सूचना पट्ट
- आपका शरीर सामान्य सर्दी-जुकाम जैसे संक्रमण के प्रति कैसे अनुक्रिया करता है?
- वर्तमान में हम चेचक या पोलियो जैसे रोग कम ही देखते हैं परंतु मधुमेह और हृदय संबंधी रोग अधिक सामान्य हो गए हैं। ऐसा क्यों है?
- क्या जलवायु परिवर्तन नए प्रकार के रोगों की उत्पत्ति का कारण बन सकता है?
- तनाव या चिंता जैसे संवेग हमें किस प्रकार प्रभावित करते हैं एवं रोगी बनाते हैं?
- रोग के प्रकोप के समय कुछ वर्गों के लोग दूसरे वर्गों की तुलना में अधिक प्रभावित क्यों होते हैं?
- अपने प्रश्नों को साझा कीजिए
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3.1 स्वास्थ्य - क्या रोग का नहीं होना ही मात्र स्वास्थ्य है?
सूचना पट्ट पर लगी समाचार पत्र की कतरनें हमारे देश में लोगों के स्वास्थ्य के संबंध में आपको क्या बताती हैं? क्या स्वस्थ रहने का अर्थ केवल रोग का नहीं होना ही है? स्वास्थ्य में शारीरिक रूप से अच्छा अनुभव करना, सकारात्मक बने रहना और पारस्परिक संबंधों को दृढ़ बनाए रखना भी सम्मिलित है। एक स्वस्थ व्यक्ति अपने शरीर की देखभाल करता है, मानसिक दृष्टिकोण को सकारात्मक बनाए रखता है और सामाजिक जीवन का आनंद लेता है। आइए, अब हम खोजते हैं कि वास्तव में स्वस्थ होने का अर्थ क्या होता है।
क्रियाकलाप 3.1- आइए, पढ़ें
आठवीं कक्षा के एक विद्यार्थी ने दूसरे शहर के एक नए विद्यालय में प्रवेश लिया। नए परिवेश में कोई मित्र न होने और माता-पिता के व्यस्त होने के कारण वह एकाकीपन का अनुभव करता था। एकाकीपन दूर करने के लिए वह अपना अधिक समय मोबाइल फोन और सोशल मीडिया पर व्यतीत करने लगा परंतु इससे उसका एकाकीपन और अधिक बढ़ गया। उसने मित्र बनाने का प्रयास करना बंद कर दिया, उसे सिरदर्द होने लगा, उसका वजन कम हो गया और वह पर्याप्त नींद नहीं ले पाता था। चिकित्सक ने उसे स्क्रीन टाइम (मोबाइल, कंप्यूटर, टी. वी इत्यादि के स्क्रीन को देखते हुए व्यतीत किया गया समय) कम करने एवं परामर्शदाता से मिलने की सलाह दी। विद्यालय के परामर्शदाता ने विद्यार्थी को सहायता उपलब्ध कराई जिससे कि वह मित्र बना सके और अपने स्वास्थ्य में सुधार कर सके।

सोचें और विचार करें - विद्यार्थी की स्वास्थ्य समस्याओं का कारण क्या था? उसकी आदतों और परिवेश ने उसके स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित किया?
विश्व स्वास्थ्य संगठन (डबल्यू.एच.ओ.) के अनुसार स्वास्थ्य को "पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक स्वास्थ्य की स्थिति के रूप में परिभाषित किया गया है न कि मात्र रोगों की अनुपस्थिति के रूप में” (चित्र 3.1)। एक स्वस्थ व्यक्ति सामान्यतः विभिन्न कार्यों को अधिक कुशलता से कर सकता है एवं भिन्न-भिन्न तथा कठिन परिस्थितियों का भली-भाँति सामना कर सकता है। एक स्वस्थ व्यक्ति अपने साथियों और समाज के अन्य सदस्यों के साथ भली प्रकार से सामंजस्य बना सकता है। आइए, स्वास्थ्य के विषय में और अधिक समझें।

आयुर्वेद हमें सिखाता है कि शरीर, मन और परिवेश का संतुलन ही सच्चा स्वास्थ्य है। दिनचर्या और ऋतुचर्या का अनुपालन इस संतुलन को बनाए रखने में सहायता करता है। अपनी प्रकृति (शारीरिक संरचना) के अनुकूल ताजा एवं पौष्टिक भोजन ग्रहण करना आवश्यक है। नियमित व्यायाम, स्वच्छता, आरामदायक नींद और शांत मन समग्र स्वास्थ्य प्राप्त करने में सहायक होते हैं। इसे योग, ध्यान और सचेतनता जैसे अभ्यासों के माध्यम से भी प्राप्त किया जा सकता है।
3.2 हम स्वस्थ कैसे रह सकते हैं?
स्वस्थ रहने के लिए पौष्टिक भोजन करना, स्वच्छता बनाए रखना, स्वच्छ स्थान पर रहना, नियमित व्यायाम करना, पर्याप्त नींद लेना, परिवार एवं मित्रों के साथ समय व्यतीत करना और सकारात्मक दृष्टिकोण बनाए रखना आवश्यक है। हमें स्वयं को स्वस्थ रखने के लिए क्या करना चाहिए और क्या नहीं?
