- क्या आपने कभी सोचा है कि यदि आपके आस-पास का अदृश्य संसार दृश्यमान हो जाए तो आप क्या देख पाएँगे?
- आपको क्या लगता है कि इस अदृश्य संसार का अवलोकन करना- 'आकार', 'जटिलता' अथवा 'सजीवों' के संबंध में आपके सोचने के ढंग को कैसे परिवर्तित कर सकता है?
- क्या आपने कभी सोचा है कि ये सूक्ष्म जीव एक-दूसरे के साथ किस प्रकार परस्पर क्रिया करते हैं?
- अपने प्रश्नों को साझा कीजिए
_____________
_____________?
मानव नेत्र केवल उन वस्तुओं को देख सकते हैं जो एक निश्चित आकार से बड़ी होती हैं। लंबे समय तक हम अपने आस-पास की कई छोटी-छोटी वस्तुओं से अनभिज्ञ थे। बहुत समय पूर्व लोगों ने यह खोज की थी कि काँच का एक वक्रित टुकड़ा छोटी वस्तुओं को बड़ा दिखा सकता है। यह काँच का टुकड़ा मसूर की दाल (लेंटिल) के दाने जैसा था जोकि बीच से मोटा और किनारों पर पतला था इसलिए उन्होंने इसे लेंस कहा। समय के साथ लेंसों की गुणवत्ता में सुधार किया गया एवं उनकी आवर्धन क्षमता को बढ़ाया गया। साधारण आवर्धक लेंस से लेकर सूक्ष्मदर्शी तक प्रत्येक नए उपकरण ने मनुष्यों को वह देखने में सहायता की जिसे नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता था। सूक्ष्मदर्शी के आविष्कार ने छोटे-छोटे जीवों से भरे एक अद्भुत और अदृश्य संसार का मार्ग प्रशस्त किया। इस अध्याय में हम ऐसे ही कुछ जीवन रूपों का अन्वेषण करेंगे।
आप जीवों की अद्भुत विविधता के विषय में पहले ही पढ़ चुके हैं। अपने चारों ओर देखिए कितने सारे सुंदर पेड़-पौधे और जीव-जंतु हैं! वे विविध आकार, रंग और रूप के हैं। कुछ जीव-जंतु बहुत छोटे होते हैं जबकि कुछ बहुत बड़े होते हैं। वे न केवल अपनी संरचना में अपितु अन्य लक्षणों में भी भिन्न होते हैं। ये सभी सजीव चाहे वे पौधे हों अथवा जंतु जीव कहलाते हैं। क्या आपने कभी यह सोचा है कि आपकी आँखों से दिखाई देने वाला सबसे छोटा जीव कौन-सा है? इस विषय पर विचार कीजिए कि वस्तुतः आपकी आँखें कितनी छोटी वस्तु को देख सकती हैं?
आपने कुछ लोगों को पढ़ने के लिए चश्मा पहने हुए देखा होगा। क्या आपने सोचा है कि चश्मा उन्हें स्पष्ट देखने में कैसे सहायता करता है? अथवा क्या होता है जब हम किसी वस्तु का अवलोकन करने के लिए आवर्धक लेंस का उपयोग करते हैं?
क्रियाकलाप 2.1- आइए, अवलोकन करें
- चित्र 2.1 में दर्शाए गए अनुसार एक गोल पेंदे वाला फ्लास्क लीजिए। इसे जल से भरिए।
- फ्लास्क के मुँह को कॉर्क से बंद कर दीजिए।
- अब फ्लास्क को एक खुली पुस्तक पर रखिए और इसके माध्यम से पुस्तक के अक्षरों को देखिए।
क्या आपने कुछ रोचक देखा? जब आप फ्लास्क के माध्यम से अक्षरों को देखते हैं तो वे बड़े दिखाई देते हैं! ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जल से भरा यह फ्लास्क एक आवर्धक लेंस की भाँति कार्य करता है। अब एक वास्तविक आवर्धक लेंस लीजिए और किसी छोटे जीव जैसे चींटी को देखिए। क्या आप उसके शरीर की संरचना को पहले से अधिक स्पष्ट देख पाए?

लंबे समय तक लोग अपने आस-पास के सूक्ष्म जीवों को देखने के लिए उत्सुक थे परंतु वे उन्हें अपनी नग्न आँखों से नहीं देख सकते थे तो फिर हम इस अदृश्य संसार की खोज कैसे कर पाए? क्या आप जानते हैं कि कौन-सी वैज्ञानिक खोज ने हमें सर्वप्रथम इस सूक्ष्म संसार को देखने में सहायता की?
वर्ष 1665 में रॉबर्ट हुक नामक एक वैज्ञानिक ने माइक्रोग्राफिया नामक एक पुस्तक प्रकाशित की। वे एक सतर्क प्रेक्षक और कुशल कलाकार भी थे। इस पुस्तक में उन्होंने अत्यंत छोटी-छोटी वस्तुओं के आवर्धित चित्र दिखाए जिन्हें लोगों ने पहले कभी नहीं देखा था। ये वस्तुएँ उन्होंने उस उपकरण से देखीं जिसे हम आज सूक्ष्मदर्शी कहते हैं।
उनका सूक्ष्मदर्शी नग्न आँखों से देखी जा सकने वाली वस्तुओं को उनके वास्तविक आकार से 200 से 300 गुना बड़ा दिखा सकता था। एक दिन उन्होंने कॉर्क के एक पतले टुकड़े को देखा और पाया कि उसमें कई छोटे-छोटे रिक्त स्थान (प्रकोष्ठ) हैं। ये प्रकोष्ठ उन्हें मधुमक्खी के छत्ते जैसे लगे। उन्होंने जो देखा उसका चित्र बनाया एवं प्रत्येक छोटे भाग को कोशिका कहा। विज्ञान के क्षेत्र में सर्वप्रथम जीवन की सबसे छोटी इकाई को कोशिका कहा गया।
वर्ष 1660 के दशक के आस-पास एंटोनी वॉन ल्यूवेनहॉक नामक एक डच वैज्ञानिक ने अधिक परिष्कृत लेंस बनाए जिनसे उन्होंने अधिक उपयोगी सूक्ष्मदर्शी का निर्माण किया। वह सूक्ष्मजीव जैसे जीवाणु और रक्त कोशिकाओं को स्पष्ट रूप से देखने और उनका वर्णन करने वाले प्रथम व्यक्ति थे। इसी कारण उन्हें सूक्ष्मजैविकी का जनक कहा जाता है।



