनंदित करता है? विस्तार से बताइए।

  2. 2. कवयित्री ने पाठ में 'नूपुर' और 'क्षुद्र घंटिका' जैसे उदाहरणों का प्रयोग किया है। किसी का वर्णन करने के लिए हम केवल बड़ी-बड़ी ही नहीं, बल्कि उससे जुड़ी छोटी-छोटी बातें भी बता सकते हैं। आप भी अपने आस-पास के किसी व्यक्ति या वस्तु का वर्णन करते हुए उससे जुड़ी छोटी-छोटी बातों पर ध्यान दीजिए और उन्हें लिखिए।

विशेषताएँ

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"मोहनि मूरति साँवरि सूरति, नैना बने विशाल।"

  • (क) इस पंक्ति में कवयित्री ने श्रीकृष्ण की मोहनी मूरत, साँवरी सूरत और विशाल नैनों की बात की है। आपको श्रीकृष्ण की कौन-कौन सी बातों ने सबसे अधिक आकर्षित किया?
  • (ख) किसी व्यक्ति या वस्तु का कौन-सा गुण आपको सबसे अधिक आकर्षित करता है? क्यों? अपने जीवन से जुड़े किसी व्यक्ति या वस्तु के उदाहरण से बताइए।
  • (ग) हम सबकी कुछ विशेषताएँ बाह्य तो कुछ आंतरिक होती हैं। बाह्य विशेषताएँ तो हमें दिखाई दे जाती हैं, लेकिन आंतरिक विशेषताएँ व्यक्ति के व्यवहार से पता चलती हैं। आप अपनी दोनों प्रकार की विशेषताओं के दो-दो उदाहरण दीजिए।

मधुर ध्वनियाँ

"अघर सुधा रस मुरली राजति, उर वैजंती माला।

क्षुद्र घंटिका कटितट सोभित, नूपुर शब्द रसाल।।"

इन पंक्तियों में तीन ऐसी वस्तुओं के नाम आए हैं, जिनसे मधुर ध्वनियाँ उत्पन्न होती हैं। उन वस्तुओं के नाम पहचानिए और उनके नीचे रेखा खींचिए।

आगे मधुर ध्वनियों उत्पन्न करने वाले कुछ वाद्ययंत्रों के विषय में पहेलियाँ दी गई हैं। इन्हें पहचानकर सही चित्रों के साथ रेखा खींचकर मिलाइए- Screenshot 2025-06-30 112519

पहेली उत्तर
हवा से बोलती है, सुर में गीत सुनाती है, होठों से छू जाए, तो मन को लुभाती है। उदाहरण छवि
दो साथियों का जोड़ा, हाथों से है बजता, ताल मिलाए ताल से, हर संगत में सजता। उदाहरण छवि
शाहों में शामिल होती, फूंकों से संगीत सुनाती, सुख के सारे काम सजाती, दुख में भी ये साथ निभाती। उदाहरण छवि
तारों में छिपा संगीत, माँ सरस्वती का गहना, छेड़े जब अँगुलियाँ, बहे रागों का झरना। उदाहरण छवि
दो हाथों से बजती है ये, ताल से थिरके पैर, हर उत्सव की है ये साथी, लटक गले ये करती सैरा उदाहरण छवि
नागिन-सी लहराती है जो, बड़ी खास आवाज है जिसकी, तीन, चीन, रंगीन, हीन से मिली-जुली पहचान है इसकी। उदाहरण छवि
सौ तारों का जादू, डंडियों से जो गाए, कश्मीर की वादियों जैसा मधुर संगीत लाए। उदाहरण छवि
छोटा-सा यंत्र है, हाथों से बजता जाए, पर-मंदिर का साथी, झंकार से मन बहलाए। उदाहरण छवि

चित्र करते हैं बातें

नीचे दिए गए चित्र को ध्यान से देखिए-

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यह मीरा का काँगड़ा शैली में बना चित्र है। इस चित्र के आधार पर मीरा के संबंध में एक अनुच्छेद लिखिए।