क्रियाकलाप 3.2- आइए, सूची बनाएँ
- कुछ अच्छी आदतों की सूची बनाइए जिनका अनुपालन करने के लिए प्रायः आपके माता-पिता, शिक्षक अथवा वरिष्ठजन आपको प्रेरित करते हैं। इनमें से कितनी आदतें पहले से ही आपकी दिनचर्या का भाग हैं? आप किन आदतों का अनुपालन आरंभ करना चाहेंगे? नीचे दी गई सूची में जोड़िए-

संतुलित आहार लें 
शारिरिक रूप से सक्रिय रहें 
धूम्रपान, मद्यपान और मादक पदार्थों को 'ना' कहें 
तनाव प्रबंधन करें 
पर्याप्त नींद लें चित्र 3.2 - स्वस्थ कैसे रहें - व्यक्तिगत स्वच्छता बनाए रखिए।
- स्वस्थ और संतुलित आहार लीजिए।
- नियमित रूप से व्यायाम कीजिए।
- प्रतिदिन विश्राम और ध्यान के लिए समय निकालिए।
- अब उन आदतों के विषय में विचार कीजिए जो आपके स्वास्थ्य के लिए अच्छी नहीं हैं।
नीचे दी गई सूची में और भी आदतों को जोड़िए-
- मोबाइल फोन अथवा अन्य डिजिटल स्क्रीन पर बहुत अधिक समय व्यतीत करना।
- प्रतिदिन फास्ट फूड और अन्य अस्वास्थ्यप्रद भोजन (जंक फूड) का सेवन करना।
- रात्रि में बहुत देर से सोना अथवा पर्याप्त नींद न लेना।
- भोजन विशेषकर सुबह का अल्पाहार (कलेवा) न करना।
अपने निष्कर्षों पर अपने मित्रों एवं शिक्षक के साथ चर्चा कीजिए। आपने जिस क्रियाकलाप में भाग लिया और चर्चा की उसके उपरांत आपने यह अनुभव किया होगा कि हमारा स्वास्थ्य अनेक कारकों पर निर्भर करता है। इन कारकों में हमारी जीवनशैली एवं हमारा पर्यावरण सम्मिलित हैं।
3.2.1 स्वस्थ जीवनशैली अपनाएँ
- संतुलित आहार लीजिए जिसमें प्रचुर मात्रा में फल, सब्जियाँ और साबुत अनाज सम्मिलित हों।
- प्रसंस्कृत, वसायुक्त अथवा शर्करायुक्त खाद्य और पेय पदार्थों के सेवन से बचिए।
- बाहर खेलकर, टहलकर, दौड़कर, साइकिल चलाकर या व्यायाम करके शारीरिक रूप से सक्रिय रहिए।
- स्क्रीन टाइम को सीमित कीजिए और प्रकृति के सान्निध्य में अधिक समय बिताइए।
- अपने शरीर और मस्तिष्क को विश्राम देने और स्वस्थ रहने के लिए पर्याप्त नींद लीजिए।
- नियमित रूप से योग अथवा सरल श्वास व्यायाम जैसे प्राणायाम कीजिए।
- हानिकारक पदार्थों जैसे तंबाकू, मद्य और मादक पदार्थों को 'ना' कहें (चित्र 3.2)।
3.2.2 पर्यावरण को स्वच्छ रखें
क्रियाकलाप 3.3- आइए, तुलना करें
- चित्र 3.3 (क) और चित्र 3.3 (ख) देखिए। आप किस खेल के मैदान में खेलना पसंद करेंगे और क्यों?
- हम में से अधिकांश चित्र 3.3 (क) में दर्शाए गए स्वच्छ, सुव्यवस्थित और सुंदर दिखने वाले खेल के मैदान में खेलना पसंद करेंगे। चित्र 3.3 (ख) का खेल का मैदान प्रदूषित, गंदा, अस्वच्छ और मक्खियों-मच्छरों से भरा हुआ है। ऐसे क्षेत्र में रहने वाले लोग बार-बार बीमार पड़ सकते हैं।
- अच्छी आदतें और स्वस्थ जीवनशैली अपनाने के साथ-साथ हमें स्वयं को एवं अपने आस-पास के वातावरण को भी स्वच्छ रखना चाहिए।
- क्या आपको कभी धुएँ अथवा धूल वाली जगह पर श्वास लेने में कठिनाई हुई है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि स्वच्छ वायु एवं जल हमारे स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। शहरों में वाहनों एवं कारखानों से होने वाले वायु प्रदूषण के कारण खाँसी अथवा अस्थमा (दमा) जैसी समस्याएँ हो सकती हैं। वायु गुणवत्ता सूचकांक (एयर क्वालिटी इंडेक्स, AQI) हमें यह बताने में सहायता करता है कि वायु कितनी स्वच्छ है। अपेक्षाकृत स्वच्छ पर्यावरण हमें स्वस्थ रहने और अच्छा अनुभव कराने में सहायक होता है।
- ध्यान रखिए कि स्वास्थ्य केवल शरीर तक ही सीमित नहीं है। इसमें हमारी भावनाएँ और पारस्परिक संबंध भी महत्त्वपूर्ण हैं। यदि हम अच्छा भोजन करने और स्वच्छ स्थान पर रहने के पश्चात भी अकेले या उदास हैं तो हम अच्छा अनुभव नहीं करेंगे। मित्रों और परिवार के साथ समय व्यतीत करना, बातचीत करना, हँसना और मनोरंजन करना हमारे मन को भी स्वस्थ रखने में सहायता करता है।

3.3 हम कैसे जानें कि हम अस्वस्थ हैं?
हमारा शरीर सामान्यतः हमें स्वस्थ रखने के लिए एक निश्चित प्रकार से कार्य करता है। जब हम अस्वस्थ अनुभव करते हैं तो इसका अर्थ है कि हमारे शरीर के भीतर कुछ सुचारु रूप से कार्य नहीं कर रहा है जैसा उसे करना चाहिए। हमें कुछ लक्षण, जैसे- दर्द, थकान या चक्कर आना एवं कुछ संकेत जैसे – ज्वर, दाने, उच्च रक्तचाप या शोथ (सूजन) हो सकते हैं जो यह इंगित करते हैं कि हम अस्वस्थ हैं। लक्षण वह होता है जिसे हम अनुभव करते हैं, जैसे- दर्द जबकि संकेत वह होता है जो देखा या मापा जा सकता है, जैसे- ज्वर के समय शरीर के तापमान का बढ़ जाना। ये लक्षण या संकेत चिकित्सकों को यह समझने में सहायता करते हैं कि हमें क्या समस्या हो सकती है।
3.4 रोगों के कारण और प्रकार क्या हैं?