2.1 कोशिका क्या है?
सभी सजीव कोशिकाओं से बने होते हैं। आप यह देखकर आश्चर्यचकित हो सकते हैं कि कोशिकाएँ वास्तव में कैसी दिखती हैं। आइए, एक सूक्ष्मदर्शी की सहायता से कोशिका की मूल संरचना का अधिक गहनता से अवलोकन करें।
क्रियाकलाप 2.2- आइए, कोशिका का अध्ययन करें (शिक्षक निदर्शन क्रियाकलाप)
- अपने रसोईघर से या बगीचे से एक प्याज लीजिए और उसे पानी से भली-भाँति धो लीजिए।
- प्याज को लंबवत टुकड़ों में काट लीजिए।
- एक टुकड़ा लीजिए और चिमटी की सहायता से उसकी भीतरी सतह से पतली एवं पारदर्शी परत को बाहर निकालिए। इस परत को प्याज की झिल्ली कहते हैं।
- प्याज की झिल्ली को 30 सेकंड के लिए सैफ्रेनीन (लाल रंग का अभिरंजक) की कुछ बूंदों वाली पेट्री डिश में रखिए। इससे कोशिकाएँ गुलाबी रंग की हो जाएँगी और हम उन्हें
- एक पतले ब्रश की सहायता से प्याज की झिल्ली को दूसरी पेट्री डिश में रखिए जिसमें पानी हो ताकि अतिरिक्त अभिरंजक निकल जाए।
- अब प्याज की अभिरंजित झिल्ली को काँच की स्लाइड पर एक पतले ब्रश की सहायता से रखिए। ध्यान रखिए कि न तो यह टूटे और न ही मुड़े।
- स्लाइड पर प्याज की झिल्ली के ऊपर ग्लिसरीन की एक या दो बूँद डालिए। ग्लिसरीन कोशिकाओं को सूखने से बचाएगा और उन्हें अधिक स्पष्ट रूप से देखने में सहायता करेगा।
- धीरे से एक कवरस्लिप को सुई की सहायता से प्याज की झिल्ली के ऊपर रखिए ताकि वायु के बुलबुले अंदर न जाएँ।
- शोषक पत्र से कवरस्लिप के किनारों पर जमा अतिरिक्त ग्लिसरीन को हल्के से पोंछिए।
- अब स्लाइड का सूक्ष्मदर्शी के द्वारा अवलोकन कीजिए। (एक कागज से निर्मित मोड़े जा सकने वाले सरल सूक्ष्मदर्शी का भी उपयोग कर सकते हैं) चित्र 2.3 (ग) से इसकी तुलना कीजिए।
- आपको चित्र 2.3 (ग) और 2.3 (घ) में क्या समानताएँ दिखती हैं? आपको सूक्ष्मदर्शी के नीचे लगभग आयताकार संरचनाएँ दिखाई देंगी। ये प्याज की झिल्ली की कोशिकाएँ होती हैं जो बिना किसी अंतराल के सघन रूप से व्यवस्थित होती हैं। अब आप अपने आस-पास के विभिन्न पौधों के पत्तों की झिल्ली को भी देखिए। आप पाएँगे कि सभी पौधे कोशिकाओं से बने होते हैं। आपके विचार से जंतुओं का शरीर किससे बना होता है?




क्रियाकलाप 2.3- आइए, अन्वेषण करें
- स्वच्छ जल से कुल्ला कीजिए।
- एक स्वच्छ टूथपिक के कुंद सिरे का उपयोग करके अपने कपोल (गाल) के भीतरी भाग को धीरे से खुरचिए।
- खुरचे हुए पदार्थ में पानी की एक बूँद मिलाकर एक स्वच्छ काँच की स्लाइड पर रखिए और उसे समान रूप से फैलाइए।
- स्लाइड पर रखे पदार्थ के ऊपर मेथिलीन ब्लू (नीले रंग का अभिरंजक) की एक बूँद डालिए। अभिरंजक के उपयोग से बढ़े हुए विपर्यास (कंट्रास्ट) के कारण सूक्ष्मदर्शी से देखने पर पदार्थ की दृश्यता अधिक स्पष्ट होती है।
- एक मिनट के पश्चात कोशिकाओं को सूखने से बचाने के लिए स्लाइड पर रखे पदार्थ के ऊपर ग्लिसरीन की एक बूँद डालिए।
- अब ध्यान से उस पदार्थ पर एक स्वच्छ कवरस्लिप रखिए और कवरस्लिप की सीमाओं से अतिरिक्त ग्लिसरीन को शोषक पत्र से हटा दीजिए।
- स्लाइड को सूक्ष्मदर्शी से देखिए और आपको जो दिखाई देता है उसे अपनी नोटबुक में चित्रित कीजिए।

आपने क्या अवलोकन किया? आप एक बहुभुजाकार संरचना देखेंगे जैसी चित्र 2.4 में दर्शाई गई है। ये कपोल की कोशिकाएँ हैं जो आपके मुँह की आंतरिक परत बनाती हैं।
क्रियाकलाप 2.2 में प्याज की झिल्ली की कोशिकाओं और क्रियाकलाप 2.3 में मानव कपोल की कोशिकाओं के बीच आपने क्या समानताएँ और भिन्नताएँ देखी?
आपने देखा होगा कि कोशिकाओं के तीन मुख्य भाग होते हैं। बाहरी परत को कोशिका झिल्ली कहते हैं। मध्यभाग में स्थित गोल संरचना केंद्रक है जो एक पतली झिल्ली से ढका होता है। कोशिका झिल्ली और केंद्रक के बीच का स्थान कोशिकाद्रव्य से भरा होता है। कोशिका के तीन मूलभाग, अर्थात कोशिका झिल्ली, कोशिकाद्रव्य और केंद्रक होते हैं। कुछ कोशिकाओं जैसे प्याज की झिल्ली की कोशिकाओं में एक अतिरिक्त बाहरी परत होती है जिसे कोशिका भित्ति कहते हैं। कोशिका में इन संरचनाओं का क्या महत्त्व है? ये क्या कार्य करती हैं? क्या ये कार्य जीवन को बनाए रखने के लिए महत्त्वपूर्ण हैं?
कोशिका झिल्ली कोशिकाद्रव्य और केंद्रक को घेरे रहती है। कोशिका झिल्ली एक कोशिका को दूसरी कोशिका से अलग करती है। यह सरंध्र होती है और जैव प्रक्रमों के लिए आवश्यक पदार्थों के प्रवेश और अपशिष्ट पदार्थों के निकास को नियंत्रित करती है।
कोशिकाद्रव्य में कोशिका के अन्य घटक और यौगिक, जैसे कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा और खनिज लवण उपस्थित होते हैं। अधिकांश जैव प्रक्रम कोशिकाद्रव्य के भीतर ही होते हैं।
कोशिका के भीतर होने वाली सभी गतिविधियों को केंद्रक नियंत्रित करता है। यह वृद्धि को भी नियंत्रित करता है।
पादप कोशिका में कोशिका भित्ति पौधों को मजबूती और दृढ़ता प्रदान करती है। यही कारण है कि सभी कोशिकाएँ एक-दूसरे के साथ सघन रूप से व्यवस्थित होती हैं एवं उनकी संरचनाएँ सुदृढ़ दिखाई देती हैं।

अब हम कोशिका की मूल संरचना को समझ चुके हैं। अब हम यह भी समझ गए हैं कि पादप और जंतु कोशिकाएँ आकार और संरचना में भिन्न होती हैं।
क्या विभिन्न जंतु कोशिकाएँ भी आकार और संरचना में भिन्न होती हैं?
2.1.1 कोशिकाओं के आकार और संरचना में विभिन्नता
मानव की पेशी कोशिका और तंत्रिका कोशिका को चित्र 2.6 (क) और (ख) में दर्शाया गया है। आप इनमें क्या समानताएँ और भिन्नताएँ देखते हैं?