सावन से जुड़े गीत

अपने परिजनों, मित्रों, शिक्षकों, पुस्तकालय या इंटरनेट की सहायता से सावन में गाए जाने वाले गीतों को ढूंढ़िए और किसी एक गीत को अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए। आप सावन से जुड़ा कोई भी लोकगीत, खेलगीत, कविता आदि लिख सकते हैं। कक्षा के सभी समूहों द्वारा एकत्रित गीतों को जोड़कर एक पुस्तिका बनाइए और कक्षा के पुस्तकालय में उसे सम्मिलित कीजिए।

खोजबीन

आपने पढ़ा कि मीरा श्रीकृष्ण की आराधना करती थीं। आपने कक्षा 6 की पुस्तक मल्हार में पढ़ा था कि सूरदास भी श्रीकृष्ण के भक्त थे। अपने समूह के साथ मिलकर सूरदास की कुछ रचनाएँ ढूँढ़कर कक्षा में सुनाइए। इसके लिए आप पुस्तकालय और इंटरनेट की सहायता ले सकते हैं।

आज की पहेली

पाठ में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। इनकी अंतिम ध्वनि से मिलती-जुलती ध्वनि वाले शब्द वर्ग में से खोजिए और लिखिए- Screenshot 2025-06-30 113119
शब्द समान ध्वनि वाले शब्द
1. मूरति सूरति
2. सावन
3. उमड़
4. नागर
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खोजबीन के लिए

नीचे दी गई इंटरनेट कड़ियों का प्रयोग करके आप कवयित्री मीरा के बारे में और जान-समझ सकते हैं-
  • मीरा
  • मीरा के भजन
  • मीराबाई
  • मीरा के भजन- एम एस सुब्बु लक्ष्मी
  • मीरा फिल्म 1945 भाग एक
  • मेरे तो गिरधर गोपाल

पढ़ने के लिए

स्वामिभक्त सुमुख

पुराने समय में, महिंसक राज्य में जब सकुल नामक राजा का शासन था, चित्रकूट पर्वत पर एक गुफा में हंसों का बहुत बड़ा झुंड निवास करता था। एक दिन कुछ हंस आहार की तलाश में निकल पड़े।

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आह! नगर के पास एक भव्य कमल-सरोवर दिख रहा है।

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वह मानुसिय कहलाता है।वह बहुत सुंदर है। उसमें पाँच प्रकार के कमल उगते हैं।हमारे चुगने के लिए वह आदर्श जगह रहेगी।

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हंसों के राजा मरालदेव को तनिक संदेह था-नहीं हमें चित्रकूट का अपना क्षेत्र नहीं छोड़ना चाहिए।

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उसका मंत्री सुमुख उनसे सहमत था।पर एक बार जगह तो देखें!हाँ, महाराज ठीक कह रहे हैं और वैसे भी. जिस जगह का उपयोग मनुष्य करते हों, वहाँ पर जाना हमारे लिए सुरक्षित नहीं है।

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जब हंसों की टोली ने जोर डाला-ठीक है। अगर इसी में तुम सबकी खुशी है, तो हम तुरंत वहाँ जाएँगे।

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हंस-टोली मानुसिय सरोवर की ओर उड़ चली।आह! नगर के पास एक भव्य कमल सरोवर दिख रहा है।

चूँकि अनेक पक्षी उस सरोवर पर आते-जाते थे, इसलिए शिकारियों का वह मनपसंद स्थान बन गया था। जब हंस-टोली सरोवर पर उतरी तो हंसों के राजा के पाँव आखेटक के जाल में फंस गए।

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ओह! मैं तो फंस गया!

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अगर मैं अभी ही चिल्ला पड़ा तो मेरे साथी बिना कुछ चुगे ही उड़ जाएँगे।

बेचारे! यहाँ पहुँचने के लिए उन्होंने कितनी लंबी उड़ान भरी है।

और चुपचाप ही अपने पाँव छुड़ाने का प्रयास करने लगा-मैं जितना खींचता हूँ, जाल की रस्सी मेरे शरीर में उतनी ही अधिक फंसती जाती है।

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उसने शांति से इंतजार किया।

आह! अब वे पानी में क्रीड़ा और उछल-कूद कर रहे हैं। उन्होंने पेट-भर चुग लिया होगा।तब हंसों को संकट का संकेत सुनाई दिया-

आह! खतरे का संकेत ! चलो, जल्दी वापस चित्रकूट चलते हैं!