रोग वह स्थिति है जो शरीर या मन के सामान्य कार्यों को प्रभावित करती है। यह तब होता है जब एक या अधिक अंग या अंग प्रणालियाँ सुचारु रूप से कार्य करना बंद कर देती हैं। कुछ रोग जीवाणु, विषाणु, कवक, कीट अथवा प्रोटोजोआ (एककोशिकीय जीव) के कारण होते हैं। रोग उत्पन्न करने वाले इन जीवों को रोगजनक (रोगाणु) कहते हैं। अन्य रोग कुपोषण अथवा अस्वस्थ जीवनशैली के कारण हो सकते हैं। कुछ रोग अल्पकालिक होते हैं जबकि अन्य दीर्घकालिक होते हैं और उनमें नियमित चिकित्सा या देखभाल की आवश्यकता होती है। रोगोंको उनके कारण और संचरण के माध्यम के आधार पर दो मुख्य प्रकारों में बाँटा जा सकता है-
- असंचरणीय रोग- कुछ रोग, जैसे- कैंसर (कर्क रोग), मधुमेह या अस्थमा (दमा) रोगजनकों के कारण नहीं होते और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में नहीं फैलते हैं। ये सामान्यतः जीवनशैली, आहार एवं पर्यावरण से जुड़े होते हैं।
- संचरणीय रोग- रोगाणुओं के कारण होने वाले रोगों को संक्रामक रोग कहा जाता है। ये एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में संचरित हो सकते हैं। संचरणीय रोगों के कुछ उदाहरण हैं- टाइफॉइड (आंत्र ज्वर), डेंगू, फ्लू, चेचक और कोविड-19।

3.4.1 संचरणीय रोगों की उत्पत्ति और प्रसार कैसे होता है?
सभी संचरणीय रोग रोगजनकों के कारण होते हैं। ये रोगजनक हमारे शरीर में श्वास लेते समय वायु से, दूषित पेयजल से अथवा भोजन के सेवन से और अन्य अनेक माध्यमों से प्रवेश कर सकते हैं परंतु ये रोगजनक एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक कैसे फैलते हैं? एक सामान्य तरीका वायु के माध्यम से रोग का संचरण है जब संक्रमित व्यक्ति के खाँसने या छींकने से अथवा प्रत्यक्ष संपर्क जैसे हाथ मिलाने से या अप्रत्यक्ष रूप से संक्रमित व्यक्ति द्वारा प्रयुक्त व्यक्तिगत वस्तुएँ साझा करने से संक्रमण हो सकता है। कुछ संचरणीय रोग दूषित पेयजल अथवा भोजन से भी फैलते हैं। कुछ रोगजनक मच्छरों और मक्खियों जैसे कीटों द्वारा भी फैलते हैं, इन्हें रोगवाहक (वेक्टर) कहा जाता है (चित्र 3.4)।
रोग कैसे संचरित होते हैं यह समझकर हम अपने और दूसरों के बचाव के लिए सरल उपाय कर सकते हैं। आइए, पता लगाएँ कि ये संचरणीय रोग कैसे फैलते हैं और हम उनकी रोकथाम किस प्रकार कर सकते हैं।
क्रियाकलाप 3.4- आइए, पता करें
- कक्षा आठ के विद्यार्थियों ने एक सामुदायिक अभियान और पुस्तकालय में अध्ययन करने के समय तालिका 3.1 में कुछ सामान्य संचरणीय रोगों की सूची बनाई।
- पुस्तकों, विश्वसनीय वेबसाइटों द्वारा अथवा अपने विज्ञान के शिक्षक से पूछकर सूची में दी गई जानकारी की जाँच कीजिए। कोई अन्य महत्त्वपूर्ण जानकारी जो छूट गई हो, उसे जोड़िए।
- नीचे दी गई तालिका का अध्ययन कीजिए और विचार कीजिए कि कौन-से सरल उपाय प्रत्येक रोग की रोकथाम में सहायता कर सकते हैं।
तालिका 3.1 – मनुष्यों को प्रभावित करने वाले कुछ सामान्य संचरणीय रोग
| रोग | कारक | शरीर में संक्रमण का स्थान | लक्षण | निवारक उपाय |
|---|---|---|---|---|
| वायु के माध्यम से फैलने वाले रोग | ||||
सर्दी-जुकाम और इन्फ्लूएंजा![]() |
विषाणु | श्वसन तंत्र | नाक बंद होना और नाक से पानी बहना, गले में खराश, ज्वर, खाँसी, शरीर में दर्द | बार-बार हाथ धोएँ, व्यक्तिगत वस्तुएँ साझा न करें एवं मुँह और नाक को मास्क से ढक कर रखें। |
छोटी माता (चिकनपॉक्स)![]() |
विषाणु | श्वसन तंत्र, त्वचा | हल्का ज्वर, त्वचा में खुजली, चकत्ते, फफोले | रोगी को पूरी तरह से अलग रखें, मुँह और नाक ढक कर रखें एवं टीकाकरण करवाएँ। |
खसरा (मीजल्स)![]() |
विषाणु | त्वचा, श्वसन तंत्र | ज्वर, गले में खराश और गर्दन, कान तथा त्वचा के अन्य भागों पर लाल चकत्ते | रोगी को अलग रखें, मुँह और नाक को ढक कर रखें, स्वच्छता बनाए रखें एवं टीकाकरण करवाएँ। |
क्षय रोग (टीबी)![]() |
जीवाणु | फेफड़े | खाँसी, ज्वर, थकान, भूख न लगना, रात में पसीना आना | टीबी से संक्रमित लोगों के निकट संपर्क से बचें, मुँह और नाक को ढक कर रखें, स्वच्छता बनाए रखें एवं टीकाकरण करवाएँ। |
| दूषित जल और भोजन से फैलने वाले रोग | ||||
यकृतशोथ (हेपेटाइटिस) ए![]() |
विषाणु | यकृत | थकान, ज्वर, भूख न लगना, मतली, वमन, पीलिया, पेट के ऊपरी दाहिने भाग में दर्द | उबला हुआ पानी पिएँ एवं टीकाकरण करवाएँ। |
हैजा (कॉलरा)![]() |
जीवाणु | आंत्र | अतिसार और निर्जलीकरण | व्यक्तिगत स्वच्छता और स्वच्छता संबंधी आदतों को अपनाएँ, भली-भाँति पका हुआ भोजन खाएँ एवं उबला हुआ पानी पिएँ और टीकाकरण करवाएँ। |
आंत्र ज्वर (टाइफॉइड)![]() |