एक पेशी कोशिका (चित्र 2.6, क) तर्कुरुपी (Spindle) होती है जबकि एक तंत्रिका कोशिका (चित्र 2.6, ख) बहुत लंबी और शाखित होती है। इसी प्रकार कुछ कोशिकाएँ गोलाकार होती हैं जबकि कुछ अन्य लंबी एवं पतली होती हैं। विभिन्न जीवों में कोशिकाओं की संख्या भी भिन्न-भिन्न होती है। कोशिकाएँ एक-दूसरे से इतनी भिन्न क्यों दिखती हैं? क्या कोशिका का आकार और संरचना उसके प्रकार्य से संबंधित है?
कोशिकाओं का विशिष्ट आकार, आमाप और संरचना उन्हें अपने विशिष्ट कार्य करने में सहायता करती है। आइए पता लगाएँ कि ये कोशिकाएँ शरीर में विभिन्न कार्यों को करने में कैसे सहायता करती हैं?
आपने गतिविधि 2.3 में देखा कि कपोल की आंतरिक कोशिकाएँ पतली और चपटी होती हैं। ये कपोल की आंतरिक सतह पर एक सुरक्षात्मक परत बनाती हैं। तंत्रिका कोशिका को न्यूरॉन भी कहा जाता है, ये हमारे शरीर में संदेश ले जाती हैं। इनका दीर्घाकृत आकार और शाखित संरचना इन्हें शरीर के विभिन्न भागों तक पहुँचाने और संदेशों को शीघ्रता से पहुँचाने में सहायता करती हैं। इसी प्रकार पादप कोशिकाएँ भी विभिन्नताएँ प्रदर्शित करती हैं। पौधों में भी कोशिकाएँ आयताकार, लंबी, अंडाकार यहाँ तक कि नलिकाकार भी हो सकती हैं। कुछ पादप कोशिकाएँ लंबी नलिकाएँ बनाती हैं जो पूरे पौधे में पानी पहुँचाने में सहायता करती हैं।
आप पहले ही कक्षा 7 में पाचन तंत्र के विषय में पढ़ चुके हैं। पाचन तंत्र के विभिन्न भाग विभिन्न प्रकार की कोशिकाओं से बने होते हैं। भोजन नली में पेशी कोशिकाओं का एक समूह उपस्थित होता है। ये कोशिकाएँ लहर की तरह संकुचित और शिथिल होती हैं जिससे भोजन आमाशय तक पहुँचता है। यह गति इसलिए संभव है क्योंकि पेशी कोशिकाएँ पतली, लचीली और तर्कुरूपी होती हैं। आमाशय में भी विभिन्न प्रकार की कोशिकाएँ होती हैं जो अलग-अलग कार्य करती हैं। आमाशय की भित्ति में स्थित पेशी कोशिकाएँ भोजन को मथने में सहायता करती हैं। आमाशय के आंतरिक आस्तर में स्थित अन्य कोशिकाएँ पाचक रस और अम्ल उत्पन्न करती हैं जो भोजन को विघटित करने में सहायता करते हैं। ये सभी कोशिकाएँ मिलकर पाचन को संभव बनाती हैं।

2.2 सजीवों के शरीर में संगठन के स्तर क्या हैं?
सजीवों का शरीर जटिल रूप में संगठित होता है। कोशिका (चित्र 2.7, क) जीवन की एक मूल इकाई है ठीक उसी तरह जैसे ईंट दीवार की मूल इकाई है (चित्र 2.3, घ)। समान कोशिकाओं का एक समूह एक प्रकार का ऊतक बनाता है (चित्र 2.7, ख)। विभिन्न ऊतक मिलकर एक अंग बनाते हैं (चित्र 2.7, ग)। कई अंग मिलकर एक अंग-तंत्र बनाते हैं जो शरीर का एक प्रमुख कार्य करता है (चित्र 2.7, घ)। सभी अंग-तंत्र मिलकर एक संपूर्ण जीव बनाते हैं (चित्र 2.7, ङ) जैसे – कोई पौधा या जंतु। अतः संगठन के स्तर निम्न हैं --
कोशिका ->ऊतक ->अंग -> अंग-तंत्र -> जीव
संगठन के ये स्तर हमें यह समझने में सहायता करते हैं कि किस प्रकार कोशिकाओं जैसे सरल निर्माण खंड एक साथ मिलकर एक जटिल जीव की रचना करते हैं।
जटिल जीवों का जीवन एक एकल कोशिका 'अंडे' से आरंभ होता है। किसी भी जीव के अंडे में बार-बार विभाजित होकर अनेक कोशिकाओं से निर्मित एक पूर्ण जीव बनाने की अद्भुत क्षमता होती है। ऐसे जीवों को बहुकोशिकीय जीव कहा जाता है। मानव सहित सभी जंतु एवं पौधे बहुकोशिकीय जीवों के उदाहरण हैं।

शुतुरमुर्ग के अंडे का पीतक (अंडे का पीला भाग) सबसे बड़ी ज्ञात एकल जीवित कोशिका है। इसका व्यास लगभग 130 मिलीमीटर से 170 मिलीमीटर तक होता है। अंडे में अतिरिक्त अकोशिकीय पदार्थ होता है जो सुरक्षा के लिए एक खोल और एक सफेद तरल कोशिका को उसके निरंतर विकास के समय पोषण देता है।
2.3 सूक्ष्मजीव क्या हैं?
कुछ सजीव केवल एक या कुछ कोशिकाओं से बने होते हैं। ये इतने छोटे होते हैं कि इन्हें नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता। इन्हें सूक्ष्मजीव कहते हैं। कुछ सूक्ष्मजीव जैसे जीवाणु और अमीबा केवल एक कोशिका (एककोशिकीय) से बने होते हैं। अन्य कुछ कवक एवं शैवाल में अनेक कोशिकाएँ (बहुकोशिकीय) होती हैं। ये सर्वत्र पाए जाते हैं अर्थात जल, मृदा, वायु और यहाँ तक कि हमारे शरीर के अंदर भी! परंतु इनकी कोशिकाएँ कैसी दिखती हैं? क्या ये उन पौधों और जंतुओं की कोशिकाओं के समान हैं जिनके विषय में हमने अभी-अभी पढ़ा है अथवा ये अलग हैं? सूक्ष्मजीव की कोशिकाओं का अवलोकन करने के लिए हमें पुनः एक सूक्ष्मदर्शी का उपयोग करना होगा जो उनके आमाप को आवर्धित कर देता है जिससे हम उन्हें देख सकें। वैज्ञानिकों ने एक कम लागत का कागज और लेंस से बना सूक्ष्मदर्शी विकसित किया है जिसे सरलता से मोड़ कर रखा जा सकता है। यह सूक्ष्मदर्शी उच्च आवर्धन क्षमता वाले प्रयोगशाला सूक्ष्मदर्शी जैसे विवरण प्रदान नहीं कर सकता है तथापि इनकी सहायता से अनेक लोगों के लिए सूक्ष्मदर्शीय संसार को देखना संभव हुआ है।
आइए, अब हम सूक्ष्मजीवों के रोचक संसार को निकट से देखें।
क्रियाकलाप 2.4- आइए, तालाब के जल या रुद्ध जल का अवलोकन करें
- एक पात्र लीजिए और अपने शिक्षक या बड़ों की सहायता से उसमें तालाब के जल या रुद्ध जल को एकत्रित कीजिए।
- बिंदुपाती की सहायता से तालाब के जल या रुद्ध जल की एक बूँद सूक्ष्मदर्शी की स्लाइड पर डालिए। एक कवरस्लिप लगाकर उसे सूक्ष्मदर्शी के द्वारा देखिए।
- तालाब के जल या रुद्ध जल में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवों का अवलोकन कीजिए।
क्रियाकलाप 2.5- आइए, मृदा निलंबन का अवलोकन करें
- एक बीकर लीजिए और उसमें आस-पास के खेत या उद्यान से थोड़ी नम मृदा एकत्र कीजिए। मृदा एकत्र करने के लिए चम्मच या दस्तानों का उपयोग कीजिए।
- बीकर में थोड़ा जल डालिए एवं उसे काँच की छड़ से हिलाइए। यह तरल पदार्थ जो देखने में गंदा लग सकता है वह मृदा के अत्यंत सूक्ष्म कणों से युक्त होता है और इसे मृदा निलंबन कहते हैं। इसे कुछ समय के लिए अलग रख दीजिए एवं मिश्रण को बीकर की तली में बैठने दीजिए।
- बिंदुपाती द्वारा ऊपरी परत से पानी की एक बूँद लीजिए। इस बूँद को सूक्ष्मदर्शी की स्लाइड पर रखिए।
- इसे कवरस्लिप से ढक दीजिए और सूक्ष्मदर्शी की सहायता से इस स्लाइड का अवलोकन कीजिए (चित्र 2.8)।