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लेकिन पुकारा किसने था?

यह पता लगाने का समय नहीं है। हमें अपने प्राणों की रक्षा करने के लिए यहाँ से उड़ जाना चाहिए। पूरी टोली में केवल एक हंस ऐसा था, जो उड़ जाने को तैयार न था। और वह था- मंत्री सुमुख।

मुझे महाराज मरालदेव दिखाई नहीं दे रहे। कहीं वही तो घायल नहीं हो गए?चिंताग्रस्त, सुमुख सरोवर पर लौट कर गया और उसने राजा को घायल और लहूलुहान अवस्था में पाया

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चिंता न करें, महाराज। मैं अपनी जान देकर भी आपको बंधन से छुड़ाऊँगा।

लेकिन तुम क्यों चिंता करते हो, देखो, शेष सबके सब उड़ गए हैं। मेरे जैसे फंसे हुए पक्षी के लिए आशा ही क्या बचती है भला?

मैं आपको इस स्थिति में छोड़ने की अपेक्षा आपके साथ मर जाना अधिक पंसद करूंगा।

लेकिन तुम्हारे इस बलिदान से हमारा या किसी और का कौन-सा प्रयोजन सिद्ध हो सकता है?

हे पक्षियों में श्रेष्ठ, संकट की इस घड़ी में आपके साथ रहना मेरा परम कर्तव्य है।

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सचमुच, ऐसा करना तुम्हारी महानता का प्रमाण है। मैं तुम्हारी स्वामीभक्ति की प्रशसा करता हैं। फिर भी, मैं तुम्हें जाने की अनुमति देता हूँ।

देखो! आखेटक इसी ओर आ रहा है।

वाह! क्या सौभाग्य है! आज मेरे जाल में एक साथ दो हंस फैसे हैं!

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लेकिन जब वह निकट गया-

अरे, तुम तो मुक्त हो! फिर दूसरे हंस की भाँति उड़ क्यों नहीं जाते?मैं इन्हें नहीं छोड़ सकता। ये मेरे राजा होने के साथ-साथ प्रिय मित्र भी हैं। इन्हें मुक्त कर दो और हमें जाने दो।

लेकिन तुम तो जब चाहो जा सकते हो!

नहीं, मैं अकेले अपनी मुक्ति की कामना नहीं करता। सचमुच मैं तुमसे विनती करता हूँ, महाराज को छोड़ दो और बदले में मुझे पकड़ लो।

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मैं इनके समान ही आकार में बड़ा और मोटा-ताजा हैं। इनके स्थान पर अगर तुम मुझे पकड़ लो तो तुम्हें कोई हानि नहीं होगी।

तभी..

इस प्रकार सौम्यता से किंतु दृढ़तापूर्वक बातचीत करके सुमुख आखेटक का हृदय परिवर्तन करने में सफल हो गया।

मैं तुम्हारी स्वामीभक्ति देख कर अत्यंत प्रभावित हूँ। जाओ, मैं तुम्हारे राजा को मुक्त कर देता हूँ।

बड़ी कोमलता से आखेटक ने हंस के फैसे हुए पाँव को छुड़ाया और उसके जख्मों को धोकर साफ किया।

धन्यवाद! तुम भी सदा सुखी रहो।

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इस आखेटक ने हमें छोड़ कर हम पर बहुत उपकार किया है।

यह चाहता तो हमें क्रीड़ा हंस बनाकर यहाँ के राजा को भेंट करके पुरस्कार पा सकता था या हमें मारकर हमारा माँस बेच सकता था। आप इस आखेटक की ओर से यहाँ के राजा से बात क्यों नही करते।

हमें अपने राजा के पास ले चलो !