जीवाणु | आंत्र | सिरदर्द, पेट में तकलीफ, ज्वर और अतिसार | व्यक्तिगत स्वच्छता और स्वच्छता संबंधी अच्छी आदतों को अपनाएँ, अच्छी तरह से पका हुआ भोजन खाएँ एवं उबला हुआ पानी पिएँ और टीकाकरण करवाएँ। |
एस्केरिसता (गोल कृमि संक्रमण)
![]() |
कृमि | आंत्र | मल में कृमि, भूख न लगना, वृद्धि में कमी, अतिसार, वजन कम होना, रक्ताल्पता (एनीमिया) | व्यक्तिगत स्वच्छता और स्वच्छता संबंधी अच्छी आदतों को अपनाएँ, अच्छी तरह से पका हुआ भोजन खाएँ और उबला हुआ पानी पिएँ। |
| कीटों द्वारा संचरित रोग | ||||
मलेरिया (विषम ज्वर)![]() |
प्रोटोजोआ | त्वचा, रक्त | तीव्र ज्वर, अत्यधिक पसीना आना, कंपकंपी आना | मच्छरदानी और मच्छर प्रतिकर्षियों का उपयोग करें, पूरी बाँह के कपड़े पहनें एवं अपने घर और आस-पास मच्छरों के प्रजनन को नियंत्रित करें। |
डेंगू ज्वर (हड्डी तोड़ ज्वर)![]() |
विषाणु | त्वचा, रक्त | ज्वर, सिरदर्द, माँसपेशियों और जोड़ों में दर्द, मतली | मच्छरदानी और मच्छर प्रतिकर्षियों का उपयोग करें, पूरी बाँह के कपड़े पहनें, अपने घर और आस-पास के स्थानों पर मच्छरों के प्रजनन को नियंत्रित करें एवं रुद्ध जल वाले क्षेत्रों से बचें। |
तालिका 3.1 का अध्ययन करके हम यह समझ सकते हैं कि संक्रामक रोग कैसे फैलते हैं और उनकी रोकथाम कैसे की जा सकती है। नीचे कुछ आसान किंतु महत्त्वपूर्ण सावधानियाँ दी गई हैं-
- स्वयं को और अपने आस-पास के वातावरण को स्वच्छ रखना।
- दैनिक जीवन में स्वच्छ रहने की प्रवृत्तियों को अपनाना।
- रोगजनकों से बचाव के लिये साबुन और पानी से हाथ धोना।
- खाँसते या छींकते समय अपने मुँह और नाक को ढकना।
- भीड़-भाड़ वाले स्थानों पर सुरक्षित रहने के लिए मास्क पहनना।
- तौलिया एवं रुमाल जैसी व्यक्तिगत वस्तुओं को दूसरों के साथ साझा ना करना।
- घर, भोजन और पेयजल को स्वच्छ रखना।
- जब हम अस्वस्थ हों तब घर पर आराम करना चाहिए। इससे स्वास्थ्य लाभ में सहायता मिलती है और दूसरों तक रोग के संचरण में कमी आती है।
कुछ संक्रामक रोग कृमियों के कारण होते हैं जो हमारे शरीर में विशेषकर पाचन तंत्र में रहते हैं। ये कृमि शरीर के पोषक तत्वों को खाकर जीवित रहते हैं और परजीवी कहलाते हैं अर्थात ऐसे जीव जो किसी दूसरे जीव के शरीर में या शरीर पर रहते हैं। ये कृमि सामान्यतः संदूषित भोजन, पानी, मृदा या संक्रमित व्यक्तियों अथवा जंतुओं से संपर्क द्वारा फैलते हैं।
3.4.2 असंचरणीय रोग किस कारण होते हैं?
आपने सीखा कि कैंसर, मधुमेह और दमा जैसे असंचरणीय रोग जीवनशैली, आहार और पर्यावरण से जुड़े होते हैं। ये भारत में मृत्यु के सबसे सामान्य कारण हैं। कक्षा 6 में आपने स्कर्वी, एनीमिया और घेघा (गॉयटर) जैसे रोगों के विषय में भी जाना था जो हमारे भोजन में किसी विशेष पोषक तत्व की कमी से होते हैं। इन्हें अभावजन्य रोग कहा जाता है एवं ये भी असंचरणीय रोग हैं।- यदि मैं विटामिन और खनिजों का सेवन अधिक मात्रा में करूँ तो क्या होगा?
मधुमेह एक सामान्य रोग है जो अब वयस्कों के साथ-साथ बच्चों में भी तीव्र गति से बढ़ रहा है। वस्तुतः भारत अब विश्व में मधुमेह के सबसे अधिक मामलों वाले देशों में से एक बन गया है। यह रोग प्रायः हॉर्मोन असंतुलन, अस्वास्थ्यकर खानपान की प्रवृत्तियों, शारीरिक सक्रियता की कमी, अधिक वजन या स्थूलता एवं अन्य कारणों से पनपता है।
आइए, असंचरणीय रोगों के कारणों और उनकी रोकथाम के विषय में और अधिक जानें।
क्रियाकलाप 3.5- आइए, सर्वेक्षण करें
- अपने आस-पड़ोस में जीवनशैली से संबंधित तीन सबसे सामान्य रोगों का पता लगाइए।
- किसी चिकित्सक, नर्स, स्वास्थ्यकर्मी या परिवार के ऐसे सदस्य से बात कीजिए जिसे स्वास्थ्य के विषय में जानकारी हो और जो यह बता सके कि जीवनशैली में किस प्रकार के परिवर्तन से इन रोगों की रोकथाम अथवा प्रबंधन किया जा सकता है। आप विश्वसनीय स्वास्थ्य वेबसाइटों, पुस्तकों, शिक्षकों और चिकित्सकों से भी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। तालिका 3.2 में रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए और जीवनशैली से संबंधित रोगों के विषय में और अधिक जानिए।
- तालिका 3.2- असंचरणीय रोग
| क्र.सं. | जीवनशैली से संबंधित सामान्य रोगों के नाम | संकेत और लक्षण | जीवनशैली में सुझाए गए परिवर्तन |
|---|---|---|---|
| 1. | स्थूलता | संतुलित आहार लेना और नियमित व्यायाम करना | |
| 2. | मधुमेह |
|
|
| 3. | उच्च रक्तचाप | ||
| 4. | ......................... | ......................... | ......................... |

3.5 रोगों का निवारण और नियंत्रण कैसे करें?