आप क्रियाकलाप 2.4 में देखे गए जीवों के समान छोटे गतिशील जीवों का अवलोकन कर सकते हैं। यह दर्शाता है कि मृदा निलंबन में भी कई प्रकार के छोटे जीव होते हैं जिन्हें नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता है। ऐसे छोटे जीव जिन्हें नग्न आँखों से नहीं देखा जा सकता है उन्हें सूक्ष्मजीव (सूक्ष्म का अर्थ है बहुत छोटा एवं जीव का अर्थ है जीवित प्राणी) कहते हैं।
क्रियाकलाप 2.6- आइए, अध्ययन करें
कक्षा 8 में पढ़ने वाले विद्यार्थियों के एक समूह ने क्रियाकलाप 2.4 और 2.5 किए। उन्होंने पुस्तकालय और इंटरनेट से भी जानकारी एकत्र की। विद्यार्थियों ने तालाब के जल के अवलोकन से प्राप्त आँकड़ों को तालिका 2.1 में और मृदा के निलंबन के अवलोकन से प्राप्त आँकड़ों को तालिका 2.2 में अभिलेखित किया। विद्यार्थियों ने सूक्ष्मजीवों की पहचान प्रोटोजोआ, शैवाल, कवक और जीवाणु के रूप में की। आप उपरोक्त क्रियाकलाप को स्वयं ही करके देख सकते हैं और यदि आपको इनमें से किसी भी प्रकार के जीव मिलते हैं तो आप उसे अभिलेखित कर सकते हैं।
| क्र.सं. | अवलोकित सूक्ष्मजीव | अभिलेखित विवरण |
|---|---|---|
| 1. |
अमीबा (प्रोटोजोआ)
|
एकल कोशिका, गतिशील एवं अनियमित आकार |
| 2. |
पैरामीशियम (प्रोटोजोआ)
|
एकल कोशिका जो विशेषीकृत संरचनाओं की सहायता से एक स्थान से दूसरे स्थान पर संचलन करती है। |
| 3. |
शैवाल (काई)
|
एकल कोशिका, हरित वर्णक की उपस्थिति के कारण हरा दिखता है एवं संचलन विशिष्ट संरचनाओं की सहायता से होता है। |
| क्र.सं. | जीव | विवरण |
|---|---|---|
| 1. |
ब्रेड फफूँद (कवक)
|
पर्णहरित हीन शाखित तंतु जिनमें थैली जैसी संरचना होती है। |
| 2. |
फफूँद (कवक)
|
पर्णहरित हीन शाखित तंतु जिनमें ब्रश जैसी संरचना होती है। |
| 3. |
शैवाल
|
गोलाकार एवं पर्णहरित (हरे वर्णक) की उपस्थिति होती है। |
| 4. |
जीवाणु
|
गोलाकार, कॉमा, सर्पिल अथवा छड़ाकार, एक लंबे बाल जैसी संरचना तथा कोशिका के चारों ओर छोटे बाल जैसे अनेक उभार होते हैं। |
क्या आपने भी इनमें से किसी सूक्ष्मजीव अथवा किसी अन्य सूक्ष्मजीव का अवलोकन किया है? इसे अपनी अभ्यास पुस्तिका में अभिलेखित कीजिए और अपनी कक्षा में इस पर चर्चा कीजिए। तालिका 2.1 और 2.2 में आपने विभिन्न सूक्ष्मजीवों की पहचान की है। ये सर्वत्र हैं और हम इन्हें केवल सूक्ष्मदर्शी के माध्यम से देख सकते हैं। यह एक ऐसी युक्ति है जो इन्हें 100 से 400 गुना तक आवर्धित कर देती है हालाँकि सूक्ष्मजीव आकार में छोटे होते हैं। इसके साथ ही वह हमारे जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
विषाणु सूक्ष्मदर्शीय और अकोशिकीय होते हैं। विषाणु जीवित कोशिका में प्रवेश करने पर गुणन करने लगते हैं। वे पौधों, जंतुओं अथवा जीवाण्विक कोशिकाओं को संक्रमित कर सकते हैं एवं रोग उत्पन्न कर सकते हैं।
क्या हमें अन्य स्थानों पर भी सूक्ष्मजीव मिलते हैं?
आइए, इस पर चर्चा करें-

क्या आपने कभी नींबू, टमाटर, संतरा या किसी अन्य खाद्य पदार्थ को कुछ समय के लिए बाहर रखे रहने के बाद सड़ते हुए देखा है? यदि हाँ, तो आपने उन पर पाउडर या रुई जैसी वृद्धि देखी होगी (चित्र 2.9)। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वे सूक्ष्मजीवों से संक्रमित हो गए हैं लेकिन ये सूक्ष्मजीव कहाँ से आए? वे भोजन के संपर्क में कैसे आए?

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सूक्ष्मजीव सर्वत्र पाए जा सकते हैं- जल में, मृदा में, वायु में और यहाँ तक कि कुछ खाद्य पदार्थों में भी।
आप सूक्ष्मदर्शी की सहायता से पत्तियों, तनों, जड़ों अथवा अन्य किसी भाग की सतह पर इन्हें देख सकते हैं। पौधों और जंतुओं की भाँति ही सूक्ष्मजीवों में भी अत्यधिक विविधता पाई जाती है। उनमें से कुछ चरम जलवायु परिस्थितियों, जैसे - गरम पानी के झरने और बर्फीले ठंडे क्षेत्र और साथ ही साधारण औसत तापमान में भी पाए जा सकते हैं। आप जानते हैं कि इनमें से कुछ जीव हमारे शरीर में रहते हैं विशेषकर हमारी आँत में। आपने कक्षा 7 की पुस्तक जिज्ञासा के अध्याय 'जंतुओं में जैव प्रक्रम' में पढ़ा होगा कि हमारी आँत में अनेक जीवाणु होते हैं जो पाचन में सहायता करते हैं। पौधों और जंतुओं की भाँति सूक्ष्मजीव भी आकार, आमाप और संरचना में भिन्न होते हैं। तालिका 2.1 और 2.2 में आपने विभिन्न आकृतियों के सूक्ष्मजीवों को देखा होगा, जैसे- गोलाकार, छड़ाकार अथवा अनियमित ।
सूक्ष्मजीवों की विविधता हमारे दैनिक जीवन में क्या भूमिका निभाती है? वे पर्यावरण को स्वच्छ बनाने में कैसे सहायता करते हैं?
2.4.1 पर्यावरण स्वच्छता में महत्त्वपूर्ण सूक्ष्मजीव
आइए, एक क्रियाकलाप के माध्यम से इसे समझने का प्रयास करें।
क्रियाकलाप 2.7- आइए, करके देखें
- एक खाली पात्र लीजिए और उसे उद्यान की मृदा से आधा भर लीजिए।
- पात्र में फलों और सब्जियों के कुछ छिलके डालिए। इसके पश्चात उस पर मृदा की एक परत बिछाकर उसे ओर तरफ रख दीजिए।
- 2-3 सप्ताह पश्चात इसमें हुए परिवर्तनों का अवलोकन कीजिए।
- क्या आपको पात्र में रखी सामग्री में कोई अंतर दिखाई देता है?
आप पाएँगे कि फलों और सब्जियों के छिलके गहरे रंग के पदार्थ में परिवर्तित हो गए हैं। यह एक प्रकार की खाद है जो पोषक तत्वों से भरपूर होती है और मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में सहायक होती है परंतु फलों और सब्जियों के छिलके खाद में कैसे परिवर्तित हो गए?