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लेकिन ऐसा करना संकट से खाली नहीं है। राजा तुम्हें पालतू बनाकर बंधन में रख सकते हैं या मरवा भी सकते हैं।

तुम्हारा हृदय परिर्वतन हो गया। हो सकता है कि तुम्हारे राजा भी कठोर हृदय वाले न हों आखेटक दोंनो हंसों को राजा सकुल के पास ले गया।

आखेटक दोंनो हंसों को राजा सकुल के पास ले गया।

ये दोनों उत्तम हंस हैं, महाराज यह हंसों के राजा और उनके सेनापति हैं।

ये तुम्हारे हाथ कैसे लगे?

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तब आखेटक ने सारा किस्सा सुनाया- इन्हें सोने के आसन पर बैठाया जाए। इनके लिए शहद और मिसरी का प्रबंध किया जाए।

जब हंसों का खाना हो गया

हंसों मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता है?

ये दोनों उत्तम हंस हैं, महाराज यह हंसों के राजा और उनके सेनापति हैं।

हे राजा, इस आखेटक ने कृपापूर्वक हमें मुक्त किया। हम आपके पास इसे पुरस्कार दिलवाने के लिए आए हैं।

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राजा ने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली।

यह सब मेरे सेनापति सुमुख की समझदारी और निष्ठा के कारण संभव हुआ। उसने मुझे बचाने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी।

राजा सकुल की अनुमति लेकर हंसों का राजा मरालदेव और सुमुख अपने झुंड में वापस आ गए।

आप कैसे मुक्त हए?

यह सब मेरे सेनापति सुमुख की समझदारी और निष्ठा के कारण संभव हुआ। उसने मुझे बचाने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी।

पढ़ने के लिए

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा।
झंडा ऊँचा रहे हमारा ।।

सदा शक्ति बरसाने वाला, प्रेम सुधा सरसाने वाला।
वीरों को हरसाने वाला, मातृभूमि का तन मन सारा।।

झंडा ऊँचा रहे हमारा।
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा ।।

स्वतंत्रता के भीषण रण में, लख कर जोश बढ़े क्षण-क्षण में।
काँपें शत्रु देख कर मन में, मिट जावे भय संकट सारा ।।

झंडा ऊँचा रहे हमारा।
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा ।।

इस झंडे के नीचे निर्भय, ले स्वराज्य यह अविचल निश्चय ।
बोलो भारत-माता की जय, स्वतंत्रता है ध्येय हमारा।।

झंडा ऊँचा रहे हमारा।
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा ।।

Screenshot 2025-06-30 113119 Screenshot 2025-06-30 113119

आओ प्यारे वीरो आओ, देश धर्म पर बलि बलि जाओ।
एक साथ सब मिल कर गाओ, प्यारा भारत देश हमारा।।

झंडा ऊँचा रहे हमारा।
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा।।

इसकी शान न जाने पाये, चाहे जान भले ही जाये।
विश्व विजय करके दिखलाये, तब होवे प्रण पूर्ण हमारा।।

झंडा ऊँचा रहे हमारा।
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा ॥

---श्यामलाल गुप्त 'पार्षद'

शब्दकोश

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यहाँ आपके लिए एक छोटा-सा शब्दकोश दिया गया है। इस शब्दकोश में वे शब्द हैं, जो विभिन्न पाठों में आए हैं और आपके लिए नए हो सकते हैं। किसी-किसी शब्द के कई अर्थ भी हो सकते हैं। पाठ के संदर्भ से जोड़कर आप यह अनुमान स्वयं लगाएँ कि कौन-सा अर्थ पाठ के लिए अधिक उपयुक्त है।

कहीं-कहीं शब्दों के अनेक समानार्थी भी दिए गए हैं। इससे आप प्रसंग के अनुसार अनुकूल शब्द का चयन करना सीख सकेंगे। यह शब्दकोश आपको शब्दों के न केवल सही अर्थ जानने में सहायता करेगा अपितु शब्दों की सही वर्तनी भी सिखाएगा।

शब्द का अर्थ देने से पहले मूल शब्द के बाद कोष्ठक में एक संकेताक्षर दिया गया है। इन संकेतों से हमें शब्दों की भाषा और व्याकरण संबंधी जानकारी मिलती है। यहाँ जो संकेताक्षर अथवा संक्षिप्त रूप प्रयुक्त हुए हैं, वे इस प्रकार हैं-