आपने यह वाक्य सुना होगा कि 'रोकथाम उपचार से बेहतर है।' संचरणीय और असंचरणीय दोनों प्रकार के रोगों से स्वयं की सुरक्षा करना महत्त्वपूर्ण है।
क्रियाकलाप 3.6- आइए, पढ़ें
ओडिशा - समुदाय आधारित स्वच्छता अभियान
ओडिशा के भद्रक जिले में एक समुदाय आधारित स्वच्छता अभियान ने अधिक लोगों को शौचालय के निर्माण और उपयोग के लिए प्रोत्साहित किया। इससे खुले में शौच की समस्या में एक बड़े स्तर तक कमी आई और बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार हुआ तथा उनमें अतिसार और संक्रमण के मामले भी कम हो गए।
इस अध्ययन से आप क्या निष्कर्ष निकालते हैं? सरल उपाय जैसे कि स्वच्छता बनाए रखना एवं संचरणीय रोगों के फैलने को पर्याप्त रूप से कम कर सकते हैं। अपने क्षेत्र में आयोजित ऐसे सामुदायिक अभियानों के विषय में जानकारी एकत्र कीजिए। इन जानकारियों को अपनी कक्षा में साझा कीजिए और अपने साथियों के साथ ऐसे प्रयासों के प्रभाव पर चर्चा भी कीजिए।
शरीर की रोगों से लड़ने की क्षमता
आपने देखा होगा कि कुछ लोग एक जैसे वातावरण में रहने पर भी दूसरों की अपेक्षा अधिक रोगग्रस्त होते हैं। क्या आप जानते हैं कि ऐसा क्यों होता है? हमारे शरीर की रोगों से लड़ने की प्राकृतिक क्षमता को प्रतिरक्षा कहते हैं। हमारे शरीर में एक विशेष प्रणाली होती है जिसे प्रतिरक्षा प्रणाली कहा जाता है। यह प्रतिरक्षा प्रणाली रोगों से लड़ने में शरीर की सहायता करती है।
आपने बाल्यावस्था में पोलियो, खसरा, टेटेनस (धनु स्तंभ) और हेपेटाइटिस जैसे रोगों से बचाव के लिए कुछ बूँदें (पोलियो ड्रॉप्स) या टीके लिए होंगे। ये टीके (वैक्सीन) विषाणु और जीवाणु के कारण होने वाले गंभीर संक्रमणों से रक्षा करने में सहायता करते हैं।
टीका कुछ विशेष रोगों से लड़ने में हमारे शरीर की सहायता करता है। यह हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को हानिकारक रोगाणुओं को पहचानने और उन पर आक्रमण करने के लिए प्रशिक्षित करता है। इसे उपार्जित प्रतिरक्षा कहते हैं। यह तब विकसित होती है जब शरीर किसी रोगाणु या टीके के संपर्क में आता है। टीके कई प्रकार से बनाए जा सकते हैं, जैसे- क्षीणीकृत अथवा मृत रोगाणुओं (जैसे विषाणु या जीवाणु) से अथवा रोगाणु के निष्क्रिय अथवा हानिरहित भाग से। कुछ नवीन टीके हमारे शरीर की कोशिकाओं को यह निर्देश देते हैं कि वे उस रोगाणु का एक हानिरहित भाग बनाएँ जिससे प्रतिरक्षा प्रणाली उसे पहचानकर उसके विरुद्ध लड़ना सीख जाती है।
उदाहरण के लिए प्रायः किसी चोट (खरोंच या घाव) के पश्चात दिया जाने वाला टेटेनस (धनुस्तंभ) का टीका, टेटेनस उत्पन्न करने वाले जीवाणु से होने वाले संक्रमण से बचाता है। इसमें जीवाणु का निष्क्रियित आविष होता है जो शरीर में रोग उत्पन्न किए बिना प्रतिरक्षा प्रणाली की सुरक्षा विकसित करने में सहायता करता है।
क्या आप जानते हैं कि पहले टीके की खोज कब हुई थी?