क्रियाकलाप 2.6 में आपने देखा कि मिट्टी में विभिन्न प्रकार के सूक्ष्मजीव होते हैं। इनमें से कुछ सूक्ष्मजीव, जैसे- कवक और जीवाणु, पादप अपशिष्ट पर क्रिया करते हैं एवं धीरे-धीरे उसे सरल पोषक तत्वों से भरपूर खाद में परिवर्तित कर देते हैं। आपने अपने विद्यालय में या अपने घर के पास के खेत में माली को सूखे पत्तों और पादप अपशिष्ट को एकत्र करके गड्डों में डालते देखा होगा। क्या अब आप समझ गए हैं कि वे ऐसा क्यों करते हैं? ऐसा प्राकृतिक खाद बनाने के लिए किया जाता है।
यदि आप अपने आस-पास ध्यानपूर्वक देखें तो आपको अपक्षयित होते पौधे और पात्रों में भंडारित अथवा उद्यान में गिरी पत्तियाँ दिखाई दे सकती हैं जो कुछ समय पश्चात विघटित होकर लुप्त हो जाती हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि सूक्ष्मजीव गिरी हुई पत्तियों के जटिल पदार्थों को पोषकों से समृद्ध अपेक्षाकृत सरल पदार्थों में परिवर्तित कर देते हैं यह प्रक्रिया विघटन कहलाती है। ये पोषक तत्व मिट्टी में वापस चले जाते हैं एवं पौधों के उत्तम विकास में सहायता करते हैं। सूक्ष्मजीव मृत जंतुओं के शरीर को भी विघटित करते हैं। अतः सूक्ष्मजीव अपशिष्ट को पुनर्चक्रित करने और महत्त्वपूर्ण पोषक तत्वों को प्रकृति को वापस लौटाने में सहायता करते हैं। खाद का निर्माण इष्टतम तापमान और उचित नमी के स्तर पर होता है।
क्या यह रोचक नहीं है? अब तक आप समझ गए होंगे कि जीवाणु और कुछ कवक सूक्ष्मजीवों के प्रकार हैं जो हमारे जीवन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। क्या आप जानते है कि ये उपयोगी जीवाणु गोबर जैसे जंतु अपशिष्टों को भी विघटित कर सकते हैं!
क्रियाकलाप 2.7 से हम यह भी अनुमान लगा सकते हैं कि सूक्ष्मजीव न केवल पौधों की वृद्धि में सहायता करते हैं अपितु अपशिष्ट को विघटित करके हमारे पर्यावरण को भी स्वच्छ करते हैं।
अब विचार करें कि यदि पृथ्वी पर सूक्ष्मजीव न होते तो क्या होता?
बायोगैस के स्रोत के रूप में सूक्ष्मजीव
जीवाणु और कवक जैसे कई सूक्ष्मजीव ऑक्सीजन रहित वातावरण में निवास करते हैं। इनमें से कुछ जीवाणुओं में पर्यावरण या घरेलू अपशिष्ट जल में उपस्थित पादप और जंतु अपशिष्ट को विघटित करने की क्षमता होती है। इस प्रक्रिया के समय वे गैसों के ऐसे मिश्रण को निर्मुक्त करते हैं जिसे बायोगैस कहते हैं। ये मुख्यतः कार्बन डाइऑक्साइड तथा उच्च अनुपात में एक अन्य गैस मीथेन से मिलकर बनती है। इस गैस का उपयोग खाना पकाने, तापन, बिजली उत्पादन और यहाँ तक कि वाहन चलाने के लिए ईंधन के स्रोत के रूप में किया जाता रहा है।
आनंद मोहन चक्रवर्ती (1938-2020) एक वैज्ञानिक थे जिन्होंने जीवाणुओं का अध्ययन किया। वर्ष 1971 में उन्होंने एक विशेष जीवाणु विकसित किया जो तेल रिसाव को विघटित कर सकता था एवं पर्यावरण को स्वच्छ बनाने में सहायता कर सकता था। उनकी खोज को वर्ष 1980 में पेटेंट प्राप्त हुआ। पेटेंट किसी व्यक्ति को दिया गया एक कॉपीराइट है ताकि कोई भी व्यक्ति उसकी अनुमति के बिना उसके आविष्कार की नकल, उपयोग या बिक्री न कर सके। उनके शोधकार्य ने दिखाया कि प्रदूषण जैसी पर्यावरणीय समस्याओं के समाधान के लिए सूक्ष्मजीवों का उपयोग कैसे किया जा सकता है। उन्हें विज्ञान में उनके योगदान और सूक्ष्मजीवों के उपयोग द्वारा पर्यावरण की रक्षा के लिए स्मरण किया जाता है। आपके विचार से सूक्ष्मजीवों की सहायता से और कौन-सी समस्याओं का समाधान किया जा सकता है?
2.4.2 सूक्ष्मजीव और भोजन
सूक्ष्मजीवों की विविधता हमारे रसोईघर में कैसे सहायक होती है?