अं. - अंग्रेज़ी अ. - अव्यय अ. - अरबी अ.क्रि. - अकर्मक क्रिया पु. - पुंलिंग फा. - फारसी वि. - विशेषण सं. - संस्कृत स.क्रि. - सकर्मक क्रिया सर्व. - सर्वनाम स्त्री. - स्त्रीलिंग

  • अकाल [पु.सं.] - सूखा, अयोग्य या अनियत काल, कुसमय, अनवसर, परमात्मा
  • अदृश्य [वि.सं.] - जो दिखाई न दे, जो देखा न जा सके, अगोचर, लुप्त, गायब
  • अधर [वि.सं.] - होंठ, नीचे का ओठ, अंतरिक्ष, पाताल, दक्षिण दिशा
  • अनोखी [वि.] - अनूठा, अद्भुत, अपूर्व, नया, सुंदर
  • अनौपचारिक [वि.सं.] - नियम आदि का पालन न किया गया हो
  • अभिवादन [पु.सं.] - प्रणाम करना, छोटे की ओर से बड़े को नमस्कार, स्तुति
  • असफल [वि.सं.] - विफल, नाकामयाब

  • आखेटक [पु.सं.] - शिकारी, शिकार
  • आग्रही [वि.सं.] - आग्रह करने वाला
  • आजीविका [स्त्री.सं.] - रोजगार, रोजी, धंधा
  • आमोद [पु.सं.] - हर्ष, प्रसन्नता, खुशी, बिखरने और फैलने वाली सुगंध, सुरभि
  • आवन [पु.] - आगमन
  • आवरण [पु.सं.] – ढकना, छिपाना, घेरना, ढक्कन, परदा, बचाव, ढाल, चहारदीवारी
  • आवेश [पु.सं.] - प्रवेश, दबा लेना, हावी हो जाना, गुस्सा, जोश, घमंड, लगन
  • आश्चर्य [पु.सं.] - अचरज, अचंभा, विस्मय, अद्भुत रस का स्थायी भाव
  • आश्रय [पु.सं.] - आधार, विषय, शरण, ठिकाना, घर, सहायता
  • आहत [वि.सं.] – घायल, आघात किया गया हो, जिस पर प्रहार, मारा हुआ, हटाया

  • उपवन [पु.सं.] - उद्यान, बगीचा
  • उभय [वि.सं.] - दोनों, दो में से प्रत्येक
  • उमग्यो [स्त्री.] - उमंग, उल्लास, मौज, जोश, उभार, उमड़ा, आकांक्षा
  • उमड़ [स्त्री.] - बाढ़, धावा, घिराव
  • उर [वि.सं.] - हृदय, मन

औपचारिक [वि.सं.] - गौण, उपचार संबंधी, दिखाऊ

  • कटितट [पु.सं.] - कमर
  • कतार [स्त्री. (अ.)] – पंक्ति, पाँत, क्रम, सिलसिला, समूह
  • कपोत [पु.सं.] - कबूतर, पंडुक, चिड़िया
  • कसर [स्त्री. (अ.)] - कमी, न्यूनता, घाटा, वैर, विकार
  • काक [पु.सं.] - कौआ, एक द्वीप, एक माप, कान
  • कुंज [पु.सं.] - लता आदि से घिरा या ढका हुआ स्थान, हाथी का दाँत, नीचे का जबड़ा, गुफा
  • कुढ़न [स्त्री.] - खीझ, कुढ़ने का भाव, जलन, विवशता आदि की अनुभूति से होने वाला मनस्ताप
  • कुल [पु.सं.] - वंश, घराना, गोत्र, समुदाय, श्रेणी, घर, आवास, जनपद, सब, सारा
  • कोकिल [पु.सं.] - कोयल, अंगारा, एक तरह का साँप