एडवर्ड जेनर और चेचक का टीका
चेचक एक घातक रोग था जो फफोले पैदा करता था और इससे करोड़ों लोगों की मृत्यु हो चुकी थी। गायों में पाया जाने वाला अपेक्षाकृत कम गंभीर रोग, जिसे गौशीतला (काउपॉक्स) कहते हैं, मनुष्यों को भी संक्रमित करता था। 17वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इंग्लैंड के चिकित्सक एडवर्ड जेनर ने यह खोज की कि जिन लोगों को गौशीतला हो चुका है उन्हें चेचक नहीं हुआ। इस खोज ने प्रथम टीके के आविष्कार का मार्ग प्रशस्त किया और लोगों को चेचक से बचाने में सहायता की।
आधुनिक टीकों से बहुत पहले भारत में चेचक से बचाव के लिए एक पारंपरिक विधि का उपयोग किया जाता था जिसे मसूरिकाकरण (वैरियोलेशन) कहा जाता था। इसमें चेचक के फफोलों से लिए गए पदार्थ को त्वचा पर खरोंच कर लगाया जाता था जिससे अपेक्षाकृत कम गंभीर संक्रमण होता था और शरीर में प्रतिरक्षा (इम्युनिटी) विकसित हो जाती थी। जो लोग यह प्रक्रिया करते थे उन्हें 'टीकेदार' कहा जाता था।
अवलोकन
जेनर ने देखा कि दूध दुहने वाली जिन ग्वालिनों को गौशीतलता हुआ वे चेचक से संक्रमित नहीं हुईं। संभवतः ऐसा इसलिए था क्योंकि दोनों रोगों के विषाणु संबंधित थे।
परिकल्पना
गौशीतला के फफोलों में उपस्थित पदार्थ ने व्यक्तियों को चेचक से सुरक्षा प्रदान की।परीक्षण
उन्होंने यह परीक्षण करने के लिए एक लड़के में गौशीतला से उत्पन्न फफोलों के तरल पदार्थ को अंतर्क्षपित किया जिससे बाद में चेचक रोग के संपर्क में आने पर भी इस रोग के कोई लक्षण 90
उसमें दिखाई नहीं दिए।परिणाम
उन्होंने पाया कि जिन लोगों को गौशीतला के फफोलों से निकले तरल पदार्थ से संक्रमित किया गया था, वे अब चेचक के प्रति प्रतिरोधी हो गए थे।
।अनुप्रयोग
व्यापक स्तर पर टीकाकरण से अंततः पूरे विश्व से चेचक का उन्मूलन करने में सहायता मिलीनवजात शिशुओं से लेकर वृद्धों तक टीके सभी आयु के लोगों को अनेक गंभीर रोगों से बचाने के सबसे प्रभावी उपायों में से एक हैं। वे रोगों की रोकथाम में सहायता करते हैं, संक्रमण के प्रसार को कम करते हैं और प्रतिवर्ष करोड़ों जीवन बचाते हैं। यह स्मरण रखना महत्त्वपूर्ण है कि टीके रोकथाम के लिए होते हैं, चिकित्सा के लिए नहीं। ये रोगों की गंभीरता कम करने में सहायता करते हैं परंतु यदि कोई पहले से ही रोगग्रस्त है तो उसका उपचार नहीं करते हैं। कुछ लोगों में टीकों के प्रति भय और संशय हो सकता है यद्यपि वैज्ञानिक और चिकित्सक सुरक्षा की दृष्टि से सावधानीपूर्वक इन टीकों का परीक्षण करते हैं। टीका लगवाना न केवल आपको सुरक्षित रखता है अपितु आपके आस-पास के व्यक्तियों की भी सुरक्षा करता है।
टीका उत्पादन में भारत की भूमिका
भारत विश्व के सबसे बड़े टीका उत्पादकों में से एक है। यहाँ व्यापक स्तर पर टीकों को निर्मित किया जाता है एवं अनेक देशों को उनकी आपूर्ति की जाती है। भारतीय टीका कंपनियों ने कोविड-19 महामारी के दौरान महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। साथ ही यह कंपनियाँ वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य देखभाल के प्रयासों में निरंतर सहयोग दे रही हैं।
महाराज किशन भान एक प्रसिद्ध भारतीय चिकित्सक और वैज्ञानिक थे। जैव प्रौद्योगिकी विभाग के सचिव के रूप में उन्होंने भारत में विज्ञान और नवाचार को प्रोन्नत करने में सहायता की। उन्होंने बच्चों को अतिसार से बचाने वाले रोटावायरस के टीके को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे किफायती स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने के लिए शोध के उपयोग में विश्वास करते थे। इसके साथ ही उन्होंने भारत में स्वास्थ्य और जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए।
3.5.1 रोगों का उपचार यदि हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली किसी
यदि हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली किसी संक्रामक रोग से हमें बचाने में असफल हो जाती है तो हम रोगग्रस्त हो जाते हैं और हमें चिकित्सक के पास जाना पड़ता है। चिकित्सक हमें प्रतिजैविक औषधियाँ (एंटीबायोटिक्स) दे सकते हैं जो रोग का कारण बनने वाले जीवाणुओं को नष्ट करती हैं। प्रतिजैविक औषधियाँ केवल जीवाणु से होने वाले संक्रमणों के लिए प्रभावी हैं क्योंकि ये जीवाणु कोशिकाओं के मात्र उन्हीं भागों को लक्षित करते हैं जो मानव अथवा अन्य जंतु कोशिकाओं से भिन्न होते हैं। ये विषाणु या प्रोटोजोआ से होने वाले रोगों के लिए प्रभावी नहीं है।
प्रथम प्रतिजैविक पेनिसिलिन की खोज
पेनिसिलिन की खोज 1928 में लंदन के जीवाणु विज्ञानी अलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने की थी। हानिकारक जीवाणुओं का अध्ययन करते समय उन्होंने देखा कि एक अप्रयुक्त पेट्री डिश पर लगी फफूँद ने जीवाणु की वृद्धि को अवरुद्ध कर दिया था। उन्होंने यह जाना कि यह फफूँद एक ऐसा पदार्थ निर्मुक्त करता है जो जीवाणु को नष्ट कर देता है। यह आकस्मिक खोज पहले प्रतिजैविक पेनिसिलिन की खोज का कारण बनी जिसका उपयोग जीवाण्विक संक्रमणों की चिकित्सा के लिए किया जाता है।
यद्यपि प्रतिजैविक औषधियाँ जीवाण्विक संक्रमणों से हमें बचाने में प्रभावी हैं और उनकी खोज के पश्चात करोड़ों जीवन बचाए जा सके हैं। परंतु उनका अनियंत्रित उपयोग उनकी प्रभावशीलता में कमी का कारण बन रहा है (चित्र 3.5, क)। आपने देखा होगा कि वर्तमान समय में मुख्य समाचारों में प्रतिजैविक प्रतिरोध की चर्चा होती है जिसका अर्थ है एक ऐसी परिघटना जहाँ पहले किसी प्रतिजैविक के द्वारा नष्ट किए गए जीवाणु उस प्रतिजैविक के द्वारा उपचार के पश्चात भी जीवित रहते हैं और गुणन करते हैं। यह स्थिति सामान्य संक्रमणों की चिकित्सा को कठिन बना देती है और जटिलताओं, दीर्घकालिक रोगों और यहाँ तक कि मृत्यु की संभावना बढ़ा देती है।

क्रियाकलाप 3.7- आइए, निष्कर्ष निकालें
- चित्र 3.5 (ख) में दिए गए सूचना आरेख का अध्ययन करें। आपके विचार से जीवाण्विक रोगजनकों में प्रतिजैविक प्रतिरोध कैसे विकसित हुआ? प्रतिजैविक प्रतिरोध को कम करने के लिए कौन-कौन सी सावधानियाँ रखी जा सकती हैं?