आइए, रसोईघर में कुछ क्रियाकलापों के माध्यम से इसे समझने का प्रयास करें।
क्रियाकलाप 2.8- आइए, करके देखें
- दो कटोरे 'क' और 'ख' लीजिए।
- प्रत्येक में 200 ग्राम आटा अथवा मैदा लीजिए और उसमें एक चुटकी चीनी डालिए।
- अब कटोरा 'क' में थोड़ा-सा चूर्णित खमीर (पाउडर यीस्ट) डालिए और उसे आटे में अच्छी तरह मिलाइए।
- कटोरा 'ख' में खमीर न डालें जिससे हम दोनों कटोरों में रखे पदार्थों में आए परिवर्तनों की तुलना कर सकें।
- दोनों कटोरों के आटे को गुनगुने पानी से गूंधकर नरम आटा तैयार कीजिए (चित्र 2.11)।
- आटे को एक गीले कपड़े से ढककर गरम स्थान पर रख दीजिए।
- 4-5 घंटे के पश्चात दोनों कटोरों को देखिए।
क्या आपने गुँधे हुए आटे के आयतन, गंध या गठन में कोई परिवर्तन देखा? यदि नहीं, तो आटे को कुछ देर और रखा रहने दें। कुछ समय उपरांत आप देखेंगे कि कटोरा 'क' जिसमें खमीर मिलाया गया था उसमें रखा आटा फूल कर थोड़ा ऊपर उठ गया है और बिना खमीर वाले आटे की तुलना में उसकी गंध भिन्न है। ऐसा क्यों होता है? खमीर की क्या भूमिका है? हमने आटे में चीनी और गरम पानी क्यों मिलाया?
खमीर एक प्रकार का सूक्ष्मजीव है। यह सूक्ष्मजीवों के उस वर्ग का सदस्य है जिसे कवक कहा जाता है। खमीर गरम स्थितियों में भली-भाँति वृद्धि करता है। आपने कक्षा 7 के अध्याय 'जंतुओं में जैव प्रक्रम' से समझा होगा कि अन्य जीवों की भाँति खमीर भी श्वसन करता है एवं भोजन को विघटित करके अपनी वृद्धि और जैव प्रक्रमों के निर्वहन के लिए ऊर्जा निर्मुक्त करता है। इस प्रक्रिया के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड निर्मुक्त होती है जिससे बुलबुले बनते हैं जो आटे को नरम और फूला हुआ बनाते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान खमीर थोड़ी मात्रा में एल्कोहल भी उत्पन्न करता है जिससे आटे से थोड़ी अलग गंध आती है। खमीर के इस विशेष गुण का उपयोग पावरोटी (ब्रेड), केक इत्यादि को बनाने में किया जाता है। खमीर के अतिरिक्त कुछ जीवाणु, जैसे- लैक्टोबैसिलस, इडली और दोसा बनाने के लिए घोल और भटूरे बनाने के लिए गुँधे हुए आटे के किण्वन में सहायता करते हैं।
क्रियाकलाप 2.9- आइए, तैयारी करें
- काँच के दो छोटे कटोरे लीजिए उन्हें 'क' और 'ख' के रूप में नामांकित कीजिए।
- कटोरा 'क' में गुनगुना दूध और कटोरा 'ख' में ठंडा दूध डालिए।
- अब दोनों कटोरों में एक-एक छोटा चम्मच दही डालिए और चम्मच से अच्छी तरह मिलाइए।
- दोनों कटोरों को ढक दीजिए। कटोरा 'क' को गरम स्थान पर और कटोरा 'ख' को ठंडे स्थान (जैसे - रेफ्रिजरेटर) में कुछ घंटों या पूरी रात के लिए रख दीजिए।
- काँच के कटोरों में रखे दूध में होने वाले परिवर्तनों का अवलोकन कीजिए। अपने अनुमान और अवलोकन तालिका 2.4 में लिखिए।
| दूध के स्वरूप में होने वाला परिवर्तन | दूध के रंग में होने वाला परिवर्तन | संभावित कारण | |||
|---|---|---|---|---|---|
| कटोरा 'क' ' | कटोरा 'ख' | कटोरा 'क' | कटोरा 'ख | ||
| अनुमान | |||||
| अवलोकन | |||||

आप देखेंगे कि कटोरा 'क' का दूध कुछ घंटों के पश्चात दही में परिवर्तित हो गया है एवं थोड़ा खट्टा हो गया है। वहीं कटोरा 'ख' का दूध दही में परिवर्तित नहीं हुआ है परंतु हल्का खट्टा हो सकता है। क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों होता है? दही में अनेक प्रकार के जीवाणु होते हैं। उनमें से एक लैक्टोबैसिलस है। यह जीवाणु दूध में विद्यमान शर्करा (लैक्टोज) से भोजन प्राप्त करता है, गुणन करता है एवं दूध को किण्वित करके दही बनाता है। ये जीवाणु एल्कोहल (जैसे खमीर) बनाने की अपेक्षा लैक्टिक अम्ल बनाते हैं जो दही को खट्टा कर देते हैं। ये जीवाणु गरम स्थितियों में अच्छी तरह पनपते हैं। अतः कटोरा 'क' में दही बनता है, परंतु कटोरा 'ख' में ऐसा नहीं होता है।
हम सूक्ष्मजीवों को विभिन्न श्रेणियों में वर्गीकृत कर सकते हैं, जैसे- प्रोटोजोआ, कवक, जीवाणु, कुछ शैवाल इत्यादि। कुछ जीवाणु जैसे राइजोबियम कुछ फलीदार पौधों की जड़ों में चित्र 2.12 में दर्शाए अनुसार फूले हुए क्षेत्र बनाते हैं जिन्हें ग्रंथिकाएँ कहा जाता है। कुछ फलीदार पौधे, जैसे- सेम, मटर और मसूर की जड़ों में मूल ग्रंथिकाएँ होती हैं। इनमें राइजोबियम जीवाणु होते हैं। ये जीवाणु वायु से नाइट्रोजन को अवशोषित कर लेते हैं एवं उसे पौधों के लिए उपयोगी बनाते हैं। इससे पौधों को रासायनिक उर्वरकों के बिना उत्कृष्ट रूप से वृद्धि करने में सहायता मिलती है। अतः किसान अन्य फसलों के साथ-साथ चक्रण में फलीदार फसलें भी उगाते हैं। इससे मृदा में नाइट्रोजन की मात्रा स्वाभाविक रूप से बढ़ती है और अगली फसल के लिए मृदा को स्वस्थ रखती है।
2.4.3 अद्भुत सूक्ष्म शैवाल - जल में उपस्थित सूक्ष्म सहायक
सूक्ष्म शैवाल सूक्ष्मदर्शीय पौधे जैसे जीव होते हैं जो जल, मृदा, वायु और यहाँ तक कि वृक्षों पर भी रहते हैं। ये सूर्य के प्रकाश का उपयोग करके अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। ऐसा करते समय ये ऑक्सीजन भी निर्मुक्त करते हैं एवं पृथ्वी की कुल ऑक्सीजन आपूर्ति का आधे से अधिक भाग उत्पन्न करते हैं। ये पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं और कई जलीय जीवों के लिए भोजन का स्रोत होते हैं। कुछ सूक्ष्म शैवाल, जैसे- स्पाइरुलाइना, क्लोरेला और डायटम मनुष्यों द्वारा स्वास्थ्य पूरक तथा दवाओं के रूप में भी उपयोग किए जाते हैं। सूक्ष्म शैवाल जल को स्वच्छ करने में भी सहायता करते हैं एवं जैव-ईंधन बनाने के लिए उपयोग किए जाते हैं।
तथापि प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और पर्यावासों के नष्ट होने से सूक्ष्म शैवालों की विविधता और प्रचुरता संकट में है। पर्यावरण की रक्षा और पृथ्वी पर ऑक्सीजन संतुलन बनाए रखने के लिए इन सूक्ष्म जीवों का संरक्षण करना महत्त्वपूर्ण है।
एक सूक्ष्म शैवाल स्पाइरुलाइना अपने स्वास्थ्य लाभों के कारण सुपरफूड कहलाता है। स्पाइरुलाइना विटामिन B_{12} का भी एक अच्छा स्रोत है जो हमारे शरीर के लिए आवश्यक है। इसमें अल्प मात्रा में वसा और शर्करा तथा प्रचुर मात्रा में प्रोटीन होते हैं जोकि इसके शरीर के भार के 60 प्रतिशत से भी अधिक हैं।
वर्तमान में स्पाइरुलाइना की खेती आजीविका का एक व्यवहार्य अवसर बनती जा रही है। आप इन चरणों का पालन करके सरलता से स्पाइरुलाइना उगा सकते हैं-
- एक स्वच्छ काँच की टंकी को सीधी धूप से दूर किसी प्रकाशित स्थान पर रखिए।
- टंकी को छायादार जाल से ढक दें अथवा टैंक को मध्यम तापमान वाले स्थान पर रख दीजिए।
- टंकी को तालाब के जल से भरिए।
- तालाब से एकत्रित जीवित स्पाइरुलाइना टंकी में डालिए।
- वर्धनशील स्पाइरुलाइना को सप्ताह में दो बार हिलाइए।
- 3-6 सप्ताह पश्चात स्पाइरुलाइना को एक महीन कपड़े से छानकर टैंक से निकाला जा सकता है।