क्ष

  • क्षुद्र [वि.सं.] – नन्हा, छोटा, तुच्छ, खोटा, ओछा
    • खंजन [पु.सं.] - एक प्रसिद्ध छोटी चिड़िया, जो मैदानी प्रदेशों में केवल जाड़े में दिखाई देती है, खंडरिच, लँगड़ाते हुए चलना
    • खग [पु.सं.] - पक्षी, सूर्य, ग्रह, वायु, बादल, चंद्रमा, बाण, देवता
    • खता [पु.] - क्षत, घाव

    • गावन [स्त्री.] - गाने का ढंग
    • गुजारा [पु.फा.] - निर्वाह, रास्ता, घाट, पुल या नाव से नदी पार करना

    • घंटिका [स्त्री.सं.] - छोटी घंटी, घुँघरू
    • घनघोर (वि.सं.] - बहुत घना, जबरदस्त, गहरा, भयंकर
    • घसियारा [पु.] - घास खोदने वाला, घास काटने वाला, घास बेचने वाला
    • घुमड़ (अ.क्रि.] - बादलों का इधर-उधर से आकर जमा होना

    • चकित [वि.सं.)- विस्मित, हैरान, शंकित, घबराया हुआ, भीत
    • चहुँ [वि.] - चारों ओर, चार
    • चातक [पु.सं.] - पपीहा, सारंग (कवि-संप्रदाय के अनुसार यह पक्षी केवल वर्षा, बल्कि स्वाती नक्षत्र में होने वाली वर्षा का जल पीता है, फलतः सदैव बादलों की ओर टकटकी लगाए रहता है।)
    • चापलूस [वि.फा.] - चाटुकार, खुशामदी
    • चित्त [पु.सं.] अंतःकरण, मन, अंतरिंद्रिय
    • चेटी [स्त्री.सं.] - दासी, सेविका, सेवा-टहल करने वाली स्त्री

    • छटा [स्त्री.सं.] शोभा, छवि, झलक, दीप्ति, पंरपरा, बिजली
    • छुटपन (पु.अ.] - छोटापन, बचपन

    • जलाशय [पु.सं.] - झील, तालाब, जलाधार, समुद्र
    • जिय [पु.] - जी, मन, जान, चित्त, जीव

    • झर [पु.सं.] - झरना, सोता, जल प्रवाह की ध्वनि, ज्वाला, आँच, झुंड
    • झलमल [पु.वि.] - झलमलाने का भाव, अस्थिर झलमलाता हुआ प्रकाश
    • झुंझलाना [अ.क्रि.] - खीझना, चिढ़ना, बिगड़ना

  • ट्रैफिक (अं.) – यातायात
  • ठाठ [पु.] - शान, सजधज, सितार का तार
  • ढाल [स्त्री. सं.) – तलवार, भाले आदि के आघात को रोकने का लोहे या गैंडे के चमड़े का बना कछुवे की पीठ जैसा एक साधन, आगे की ओर क्रमशः नीची होती गई जमीन, उतार, ढंग, प्रकार
    • तात [पु.सं.] - पिता, आदरणीय व्यक्ति
    • ताप [पु.सं.] - गरमी, ज्वर, दुःख, मानसिक व्यथा, आधि, ऊष्णता, गर्माहट के लिहाज से किसी वस्तु की दशा-वह दशा जो एक वस्तु से दूसरी वस्तु में ऊष्मा के प्रवाह की दिशा निर्धारित करती है।
    • तालीम (स्त्री. (अ.)] - शिक्षा
    • ताहि [सर्व.] - उसे, उसको

    • दम [पु.फा.] साँस, श्वास, पल, लहजा, क्षण, ताकत, जिंदगी, जोर
    • दामिन (स्त्री.] - दामिनी, बिजली
    • दुर्जन [पु.सं.] - दुष्ट मनुष्य, खल
    • द्रोह (पु.सं.] दूसरे का अनिष्ट चाहना, हिंसा, अपराध, वैर, विद्रोह

    • नभ (पु.सं.) आकाश, आसमान, मेघ, जल, पृथ्वी आदि पाँच तत्वों में से एक
    • निर्भय [वि.सं.] - निडर, निरापद, जो किसी से भय न खाय
    • नूपुर [पु.सं.] - घुँघरू, पैर का एक गहना
    • नैना (पु.] - नेत्र, आँख,