- प्रतिजैविक प्रतिरोध की समस्या से निपटने के लिए हमें प्रतिजैविक औषधियों का उपयोग समझदारी से करना चाहिए और केवल चिकित्सक द्वारा प्रदिष्ट किए जाने पर सही मात्रा में और निर्धारित अवधि तक ही इनका सेवन करना चाहिए। अनावश्यक उपयोग से बचने से प्रतिरोधी जीवाणुओं की वृद्धि को रोकने में सहायता प्राप्त होती है एवं इससे प्रतिजैविक औषधियाँ भावी पीढ़ियों के लिए प्रभावी बनी रहती हैं।

भारत में आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी जैसी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों का उपयोग वर्षों से सामान्य स्वास्थ्य समस्याओं के प्रबंधन के लिए किया जाता रहा है। इनमें जड़ी-बूटियों, तेलों और खनिजों जैसे प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग रोगों के उपचार और स्वास्थ्य सुधार के लिए किया जाता है। इसके साथ ही स्वस्थ जीवनशैली और संतुलित आहार पर बल दिया जाता है। यद्यपि ये प्रणालियाँ कुछ परिस्थितियों में सहायक हो सकती हैं एवं दैनिक जीवन में स्वास्थ्य को बनाए रखने में उपयोगी हैं तथापि ये सभी रोगों और प्रत्येक स्थिति में प्रभावी नहीं होती हैं।
असंचरणीय रोगों के उपचार में लक्षणों के प्रबंधन और जीवन की गुणवत्ता सुधारने पर ध्यान दिया जाता है जो औषधियों, जीवनशैली में परिवर्तन और पुनर्वास के माध्यम से किया जाता है। शीघ्र निदान और निरंतर देखभाल रोग की प्रगति को नियंत्रित करने और जटिलताओं को रोकने के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
- स्वास्थ्य का अर्थ है पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की स्थिति न कि मात्र रोगों की अनुपस्थिति।
- प्रसन्न रहना हमें सक्रिय और स्वस्थ बनाए रखता है। साथ ही अच्छा स्वास्थ्य हमारी मनोदशा को भी बेहतर करता है। स्वास्थ्य और प्रसन्नता का परस्पर घनिष्ठ संबंध है।
- रोग शरीर या मन के सामान्य कार्य प्रणाली को बाधित करता है। लक्षण वे होते हैं जिनका हम अनुभव करते हैं, जैसे- पीड़ा या थकान इसके साथ ही संकेत वे होते हैं जो देखे या मापे जा सकते हैं, जैसे- चकत्ते या ज्वर।
- असंचरणीय रोग, जैसे - मधुमेह और हृदय रोग जीवनशैली और पर्यावरणीय कारणों से होते हैं रोगाणुओं से नहीं। इनकी रोकथाम प्रायः स्वस्थ आदतों के अनुपालन, जीवनशैली में परिवर्तन और नियमित व्यायाम से की जा सकती है।
- संक्रामक रोग जीवाणु, विषाणु अथवा कृमि जैसे रोगजनकों से होते हैं।
- हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली हानिकारक रोगजनकों से हमें बचाती है।
- टीके किसी रोगाणु के मृत, क्षीणीकृत या हानिरहित भाग होते हैं और रोगों की रोकथाम के लिए प्रतिरक्षा प्रणाली को प्रशिक्षित करते हैं।
- रोग का उचित निदान रोग के प्रबंधन और उपचार के लिए आवश्यक है।
- चित्रों में दर्शाए गए रोगों को संचरणीय अथवा असंचरणीय रोगों के रूप में समूहित करें।
- रोगों को व्यापक रूप से संचरणीय और असंचरणीय रोगों के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है। नीचे दिए गए विकल्पों में से असंचरणीय रोगों को पहचानिए।
(i) आंत्र ज्वर (ii) अस्थमा (iii) मधुमेह (iv) खसरा (क) (i) और (ii) (ख) (ii) और (iii) (ग) (i) और (iv) (घ) (ii) और (iv) - आपके विद्यालय में फ्लू का प्रकोप हुआ है। आपके अनेक सहपाठी अनुपस्थित हैं जबकि कुछ खाँसते और छींकते हुए विद्यालय आ रहे हैं।
संक्रमण को और अधिक फैलने से रोकने के लिए विद्यालय द्वारा तत्काल क्या उपाय किए जाने चाहिए?
यदि आपके साथ बेंच पर बैठने वाले सहपाठी में फ्लू के लक्षण दिखने लगें तो आप उन्हें दुःख अथवा ठेस पहुँचाए बिना कैसे प्रतिक्रिया देंगे?
इस स्थिति में आप स्वयं को और दूसरों को संक्रमित होने से कैसे बचा सकते हैं? - 4. आपका परिवार ऐसे स्थान पर यात्रा की योजना बना रहा है जहाँ मलेरिया का प्रकोप है।
(i) यात्रा से पूर्व, यात्रा के समय और यात्रा के पश्चात आपको कौन-कौन सी सावधानियाँ रखनी चाहिए?
(ii) आप अपने भाई अथवा बहन को मच्छरदानी या मच्छर प्रतिकर्षी का महत्त्व कैसे समझाएँगे?
(iii) यदि ऐसे क्षेत्रों में यात्री स्वास्थ्य सलाह की अनदेखी करते हैं तो क्या हो सकता है? - आपके चाचाजी ने अपने मित्रों की संगत में पड़कर धूम्रपान करना आरंभ कर दिया है जबकि यह सर्वविदित है कि धूम्रपान स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है और मृत्यु का कारण भी बन सकता है।
(i) आप उन्हें ठेस पहुँचाए बिना उनसे ऐसा क्या कहेंगे जिससे कि वे इसे छोड़ दें?