खाद्य सुरक्षा और आजीविका विकास सुनिश्चित करने के लिए सूक्ष्म शैवाल का संरक्षण एक उत्कृष्ट विधि है।
सभी सजीवों का शरीर छोटे-छोटे खंडों से बना होता है जिन्हें कोशिकाएँ कहते हैं। एक कोशिका में विभिन्न घटक होते हैं जो जीवों को विभिन्न कार्य करने में सहायता करते हैं। सभी पौधों एवं जंतुओं के शरीर अनेक कोशिकाओं से मिलकर बने होते हैं इसलिए इन्हें बहुकोशिकीय जीव कहा जाता है। बहुकोशिकीय जीवों में कोशिकाएँ वैयक्तिक रूप से विशिष्ट कार्य करती हैं परंतु उत्तरजीविता की संभावना बढ़ाने के लिए एक-दसरे के साथ सहयोग भी करती हैं।
कुछ सूक्ष्मजीव जैसे जीवाणु और प्रोटोजोआ केवल एक कोशिका से बने होते हैं। इन्हें एककोशिकीय जीव कहा जाता है। ये अपने उत्तरजीविता के लिए सभी आवश्यक कार्य एक ही कोशिका में संपन्न करते हैं। अन्य सूक्ष्मजीव जैसे शैवाल और कवक एक अथवा एक से अधिक कोशिकाओं से बने होते हैं। उदाहरण के लिए यीस्ट एक एककोशिकीय कवक है जबकि फफूँदी एक बहुकोशिकीय कवक है।

जंतु और पादप कोशिकाओं की भाँति सूक्ष्मजीवों की कोशिकाएँ भी एक कोशिका झिल्ली से घिरी होती हैं। कवक की कोशिकाओं में झिल्ली के अतिरिक्त एक कोशिका भित्ति भी होती है परंतु उनमेंहरित लवक नहीं होते हैं। अतः वे प्रकाश संश्लेषण द्वारा अपना भोजन स्वयं नहीं बना सकते हैं। जीवाणुओं में एक सुस्पष्ट केंद्रक और केंद्रकीय झिल्ली नहीं होती है। उसके स्थान पर उनमें एक केंद्रकाभ होता है। यह विशेषता उन्हें खमीर (यीस्ट), प्रोटोजोआ, शैवाल, कवक, पौधों और जंतुओं की कोशिकाओं से अलग करती है।
हमने यहाँ केवल कुछ मूलभूत कोशिका संरचनाओं पर ही विचार किया है। कोशिका में अन्य घटक भी होते हैं जिनके विषय में आप उच्च कक्षाओं में सीखेंगे। उपकोशिकीय घटकों को देखने के लिए हमें उच्च आवर्धन वाले सूक्ष्मदर्शी की आवश्यकता होती है। एक इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी कोशिका को लगभग 10,00,000 गुना आवर्धित कर देता है जिसमें हम कोशिका में विद्यमान अधिक संरचनाएँ देख सकते हैं।अब तक आप समझ गए होंगे कि सूक्ष्मजीवों सहित सभी जीव एक या एक से अधिक कोशिकाओं से बने होते हैं। इनकी कोशिकाएँ आमाप, आकार और संरचना में भिन्न होती हैं। पादप और जंतु कोशिकाओं में भी कुछ भिन्नताएँ होती हैं। इन भिन्नताओं को समझने से हमें यह जानने में सहायता मिलती है कि ये जीव किस प्रकार भिन्न-भिन्न तरीके में से कार्य करते हैं। इस अध्याय में हमने लाभकारी सूक्ष्मजीवों के विषय में सीखा है। यद्यपि कुछ सूक्ष्मजीव ऐसे भी हैं जो पौधों एवं मनुष्यों सहित सभी जंतुओं में रोग का कारण बनते हैं। हम अगले अध्याय में सूक्ष्मजीवों द्वारा उत्पन्न कुछ रोगों के विषय में जानेंगे।
- सूक्ष्मजीव छोटे आकार के जीव होते हैं और इन्हें सूक्ष्मदर्शी के बिना नहीं देखा जा सकता है।
- सूक्ष्मजीव सभी प्रकार के वातावरणों में यहाँ तक कि पौधों एवं जंतुओं के शरीर में भी रह सकते हैं।
- सूक्ष्मजीव एककोशिकीय अथवा बहुकोशिकीय होते हैं। जीवाणु और प्रोटोजोआ एककोशिकीय होते हैं एवं कवक एककोशिकीय अथवा बहुकोशिकीय हो सकते हैं। जबकि पादप और जंतु बहुकोशिकीय होते हैं।
- कोशिका जीवन की एक मूलभूत इकाई है।
- सभी सजीवों का शरीर कोशिकाओं से बना होता है। एक कोशिका में विभिन्न घटक होते हैं जो जीवों को उनके कार्य संपन्न करने एवं जीवित रहने में सहायता करते हैं।
- एक सामान्य कोशिका एक कोशिका झिल्ली से घिरी होती है जो कोशिकाद्रव्य से भरी होती है और इसमें एक केंद्रक होता है। पादप कवक और जीवाणु कोशिकाओं में कोशिका झिल्ली के चारों ओर एक अतिरिक्त आवरण होता है जिसे कोशिका भित्ति कहा जाता है। जीवाणु में एक सुस्पष्ट केंद्रक का अभाव होता है।
- कोशिकाएँ आकार और आमाप में भिन्न होती हैं। उनका आकार उनके द्वारा किए जाने वाले कार्य से संबंधित होता है।
- जीवाणु, कवक और प्रोटोजोआ विभिन्न प्रकार के सूक्ष्मजीव होते हैं।
- विषाणु भी आकार में छोटे होते हैं परंतु वे अन्य सूक्ष्मजीवों से भिन्न होते हैं क्योंकि वे केवल परपोषी जीव के भीतर ही प्रजनन करते हैं।
- सूक्ष्मजीव हमारे लिए लाभदायक अथवा हानिकारक हो सकते हैं।
- कुछ सूक्ष्मजीव पौधों एवं जंतुओं के अपशिष्ट को सरल पदार्थों में विघटित कर देते हैं और पर्यावरण को स्वच्छ बनाते हैं।
- कुछ सूक्ष्मजीव मटर, सेम और मसूर जैसी फलियों की मूल ग्रंथिकाओं में रहते हैं। ये वायु से नाइट्रोजन अवशोषित करते हैं और मृदा की उर्वरता में वृद्धि करते हैं।
- यीस्ट (खमीर) एक प्रकार का कवक है जिसका उपयोग पावरोटी (ब्रेड), केक, पेस्ट्री, इडली, डोसा और भटूरे बनाने में किया जाता है।
- लैक्टोबैसिलस का उपयोग घर पर दही जमाने और खाद्य उद्योग में किण्वन प्रक्रिया में किया जाता है।
- कोशिका के विभिन्न भागों के नाम निम्नलिखित हैं। इन्हें
निम्नांकित आरेख में उपयुक्त स्थानों पर लिखिए।
- केंद्रक
- हरित लवक
- कोशिका झिल्ली
- कोशिकाद्रव्य
- कोशिका भित्ति
- केंद्रकाभ
- आनंदी ने दो परखनली लीं एवं उन्हें 'क' और 'ख' से चिह्नित किया। उसने प्रत्येक परखनली में दो चम्मच चीनी का घोल डाला। परखनली 'ख' में उसने एक चम्मच खमीर (यीस्ट) डाला। इसके पश्चात उसने प्रत्येक परखनली के मुँह पर दो कम फूले हुए गुब्बारे लगाए। उसने इस व्यवस्थापन को धूप से दर गरम स्थान पर रखा।
- क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि 3-4 घंटे के पश्चात क्या होगा? उसने देखा कि परखनली 'ख' से जुड़ा गुब्बारा फूला हुआ था। इसका संभावित स्पष्टीकरण क्या हो सकता है?