    • पनघट (पु.] - पानी भरने का घाट
    • परतीती - प्रतीति, ज्ञान, बोध, हर्ष, विश्वास
    • पवन [पु.सं.] - हवा, छलनी, पानी
    • पैनी [वि.स्त्री.] - जो भीतर की वस्तु को देख सके, जिसकी धार बहुत तेज हो
    • प्रशिक्षण (पु.] - किसी व्यवसाय, कला, दौड़ आदि की व्यावहारिक रूप में लगातार कुछ समय तक दी जाने वाली शिक्षा, ट्रेनिंग

    • फरमाइश [स्त्री.फा.) आज्ञा रूप में कुछ माँगना, आज्ञा, कोई चीज भेजने की आज्ञा, आर्डर
    • फौरन [अ. (अ.)]- तुरंत, अभी, झटपट

    • बधारना [स.क्रि.] छौंकना, तड़का देना, हींग, जीरा, प्याज आदि घी में कड़कड़ाकर दाल, तरकारी आदि में डालना
    • बसन [पु.सं.] वस्त्र, आवरण, ढकने की वस्तु, निवास
    • बानी [स्त्री.] - वाणी, सरस्वती, सार्थक शब्द, वचन, जीभ, स्वर, प्रशंसा
    • बिद्ध [वि.] - बिंधा हुआ, छेदा हुआ
    • बिसारि [स.क्रि.] - बिसराना, भुला देना

    • भक्तवछल- [वि.] - भक्त को प्यार करने वाला, भक्त के प्रति स्नेहयुक्त
    • भक्षक [वि.सं.] - खाने वाला, भक्षण करने वाला
    • भनक [स्त्री.] - धीमी, अस्पष्ट ध्वनि, उड़ती हुई खबर
    • भावन [पु.सं.] - निमित्त, कारण, उत्पादन, रुचि-वर्धन, चिंतन, कल्पना, स्मरण
    • भाव-भंगिमा [स्त्री.सं.] - मन के विकार को व्यक्त करने वाला अंग चालन या क्रिया
    • भौर [पु.] - भ्रमर, भौंरा, मधुप, जलावर्त
    • भ्रमण [पु.सं.] घूमना, फिरना, यात्रा, अस्थिरता, चक्कर

    • मंत्र [पु.सं.) – सलाह, राय, गुप्त वार्ता, कान में कही जाने वाली बात, कार्य सिद्धि का गुर, [स्त्री.] समक्ष, बुद्धि
    • मनहर [वि.सं.] - मन को हरने-चुराने वाला, सुंदर
    • मानधन [पु.सं.वि.] - मान का धनी, प्रतिष्ठा ही जिसका धन हो
    • मुक्ति [स्त्री.सं.] - आजादी, छुटकारा, मोक्ष
    • मूरति [स्त्री.सं.] - मूर्ति, शरीर, स्वरूप या शक्ल, प्रतिमा
    • मेह [पु.] - वर्षा, बरसात, झड़ी (पड़ना, बरसना)

    • रस [पु.सं.] - स्वाद, आनंद, प्रेम, द्रव, जल, मन में उत्पन होने वाला वह भाव, जो काव्य पाठ, अभिनय-दर्शन आदि से होता है
    • रसाल [वि.सं.] - रसीला, मीठा, मधुर, सुंदर, शुद्ध
    • राजति [अ.क्रि.] - राजना, रहना, शोभित होना, विराजना
    • रिसेस [अं.] - अल्पावकाश, मध्यावकाश
    • रीति [स्त्री.सं.] - नियम, झरना, टपकना, ढंग, प्रकार, तरीका, चलन
    • रेवड़ [पु.] - भेड़ों का समूह, पशुओं का झुंड, गल्ला

    • लहरा [पु.] - लहर, मजा, आनंद, बाजों की संगत, जिसमें ताल-स्वरों की केवल लय होती हैं, बादलों का कुछ देर जोर से बरसना, एक घास
    • लावन [स्त्री.] - लावनि, लावण्य, सुंदरता