(ii) यदि आपके मित्र ने पार्टी में आपको धूम्रपान करने के लिए कहा तो आप क्या करेंगे?
(iii) विद्यालय ऐसी हानिकारक आदतों से विद्यार्थियों को बचाने में कैसे सहायता कर सकते हैं? - - सानिया अपनी सखी विनीता से कहती है, "प्रतिजैविक औषधियाँ किसी भी संक्रमण को ठीक कर सकती हैं इसलिए हमें रोगों की चिंता नहीं करनी चाहिए।" विनीता ऐसे कौन-कौन से प्रश्न पूछ सकती हैं जिससे सानिया समझ सके कि उसका कथन गलत है?
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निम्नलिखित तालिका में एक वर्ष की अवधि में एक चिकित्सालय में अंकित किए गए
डेंगू के मामलों की संख्या की जानकारी दी गई है-
क्र.सं. 1 2 3 4 5 6 माह जनवरी फरवरी मार्च अप्रैल मई जन डेंगू के मामलों की संख्या 10 12 15 18 22 40
क्र.सं. 7 8 9 10 11 12 माह जुलाई अगस्त सितंबर अक्तूबर नवंबर दिसंबर डेंगू के मामलों की संख्या 65 65 65 30 30 20 आप एक बार ग्राफ (दंड आलेख) बनाइए जिसमें Y-अक्ष पर मामलों की संख्या और X-अक्ष पर माह के नाम अंकित हों। अपने निष्कर्षों का समीक्षात्मक विश्लेषण कीजिए एवं निम्नलिखित प्रश्नों के उत्तर दीजिए-
(i) किन तीन महीनों में डेंगू के मामले सबसे अधिक थे?
(ii) किस महीने अथवा महीनों में मामले सबसे कम थे?
(iii) डेंगू के सर्वाधिक प्रकोप वाले महीनों में कौन-से प्राकृतिक या पर्यावरणीय कारण इसके मामलों में वृद्धि का कारण बन सकते थे?
(iv) कुछ ऐसे निवारक उपाय सुझाइए जो समुदाय अथवा सरकार द्वारा ऐसे समय से पूर्व किए जा सकते हैं जब डेंगू के मामले सबसे अधिक होते हैं ताकि डेंगू के प्रकोप को कम किया जा सके? - कल्पना कीजिए कि आप एक विद्यालय के स्वास्थ्य अभियान के प्रभारी हैं। इस भूमिका में आप संचरणीय और असंचरणीय रोगों को कम करने के लिए कौन-कौन से मुख्य संदेश देंगे?
- यह सलाह दी जाती है कि वायरल संक्रमण, जैसे- सर्दी, खाँसी या फ्लू में प्रतिजैविक औषधियाँ न लें। क्या आप इस सलाह के संभावित कारण बता सकते हैं?
- किसी संक्रमित व्यक्ति के उत्सर्जी पदार्थ द्वारा पेयजल के संदूषित होने पर निम्नलिखित में से कौन-कौन से रोग फैल सकते हैं?
यकृतशोथ (हेपेटाइटिस) ए, क्षयरोग (टीबी), पोलियोमाइलाइटिस, हैजा, चेचक
- जब हमारा शरीर किसी रोगजनक (रोगाणु) का पहली बार सामना करता है तो हमारी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया सामान्यतः कम होती है परंतु जब उसी रोगजनक से पुनः सामना होता है तो शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया पहली बार की तुलना में कहीं अधिक प्रबल होती है। ऐसा क्यों होता है?





- विद्यार्थी कम से कम एक महीने तक एक स्वास्थ्य दैनंदिनी बनाएँ और उसमें अपने भोजन, स्वच्छता, व्यायाम, नींद, स्क्रीन समय और भावनात्मक स्थिति को लिखें।
- भारतीय वैज्ञानिकों यथा सुनीती सोलोमन, असिमा चट्टर्जी, येल्लाप्रगाडा सुब्बाराव, मैरी पूनन लूकोस के स्वास्थ्य और रोगों के क्षेत्र में योगदान के विषय में पढ़िए।
- जानलेवा रोग चेचक का टीकाकरण के माध्यम से उन्मूलन किया गया था। पता लगाइए कि यह कैसे संभव हुआ और यह क्यों प्रभावी रहा। चर्चा कीजिए कि क्या दूसरों की सुरक्षा के लिए सभी को टीकाकरण करवाने की आवश्यकता होती है?
- वर्तमान दिशा-निर्देशों के अनुसार अचानक श्वास रुकने की स्थिति में वयस्क पर हृदय-फुफ्फुसीय पुनर्जीवन (कार्डियोपल्मोनरी रिससिटेशन या सी.पी.आर.) करने के सही क्रम को सीखिए। विद्यालय में किसी चिकित्सक या विशेषज्ञ को आमंत्रित करके एक नकली आपातकालीन अभ्यास (मॉक ड्रिल) के लिए कहा जा सकता है।
- विद्यालय में एक चिकित्सक को आमंत्रित कीजिए। कुपोषण, अल्प पोषण और अति पोषण के मुद्दों पर चिकित्सक से वार्तालाप करने के लिए विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया जा सकता है।
- यदि आपको अपना स्वास्थ्य पत्रक (हैल्थ कार्ड) बनाने का अवसर मिले तो आप इसमें क्या-क्या सम्मिलित करना चाहेंगे? अपना स्वास्थ्य पत्रक बनाइए और इस पर चर्चा कीजिए।
- 'क्या फास्ट फूड का पालतू पशुओं पर कोई नकारात्मक प्रभाव पड़ता है?' इस विषय पर चर्चा कीजिए।
अपने साथियों द्वारा निर्मित प्रश्नों पर चिंतन कीजिए और उत्तर देने का प्रयास कीजिए...