चित्र 2.14 - परीक्षण के लिए व्यवस्थापन - परखनली 'ख' में पानी वाष्पित हो गया और गुब्बारे में जलवाष्प भर गई।
- गरम वातावरण ने परखनली 'ख' के भीतर की हवा को फैला दिया जिससे गुब्बारा फूल गया।
- यीस्ट ने परखनली 'ख' के भीतर एक गैस उत्पन्न की जिससे गुब्बारा फूल गया।
- चीनी ने गरम हवा के साथ अभिक्रिया की जिससे गैस उत्पन्न हुई और अंततः गुब्बारा फूल गया।
- आनंदी ने एक और परखनली ली जो चूने के पानी से ¼ भरी थी। उसने परखनली 'ख' से गुब्बारे को इस तरह निकाला कि गुब्बारे में भरी हुई गैस बाहर न निकले। उसने गुब्बारे को चूने के पानी वाली परखनली से जोड़ा और उसे अच्छी तरह हिलाया। आपके विचार से वह क्या जानना चाहती है?
- क्या आप अनुमान लगा सकते हैं कि 3-4 घंटे के पश्चात क्या होगा? उसने देखा कि परखनली 'ख' से जुड़ा गुब्बारा फूला हुआ था। इसका संभावित स्पष्टीकरण क्या हो सकता है?
- एक किसान अपने खेत में गेहूं की फसल की बुवाई कर रहा था। उसने फसल की अच्छी उपज पाने के लिए मिट्टी में नाइट्रोजन समृद्ध उर्वरक डाला। पड़ोस के खेत में एक और किसान सेम की फसल उगा रहा था परंतु उसने स्वस्थ फसल प्राप्त करने के लिए नाइट्रोजन समृद्ध उर्वरक नहीं डाला। क्या आप इसके कारणों पर विचार कर सकते हैं?
- स्नेहल ने अपने बगीचे में दो गड्ढे 'क' और 'ख' खोदे। गड्डा 'क' में उसने फलों और सब्जियों के छिलके डाले और उन्हें सूखे पत्तों के साथ मिला दिया। गड्डा 'ख' में उसने उसी तरह के कचरे को सूखे पत्तों के साथ मिलाए बिना डाल दिया। उसने दोनों गड्डों को मिट्टी से ढक दिया और 3 सप्ताह बाद देखा। वह क्या जाँचने का प्रयास कर रही है?
- निम्नलिखित सूक्ष्मजीवों की पहचान करें-
- मैं प्रत्येक प्रकार के वातावरण में और आपकी आँत में रहता हूँ।
- मैं पावरोटी और केक को मुलायम और फूला हुआ बनाता हूँ।
- मैं दलहनी (फलीदार) फसलों की जड़ों में रहता हूँ और उनकी वृद्धि के लिए पोषक तत्व प्रदान करता हूँ।
- यह जाँचने के लिए एक प्रयोग अभिकल्पित कीजिए कि सूक्ष्मजीवों को अपनी वृद्धि के लिए इष्टतम तापमान, वायु और नमी की आवश्यकता होती है।
- ब्रेड के 2 स्लाइस लीजिए। एक स्लाइस को सिंक के पास एक प्लेट में रखिए। दूसरे स्लाइस को रेफ्रिजरेटर में रखिए। तीन दिन पश्चात दोनों स्लाइस की तुलना कीजिए। अपने अवलोकनों को अभिलेखित कीजिए। अपने अवलोकनों के कारण बताइए।
- एक विद्यार्थी अवलोकन करता है कि जब दही को एक दिन के लिए बाहर रखा जाता है तो वह अधिक खट्टा हो जाता है। इस अवलोकन के दो संभावित स्पष्टीकरण क्या हो सकते हैं?
- चित्र 2.15 में दिए गए व्यवस्थापन का अवलोकन कीजिए और निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए।
- फ्लास्क 'क' में चीनी के घोल का क्या होता है?
- चार घंटे पश्चात आप परखनली 'ख' में क्या देखते हैं? आपके विचार से ऐसा क्यों हुआ?
- यदि फ्लास्क 'क' में यीस्ट न डाला जाए तो क्या होगा?

- भारत में बायोगैस उत्पादन का एक लंबा इतिहास रहा है। हमारे सबसे पुराने बायोगैस संयंत्रों में से एक 1850 के दशक के अंत में स्थापित किया गया था। भारत सरकार के नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा आरंभ किए गए बायोगैस कार्यक्रम के विषय में सूचनाएँ एकत्र कीजिए।
- भारत के कुछ भागों में किण्वित सोयाबीन और बाँस के किण्वित प्ररोह जैसे किण्वित खाद्य पदार्थ पारंपरिक भोजन के रूप में खाए जाते हैं। अपने माता-पिता और शिक्षकों की सहायता से अपने क्षेत्र के कुछ पारंपरिक खाद्य पदार्थों की सूची बनाएँ जो किण्वन प्रक्रिया का उपयोग करते हैं। इन किण्वित खाद्य पदार्थों को तैयार करने में प्रयुक्त सामग्री, इन्हें तैयार करने की विधि, भोजन के किण्वन के लिए उत्तरदायी सूक्ष्मजीव एवं किण्वित भोजन के सांस्कृतिक और पोषण संबंधी महत्त्व के विषय में पता लगाइए।
- एक आवर्धक काँच और सूक्ष्मदर्शी का उपयोग करके एक वृहत कवक मशरूम के विभिन्न भागों का अध्ययन कीजिए। उच्च कक्षाओं के विद्यार्थियों से सहायता लीजिए एवं अपने विद्यालय की प्रयोगशाला में सूक्ष्मदर्शी के द्वारा मशरूम के विभिन्न भागों की आंतरिक संरचना का अवलोकन कीजिए।
- किसी उद्यमी से वार्तालाप कीजिए और मशरूम की खेती के चरणों के संबंध में सूचना प्राप्त कीजिए।