    • वर्ण [पु.सं.] रंग, भेद, अक्षर, शब्द, स्वर
    • वादक [पु.सं.] - बजाने वाला, बोलने वाला, शास्त्रार्थ करने वाला
    • विकार [पु.सं.] परिवर्तन, भावना, वासना, क्षोभ, रूप, धर्म आदि स्वाभाविक अवस्था का परिवर्तित होना
    • विचरण [पु.सं.] घूमना-फिरना, चलना, भ्रमण करना
    • व्यापक [वि.सं.] - सर्वत्र फैला हुआ, दूर तक, जो किसी चीज के सारे विस्तार में हो

    • शाखा [स्त्री.सं.] - पेड़ की डाल, दरवाजे की चौखट, बाहु, संप्रदाय
    • शुक [पु.सं.)- सुम्गा, तोता, वस्त्र, पोशाक
    • शैली [स्त्री.सं.] रीति, किसी काम के करने का ढंग तरीका, पद्धति
    • श्याम [वि.सं.] - साँवला, काला, कृष्ण

    • सदय [वि.सं.] - दयालु, रहम दिल
    • समुझि [स्त्री.] - समझ, बुद्धि, प्रज्ञा, विचार
    • साजिंदे [पु.फा.] - साज बजाने वाला (सारंगिया, तबलची)
    • सिद्धि [स्वी.सं.वि.] - सफलता, अभ्युदय, अनुमान, दक्षता, निपुणता, मोक्ष, लाभ
    • सुखदाई [पु.सं.] सुख देने वाला
    • सुधा [स्वी.सं.] अमृत, रक्त, रस, दूध, जल, शहद, गंगा, बिजली, पृथ्वी
    • सुधि [स्त्री.] - याद, होश, चेत, खबर
    • सुर (पु.सं.) स्वर, आवाज, देवता, सूर्य
    • सुरभि (वि.सं.] - सुगंधित, खुशबूदार, प्रिय, मनोरम, प्रसिद्ध, बुद्धिमान, विद्वान
    • सूरति [स्त्री.] शक्ल, रूप, वाद, स्मरण
    • सोहता [वि.] मोहक, सुंदर
    • सोहावन (अ.क्रि.] - अच्छा लगना, भला मालूम, सुन्दर, शोभित होना
    • स्वच्छंद (पु.सं.) - अपनी इच्छा, पसंद

    • हँसिया (पु.] - लोहे का धनुषाकार औजार जिससे फसल, तरकारी आदि काटते हैं
    • हठी [वि.सं.] - हठ करने वाला, जिद्दी


    'ब्रेल भारती' हिंदी वर्ण व गिनती

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    पहेलियों के उत्तर

    पाठ संख्या
    1. माँ, कह एक कहानी आज की पहेली माँ, पक्षी, सुरभि
    2. तीन बुद्धिमान आज की पहेली गिरगिट, नीला डिब्बा
    4. पानी रे पानी आज की पहेली मेह, जलाशय, नीर, अंबु, सर, सरोवर, सलिल, ताल, तटिनी, बारिश, प्रवाहिनी, तरंगिणी
    5. नहीं होना बीमार आज की पहेली आलू का पराठा, मसाला डोसा, वड़ा पाव, ढोकला, पानी पूरी, मक्के की रोटी, बाटी, रसगुल्ला
    7. वसंत बहार आज की पहेली ग्रीष्म ऋतु, वर्षा ऋतु, शरद ऋतु, वसंत ऋतु, शीत ऋतु, पतझड़
    8. बिरजू महाराज से साक्षात्कार आज की पहेली रूपक, लक्ष्मी, तिलवाड़ा, कहरवा, झूमरा, दीपचंदी, दादरा
    9. चिड़िया आज की पहेली तोता, कौवा, खंजन, कोयल, कबूतर, चातक, हंस
    10. मीरा के पद मधुर ध्वनियाँ

    आज की पहेली
    बाँसुरी, तबला, शहनाई, वीणा, ढोलक, बीन, संतूर, मजीरा

    आवन, घुमड़, नगर, गोपाल